44. परमेश्वर की प्रजा कौन होते हैं? सेवाकर्त्ता कौन होते हैं?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

"पाँच समझदार कुँआरियाँ" मेरे द्वारा सृजित मनुष्यों के बीच में से मेरे पुत्रों और मेरे लोगों को दर्शाती हैं। उन्हें "कुँवारियाँ" इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे पृथ्वी पर पैदा होने पर भी मेरे द्वारा प्राप्त किए गए हैं; उन्हें पवित्र कहा जा सकता है, इसलिए उन्हें "कुँआरियाँ" कहा जाता है। पूर्वोक्त "पाँच" मेरे पुत्रों और मेरे लोगों की संख्या को दर्शाता है, जिन्हें मैंने पूर्वनियत किया है। "पाँच मूर्ख कुँआरियाँ" सेवा करने वालों को संदर्भित करता है। वे जीवन को जरा-सा भी महत्व दिए बिना केवल बाहरी चीज़ों का अनुसरण करते हुए मेरे लिए सेवा करते हैं (क्योंकि उनमें मेरी गुणवत्ता नहीं है, चाहे वे कुछ भी क्यों न करें, वह बाहरी चीज़ ही होती है), और वे मेरे सक्षम सहायक होने में असमर्थ हैं, इसलिए उन्हें "मूर्ख कुँआरियाँ" कहा जाता है। पूर्वोक्त "पाँच" शैतान का प्रतिनिधित्व करता है, और उन्हें "कुँआरियाँ" कहे जाने के तथ्य का अर्थ है कि वे मेरे द्वारा जीते जा चुके हैं और मेरे लिए सेवा करने में सक्षम हैं, किंतु इस तरह के व्यक्ति पवित्र नहीं हैं, इसलिए उन्हें सेवा करने वाले कहा जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 116' से उद्धृत

स्थिति अब वह नहीं है, जो कभी थी, और मेरा कार्य एक नए प्रस्थान-बिंदु में प्रवेश कर चुका है। ऐसा होने के कारण एक नया दृष्टिकोण होगा : वे सब, जो मेरा वचन देखते हैं और उसे ठीक अपने जीवन के रूप में स्वीकार करते हैं, वे मेरे राज्य में परमेश्वर के लोग हैं। चूँकि वे मेरे वचनों का मार्गदर्शन स्वीकार करते हैं, अत: भले ही उन्हें परमेश्वर के लोग कहा जाता है, यह उपाधि मेरे "पुत्र" कहे जाने से किसी भी रूप में कम नहीं है। परमेश्वर के लोगों में शामिल होने के बाद सभी को मेरे राज्य में अधिकतम निष्ठा के साथ सेवा करनी चाहिए और मेरे राज्य में उन्हें अपने कर्तव्य पूरे करने चाहिए। जो कोई मेरे प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करेगा, उसे मेरी सजा अवश्य मिलनी चाहिए। यह सभी के लिए मेरी सलाह है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 1' से उद्धृत

केवल परमेश्वर के आगे शांत रहने वाले लोग ही जीवन को महत्व देते हैं, आत्मा में संगति को महत्व देते हैं, परमेश्वर के वचनों के प्यासे होते हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं। जो कोई भी परमेश्वर के आगे शांत रहने को महत्व नहीं देता है और परमेश्वर के समक्ष शांत रहने का अभ्यास नहीं करता वह अहंकारी और अल्पज्ञ है, संसार से जुड़ा है और जीवन-रहित है; भले ही वे कहें कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे केवल दिखावटी बात करते हैं। जिन्हें परमेश्वर अंततः सिद्ध बनाता है और पूर्णता देता है, वे लोग हैं जो परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रह सकते हैं। इसलिए जो लोग परमेश्वर के समक्ष शांत होते हैं, वे बड़े आशीषों का अनुग्रह प्राप्त करते हैं। जो लोग दिन भर में परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के लिए शायद ही समय निकालते हैं, जो पूरी तरह से बाहरी मामलों में लीन रहते हैं और जीवन में प्रवेश को थोड़ा ही महत्व देते हैं—वे सब ढोंगी हैं, जिनके भविष्य में विकास के कोई आसार नहीं हैं। जो लोग परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकते हैं और जो वास्तव में परमेश्वर से संगति कर सकते हैं, वे ही परमेश्वर के लोग होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के बारे में' से उद्धृत

अभी अधिकांश लोग (जिसका अर्थ है कि ज्येष्ठ पुत्रों को छोड़कर सभी लोग) इसी स्थिति में हैं। मैं इन चीज़ों को बहुत स्पष्ट रूप से कहता हूँ और इन लोगों की कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है और ये लोग फिर भी अपने शारीरिक आनंद की परवाह करते हैं—वे खाते हैं और फिर वे सो जाते हैं; वे सोते हैं और फिर खाते हैं, और वे मेरे वचनों पर विचार नहीं करते हैं। यहाँ तक कि यदि वे उत्साहित भी होते हैं, तो ऐसा केवल थोड़ी देर के लिए होता है, और बाद में वे वैसे ही रह जाते हैं जैसे थे, पूरी तरह से अपरिवर्तित, मानो कि उन्होंने मुझे बिल्कुल भी नहीं सुना। ये सामान्य निर्बल इंसान हैं जिनके पास कोई ज़िम्मेदारी नहीं है—सबसे स्पष्ट मुफ़्तखोर लोग। बाद में, मैं उन्हें एक-एक करके त्याग दूँगा। चिंता मत करो! एक-एक करके मैं उन्हें वापस अथाह-कुंड में भेज दूँगा। पवित्र आत्मा इस तरह के व्यक्ति पर कभी भी कार्य नहीं करता है, और वे जो कुछ भी करते हैं वह उन उपहारों से आता है जो उन्होंने प्राप्त किये हैं। जब मैं इस उपहार के बारे में बात करता हूँ, तो मेरा मतलब है कि यह कोई बिना जीवन वाला व्यक्ति है, जो मेरा, सेवादार है। मैं उनमें से किसी को भी नहीं चाहता हूँ और मैं उन्हें ख़त्म कर दूँगा (किन्तु फिलहाल वे अभी भी थोड़े उपयोगी हैं)।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 102' से उद्धृत

और इन सेवा करने वालों की भूमिका क्या है? परमेश्वर के चुने हुए लोगों की सेवा करना। मुख्य रूप से, उनकी भूमिका परमेश्वर के काम आना, परमेश्वर के कार्य में सहयोग करना, और परमेश्वर के चुने हुए लोगों की पूर्णता में सहयोग करना है। ... सेवा करने वाले की पहचान सेवा करने वाले की ही है, किन्तु परमेश्वर के लिए, वे उन चीज़ों में से एक ही हैं जिनकी उसने रचना की है—यह मात्र इतना ही है कि उनकी भूमिका सेवा करने वालों की है। परमेश्वर के प्राणियों में से एक के रूप में, क्या एक सेवा करने वाले और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के बीच कोई अन्तर है? वस्तुतः, अंतर नहीं है। नाममात्र के लिए कहें तो, एक अंतर है, सार रूप में एक अन्तर है, वे जो भूमिका निभाते हैं उसके अनुसार अन्तर है, किन्तु परमेश्वर इन लोगों में कोई भेदभाव नहीं करता है। तो क्यों इन लोगों को सेवा करने वालों के रुप में परिभाषित किया जाता है? तुम लोगों को इस बात को समझना चाहिए। सेवा करने वाले अविश्वासियों में से आते हैं। अविश्वासियों का उल्लेख हमें बताता है कि उनका अतीत बुरा है: वे सब नास्तिक हैं, अपने अतीत में वे नास्तिक थे, वे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते थे, और वे परमेश्वर के, सत्य के, और सकारात्मक बातों के प्रति शत्रुतापूर्ण थे। वे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते थे और नहीं मानते थे कि कोई परमेश्वर है, तो क्या वे परमेश्वर के वचनों को समझने में सक्षम हैं? यह कहना उचित होगा कि, काफी हद तक, वे सक्षम नहीं हैं। ठीक जैसे कि पशु मनुष्य के शब्दों को समझने में सक्षम नहीं हैं, वैसे ही सेवा करने वालों को भी यह समझ में नहीं आता है कि परमेश्वर क्या कह रहा है, वह क्या चाहता है, उसकी ऐसी अपेक्षा क्यों है—उनकी समझ में नहीं आता है, ये बातें उनकी समझ से बाहर हैं, वे अप्रबुद्ध रहते हैं। और इस कारण से, वे लोग उस जीवन को धारण नहीं करते हैं जिसके बारे में हमने बात की थी। बिना जीवन के, क्या लोग सत्य को समझ सकते हैं? क्या वे सत्य से सुसज्जित है? क्या वे परमेश्वर के वचनों के अनुभव और ज्ञान से सुसज्जित हैं? (नहीं।) सेवा करने वालों के इसी तरह के उद्गम है। किन्तु चूँकि परमेश्वर इन लोगों को सेवा करने वाला बनाता है, इसलिए उनसे उसकी अपेक्षाओं के भी स्तर हैं; वह उन्हें तुच्छ दृष्टि से नहीं देखता है, और वह उनके प्रति बेपरवाह नहीं है। यद्यपि वे उसके वचनों को नहीं समझते हैं, और बिना जीवन के हैं, फिर भी परमेश्वर उनके प्रति दयावान है, और तब भी उनसे उसकी अपेक्षाओं के मानक हैं। तुम लोगों ने अभी-अभी इन मानकों के बारे में बोला है: परमेश्वर के प्रति वफादार होना, और वही करना जो वह कहता है। अपनी सेवा में तुम्हें अवश्य वहीं सेवा करनी चाहिए जहाँ आवश्यकता है, और बिल्कुल अंत तक सेवा करनी चाहिए। यदि तुम एक निष्ठावान सेवा करने वाले बन सकते हो, और अन्त तक सेवा कर सकते हो, यदि तुम एक निष्‍ठावान सेवा करने वाला बन सकते हो, बिल्कुल अंत तक सेवा करने में सक्षम हो हो, और परमेश्वर द्वारा तुम्हें दिए गए आदेश को सर्वथा पूर्ण कर पाते हो, तो तुम एक मूल्यवान जीवन जीओगे और इसलिए तुम शेष रह पाओगे। यदि तुम थोड़ा अधिक प्रयास करते हो, यदि तुम थोड़ा अधिक परिश्रम से प्रयास करते हो, परमेश्वर को जानने के अपने प्रयास को दोगुना कर पाते हो, परमेश्वर के ज्ञान के बारे में थोड़ा अधिक बोल पाते हो, परमेश्वर की गवाही दे सकते हो, और इसके अतिरिक्त, यदि तुम परमेश्वर की इच्छा में से कुछ समझ सकते हो, परमेश्वर के कार्य में सहयोग कर सकते हो, और परमेश्वर की इच्छा के प्रति कुछ-कुछ सचेत हो सकते हो, तब तुम्हारे, इस सेवा करने वाले के, भाग्य में बदलाव होगा। और भाग्य में यह परिवर्तन क्या होगा? तुम शेष नहीं रह पाओगे। तुम्हारे आचरण और तुम्हारी व्यक्तिगत आकांक्षाओं और खोज के आधार पर, परमेश्वर तुम्हें चुने हुओं में से एक बनाएगा। यह तुम्हारे भाग्य में परिवर्तन होगा। सेवा करने वालों के लिए, इस बारे में सर्वोत्तम बात क्या है? वह यह है कि वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से एक बन सकते हैं। ... क्या यह अच्छा है? हाँ, है, और यह एक अच्छा समाचार है। कहने का तात्पर्य है कि, सेवा करने वालों को ढाला जा सकता है। यह वह मामला नहीं है कि सेवा करने वाले के लिए, जब परमेश्वर उसे सेवा के लिए निर्धारित करता है, तो वह हमेशा ऐसा ही करेगा; ऐसा होना आवश्यक नहीं है। उसके व्यक्तिगत आचरण के आधार पर, परमेश्वर उसे भिन्न तरीके से सँभालेगा, और उसे भिन्न प्रकार से उत्तर देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

परमेश्वर के लोग कौन हैं? परमेश्वर से संबंध रखने वाले सभी लोग राज्य के युग में रह सकते हैं और बचाये जा सकते हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है और सत्य को प्राप्त किया है, वे ऐसे लोग हैं जिनके पास नया जीवन है। परमेश्वर के लोगों के पास परमेश्वर का सच्चा ज्ञान है, वे सत्य का अभ्यास कर सकते हैं, और अंततः कई परीक्षणों, शुद्धिकरणों, क्लेशों और आपदाओं से गुज़रने के बाद, वे पूर्ण किए जा चुके हैं। परमेश्वर के लोग वे हैं जिन्हें परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के बाद पूर्ण किया जाता है। परमेश्वर से संबंधित सभी लोगों में तीन गुण होते हैं: एक, उनके पास एक ऐसा हृदय होता है जो परमेश्वर का सम्मान करता है, यही मुख्य बात है; दो, उनकी मानवता काफी अच्छी होती है, उनकी एक अच्छी प्रतिष्ठा होती है, ज्यादातर लोग उनको स्वीकार करते हैं; तीन, वे अपना कर्तव्य वफादारी के साथ पूरा करते हैं। अगर लोगों के पास ये तीन विशेषताएँ हैं, तो वे परमेश्वर के लोग हैं। परमेश्वर के लोगों में से एक के रूप में, यह मायने नहीं रखता है कि उसकी क्षमता कितनी उच्च है; वास्तव में, उसकी क्षमता कम से कम औसत होती है, वह औसत सत्य को समझ सकता है, लेकिन मुख्य बात यह है कि उसके पास ऐसा हृदय होता है जो परमेश्वर का सम्मान करता है, उसके पास अच्छी मानवता होती है। चाहे तुम उसे कहीं भी क्यों न रखो, और चाहे तुम उसे कोई भी काम करने को क्यों न कहो, वह बहुत विश्वसनीय होता है। वह तुम्हारे सामने एक तरह का, और तुम्हारी पीठ पीछे किसी और तरह का नहीं होता है, वह दोगला नहीं होता, वह बाहर से सहमत लेकिन छुपकर विरोधी नहीं होता है। बल्कि वह ईमानदार होता है, भरोसेमंद होता है, वह दूसरों में विश्वास पैदा करता है। ऐसे लोग वे सभी हैं जिनमें काफी अच्छी मानवता होती है और जो काफी ईमानदार होते हैं; इस प्रकार के लोग राज्य के युग में परमेश्वर के लोग हैं।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

सेवा करने वालों ने सत्य को अपना जीवन नहीं बनाया है, वे केवल परमेश्वर के लिए सेवा करते हैं, परमेश्वर के लिए उनका हृदय ईमानदार होता है, उनमें आस्था होती है, उनमें अच्छी मानवता होती है, लेकिन वे सत्य को उतना पसंद नहीं करते हैं। वे परमेश्वर के लिए उत्साहपूर्वक स्वयं को खपाते हैं, और किसी भी कठिनाई को सहन करने के लिए तैयार होते हैं, वे बिलकुल अंत तक अनुसरण करते हैं और परमेश्वर को कभी नहीं छोड़ते हैं। इस प्रकार के लोग समर्पित सेवा करने वालों से संबंधित हैं और उन्हें बनाये रखा जाएगा। ... ऐसा क्यों कहा जाता है कि वे सेवा करने वालों की श्रेणी से संबंधित हैं? क्योंकि वे सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं! जो व्यक्ति सत्य का अनुसरण करता है उसके लिए ऐसे पल भी आते हैं जब उसकी भ्रष्टता प्रकट होती है, ऐसे मौके भी आते हैं जब वह पराजय में गिर पड़ता है, लेकिन एक बार जब उसे काट-छाँट दिया जाता है, या एक बार उसका निपटारा कर लिया जाता है, उसे परमेश्वर के घर से निष्कासित कर दिया जाता है, और वह कुछ विफलताओं और रुकावटों का अनुभव कर लेता है, तो उसकी समझ में आ जाता है कि, "जो सत्य के बिना है, वह बहुत दयनीय है, जो जोश पर भरोसा करता है वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता है! यदि कोई सत्य का अभ्यास नहीं कर सकता है, यदि कोई सत्य को नहीं समझता है, तो वह अपने कर्तव्य को मानक तक पूरा करने का प्रयास नहीं कर सकता है, क्या ऐसा व्यक्ति सेवा करने वाला नहीं है? मैं सत्य का अनुसरण करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता हूँ! मैं एक सेवा करने वाला नहीं बन सकता हूँ, परमेश्वर के हृदय को सान्त्वना देने और परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान करने के लिए मुझे अवश्य अपने कर्तव्य को मानक तक पूरा करने का प्रयास करना चाहिए।" वह जागता है, और सत्य का अनुसरण करना शुरू करता है, और अंत में वास्तव में कुछ सत्य प्राप्त करता है, उसके पास वास्तव में एक ऐसा हृदय विकसित होने लगता है जो परमेश्वर का सम्मान करता है। क्या इस तरह के लोग सेवा करने वाले हैं? वे परमेश्वर के लोगों से संबंधित हैं, क्योंकि उनके पास अब कुछ सत्य है, उनके पास ऐसा हृदय है जो परमेश्वर का सम्मान करता है, एक ऐसा हृदय है जो परमेश्वर से प्रेम करता है। जैसे ही वे अवज्ञाकारी और प्रतिरोधी बनते हैं, वे इसे जान लेते हैं, और वे परमेश्वर के सामने पश्चाताप करते हैं, फिर वे बदल जाते हैं; इस तरह का व्यक्ति वह है जो अपना जीवन सत्य में बिताता है।

क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर के लोगों और सेवा करने वालों के बीच बड़ा अंतर है? हालाँकि यह अंतर बहुत बड़ा नहीं है, या उतना स्पष्ट नहीं है, लेकिन सार रूप में वे एक जैसे नहीं हैं। सेवा करने वालों के पास केवल परमेश्वर के प्रति थोड़ा डर होता है, वे सिर्फ कहते हैं, "परमेश्वर का अपमान मत करो! यदि तुम परमेश्वर का अपमान करोगे तो तुम दंडित किए जाओगे!" क्या इसे परमेश्वर के प्रति एक सच्ची श्रद्धा माना जा सकता है? वे लोग जिनके पास परमेश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा वाला हृदय है, वे न केवल इस बात का विचार करते हैं कि क्या वे परमेश्वर का अपमान करेंगे या नहीं, बल्कि वे इस बात का भी विचार करते हैं कि क्या वे सत्य के विरुद्ध जा रहे हैं या नहीं, क्या वे परमेश्वर के वचनों के विरुद्ध जा रहे हैं या नहीं, क्या कुछ करना परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारिता है, क्या वह परमेश्वर के हृदय को कष्ट पहुँचा सकता है, वे परमेश्वर को कैसे संतुष्ट कर सकते हैं। वे इन सभी पहलुओं पर विचार करते हैं, यह एक ऐसा हृदय रखना है जो परमेश्वर का सम्मान करता हो। जिसके पास ऐसा हृदय है जो परमेश्वर का सम्मान करता हो और सत्य का अभ्यास करता हो, वह कम से कम बुराई से तो दूर रह सकता है, और वह उन चीजों को नहीं कर सकता है जो परमेश्वर का विरोध करती हैं। वह इस आधार-रेखा से परे जाने में सक्षम है; इसे ऐसा हृदय रखना कहा जाता है जो परमेश्वर का सम्मान करता है। परमेश्वर का सम्मान करने वाला हृदय रखने और परमेश्वर से कुछ डरने वाला हृदय रखने के बीच एक अंतर है। यदि कोई ऐसा व्यक्ति जिसके पास परमेश्वर का सम्मान करने वाला हृदय है वास्तव में कुछ सच्चाइयों को समझता है, और परमेश्वर के कुछ वचनों को अभ्यास में ला सकता है, तो इस व्यक्ति के पास निश्चित रूप से जीवन है; सत्य ही जिसका जीवन है वह परमेश्वर के लोगों से संबंधित है। सेवा करने वालों के पास उनके जीवन के रूप में सत्य नहीं होता है, उन्हें सत्य पसंद नहीं होता है, और उनके पास केवल परमेश्वर पर आस्था होती है। इसके अलावा, उनके पास उत्साह होता है, उनकी मानवता कम से कम औसत होती है; वे परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाने के लिए तैयार रहते हैं। चाहे घर में कितनी भी परेशानियाँ क्यों न हों, चाहे वे कैसी भी स्थिति का सामना क्यों न करें, चाहे वे कैसी भी परीक्षाओं का सामना क्यों न करें, वे परमेश्वर की सेवा करने में लगे रहते हैं, बिना पीछे हटे, बिल्कुल अंत तक समर्पित रहते हैं। ये ऐसे लोग हैं जो वफादार सेवा करने वाले बने रहेंगे। कुछ सेवा करने वाले अंत तक सेवा नहीं करते हैं; जैसे ही वे सुनते हैं कि वे आशीष प्राप्त नहीं करेंगे, वे सेवा करना बंद कर देते हैं। कुछ सेवा करने वाले, जो अच्छी तरह से सेवा करने में अक्षम होते हैं, वे किसी को भी अपने मामले में हस्तक्षेप नहीं करने देते हैं; जैसे ही कोई उनके साथ हस्तक्षेप करता है, वे कहते हैं, "मैं अब और सेवा नहीं करूँगा, मैं घर जा रहा हूँ।" कुछ सेवा करने वाले, गंभीर परिस्थितियों का सामना करने पर, उदाहरण के लिए, गिरफ्तार किए जाने पर, कायर बन जाते हैं और पीछे हट जाते हैं। कुछ सेवा करने वाले, सेवा करते हुए भी अपने परिवार के जीवन के बारे में चिंतित रहते हैं, "मेरा परिवार कैसे रहेगा? मुझे अवश्य वापस जाना चाहिए और कुछ पैसे कमाने चाहिए, मुझे अवश्य अपने पति (या पत्नी) और बच्चों की अच्छी देखभाल करनी चाहिए।" वे काम करते वक्त, परमेश्वर के प्रति निष्ठा रखे बिना, पीछे की ओर देखते हैं। इस प्रकार के सेवा करने वाले मानक के अनुसार नहीं हैं, और इसलिए हटा दिए जाएंगे।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

अतीत में, बहुत से लोग ऐसे थे जो यह नहीं समझते कि परमेश्वर के लोग कौन हैं। आखिरकार, परमेश्वर के लोग क्या हैं? क्या यह सच है कि परमेश्वर के लोग हम हैं, जिन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार किया है? ऐसा नहीं है कि जब तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर का नाम स्वीकार करते हो, तब तुम परमेश्वर के लोगों में से एक बन जाते हो। इसके लिए, पूर्ण किये जाने की एक प्रक्रिया है जिसका एक मानदंड है। वह मानदंड क्या है? यह तुम्हारे द्वारा अपने कर्तव्य को एक मानक तक पूरा किया जाना है, और केवल तभी तुम परमेश्वर के लोगों में से एक होगे, और जो लोग अपना कर्तव्य करने में मानदंड तक नहीं पहुंच पाएं हैं, वे परमेश्वर के लोग नहीं हैं। अगर वे परमेश्वर के लोग नहीं हैं, तो वे आखिर क्या हैं? वे सेवा कर्ता हैं। मानदंड तक पहुंचने से पहले अभ्यास के चरण में, उन्हें सेवा कर्ता कहा जाता है। जिन लोगों ने अभी तक सत्य प्राप्त नहीं किया है उन्हें सेवा कर्ता कहा जाता है। जब कोई सत्य प्राप्त कर लेता है और सिद्धांत के अनुसार मामलों को संभालने में सक्षम हो जाता है, तो इसका मतलब है कि उसने जीवन प्राप्त कर लिया है। जिन लोगों ने सत्य को अपना जीवन बनाया है, वे ही वास्तव में परमेश्वर के लोग हैं।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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