1. परमेश्वर-जन कौन होते हैं और सेवाकर्ता कौन होते हैं

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

स्थिति अब वह नहीं है, जो कभी थी, और मेरा कार्य एक नए आरंभ-बिंदु में प्रवेश कर चुका है। ऐसा होने के कारण एक नया दृष्टिकोण होगा : वे सब, जो मेरा वचन देखते हैं और उसे अपने जीवन के रूप में स्वीकार करते हैं, वे लोग मेरे राज्य में हैं, और मेंरे राज्य में होने के कारण वे मेरे राज्य के लोग हैं। चूँकि वे मेरे वचनों का मार्गदर्शन स्वीकार करते हैं, अत: भले ही उन्हें मेरे लोग कहा जाता है, यह उपाधि मेरे "पुत्र" कहे जाने से किसी भी रूप में कम नहीं है। परमेश्वर के लोग बना दिए जाने के बाद सभी को मेरे राज्य में अधिकतम निष्ठा के साथ सेवा करनी चाहिए और मेरे राज्य में उन्हें अपने कर्तव्य पूरे करने चाहिए। जो कोई मेरे प्रशासनिक आदेशों के खिलाफ अपराध करेगा, उसे मेरी सज़ा अवश्य मिलेगी। यह सभी के लिए मेरी सलाह है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 1' से उद्धृत

चूँकि तुम सभी मेरे लोग कहलाते हो, इसलिए तुम्हें इस योग्य होना चाहिए कि मेरे नाम को महिमामंडित कर सको; अर्थात्, परीक्षण के बीच गवाही दे सको। यदि कोई मुझे मनाने की कोशिश करता है और मुझसे सच छुपाता है, या मेरी पीठ पीछे अपकीर्तिकर व्यवहार करता है, तो ऐसे लोगों को, बिना किसी छूट के मेरे घर से खदेड़ और बाहर निकाल दिया जाएगा ताकि वे इस बात के लिए मेरा इंतज़ार करें कि मैं उनसे कैसे निपटूँगा। अतीत में जो लोग मेरे प्रति विश्वासघाती रहे हैं और संतान की भांति नहीं रहे हैं, और आज फिर से खुलकर मेरी आलोचना करने के लिए उठ खड़े हुए हैं, उन्हें भी मेरे घर से खदेड़ दिया जाएगा। जो मेरे लोग हैं उन्हें लगातार मेरी ज़िम्मेदारियों के प्रति चिंता दर्शानी चाहिए और साथ ही मेरे वचनों को जानने की खोज करते रहना चाहिए। केवल इस तरह के लोगों को ही मैं प्रबुद्ध करूँगा, और वे निश्चित रूप से, कभी भी ताड़ना को प्राप्त न करते हुए, मेरे मार्गदर्शन और प्रबुद्धता के अधीन रहेंगे। जो मेरी ज़िम्‍मेदारियों के प्रति चिंता दर्शाने में असफल रहते हुए, अपने खुद के भविष्य की योजना बनाने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं—अर्थात वे जो अपने कार्यों के द्वारा मेरे हृदय को संतुष्ट करने का लक्ष्य नहीं रखते हैं, बल्कि इसके बजाय भोजन, धन, आदि सामान की तलाश में रहते हैं, मैं इन भिखारी-जैसे प्राणियों का उपयोग करने से पूरी तरह इनकार करता हूँ, क्योंकि वे जब से पैदा हुए हैं, वे बिलकुल नहीं जानते कि मेरी ज़िम्मेदारियों के प्रति चिंता दर्शाने के मायने क्या हैं। वे ऐसे लोग हैं जिनमें सामान्य समझ का अभाव है; ऐसे लोग मस्तिष्क के "कुपोषण" से पीड़ित हैं, और उन्हें कुछ "पोषण" पाने के लिए घर जाने की आवश्यकता है। मेरे लिए ऐसे लोग किसी काम के नहीं हैं। जो मेरे लोग हैं उनमें से प्रत्येक को, मुझे अंत तक वैसे अनिवार्य कर्तव्य के रूप में जानना जरूरी होगा जैसे कि खाना, पहनना, सोना, जिसे कोई एक पल के लिए भी भूलता नहीं, ताकि अंत में, मुझे जानना खाना खाने जितनी जानी-पहचानी चीज़ बन जाए, जिसे तुम सहजतापूर्वक अभ्यस्त हाथों से करते हो। जहाँ तक उन वचनों की बात है जो मैं बोलता हूँ, तो प्रत्येक शब्द को अत्यधिक निष्ठा और पूरी तरह से आत्मसात करते हुए ग्रहण करना चाहिए; इसमें अन्यमनस्क ढंग से किए गए आधे-अधूरे प्रयास नहीं हो सकते हैं। जो कोई भी मेरे वचनों पर ध्यान नहीं देता है, उसे सीधे मेरा विरोध करने वाला माना जाएगा; जो कोई भी मेरे वचनों को नहीं खाता, या उन्हें जानने की इच्छा नहीं करता है, उसे मुझ पर ध्यान नहीं देने वाला माना जाएगा, और उसे मेरे घर के द्वार से सीधे बाहर कर दिया जाएगा। ऐसा इसलिए है, जैसा कि मैंने अतीत में कहा है, कि मैं जो चाहता हूँ, वह यह नहीं है कि बड़ी संख्या में लोग हों, बल्कि उत्कृष्टता हो। सौ लोगों में से, यदि कोई एक भी मेरे वचनों के द्वारा मुझे जानने में सक्षम है, तो मैं इस एक व्यक्ति को प्रबुद्ध और रोशन करने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अन्य सभी को स्वेछा से छोड़ दूँगा। इससे तुम देख सकते हो कि यह अनिवार्य रूप से सत्य नहीं है कि बड़ी संख्या ही मुझे अभिव्यक्त कर सकती है, और मुझे जी सकती है। मैं गेहूँ (चाहे दाने पूरे भरे न हों) चाहता हूँ, न कि जंगली दाने (चाहे उसमें दाने इतने भरे हों कि मन प्रसन्न हो जाए)। उन लोगों के लिए जो तलाश करने की परवाह नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाय शिथिलता से व्यवहार करते हैं, उन्हें स्‍वेच्‍छा से चले जाना चाहिए; मैं उन्हें अब और देखना नहीं चाहता हूँ, अन्‍यथा वे मेरे नाम को अपमानित करते रहेंगे। मैं अपने लोगों से क्या अपेक्षा करता हूँ उस बारे में, अभी मैं इन निर्देशों पर रुकता हूँ, और परिस्थितियाँ कैसे बदलती हैं, इस बात पर निर्भर करते हुए और स्वीकृतियाँ देने के लिए प्रतीक्षा करूँगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 5' से उद्धृत

जो व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर के समक्ष सच में शांत रह सकता है, वह खुद को समस्त सांसारिक बंधनों से मुक्त कर पाता है, और परमेश्वर द्वारा कब्जा किए जाने में समर्थ होता है। वे सभी, जो परमेश्वर के समक्ष शांत होने में असमर्थ हैं, निश्चित रूप से लंपट और स्वछंद हैं। वे सभी, जो परमेश्वर के समक्ष शांत रहने में समर्थ हैं, वे लोग हैं जो परमेश्वर के समक्ष पवित्र हैं, और जो परमेश्वर के लिए लालायित रहते हैं। केवल परमेश्वर के आगे शांत रहने वाले लोग ही जीवन को महत्व देते हैं, आत्मा में संगति को महत्व देते हैं, परमेश्वर के वचनों के प्यासे होते हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं। जो कोई भी परमेश्वर के आगे शांत रहने को महत्व नहीं देता है और परमेश्वर के समक्ष शांत रहने का अभ्यास नहीं करता वह अहंकारी और अल्पज्ञ है, संसार से जुड़ा है और जीवन-रहित है; भले ही वे कहें कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे केवल दिखावटी बात करते हैं। जिन्हें परमेश्वर अंततः सिद्ध बनाता है और पूर्णता देता है, वे लोग हैं जो परमेश्वर की उपस्थिति में शांत रह सकते हैं। इसलिए जो लोग परमेश्वर के समक्ष शांत होते हैं, वे बड़े आशीषों का अनुग्रह प्राप्त करते हैं। जो लोग दिन भर में परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के लिए शायद ही समय निकालते हैं, जो पूरी तरह से बाहरी मामलों में लीन रहते हैं और जीवन में प्रवेश को थोड़ा ही महत्व देते हैं—वे सब ढोंगी हैं, जिनके भविष्य में विकास के कोई आसार नहीं हैं। जो लोग परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकते हैं और जो वास्तव में परमेश्वर से संगति कर सकते हैं, वे ही परमेश्वर के लोग होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत रखने के बारे में' से उद्धृत

परमेश्वर के घर और राज्य का सदस्य—यह उपाधि कहाँ से आती है? लोग इसे कैसे प्राप्त करते हैं? यह एक क़ीमत चुकाने से, और सत्य को समझने के माध्यम से, आती है, तुमने सत्य का अनुसरण किया है और तुम अपने स्वभाव में परिवर्तन के एक निश्चित स्तर पर आ गए हो; अब तुम परमेश्वर को समर्पित हो सकते हो और उसका आदर कर सकते हो, और तुम उसके घर के सदस्य बन गए हो। अय्यूब और पतरस की तरह, तुम्हें अब शैतान के उत्पीड़न और भ्रष्टाचार से और नहीं गुज़रना पड़ेगा। तुम परमेश्वर के घर और उसके राज्य में स्वतंत्र रूप से रहने में सक्षम हो, और तुम्हें अब भ्रष्ट स्वभाव से लड़ने की ज़रूरत नहीं है; तुम परमेश्वर की दृष्टि में, सृष्टि की एक सच्ची वस्तु और एक वास्तविक इंसान हो। इसका अर्थ है कि शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए व्यक्ति के कष्ट के दिन अब पूरी तरह से समाप्त हो गए हैं; अब शांति, आनंद और खुशी का समय है, जिसमें एक व्यक्ति सृष्टिकर्ता के अनुग्रह के प्रकाश में और परमेश्वर के साथ रह सकता है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपनी व्यक्तिगत महिमा के बदले उन हितों को बेच तक देते हैं (IX)' से उद्धृत

राज्य के युग में मनुष्य को पूरी तरह से पूर्ण किया जाएगा। विजय के कार्य के पश्चात् मनुष्य को शुद्धिकरण और क्लेश का भागी बनाया जाएगा। जो लोग विजय प्राप्त कर सकते हैं और इस क्लेश के दौरान गवाही दे सकते हैं, वे वो लोग हैं जिन्हें अंततः पूर्ण बनाया जाएगा; वे विजेता हैं। इस क्लेश के दौरान मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह इस शुद्धिकरण को स्वीकार करे, और यह शुद्धिकरण परमेश्वर के कार्य की अंतिम घटना है। यह अंतिम बार है कि परमेश्वर के प्रबंधन के समस्त कार्य के समापन से पहले मनुष्य को शुद्ध किया जाएगा, और जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, उन सभी को यह अंतिम परीक्षा स्वीकार करनी चाहिए, और उन्हें यह अंतिम शुद्धिकरण स्वीकार करना चाहिए। जो लोग क्लेश से व्याकुल हैं, वे पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर के मार्गदर्शन से रहित हैं, किंतु जिन्हें सच में जीत लिया गया है और जो सच में परमेश्वर की खोज करते हैं, वे अंततः डटे रहेंगे; ये वे लोग हैं, जिनमें मानवता है, और जो सच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं। परमेश्वर चाहे कुछ भी क्यों न करे, इन विजयी लोगों को दर्शनों से वंचित नहीं किया जाएगा, और ये फिर भी अपनी गवाही में असफल हुए बिना सत्य को अभ्यास में लाएँगे। ये वे लोग हैं, जो अंततः बड़े क्लेश से उभरेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

यदि हम "सेवाकर्मी" शब्द को मानवीय भाषा के शब्दों के अनुसार समझने के लिए, इसका एक शाब्दिक अर्थ लेते हैं, तो इसका मतलब है वे अस्थायी कर्मचारी जो किसी उद्योग या नौकरी में अस्थायी सेवाएँ प्रदान करते हैं, और जिनकी आवश्यकता एक तदर्थ आधार पर होती है। परमेश्वर के घर में, उसकी प्रबंधन योजना और उसके काम में, सेवाकर्मियों के रूप में संदर्भित किए गए लोगों का समूह बिल्कुल अपरिहार्य होता है। जब ऐसे लोग परमेश्वर के घर पहुँचते हैं, और परमेश्वर के कार्यस्थल पर आते हैं, तो वे परमेश्वर के बारे में या आस्था के बारे में कुछ नहीं जानते हैं, और न ही उन्हें उसके काम या प्रबंधन योजना के बारे में कुछ भी पता होता है। वे कुछ नहीं समझते; वे सिर्फ आम लोग होते हैं। परमेश्वर के घर में आम लोगों को क्या कहा जाता है? अविश्वासी। जब ऐसे लोग परमेश्वर के घर में आते हैं जो परमेश्वर की नज़रों में अविश्वासी हों, तो वे क्या कर सकते हैं? परमेश्वर को वास्तव में उनसे क्या चाहिए? चूँकि लोगों के पास भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, और उनके प्रकृति-सार के कारण, वे बस वो कर सकते हैं जो उन्हें बताया जाता है, उन निर्देशों को कार्यान्वित कर सकते हैं जो परमेश्वर उन्हें देता है, वे वहाँ जा सकते हैं जहाँ भी उनका काम उन्हें ले जाए, और जो कुछ भी उसके वचन उन्हें जानने की अनुमति दें, उसे ही वे जान सकते हैं। वे केवल जान सकते हैं; समझ हासिल नहीं कर सकते। परमेश्वर के प्रत्येक कार्य में, जिसकी उसे आवश्यकता होती है, लोग केवल निष्क्रिय रूप से सहयोग करते हैं; वे कोई पहल नहीं करते हैं। यदि तुमने वास्तव में कुछ पहल की होती, तो तुमने सत्य और परमेश्वर की इच्छा को समझ लिया होता! यहाँ "निष्क्रिय" का अर्थ है कि तुम नहीं जानते हो कि परमेश्वर क्या करना चाहता है, तुम्हें नहीं पता कि वह तुमसे जो करवाता है उसका मतलब क्या है या उसका मूल्य कहाँ निहित है, और तुम नहीं जानते कि तुम्हें किस तरह का मार्ग अपनाना चाहिए। जब तुम परमेश्वर के घर में आते हो, तो तुम एक मशीन की तरह होते हो; जिस तरह से भी परमेश्वर तुम्हारा संचालन करता है, तुम वैसे ही कार्य करते हो। परमेश्वर को तुम्हारी आवश्यकता किस लिए है? (मानवता का न्याय करने के लिए परमेश्वर द्वारा सत्य को व्यक्त करने के एक साधन के रूप में)। सही है; तुम परमेश्वर के लिए एक ऐसी विषय-वस्तु हो जिसके प्रति उसके वचनों को बोला जाए। और क्या? तुम्हारी प्रतिभाएँ, सही है? क्या सामान्य मानवीय सोच मायने रखती है? यदि तुम सामान्य मानवीय सोच रखते हो, केवल तभी परमेश्वर तुम्हारा उपयोग करेगा। यदि तुम्हारी मानसिक स्थिति असामान्य है, तो तुम सेवाकर्मी बनने के लिए भी योग्य नहीं हो। और क्या? (किसी के कौशल और उसकी ताक़तें)। दूसरे शब्दों में, वे सभी विभिन्न कौशल जो लोगों के पास होते हैं। और क्या? (परमेश्वर के साथ सहयोग करने का संकल्प)। यह भी, कुछ ऐसा है जिसकी उसे अपेक्षा होती है; यह लोगों की एक प्रकार की आकांक्षा होती है, सुनने और समर्पण करने की, और इसे सकारात्मक चीज़ों और प्रकाश से प्रेम करने की इच्छा भी कहा जा सकता है। यदि हम इसे एक संकल्प कहते हैं, तो वो इसे समाहित करने के लिए थोड़ा संकीर्ण हो सकता है। आकांक्षाएँ एक व्यापक दायरे को शामिल करती हैं, और वे अपनी पहुँच के संदर्भ में संकल्पों की तुलना में छोटी होती हैं। अर्थात्, तुम एक आकांक्षा के साथ शुरू करते हो, और आकांक्षा होने के बाद ही तुम धीरे-धीरे विभिन्न संकल्पों को विकसित करोगे। संकल्प अधिक ठोस होते हैं, जबकि आकांक्षाएँ एक अधिक व्यापक दायरे को शामिल करती हैं। सृष्टिकर्ता के दृष्टिकोण से, भ्रष्ट मनुष्यों के संदर्भ में, यही वो चीज़ें हैं, जिनके लिए परमेश्वर को तुम्हारी आवश्यकता है। अर्थात्, जब एक ऐसा आम व्यक्ति परमेश्वर के घर में आता है जिसे परमेश्वर का, उसके प्रबंधन का, उसके सार का, उसके कथनों का, या उसके स्वभाव का कोई ज्ञान नहीं होता, तो वह व्यक्ति एक मशीन की तरह होता है। वह व्यक्ति परमेश्वर के लिए क्या कर सकता है और वह परमेश्वर के काम में कैसे सहयोग कर सकता है, इसका मूल रूप से उस मानक से कोई संबंध नहीं है जिसकी परमेश्वर को आवश्यकता है (सत्य)। एक व्यक्ति की जिन चीज़ों का परमेश्वर उपयोग कर सकता है, वे वो हैं जिनका अभी उल्लेख किया गया: पहला, व्यक्ति परमेश्वर द्वारा बात करने के लिए एक विषय-वस्तु बन जाता है; दूसरा, विभिन्न प्रतिभाएँ जो किसी के पास हों; तीसरा, सामान्य मानवीय सोच का होना; चौथा, विभिन्न कौशल जो किसी व्यक्ति के पास होते हैं; और पाँचवाँ—सबसे महत्वपूर्ण—परमेश्वर के वचनों को सुनने और उनके प्रति समर्पण करने की आकांक्षा का होना। ये बातें प्रमुख होती हैं। जब किसी के पास ये गुण होते हैं, तो वह परमेश्वर के कार्य और उसकी प्रबंधन योजना की सेवा में काम करना शुरू करता है। वह तब औपचारिक रूप से सही मार्ग पर चल देता है, यानी कि वह आधिकारिक तौर पर परमेश्वर के घर में एक सेवाकर्मी बन जाता है।

परमेश्वर के वचनों को, सत्य और परमेश्वर की इच्छा को समझने से पहले, और परमेश्वर के प्रति लेश मात्र भी श्रद्धा विकसित करने से पहले, प्रत्येक व्यक्ति जो भूमिका निभाता है, वह केवल सेवाकर्मी की हो सकती है, और कुछ नहीं। यानी कि, तुम एक सेवाकर्मी हो, भले तुम यह चाहो या न चाहो; तुम इस पदवी से बच नहीं सकते। कुछ लोग कहते हैं, "लेकिन मैंने आजीवन परमेश्वर पर विश्वास किया है; यीशु पर विश्वास करते हुए मुझे कई दशक हो गए हैं। क्या मैं सचमुच अभी भी सिर्फ एक सेवाकर्मी हूँ?" तुम इस प्रश्न के बारे में क्या सोचते हो? तुम किससे पूछ रहे हो? तुम्हें अपने आप से यह पूछना चाहिए: क्या तुम अब परमेश्वर की इच्छा को समझते हो? क्या तुम वर्तमान में केवल कुछ प्रयास कर रहे हो, या तुम सत्य का अभ्यास कर रहे हो? क्या तुमने सत्य की तलाश करने और उसे समझने के मार्ग पर कदम रखा है? क्या तुमने सत्य-वास्तविकता में प्रवेश किया है? क्या तुम्हारे मन में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा है? यदि तुम्हारे पास ये गुण हैं, यदि तुम परमेश्वर के परीक्षणों का सामना करते समय दृढ़ रह सकते हो, और तुम परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में सक्षम हो, तो निश्चित रूप से तुम अब एक सेवाकर्मी नहीं हो। बहरहाल, यदि तुम्हारे पास ये गुण नहीं हैं, तो तुम निस्संदेह अभी भी एक सेवाकर्मी ही हो। यह टाला नहीं जा सकता, और यह अपरिहार्य भी है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपनी व्यक्तिगत महिमा के बदले उन हितों को बेच तक देते हैं (IX)' से उद्धृत

जब लोग परमेश्वर के घर में प्रवेश करते हैं और वे सत्य को नहीं समझते हैं, बल्कि उनके पास केवल विभिन्न आकांक्षाएँ होती हैं या सहयोग करने के लिए वे केवल कुछ संकल्प विकसित करते हैं, तो इस अवधि के दौरान वे जिस भूमिका को पूरा कर सकते हैं, वह केवल सेवाकर्मियों की ही हो सकती है। "सेवा देना" बेशक बहुत अच्छा लगने वाला वाक्यांश नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें तो, इसका मतलब यह होता है कि लोग परमेश्वर की प्रबंधन योजना के कार्य के लिए सेवा और परिश्रम करें, अर्थात वे इसके लिए प्रयास करें। वे कुछ भी समझते या बूझते नहीं हैं, लेकिन उनके पास कुछ कौशल और प्रतिभाएँ होती हैं, और दूसरों की बातों से सीख सकते तथा उन्हें संप्रेषित कर सकते हैं, और सामान्य मामलों के कुछ कार्य करने में सक्षम होते हैं, लेकिन जब परमेश्वर के उद्धार के विशिष्ट कार्य और मानवता के प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं की, साथ ही साथ सत्य से संबंधित कार्य के विभिन्न पहलुओं की, बात आती है वे कोई प्रयास नहीं कर सकते या कोई भी सहयोग नहीं दे सकते हैं; वे केवल कुछ प्रयास करते हैं और सामान्य मामलों के कुछ कार्य करते समय कुछ बातें कहते हैं, और सेवा से संबंधित कुछ परिधीय काम करते हैं। यदि लोगों के कर्तव्य का, या उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाओं और परमेश्वर के घर में उनके द्वारा किए जाने वाले कार्यों का, यही सार है, तो उनके लिए "सेवाकर्मी" की पदवी को हटाना कठिन होगा। क्यों उनके लिए इसे हटाना कठिन होगा? क्या इसका सरोकार इस बात से नहीं है कि परमेश्वर इस उपाधि को किस तरह परिभाषित करता है? लोगों के लिए कुछ प्रयास करना और अपनी सहज क्षमताओं, प्रतिभाओं और बुद्धिमत्ता द्वारा चीज़ों को करना काफ़ी आसान होता है। लेकिन, सत्य से जीना, सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करना, परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करना—ये चीज़ें बहुत श्रमसाध्य होती हैं; वे समय की माँग करती हैं, अगुवाई करने के लिए उन्हें लोगों की आवश्यकता होती है, उन्हें परमेश्वर से प्रबोधन की आवश्यकता होती है, और उन्हें परमेश्वर के अनुशासन की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, न्याय और ताड़ना के लिए उन्हें परमेश्वर के वचनों के आने की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, इस लक्ष्य तक पहुँचने में लगने वाले समय के दौरान, अधिकांश लोग जो काम करने और प्रदान करने में सक्षम होते हैं, वे उन मुट्ठी भर चीज़ों तक सीमित होते हैं: परमेश्वर जिनसे बात करे उन पात्रों की भूमिका का निर्वहन करना; कुछ प्रतिभाएँ रखना और परमेश्वर के घर में कुछ उपयोगी होना; सामान्य मानवजाति की तरह सोचना, और जो भी कार्य तुम्हें आवंटित किया जाए, उसे समझने और कार्यान्वित करने में सक्षम होना; कुछ कौशल से लैस होना और परमेश्वर के घर में जो भी काम तुम्हें करने के लिए दिया जाए, उसे अपनी पूरी क्षमता के अनुसार पूरा करना; और, सबसे महत्वपूर्ण, सुनने और समर्पण करने की आकांक्षा रखना। परमेश्वर के घर में सेवा करते समय, और परमेश्वर के काम में कोशिश करते समय, यदि तुम्हारे पास सुनने और समर्पण करने के प्रति थोड़ा-सा भी झुकाव हो, तो तुम भाग जाने में या परेशानी खड़ी करने में असमर्थ होगे; बल्कि, तुम खुद को संयमित करने तथा कम बुरे और अधिक अच्छे कर्मों को करने की पूरी कोशिश करोगे। यह अधिकांश लोगों की स्थिति और अवस्था होती है, है ना?

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपनी व्यक्तिगत महिमा के बदले उन हितों को बेच तक देते हैं (IX)' से उद्धृत

"सेवा" सुनने में कोई बहुत मनोहर शब्द नहीं है, न ही यह ऐसा कुछ है जिसे कोई चाहेगा, किन्तु हमें यह देखना चाहिए कि यह किसकी ओर लक्षित है। परमेश्वर के सेवाकर्ताओं के अस्तित्व का एक विशेष महत्व है। कोई अन्य उनकी भूमिका नहीं निभा सकता है, क्योंकि उन्हें परमेश्वर द्वारा चुना गया था। और इन सेवाकर्ताओं की भूमिका क्या है? यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों की सेवा करना है। मुख्य रूप से, उनकी भूमिका परमेश्वर के कार्य में अपनी सेवा प्रदान करना, उसमें सहयोग करना, और परमेश्वर के चुने हुए लोगों की पूर्णता में समायोजन करना है। इस बात की परवाह किए बिना कि वे मेहनत कर रहे हैं, कार्य के किसी पहलू पर काम कर रहे हैं, या कुछ कार्य कर रहे हैं, परमेश्वर की इन सेवाकर्ताओं से क्या अपेक्षा है? क्या वह इनसे बहुत अधिक की माँग कर रहा है? (नहीं, वह बस उनसे निष्ठावान रहने को कहता है।) है। सेवाकर्ताओं को भी निष्ठावान होना ही चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारा उद्गम कहाँ से है, या परमेश्वर ने तुम्हें क्यों चुना, तुम्हें परमेश्वर के प्रति, परमेश्वर के तुम्हारे लिए आदेशों के प्रति, और साथ ही उस कार्य के प्रति जिसके लिए तुम उत्तरदायी हो और अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान अवश्य ही होना चाहिए। जो सेवाकर्ता निष्ठावान और परमेश्वर को संतुष्ट करने में समर्थ हैं, उनके लिए परिणाम क्या होगा? वे शेष रह पाएँगे। क्या ऐसा सेवाकर्ता होना जो शेष रह जाता है, एक आशीष है? शेष रहने का क्या अर्थ है? इस आशीष का क्या महत्व है? हैसियत में, वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के असदृश दिखाई देते हैं, वे भिन्न दिखाई देते हैं। लेकिन, वास्तव में, क्या इस जीवन में वे जिसका आनंद लेते हैं, क्या यह वही नहीं है जिसका आनंद परमेश्वर के चुने हुए लोग लेते हैं? कम से कम, इस जीवन में तो यह वैसा ही है। तुम लोग इससे इनकार नहीं करते, है ना? परमेश्वर के कथन, परमेश्वर का अनुग्रह, परमेश्वर द्वारा भरण-पोषण, परमेश्वर के आशीष—कौन इन चीज़ों का आनन्द नहीं उठाता है? हर कोई ऐसी बहुतायत का आनन्द उठाता है। एक सेवाकर्ता की पहचान है, वह जोकि सेवा करता है, किन्तु परमेश्वर के लिए, वह उन चीज़ों में से एक ही है जिनकी उसने रचना की है; यह मात्र इतना ही है कि उनकी भूमिका सेवाकर्ता की है। उन दोनों के ही परमेश्वर के प्राणी होने के नाते, क्या एक सेवाकर्ता और परमेश्वर के चुने हुए व्यक्ति के बीच कोई अन्तर है? वस्तुतः, अंतर नहीं है। नाममात्र के लिए कहें तो, एक अंतर है; सार का और उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के लिहाज से एक अंतर है—किन्तु परमेश्वर लोगों के इस समूह से कोई भेदभाव नहीं करता है। तो क्यों इन लोगों को सेवाकर्ता के रूप में परिभाषित किया जाता है? तुम लोगों को इस बात की कुछ समझ तो होनी ही चाहिए! सेवाकर्ता अविश्वासियों में से आते हैं। जैसे ही हम यह उल्लेख करते हैं कि वे अविश्वासियों में से आते हैं, यह स्पष्ट हो जाता है कि उनका अतीत बुरा है: वे सब नास्तिक हैं और अतीत में भी ऐसे ही थे; वे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते थे, और उसके, सत्य के, और सभी सकारात्मक चीजों के प्रति शत्रुतापूर्ण थे। वे परमेश्वर या उसके अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे। तो क्या वे परमेश्वर के वचनों को समझने में सक्षम हैं? यह कहना उचित होगा कि, काफी हद तक, वे सक्षम नहीं हैं। ठीक जैसे कि पशु मनुष्य के शब्दों को समझने में सक्षम नहीं हैं, वैसे ही सेवाकर्ता भी यह नहीं समझ सकते कि परमेश्वर क्या कह रहा है, वह क्या चाहता है या वह ऐसी माँगें क्यों करता है। वे नहीं समझते; ये बातें उनकी समझ से बाहर हैं, और वे अप्रबुद्ध रहते हैं। इस कारण से, वे लोग उस जीवन को धारण नहीं करते हैं जिसके बारे में हमने बात की थी। बिना जीवन के, क्या लोग सत्य को समझ सकते हैं? क्या वे सत्य से सुसज्जित हैं? क्या उनके पास परमेश्वर के वचनों का अनुभव और ज्ञान है? (नहीं।) सेवाकर्ताओं के उद्गम ऐसे ही हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X' से उद्धृत

क्या "सेवाकर्ता" इंसानों को संबोधित करने के लिए परमेश्वर का एक भेदभावपूर्ण तरीका है? क्या उसने जानबूझकर लोगों को अपमानित करने या बेनक़ाब करने और उनकी परीक्षा लेने के लिए, इस पदवी का इस्तेमाल किया है? (नहीं)। तो, क्या बात यह है कि परमेश्वर इस पदवी का उपयोग लोगों को यह समझाने के लिए करता है कि वे क्या हैं? क्या परमेश्वर के पास इस इरादे का कोई संकेत भी है? दरअसल, परमेश्वर का ऐसा कोई इरादा नहीं है। लोगों को उजागर करना या उन्हें छोटा करना या उनके बारे में कटु टिप्पणी करना उसका उद्देश्य नहीं है, और न ही उसका इरादा इस शब्द के उपयोग के द्वारा लोगों की परीक्षा लेना है। इसका एकमात्र अर्थ यह है: यह पदवी इंसानों के व्यवहार और सार के आधार पर, साथ ही उन भूमिकाओं के आधार पर जिन्हें इंसान परमेश्वर के कार्य के इस चरण में निभा रहे हैं, उनकी क्षमताओं और सहयोग के उनके तरीकों के आधार पर, परमेश्वर ने उत्पन्न और निर्धारित की थी। इस अर्थ में इसे देखते हुए, परमेश्वर के घर का प्रत्येक सदस्य परमेश्वर की प्रबंधन योजना के लिए सेवा करता है और वह पहले इस तरह की भूमिका निभा चुका है। क्या इसे इस तरह से कहा जा सकता है? (हाँ)। ऐसा अवश्य कहा जा सकता है! परमेश्वर किसी की सकारात्मकता पर हमला करने के लिए, या तुम्हारी आस्था, तुम्हारे सच्चे विश्वास की परीक्षा करने के लिए, इस पदवी का उपयोग करना नहीं चाहता है, तुम्हें छोटा करने के लिए, तुम्हें अच्छे आचरण वाला बनाने के लिए, तुम्हें और अधिक आज्ञाकारी बनाने के लिए, या तुम्हारी पहचान और स्थिति से तुम्हें अवगत कराने के लिए तो और भी नहीं; उसका उद्देश्य "सेवाकर्मी" की उपाधि का उपयोग करके लोगों को सृजन की वस्तुओं के रूप में अपने कर्तव्यों को पूरा करने के उनके अधिकार से वंचित करने का तो बिल्कुल ही नहीं होता है। यह पदवी पूरी तरह से लोगों की स्थितियों और उनके सार का, और उस अवस्था का भी जिनमें परमेश्वर का अनुसरण करते हुए वे परमेश्वर के कार्य की प्रक्रिया में होते हैं, परिणाम है। इसलिए, इस पदवी का कोई भी सरोकार इस बात से नहीं होता कि परमेश्वर के प्रबंधन कार्य के पूरे हो जाने के बाद लोगों के पास किस तरह की पहचान, दर्जा, स्थिति, या गंतव्य होंगे। इस पदवी की उत्पत्ति परमेश्वर की प्रबंधन योजना और उसके प्रबंधन-कार्यों की आवश्यकताओं में पूरी तरह से निहित है, और यह एक प्रकार की अवस्था होती है जिसमें, उस कार्य के दौरान, लोग होते हैं। जहाँ तक प्रश्न यह है कि क्या यह अवस्था—जिसमें कोई व्यक्ति परमेश्वर के घर के लिए सेवा प्रदान करने वाला एक सेवा-कर्मी होता है और जिसका एक मशीन की तरह इस्तेमाल किया जाता है—बिल्कुल अंत तक जारी रहेगी या बीच में सुधारी जा सकती है, यह उस व्यक्ति की तलाश पर निर्भर करता है। यदि कोई सत्य की तलाश करता है, अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल कर सकता है, और परमेश्वर के प्रति श्रद्धावान होकर समर्पण कर सकता है, तो उस व्यक्ति को "सेवाकर्मी" की उपाधि से पूरी तरह छुटकारा मिल जाएगा। उस उपाधि को त्यागने के बाद, लोग क्या बन जाते हैं? वे परमेश्वर के सच्चे अनुयायी बन जाते हैं, उसके अपने लोग, राज्य के लोग—अर्थात्, परमेश्वर के राज्य की प्रजा। यदि, इस प्रक्रिया में, तुम केवल एक क़ीमत चुकाने, कष्ट उठाने और प्रयास करने भर से संतुष्ट हो जाते हो, लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं करते या इसे व्यवहार में नहीं लाते, और यदि तुम्हारा स्वभाव थोड़ा भी नहीं बदलता और तुम जो कुछ भी करते हो, उसमें परमेश्वर के घर के सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं करते हो, और तुम अंततः परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखने और समर्पण करने में असमर्थ होते हो, तो "सेवाकर्मी" की यह पदवी—यह "ख्याति का ताज"—तुम्हारे सिर पर पक्का बना रहेगा, और तुम कभी इसे हटा नहीं पाओगे। यदि तुम परमेश्वर के कार्य के समाप्त होने के बाद भी इस तरह की अवस्था में बने रहते हो, और तुम्हारा स्वभाव अभी भी नहीं बदला है, तो "परमेश्वर के राज्य की प्रजा" की उपाधि में तुम्हारा कोई हिस्सा नहीं होगा। इन वचनों को कैसे समझा जा सकता है? तुम लोग यह समझते हो या नहीं? जैसे ही परमेश्वर का काम पूरा हो जाता है, यानी कि जिनको भी वह बचाने जा रहा है उन सभी को बचा लिया जाता है, जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाता है; जब वह अब लोगों से बात नहीं करता या उनका मार्गदर्शन नहीं करता है या इंसानों के लिए उद्धार का अब कोई काम नहीं करता है, जब यह सब पूरा हो जाता है, और उस क्षण में, जब परमेश्वर के कार्य का समापन हो जाता है, तो मुझे बताओ, क्या इसका मतलब यह है कि परमेश्वर में विश्वास का वह मार्ग भी जिस पर हर कोई चल रहा है, समाप्त हो जाएगा? एक पंक्ति है जिसमें लिखा गया है, "जो अन्याय करता है, वह अन्याय ही करता रहे; और जो मलिन है, वह मलिन बना रहे; और जो धर्मी है, वह धर्मी बना रहे; और जो पवित्र है; वह पवित्र बना रहे" (प्रकाशितवाक्य 22:11)। इन वचनों का क्या अर्थ है? इनका अर्थ यह है कि जिस क्षण परमेश्वर कहता है कि उसका काम समाप्त हो गया है, तो इसका मतलब है कि वह अब लोगों को बचाने का, या लोगों के न्याय और उनकी ताड़ना का, कोई भी काम नहीं करेगा; वह अब तुम्हें प्रबुद्ध नहीं करेगा, तुम्हारा मार्गदर्शन नहीं करेगा, या तुम्हें प्रेरित करने के उन श्रमसाध्य वचनों को, या तुम्हारी काट-छाँट करने या तुमसे निपटने के वचनों को, नहीं कहेगा। वह अब इन कार्यों को नहीं करेगा। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि सभी चीज़ों के परिणाम सामने आ गए होंगे, और मानवता के अंत को अंतिम रूप दिया जा चुका होगा। एक भी व्यक्ति इसे बदलने में सक्षम नहीं होगा; तुम्हारे पास और अधिक अवसर नहीं होंगे। इसका मतलब यही है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपनी व्यक्तिगत महिमा के बदले उन हितों को बेच तक देते हैं (IX)' से उद्धृत

कुछ लोग अपने कर्तव्यों का पालन करने में गैर-जिम्मेदार होते हैं। वे किसी समस्या की पहचान तो कर सकते हैं, लेकिन दिल ही दिल में महसूस करते हुए भी, वे या तो दूसरों को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते या इसे गंभीरता से लेने को तैयार नहीं होते। उन्हें लगता है कि यह बहुत बड़ी परेशानी है—वे "ठीकठाक" पर समझौता कर लेते हैं, फिर मामले पर और ध्यान नहीं देते। क्या यह उचित है? यदि तुम्हें अपना कर्तव्य निभाना है, तो तुम्हें जिम्मेदारी लेने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। तुम मामलों को गंभीरता से लेने से इनकार क्यों करते हो? क्या यह कर्तव्य की अवहेलना नहीं है? ... अपने कर्तव्य के प्रति तुम लोगों का नज़रिया यह होता है: "मैं देखूँगा कि मैं कितना कम काम कर सकता हूँ, कितने से काम चल जाएगा; तुम धीरे-धीरे काम करते हो, तुम्हें कोई परवाह नहीं कि तुम्हारी वजह से कितनी देर होती है।" लेकिन अगर तुम लोग चीज़ों को गंभीरता से लो, तो तुम उन्हें झट से पूरा करा सकोगे। कुछ चीज़ें हैं जिन्हें कैसे करना है यह तुम लोग नहीं जानते, इसलिए मैं तुम्हें सटीक निर्देश देता हूँ। तुम लोगों को सोचना नहीं है, तुम्हें बस सुनना है और काम शुरू कर देना है—पर तुम लोगों से यह भी नहीं होता है। तुम लोगों की वफ़ादारी कहाँ है? यह कहीं दिखाई नहीं देती! तुम लोग सिर्फ बातें करते हो, तुम्हारा दिल इसमें नहीं है। तुम्हारा दिल समझ भी ले तो भी, तुम कुछ करते नहीं हो। ऐसा व्यक्ति वो होता है जो सत्य से प्रेम नहीं करता! यदि तुम लोग इसे अपनी आँखों से देख सकते हो और अपने दिल में महसूस भी कर सकते हो, पर फिर भी कुछ नहीं करते, तो दिल होने का क्या फ़ायदा? तुम्हारा बेकार ज़मीर तुम्हारे कर्मों को नियंत्रित नहीं करता, यह तुम्हारे विचारों को निर्देशित नहीं करता—तो इसका क्या काम है? इसका होना, न होना बराबर है; यह तो सिर्फ दिखावे के लिए है। इंसान की आस्था वाक़ई दयनीय होती है! उसके बारे में क्या दयनीय होता है? जब वह सत्य को समझता भी है, तो वह इसे अभ्यास में नहीं डालता है। समस्या को पूरी तरह से समझकर भी वह उसकी ज़िम्मेदारी नहीं उठाता; वह जानता है कि यह उसकी ज़िम्मेदारी है, लेकिन वह इसमें अपना दिल नहीं लगाता है। यदि तुम उन ज़िम्मेदारियों को नहीं उठाते जो तुम्हारे दायरे में हैं, तो उन ज़रा-सी ज़िम्मेदारियों का क्या मोल है जो तुम उठाते हो? उनसे क्या फर्क़ पड़ता है? तुम केवल नाममात्र के लिए कोशिश करते हो, सिर्फ कहने के लिए कहते हो। तुम इसमें अपना दिल नहीं लगाते, इसमें अपनी पूरी ऊर्जा लगाने की बात तो छोड़ ही दो। यह एक स्वीकार्य मानक तक अपना कर्तव्य पूरा करना नहीं है, इसमें कोई निष्ठा नहीं है; तुम केवल अपने माथे के पसीने की खा रहे हो, जैसे-तैसे परमेश्वर के अनुयायी बने हुए हो। क्या ऐसी आस्था का कोई महत्त्व है? ऐसी आस्था बहुत तुच्छ होती है—इसका क्या मोल है? जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो तो तुम्हें एक क़ीमत चुकानी होती है। तुम्हें इसे गंभीरता से लेना होगा। गंभीरता से लेने का क्या अर्थ है? गंभीरता से लेने का अर्थ यह नहीं है कि थोड़ी-सी मेहनत कर लो, या कोई शारीरिक यातना झेल लो। मुख्य बात यह है कि तुम्हारे दिल में परमेश्वर, और एक दायित्व-भार हो। तुम्हारे दिल में तुम्हें अपने कर्तव्य के महत्त्व को तोलना चाहिए, और फिर इस भार को, इस दायित्व को अपने हर काम में उठाए रखना चाहिए और अपना दिल इसमें लगाना चाहिए। तुम्हें स्वयं को उस लक्ष्य के योग्य बनाना चाहिए जो परमेश्वर ने तुम्हें प्रदान किया है, साथ ही तुम्हें खुद को परमेश्वर ने तुम्हारे लिए जो कुछ भी किया है उसके योग्य, और तुमसे उसकी उम्मीदों के योग्य भी बनाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही गंभीर होना है। सिर्फ लापरवाही से काम करने से कुछ न होगा; तुम लोगों को छल सकते हो, पर तुम परमेश्वर को बेवकूफ़ नहीं बना सकते। यदि कर्तव्य को करते समय, कोई सच्चा मूल्य न हो, तुम्हारी कोई निष्ठा न हो, तो यह मानक के अनुसार नहीं है। यदि तुम परमेश्वर में अपनी आस्था को और तुम्हारे काम के निष्पादन को गंभीरता से नहीं लेते हो; यदि तुम हमेशा बिना मन लगाए काम करते हो और अपने कामों में लापरवाह रहते हो, उस अविश्वासी की तरह जो अपने मालिक के लिए काम करता है; यदि तुम केवल नाम-मात्र के लिए प्रयास करते हो, किसी तरह हर दिन गुज़ार देते हो, उन समस्याओं को देखकर उनसे आँखें फेरते हो, कुछ गड़बड़ी हो जाए तो उसकी ओर ध्यान नहीं देते हो, और विवेकशून्य तरीके से हर उस बात को ख़ारिज करते हो जो तुम्हारे व्यक्तिगत लाभ की नहीं—तो क्या यह समस्या नहीं है? ऐसा कोई व्यक्ति परमेश्वर के घर का सदस्य कैसे हो सकता है? ऐसे लोग बाहर के होते हैं; वे परमेश्वर के घर के नहीं हो सकते। अपने दिल में तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि अपने कर्तव्य को पूरा करते समय, क्या तुम एकनिष्ठ और गंभीर हो, और परमेश्वर भी तुम्हारा हिसाब रखता है। तो क्या तुमने कभी भी अपने कर्तव्य के निष्पादन को गंभीरता से लिया है? क्या तुमने इसे दिल लगाकर किया है? क्या तुमने इसे अपना दायित्व, अपनी बाध्यता माना है? क्या तुमने इसके स्वामित्व को अपनाया है? अपने कर्तव्य को करते समय जब तुम किसी समस्या को देखते हो, तो क्या कभी भी तुमने इस बारे में खुलकर बात की है? यदि तुमने समस्या का पता चलने के बाद भी कभी खुलकर बात नहीं की है, न ही इसके बारे में सोचा तक है, यदि तुम इन चीज़ों की चिंता करने से विमुख रहते हो, और सोचते हो कि जितना झंझट कम हो उतना ही अच्छा है—यदि तुमने उन बातों की ओर यह सिद्धांत अपनाया है, तो तुम अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर रहे हो; तुम अपने माथे के पसीने की खा रहे हो, तुम बस सेवा कर रहे हो। सेवा करने वाले परमेश्वर के घर के अपने लोग नहीं होते। वे कर्मचारी होते हैं, अपना काम पूरा करके वे अपना वेतन लेते हैं और चले जाते हैं, हर कोई अपने रास्ते जाता है और वे सब एक दूसरे के लिए अज़नबी हो जाते हैं। उनका परमेश्वर के घर से ऐसा सम्बन्ध होता है। परमेश्वर के घर के सदस्य इससे भिन्न होते हैं: वे परमेश्वर के घर में हर काम जी-जान से करते हैं, वे ज़िम्मेदारी उठाते हैं, परमेश्वर के घर में कौन-सा काम ज़रूरी है यह उनकी आँखें देख लेती हैं और वे उन कामों को अपने दिमाग में रखते हैं, वे जो भी सोचें और देखें उसे याद रखते हैं, वे भार उठाते हैं, उनमें ज़िम्मेदारी का एक एहसास होता है—ऐसे लोग परमेश्वर के घर के सदस्य होते हैं। क्या तुम लोग इस बिंदु तक पहुँचे हो? (नहीं।) तो फिर तुम लोगों को अभी भी एक लम्बा रास्ता तय करना होगा, इसलिए तुम लोगों को अनुसरण करना ज़ारी रखना होगा! यदि तुम स्वयं को परमेश्वर के घर का सदस्य नहीं मानते और स्वयं को हटा लेते हो—तो परमेश्वर तुम्हें किस तरह से देखता है? परमेश्वर तुम्हें बाहर का नहीं मानता, ये तुम ही हो जिसने अपने आप को उसके दरवाज़े के बाहर कर दिया है। तो अगर वस्तुगत भाव से देखें, तो सही मायने में तुम किस तरह के इंसान हो? तुम उसके घर में नहीं हो। परमेश्वर जो भी कहता है या जो भी निर्णय लेता है, उससे क्या इस बात का कोई सरोकार है? यह तुम ही हो जिसने अपना छोर, अपना स्थान परमेश्वर के घर के बाहर रखा है—इसके लिए और किसे दोष दिया जा सकता है?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने कर्तव्य को अच्छी तरह निभाने के लिए कम से कम, एक जमीर का होना आवश्यक है' से उद्धृत

अभी अधिकांश लोग (मतलब ज्येष्ठ पुत्रों को छोड़कर सभी लोग) इसी स्थिति में हैं। मैं इन चीज़ों को बहुत स्पष्ट रूप से कहता हूँ, फिर भी इन लोगों की कोई प्रतिक्रिया नहीं होती और ये लोग अपने शारीरिक सुख में ही लगे रहते हैं—खाते हैं और सो जाते हैं; सोते हैं और फिर खाते हैं, मेरे वचनों पर विचार नहीं करते। जब वे उत्साहित भी होते हैं, तो ऐसा केवल थोड़ी देर के लिए होता है, और बाद में वे वैसे ही बन जाते हैं जैसे थे, पूरी तरह से अपरिवर्तित, मानो उन्होंने मुझे सुना ही नहीं। ये अजीब से, बेकार इंसान हैं जिनके पास कोई ज़िम्मेदारी नहीं है—ये साफ तौर पर बेहद मुफ़्तखोर लोग होते हैं। बाद में, मैं उन्हें एक-एक कर त्याग दूँगा। चिंता मत करो! एक-एक कर, मैं उन्हें वापस अथाह-कुंड में भेज दूँगा। पवित्र आत्मा ने ऐसे लोगों पर कभी कार्य नहीं किया, और वे जो कुछ भी करते हैं, वह उन उपहारों से आता है जो उन्होंने प्राप्त किये हैं। जब मैं उपहारों की बात करता हूँ, तो मेरा मतलब है कि ये निष्प्राण लोग हैं, जो मेरे सेवादार हैं। मैं उनमें से किसी को भी नहीं चाहता, मैं उन्हें हटा दूँगा (किन्तु फिलहाल वे थोड़े उपयोगी हैं)। तू जो सेवादार है, मेरी बात सुन! यह मत सोच कि तेरा उपयोग करने से मेरा मतलब है कि मैं तेरा पक्ष लेता हूँ। यह इतना आसान नहीं है। यदि तू चाहता है कि मैं तेरा पक्ष लूँ, तो तुझे ऐसा व्यक्ति बनना होगा जिसका मैं अनुमोदन करूँ और जिसे मैं व्यक्तिगत रूप से पूर्ण बनाऊँ। मैं ऐसे ही व्यक्ति से प्रेम करता हूँ। भले ही लोग कहें कि मैंने ग़लती की है, मैं कभी इनकार नहीं करूँगा। क्या तू जानता है? जो लोग सेवा प्रदान करते हैं वे मवेशी और घोड़े हैं। वे मेरे ज्येष्ठ पुत्र कैसे हो सकते हैं? क्या यह बेवकूफी नहीं होगी? क्या यह प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं होगा? जिनके पास भी मेरा जीवन है, मेरी गुणवत्ता है, वे मेरे ज्येष्ठ पुत्र हैं। यह एक तर्कसंगत बात है—कोई भी इसका खंडन नहीं कर सकता। ऐसा ही होना चाहिए, अन्यथा ऐसा कोई भी नहीं होगा जो यह भूमिका निभा सके, कोई भी नहीं होगा जो इसका विकल्प बन सके। यह कोई भावुकता में की गई बात नहीं है, क्योंकि मैं स्वयं ही धार्मिक परमेश्वर हूँ; मैं स्वयं ही पवित्र परमेश्वर हूँ; मैं प्रतापी, अनुलंघनीय परमेश्वर हूँ!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 102' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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