4. परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त लोगों के सत्य के अनुरूप शब्दों और परमेश्वर के वचनों के बीच अंतर

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मेरे वचन सदा-सर्वदा अपरिवर्तनीय सत्‍य हैं। मैं मनुष्य के लिए जीवन की आपूर्ति और मानव-जाति के लिए एकमात्र मार्गदर्शक हूँ। मेरे वचनों का मूल्य और अर्थ इससे निर्धारित नहीं होता कि उन्हें मानव-जाति द्वारा पहचाना या स्वीकारा जाता है या नहीं, बल्कि स्वयं वचनों के सार द्वारा निर्धारित होता है। भले ही इस पृथ्वी पर एक भी व्यक्ति मेरे वचनों को ग्रहण न कर पाए, मेरे वचनों का मूल्य और मानव-जाति के लिए उनकी सहायता किसी भी मनुष्य के लिए अपरिमेय है। इसलिए ऐसे अनेक लोगों से सामना होने पर, जो मेरे वचनों के खिलाफ विद्रोह करते हैं, उनका खंडन करते हैं, या उनका पूरी तरह से तिरस्कार करते हैं, मेरा रुख केवल यह रहता है : समय और तथ्यों को मेरी गवाही देने दो और यह दिखाने दो कि मेरे वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं। उन्हें यह दिखाने दो कि जो कुछ मैंने कहा है, वह सही है, और वह ऐसा है जिसकी आपूर्ति लोगों को की जानी चाहिए, और इतना ही नहीं, जिसे मनुष्य को स्वीकार करना चाहिए। मैं उन सबको, जो मेरा अनुसरण करते हैं, यह तथ्य ज्ञात करवाऊँगा : जो लोग पूरी तरह से मेरे वचनों को स्वीकार नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों का अभ्यास नहीं कर सकते, जिन्हें मेरे वचनों में कोई लक्ष्य नहीं मिल पाता, और जो मेरे वचनों के कारण उद्धार प्राप्त नहीं कर पाते, वे लोग हैं जो मेरे वचनों के कारण निंदित हुए हैं और इतना ही नहीं, जिन्होंने मेरे उद्धार को खो दिया है, और मेरी लाठी उन पर से कभी नहीं हटेगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्‍वर द्वारा बोले गए वचन दिखने में भले ही सीधे-सादे या गहन हों, लेकिन वे सभी सत्य हैं, और जीवन में प्रवेश करने वाले मनुष्य के लिए अपरिहार्य हैं; वे जीवन-जल के ऐसे झरने हैं, जो मनुष्य को आत्मा और देह दोनों से जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं। वे मनुष्‍य को जीवित रहने के लिए हर ज़रूरी चीज़ मुहैया कराते हैं; उसके दैनिक जीवन के लिए सिद्धांत और मत; मार्ग, लक्ष्‍य और दिशा, जिससे होकर गुज़रना उद्धार पाने के लिए आवश्‍यक है; उसके अंदर परमेश्वर के समक्ष एक सृजित प्राणी के रूप में हर सत्‍य होना चाहिए; तथा हर वह सत्य होना चाहिए कि मनुष्‍य परमेश्‍वर की आज्ञाकारिता और आराधना कैसे करता है। वे मनुष्य का अस्तित्व सुनिश्चित करने वाली गारंटी हैं, वे मनुष्य का दैनिक आहार हैं, और ऐसा मजबूत सहारा भी हैं, जो मनुष्य को सशक्त और अटल रहने में सक्षम बनाते हैं। वे उस सामान्य मानवता के सत्य की वास्तविकता से संपन्‍न हैं जिसे सृजित मनुष्य जीता है, वे उस सत्य से संपन्‍न हैं, जिससे मनुष्य भ्रष्टता से मुक्त होता है और शैतान के जाल से बचता है, वे उस अथक शिक्षा, उपदेश, प्रोत्साहन और सांत्वना से संपन्‍न हैं, जो स्रष्टा सृजित मानवजाति को देता है। वे ऐसे प्रकाश-स्तंभ हैं, जो मनुष्य को सभी सकारात्‍मक बातों को समझने के लिए मार्गदर्शन और प्रबुद्धता देते हैं, ऐसी गारंटी हैं जो यह सुनिश्चित करती है कि मनुष्य उस सबको जो धार्मिक और अच्‍छा है, उन मापदंडों को जिन पर सभी लोगों, घटनाओं और वस्‍तुओं को मापा जाता है, तथा ऐसे सभी दिशानिर्देशों को जिए और प्राप्त करे, जो मनुष्‍य को उद्धार और प्रकाश के मार्ग पर ले जाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

मेरा व्याख्यान मेरे अस्तित्व को दर्शाता है, परन्तु जो मैं कहता हूँ वह मनुष्य की पहुँच से परे होता है। मैं जो कहता हूँ, वह वो नहीं है जिसका मनुष्य अनुभव करता है, वह कुछ ऐसा नहीं है जिसे मनुष्य देख सकता है; न ही वो है जिसे वह स्पर्श कर सकता है; बल्कि यह वो है जो मैं हूँ। कुछ लोग केवल इतना ही स्वीकार करते हैं कि जो मैं संगति करता हूँ वह मैंने अनुभव किया है, परन्तु वे इस बात को नहीं पहचानते कि यह पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। निस्संदेह, जो मैं कहता हूँ वह मैंने अनुभव किया है। मैंने ही छः हजार वर्षों से प्रबंधन का कार्य किया है। मैंने मनुष्यजाति के सृजन के आरम्भ से लेकर आज तक हर चीज़ का अनुभव किया है; कैसे मैं इसके बारे में बात नहीं कर पाऊँगा? जब मनुष्य की प्रकृति की बात आती है, तो मैंने इसे स्पष्ट रूप से देखा है; मैंने बहुत पहले ही इसका अवलोकन कर लिया था। कैसे मैं इसके बारे में स्पष्ट रूप से बात नहीं कर पाऊँगा? चूँकि मैंने मनुष्य के सार को स्पष्टता से देखा है, इसलिए मैं मनुष्य को ताड़ना देने और उसका न्याय करने के योग्य हूँ, क्योंकि सभी मनुष्य मुझ से ही आए हैं परन्तु उन्हें शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है। निस्संदेह, मैं उस कार्य का आकलन करने के भी योग्य हूँ जो मैंने किया है। यद्यपि यह कार्य मेरे देह द्वारा नहीं किया जाता, फिर भी यह पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है, और यही मेरा स्वरूप है। इसलिए, मैं इसे व्यक्त करने और उस कार्य को करने के योग्य हूँ जो मुझे करना चाहिए। जो कुछ लोग कहते हैं उसका उन्होंने अनुभव किया होता है। वही उन्होंने देखा है, जहाँ तक उनका दिमाग पहुँच सकता है और जिसे उनकी इंद्रियाँ महसूस कर सकती हैं। उसी की वे संगति कर सकते हैं। देहधारी परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं और वे उस कार्य को अभिव्यक्त करते हैं जो पवित्रात्मा द्वारा किया गया है, जिसे देह ने अनुभव नहीं किया है या देखा नहीं है, लेकिन फिर भी अपने अस्तित्व को व्यक्त करता है, क्योंकि देह का सार पवित्रात्मा है, और वह पवित्रात्मा के कार्य को व्यक्त करता है। यद्यपि यह देह की पहुँच से परे है, फिर भी इस कार्य को पवित्रात्मा द्वारा पहले ही कर लिया गया है। देहधारण के पश्चात्, देह की अभिव्यक्ति के माध्यम से, वह लोगों को परमेश्वर के अस्तित्व को जानने में सक्षम बनाता है और लोगों को परमेश्वर के स्वभाव और उस कार्य को देखने देता है जो उसने किया है। मनुष्य का कार्य लोगों को इस बारे में अधिक स्पष्ट होने में सक्षम बनाता है कि उन्हें किसमें प्रवेश करना चाहिए और उन्हें क्या समझना चाहिए; इसमें लोगों को सत्य को समझने और उसका अनुभव करने की ओर ले जाना शामिल है। मनुष्य का कार्य लोगों को पोषण देना है; परमेश्वर का कार्य मानवजाति के लिए नए मार्गों और नए युगों को प्रशस्त करना है, और लोगों के सामने वह प्रकट करना है जिसे नश्वर लोग नहीं जानते, जिससे वे परमेश्वर के स्वभाव को जानने में सक्षम हो जाएँ। परमेश्वर का कार्य सम्पूर्ण मानवजाति की अगुवाई करना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा जो प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त किया जाता है वह सत्य है। पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से निकलने वाली कोई भी चीज़ केवल सत्य के अनुरूप होती है, क्योंकि पवित्र आत्मा लोगों को उनके आध्यात्मिक कद के आधार पर प्रबुद्ध करता है और मनुष्य को प्रत्यक्ष रूप से सत्य नहीं बता सकता। इस चीज़ को तुम्हें समझना चाहिए। और जब सत्य के वचनों के आधार पर, लोगों को अंतर्दृष्टि और अनुभव से ज्ञान प्राप्त होता है, तो क्या ऐसी अंतर्दृष्टि और ज्ञान को सत्य में गिना जाएगा? अधिक से अधिक, यह सत्य का एक छोट-सा ज्ञान होता है। पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता वाले वचन परमेश्वर के वचनों को निरूपित नहीं करते, वे सत्य को निरूपित नहीं करते, उनका सत्य से संबंध नहीं होता; वे केवल सत्य का थोड़ा-सा ज्ञान, पवित्र आत्मा की थोड़ी-सी प्रबुद्धता होते हैं। यदि लोगों को सत्य का कुछ ज्ञान प्राप्त होता है और फिर वे दूसरों तक उसे पहुँचाते हैं, तो यह भी व्यक्तिगत ज्ञान और अनुभवों की आपूर्ति है। वे लोगों तक सत्य नहीं पहुँचा रहे हैं। यह कहा जा सकता है कि यह सत्य की संगति है—इसे बयान करने का यह उचित तरीका है। क्योंकि यह साधारण मामला नहीं है और अधिकतर लोग इसकी गहराई में जाने में अक्षम हैं, इसलिए तुम्हें इसे स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए; यह केवल सटीक वचन का मामला नहीं है या तुम्हें केवल कुछ व्याख्याओं को ही समझने की ज़रूरत है, और कुछ नहीं। तुम्हें शायद सत्य से कुछ चीज़ें प्राप्त हुई हों, वे चीज़ें जो मनुष्य के पास होनी चाहिए, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि तुमने सत्य को प्राप्त कर लिया है। हो सकता है कि तुमने सत्य से कुछ और चीज़ें भी प्राप्त की हों, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि अब तुम्हारे पास सत्य का जीवन है, यह कहना तो दूर की बात रही कि तुम सत्य के हो—ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। तुमने अपने जीवन का पोषण करने के लिए सत्य से केवल कुछ पौष्टिक प्राप्त किया है, ताकि तुम्हारे भीतर कुछ ऐसा हो, जिसे तुम्हारे पास होना चाहिए, जो परमेश्वर में विश्वास करता है और परमेश्वर को संतुष्ट करता है। परमेश्वर सत्य का उपयोग लोगों को पोषण देने के लिए करता है, उन्हें अनुमति देता है कि वे सत्य के माध्यम से उसे संतुष्ट करें और उसके हृदय के अनुरूप बनें। अंततः, लोग जब परमेश्वर की इच्छा को पूरी तरह संतुष्ट कर देते हैं, तब भी यह नहीं कहा जा सकता कि वे सत्य के हैं, यह कहना तो दूर की बात रही कि उनके भीतर सत्य का जीवन है। ... प्रत्येक व्यक्ति सत्य का अनुभव करता है, लेकिन हर कोई विभिन्न परिस्थितियों में ऐसा करता है और हर व्यक्ति को कुछ अलग प्राप्त होता है। यदि उनके ज्ञान को एक साथ मिला दिया जाए, तब भी वे एक सत्य को व्यक्त करने में असमर्थ रहेंगे। सत्य इतना गहरा होता है! ऐसा क्यों कहा जाता है कि तुमने जो चीज़ें प्राप्त की हैं वे और तुम्हारा ज्ञान सत्य के प्रतीक नहीं हो सकते? तुम दूसरों के साथ अपने ज्ञान की संगति करते हो, और इसका पूरी तरह अनुभव करने से पहले उन्हें चिंतन करने में केवल दो या तीन दिन लगते हैं। लेकिन लोगों को पूरा जीवनकाल बिताने के बाद भी सत्य का पूरी तरह अनुभव नहीं हो पाता; प्रत्येक व्यक्ति ने जो कुछ अनुभव किया है, यदि उसे एक साथ मिला दिया जाए, तब भी सत्य का अनुभव पूरी तरह नहीं होगा। इसीलिए यह देखा जा सकता है कि सत्य असाधारण रूप से गहरा होता है। सत्य को पूरी तरह से शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मनुष्य की भाषा में, सत्य मानवजाति का वास्तविक सार है। सत्य का पूरी तरह अनुभव करने में मनुष्य कभी सक्षम नहीं होगा। मनुष्य को सत्य के साथ जीना चाहिए। एक सत्य पूरी मानवजाति के अस्तित्व को कई हज़ार वर्षों तक बनाए रख सकता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'क्या तुम जानते हो कि सत्य वास्तव में क्या है?' से उद्धृत

सत्य स्वयं परमेश्वर का जीवन है; यह उसके स्वभाव, सार और उसमें निहित हर चीज़ का प्रतिनिधित्व करता है। यदि तुम कहते हो कि थोड़े-से अनुभवों के होने का मतलब सत्य का होना है, तो क्या तुम परमेश्वर के स्वभाव का प्रतिनिधित्व कर सकते हो? तुम्हारे पास कुछ अनुभव हो सकता है, सत्य के किसी निश्चित पहलू या उसके किसी एक पक्ष से संबंधित प्रकाश हो सकता है, लेकिन तुम दूसरों को हमेशा के लिए इसकी आपूर्ति नहीं कर सकते, इसलिए यह जो प्रकाश तुमने प्राप्त किया है, सत्य नहीं है; यह केवल एक मुकाम है जिस तक लोग पहुँच सकते हैं। यह महज़ उचित अनुभव और उचित समझ है, कुछ वास्तविक अनुभव और सत्य का ज्ञान है, जो इंसान में होना चाहिए। यह रोशनी, प्रबोधन और अनुभवजन्य समझ सत्य का स्थान कभी नहीं ले सकते; अगर सभी लोग इस सत्य का अनुभव कर भी लेते और अपनी समस्त अनुभवजन्य समझ को एक साथ जोड़ लेते, तो भी वे उस एक सत्य के बराबर नहीं हो सकते थे। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, "मैं मानव जगत के लिए इस बात को एक कहावत के साथ पूरा करता हूँ : मनुष्यों में, कोई भी ऐसा नहीं जो मुझे प्रेम करता है।" यह सच्चा बयान है; यह जीवन का सच्चा सार है। सभी बातों में यह सबसे गहन है; यह परमेश्वर स्वयं की अभिव्यक्ति है। तुम इसे अनुभव करते रह सकते हो और यदि तुम इसे तीन सालों तक अनुभव करते हो तो तुम्हें इसकी एक सतही समझ प्राप्त होगी; अगर तुम इसे सात या आठ साल तक अनुभव करते हो तो तुम्हें उससे भी अधिक समझ मिलेगी, लेकिन जो भी समझ तुम हासिल करोगे वो कभी भी सत्य के उस एक बयान का स्थान नहीं ले पाएगी। अन्य व्यक्ति, इसका एक-दो साल तक अनुभव करने के बाद, शायद थोड़ी-सी समझ हासिल कर ले, और दस सालों तक अनुभव करने के बाद थोड़ी और गहरी समझ हासिल कर ले, और फिर पूरे जीवनकाल के लिए अनुभव कर ज़्यादा उच्चतर समझ हासिल कर ले—लेकिन यदि तुम दोनों अपने द्वारा हासिल समझ को मिला दो, तो भी—चाहे तुम दोनों के पास कितनी भी समझ, कितने ही अनुभव, कितनी भी अंतर्दृष्टि, कितना भी प्रकाश, या कितने ही उदाहरण हों—ये सब मिलकर सत्य के उस एक कथन का स्थान नहीं ले सकते। दूसरे शब्दों में, मनुष्य का जीवन हमेशा मनुष्य का जीवन होगा, भले ही तुम्हारी समझ सत्य, परमेश्वर के इरादों, उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप हो, लेकिन यह कभी भी सत्य का एक विकल्प नहीं बन पाएगी। यह कहने का अर्थ कि लोगों ने सत्य हासिल कर लिया है, यह है कि उनके पास कुछ वास्तविकता है, और उन्होंने सत्य की कुछ समझ हासिल कर ली है, परमेश्वर के वचनों में कुछ वास्तविक प्रवेश पा लिया है, उन्हें परमेश्वर के वचनों का कुछ वास्तविक अनुभव हो गया है, और परमेश्वर पर अपने विश्वास में वे सही मार्ग पर हैं। किसी व्यक्ति के जीवन भर के अनुभव के लिए परमेश्वर से केवल एक ही बयान पर्याप्त है; लोग कई जीवनकाल या कई हज़ार वर्षों तक का अनुभव करने के बाद भी पूरी तरह और अच्छी तरह से मात्र एक सत्य का अनुभव भी नहीं कर पाएंगे। ...

... अगर तुम्हें परमेश्वर के वचनों का थोड़ा-बहुत अनुभव है, और तुम सत्य की अपनी समझ के अनुसार जी रहे हो, तब परमेश्वर के वचन तुम्हारा जीवन बन जाते हैं। फिर भी, तुम यह नहीं कह सकते कि सत्य तुम्हारा जीवन है या तुम जो व्यक्त करते हो, वह सत्य है; अगर तुम्हारा यह विचार है, तो तुम गलत हो। यदि तुम्हारे पास सत्य के किसी पहलू के अनुसार कुछ अनुभव है, तो क्या यह अपने आप में सत्य का प्रतिनिधित्व कर सकता है? बिल्कुल नहीं। क्या तुम सत्य की पूरी व्याख्या कर सकते हो? क्या तुम सत्य से परमेश्वर के स्वभाव और सार का पता लगा सकते हो? तुम ऐसा नहीं कर सकते। प्रत्येक व्यक्ति के पास सत्य के सिर्फ एक पहलू, एक दायरे का अनुभव होता है; इसे अपने सीमित दायरे में अनुभव करने से, तुम सत्य के विभिन्न पहलुओं को नहीं छू सकते। क्या लोग सत्य के मूल अर्थ को जी सकते हैं? तुम्हारा ज़रा-सा अनुभव किसके बराबर है? समुद्र तट पर रेत के एक कण के बराबर; महासागर में पानी की एक बूँद के बराबर। इसलिए, भले ही तुम्हारे अनुभव से प्राप्त समझ और अनुभूतियां कितनी भी अनमोल हों, फिर भी उन्हें सत्य नहीं माना जा सकता। सत्य के स्रोत और अर्थ में एक बहुत व्यापक क्षेत्र शामिल होता है! कुछ भी इसका खंडन नहीं कर सकता। कुछ लोग कहते हैं, "क्या मेरे अनुभव का ज्ञान कभी खंडित नहीं होगा?" बेशक, नहीं होगा। जो सच्ची समझ परमेश्वर के वचनों के तुम्हारे अनुभव से आती है, वह सत्य के अनुरूप है, उसका खंडन कैसे किया जा सकता है? सत्य किसी भी वातावरण में तुम्हारा जीवन हो सकता है। यह तुम्हें एक पथ दे सकता है, इसके सहारे तुम जीवित रह सकते हो। हालांकि, लोगों के पास जो चीज़ें हैं, लोगों ने जो प्रकाश प्राप्त किया है, वो केवल एक निश्चित दायरे में खुद के लिए या कुछ अन्य लोगों के लिए ही उपयुक्त है, वो एक अलग दायरे में उपयुक्त नहीं है। किसी व्यक्ति का अनुभव कितना भी गहन हो, लेकिन वो होता बहुत ही सीमित है, किसी व्यक्ति का अनुभव सत्य के दायरे तक कभी नहीं पहुंच सकता। किसी व्यक्ति के प्रकाश और उसकी समझ की तुलना सत्य से कभी नहीं की जा सकती।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'क्या तुम जानते हो कि सत्य वास्तव में क्या है?' से उद्धृत

भविष्यवाणियों की पुस्तकों को छोड़कर, पुराने नियम का अधिकांश भाग ऐतिहासिक अभिलेख है। नए नियम के कुछ धर्मपत्र लोगों के व्यक्तिगत अनुभवों से आए हैं, और कुछ पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से आए हैं; उदाहरण के लिए, पौलुस के धर्मपत्र एक मनुष्य के कार्य से उत्पन्न हुए थे, वे सभी पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के परिणाम थे, और वे कलीसियाओं के लिए लिखे गए थे, और वे कलीसियाओं के भाइयों एवं बहनों के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन के वचन थे। वे पवित्र आत्मा द्वारा बोले गए वचन नहीं थे—पौलुस पवित्र आत्मा की ओर से नहीं बोल सकता था, और न ही वह कोई नबी था, और उसने उन दर्शनों को तो बिलकुल नहीं देखा था जिन्हें यूहन्ना ने देखा था। उसके धर्मपत्र इफिसुस, फिलेदिलफिया और गलातिया की कलीसियाओं, और अन्य कलीसियाओं के लिए लिखे गए थे। और इस प्रकार, नए नियम में पौलुस के धर्मपत्र वे धर्मपत्र हैं, जिन्हें पौलुस ने कलीसियाओं के लिए लिखा था, और वे पवित्र आत्मा की अभिप्रेरणाएँ नहीं हैं, न ही वे पवित्र आत्मा के प्रत्यक्ष कथन हैं। वे महज प्रेरणा, सुविधा और प्रोत्साहन के वचन हैं, जिन्हें उसने अपने कार्य के दौरान कलीसियाओं के लिए लिखा था। इस प्रकार वे पौलुस के उस समय के अधिकांश कार्य के अभिलेख भी हैं। वे प्रभु में विश्वास करने वाले सभी भाई-बहनों के लिए लिखे गए थे, ताकि उस समय कलीसियाओं के भाई-बहन उसकी सलाह मानें और प्रभु यीशु द्वारा बताए गए पश्चात्ताप के मार्ग पर बने रहें। किसी भी तरह से पौलुस ने यह नहीं कहा कि, चाहे वे उस समय की कलीसियाएँ हों या भविष्य की, सभी को उसके द्वारा लिखी गई चीज़ों को खाना और पीना चाहिए, न ही उसने कहा कि उसके सभी वचन परमेश्वर से आए हैं। उस समय की कलीसियाओं की परिस्थितियों के अनुसार, उसने बस भाइयों एवं बहनों से संवाद किया था और उन्हें प्रोत्साहित किया था, और उन्हें उनके विश्वास में प्रेरित किया था, और उसने बस लोगों में प्रचार किया था या उन्हें स्मरण दिलाया था और उन्हें प्रोत्साहित किया था। उसके वचन उसके स्वयं के दायित्व पर आधारित थे, और उसने इन वचनों के जरिये लोगों को सहारा दिया था। उसने उस समय की कलीसियाओं के प्रेरित का कार्य किया था, वह एक कार्यकर्ता था जिसे प्रभु यीशु द्वारा इस्तेमाल किया गया था, और इस प्रकार कलीसियाओं की ज़िम्मेदारी लेने और कलीसियाओं का कार्य करने के लिए उसे भाइयों एवं बहनों की स्थितियों के बारे में जानना था—और इसी कारण उसने प्रभु में विश्वास करने वाले सभी भाइयों एवं बहनों के लिए धर्मपत्र लिखे थे। यह सही है कि जो कुछ भी उसने कहा, वह लोगों के लिए शिक्षाप्रद और सकारात्मक था, किंतु वह पवित्र आत्मा के कथनों का प्रतिनिधित्व नहीं करता था, और वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। यह एक बेहद गलत समझ और एक ज़बरदस्त ईश-निंदा है कि लोग एक मनुष्य के अनुभवों के अभिलेखों और धर्मपत्रों को पवित्र आत्मा द्वारा कलीसियाओं को बोले गए वचनों के रूप में लें! यह पौलुस द्वारा कलीसियाओं के लिए लिखे गए धर्मपत्रों के संबंध में विशेष रूप से सत्य है, क्योंकि उसके धर्मपत्र उस समय प्रत्येक कलीसिया की परिस्थितियों और उनकी स्थिति के आधार पर भाइयों एवं बहनों के लिए लिखे गए थे, और वे प्रभु में विश्वास करने वाले भाइयों एवं बहनों को प्रेरित करने के लिए थे, ताकि वे प्रभु यीशु का अनुग्रह प्राप्त कर सकें। उसके धर्मपत्र उस समय के भाइयों एवं बहनों को जाग्रत करने के लिए थे। ऐसा कहा जा सकता है कि यह उसका स्वयं का दायित्व था, और यह वह दायित्व भी था, जो उसे पवित्र आत्मा द्वारा दिया गया था; आखिरकार, वह एक प्रेरित था जिसने उस समय की कलीसियाओं की अगुआई की थी, जिसने कलीसियाओं के लिए धर्मपत्र लिखे थे और उन्हें प्रोत्साहित किया था—यह उसकी जिम्मेदारी थी। उसकी पहचान मात्र काम करने वाले एक प्रेरित की थी, और वह मात्र एक प्रेरित था जिसे परमेश्वर द्वारा भेजा गया था; वह नबी नहीं था, और न ही भविष्यवक्ता था। उसके लिए उसका कार्य और भाइयों एवं बहनों का जीवन अत्यधिक महत्वपूर्ण था। इस प्रकार, वह पवित्र आत्मा की ओर से नहीं बोल सकता था। उसके वचन पवित्र आत्मा के वचन नहीं थे, और उन्हें परमेश्वर के वचन तो बिलकुल भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पौलुस परमेश्वर के एक प्राणी से बढ़कर कुछ नहीं था, और वह परमेश्वर का देहधारण तो निश्चित रूप से नहीं था। उसकी पहचान यीशु के समान नहीं थी। यीशु के वचन पवित्र आत्मा के वचन थे, वे परमेश्वर के वचन थे, क्योंकि उसकी पहचान मसीह—परमेश्वर के पुत्र की थी। पौलुस उसके बराबर कैसे हो सकता है? यदि लोग पौलुस जैसों के धर्मपत्रों या शब्दों को पवित्र आत्मा के कथनों के रूप में देखते हैं, और उनकी परमेश्वर के रूप में आराधना करते हैं, तो सिर्फ यह कहा जा सकता है कि वे बहुत ही अधिक अविवेकी हैं। और अधिक कड़े शब्दों में कहा जाए तो, क्या यह स्पष्ट रूप से ईश-निंदा नहीं है? कोई मनुष्य परमेश्वर की ओर से कैसे बात कर सकता है? और लोग उसके धर्मपत्रों के अभिलेखों और उसके द्वारा बोले गए वचनों के सामने इस तरह कैसे झुक सकते हैं, मानो वे कोई पवित्र पुस्तक या स्वर्गिक पुस्तक हों। क्या परमेश्वर के वचन किसी मनुष्य के द्वारा बस यों ही बोले जा सकते हैं? कोई मनुष्य परमेश्वर की ओर से कैसे बोल सकता है? तो, तुम क्या कहते हो—क्या वे धर्मपत्र, जिन्हें उसने कलीसियाओं के लिए लिखा था, उसके स्वयं के विचारों से दूषित नहीं हो सकते? वे मानवीय विचारों द्वारा दूषित कैसे नहीं हो सकते? उसने अपने व्यक्तिगत अनुभवों और अपने ज्ञान के आधार पर कलीसियाओं के लिए धर्मपत्र लिखे थे। उदाहरण के लिए, पौलुस ने गलातियाई कलीसियाओं को एक धर्मपत्र लिखा, जिसमें एक निश्चित राय थी, और पतरस ने दूसरा धर्मपत्र लिखा, जिसमें दूसरा विचार था। उनमें से कौन-सा पवित्र आत्मा से आया था? कोई निश्चित तौर पर नहीं कह सकता। इस प्रकार, सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि उन दोनों ने कलीसियाओं के लिए दायित्व वहन किया था, फिर भी उनके पत्र उनके आध्यात्मिक कद का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे भाइयों एवं बहनों के लिए उनके पोषण एवं समर्थन का, और कलीसियाओं के प्रति उनके दायित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं, और वे केवल मनुष्य के कार्य का प्रतिनिधित्व करते हैं; वे पूरी तरह से पवित्र आत्मा के नहीं थे। यदि तुम कहते हो कि उसके धर्मपत्र पवित्र आत्मा के वचन हैं, तो तुम बेतुके हो, और तुम ईश-निंदा कर रहे हो! पौलुस के धर्मपत्र और नए नियम के अन्य धर्मपत्र बहुत हाल की आध्यात्मिक हस्तियों के संस्मरणों के बराबर हैं : वे वाचमैन नी की पुस्तकों या लॉरेंस आदि के अनुभवों के समतुल्य हैं। सीधी-सी बात है कि हाल ही की आध्यात्मिक हस्तियों की पुस्तकों को नए नियम में संकलित नहीं किया गया है, फिर भी इन लोगों का सार एकसमान था : वे पवित्र आत्मा द्वारा एक निश्चित अवधि के दौरान इस्तेमाल किए गए लोग थे, और वे सीधे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते थे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'बाइबल के विषय में (3)' से उद्धृत

मनुष्य के अभ्यास करने के तरीके और सत्य का उसका ज्ञान, ये सभी एक विशेष दायरे में लागू होते हैं। तुम यह नहीं कह सकते कि जिस मार्ग पर मनुष्य चलता है वह पूरी तरह से पवित्र आत्मा की इच्छा है, क्योंकि मनुष्य को केवल पवित्र आत्मा द्वारा ही प्रबुद्ध किया जा सकता है और उसे पवित्र आत्मा से पूरी तरह से नहीं भरा जा सकता। जिन चीज़ों को मनुष्य अनुभव कर सकता है, वे सभी सामान्य मानवता के दायरे के भीतर हैं और वे सामान्य मानवीय बुद्धि में मौजूद विचारों की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ सकतीं। वे सभी लोग, जो सत्य-वास्तविकता को जी सकते हैं, इस सीमा के भीतर अनुभव करते हैं। जब वे सत्य का अनुभव करते हैं, तो यह हमेशा पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध सामान्य मानवीय जीवन का अनुभव होता है; यह उस तरह से अनुभव करना नहीं है जो सामान्य मानवीय जीवन से भटक जाता है। वे अपने मानवीय जीवन को जीने की बुनियाद पर पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध किए गए सत्य का अनुभव करते हैं। इसके अतिरिक्त, यह सत्य हर व्यक्ति के लिए अलग होता है, और इसकी गहराई उस व्यक्ति की अवस्था से संबंधित होती है। यह कहा जा सकता है कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह ऐसे व्यक्ति का सामान्य मानवीय जीवन है जो सत्य की खोज कर रहा है, और इसे ऐसा मार्ग कहा जा सकता है जिस पर पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध कोई सामान्य व्यक्ति चल चुका है। कोई यह नहीं कह सकता कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह ऐसा मार्ग है जिस पर पवित्र आत्मा चलता है। सामान्य मानवीय अनुभव में, क्योंकि जो लोग अनुसरण करते हैं वे एक समान नहीं होते, इसलिए पवित्र आत्मा का कार्य भी समान नहीं होता। इसके अतिरिक्त, क्योंकि जिन परिवेशों का लोग अनुभव करते हैं और उनके अनुभव की सीमाएँ एक समान नहीं होतीं, इसलिए उनके मन और विचारों के मिश्रण की वजह से, उनका अनुभव विभिन्न अंशों तक मिश्रित हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भिन्न व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार ही किसी सत्य को समझता है। सत्य के वास्तविक अर्थ की उसकी समझ पूर्ण नहीं होती और यह उसका केवल एक या कुछ ही पहलू होते हैं। मनुष्य सत्य के जिस दायरे का अनुभव करता है, वह प्रत्येक इंसान की परिस्थितियों के अनुरूप बदलता है। इस तरह, एक ही सत्य के बारे में विभिन्न लोगों द्वारा व्यक्त ज्ञान एक समान नहीं होता। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य के अनुभव की हमेशा सीमाएँ होती हैं और यह पवित्र आत्मा की इच्छा को पूरी तरह से नहीं दर्शा सकता, और न ही मनुष्य के कार्य को परमेश्वर का कार्य समझा जा सकता, फिर भले ही जो कुछ मनुष्य द्वारा व्यक्त किया गया है, वह परमेश्वर की इच्छा से बहुत बारीकी से मेल क्यों न खाता हो, भले ही मनुष्य का अनुभव पवित्र आत्मा द्वारा किए जाने वाले पूर्ण करने के कार्य के बेहद करीब ही क्यों न हो। मनुष्य केवल परमेश्वर का सेवक हो सकता है, जो केवल वही कार्य करता है जो परमेश्वर उसे सौंपता है। मनुष्य केवल पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध ज्ञान और व्यक्तिगत अनुभवों से प्राप्त सत्यों को ही व्यक्त कर सकता है। मनुष्य अयोग्य है और पवित्र आत्मा का निर्गम बनने की शर्तों को पूरा नहीं करता। वह यह कहने का हकदार नहीं है कि उसका कार्य परमेश्वर का कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

मनुष्य की संगति परमेश्वर के वचन से भिन्न होती है। लोग जो संगति करते हैं वह उनकी व्यक्तिगत अंतर्दृष्टि और अनुभव को बताती है, और परमेश्वर के कार्य के आधार पर उनकी अंतर्दृष्टि और अनुभव को व्यक्त करती है। उनकी ज़िम्मेदारी यह है कि परमेश्वर के कार्य करने या बोलने के पश्चात्, वे पता लगायें कि उन्हें इसमें से किसका अभ्यास करना चाहिए, या किसमें प्रवेश करना चाहिए, और फिर इसे अनुयायियों को सौंप दें। इसलिए, मनुष्य का कार्य उसके प्रवेश और अभ्यास का प्रतिनिधित्व करता है। निस्संदेह, ऐसा कार्य मानवीय सबक और अनुभव या कुछ मानवीय विचारों के साथ मिश्रित होता है। पवित्र आत्मा चाहे जैसे कार्य करे, चाहे वह मनुष्य में कार्य करे या देहधारी परमेश्वर में, कर्मी हमेशा वही व्यक्त करते हैं जो वे होते हैं। यद्यपि कार्य पवित्र आत्मा ही करता है, फिर भी मनुष्य अंतर्निहित रूप से जैसा होता है कार्य उसी पर आधारित होता है, क्योंकि पवित्र आत्मा बिना आधार के कार्य नहीं करता। दूसरे शब्दों में, कार्य शून्य में से नहीं आता, बल्कि वह हमेशा वास्तविक परिस्थितियों और असली स्थितियों के अनुसार किया जाता है। केवल इसी तरह से मनुष्य के स्वभाव को रूपान्तरित किया जा सकता है और उसकी पुरानी धारणाओं एवं पुराने विचारों को बदला जा सकता है। जो कुछ मनुष्य देखता है, अनुभव करता है, और कल्पना कर सकता है, वह उसी को अभिव्यक्त करता है, और यह मनुष्य के विचारों द्वारा प्राप्य होता है, भले ही ये सिद्धांत या धारणाएँ ही क्यों न हों। चाहे मनुष्य के कार्य का आकार कुछ भी हो, यह उसके अनुभव के दायरे से परे नहीं जा सकता, न ही जो वह देखता है, या जिसकी वह कल्पना या जिसका विचार कर सकता है, उससे बढ़कर हो सकता है। परमेश्वर वही सब प्रकट करता है जो वह स्वयं है, और यह मनुष्य की पहुँच से परे है, अर्थात्, मनुष्य की सोच से परे है। वह संपूर्ण मानवजाति की अगुवाई करने के अपने कार्य को व्यक्त करता है, इसका मानवीय अनुभव के विवरणों से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि यह उसके अपने प्रबंधन से संबंधित है। मनुष्य जो व्यक्त करता है वह उसका अपना अनुभव है, जबकि परमेश्वर अपने स्वरूप को व्यक्त करता है, जो कि उसका अंतर्निहित स्वभाव है और मनुष्य की पहुँच से परे है। मनुष्य का अनुभव उसकी अंतर्दृष्टि और वह ज्ञान है जो उसने परमेश्वर द्वारा अपने स्वरूप की अभिव्यक्ति के आधार पर प्राप्त किया है। ऐसी अंतर्दृष्टि और ज्ञान मनुष्य का स्वरूप कहलाता है, और उनकी अभिव्यक्ति का आधार मनुष्य का अंतर्निहित स्वभाव और उसकी क्षमता होते हैं—इसलिए इन्हें मनुष्य का अस्तित्व भी कहा जाता है। जो कुछ मनुष्य देखता और अनुभव करता है वह उसकी संगति कर पाता है। अत: कोई भी व्यक्ति उस पर संगति नहीं कर सकता जिसका उसने अनुभव नहीं किया है या देखा नहीं है या जिस तक उसका मन नहीं पहुँच पाता है, वे ऐसी चीज़ें हैं जो उसके भीतर नहीं हैं। यदि जो कुछ मनुष्य व्यक्त करता है वह उसके अनुभव से नहीं आया है, तो यह उसकी कल्पना या सिद्धांत है। सीधे-सीधे कहें तो, उसके वचनों में कोई वास्तविकता नहीं होती। यदि तुम समाज की चीज़ों से कभी संपर्क में न आते, तो तुम समाज के जटिल संबंधों की स्पष्टता से संगति करने में समर्थ नहीं होते। यदि तुम्हारा कोई परिवार न होता परन्तु अन्य लोग परिवारिक मुद्दों के बारे में बात करते, तो तुम उनकी अधिकांश बातों को नहीं समझ पाते। इसलिए, जो कुछ मनुष्य संगति करता है और जिस कार्य को वह करता है, वे उसके भीतरी अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य' से उद्धृत

परमेश्वर के वचन को मनुष्य का वचन नहीं समझा जा सकता, और मनुष्य के वचन को परमेश्वर का वचन तो बिलकुल भी नहीं समझा जा सकता। परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया गया व्यक्ति देहधारी परमेश्वर नहीं है, और देहधारी परमेश्वर, परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया गया मनुष्य नहीं है। इसमें एक अनिवार्य अंतर है। शायद इन वचनों को पढ़ने के बाद तुम इन्हें परमेश्वर के वचन न मानकर केवल मनुष्य द्वारा प्राप्त प्रबुद्धता मानो। उस हालत में, तुम अज्ञानता के कारण अंधे हो। परमेश्वर के वचन मनुष्य द्वारा प्राप्त प्रबुद्धता के समान कैसे हो सकते हैं? देहधारी परमेश्वर के वचन एक नया युग आरंभ करते हैं, समस्त मानवजाति का मार्गदर्शन करते हैं, रहस्य प्रकट करते हैं, और मनुष्य को वह दिशा दिखाते हैं, जो उसे नए युग में ग्रहण करनी है। मनुष्य द्वारा प्राप्त की गई प्रबुद्धता अभ्यास या ज्ञान के लिए सरल निर्देश मात्र हैं। वह एक नए युग में समस्त मानवजाति को मार्गदर्शन नहीं दे सकती या स्वयं परमेश्वर के रहस्य प्रकट नहीं कर सकती। अंतत: परमेश्वर, परमेश्वर है और मनुष्य, मनुष्य। परमेश्वर में परमेश्वर का सार है और मनुष्य में मनुष्य का सार। यदि मनुष्य परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों को पवित्र आत्मा द्वारा प्रदत्त साधारण प्रबुद्धता मानता है, और प्रेरितों और नबियों के वचनों को परमेश्वर के व्यक्तिगत रूप से कहे गए वचन मानता है, तो यह मनुष्य की गलती होगी। चाहे जो हो, तुम्हें कभी सही और गलत को मिलाना नहीं चाहिए, और ऊँचे को नीचा नहीं समझना चाहिए, या गहरे को उथला समझने की गलती नहीं करनी चाहिए; चाहे जो हो, तुम्हें कभी भी जानबूझकर उसका खंडन नहीं करना चाहिए, जिसे तुम जानते हो कि सत्य है। हर उस व्यक्ति को, जो यह विश्वास करता है कि परमेश्वर है, समस्याओं की जाँच सही दृष्टिकोण से करनी चाहिए, और परमेश्वर द्वारा सृजित प्राणी के परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर के नए कार्य और वचनों को स्वीकार करना चाहिए; अन्यथा परमेश्वर द्वारा उन्हें मिटा दिया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना' से उद्धृत

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