परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" | अंश 180

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" | अंश 180

0 |22 जून, 2020

आप सभी को जानना होगा कि परमेश्वर के कार्य से मनुष्य के काम को कैसे अलग किया जाता है। आप मनुष्य के काम से क्या देख सकते हैं? मनुष्य के काम में मनुष्य के अनुभव के बहुत सारे तत्व होते हैं; मनुष्य जैसा अभिव्यक्त करता है वह वैसा ही होता है। परमेश्वर का स्वयं का कार्य भी उसे ही अभिव्यक्त करता है, परन्तु जो वह है वह मनुष्य से अलग है। मनुष्य जो कुछ है वह मनुष्य के अनुभव एवं जीवन का प्रतिनिधि है (जो कुछ मनुष्य अपने जीवन में अनुभव एवं सामना करता है, या जो उसके जीवन-दर्शन हैं), और विभिन्न वातावरणों में रहने वाले लोग विभिन्न प्राणियों को व्यक्त करते हैं। आपके पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं और आप वास्तव में किस प्रकार अपने परिवार में रहते एवं अनुभव करते हैं उसे जो कुछ आप अभिव्यक्त करते हैं उसमें देखा जा सकता है, जबकि आप देहधारी परमेश्वर के कार्य से यह नहीं देख सकते हैं कि उसके पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं। वह मनुष्य के सार-तत्व से अच्छी तरह से परिचित है, वह सभी प्रकार के अभ्यास को प्रगट कर सकता है जो सब प्रकार के लोगों से सम्बन्धित होते हैं। वह मानव के भ्रष्ट स्वभाव एवं विद्रोही आचरण को भी बेहतर ढंग से प्रगट कर सकता है। वह सांसारिक लोगों के मध्य नहीं रहता है, परन्तु वह नश्वर मनुष्यों के स्वभाव और सांसारिक लोगों की समस्त भ्रष्टता से भली भांति अवगत है। वह ऐसा ही है। हालाँकि वह संसार के साथ व्यवहार नहीं करता है, फिर भी वह संसार के साथ व्यवहार करने के नियमों को जानता है, क्योंकि वह मानवीय स्वभाव को पूरी तरह से समझता है। वह वर्तमान एवं अतीत दोनों के आत्मा के कार्य के विषय में जानता है जिसे मनुष्य की आंखें नहीं देख सकती हैं जिसे मनुष्य के कान नहीं सुन सकते हैं। इसमें बुद्धि शामिल है जो जीवन का दर्शनशास्त्र एवं आश्चर्य नहीं है जिसकी गहराई नापना मनुष्य को कठिन जान पड़ता है। वह ऐसा ही है, लोगों के लिए खुला और साथ ही लोगों से छिपा हुआ भी है। जो कुछ वह अभिव्यक्त करता है वह ऐसा नहीं है जैसा एक असाधारण मनुष्य होता है, परन्तु अंतर्निहित गुण एवं आत्मा का अस्तित्व है। वह संसार भर में यात्रा नहीं करता है परन्तु उसके विषय में हर एक चीज़ को जानता है। वह "वन-मानुषों" के साथ सम्पर्क करता है जिनके पास कोई ज्ञान या अंतर्दृष्टि नहीं है, परन्तु वह ऐसे शब्दों को व्यक्त करता है जो ज्ञान से ऊँचे और महान मनुष्यों से ऊपर हैं। वह कम समझ एवं सुन्न लोगों के समूह के मध्य रहता है जिनके पास मानवता नहीं है और जो मानवीय परम्पराओं एवं जीवनों को नहीं समझते हैं, परन्तु वह मानवजाति से सामान्य मानवता को जीने के लिए कह सकता है, ठीक उसी समय वह मानवजाति के नीच एवं घटिया मनुष्यत्व को प्रगट करता है। यह सब कुछ वही है जो वह है, वह किसी भी मांस और लहू के व्यक्ति की अपेक्षा अधिक ऊँचा है। उसके लिए, यह जरुरी नहीं है कि वह उस काम को करने के लिए जिसे उसे करने की आवश्यक है जटिल, बोझिल एवं पतित सामाजिक जीवन का अनुभव करे और भ्रष्ट मानवजाति के सार-तत्व को पूरी तरह से प्रगट करे। ऐसा पतित सामाजिक जीवन उसकी देह को उन्नत नहीं करता है। उसके कार्य एवं वचन मनुष्य केआज्ञालंघन को ही प्रगट करते हैं और संसार के साथ निपटने के लिए मनुष्य को अनुभव एवं शिक्षाएं प्रदान नहीं करते हैं। जब वह मनुष्य को जीवन की आपूर्ति करता है तो उसे समाज या मनुष्य के परिवार की जांच पड़ताल करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। मनुष्य का खुलासा एवं न्याय करना उसकी देह के अनुभवों की अभिव्यक्ति नहीं है; यह लम्बे समय तक मनुष्य के आज्ञालंघन को जानने के बाद उसकी अधार्मिकता को प्रगट करने और मानवता के भ्रष्ट स्वभाव से घृणा करने के लिए है। वह कार्य जिसे परमेश्वर करता है वह मनुष्य पर अपने स्वभाव को पूरी तरह से प्रगट करने और अपने अस्तित्व को अभिव्यक्त करने के लिए है। केवल वही इस कार्य को कर सकता है, यह ऐसी चीज़ नहीं है जिसे मांस और लहू का व्यक्ति हासिल कर सकता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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