परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" | अंश 179

01 अगस्त, 2020

वह कार्य जो मनुष्य के दिमाग में होता है उसे बहुत ही आसानी से मनुष्य के द्वारा प्राप्त किया जाता है। उदाहरण के लिए, इस धार्मिक संसार में पास्टर एवं अगुवे अपने कार्य को करने के लिए अपने वरदानों एवं पदों पर भरोसा रखते हैं। ऐसे लोग जो लोग लम्बे समय से उनका अनुसरण करते हैं वे उनके वरदानों के द्वारा संक्रमित हो जाएंगे और जो वे हैं उनमें से कुछ के द्वारा उन्हें प्रभावित किया जाएगा। वे लोगों के वरदानों, योग्यताओं एवं ज्ञान पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, और वे कुछ अलौकिक कार्यों और अनेक गम्भीर अवास्तविक सिद्धान्तों पर ध्यान देते हैं (हाँ वास्तव में, इन गम्भीर सिद्धान्तों को हासिल नहीं किया जा सकता है)। वे लोगों के स्वभाव के परिवर्तनों पर ध्यान केन्द्रित नहीं करते हैं, किन्तु इसके बजाए वे लोगों के प्रचार एवं कार्य करने की योग्यताओं को प्रशिक्षित करने, और लोगों के ज्ञान एवं समृद्ध धार्मिक सिद्धान्तों को बेहतर बनाने के ऊपर ध्यान केन्द्रित करते हैं। वे इस पर ध्यान केन्द्रित नहीं करते हैं कि लोगों के स्वभाव में कितना परिवर्तन हुआ है या इस पर कि लोग सत्य को कितना समझते हैं। वे लोगों के मूल-तत्व के साथ अपने आपको नहीं जोड़ते हैं, और वे लोगों की सामान्य एवं असमान्य दशाओं को जानने की कोशिश तो बिलकुल भी नहीं करते हैं। वे लोगों की धारणाओं का विरोध नहीं करते हैं या उनकी धारणाओं को प्रगट नहीं करते हैं, और वे अपनी कमियों या भ्रष्टता में सुधार तो बिलकुल भी नहीं करते हैं। अधिकांश लोग जो उनका अनुसरण करते हैं वे अपने स्वाभाविक वरदानों के द्वारा सेवा करते हैं, और जो कुछ वे अभिव्यक्त करते हैं वह ज्ञान एवं अस्पष्ट धार्मिक सत्य है, जिनका वास्तविकता के साथ कोई नाता नहीं है और वे लोगों को जीवन प्रदान में पूरी तरह से असमर्थ हैं। वास्तव में, उनके कार्य का मूल-तत्व प्रतिभाओं का पोषण करना है, शून्य के साथ किसी व्यक्ति का पोषण करना है कि वह एक योग्य सेमेनरी स्नातक बन जाए जो बाद में काम एवं अगुवाई करने के लिए जाता है। परमेश्वर के हज़ार वर्षों के कार्य में क्या आप इसके किसी नियम का पता लगा सकते हैं? उस काम में जिसे मनुष्य करता है बहुत सारे नियम एवं प्रतिबन्ध होते हैं, और मानवीय मस्तिष्क बहुत ही कट्टर है। अतः जो कुछ मनुष्य अभिव्यक्त करता है वह उसके समस्त अनुभवों के अंतर्गत उसका थोड़ा सा ज्ञान एवं एहसास है। मनुष्य इसके आलावा कुछ भी अभिव्यक्त करने में असमर्थ है। मनुष्य के अनुभव या उसका ज्ञान उसके स्वाभाविक वरदानों या सहज प्रवृत्ति से उत्पन्न नहीं होते हैं; वे परमेश्वर के मार्गदर्शन और परमेश्वर की प्रत्यक्ष चरवाही से उत्पन्न होते हैं। मनुष्य के पास केवल इस चरवाही को स्वीकार करने का अंग है और उसके पास वह अंग नहीं है कि वह सीधे तौर पर यह अभिव्यक्त करे कि ईश्वरीयता क्या है। मनुष्य वह स्रोत बनने में असमर्थ है, वह केवल ऐसा पात्र हो सकता है जो स्रोत से पानी प्राप्त करता है; यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है, यह ऐसा अंग है जिसे किसी मानव के पास मानव प्राणी होने के नाते होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचन को ग्रहण करनेवाले उस अंग को खो देता है और मानवीय सहज प्रवृत्ति को खो देता है, तो वह व्यक्ति उसे भी खो देता है जो अत्यंत बहुमूल्य है, और सृजे गए मनुष्य के कर्तव्य को खो देता है। यदि किसी मनुष्य के पास कोई ज्ञान या परमेश्वर के वचन या उसके कार्य का अनुभव न हो, तो वह व्यक्ति अपने कर्तव्य को खो देता है, ऐसा कर्तव्य जिसे उसे एक सृजे गए प्राणी के रूप में निभाना चाहिए, और वह एक सृजे गए प्राणी के रूप में अपनी गरिमा को खो देता है। यह अभिव्यक्त करना परमेश्वर की सहज प्रवृत्ति है कि ईश्वरीयता क्या है, चाहे इसे देह में अभिव्यक्त किया गया है या सीधे तौर पर आत्मा के द्वारा अभिव्यक्त किया गया है; यह परमेश्वर की सेवकाई है। मनुष्य परमेश्वर के कार्य के दौरान या उसके बाद अपने स्वयं के अनुभवों या ज्ञान (अर्थात्, जो वह है उसे अभिव्यक्त करता है) को अभिव्यक्त करता है; यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति और मनुष्य का कर्तव्य है, यह वही है जिसे मनुष्य को हासिल करना चाहिए। हालाँकि मनुष्य की अभिव्यक्ति उससे रहित है जिसे परमेश्वर अभिव्यक्त करता है, और जो कुछ मनुष्य अभिव्यक्त करता है उसमें बहुत सारे नियम होते हैं, फिर भी मनुष्य को उस कर्तव्य को निभाना होगा जिसे उसे निभाना चाहिए और उसे उस कार्य को करना है जिसे उसे अवश्य करना चाहिए। मनुष्य को अपने कर्तव्य को निभाने के लिए हर वह चीज़ करना चाहिए जो मानवीय रूप से सम्भव है, और उसमें थोड़ा सा भी सन्देह नहीं होना चाहिए।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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