परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" | अंश 178

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" | अंश 178

155 |06 अगस्त, 2020

मनुष्य के काम में एक दायरा एवं सीमाएं होती हैं। कोई व्यक्ति केवल एक ही निश्चित अवस्था के कार्य को करने के लिए योग्य होता है और सम्पूर्ण युग के कार्य को नहीं कर सकता हैं—अन्यथा, वह लोगों को नियमों के भीतर ले जाएगा। मनुष्य के काम को केवल एक विशेष समय या अवस्था पर ही लागू किया जा सकता है। यह इसलिए है क्योंकि मनुष्य के अनुभव में एक दायरा होता है। कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य के साथ मनुष्य के काम की तुलना नहीं कर सकता है। मनुष्य के अभ्यास करने के तरीके और सत्य के विषय में उसके समस्त ज्ञान को एक विशेष दायरे में लागू किया जाता है। आप नहीं कह सकते हैं कि वह मार्ग जिस पर कोई मनुष्य चलता है वह पूरी तरह से पवित्र आत्मा की इच्छा है, क्योंकि मनुष्य को केवल पवित्र आत्मा के द्वारा ही प्रकाशित किया जा सकता है और उसे पवित्र आत्मा से पूरी तरह से भरा नहीं जा सकता है। ऐसी चीज़ें जिन्हें मनुष्य अनुभव कर सकता है वे सभी सामान्य मानवता के दायरे के भीतर हैं और वे सामान्य मानवीय मस्तिष्क में विचारों की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ सकती हैं। वे सभी जिनके पास व्यावहारिक अभिव्यक्ति है वे इस सीमा के अंतर्गत अनुभव करते हैं। जब वे सत्य का अनुभव करते हैं, तो यह हमेशा ही पवित्र आत्मा के अद्भुत प्रकाशन के अधीन सामान्य मानवीय जीवन का एक अनुभव है, और यह ऐसी रीति से अनुभव करना नहीं है जो सामान्य मानवीय जीवन से दूर हट जाता है। अपने मानवीय जीवन को जीने के आधार पर वे उस सच्चाई का अनुभव करते हैं जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा प्रकाशित किया जाता है। इसके अतिरिक्त, यह सत्य एक व्यक्ति से लेकर दूसरे व्यक्ति तक भिन्न होता है, और इसकी गहराई उस व्यक्ति की दशा से सम्बन्धित होती है। कोई व्यक्ति केवल यह कह सकता है कि वह मार्ग जिस पर वे चलते हैं वह किसी मनुष्य का सामान्य जीवन है जो सत्य का अनुसरण कर रहा है, और यह कि यह वह मार्ग जिस पर किसी साधारण व्यक्ति के द्वारा चला गया है जिसके पास पवित्र आत्मा का अद्भुत प्रकाशन है। आप नहीं कह सकते हैं कि वह मार्ग जिस पर वे चलते हैं वह ऐसा मार्ग है जिसे पवित्र आत्मा द्वारा लिया गया है। सामान्य मानवीय अनुभव में, क्योंकि ऐसे लोग जो अनुसरण करते हैं वे एक समान नहीं होते हैं, इसलिए पवित्र आत्मा का कार्य भी एक समान नहीं होता है। इसके साथ ही, क्योंकि ऐसे वातावरण जिनका वे अनुभव करते हैं और उनके अनुभव की सीमाएं एक समान नहीं होती हैं, उनके मस्तिष्क एवं विचारों के मिश्रण के कारण, उनके अनुभव विभिन्न मात्राओं तक मिश्रित हो जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार ही किसी सच्चाई को समझ पाता है। सत्य के वास्तविक अर्थ के विषय में उनकी समझ पूर्ण नहीं है और यह इसका केवल एक या कुछ ही पहलु है। वह दायरा जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य के द्वारा उस सच्चाई का अनुभव किया जाता है वह हमेशा ही व्यक्तित्वों की विभिन्न परिस्थितियों पर आधारित होता है और इसलिए यह एक समान नहीं होता है। इस रीति से, वह ज्ञान जिसे विभिन्न लोगों के द्वारा उसी सच्चाई से अभिव्यक्त किया जाता है वह एक समान नहीं है। कहने का तात्पर्य है, मनुष्य के अनुभव में हमेशा सीमाएं होती हैं और यह पवित्र आत्मा की इच्छा को पूरी तरह से दर्शा नहीं सकता है, और मनुष्य के काम को परमेश्वर के कार्य के समान महसूस नहीं किया जा सकता है, भले ही जो कुछ मनुष्य के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है वह परमेश्वर की इच्छा से नज़दीकी से सम्बन्ध रखता हो, भले ही मनुष्य का अनुभव सिद्ध करनेवाले कार्य के बेहद करीब हो जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा किया जाना है। मनुष्य केवल परमेश्वर का सेवक हो सकता है, और उस कार्य को कर सकता है जिसे परमेश्वर ने उसे सौंपा है। मनुष्य केवल पवित्र आत्मा के अद्भुत प्रकाशन के अधीन उस ज्ञान को और उन सच्चाईयों को व्यक्त कर सकता है जिन्हें उसने अपने व्यक्तिगत अनुभवों से अर्जित किया है। मनुष्य अयोग्य है और उसके पास ऐसी स्थितियां नहीं हैं कि वह पवित्र आत्मा की अभिव्यक्ति का साधन बने। वह यह कहने का हकदार नहीं है कि मनुष्य का काम परमेश्वर का कार्य है। मनुष्य के पास मनुष्य के कार्य करने के सिद्धान्त होते हैं, और सभी मनुष्यों के पास विभिन्न अनुभव होते हैं और उनके पास अलग अलग स्थितियां होती हैं। मनुष्य का काम पवित्र आत्मा के अद्भुत प्रकाशन के अधीन उसके सभी अनुभवों को सम्मिलित करता है। ये अनुभव केवल मनुष्य के अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं और परमेश्वर के अस्तित्व या पवित्र आत्मा की इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। इसलिए, वह मार्ग जिस पर मनुष्य के द्वारा चला जाता है उसे ऐसा मार्ग नहीं कहा जा सकता है जिस पर पवित्र आत्मा के द्वारा चला गया है क्योंकि मनुष्य का काम परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता और मनुष्य का काम एवं मनुष्य का अनुभव पवित्र आत्मा की सम्पूर्ण इच्छा नहीं है। मनुष्य के काम का झुकाव नियम के अंतर्गत आने के लिए होता है, और उसके कार्य करने के तरीके को आसानी से एक सीमित दायरे में सीमित किया जा सकता है और यह स्वतन्त्र रूप से लोगों की अगुवाई करने में असमर्थ है। अधिकांश अनुयायी एक सीमित दायरे में जीवन बिताते हैं, और उनके अनुभव करने का मार्ग भी इसके दायरे तक ही सीमित होता है। मनुष्य का अनुभव हमेशा सीमित होता है; उसके कार्य करने का तरीका भी कुछ प्रकारों तक ही सीमित होता है और पवित्र आत्मा के कार्य से या स्वयं परमेश्वर के कार्य से इसकी तुलना नहीं की जा सकती है—यह इसलिए है क्योंकि अंत में मनुष्य का अनुभव सीमित होता है। फिर भी परमेश्वर अपना कार्य करता है, इसके लिए कोई नियम नहीं है; फिर भी वह पूर्ण होता है, यह एक तरीके पर सीमित नहीं है। परमेश्वर के कार्य के लिए किसी भी प्रकार के नियम नहीं हैं, उसके समस्त कार्य को स्वतन्त्र रूप से मुक्त किया गया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य उसका अनुसरण करते हुए कितना समय बिताता है, वे उसके कार्य करने के तरीकों के विषय में किसी भी प्रकार के नियमों का सार नहीं निकल सकते हैं। हालाँकि उसका कार्य सैद्धांतिक है, और इसे हमेशा नए तरीकों से किया जाता है और इसमें हमेशा नई नई प्रगति होती रहती है, जो मनुष्य की पहुंच से परे है। एक समय काल के दौरान, हो सकता है कि परमेश्वर के पास भिन्न भिन्न प्रकार के कार्य और भिन्न भिन्न प्रकार की अगुवाई हो, जो लोगों को अनुमति देती हो कि उनके पास हमेशा नए नए प्रवेश एवं नए नए परिवर्तन हों। आप उसके कार्य के नियमों का पता नहीं लगा सकते हैं क्योंकि वह हमेशा नए तरीकों से कार्य कर रहा है। केवल इस रीति से ही परमेश्वर के अनुयायी नियमों के अंतर्गत नहीं आते हैं। स्वयं परमेश्वर का कार्य हमेशा लोगों की धारणाओं से परहेज करता है और उनकी धारणाओं का विरोध करता है। ऐसे लोग जो एक सच्चे हृदय के साथ उसके पीछे पीछे चलते हैं और उसका अनुसरण करते हैं केवल उनका स्वभाव ही रूपान्तरित हो सकता है और वे किसी भी प्रकार के नियमों के अधीन हुए बिना या किसी भी प्रकार की धार्मिक धारणाओं के द्वारा अवरुद्ध हुए बगैर स्वतन्त्रता से जीवन जी सकते हैं। ऐसी मांगें जिन्हें मनुष्य का काम लोगों से करता है वे उनके स्वयं के अनुभव और उस चीज़ पर आधारित होते हैं जिन्हें वह स्वयं हासिल कर सकता है। इन अपेक्षाओं का स्तर एक निश्चित दायरे के भीतर सीमित होता है, और अभ्यास के तरीके भी बहुत ही सीमित होते हैं। इस प्रकार अनुयायी सीमित दायरे के भीतर अवचेतन रूप से जीवन बिताते हैं; जैसे जैसे समय गुज़रता है, वे नियम एवं रीति रिवाज बन जाते हैं। यदि एक समय अवधि के कार्य की अगुवाई ऐसे व्यक्ति के द्वारा की जाती है जो परमेश्वर के व्यक्तिगत सिद्धिकरण से होकर नहीं गुज़रा है और जिसने न्याय को प्राप्त नहीं किया है, तो उसके सभी अनुयायी कट्टर धर्मावलम्बी बन जाएंगे और परमेश्वर का विरोध करने में माहिर हो जाएंगे। इसलिए, यदि कोई योग्य अगुवा है, तो उस व्यक्ति को न्याय से होकर गुज़ारना होगा और सिद्धिकरण को स्वीकार करना होगा। ऐसे लोग जो न्याय से होकर नहीं गुज़रे हैं, हालाँकि उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है, फिर भी वे केवल अस्पष्ट एवं अवास्तविक चीज़ों को ही व्यक्त करते हैं। समय के साथ, वे लोगों को अस्पष्ट एवं अलौकिक नियमों की ओर ले जाएंगे। वह कार्य जिसे परमेश्वर अंजाम देता है वह मनुष्य की देह के साथ मेल नहीं खाता है; यह मनुष्य के विचारों के साथ मेल नहीं खाता है परन्तु मनुष्य की धारणाओं का विरोध करता है; यह धुंधले धार्मिक रंग के साथ मिश्रित नहीं होता है। उसके कार्य के परिणामों को ऐसे व्यक्ति के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है जिसे उसके द्वारा सिद्ध नहीं किया गया है और वे मनुष्य की सोच से परे हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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