परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" | अंश 175

29 जुलाई, 2020

विभिन्न प्रकार के लोगों के अनुभव उन चीज़ों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो उनके भीतर हैं। वे सभी जिनके पास आत्मिक अनुभव नहीं है वे सत्य के ज्ञान, या विभिन्न प्रकार की आत्मिक चीज़ों के बारे में सही ज्ञान के विषय में बात नहीं कर सकते हैं। जो कुछ मनुष्य अभिव्यक्त करता है वह भीतर से ऐसा ही होता है—यह निश्चित है। यदि कोई आत्मिक चीज़ों एवं सत्य का ज्ञान पाने की इच्छा करता है, तो उसके पास वास्तविक अनुभव होना चाहिए। यदि आप मानवीय जीवन के सम्बन्ध में सहज बुद्धि के विषय में साफ साफ बात नहीं कर सकते हैं, तो आप आत्मिक चीज़ों के विषय में बातचीत करने के योग्य तो बिलकुल भी नहीं होंगे? ऐसे लोग जो कलीसिया की अगुवाई कर सकते हैं, वे लोगों को जीवन प्रदान कर सकते हैं, और लोगों के लिए एक प्रेरित हो सकते हैं, उनके पास वास्तविक अनुभव होने चाहिए, उनके पास आत्मिक चीज़ों की सही समझ होनी चाहिए, और सत्य की सही समझ एवं अनुभव होना चाहिए। केवल ऐसे मनुष्य ही कार्यकर्ता या प्रेरित होने के योग्य हैं जो कलीसिया की अगुवाई करते हैं। अन्यथा, वे न्यूनतम रूप में केवल अनुसरण ही कर सकते हैं और अगुवाई नहीं कर सकते हैं, और वे प्रेरित तो बिलकुल भी नहीं हो सकते हैं कि लोगों को जीवन प्रदान करें। यह इसलिए है क्योंकि प्रेरित का कार्य दौड़ना या लड़ना नही है; यह जीवन की सेवा करना है और मानवीय स्वभाव में परिवर्तनों की अगुवाई करना है। यह ऐसा कार्य है जिसे उनके द्वारा किया जाता है जिन्हें भारी ज़िम्मेदारियों को कंधों पर उठाने के लिए नियुक्त किया गया है और यह ऐसा कार्य नहीं है जिसे प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है। इस प्रकार के कार्य को केवल ऐसे लोगों के द्वारा आरम्भ किया जा सकता है जिनके पास जीवन का अस्तित्व है, अर्थात्, ऐसे लोग जिनके पास सत्य का अनुभव है। हर कोई जो दे सकता है, भाग सकता है या जो खर्च करने की इच्छा रखता है उसके द्वारा इसका आरम्भ नहीं किया जा सकता है; लोग जिनके पास सत्य का कोई अनुभव नहीं है, जिनकी कांट-छांट या जिनका न्याय नहीं किया गया है, वे इस प्रकार के कार्य को करने में असमर्थ हैं। ऐसे लोग जिनके पास कोई अनुभव नहीं है, अर्थात्, ऐसे लोग जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है, वे साफ साफ नहीं देख सकते हैं क्योंकि इस पहलु में वे स्वयं अस्तित्व को धारण नहीं करते हैं। अतः, इस प्रकार का व्यक्ति न केवल अगुवाई का कार्य करने में असमर्थ है, बल्कि वह निष्कासन का एक वस्तु हो सकता है यदि उनके पास लम्बी अवधि के लिए कोई सत्य नहीं है। जो आप देखते हैं उसके विषय में आप बोलते है यह उन कठिनाईयों को प्रमाणित करता है जिन्हें आपने जीवन में अनुभव किया है, जिन विषयों में आपको ताड़ना दी गई है और जिन मामलों में आपका न्याय किया गया है। यह परीक्षाओं में भी सही हैः ऐसी चीज़ें जिसके अंतर्गत किसी मनुष्य को परिष्कृत किया जाता है, ऐसी चीज़ें जिसके अंतर्गत कोई मनुष्य कमज़ोर होता है, ये ऐसी चीज़ें हैं जिसके अंतर्गत किसी मनुष्य के पास अनुभव होते हैं, ऐसी चीज़ें जिसके अंतर्गत किसी मनुष्य के पास मार्ग होते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई विवाह में कुंठाओं से ग्रसित होता है, तो वह अधिकांश समय संगति करेगा, "धन्यवाद परमेश्वर, परमेश्वर की स्तुति हो, मुझे परमेश्वर के हृदय की इच्छा को संतुष्ट करना होगा और अपना सारा जीवन अर्पित करना होगा, मेरे विवाह को पूरी तरह से परमेश्वर के हाथों में सौंप दो। मैं अपने सम्पूर्ण जीवन को परमेश्वर को देने का वादा करता हूँ।" संगति के माध्यम से, मनुष्य के भीतर की हर एक चीज़, एवं जो वह है, उसे दर्शाया जा सकता है। किसी व्यक्ति की बोली की गति, चाहे वह जोर से बोलता है या धीमे से, ऐसे मामले जो अनुभव के मामले नहीं हैं वे उन बातों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं जो उसके पास है एवं जो वह है। वे केवल बता सकते हैं कि उसका चरित्र अच्छा है या बुरा, या उसका स्वभाव अच्छा है या बुरा, परन्तु इस बात के साथ उसकी बराबरी नहीं की जा सकती कि उसके पास अनुभव हैं या नहीं। बोलते समय स्वयं को अभिव्यक्त करने की योग्यता, या बोली की कुशलता एवं गति, वे सिर्फ अभ्यास की बात है और उसके अनुभव का स्थान नहीं ले सकते हैं। जब आप अपने व्यक्तिगत अनुभव के बारे में बात करते हैं, तब आप जिसे आप महत्व देते हैं और वे सभी चीज़ें जो आपके भीतर हैं उनसे संगति करते हैं। मेरी बोली मेरे अस्तित्व को दर्शाती है, परन्तु जो मैं कहता हूँ वह मनुष्य की पहुंच से परे है। जो कुछ मैं कहता हूँ यह वह नहीं है जिसका मनुष्य अनुभव करता है, और यह ऐसी चीज़ नहीं है कि मनुष्य इसे देख सके, और साथ ही यह ऐसी चीज़ भी नहीं है जिसे मनुष्य स्पर्श कर सकता है, परन्तु यह वह है जो मैं हूँ। कुछ लोग केवल यही मानते हैं कि जिसकी मैं संगति करता हूँ यह वह है जिसका मैं ने अनुभव किया है, परन्तु वे इस बात को नहीं पहचानते हैं कि यह आत्मा का सीधी अभिव्यक्ति है। हाँ वास्तव में, जो मैं कहता हूँ यह वही है जिसका मैं ने अनुभव किया है। यह मैं ही हूँ जिसने छः हजार सालों से भी ज़्यादा से प्रबंधकीय कार्य किया है। मैं ने मानवजाति की उत्पत्ति से लेकर आज तक हर एक चीज़ का अनुभव किया है; मैं इसके बारे में बातचीत करने के योग्य कैसे न होऊंगा? जब मनुष्य के स्वभाव की बात आती है, तो मैं ने इसे साफ साफ देखा है, और मैं ने लम्बे समय से इसका अवलोकन किया है; मैं इसके विषय में साफ साफ बात करने के योग्य कैसे न होऊंगा? जबकि मैने मनुष्य के सार-तत्व को स्पष्टता से देखा है, मैं मनुष्य को ताड़ना देने एवं उसका न्याय करने के लिए योग्य हूँ, क्योंकि सभी मनुष्य मुझ से ही निकले हैं परन्तु उन्हें शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है। हाँ वास्तव में, मैं उस कार्य का आंकलन करने के लिए भी योग्य हूँ जिसे मैं ने किया है। हालाँकि इस कार्य को मेरे शरीर के द्वारा नहीं किया गया है, फिर भी यह आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है, और यह वह है जो मेरे पास है और जो मैं हूँ। इसलिए, मैं इसे व्यक्त करने और उस कार्य को करने के लिए योग्य हूँ जिसे मुझे अवश्य करना चाहिए। जो कुछ मनुष्य कहता है यह वही है जिसे उन्होंने अनुभव किया है। यह वही है जिसे उन्होंने देखा है, जिस तक उनका दिमाग पहुंच सकता है और जो उनकी इंद्रियां महसूस कर सकती हैं। यह वही है जिसकी वे संगति कर सकते हैं। देहधारी परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचन आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है और वे उस कार्य को अभिव्यक्त करते हैं जिन्हें आत्मा के द्वारा किया गया है। देह ने इसे अनुभव नहीं किया है या देखा नहीं हैं, परन्तु अभी भी उसके अस्तित्व को अभिव्यक्त करता है क्योंकि शरीर का मूल-तत्व आत्मा है, और वह आत्मा के कार्य को अभिव्यक्त करता है। हालाँकि देह इस तक पहुंचने में असमर्थ है, फिर भी यह ऐसा कार्य है जिसे आत्मा के द्वारा पहले से ही किया गया है। देहधारण के पश्चात्, देह की अभिव्यक्ति के माध्यम से, वह परमेश्वर के अस्तित्व को जानने के लिए लोगों को योग्य बनाता है और लोगों को परमेश्वर के स्वभाव और उस कार्य को देखने की अनुमति देता है जिसे उसने किया है। मनुष्य का कार्य लोगों को इस योग्य बनाता है कि वे इस बात के विषय में और अधिक स्पष्ट हो जाएं कि उन्हें किसमें प्रवेश करना चाहिए और उन्हें क्या समझना चाहिए; इसमें शामिल है सत्य को समझने एवं अनुभव करने के प्रति लोगों की अगुवाई करना। मनुष्य का काम लोगों को बनाए रखना है; परमेश्वर का कार्य मानवता के लिए नए मार्गों को खोलना और नए युगों खोलना है, और लोगों को वह प्रगट करना है जिसे नश्वर मनुष्यों के द्वारा जाना नहीं जाता है, और उन्हें इस योग्य बनाना है कि वे उसके स्वभाव को जानें। परमेश्वर का कार्य सम्पूर्ण मानवता की अगुवाई करना है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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