परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" | अंश 172

0 |29 जून, 2020

ऐसा कार्य जो पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में है वह पवित्र आत्मा का कार्य है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह परमेश्वर का स्वयं का कार्य है या उपयोग किए गए मनुष्यों का काम है। स्वयं परमेश्वर का मूल-तत्व आत्मा है, जिसे पवित्र आत्मा या सात गुना तीव्र आत्मा भी कहा जा सकता है। हर हालत में, वे परमेश्वर की आत्माएं हैं। यह सिर्फ इतना है कि विभिन्न युगों के दौरान परमेश्वर के आत्मा को अलग अलग नामों से पुकारा गया है। परन्तु उनका मूल-तत्व अभी भी एक है। इसलिए, स्वयं परमेश्वर का कार्य ही पवित्र आत्मा का कार्य है; देहधारी परमेश्वर का कार्य पवित्र आत्मा के कार्य से कम नहीं है। उन मनुष्यों का काम भी पवित्र आत्मा का कार्य है जिन्हें उपयोग किया जाता है। यह सिर्फ इतना है कि परमेश्वर का कार्य पवित्र आत्मा की सम्पूर्ण अभिव्यक्ति है, और इनमें कोई फ़र्क नहीं है, जबकि उपयोग किए गए मनुष्यों का काम बहुत सी मानवीय चीज़ों के साथ घुल मिल गया है, और यह पवित्र आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति नहीं है, सम्पूर्ण प्रकाशन की तो बात ही छोड़ दीजिए। पवित्र आत्मा का कार्य भिन्न होता है और यह किसी परिस्थिति के द्वारा सीमित नहीं होता है। अलग अलग लोगों में यह कार्य भिन्न होता है, और कार्य करने के विभिन्न मूल-तत्वों को सूचित करता है। अलग अलग युगों में भी कार्य भिन्न होता है, जैसे अलग अलग देशों में कार्य भिन्न होता है। हाँ वास्तव में, यद्यपि पवित्र आत्मा अनेक विभिन्न तरीकों से और अनेक सिद्धान्तों के अनुसार कार्य करता है, फिर भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कार्य किस प्रकार किया गया है या किस प्रकार के लोगों पर किया गया है, क्योंकि मूल-तत्व हमेशा भिन्न होता है, और वह कार्य जिसे वह अलग अलग लोगों पर करता है उन सबके के सिद्धान्त होते हैं और वे सभी उस कार्य के उद्देश्य के मूल-तत्व को प्रदर्शित कर सकते हैं। यह इसलिए है क्योंकि पवित्र आत्मा का कार्य दायरे में काफी विशिष्ट एवं काफी नपा-तुला होता है। वह कार्य जिसे देहधारी शरीर में किया गया है वह उस कार्य के समान नहीं है जिसे लोगों पर किया गया है, और लोगों की विभिन्न क्षमता के आधार पर वह कार्य भी अलग अलग होता है। देहधारी शरीर में किए गए कार्य को लोगों पर नहीं किया गया है, और वह देहधारी शरीर में उसी कार्य को नहीं करता है जिसे लोगों पर किया गया है। एक शब्द में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस प्रकार कार्य करता है, क्योंकि विभिन्न व्यक्तियों पर किया गया कार्य कभी एक समान नहीं होता है, और ऐसे सिद्धान्त जिनके द्वारा वह कार्य करता है वे अलग अलग लोगों की दशा एवं स्वभाव के अनुसार भिन्न होते हैं। उनके अंतर्निहित मूल-तत्व के आधार पर पवित्र आत्मा अलग अलग लोगों पर कार्य करता है और उनके अंतर्निहित मूल-तत्व से बाहर उनसे मांग नहीं करता है, न ही वह उनकी वास्तविक क्षमता से बाहर उन पर कार्य करता है। अतः, मनुष्य पर किया गया पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को कार्य के उद्देश्य के मूल-तत्व को देखने की अनुमति देता है। मनुष्य का अंतर्निहित मूल-तत्व परिवर्तित नहीं होता है; मनुष्य की वास्तविक सामर्थ सीमित है। चाहे पवित्र आत्मा लोगों को इस्तेमाल करे या लोगों पर कार्य करे, वह कार्य हमेशा मनुष्यों की क्षमता की सीमाओं के अनुसार होता है ताकि वे इससे लाभान्वित हो सकें। जब पवित्र आत्मा इस्तेमाल किए जा रहे मनुष्यों पर कार्य करता है, तो उनके वरदान एवं वास्तविक क्षमता का प्रदर्शन होता है और उन्हें बचाकर नहीं रखा जाता है। उनकी वास्तविक क्षमता कार्य को अंजाम देने के लिए इस्तेमाल होती है। ऐसा कहा जा सकता है कि वह उस कार्यकारी परिणाम को हासिल करने के लिए मनुष्यों के उपलब्ध गुणों का उपयोग करने के द्वारा कार्य करता है। इसके विपरीत, देहधारी शरीर में किया गया कार्य सीधे तौर पर आत्मा के कार्य को व्यक्त करने के लिए है और यह मानवीय मस्तिष्क एवं विचारों के साथ मिश्रित नहीं होता है, और मनुष्यों के वरदानों, मनुष्य के अनुभव या मनुष्य की स्वाभाविक दशा के द्वारा इस तक पहुंचा नहीं जा सकता है। पवित्र आत्मा के असंख्य कार्य को कुलमिलाकर मनुष्यों के लाभ एवं बढ़ोत्तरी के उद्देश्य से किया जाता हैं। परन्तु कुछ लोगों को सिद्ध किया जा सकता है जबकि अन्य लोग सिद्धता के लिए ऐसी स्थितियां नहीं रखते हैं, कहने का तात्पर्य है, उन्हें सिद्ध नहीं किया जा सकता है और उन्हें बमुश्किल ही बचाया जा सकता है, और यद्यपि उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य हो सकता है, फिर भी अंततः उन्हें निष्कासित कर दिया जाता है। कहने का अर्थ है कि हालाँकि पवित्र आत्मा का कार्य लोगों की बढ़ोत्तरी के लिए है, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि वे सभी लोग जिनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है उन्हें पूरी तरह से सिद्ध किया जाना है, क्योंकि ऐसा मार्ग जिसका अनुसरण बहुत से लोगों के द्वारा किया जाता है वह सिद्ध होने का मार्ग नहीं है। उनके पास पवित्र आत्मा का केवल एक पक्षीय कार्य है, और उनके पास आत्मनिष्ठ मानवीय सहयोग या सही मानवीय अनुसरण नहीं है। इस रीति से, इन लोगों पर पवित्र आत्मा कार्य उन लोगों का सेवा कार्य बन जाता है जिन्हें सिद्ध किया गया है। पवित्र आत्मा के कार्य को सीधे तौर पर लोगों के द्वारा देखा या स्वयं सीधे तौर पर लोगों के द्वारा छुआ नहीं जा सकता है। इसे केवल मनुष्यों के कार्य करने के वरदान के साथ मदद के जरिए अभिव्यक्त किया जा सकता है, इसका अर्थ है कि पवित्र आत्मा के कार्य को अभिव्यक्ति के जरिए मनुष्यों के द्वारा अनुयायियों को प्रदान किया जाता है।

— ‘वचन देह में प्रकट होता है’ से उद्धृत

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