परमेश्वर के दैनिक वचन | "पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें" | अंश 321

परमेश्वर के दैनिक वचन | "पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें" | अंश 321

840 |19 जुलाई, 2020

तुम परमेश्वर से बहुत अधिक इच्छा रखते हो कि वह तुम लोगों में चमक उठे, मगर तुम लोग परमेश्वर से बहुत अधिक दूर हो। यहाँ पर मामला क्या है? तुम लोग केवल उसके वचनों को ग्रहण करते हो, किन्तु उसके व्यवहार करने या अनावश्यक हिस्से की काट-छाँट करने को ग्रहण नहीं करते हो, उसके प्रत्येक प्रबंध को स्वीकार करने, उस पर पूर्ण विश्वास करने में तो तुम बिल्कुल भी समर्थ नहीं हो। तो फिर यहाँ पर क्या मामला है? अंतिम विश्लेषण में, तुम लोगों का विश्वास एक अंडे के खाली खोल के समान है जो कभी भी किसी चूज़े को पैदा नहीं कर सकता है। क्योंकि तुम लोगों का विश्वास तुम लोगों को सत्य तक लेकर नहीं आया है या इसने तुम्हें जीवन प्राप्त नहीं कराया है, बल्कि इसके बजाय तुम लोगों तक जीवनाधार और आशा की एक भ्रामक भावना लाया है। परमेश्वर पर विश्वास करने में तुम लोगों का उद्देश्य, सत्य और जीवन के बजाय, इस आशा और जीवनाधार की भावना के वास्ते है। इसलिए, मैं कहता हूँ कि परमेश्वर पर विश्वास का तुम लोगों का मार्ग, जीहुज़ूरी और बेशर्मी से केवल परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करने के अलावा और कुछ नहीं है, और किसी भी तरह से इसे सच्चा विश्वास नहीं माना जा सकता है। कैसे इस प्रकार के विश्वास से चूज़ा प्रकट हो सकता है? दूसरे शब्दों में, इस ढंग के विश्वास से कैसा फल प्राप्त हो सकता है? परमेश्वर पर तुम लोगों के विश्वास का प्रयोजन, तुम लोगों के लक्ष्यों को पूर्ण करने के लिए, परमेश्वर का उपयोग करना है। क्या यह तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के स्वभाव के अपमान का एक और तथ्य नहीं है? तुम लोग स्वर्ग के परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो परन्तु पृथ्वी के परमेश्वर के अस्तित्व से इनकार करते हो। हालाँकि, मैं तुम लोगों के विचारों का अनुमोदन नहीं करता हूँ। मैं केवल उन लोगों की सराहना करता हूँ जो अपने पैरों को ज़मीन पर रखते हैं और पृथ्वी के परमेश्वर की सेवा करते हैं, किन्तु उनकी कभी भी नहीं करता हूँ जो पृथ्वी के मसीह को स्वीकार नहीं करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस प्रकार के लोग स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति कितने वफादार हैं, अंत में, वे मेरे हाथ से बच कर नहीं निकल सकते हैं जो दुष्टों को दण्ड देता है। इस प्रकार के लोग दुष्ट हैं; ये मनुष्य दुष्ट हैं; ये दुष्ट लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं और जिन्होंने कभी भी खुशी से मसीह का आज्ञापालन नहीं किया है। निस्संदेह, उनकी संख्या में वे सम्मिलित हैं जो मसीह को नहीं जानते हैं, और उसके अलावा, उसे अभिस्वीकृत नहीं करते हैं। तुम विश्वास करते हो कि तुम मसीह के प्रति जैसा चाहो वैसा व्यव्हार कर सकते हो जब तक कि तुम स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति वफादार हो। गलत! मसीह के बारे में तुम्हारी अज्ञानता स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति अज्ञानता है। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि तुम स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति कितने वफादार हो, यह मात्र खोखली बात और दिखावा है, क्योंकि पृथ्वी का परमेश्वर न केवल सत्य और अधिक गहरे ज्ञान को प्राप्त करने का मनुष्यों में साधन है, बल्कि मनुष्यों की भर्त्सना करने के लिए और उसके बाद दुष्टों को दंडित करने के लिए तथ्यों पर कब्ज़ा करने में और भी बड़ा साधक है। क्या तुमने यहाँ लाभदायक और हानिकारक परिणामों को समझ लिया है? क्या तुमने उनका अनुभव किया है? मैं चाहता हूँ कि तुम लोग शीघ्र ही एक दिन इस सत्य को समझो: परमेश्वर को जानने के लिए, तुम्हें न केवल स्वर्ग के परमेश्वर को अवश्य जानना चाहिए बल्कि, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, पृथ्वी के परमेश्वर को भी अवश्य जानना चाहिए। अपनी प्राथमिकताओं को भ्रमित मत करवाओ या गौण को मुख्य से आगे निकलने की अनुमति मत दो। केवल इसी प्रकार से तुम परमेश्वर के साथ वास्तव में एक अच्छा सम्बन्ध बना सकते हो, परमेश्वर के नज़दीक हो सकते हो, और अपने हृदय को उसके और अधिक निकट ला सकते हो। यदि तुम काफी वर्षों से विश्वास में रहे हो और मेरे साथ बहुत समय तक सम्बद्ध रहे हो, फिर भी मुझ से दूर रहे हो, तो मैं कहता हूँ कि ऐसा अवश्य है कि तुम प्रायः परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करते हो, और तुम्हारे अंत का अनुमान लगाना बहुत ही मुश्किल होगा। यदि मेरे साथ कई वर्षों की सम्बद्धता तुम्हें न केवल ऐसा मनुष्य बनाने में असफल हुई है जिसमें मानवता और सत्यता हो, बल्कि इसके बजाय तुम्हारे दुष्ट तौर-तरीके तुम्हारे स्वभाव में अंतर्निहित हो गए हैं, तुममें बडप्पन के मति-भ्रम न केवल दुगुने हुए हैं बल्कि मेरे बारे में तुम्हारी गलतफहमियाँ भी कई गुना बढ़ गई हैं, इतनी कि तुम मुझे अपना छोटा सा सहअपराधी मान लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हारा मनस्ताप अब ऊपर-ऊपर नहीं है, बल्कि एकदम तुम्हारी अस्थियों तक घुस गया है। और तुम्हारे लिए जो शेष बचा है वह है कि किए जाने वाले अंतिम संस्कार की व्यवस्थाओं की प्रतीक्षा करो। तब तुम्हें मुझसे याचना करने की आवश्यकता नहीं है कि मैं तुम्हारा परमेश्वर बनूँ, क्योंकि तुमने मृत्यु के योग्य पाप, एक अक्षम्य पाप किया है। भले ही मैं तुम्हारे ऊपर दया कर सकूँ, तब भी स्वर्ग का परमेश्वर तुम्हारा जीवन लेने पर जोर देगा, क्योंकि परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध तुम्हारा अपराध कोई साधारण समस्या नहीं है, बल्कि अत्यंत गम्भीर प्रकृति का है। जब समय आएगा, तो तुम्हें पहले से ही नहीं बताने के लिए मुझे दोष मत देना। यह सब वापस इस पर आता है कि: जब तुम एक साधारण मनुष्य के रूप में मसीह—पृथ्वी के परमेश्वर—से सम्बद्ध होते हो, अर्थात् जब तुम विश्वास करते हो कि यह परमेश्वर कुछ नहीं बल्कि एक साधारण मनुष्य है, तभी ऐसा होता है कि तुम तबाह हो जाओगे। तुम सब के लिए मेरी यही एकमात्र चेतावनी है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

परमेश्वर उन्हीं की प्रशंसा करता है जो ईमानदारी से मसीह की सेवा करते हैं

ईश्वर तुम सबसे हर्षित हो, ये तुम चाहो, फिर भी तुम लोग उससे दूर हो, ऐसा क्यों? तुम लोग उसकी काट-छाँट को, योजनाओं को नहीं, उसके वचन को स्वीकारते हो, उसमें तुम्हारी पूरी आस्था नहीं, तो फिर यहाँ, मामला क्या है? तुम्हारी आस्था ऐसा बीज है जो कभी उगेगा नहीं, क्योंकि तुम्हारी आस्था ने न सत्य दिया, न जीवन तुम्हें, बस दिया है झूठा पोषण और सपने तुम्हें। तुम लोग स्वर्ग के ईश्वर को मानते हो, धरती के ईश्वर को नहीं, मगर ईश्वर तुम्हारे इस विचार से सहमत नहीं। ईश्वर तारीफ करता उनकी जो धरती के ईश्वर की सेवा करते, उनकी नहीं जो धरती पर मसीह को नहीं स्वीकारते। वे स्वर्ग के ईश्वर से कितनी भी वफ़ा करें, जब ईश्वर दुष्टों को सज़ा देगा, तो वे बचेंगे नहीं।

तुम्हारी ईश्वर-आस्था का लक्ष्य आशा और पोषण है, सत्य और जीवन नहीं। ईश्वर से अनुग्रह चाहे तुम्हारी निर्लज्ज आस्था, इसे बिल्कुल न माना जा सके सच्ची आस्था। तो कैसे देगी फल ऐसी आस्था? तुम्हारी ईश्वर-आस्था का एक ही लक्ष्य है, अपने मकसद के लिए ईश्वर का इस्तेमाल करना। क्या ये ईश्वर के स्वभाव का अपमान नहीं? तुम लोग स्वर्ग के ईश्वर को मानते हो, धरती के ईश्वर को नहीं, मगर ईश्वर तुम्हारे इस विचार से सहमत नहीं। ईश्वर तारीफ करता उनकी जो धरती के ईश्वर की सेवा करते, उनकी नहीं जो धरती पर मसीह को नहीं स्वीकारते। वे स्वर्ग के ईश्वर से कितनी भी वफ़ा करें, जब ईश्वर दुष्टों को सज़ा देगा, तो वे बचेंगे नहीं।

ईश्वर-विरोधी हैं वे दुष्ट, हुक्म मानते नहीं मसीह का, और वे भी, जो न जानते, न मानते मसीह को। ईश्वर तारीफ करता उनकी जो धरती के ईश्वर की सेवा करते, उनकी नहीं जो धरती पर मसीह को नहीं स्वीकारते। वे स्वर्ग के ईश्वर से कितनी भी वफ़ा करें, जब ईश्वर दुष्टों को सज़ा देगा, तो वे बचेंगे नहीं।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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