1. सच्चा प्रायश्चित क्या है और इसकी अभिव्यक्तियाँ क्या हैं

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

हर इंसान ने कभी न कभी परमेश्वर का विरोध किया होगा और हर इंसान ने कभी न कभी परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया होगा। लेकिन, यदि तुम अपनी खुशी से देहधारी परमेश्वर की आज्ञा मानते हो, और उसके बाद से परमेश्वर के हृदय को अपनी सत्यनिष्ठा द्वारा संतुष्ट करते हो, अपेक्षित सत्य का अभ्यास करते हो, अपेक्षित कर्तव्य का निर्वहन करते हो, और अपेक्षित नियमों को मानते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने विद्रोह को दूर करना चाहते हो, और ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जा सकता है। यदि तुम अपनी गलतियाँ मानने से ढिठाई से इनकार करते हो, और तुम्हारी नीयत पश्चाताप करने की नहीं है, यदि तुम अपने विद्रोही आचरण पर अड़े रहते हो, और परमेश्वर के साथ ज़रा-सा भी सहयोग करने और उसे संतुष्ट करने का भाव नहीं रखते, तब तुम्हारे जैसे दुराग्रही और न सुधरने वाले व्यक्ति को निश्चित रूप से दण्ड दिया जाएगा, और परमेश्वर तुम्हें कभी पूर्ण नहीं बनाएगा। यदि ऐसा है, तो तुम आज परमेश्वर के शत्रु हो और कल भी परमेश्वर के शत्रु रहोगे और उसके बाद के दिनों में भी तुम परमेश्वर के शत्रु बने रहोगे; तुम सदैव परमेश्वर के विरोधी और परमेश्वर के शत्रु रहोगे। ऐसी स्थिति में, परमेश्वर तुम्हें कैसे क्षमा कर सकता है? परमेश्वर का विरोध करना इंसान की प्रकृति है, लेकिन इंसान को महज़ इसलिए जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने के "रहस्य" को पाने का प्रयास नहीं करना चाहिए क्योंकि अपनी प्रकृति बदलना दुर्गम कार्य है। यदि ऐसी बात है, तो बेहतर होगा, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए तुम चले जाओ, ऐसा न हो कि भविष्य में तुम्हारी ताड़ना अधिक कठोर हो जाए, और तुम्हारी क्रूर प्रकृति उभर आए और उच्छृंखल हो जाए, जब तक कि अंत में परमेश्वर द्वारा तुम्हारे भौतिक शरीर को समाप्त न कर दिया जाए। तुम आशीष पाने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हो; लेकिन अगर अंत में, तुम पर दुर्भाग्य आ पड़े, तो क्या यह शर्मिंदगी की बात नहीं होगी। मैं तुम लोगों से आग्रह करता हूँ कि बेहतर होगा कि तुम कोई अन्य योजना बनाओ। तुम जो भी करो, वो परमेश्वर में आस्था रखने से बेहतर होगा : यकीनन ऐसा तो नहीं हो सकता कि यही एक मार्ग है। अगर तुमने सत्य की खोज नहीं की तो क्या तुम जीवित नहीं रहोगे? तुम क्यों इस प्रकार से परमेश्वर के साथ असहमत हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं' से उद्धृत

हर व्‍यक्ति ने, कमोबेश, पाप किया है। जब तुम किसी चीज़ के बारे में यह नहीं जानते कि वह पाप है, तो तुम उसके बारे में धुँधले-से ढंग से सोचते हो या शायद तुम अपनी धारणाओं, आदतों और समझने के तौर-तरीक़ों से चिपके रहते हो—लेकिन एक दिन, चाहे अपने भाइयों और बहनों के साथ संगति के माध्‍यम से या परमेश्‍वर के प्रकाशन के माध्‍यम से, तुम जान जाते हो कि यह एक पाप है, परमेश्‍वर का अपमान है। तब तुम्‍हारा रवैया क्‍या होगा? क्‍या तुम तब भी, इस विश्‍वास के साथ कि तुम जो कुछ भी कर रहे हो वह सत्‍य के अनुरूप है, अपनी ज़ि‍द पर अड़े रहते हुए तर्क देते रहोगे, बहस करते रहोगे, अपने विचारों का अनुसरण करते रहोगे, यह मानते हुए कि जो तुम कर रहे हो वह सत्य के साथ तालमेल में है? यह चीज़ परमेश्‍वर के साथ तुम्‍हारे रवैये से संबंध रखती है। डेविड ने अपने पाप के प्रति किस तरह का रवैया अपनाया था? पश्‍चाताप–मैं अब यह पाप नहीं करूँगा। तब उसने क्‍या किया था? उसने परमेश्‍वर से प्रार्थना की थी कि वह उसे दंड दे : "अगर मैं यह ग़लती फिर से करूँ, तो परमेश्‍वर मुझे दंड दे और मेरी मृत्‍यु का कारण बने!" यह था उसका संकल्‍प; वह सच्‍चा पश्‍चाताप था। क्‍या साधारण लोग इसे हासिल कर सकते हैं? साधारण लोगों के लिए यही अच्‍छा है कि वे बहस करने की कोशिश नहीं करते या चुपचाप जवाबदेही स्‍वीकार कर लेते हैं और मन-ही-मन यह सोचते हैं : "उम्‍मीद है अब फिर से यह मुद्दा कोई नहीं उठाएगा। मुझे अपमानित होना पड़ेगा।" क्‍या यह सच्‍चा पश्‍चाताप है? सच्‍चे पश्‍चाताप के लिए अनिवार्य है कि तुम अतीत की अपनी बुराई को त्‍याग दो, उसे ख़त्‍म कर दो और भविष्‍य में उसे न दोहराओ। तब फिर क्‍या किया जाए? क्‍या मात्र बुराई को त्‍याग देने से और वह कृत्‍य न करने तथा उसके बारे में न सोचने से काम चल जाएगा? परमेश्‍वर के प्रति तुम्‍हारा क्‍या रवैया है? अब तुम स्‍वयं को परमेश्‍वर के समक्ष उजागर करते हुए उसके प्रति क्‍या दृष्टिकोण अपनाओगे? (हम परमेश्‍वर का दंड स्‍वीकार करेंगे।) परमेश्‍वर के दंड को, उसके न्‍याय और ताड़ना को स्‍वीकार करना–यह उसका एक हिस्‍सा है। दूसरा हिस्‍सा है परेमश्‍वर के दंड को स्‍वीकार करते हुए उसकी पड़ताल को स्‍वीकार करना। जब तुम इन दोनों हिस्‍सों को स्‍वीकार कर लोगे, तब तुम्‍हारे संकल्‍प का रूप क्‍या होगा? जब भविष्‍य में इस तरह की परिस्थितियों और मसलों से तुम्‍हारा सामना होगा, तब तुम क्‍या करोगे? सच्‍चे पश्‍चाताप के बिना व्‍यक्ति अपनी बुराई को नहीं त्‍याग सकता और वे कहीं भी, कभी भी, अपने पुराने तौर-तरीक़ों पर वापस लौट सकते हैं और बार-बार उसी बुरे काम को, उसी पाप को, उसी भूल को दोहरा सकते हैं। इससे सत्‍य और परमेश्‍वर के प्रति मनुष्‍य का रवैया ज़ाहिर होता है।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

शुरू में लोग सत्य पर अमल करने को तैयार नहीं होते। उदाहरण के तौर पर, पूरे समर्पण भाव से कर्तव्यों के निर्वहन को ही लो। तुम्हारे अंदर अपने कर्तव्यों को पूरा करने और परमेश्वर के प्रति वफादार होने की कुछ समझ है, और तुम उससे जुड़े सत्यों को समझते भी हो, लेकिन तुम परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पित कब होगे? नाम और कर्म में तुम अपने कर्तव्यों का निर्वहन कब करोगे? इसमें प्रक्रिया की आवश्यकता है। इस प्रक्रिया के दौरान, तुम्हें कई कठिनाइयों को झेलना पड़ सकता है; शायद कुछ लोग तुम्हारे साथ निपटें, कुछ तुम्हारी आलोचना करें। सबकी आँखें तुम पर टिकी होंगी, तब तुम्हें एहसास होगा कि तुम गलत हो, तुम्हीं ने अच्छा काम नहीं किया, कर्तव्यों के निर्वहन में समर्पण की कमी को बर्दाश्त नहीं किया जाता, तुम लापरवाह या अन्यमनस्क नहीं हो सकते। पवित्र आत्मा तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध करता है और जब तुम भूल करते हो, तो वह तुम्हें फटकारता है। इस प्रक्रिया के दौरान, तुम अपने बारे में कुछ बातें समझोगे और जानोगे कि तुम बहुत अपवित्र हो, तुम्हारे अंदर निजी इरादे भरे पड़े हैं, और अपने कर्तव्यों को पूरा करते समय तुम्हारे अंदर बहुत सारी अनियंत्रित इच्छाएँ हैं। जब तुम इन चीज़ों के सार को समझ जाते हो, तो तुम परमेश्वर के समक्ष आकर, उससे प्रार्थना करके सच्चा प्रायश्चित कर सकते हो; इस तरह तुम अशुद्धियों से मुक्त हो सकते हो। यदि इस तरह अपनी व्यावहारिक समस्याओं का समाधान करने के लिए तुम अक्सर सत्य की खोज करोगे, तो तुम आस्था के सही मार्ग पर कदम बढ़ा सकोगे। किसी इंसान का भ्रष्ट स्वभाव जितना शुद्ध किया जाएगा, उसका जीवन स्वभाव उतना ही रूपांतरित होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वभाव बदलने के बारे में क्या जानना चाहिए' से उद्धृत

स्वभाव में परिवर्तन विभिन्न स्वभावों द्वारा उत्पन्न विभिन्न स्थितियों को पहचानने से शुरू होता है। यदि किसी ने इसे पहचानना शुरू नहीं किया है, यदि किसी ने वास्तविकता के इस पहलू में प्रवेश नहीं किया है, तो उसके स्वभाव में बदलाव का प्रश्न ही नहीं उठता है। चूँकि स्वभावगत परिवर्तन का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता, तो अधिकांश लोगों द्वारा अपने कर्तव्य के निर्वहन करने के दौरान क्या भूमिका निभाई जाती है? यह खुद को थकाना है, खुद को कार्यों में व्यस्त रखना है। वे अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं, लेकिन ज्यादातर मजदूरी कर रहे हैं। कभी-कभी जब वे अच्छे मूड में होते हैं तो वे इसमें अधिक मेहनत करते हैं, और जब वे ज्यादा अच्छे मूड में नहीं होते, तो वे इसमें कम मेहनत करते हैं। इस तथ्य के बाद, वे इसके बारे में सोचते हैं और उन्हें थोड़ा-बहुत पछतावा होता है, इसलिए वे थोड़ी अतिरिक्त ऊर्जा लगाते हैं और महसूस करते हैं कि उन्होंने पश्चाताप कर लिया है। वास्तव में, यह सच्चा परिवर्तन नहीं है; यह सच्चा पश्चाताप नहीं है। सच्चा पश्चाताप तुम्हारे व्यवहार से शुरू होता है। यदि तुम्हारे व्यवहार में कोई बदलाव आया है, तुम देह-सुख को त्यागकर वैसे काम करना बंद कर देते हो, यदि तुम्हारे कार्य सिद्धांतों के अनुरूप प्रतीत होते हैं, और धीरे-धीरे तुम शब्दों और कामों में सिद्धांतों का अनुसरण करते हो, तब यह स्वभाव में बदलाव की शुरुआत है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'तुम सत्‍य की खोज तभी कर सकते हो जब आप स्‍वयं को जानें' से उद्धृत

कुछ लोग अपने आत्म-ज्ञान में केवल प्रचलित गतियों से गुज़र रहे होते हैं : "हर कोई कह रहा है कि वह धोखेबाज़ है, इसलिए मैं भी कहता हूँ, यह तो अजीब होगा अगर मैं ये न कहूँ।" वे इसे ख़ुशी से कहते हैं, मानो वे अपनी शान बढ़ा रहे हों। यह प्रचलित गतियों से गुज़रना है। तो क्या इस ज्ञान में कोई ऋणग्रस्तता है जो प्रचलित गतियों से गुज़रने से आती है? नहीं है। चाहे वे अपने स्वयं की धोखेबाज़ी और भ्रष्ट स्वभावों को कैसे भी पहचानते हों, यह सही पहचानना नहीं है। और मैं क्यों कहता हूँ कि यह सही पहचानना नहीं है? यह उनके दिल के भीतर की गहराई से आने वाला खुद का सही खुलासा और आत्म-ग्लानि नहीं है। जब वे कुछ भी बुरा करते हैं, तो वे कोई घृणा, ऋणग्रस्तता की कोई भावना, महसूस नहीं करते हैं; जब वे परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश करते हैं, या ईश-निंदा करते हैं, परमेश्वर के खिलाफ़ विद्रोह करते हैं, और जब वे अन्य लोगों को धोखा देते हैं, तो उन्हें कोई ऋणग्रस्तता महसूस नहीं होती है। यदि वे कोई ऋणग्रस्तता महसूस नहीं करते, तो क्या वे पछतावा करने में सक्षम हैं? और क्या बिना पछतावे के लोग पश्चाताप कर सकते हैं? जो लोग पश्चाताप नहीं करते, क्या वे सत्य का अभ्यास करने के लिए वापस मुड़ सकते हैं और देह की चाहत को ख़ारिज कर सकते हैं? वे ऐसा नहीं कर सकते हैं—यह दिल का मामला है। अंदरूनी तौर पर, कुछ लोग खुद को वास्तव में जानते हैं और पश्चाताप करते हैं। हालाँकि उनके मुंह से यह नहीं कहा जाता है, वे शर्मिंदा होते हैं, उन्हें लगता है कि उन्होंने झूठ बोला है, और (हालाँकि) वे खुद ही दूसरों को बता नहीं सकते हैं, अपने दिल में वे जानते हैं कि वे धोखेबाज़ और बुरे हैं, कि वे ईमानदार नहीं हैं, कि वे पूरी तरह से झूठे और धोखेबाज़ हैं, कि वे भाइयों और बहनों को और परमेश्वर को धोखा दे रहे हैं। अपने दिल में, वे खुद से नफ़रत करते हैं, और फिर वे पश्चाताप करते हैं। हालाँकि हर किसी का सारभूत स्वभाव एक जैसा होता है, जैसे ही उन्हें अपनी खुद की नीचता का पता चलता है, वे कलंकित महसूस करते हैं, वे वो सब कुछ स्वीकार करते हैं जिसे परमेश्वर सही के रूप में प्रकट करता है, और वे न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना शुरू करते हैं। वे अपने दिलों की गहराई में सच्चा पछतावा महसूस करते हैं। यही सच्चा नज़रिया और ज्ञान है। इस बीच, जिन लोगों में सच्ची दृष्टि का अभाव होता है, वे कुछ औपचारिकताओं को दोहराने में सक्षम होते हैं, जैसे कि वे कोई चुटकुला सुना रहे हों, या कोई शिशु-गीत गा रहे हों; ये सिर्फ मनपसंद वाक्यांश भर होते हैं। उनके धोखे लोगों की आँखों को भिगो देते हैं, लेकिन ये उनके लिए कुछ भी मायने नहीं रखते हैं। क्या ऐसे कई लोग हैं? इस तरह के लोग सबसे अधिक धोखेबाज़ होते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'तुम सत्‍य की खोज तभी कर सकते हो जब आप स्‍वयं को जानें' से उद्धृत

जो लोग मसीह-विरोधियों के मार्ग का अनुसरण करते हैं, उनके पास अभी भी आशा और पश्चात्ताप करने का अवसर है, और वे अपने मसीह-विरोधी स्वभाव को त्यागने में सक्षम हैं, किंतु मसीह-विरोधी सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं, इसलिए चाहे जैसे भी तुम उनसे निष्कपट और ईमानदार होने के लिए, और जो उन्हें कहना है, उस पर ज्यादा सोच-विचार या उसे संसाधित न करके उसे सीधे तौर पर कहने के लिए कहो, लेकिन वे यह महसूस करते हैं कि इससे उन्हें बदतर स्थिति का सामना करना पड़ेगा, और कि यह काम नहीं कर सकता, कि यह सिर्फ मूर्खता है। वे चाहे जितनी भी कोशिश करें, इसे अभ्यास में नहीं ला पाते। यह एक मसीह-विरोधी है। यही अंतर है। सत्य चाहे कैसे भी संप्रेषित किया जाए, मसीह-विरोधियों जैसे लोग केवल यह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने सत्य के अनुसार कार्य नहीं किया है और उनका स्वभाव मसीह-विरोधी है। किंतु उनका स्वीकार करना बेकार है, इस बात की उनकी स्वीकृति व्यर्थ है। वे सत्य का अभ्यास नहीं करते, इसलिए वे अपने को बदलने में असमर्थ हैं, और परमेश्वर उन्हें नहीं बचाएगा। किंतु मसीह-विरोधी स्वभाव वाले लोगों में से कुछ जब इन वचनों को सुनते हैं, तो वे इन्हें अपने दिल में याद करते हैं, और ये उनके दिल पर चोट करते हैं। "तो, यह एक मसीह-विरोधी का स्वभाव है! यही मसीह-विरोधियों का मार्ग अपनाना है—यह वास्तव में गंभीर है! मेरी स्थिति इसी तरह की है, और मैं ऐसे ही व्यवहार करता हूँ। मेरा सार इसी तरह का है—मैं इसी तरह का व्यक्ति हूँ!" फिर वे इस बात पर विचार करेंगे कि वे कैसे बदल सकते हैं, कैसे वे अपने मसीह-विरोधी स्वभाव से बच सकते हैं, कैसे उनका इससे कोई लेना-देना या संबंध नहीं रह सकता, और कैसे वे मसीह-विरोधी के रास्ते पर चलने से बच सकते हैं। काम पर, जीवन में, अपने व्यक्तिगत प्रवेश में, लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति अपने रवैये में, उन चीजों से निपटने में जिन्हें परमेश्वर ने उन्हें सौंपा है, वे इस बात पर विचार करेंगे कि कोई कार्य मसीह-विरोधी का है या नहीं, और जब उनमें एक मसीह-विरोधी का स्वभाव प्रकट होता है तो वे उससे घृणा करेंगे, और उसके प्रकट होने के बाद पछताएँगे। उनकी नफरत और पछतावे से उनके जीवन-प्रवेश में कैसे लाभ होगा? एक-दो वर्षों के भीतर, काम पर और अपने व्यक्तिगत प्रवेश में समान रूप से, वे धीरे-धीरे अपने मसीह-विरोधी स्वभाव को त्याग देंगे, और उसके विरुद्ध संघर्ष करेंगे और लड़ेंगे। कभी-कभी वे अभी भी हैसियत की खातिर काम करने और बोलने से खुद को रोक नहीं पाएँगे। बोलने के बाद वे खुद से नफरत करेंगे, लेकिन अगली बार ऐसा मामला सामने आने पर वे फिर से ऐसा करेंगे, और बाद में फिर पछताएँगे, और इसे निरंतर दोहराते रहेंगे। यह दोहराव क्या साबित करता है? यह साबित करता है कि वे प्रवेश में हैं। यदि ऐसा दोहराव नहीं होगा, और न ही प्रवेश और न वापसी, तो जीवन नहीं होगा। दोहराव साबित करता है कि व्यक्ति में जीवन महत्वपूर्ण है, उसके पास जीवन और आधार है। कुछ लोगों में न तो कोई भावना होती है, न दर्द और न ही सुख, और जब उनके साथ इस बारे में सहभागिता की जाती है, तो वे स्वीकार करते हैं कि उनका स्वभाव मसीह-विरोधी है, कि उन्होंने मसीह-विरोधी मार्ग अपनाया है। वे जो कहते हैं, वह काफी अच्छा होता है, लेकिन जब प्रवेश की बात आती है, तो उनमें कोई लड़ाई नहीं होती। उनसे पूछो, क्या उन्होंने अपने मसीह-विरोधी स्वभाव के विरुद्ध संघर्ष किया है? जब वे अपनी हैसियत की रक्षा करने के लिए बोलते हैं, तो क्या वे खुद को अंदर से धिक्कारते हैं? क्या बाद में उन्हें इसका पछतावा होता है? इसका एहसास होने पर, जब वे अगली बार बोलते हैं तो क्या वे इसे रोकने की कोशिश करते हैं? क्या ये स्थितियाँ उनमें मौजूद हैं? जो सिर्फ बोलते हैं और करते कुछ नहीं, वे कहेंगे "मुझे नहीं पता—मुझमें वे सब हैं।" वे मानते हैं कि उनमें वे सब हैं, लेकिन यह स्वीकार करने के बाद, विस्तृत प्रवेश या अपनी विशिष्ट स्थिति के संबंध में वे कुछ नहीं करते। जिन्होंने वास्तव में प्रवेश किया है, वे दु:खी होंगे। "मैं जानता हूँ कि मेरा स्वभाव मसीह-विरोधी है। मैं इसे उतारकर फेंक क्यों नहीं पाता? यह बहुत कठिन है; इसे बदलना आसान बात नहीं है!" उनका यह कहना कि यह आसान नहीं है, क्या साबित करता है? यह साबित करता है कि अपने भीतर, वे प्रवेश कर रहे हैं, वे लड़ रहे हैं, और उनकी स्थिति में निरंतर बदलाव आ रहा है। इस तरह, चीजें धीरे-धीरे सुधरेंगी, और अंत में वे जीत जाएँगे। यह आसान नहीं है! यह किसी मरते हुए व्यक्ति को बचाने जैसा है—तुम जो कुछ भी कर सकते हो, करते हो। यदि कोई व्यक्ति अभी भी जीने में सक्षम है, तो उसके शरीर में जीवन के निरंतर संकेत होंगे, जबकि जो व्यक्ति पूरी तरह से मर चुका है, वह कोई प्रतिक्रिया नहीं देगा, चाहे तुम कुछ भी करो। वे लगभग मर चुके हैं और चेतनाशून्य हैं।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दूसरों से केवल अपना आज्ञापालन करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर का नहीं (II)' से उद्धृत

कुछ लोगों ने अतीत में, एक मसीह-विरोधी के कुछ स्वभावों को प्रकट किया था: वे आवारा और स्वेछाचारी थे, वे जो कहें हमेशा वही होता था या फिर परिणाम झेलना पड़ता था। लेकिन निपटारे और काट-छाँट से गुज़र कर, भाई-बहनों के द्वारा उनके साथ की गई संगति के माध्यम से, पुनर्निर्दिष्ट या प्रतिस्थापित होकर, कुछ बड़ी असफलताओं को झेलकर, एक समय के लिए नकारात्मक होने और फिर यह सोचते हुए, "कोई बात नहीं, मुझे अभी भी अपने कर्तव्य को ठीक से निभाने की अपनी प्राथमिकता को पूरा करना है। मैं मसीह-विरोधी के मार्ग पर चल रहा हूँ, लेकिन मुझे इस रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है, इसलिए मुझे अपने विश्वास में अच्छा होना चाहिए, मुझे ईमानदारी से तलाश करनी चाहिए। सत्य की तलाश करने के मार्ग में कुछ भी ग़लत नहीं होता है,"—धीरे-धीरे, वे खुद को वापस मोड़ लेते हैं, और फिर वे पश्चाताप करते हैं। उनमें अच्छी संभावनाएँ दिखाई पड़ती हैं, वे अपने कर्तव्यों का पालन करते समय सत्य-सिद्धांतों की तलाश करते हैं, और दूसरों के साथ कार्य करते हुए भी वे सत्य-सिद्धांतों की तलाश करते हैं। हर लिहाज से वे एक बेहतर दिशा में बढ़ रहे होते हैं। तब क्या वे बदले नहीं हैं? यह मसीह-विरोधी के मार्ग से हटना और सत्य के अभ्यास और उसकी तलाश के मार्ग पर चलना है। उन लोगों के लिए आशा है, उनके पास एक मौका है, वे खुद को वापस मोड़ सकते हैं। क्या तुम ऐसे लोगों को इसलिए मसीह-विरोधी के रूप में वर्गीकृत कर सकते हो, कि उन्होंने एक बार मसीह-विरोधी के कुछ लक्षण प्रदर्शित किए थे, या वे मसीह-विरोधी के मार्ग पर चले थे? नहीं। मसीह-विरोधी पश्चाताप नहीं करते हैं, उनके पास कोई शर्म नहीं होती, और इसके अलावा, उनके स्वभाव उग्र और बुरे होते हैं, तथा वे सच्चाई से एक चरम सीमा तक घृणा करते हैं। उनकी अतिशय घृणा क्या निर्धारित करती है? यह कि वे कभी पश्चाताप नहीं कर सकते। यदि वे इस हद तक सत्य से घृणा करते हैं, तो क्या वे सत्य का अभ्यास कर सकते हैं, और क्या वे पश्चाताप करने में सक्षम हैं? असंभव। यदि उन लोगों के बारे में जो पश्चाताप करने में सक्षम होते हैं, कोई एक बात निश्चित हो, तो वह यह है कि उन्होंने भूलें तो की होती हैं, लेकिन परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करने में वे सक्षम होते हैं, परमेश्वर द्वारा कही गई सच्चाइयों को स्वीकार करने में सक्षम होते हैं, और परमेश्वर के वचनों को अपनी व्यक्तिगत सूक्तिओं के रूप में लेकर, और परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन की वास्तविकता बनाकर, वे सहयोग देने का यथाशक्ति प्रयास करने में सक्षम होते हैं। वे सत्य को स्वीकार करते हैं, और अपनी गहराई में, वे इससे घृणा नहीं करते हैं। क्या यह अंतर नहीं है?

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दूसरों से केवल अपना आज्ञापालन करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर का नहीं (I)' से उद्धृत

जब नीनवे के राजा ने यह समाचार सुना, तो वह अपने सिंहासन से उठा खड़ा हुआ, उसने अपने वस्त्र उतार डाले और टाट पहनकर राख में बैठ गया। तब उसने घोषणा की कि नगर में किसी को भी कुछ भी चखने की अनुमति नहीं दी जाएगी, और किसी भेड़, बैल या अन्य मवेशी को घास-पानी नहीं दिया जाएगा। मनुष्य और पशु दोनों को एक-समान टाट ओढ़ना था, और लोगों को बड़ी लगन से परमेश्वर से विनती करनी थी। राजा ने यह घोषणा भी की कि उनमें से प्रत्येक अपने बुरे मार्ग को छोड़ देगा और हिंसा का त्याग कर देगा। उसके द्वारा लगातार किए गए इन कार्यों को देखते हुए, नीनवे के राजा के हृदय में सच्चा पश्चात्ताप था। उसके द्वारा किए गए ये कार्य—अपने सिंहासन से उठ खड़ा होना, अपने राजकीय वस्त्र उतार देना, टाट ओढ़ना और राख में बैठ जाना—लोगों को बताता है कि नीनवे का राजा अपने शाही रुतबे को छोड़ रहा था और आम लोगों के साथ टाट ओढ़ रहा था। कहने का तात्पर्य है कि नीनवे का राजा यहोवा परमेश्वर से आई घोषणा सुनने के बाद अपने बुरे मार्ग पर चलते रहने या अपने हाथों से हिंसा जारी रखने के लिए अपने शाही पद पर जमा नहीं रहा; बल्कि उसने अपने अधिकार को दरकिनार कर यहोवा परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप किया। इस समय नीनवे का राजा एक राजा के रूप में पश्चात्ताप नहीं कर रहा था; बल्कि वह परमेश्वर की एक सामान्य प्रजा के रूप में अपने पाप स्वीकार करने और पश्चात्ताप करने के लिए परमेश्वर के सामने आया था। इतना ही नहीं, उसने पूरे शहर से भी उसी तरह यहोवा परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप करने और अपने पाप स्वीकार करने के लिए कहा, जिस तरह उसने किया था; इसके अलावा, उसके पास एक विशिष्ट योजना भी थी कि ऐसा कैसे किया जाए, जैसा कि पवित्रशास्त्र में देखने को मिलता है : "क्या मनुष्य, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, या अन्य पशु, कोई कुछ भी न खाए; वे न खाएँ और न पानी पीएँ। ... और वे परमेश्‍वर की दोहाई चिल्‍ला-चिल्‍ला कर दें; और अपने कुमार्ग से फिरें; और उस उपद्रव से, जो वे करते हैं, पश्‍चाताप करें।" नगर का शासक होने के नाते, नीनवे का राजा उच्चतम हैसियत और सामर्थ्य रखता था और जो चाहता, कर सकता था। यहोवा परमेश्वर की घोषणा सामने आने पर वह उस मामले को नज़रअंदाज़ कर सकता था या बस यों ही अकेले अपने पापों का प्रायश्चित कर सकता था और उन्हें स्वीकार कर सकता था; नगर के लोग पश्चात्ताप करें या न करे, वह इस मामले को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर सकता था। किंतु नीनवे के राजा ने ऐसा बिलकुल नहीं किया। उसने न केवल अपने सिंहासन से उठकर टाट ओढ़कर और रख मलकर यहोवा परमेश्वर के सामने अपने पाप स्वीकार किए और पश्चात्ताप किया, बल्कि उसने अपने नगर के सभी लोगों और पशुओं को भी ऐसा करने का आदेश दिया। यहाँ तक कि उसने लोगों को आदेश दिया कि "परमेश्वर की दोहाई चिल्ला चिल्लाकर दो।" कार्यों की इस शृंखला के जरिये नीनवे के राजा ने सच में वह किया, जो एक शासक को करना चाहिए। उसके द्वारा किए गए कार्यों की शृंखला ऐसी है, जिसे करना मानव-इतिहास में किसी भी राजा के लिए कठिन था, और निस्संदेह, कोई अन्य राजा ये कार्य नहीं कर पाया। ये कार्य मानव-इतिहास में अभूतपूर्व कहे जा सकते हैं, और ये मानवजाति द्वारा स्मरण और अनुकरण दोनों के योग्य हैं। मनुष्य की उत्पत्ति के समय से ही, प्रत्येक राजा ने परमेश्वर का प्रतिरोध और विरोध करने में अपनी प्रजा की अगुआई की है। किसी ने भी कभी अपनी दुष्टता से छुटकारा पाने, यहोवा परमेश्वर से क्षमा पाने और आने वाले दंड से बचने के लिए परमेश्वर से विनती करने हेतु अपनी प्रजा की अगुआई नहीं की। किंतु नीनवे का राजा परमेश्वर की ओर मुड़ने, कुमार्ग त्यागने और अपने हाथों के उपद्रव का त्याग करने में अपनी प्रजा की अगुआई कर पाया। इतना ही नहीं, वह अपने सिंहासन को भी छोड़ पाया, और बदले में, यहोवा परमेश्वर का मन बदल गया और उसे अफ़सोस हुआ, उसने अपना कोप त्याग दिया, नगर के लोगों को जीवित रहने दिया और उन्हें सर्वनाश से बचा लिया। राजा के कार्यों को मानव-इतिहास में केवल एक दुर्लभ चमत्कार ही कहा जा सकता है, यहाँ तक कि उन्हें भ्रष्ट मनुष्यों का आदर्श भी कहा जा सकता है, जो परमेश्वर के सामने अपने पाप स्वीकार करते हैं और पश्चात्ताप करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

यह "कुमार्ग" मुटठीभर बुरे कार्यों को संदर्भित नहीं करता, बल्कि उस बुरे स्रोत को संदर्भित करता है, जिससे लोगों का व्यवहार उत्पन्न होता है। "अपने कुमार्ग से फिर जाने" का अर्थ है कि ऐसे लोग ये कार्य दोबारा कभी नहीं करेंगे। दूसरे शब्दों में, वे दोबारा कभी इस बुरे तरीके से व्यवहार नहीं करेंगे; उनके कार्यों का तरीका, स्रोत, उद्देश्य, इरादा और सिद्धांत सब बदल चुके हैं; वे अपने मन को आनंदित और प्रसन्न करने के लिए दोबारा कभी उन तरीकों और सिद्धांतों का उपयोग नहीं करेंगे। "हाथों के उपद्रव को त्याग देना" में "त्याग देना" का अर्थ है छोड़ देना या दूर करना, अतीत से पूरी तरह से नाता तोड़ लेना और कभी वापस न मुड़ना। जब नीनवे के लोगों ने हिंसा त्याग दी, तो इससे उनका सच्चा पश्चात्ताप सिद्ध हो गया। परमेश्वर लोगों के बाहरी रूप के साथ-साथ उनका हृदय भी देखता है। जब परमेश्वर ने नीनवे के लोगों का हृदय सच्चा पश्चात्ताप देखा जिसमें कोई सवाल नहीं थे, और यह भी देखा कि वे अपने कुमार्गों से फिर गए हैं और उन्होंने हिंसा त्याग दी है, तो उसने अपना मन बदल लिया। कहने का तात्पर्य है कि इन लोगों के आचरण, व्यवहार और कार्य करने के विभिन्न तरीकों ने, और साथ ही उनके हृदय में पापों की सच्ची स्वीकृति और पश्चात्ताप ने परमेश्वर को अपना मन बदलने, अपने इरादे बदलने, अपना निर्णय वापस लेने, और उन्हें दंड न देने या नष्ट न करने के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार, नीनवे के लोगों ने अपने लिए एक अलग परिणाम प्राप्त किया। उन्होंने अपने जीवन को छुड़ाया और साथ ही परमेश्वर की दया और सहनशीलता प्राप्त कर ली, और इस मुकाम पर परमेश्वर ने भी अपना कोप वापस ले लिया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

पतरस को सबसे अधिक किस बात का पछतावा हुआ? पतरस के यह कहने के शीघ्र बाद कि "तू जीवित परमेश्वर का पुत्र है", यीशु ने पतरस से एक और प्रश्न पूछा (यद्यपि यह बाइबल में इस प्रकार से दर्ज नहीं है)। यीशु ने उससे पूछा : "पतरस! क्या तूने कभी मुझसे प्रेम किया है?" पतरस उसका अभिप्राय समझ गया और बोला : "प्रभु! मैंने एक बार स्वर्गिक पिता से प्रेम किया था, किंतु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने तुझसे कभी प्रेम नहीं किया।" तब यीशु ने कहा, "यदि लोग स्वर्गिक परमेश्वर से प्रेम नहीं करते, तो वे पृथ्वी पर पुत्र से कैसे प्रेम कर सकते हैं? और यदि लोग परमपिता परमेश्वर द्वारा भेजे गए पुत्र से प्रेम नहीं करते, तो वे स्वर्गिक पिता से कैसे प्रेम कर सकते हैं? यदि लोग वास्तव में पृथ्वी पर पुत्र से प्रेम करते हैं, तो वे स्वर्गिक पिता से भी वास्तव में प्रेम करते हैं।" जब पतरस ने इन वचनों को सुना, तो उसने महसूस किया कि उसमें क्या कमी है। उसे अपने इन शब्दों पर कि "मैंने एक बार स्वर्गिक पिता से प्रेम किया था, किंतु मैंने तुझसे कभी प्रेम नहीं किया," हमेशा इतना पछतावा महसूस होता था कि उसकी आँखों में आँसू आ जाते थे। यीशु के पुनर्जीवित होने और स्वर्गारोहण करने के बाद उसे अपने इन शब्दों पर और भी अधिक पछतावा और दुःख महसूस हुआ। अपने अतीत के कार्यों और अपनी वर्तमान कद-काठी को याद कर, वह प्राय: प्रार्थना करने के लिए यीशु के सामने आता, परमेश्वर की इच्छा पूरी न कर पाने और परमेश्वर के मानकों पर खरा न उतर पाने के कारण हमेशा पछतावा और ऋण महसूस करता। ये मामले उसका सबसे बड़ा बोझ बन गए। उसने कहा : "एक दिन मैं तुझे वह सब अर्पित कर दूँगा, जो मेरे पास है और जो मैं हूँ, मैं तुझे वह दूँगा जो सबसे अधिक मूल्यवान है।" उसने कहा : "परमेश्वर! मेरे पास केवल एक ही विश्वास और केवल एक ही प्रेम है। मेरे जीवन का कुछ भी मूल्य नहीं है, और मेरे शरीर का कुछ भी मूल्य नहीं है। मेरे पास केवल एक ही विश्वास और केवल एक ही प्रेम है। मेरे मन में तेरे लिए विश्वास है और हृदय में तेरे लिए प्रेम है; ये ही दो चीज़ें मेरे पास तुझे देने के लिए हैं, और कुछ नहीं।" पतरस यीशु के वचनों से बहुत प्रोत्साहित हुआ, क्योंकि यीशु को सलीब पर चढ़ाए जाने से पहले उसने पतरस से कहा था : "मैं इस संसार का नहीं हूँ, और तू भी इस संसार का नहीं है।" बाद में, जब पतरस एक अत्यधिक पीड़ादायक स्थिति में पहुँचा, तो यीशु ने उसे स्मरण दिलाया : "पतरस, क्या तू भूल गया है? मैं इस संसार का नहीं हूँ, और मैं सिर्फ अपने कार्य के लिए ही पहले चला गया। तू भी इस संसार का नहीं है, क्या तू सचमुच भूल गया है? मैंने तुझे दो बार बताया है, क्या तुझे याद नहीं है?" यह सुनकर पतरस ने कहा : "मैं नहीं भूला हूँ!" तब यीशु ने कहा : "तूने एक बार मेरे साथ स्वर्ग में एक खुशहाल समय और मेरी बगल में एक समयावधि बिताई थी। तू मुझे याद करता है और मैं तुझे याद करता हूँ। यद्यपि सृजित प्राणी मेरी दृष्टि में उल्लेखनीय नहीं हैं, फिर भी मैं किसी निर्दोष और प्यार करने योग्य प्राणी को कैसे प्रेम न करूँ? क्या तू मेरी प्रतिज्ञा भूल गया है? तुझे धरती पर मेरा आदेश स्वीकार करना चाहिए; तुझे वह कार्य पूरा करना चाहिए, जो मैंने तुझे सौंपा है। एक दिन मैं तुझे अपनी ओर आने के लिए निश्चित रूप से तेरी अगुआई करूँगा।" यह सुनने के बाद पतरस और भी अधिक उत्साहित हो गया तथा उसे और भी अधिक प्रेरणा मिली, इतनी कि जब वह सलीब पर था, तो यह कहने में समर्थ था : "परमेश्वर! मैं तुझे पर्याप्त प्यार नहीं कर सकता! यहाँ तक कि यदि तू मुझे मरने के लिए कहे, तब भी मैं तुझे पर्याप्त प्यार नहीं कर सकता! तू जहाँ कहीं भी मेरी आत्मा को भेजे, चाहे तू अपनी पिछली प्रतिज्ञाएँ पूरी करे या न करे, इसके बाद तू चाहे जो कुछ भी करे, मैं तुझे प्यार करता हूँ और तुझ पर विश्वास करता हूँ।" उसके पास जो था, वह था उसका विश्वास और सच्चा प्रेम।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस ने यीशु को कैसे जाना' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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