4. कोई सच्ची प्रार्थना में किस प्रकार प्रवेश कर सकता है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

प्रार्थना करते समय तुम्हारे पास ऐसा हृदय होना चाहिए, जो परमेश्वर के सामने शांत रहे, और तुम्हारे पास एक ईमानदार हृदय होना चाहिए। तुम सही अर्थों में परमेश्वर के साथ संवाद और प्रार्थना कर रहे हो—तुम्हें प्रीतिकर वचनों से परमेश्वर को फुसलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। प्रार्थना उस पर केंद्रित होनी चाहिए, जिसे परमेश्वर अभी संपन्न करना चाहता हो। प्रार्थना करते समय परमेश्वर से तुम्हें अधिक प्रबुद्ध बनाने और रोशन करने के लिए कहो और अपनी वास्तविक अवस्थाओं और अपनी परेशानियाँ उसके सामने रखो, और साथ ही वह संकल्प भी, जो तुमने परमेश्वर के सामने लिया था। प्रार्थना का अर्थ प्रक्रिया का पालन करना नहीं है; उसका अर्थ है सच्चे हृदय से परमेश्वर को खोजना। मांगो कि परमेश्वर तुम्हारे हृदय की रक्षा करे, ताकि तुम्हारा हृदय अकसर उसके सामने शांत हो सके; कि जिस परिवेश में उसने तुम्हें रखा है, उसमें तुम खुद को जान पाओ, खुद से घृणा करो, और खुद को त्याग सको, और इस प्रकार तुम परमेश्वर के साथ एक सामान्य रिश्ता बना पाओ और वास्तव में ऐसे व्यक्ति बन पाओ, जो परमेश्वर से प्रेम करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

परमेश्वर की मनुष्य से न्यूनतम अपेक्षा यह है कि मनुष्य अपना हृदय उसके प्रति खोल सके। यदि मनुष्य अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को देता है और उसे अपने हृदय की सच्ची बात बताता है, तो परमेश्वर उसमें कार्य करने को तैयार होता है। परमेश्वर मनुष्य के कलुषित हृदय की नहीं, बल्कि शुद्ध और ईमानदार हृदय की चाह रखता है। यदि मनुष्य परमेश्वर से अपने हृदय को खोलकर बात नहीं करता है, तो परमेश्वर उसके हृदय को प्रेरित नहीं करेगा या उसमें कार्य नहीं करेगा। इसलिए, प्रार्थना का मर्म है, अपने हृदय से परमेश्वर से बात करना, अपने आपको उसके सामने पूरी तरह से खोलकर, उसे अपनी कमियों या विद्रोही स्वभाव के बारे में बताना; केवल तभी परमेश्वर को तुम्हारी प्रार्थनाओं में रुचि होगी, अन्यथा वह तुमसे मुँह मोड़ लेगा। प्रार्थना का न्यूनतम मानदंड यह है कि तुम्हें परमेश्वर के सामने अपना हृदय शांत रखने में सक्षम होना चाहिए, और उसे परमेश्वर से अलग नहीं हटना चाहिए। यह हो सकता है कि इस चरण के दौरान तुम्हें एक नई या उच्च अंतर्दृष्टि प्राप्त न हो, लेकिन फिर तुम्हें यथास्थिति बनाए रखने के लिए प्रार्थना का उपयोग करना चाहिए—तुम्हें पीछे नहीं हटना चाहिए। कम से कम इसे तो तुम्हें प्राप्त करना ही चाहिए। यदि तुम यह भी नहीं कर सकते, तो इससे साबित होता है कि तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन सही रास्ते पर नहीं है। परिणामस्वरूप, तुम्हारे पास पहले जो दृष्टि थी, उसे बनाए रखने में तुम असमर्थ होगे, तुम परमेश्वर में विश्वास खो दोगे, और तुम्हारा संकल्प इसके बाद नष्ट हो जाएगा। तुमने आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश किया है या नहीं, इसका एक चिह्न यह देखना है कि क्या तुम्हारी प्रार्थना सही रास्ते पर है। सभी लोगों को इस वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए; उन सभी को प्रार्थना में स्वयं को लगातार सजगता से प्रशिक्षित करने का काम करना चाहिए, निष्क्रिय रूप से प्रतीक्षा करने के बजाय, सचेत रूप से पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने का प्रयास करना चाहिए। तभी वे वास्तव में परमेश्वर की तलाश करने वाले लोग होंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

प्रार्थना केवल यन्त्रवत् ढंग से करना, प्रक्रिया का पालन करना, या परमेश्वर के वचनों का पाठ करना नहीं है। दूसरे शब्दों में, प्रार्थना कुछ वचनों को रटना नहीं है और यह दूसरों की नकल करना नहीं है। प्रार्थना में व्यक्ति को उस स्थिति तक पहुँचना चाहिए, जहाँ अपना हृदय परमेश्वर को दिया जा सके, जहाँ वह अपना हृदय खोलकर रख सके, ताकि वह परमेश्वर द्वारा प्रेरित हो सके। यदि प्रार्थना को प्रभावी होना है, तो उसे परमेश्वर के वचन पढ़ने पर आधारित होना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचनों के भीतर से प्रार्थना करने से ही व्यक्ति अधिक प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त कर सकता है। सच्ची प्रार्थना की अभिव्यक्तियाँ हैं : एक ऐसा हृदय होना, जो उस सबके लिए तरसता है जो परमेश्वर चाहता है, और यही नहीं, जो वह माँगता है उसे पूरा करने की इच्छा रखता है; उससे घृणा करना जिससे परमेश्वर घृणा करता है, और फिर इस आधार पर इसकी कुछ समझ प्राप्त करना, और परमेश्वर द्वारा प्रतिपादित सत्यों के बारे में कुछ ज्ञान और स्पष्टता हासिल करना। प्रार्थना के बाद यदि संकल्प, विश्वास, ज्ञान और अभ्यास का मार्ग हो, केवल तभी उसे सच्ची प्रार्थना कहा जा सकता है, और केवल इस प्रकार की प्रार्थना ही प्रभावी हो सकती है। फिर भी प्रार्थना को परमेश्वर के वचनों के आनंद पर निर्मित किया जाना चाहिए, उसे परमेश्वर के साथ उसके वचनों में, संवाद करने की नींव पर स्थापित होना चाहिए, और हृदय को परमेश्वर की खोज करने और उसके समक्ष शांत होने में सक्षम होना चाहिए। इस तरह की प्रार्थना पहले ही परमेश्वर के साथ सच्चे संवाद के चरण में प्रवेश कर चुकी है।

प्रार्थना के बारे में सबसे बुनियादी ज्ञान:

1. जो भी मन में आए, उसे बिना सोचे-समझे न कहो। तुम्हारे हृदय पर एक दायित्व होना चाहिए, यानी प्रार्थना करते समय तुम्हारे पास एक उद्देश्य होना चाहिए।

2. प्रार्थना में परमेश्वर के वचन शामिल होने चाहिए; उसे परमेश्वर के वचनों पर आधारित होना चाहिए।

3. प्रार्थना करते समय तुम्हें पुरानी या बीती बातों को उसमें नहीं मिलाना चाहिए। तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के वर्तमान वचनों से संबंधित होनी चाहिए, और जब तुम प्रार्थना करो, तो परमेश्वर को अपने अंतरतम विचार बताओ।

4. समूह-प्रार्थना एक केंद्र के इर्दगिर्द घूमनी चाहिए, जो आवश्यक रूप से, पवित्र आत्मा का वर्तमान कार्य है।

5. सभी लोगों को मध्यस्थतापरक प्रार्थना सीखनी है। यह परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशीलता दिखाने का एक तरीका भी है।

व्यक्ति का प्रार्थना का जीवन, प्रार्थना के महत्व की समझ और प्रार्थना के मूलभूत ज्ञान पर आधारित है। दैनिक जीवन में, बार-बार अपनी कमियों के लिए प्रार्थना करो, जीवन में अपने स्वभाव में बदलाव लाने के लिए प्रार्थना करो, और परमेश्वर के वचनों के अपने ज्ञान के आधार पर प्रार्थना करो। प्रत्येक व्यक्ति को प्रार्थना का अपना जीवन स्थापित करना चाहिए, उन्हें परमेश्वर के वचनों को जानने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, और उन्हें परमेश्वर के कार्य का ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। परमेश्वर के सामने अपनी व्यक्तिगत परिस्थितियाँ खोलकर रख दो और तुम जिस ढंग से प्रार्थना करते हो, उसकी चिंता किए बिना अपने वास्तविक स्वरूप में रहो, और सच्ची समझ और परमेश्वर के वचनों का वास्तविक अनुभव प्राप्त करना ही मुख्य बात है। आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश का अनुसरण करने वाले व्यक्ति को कई अलग-अलग तरीकों से प्रार्थना करने में सक्षम होना चाहिए। मौन प्रार्थना, परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करना, परमेश्वर के कार्य को जानना—ये सभी सामान्य आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक संगति के उद्देश्यपूर्ण कार्य के उदाहरण हैं, जो हमेशा परमेश्वर के सामने व्यक्ति की अवस्थाओं में सुधार करते हैं और व्यक्ति को जीवन में और अधिक प्रगति करने के लिए प्रेरित करते हैं। संक्षेप में, तुम जो कुछ भी करते हो, चाहे वह परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना हो, या चुपचाप प्रार्थना करना हो, या जोर-जोर से घोषणा करना हो, वह तुम्हें परमेश्वर के वचनों, उसके कार्य और जो कुछ वह तुममें हासिल करना चाहता है, उसे स्पष्ट रूप से देखने में सक्षम बनाने के लिए है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम जो कुछ भी करते हो, वह परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों तक पहुँचने और अपने जीवन को नई ऊँचाइयों तक ले जाने के लिए किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

और तुम पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने की कोशिश कैसे करते हो? अत्यंत महत्वपूर्ण है परमेश्वर के वर्तमान वचनों में जीना और परमेश्वर की अपेक्षाओं की नींव पर प्रार्थना करना। इस तरह प्रार्थना कर चुकने के बाद, पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हें स्पर्श करना निश्चित है। यदि तुम आज परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों की नींव के आधार पर कोशिशनहीं करते, तो यह व्यर्थ है। तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए और कहना चाहिए: "हे परमेश्वर! मैं तुम्हारा विरोध करता हूँ और मैं तुम्हारा बहुत ऋणी हूँ; मैं बहुत ही अवज्ञाकारी हूँ और तुम्हें कभी भी संतुष्ट नहीं कर सकता। हे परमेश्वर, मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे बचा लो, मैं अंत तक तुम्हारी सेवा करना चाहता हूँ, मैं तुम्हारे लिए मर जाना चाहता हूँ। तुम मुझे न्याय और ताड़ना देते हो और मुझे कोई शिकायत नहीं है; मैं तुम्हारा विरोध करता हूँ और मैं मर जाने लायक हूँ ताकि मेरी मृत्यु में सभी लोग तुम्हारा धार्मिक स्वभाव देख सकें।" जब तुम इस तरह अपने दिल से प्रार्थना करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारी सुनेगा और तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा; यदि तुम आज पवित्र आत्मा के वचनों के आधारपर प्रार्थना नहीं करते, तो पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हें छूने की कोई संभावना नहीं है। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार और आज परमेश्वर जो करना चाहते हैं, उसके अनुसार प्रार्थना करते हो, तो तुम कहोगे "हे परमेश्वर! मैं तुम्हारे आदेशों को स्वीकार करना चाहता हूँ और तुम्हारे आदेशों के प्रति निष्ठा रखना चाहता हूँ, और मैं अपना पूरा जीवन तुम्हारी महिमा को समर्पित करने के लिए तैयार हूँ ताकि मैं जो कुछ भी करता हूँ वह परमेश्वर के लोगों के मानकों तक पहुँच सके। काश मेरा दिल तुम्हारे स्पर्श को पा ले। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी आत्मा सदैव मेरा प्रबोधन करे ताकि मैं जो कुछ भी करूँ वह शैतान को शर्मिंदा करे ताकि मैं अंततः तुम्हारे द्वारा प्राप्त किया जाऊँ।" यदि तुम इस तरह प्रार्थना करते हो, परमेश्वर की इच्छा के आसपास केंद्रित रहकर, तो पवित्र आत्मा अपरिहार्य रूप से तुम में कार्य करेगी। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि तुम्हारी प्रार्थनाओं में कितने शब्द हैं—कुंजी यह है कि तुम परमेश्वर की इच्छा समझते हो या नहीं। तुम सभी के पास निम्नलिखित अनुभव हो सकता है: कभी-कभी किसीसभा में प्रार्थना करते समय, पवित्र आत्मा के कार्य का गति-सिद्धांत अपने चरम बिंदु तक पहुँच जाता है, जिससे सभी की ताकत बढ़ती है। परमेश्वर के सामने पश्चाताप से अभिभूत होकर कुछ लोग फूट-फूटकर रोते हैं और प्रार्थना करते हुए आँसू बहाते हैं, तो कुछ लोग अपना संकल्प दिखाते हैं और प्रतिज्ञा करते हैं। पवित्र आत्मा के कार्य से प्राप्त होने वाला प्रभाव ऐसा है। आज यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सभी लोग परमेश्वर के वचनों में पूरी तरह अपना मन लगाएँ। उन शब्दों पर ध्यान न दो, जो पहले बोले गए थे; यदि तुम अभी भी उसे थामे रहोगे जो पहले आया था, तो पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर कार्य नहीं करेगी। क्या तुम देखते हो कि यह कितना महत्वपूर्ण है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो' से उद्धृत

जब तुम प्रार्थना करना शुरू करो, तो अत्यधिक महत्वाकाँक्षी बनने की कोशिश मत करो और एक ही झटके में सबकुछ हासिल करने की उम्मीद मत करो। तुम इस बात की उम्मीद रखते हुए अतिशय माँगें नहीं कर सकते कि जैसे ही तुम माँगोगे, तुम्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित कर दिया जाएगा, या कि तुम्हें प्रबुद्धता और रोशनी मिल जाएगी, या कि परमेश्वर तुम पर अनुग्रह बरसा देगा। ऐसा नहीं होगा; परमेश्वर अलौकिक चीजें नहीं करता। परमेश्वर अपने अनुसार लोगों की प्रार्थनाओं को स्वीकार करता है, और कभी-कभी वह यह देखने के लिए कि तुम उसके प्रति वफ़ादार हो या नहीं, तुम्हारे विश्वास को परखता है। जब तुम प्रार्थना करते हो, तो तुममें विश्वास, दृढ़ता और संकल्प होना चाहिए। अधिकांश लोग प्रशिक्षित होना शुरू करते ही हिम्मत हार जाते हैं, क्योंकि वे पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित होने में विफल रहते हैं। इससे काम नहीं चलेगा! तुम्हें दृढ़ रहना चाहिए; तुम्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने का एहसास करने और तलाश और खोज करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। कभी-कभी तुम्हारे अभ्यास का मार्ग सही नहीं होता, और कभी-कभी तुम्हारे व्यक्तिगत उद्देश्य और धारणाएँ परमेश्वर के सामने टिक नहीं पातीं, और इसलिए परमेश्वर का आत्मा तुम्हें प्रेरित करने में विफल रहता है। अन्य समय में, परमेश्वर यह देखता है कि तुम वफ़ादार हो या नहीं। संक्षेप में, प्रशिक्षण में तुम्हें ऊँची कीमत चुकानी चाहिए। यदि तुम्हें पता चलता है कि तुम अपने अभ्यास के मार्ग से हट रहे हो, तो तुम अपना प्रार्थना करने का तरीका बदल सकते हो। जब तक तुम सच्चे हृदय से खोज करते हो और प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हो, पवित्र आत्मा तुम्हें निश्चित रूप से इस वास्तविकता में ले जाएगा। कभी-कभी तुम सच्चे हृदय से प्रार्थना करते हो, लेकिन ऐसा महसूस नहीं करते कि तुम विशेष रूप से प्रेरित किए गए हो। ऐसे समय में तुम्हें आस्था पर भरोसा रखना चाहिए, इस बात पर विश्वास करना चाहिए कि परमेश्वर तुम्हारी प्रार्थनाओं को देख रहा है; तुम्हें अपनी प्रार्थनाओं में दृढ़ रहना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

मैंने एक ऐसी समस्या पाई है जो सभी लोगों के साथ होती है: जब उनके साथ कुछ होता है तो वे प्रार्थना करने परमेश्वर के सामने आते हैं लेकिन उनके लिए प्रार्थना एक बात है और वो मसला अलग बात। वे मानते हैं कि उनके साथ क्या चल रहा है, यह उन्हें प्रार्थना में नहीं बोलना चाहिए। तुम लोग कभी-कभार ही दिल खोलकर प्रार्थना करते हो और कुछ लोग तो यह भी नहीं जानते हैं कि प्रार्थना कैसे करें। वस्तुतः, प्रार्थना उस बारे में बोलना है जो तुम्हारे हृदय में है, मानो कि तुम सामान्य तौर पर बोल रहे हों। लेकिन, ऐसे लोग भी हैं जो प्रार्थना शुरू करते ही अपनी जगह भूल जाते हैं; वे इस पर ज़ोर देने लगते हैं कि परमेश्वर उन्हें कुछ प्रदान करे, बिना इसकी परवाह किए कि यह उसकी इच्छा के अनुरूप है या नहीं और नतीजतन, उनकी प्रार्थना, प्रार्थना के दौरान ही कमज़ोर पड़ जाती है। जब तुम प्रार्थना करते हो, तो अपने दिल में तुम जो कुछ भी माँग रहे हों, जिसकी भी तुम्हें ख्वाइश हो; या भले ही ऐसा कोई मुद्दा हो जिसे तुम संबोधित करना चाहते हों, लेकिन जिसे लेकर तुम्हारे पास अंतर्दृष्टि नहीं है और तुम परमेश्वर से बुद्धि और सामर्थ्य माँग रहे हों या यह कि वह तुम्हें प्रबुद्ध करे—तुम्हारा अनुरोध कुछ भी हो, उसके विन्यास को लेकर तुम्हें समझदार होना चाहिए। यदि तुम समझदार नहीं हो, और घुटनों के बल बैठकर कहते हो, "परमेश्वर, मुझे सामर्थ्य दे; मैं अपनी प्रकृति देख सकूँ; मैं तुझसे काम के लिए निवेदन करता हूँ; मैं तुझसे इस या उस चीज़ के लिए निवेदन करता हूँ; मैं तुझसे निवेदन करता हूँ कि तू मुझे फलां-फलां बना दे..." तुम्हारे उस "निवेदन करता हूँ" में ज़बरदस्ती वाला तत्त्व है; यह परमेश्वर पर दबाव डालने का प्रयास है, उसे वह करने को मजबूर करना है जो तुम चाहते हो—जिसकी शर्तें तुमने आश्चर्यजनक रूप से पहले ही एकतरफ़ा तय कर ली हैं। जैसा कि पवित्र आत्मा इसे देखता है, तो ऐसी प्रार्थना का क्या प्रभाव हो सकता है जबकि तुमने शर्तें पहले ही निर्धारित कर दी हैं और यह तय कर लिया है कि तुम्हें क्या करना है? प्रार्थना एक खोजपूर्ण, आज्ञाकारी दिल से की जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, जब तुम पर कोई विपत्ति आ गयी हो, और तुम समझ न पा रहे हो कि उसे कैसे संभालो, तो तुम कह सकते हो, "हे परमेश्वर! मैं नहीं जानता कि इस बारे में क्या करूँ। इस मामले में मैं तुझे सन्तुष्ट करना चाहता हूँ और तेरी इच्छा जानना चाहता हूँ। यह तेरी इच्छानुसार ही हो। मैं तेरी इच्छानुसार कार्य करना चाहता हूँ, अपनी इच्छानुसार नहीं। तू जानता है कि मनुष्य की इच्छा तेरी इच्छा के विपरीत होती है; वह तेरा विरोध करती है और सत्य के अनुरूप नहीं होती। मैं चाहता हूँ कि तू मुझे प्रबुद्ध करे, इस मामले में मेरा मार्गदर्शन करे और मैं तुझे नाराज़ न कर दूँ..." यह लहज़ा प्रार्थना के लिए उपयुक्त है। यदि तुम मात्र यह कहते हो: "हे परमेश्वर, मैं तुझसे मदद और मार्गदर्शन माँगता हूँ, मुझे सही माहौल और सही लोगों का साथ दे और मुझे अपना कार्य अच्छी तरह से करने के योग्य बना...," तो तुम्हारी प्रार्थना खत्म हो जाने पर भी तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझ पाये होंगे क्योंकि तुम परमेश्वर से अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने को कह रहे होंगे।

अब तुम लोगों को यह ज़रूर तय करना चाहिए कि क्या प्रार्थना में तुम्हारे द्वारा प्रयोग किए जा रहे शब्द विवेकसम्मत हैं। अगर तुम्हारी प्रार्थनाएँ विवेकसम्मत नहीं हैं, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि ऐसा तुम्हारी मूर्खता के कारण है या प्रार्थना के वाक्य विन्यास के कारण, पवित्र आत्मा तुम पर कार्य नहीं करेगा। इसलिए, जब तुम प्रार्थना करते हो, तो तुम्हें उपयुक्त लहज़े में विवेकसम्मत तरीके से बोलना चाहिए। तुम यह कहो : "हे परमेश्वर! तू मेरी कमज़ोरी और मेरे विद्रोहीपन को जानता है। मैं बस इतना ही माँगता हूँ कि तू मुझे सामर्थ्य प्रदान करे और अपनी परिस्थितियों को सहन कर पाने में मेरी मदद करे, लेकिन केवल अपनी इच्छा के अनुसार। मैं बस इतना ही माँगता हूँ। मैं नहीं जानता कि तेरी इच्छा क्या है, परन्तु मैं तेरी इच्छा जस-की-तस पूर्ण होने की अभिलाषा करता हूँ। चाहे मुझसे सेवा करवाई जाए या विषमता के रूप में मेरा प्रयोग किया जाए, मैं ऐसा स्वेच्छा से करूँगा। मैं तुझसे सामर्थ्य और बुद्धि माँगता हूँ ताकि इस मामले में तुझे संतुष्ट कर सकूँ। मैं बस तेरी व्यवस्था के प्रति समर्पण करने का इच्छूक हूँ..." इस तरह से प्रार्थना करने के पश्चात् तुम्हारे दिल को सुकून मिलेगा। यदि तुम लगातार सिर्फ़ माँगने में ही लगे रहते हो, तो भले ही तुम कितना भी बोलो, ये सब सिर्फ़ खोखले शब्द ही रह जाएँगे; परमेश्वर तुम्हारी दलील पर कार्य नहीं करेगा क्योंकि तुम पहले ही तय कर चुके होंगे कि तुम्हें क्या चाहिए। जब तुम प्रार्थना करने के लिए घुटनों के बल बैठते हो, तो यह कहो: "हे परमेश्वर! तू मनुष्य की कमज़ोरियों और उसकी स्थितियों को जानता है। मैं यह माँगता हूँ कि इस मसले पर तू मुझे प्रबुद्ध करे। मुझे तेरी इच्छा जानने दे। मैं मात्र तेरी समस्त व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने की अभिलाषा करता हूँ; मेरा हृदय तेरी आज्ञा मानने का इच्छुक है..." इस प्रकार प्रार्थना करो और पवित्र आत्मा तुम्हें द्रवित कर देगा। यदि तुम्हारा प्रार्थना करने का तरीका सही नहीं है, तो तुम्हारी प्रार्थना घिसी-पिटी होगी और पवित्र आत्मा तुम्हें द्रवित नहीं करेगा। अपने ही बारे में बोलते हुए बकबक मत करते रहो—ऐसा करना और कुछ नहीं बल्कि असावधानी और लापरवाही है। यदि तुम असावधान और लापरवाह रहते हो तो क्या पवित्र आत्मा कार्य करेगा? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर के सामने आता है तो उसे पवित्र दृष्टिकोण के साथ सही और उचित होना चाहिए, व्यवस्था युग के याजकों की तरह जो सभी बलि देते हुए घुटनों के बल बैठते थे। प्रार्थना करना कोई साधारण बात नहीं है। किसी व्यक्ति के लिए यह कैसे व्यावहार्य हो सकता है कि वह परमेश्वर के सामने अपने तीखे दाँत दिखाते और अपने पंजों का प्रदर्शन करते हुए आए, या अपनी रज़ाई में दुबककर लेटे-लेटे ही प्रार्थना करे और यह माने कि परमेश्वर उसे सुन सकता है? यह धर्मनिष्ठा नहीं है! इस बातचीत में मेरा उद्देश्य यह माँग करना नहीं है कि लोग किसी विशेष नियम का अनुसरण करें; कम से कम, उनके हृदय तो परमेश्वर उन्मुख होने चाहिए और उसके सामने पवित्र दृष्टिकोण के साथ आना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'प्रार्थना का महत्व और अभ्यास' से उद्धृत

तुम लोगों की प्रार्थनाओं में प्रायः तर्क का अभाव होता है; तुम लोग हमेशा निम्नलिखित स्वर के साथ प्रार्थना करते हो: "हे परमेश्वर! चूँकि तूने मुझे इस कर्तव्य को करने दिया है, अतः जो कुछ भी मैं करता हूँ, उसे तुझे उपयुक्त बनाना होगा ताकि तेरा कार्य बाधित न हो और परमेश्वर के परिवार के हित को हानि न उठानी पड़े। तुझे मुझे बचाना होगा...।" इस प्रकार की प्रार्थना अत्यधिक अतर्कसंगत है, क्या ऐसा नहीं है? यदि तुम परमेश्वर के सामने आ कर इस तरह से प्रार्थना करोगे तो क्या वह तुम पर कार्य करेगा? यदि तुम मेरे सामने आकर इस तरह से बात करोगे तो क्या मैं सुनूँगा? मैं तुम्हें दरवाजे से बाहर निकाल दूँगा! क्या तुम आत्मा के सामने भी वैसे ही नहीं हो जैसे मसीह के सामने हो? जब कोई प्रार्थना करने के लिए परमेश्वर के सामने आता है, तो उसे इस बात पर विचार करना चाहिए कि वह इसे समझदारी से कैसे कर सकता है, और धर्मनिष्ठा पाने के लिए वह कैसे अपनी आंतरिक स्थिति को समायोजित करके समर्पण करने में समर्थ हो सकता है। ऐसा करने के बाद, प्रार्थना करना ठीक है; तुम्हें परमेश्वर की उपस्थिति का एहसास होगा। कई बार लोग प्रार्थना में घुटनों के बल गिर जाते हैं; वे अपनी आँखें बंद कर लेते हैं, और उनके मुँह से सिवाय "हे परमेश्वर! हे परमेश्वर!" के और कोई शब्द नहीं निकलते। तुम इतने लंबे समय तक बिना शब्दों के इतना चिल्लाते क्यों हो? तुम्हारी स्थिति सही नहीं है। क्या तुम कभी ऐसा करते हो? अब तुम जान गए हो कि तुम क्या कर सकते हो और किस हद तक कर सकते हो, तुमने स्वयं अपना आकलन किया है, लेकिन कई बार ऐसा होगा जब तुम असामान्य स्थिति में होगे। कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि तुम्हारी स्थिति समायोजित हो जाए और तुम्हें पता भी न चले कि ऐसा कैसे हो गया, और ज्यादातर तो प्रार्थना में तुम्हारे मुँह से शब्द ही नहीं निकलते। इसका दोष तुम शिक्षा के मत्थे मढ़ सकते हो। लेकिन क्या किसी को प्रार्थना करने के लिए अच्छी तरह से शिक्षित होना चाहिए? प्रार्थना कोई निबंध नहीं है—बस एक सामान्य विवेकपूर्ण व्यक्ति की तरह ईमानदारी से बोलो। यीशु की प्रार्थना को देखो (यद्यपि उसकी प्रार्थनाओं का यहाँ उल्लेख नहीं है ताकि लोग उसकी जगह और स्थिति को धारण कर सकें): उसने गतसमनी की वाटिका में प्रार्थना की: "यदि हो सके तो...।" अर्थात्, "यदि ऐसा किया जा सके तो।" इसे चर्चा में कहा गया था; उसने नहीं कहा कि "मैं तुझसे निवेदन करता हूँ।" एक समर्पित हृदय के साथ और एक विनीत अवस्था में, उसने प्रार्थना की: "यदि हो सके तो यह कटोरा मुझ से टल जाए, तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो" (मत्ती 26:39)। उसने दूसरी बार भी इसी प्रकार प्रार्थना की और तीसरी बार उसने प्रार्थना की: "तेरी इच्छा पूरी हो।" परमपिता परमेश्वर की इच्छा को समझ लेने के बाद, उसने कहा: "तेरी इच्छा पूरी हो।" वह रत्ती भर भी व्यक्तिगत चुनाव किए बिना पूरी तरह से समर्पण करने में समर्थ था। उसने पूछा क्या परमेश्वर के लिए उस कटोरे को उससे लेना संभव है। इसका क्या अर्थ हुआ? उसने इस तरह से प्रार्थना की थी क्योंकि उसने मरते दम तक क्रूस पर खून बहाने की उस अत्यधिक पीड़ा पर विचार किया था—और इसमें मृत्यु के मामले का मोटे तौर पर ज़िक्र था—और क्योंकि उसने अभी तक परमपिता परमेश्वर के इरादों को पूरी तरह से नहीं समझा था। यह देखते हुए कि पीड़ा के विचार के बावजूद भी वह इस तरह से प्रार्थना करने में समर्थ था, वह वास्तव में अत्यधिक विनम्र था। प्रार्थना करने का उसका तरीका सामान्य था; उसने अपनी प्रार्थना में कोई शर्त प्रस्तावित नहीं की, न ही उसने कहा था कि कप हटाया जाना है। बल्कि उसका उद्देश्य ऐसी परिस्थिति में परमेश्वर के इरादों को जानना था जिसे वह नहीं समझा था। पहली बार जब उसने प्रार्थना की तो उसे समझ नहीं आया, और उसने कहा: "यदि हो सके तो...परन्तु जैसा तू चाहता है।" उसने विनम्रता की अवस्था में परमेश्वर से प्रार्थना की। दूसरी बार, उसने उसी तरह से प्रार्थना की। कुल मिलाकर, उसने तीन बार प्रार्थना की (निस्सन्देह ये तीन प्रार्थनाएँ मात्र तीन दिनों में नहीं की गई), और अपनी अन्तिम प्रार्थना में, वह परमेश्वर की मंशाओं को पूरी तरह से समझ गया जिसके पश्चात्, उसने कुछ नहीं माँगा। पहली दो प्रार्थनाओं में, वह केवल खोज रहा था, और उसने विनम्रता की अवस्था में खोज की। हालाँकि, लोग बस इस प्रकार से प्रार्थना नहीं करते हैं। अपनी प्रार्थनाओं में, लोग कहते हैं, "हे परमेश्वर मैं तुझे यह या वह करने के लिए निवेदन करता हूँ, और मैं तुझसे इस या उस में मेरा मार्गदर्शन करने के लिए निवेदन करता हूँ, और मेरे लिए परिस्थितियाँ तैयार करने मैं तुझसे निवेदन करता हूँ...।" हो सकता है कि वो तुम्हारे लिए परिस्थितियों को तैयार ना करे और तुम्हें मुश्किलें झेलने दे। अगर लोग हमेशा यह कहते, "हे परमेश्वर, मैं निवेदन करता हूँ कि तू मेरे लिए तैयारी कर और मुझे शक्ति दे।" इस तरह से प्रार्थना करना बहुत अतार्किक है! प्रार्थना करते समय तुम्हें तर्कसंगत अवश्य होना चाहिए, और तुम्हें ऐसा अवश्य इस आधार पर करना चाहिए कि तुम समर्पण कर रहे हो। अपनी प्रार्थनाओं को सीमांकित मत करो। यहाँ तक कि तुम्हारे प्रार्थना करने से पहले भी, तुम इस प्रकार से सीमांकित कर रहे हो: मुझे परमेश्वर से अवश्य माँगना चाहिए और उससे अमुक-अमुक करवाना चाहिए। प्रार्थना करने का यह तरीका बहुत अतर्कसंगत है। प्रायः, परमेश्वर लोगों की प्रार्थनाओं को बिल्कुल नहीं सुनता इसलिए लोग जब प्रार्थना करते हैं, तो उन्हें कुछ भी महसूस नहीं होता।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'प्रार्थना का महत्व और अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर की उपस्थिति में प्रार्थना करना और खोजना परमेश्वर को यह या वह करने के लिए मजबूर करने का मामला नहीं है। उचित प्रार्थना क्या होती है? अनुचित प्रार्थना क्या होती है? इन बातों को तुम कुछ समय बाद अनुभव से जानोगे। उदाहरण के लिए, तुम्हारे प्रार्थना करने के बाद, तुम महसूस कर सकते हो कि पवित्र आत्मा वह नहीं करता जिसके लिए तुमने प्रार्थना की थी और न ही तुम्हारा मार्गदर्शन करता है जैसी कि तुमने प्रार्थना की थी। अगली बार जब तुम प्रार्थना करोगे, तो तुम अलग तरह से प्रार्थना करोगे। तुम परमेश्वर को विवश करने का प्रयास नहीं करोगे जैसा पिछली बार करने का प्रयास किया था या अपनी इच्छा के अनुसार उससे अनुरोध नहीं करोगे। तुम कहोगे : "हे परमेश्वर! सब कुछ तुम्हारी इच्छा के अनुसार होता है।" यदि इस दृष्टिकोण पर ध्यान दोगे, तो कुछ समय तक अनिश्चितता में खोजने के बाद, तुम्हें पता चल जाएगा कि अनुचित होने का क्या मतलब है। एक ऐसी अवस्था भी होती है जिसमें तुम अपनी आत्मा में महसूस करते हो कि जब तुम अपनी इच्छा के अनुसार प्रार्थना करते हो, तो तुम्हारी प्रार्थनाएँ नीरस हो जाती हैं, और जल्द ही तुम्हारे पास कहने को कुछ नहीं होता। तुम जितना अधिक बोलते हो, तुम्हारी बातें उतनी ही अधिक अजीब हो जाती हैं। इससे साबित होता है कि जब तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो, तो तुम पूरी तरह से देह का अनुसरण करते हो, और उस तरह से पवित्र आत्मा कार्य नहीं करेगा या तुम्हारा मार्गदर्शन नहीं करेगा। यह भी खोज और अनुभव की बात है। हालाँकि मैंने अभी तुमसे इसके बारे में बात करना समाप्त कर दिया है, लेकिन हो सकता है कि तुम अपने अनुभव में कुछ विशेष परिस्थितियों का सामना करो। प्रार्थना मुख्य रूप से ईमानदारी से बोलना है। "हे परमेश्वर! तुम मनुष्य के भ्रष्टाचार को जानते हो। आज मैंने एक और अनुचित काम किया है। मेरे मन में एक मंशा थी—मैं एक धोखेबाज व्यक्ति हूँ। मैं तुम्हारी इच्छा या सत्य के अनुसार काम नहीं कर रहा था। मैंने अपनी मर्जी से काम किया और खुद को सही ठहराने की कोशिश की। अब मैं अपने भ्रष्टाचार को पहचान गया हूँ। मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे और अधिक प्रबुद्ध करो और मुझे सत्य समझाओ, ताकि मैं इसे व्यवहार में लाऊँ और इन भ्रष्टाचारों का त्याग करूँ।" इस तरह बोलो; तथ्यात्मक मामलों का तथ्यात्मक लेखा-जोखा दो। अधिकांश लोग वास्तव में ज़्यादातर समय प्रार्थना नहीं करते हैं; अपने मन में अपर्याप्त ज्ञान और पश्चाताप की इच्छा लेकर वे केवल अतीत के बारे में सोचते हैं, फिर भी उन्होंने न तो सत्य पर चिंतन-मनन किया होता है और न ही उसकी थाह ली होती है। प्रार्थना करते समय परमेश्वर के वचनों पर चिंतन-मनन करना और सत्य की तलाश करना, केवल अनुस्मरण और ज्ञान से कहीं अधिक गहरा होता है। पवित्र आत्मा के कार्य से तुम्हारे भीतर हुआ मंथन और परमेश्वर के वचनों के माध्यम से पवित्र आत्मा के कार्य से तुम्हें मिली प्रबुद्धता और प्रकाश, तुम्हें सच्चे ज्ञान और सच्चे पश्चाताप की ओर ले जाते हैं; वे मानवीय विचारों और ज्ञान की तुलना में बहुत अधिक गहन होते हैं। यह एक ऐसी चीज़ है जिसे तुम्हें अच्छी तरह से जानना चाहिए। यदि तुम केवल सतही, बेतरतीब सोच और जाँच में संलग्न रहते हो, यदि तुम्हारे पास अभ्यास करने का कोई उपयुक्त मार्ग नहीं है, और तुम सच्चाई की ओर बहुत कम प्रगति करते हो, तो तुम परिवर्तन के लिए अक्षम रहोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'प्रार्थना का महत्व और अभ्यास' से उद्धृत

लोग परमेश्वर के साथ संबंध कैसे बनाए रख सकते हैं? और ऐसा करने के लिए उन्हें किस पर भरोसा करना चाहिए? उन्हें परमेश्वर से याचना करने, परमेश्वर से प्रार्थना करने और अपने हृदय में परमेश्वर के साथ संवाद करने पर भरोसा करना चाहिए। इस तरह के संबंध के साथ लोग हमेशा परमेश्वर के सामने रहते हैं और ऐसे लोग बहुत शांत होते हैं। कुछ लोग स्वयं को बाहरी कार्यों में व्यस्त रखते हुए अपना पूरा समय बाहरी कार्यों में ही बिता देते हैं। आत्मिक जीवन के बिना एक या दो दिनों के बाद वे कुछ महसूस नहीं करते; तीन या पाँच दिनों या एक या दो महीनों के बाद भी वे कुछ महसूस नहीं करते; उन्होंने प्रार्थना नहीं की, याचना नहीं की या आध्यात्मिक समागम नहीं किया। याचना वह होती है, जब अपने साथ कुछ घटित होने पर तुम परमेश्वर से अपनी सहायता करने, अपना मार्गदर्शन करने, अपने लिए पोषण प्रदान करने, अपने को प्रबुद्ध करने, उसकी इच्छा समझने देने और यह जानने के लिए कहते हो कि सत्य के अनुरूप क्या करना चाहिए। प्रार्थना का दायरा व्यापक है : कभी-कभी तुम परमेश्वर से अपनी कठिनाइयों या नकारात्मकता और कमजोरी के बारे में बात करते हुए वचनों को अपने हृदय में बोलते हो; जब तुम विद्रोही होते हो, तब भी तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो या फिर तुम उससे अपने साथ हर दिन होने वाली चीज़ों के बारे में बात करते हो, चाहे वे तुम्हें स्पष्ट हों या नहीं। यही प्रार्थना है। प्रार्थना का दायरा मूल रूप से परमेश्वर से बात करना और उसके सामने खुलना है। कभी-कभी यह नियमित समय पर किया जाता है, कभी-कभी नहीं; तुम जब चाहे और जहाँ चाहे प्रार्थना कर सकते हो। आध्यात्मिक समागम अधिक औपचारिक नहीं होता। कभी-कभी वह इसलिए होता है क्योंकि तुम्हें कोई समस्या होती है, कभी-कभी इसलिए कि तुम्हें कोई समस्या नहीं होती। कभी-कभी इसमें वचन शामिल होते हैं, कभी-कभी नहीं। जब तुम्हें कोई समस्या होती है, तो तुम उसके बारे में परमेश्वर से बात करते हो और प्रार्थना करते हो; जब तुम्हें कोई समस्या नहीं होती, तो तुम सोचते हो कि परमेश्वर लोगों से कैसे प्यार करता है, वह लोगों के बारे में कैसे चिंतित रहता है, वह लोगों को कैसे डाँटता है। तुम किसी भी समय या स्थान पर परमेश्वर के साथ समागम कर सकते हो। यही आध्यात्मिक समागम है। कभी-कभी, जब तुम रोज़मर्रा के कामों में संलग्न होते हो और ऐसी किसी चीज़ के बारे में सोचते हो जो तुम्हें परेशान करती है, तो तुम्हें अपने घुटनों के बल बैठने या आँखें बंद करने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें बस अपने हृदय में परमेश्वर से कहना है : "हे परमेश्वर, कृपया इसमें मेरा मार्गदर्शन करो। मैं कमजोर हूँ, मैं इस पर काबू नहीं पा सकता।" तुम्हारा हृदय द्रवित है; तुम कुछ सरल शब्द ही बोलते हो और परमेश्वर जान लेता है। कभी-कभी तुम्हें घर की याद सताती है और तुम कहते हो, "हे परमेश्वर! मुझे वास्तव में घर की याद आती है..." तुम यह नहीं कहते कि तुम विशेष रूप से किसे याद करते हो। तुम बस महसूस करते हो और परमेश्वर से इस बारे में बात करते हो। समस्याएँ तभी हल हो सकती हैं, जब तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और अपने हृदय की बात कहते हो। क्या अन्य लोगों से बात करने से समस्याएँ हल हो सकती हैं? यदि तुम्हारा सामना किसी ऐसे व्यक्ति से होता है जो सत्य को समझता है, तब तो ठीक है, लेकिन यदि वह सच्चाई को नहीं समझता—यदि तुम्हारा सामना किसी नकारात्मक और कमजोर व्यक्ति से होता है—तो तुम उस पर प्रभाव डाल सकते हो। यदि तुम परमेश्वर से बात करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें दिलासा देगा और तुम्हें प्रेरित करेगा। यदि तुम परमेश्वर के सामने उसके वचनों को चुपचाप पढ़ने में सक्षम हो, तो तुम सत्य को समझने और समस्या को हल करने में सक्षम होगे। परमेश्वर के वचन तुम्हें इस छोटी-सी बाधा से पार पाने के लिए मार्ग खोजने देंगे। बाधा से तुम लड़खड़ाओगे नहीं, वह तुम्हें रोक नहीं पाएगी और न ही वह तुम्हारे कर्तव्य के निष्पादन को प्रभावित करेगी। कई बार ऐसा होता है, जब तुम अचानक अपने भीतर थोड़ा उदास या असहज महसूस करते हो। ऐसे समय में, परमेश्वर से प्रार्थना करने में संकोच न करो। हो सकता है, तुम परमेश्वर से कोई याचना न करो, ऐसा कुछ भी न हो जिसे तुम परमेश्वर से करवाना चाहो या उसके द्वारा प्रबुद्ध किया जाना चाहो—तुम बस किसी भी समय, जहाँ भी तुम हो, परमेश्वर से बात करते हो और उसके प्रति खुल जाते हो। तुम्हें हर समय क्या महसूस करना चाहिए? यह कि "परमेश्वर हमेशा मेरे साथ है, उसने मुझे कभी नहीं छोड़ा है, मैं इसे महसूस कर सकता हूँ। मैं चाहे कहीं भी हूँ या कुछ भी कर रहा हूँ—हो सकता है, आराम कर रहा हूँ या हो सकता है या किसी सभा में हूँ या अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा हूँ—अपने हृदय में मैं जानता हूँ कि परमेश्वर मेरा हाथ पकड़कर मेरी अगुआई कर रहा है, कि उसने मुझे कभी नहीं छोड़ा है।" कभी-कभी यह याद करते हुए कि तुमने पिछले कुछ वर्षों में प्रत्येक दिन कैसे गुज़ारा है, तुम्हें लगता है कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बड़ा हो गया है, कि परमेश्वर द्वारा तुम्हारा मार्गदर्शन किया गया है, कि परमेश्वर के प्रेम ने हमेशा तुम्हारी रक्षा की है। इन बातों को सोचकर, तुम परमेश्वर को धन्यवाद देते हुए अपने हृदय में प्रार्थना करते हो : "हे परमेश्वर, मैं तुम्हें धन्यवाद देता हूँ! मैं बहुत कमजोर और निर्बल हूँ, बहुत ज्यादा भ्रष्ट हूँ। तुम मेरा इस तरह मार्गदर्शन न करते, तो मैं आज खुद पर भरोसा करने लायक न हो पाता।" क्या यह आध्यात्मिक समागम नहीं है? यदि लोग अकसर इस तरह से समागम कर सकते हों, तो क्या उनके पास परमेश्वर से कहने के लिए बहुत-कुछ नहीं होगा? वे बहुत दिनों तक परमेश्वर से कुछ कहे बिना नहीं रह पाएँगे। जब तुम्हारे पास परमेश्वर से कहने के लिए कुछ नहीं होता, तो परमेश्वर तुम्हारे हृदय से अनुपस्थित हो जाता है। यदि परमेश्वर तुम्हारे हृदय में है और तुम्हें परमेश्वर पर भरोसा है, तो तुम अपने हृदय की हर बात उससे कह सकोगे, जिनमें वे बातें भी शामिल हैं, जो तुम अपने विश्वासपात्रों से ही कहते हो। वास्तव में, परमेश्वर तुम्हारा सबसे करीबी विश्वासपात्र है। यदि तुम परमेश्वर को अपना सबसे करीबी विश्वासपात्र मानते हो, अपना परिवार, जिस पर तुम सबसे ज्यादा निर्भर करते हो, सबसे ज्यादा भरोसा करते हो, सबसे ज्यादा विश्वास करते हो, सबसे ज्यादा यकीन करते हो, जिसके तुम सबसे करीब हो, तो यह असंभव होगा कि परमेश्वर से कहने के लिए तुम्हारे पास कुछ न हो। यदि तुम्हारे पास हमेशा परमेश्वर से कहने के लिए कुछ है, तो क्या तुम हमेशा परमेश्वर के सामने नहीं रहोगे? यदि तुम हमेशा परमेश्वर के सामने रह सकते हो, तो तुम हर पल यह महसूस करोगे कि परमेश्वर किस तरह तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, किस तरह वह तुम्हारी देखभाल और सुरक्षा करता है, किस तरह वह तुम्हारे लिए शांति और आनंद लाता है, किस तरह वह तुम्हें आशीष प्रदान करता है, किस तरह वह तुम्हें प्रबुद्ध करता है और किस तरह वह तुम्हें डाँटता, अनुशासित करता और ताड़ना देता है और किस तरह वह तुम्हारा न्याय करता है और तुम्हें ताड़ना देता है; यह सब तुम्हारे हृदय में स्पष्ट और प्रत्यक्ष होगा। तुम प्रतिदिन कुछ भी न जानते हुए, केवल यह कहते हुए कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, केवल अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए और केवल उपस्थित मात्र होने के लिए सभाओं में भाग लेते हुए, केवल दैनिक आधार पर परमेश्वर के वचनों को पढ़ते और प्रार्थना करते हुए और बस बेमन से सब-कुछ करते हुए भ्रमित नहीं रहोगे—तुम्हारा केवल इस तरह का बाहरी धार्मिक आयोजन नहीं होगा। इसके बजाय, तुम हर क्षण अपने हृदय में परमेश्वर का ध्यान करोगे और उससे प्रार्थना करोगे, तुम हर समय परमेश्वर के साथ संवाद करोगे और तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर के सामने रह पाने में सक्षम होगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अगर तुम हमेशा परमेश्‍वर के समक्ष नहीं रह सकते तो तुम अविश्‍वासी हो' से उद्धृत

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