3. धार्मिक समारोह की प्रार्थना क्या है और क्यों इससे कुछ नहीं होता

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन प्रार्थना करने, भजन गाने, कलीसियाई जीवन में भाग लेने और परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने जैसे अभ्यासों तक सीमित नहीं है। बल्कि, इसमें एक नया और जीवंत आध्यात्मिक जीवन जीना शामिल है। जो बात मायने रखती है वो यह नहीं है कि तुम अभ्यास कैसे करते हो, बल्कि यह है कि तुम्हारे अभ्यास का परिणाम क्या होता है। अधिकांश लोगों का मानना है कि एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में आवश्यक रूप से प्रार्थना करना, भजन गाना, परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना या उसके वचनों पर मनन-चिंतन करना शामिल है, भले ही ऐसे अभ्यासों का वास्तव में कोई प्रभाव हो या न हो, चाहे वे सच्ची समझ तक ले जाएँ या न ले जाएँ। ये लोग सतही प्रक्रियाओं के परिणामों के बारे में सोचे बिना उन पर ध्यान केंद्रित करते हैं; वे ऐसे लोग हैं जो धार्मिक अनुष्ठानों में जीते हैं, वे ऐसे लोग नहीं हैं जो कलीसिया के भीतर रहते हैं, वे राज्य के लोग तो बिलकुल नहीं हैं। उनकी प्रार्थनाएँ, भजन-गायन और परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना, सभी सिर्फ नियम-पालन हैं, जो प्रचलन में है उसके साथ बने रहने के लिए मजबूरी में किए जाने वाले काम हैं। ये अपनी इच्छा से या हृदय से नहीं किए जाते हैं। ये लोग कितनी भी प्रार्थना करें या गाएँ, उनके प्रयास निष्फल होंगे, क्योंकि वे जिनका अभ्यास करते हैं, वे केवल धर्म के नियम और अनुष्ठान हैं; वे वास्तव में परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं कर रहे हैं। वे अभ्यास किस तरह करते हैं, इस बात का बतंगड़ बनाने में ही उनका ध्यान लगा होता है और वे परमेश्वर के वचनों के साथ उन नियमों जैसा व्यवहार करते हैं जिनका पालन किया ही जाना चाहिए। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं ला रहे हैं; वे सिर्फ देह को तृप्त कर रहे हैं और दूसरे लोगों को दिखाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। धर्म के ये नियम और अनुष्ठान सभी मूल रूप से मानवीय हैं; वे परमेश्वर से नहीं आते हैं। परमेश्वर नियमों का पालन नहीं करता है, न ही वह किसी व्यवस्था के अधीन है। बल्कि, वह हर दिन नई चीज़ें करता है, व्यवहारिक काम पूरा करता है। थ्री-सेल्फ कलीसिया के लोग, हर दिन सुबह की प्रार्थना सभा में शामिल होने, शाम की प्रार्थना और भोजन से पहले आभार की प्रार्थना अर्पित करने, सभी चीज़ों में धन्यवाद देने जैसे अभ्यासों तक सीमित रहते हैं—वे इस तरह जितना भी कार्य करें और चाहे जितने लंबे समय तक ऐसा करें, उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। जब लोग नियमों के बीच रहते हैं और अपने हृदय अभ्यास के तरीकों में ही उलझाए रखते हैं, तो पवित्र आत्मा काम नहीं कर सकता, क्योंकि उनके हृदयों पर नियमों और मानवीय धारणाओं का कब्जा है। इस प्रकार, परमेश्वर हस्तक्षेप करने और उन पर काम करने में असमर्थ है, और वे केवल व्यवस्थाओं के नियंत्रण में जीते रह सकते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करने में सदा के लिए असमर्थ होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के विषय में' से उद्धृत

तुम लोग हमेशा अपनी आत्मिक दशा और आत्मिक विषयों के बारे में बात किया करते थे जबकि वास्तविक जीवन में अनेक बातों के अभ्यास की उपेक्षा करते थे और उनमें अपने प्रवेश की उपेक्षा करते थे। तुम हर दिन लिखते थे, हर दिन सुनते थे और हर दिन पढ़ते थे। तुम खाना बनाते-बनाते भी प्रार्थना करते थे : "हे परमेश्वर! तू मेरे भीतर मेरा जीवन बन जा। मेरा आज का दिन जैसा भी गुज़रे, तू कृपया मुझे आशीष दे, प्रबुद्ध कर। जो भी तू आज मुझ पर प्रकशित करता है, मुझे इस क्षण उसे समझने दे, ताकि तेरे वचन मेरे जीवन के रूप में कार्य करें।" तुमने भोजन करते समय भी प्रार्थना की : "हे परमेश्वर! तूने यह भोजन हमें दिया है। तू हमें आशीष दे। आमीन! हम तेरे अनुसार जिएं। तू हमारे साथ रह। आमीन!" भोजन समाप्त करने के बाद जब तुम बर्तन धो रहे थे, तो तुम बोलने लगे, "हे परमेश्वर, मैं यह कटोरा हूँ। हमें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, हम इन्हीं कटोरों के समान हैं जिनका उपयोग किया गया है और अब इन्हें जल से धोना आवश्यक है। तू जल है, तेरे वचन जीवन का जल हैं जो मेरे जीवन की जरूरतों को पूरा करते हैं।" तुम्हें पता भी नहीं चलता औए सोने का समय हो जाता है, और तुम फिर से बोलना आरंभ कर देते हो : "हे परमेश्वर! तूने मुझे दिनभर आशीष दिया है और मेरा मार्गदर्शन किया है। मैं सचमुच तेरा आभारी हूँ। ..." इस रीति से तुम अपना दिन व्यतीत करते और फिर सोने जाते हो। अधिकांश लोग हर दिन ऐसे ही जीते हैं, और अब भी वे वास्तविक प्रवेश पर ध्यान नहीं देते। उनकी प्रार्थना केवल शाब्दिक होती है। यह उनका पिछला जीवन है—पुराना जीवन है और अधिकांश लोग ऐसे ही हैं; उनमें वास्तविक प्रशिक्षण की कमी है, और उनमें बहुत ही कम वास्तविक परिवर्तन होते हैं। वे अपनी प्रार्थनाओं में केवल शब्द बोलते हैं, केवल अपने शब्दों के द्वारा परमेश्वर के समक्ष जाते हैं परंतु उनकी समझ में गहराई की कमी होती है। एक साधारण-सा उदाहरण लेते हैं—अपने घर को साफ़ करना। तुम देखते हो कि तुम्हारा घर बहुत गंदा है, तो तुम वहां बैठकर प्रार्थना करते हो : "हे परमेश्वर! इस भ्रष्टता की ओर देख जो शैतान ने मुझमें गढ़ दी है। मैं इस घर जितना ही गंदा हूँ। हे परमेश्वर! मैं सचमुच तेरी स्तुति करता हूँ और तुझे धन्यवाद देता हूँ। तेरे उद्धार और प्रबुद्धता के बिना मैं इस वास्तविकता को समझ भी नहीं पाता।" तुम केवल बैठकर बड़बड़ाते रहते हो, लंबे समय तक प्रार्थना करते हो, और उसके बाद तुम ऐसे कार्य करते हो जैसे कि कुछ भी नहीं हुआ, और बड़बड़ाने वाली एक वृद्धा के समान व्यवहार करते हो। तुम इस तरह वास्तविकता में बिना किसी सच्चे प्रवेश के, अत्यधिक सतही अभ्यासों के साथ अपना आत्मिक जीवन जीते हो! वास्तविक प्रशिक्षण में प्रवेश करने में लोगों के वास्तविक जीवन, और उनकी व्यवहारिक कठिनाइयाँ शामिल होती हैं—वे केवल इसी तरीके से परिवर्तित हो सकते हैं। वास्तविक जीवन के बिना लोग परिवर्तित नहीं हो सकते। अपनी प्रार्थना में केवल मुँह से शब्द बोलने का क्या मतलब है? मनुष्यों की प्रकृति को समझे बिना, सबकुछ समय की बर्बादी है, और अभ्यास के मार्ग के बिना सारे प्रयास निरर्थक हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कलीसियाई जीवन और वास्तविक जीवन पर विचार-विमर्श' से उद्धृत

बहुत लोग "परमेश्वर की उपस्थिति में" अंतहीन प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना हमेशा उनके होंठ पर हो सकती है, लेकिन वे वास्तव में परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं रहते। यह एकमात्र तरीका है, जिसके द्वारा ऐसे लोग परमेश्वर की उपस्थिति में होने की अपनी स्थिति बनाए रख सकते हैं; वे हर समय परमेश्वर से जुड़े रहने के लिए अपने दिल का इस्तेमाल करने में पूरी तरह से असमर्थ होते हैं, न ही वे अनुभव के साधनों का प्रयोग करते हुए, चाहे अपने मन में सोच-विचार करके, शांत चिंतन करके या परमेश्वर के बोझ पर विचार करने के द्वारा अपने दिलों के भीतर परमेश्वर से जुड़ने के लिए अपने मन का इस्तेमाल करके परमेश्वर के समक्ष आने में समर्थ होते हैं। वे केवल अपने मुँह से स्वर्ग के परमेश्वर को प्रार्थना अर्पित करते हैं। अधिकांश लोगों के दिल में परमेश्वर नहीं है, और परमेश्वर केवल तभी उनके पास होता है, जब वे परमेश्वर के निकट जाते हैं; लेकिन ज्यादातर समय परमेश्वर उनके पास बिलकुल नहीं होता। क्या यह दिल में परमेश्वर के न होने की अभिव्यक्ति नहीं है? अगर उनके दिलों में वास्तव में परमेश्वर होता, तो क्या वे ऐसी चीजें कर सकते थे, जो लुटेरे या जानवर करते हैं? अगर कोई व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर का सम्मान करता है, तो वह अपने सच्चे दिल को परमेश्वर के संपर्क में लाएगा, और उसके विचार और ख़याल हमेशा परमेश्वर के वचनों से भरे होंगे। वे वाणी या क्रिया में ग़लतियाँ नहीं करेंगे, और कोई ऐसी चीज़ नहीं करेंगे, जो जाहिर तौर पर परमेश्वर का विरोध करे। विश्वासी होने का केवल यही एक मानक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अनुभव पर' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना का अनुभव करते हुए, परमेश्वर के वचनों के द्वारा काटे-छाँटे और निपटाए जाने और अपने स्वयं के भ्रष्ट स्वभावों को पहचानने के दौरान, अधिकांश लोग कैसे प्रार्थना करते हैं? वे सभी एक ही तरह के होते हैं, वे कहते हैं, "परमेश्वर, मैं पीड़ित हूँ। हे परमेश्वर, मैं बहुत पीड़ित हूँ।" क्या उन शब्दों से तुम्हें ऊब नहीं होती है? जब तुम परमेश्वर के सामने आते हो, तो क्या तुम्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता नहीं होती है कि वह तुम्हें थोड़ी कुछ और चीज़ के साथ प्रबुद्ध करे? क्या तुम्हें आस्था और शक्ति की आवश्यकता या इसकी आवश्यकता नहीं होती कि परमेश्वर तुम्हारा मुख्य सहारा बने, और इसकी भी कि वह तुम्हें प्रबोधन और मार्गदर्शन दे ताकि तुम अच्छी तरह से आगे की राह पर चल सको? क्या तुम्हें उसके अनुशासन और ताड़ना की आवश्यकता नहीं होती? क्या तुम्हें उसके मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं होती? क्या तुम्हें बस अपने दुखों से छुटकारा पाने के लिए ही उसकी आवश्यकता होती है? लोग वास्तव में अंदर से मुरझाए हुए, और बहुत दयनीय स्थिति में होते हैं! प्रार्थना कैसे की जाए यह न जानना एक मामूली मुद्दा लग सकता है, लेकिन वास्तव में, जब तुम इस मामूली मुद्दे को भेदते हो और इसके सार को विश्लेषित करते हो, तो तुम देखते हो कि यह बिल्कुल भी मामूली नहीं है। इससे पता चलता है कि एक व्यक्ति के रूप में तुम्हारे पास किसी भी प्रकार का उल्लेखनीय जीवन नहीं होता है, और जो भी जीवन तुम्हारे पास होता है, उसमें तुम परमेश्वर के साथ बहुत कम बातचीत करते हो। तुमने तो अपने और परमेश्वर के बीच उस तरह के संबंध को स्थापित ही नहीं किया है जो परमेश्वर और उसके अनुयायियों के बीच, या सृष्टि की वस्तुओं और उनके सृष्टिकर्ता के बीच, होना चाहिए। जब तुम्हें किसी समस्या का सामना करना पड़ता है, तो तुम अपनी खुद की व्यक्तिपरक मान्यताओं, अवधारणाओं, विचारों, ज्ञान, योग्यताओं और प्रतिभाओं तथा भ्रष्ट स्वभावों के आधार पर निर्णय लेते हो; तुम्हें परमेश्वर से कोई सरोकार नहीं होता है, इसलिए जब तुम उसके सामने आते हो, तो तुम्हारे पास उन्हें कहने के लिए कभी कुछ नहीं होता है। परमेश्वर को मानने वाले लोगों की यही दुखद स्थिति होती है! यह बहुत दयनीय स्थिति है! अंदर से, लोग सूख जाते और सुन्न हो जाते हैं; जब इन चीज़ों की बात होती है तो उन्हें कुछ भी महसूस नहीं होता है, न ही उन्हें इनकी कोई समझ होती है। जब वे परमेश्वर के सामने आते हैं, तो उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता है। चाहे तुम खुद को कैसी भी स्थिति में पाते हो, चाहे तुम कैसी भी दुर्दशा का सामना कर रहे हो, और चाहे तुम्हारे सामने कैसी भी कठिनाइयाँ हों, अगर तुम परमेश्वर के सामने मूक हो, तो क्या तुम्हारी आस्था पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है? क्या यह लोगों का दयनीय चेहरा नहीं है? इतने सालों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, तुम्हें फिर शुरू से यह सीखना है कि प्रार्थना कैसे करें, तुम अभी भी नहीं जानते कि प्रार्थना कैसे की जाए, और जब भी तुम किसी समस्या का सामना करते हो, तुम या तो घिसे-पिटे शब्दों में चीखते हो और संकल्प करते हो या परमेश्वर से शिकायत करते हो और अपने दुःख-दर्द को अभिव्यक्त करते हो, यह बताते हो कि तुम कितनी पीड़ा झेल रहे हो, या तुम स्वीकारोक्ति में खुद को तर्कसंगत और उचित ठहराते हो। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि तुम लोग सत्य में प्रवेश करने में इतने सुस्त रहे हो।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपनी व्यक्तिगत महिमा के बदले उन हितों को बेच तक देते हैं (IX)' से उद्धृत

धार्मिक अनुष्ठान की प्रार्थनाओं से ज़्यादा परमेश्वर किसी भी दूसरी चीज़ से अधिक घृणा नहीं करता है। परमेश्वर से की गयी प्रार्थनाएँ तभी स्वीकार होती हैं जब वे सच्ची होती हैं। अगर तुम्हारे पास ईमानदारी से कहने को कुछ नहीं है, तो चुप रहो; उसे धोखा देने की कोशिश करते हुए, उससे कितना प्रेम करते हो और उसके प्रति कितने निष्ठावान बने रहना चाहते हो, यह बताते हुए हमेशा झूठे शब्द न बोलो और परमेश्वर के सामने आँख मूँद कर शपथ मत लो। अगर तुम अपनी इच्छाएँ पूरी करने के काबिल नहीं हो, तुममें यह दृढ़ निश्चय और आध्यात्मिक कद नहीं है, तो किसी भी हालत में, परमेश्वर के सामने ऐसी प्रर्थना मत करो। यह उपहास होता है। उपहास का मतलब किसी का मखौल उड़ाना, उसके साथ तुच्छता से पेश आना होता है। जब लोग इस प्रकार के स्वभाव के साथ परमेश्वर के सामने प्रार्थना करते हैं, तो यह धोखे से कम कुछ नहीं होता। बदतर यह है कि अगर तुम अक्सर ऐसा करते हो, तो तुम बहुत घिनौने चरित्र वाले हो। यदि परमेश्वर को तुम्हें इन कर्मों के लिए दंड देना हो, तो इन्हें ईश-निंदा कहा जाएगा! लोगों में परमेश्वर के प्रति आदर नहीं है, वे उसका सम्मान करना नहीं जानते, या नहीं जानते कि उससे प्रेम कैसे करें, उसे कैसे संतुष्ट करें। यदि वे सत्य को स्पष्ट रूप से नहीं समझते, या उनका स्वभाव भ्रष्ट है, तो परमेश्वर इसे जाने देगा। लेकिन वे ऐसे चरित्र के साथ परमेश्वर के सामने चले आते हैं, और परमेश्वर से ऐसे पेश आते हैं जैसे कि अविश्वासी दूसरे लोगों के साथ पेश आते हैं। यही नहीं, वे सत्यनिष्ठा से परमेश्वर के सामने प्रार्थना में घुटने टेकते हैं, इन शब्दों का उपयोग करके उसकी खुशामद करने की कोशिश करते हैं, और सब कर लेने पर उन्हें आत्मनिंदा तो महसूस होती नहीं, बल्कि उन्हें अपने कर्मों की गंभीरता का भी एहसास नहीं होता। स्थिति ऐसी होने पर, क्या परमेश्वर उनके साथ होता है? क्या कोई इंसान जिसके पास परमेश्वर की मौजूदगी है ही नहीं, वह प्रबुद्ध और प्रकाशित हो सकता है? क्या वह सत्य से प्रबुद्ध हो सकता है? (नहीं, नहीं हो सकता।) फिर वे मुसीबत में हैं। क्या तुम लोगों ने कई बार ऐसी प्रार्थना की है? क्या तुम ऐसा अक्सर करते हो? जब लोग बहुत लंबा समय बाहर की दुनिया में बिताते हैं, तो उनसे समाज की गंदगी की बू आती है, उनकी नीच प्रकृति में बढ़ोत्तरी होती है, और उनमें शैतानी ज़हर और जीवनशैली भर जाती है; उनके मुँह से सिर्फ झूठ और छल-कपट के शब्द निकलते हैं, वे बिना सोचे बोलते हैं, या ऐसे शब्द बोलते हैं जिनमें हमेशा उनकी मंशाओं और लक्ष्यों के अलावा कुछ नहीं होता, उनमें विरले ही उचित मंसूबे होते हैं। ये गंभीर समस्याएँ हैं। जब लोग इन शैतानी फलसफों और जीवन शैलियों को ले कर परमेश्वर के सामने जाते हैं, तो क्या वे परमेश्वर के स्वभाव का अपमान नहीं करते? और इसका परिणाम क्या होगा? सतही तौर पर, ये प्रार्थनाएँ परमेश्वर को धोखा देने और मूर्ख बनाने के प्रयास होती हैं, और उसकी इच्छा और आवश्यकताओं के साथ ये असंगत होती हैं। मौलिक रूप से कहें तो, यह मानव स्वभाव के कारण होता है; यह भ्रष्टता का कोई क्षणिक प्रकटन नहीं होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'तुम सत्‍य की खोज तभी कर सकते हो जब आप स्‍वयं को जानें' से उद्धृत

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