1. प्रार्थना का अर्थ

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

प्रार्थना उन तरीकों में से एक है, जिनमें मनुष्य परमेश्वर से सहयोग करता है, यह एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को पुकारता है, और यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य को परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित किया जाता है। यह कहा जा सकता है कि जो लोग प्रार्थना नहीं करते, वे मृत लोग हैं जो आत्मा से रहित हैं, जिससे साबित होता है कि उनके पास परमेश्वर द्वारा प्रेरित किए जाने की योग्यता की कमी है। प्रार्थना के बिना सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीना असंभव होगा, पवित्र आत्मा के कार्य के साथ बने रहने की बात तो छोड़ ही दो। प्रार्थना से रहित होना परमेश्वर के साथ अपना संबंध तोड़ना है, और उसके बिना परमेश्वर की प्रशंसा पाना असंभव होगा। परमेश्वर के विश्वासी के तौर पर, व्यक्ति जितना अधिक प्रार्थना करता है, अर्थात् व्यक्ति परमेश्वर द्वारा जितना अधिक प्रेरित किया जाता है, उतना ही अधिक वह संकल्प से भर जाएगा और परमेश्वर से नई प्रबुद्धता प्राप्त करने में अधिक सक्षम होगा। नतीजतन, इस तरह के व्यक्ति को पवित्र आत्मा द्वारा बहुत जल्दी पूर्ण बनाया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

प्रार्थना किसी प्रकार की रस्म नहीं है; यह एक व्यक्ति और परमेश्वर के बीच एक सच्चा संपर्क है, इसका गहन महत्व है। लोगों की प्रार्थनाओं से देखा जा सकता है कि वे सीधे परमेश्वर की सेवा कर रहे हैं। यदि तुम प्रार्थना को एक रस्म के रूप में देखते हो, तब यह निश्चित है कि तुम परमेश्वर की सेवा अच्छी तरह से नहीं कर सकोगे। यदि तुम्हारी प्रार्थनाएँ ईमानदारी या निष्कपटता से नहीं की जाती हैं, तो ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के दृष्टिकोण से, तुम एक व्यक्ति के रूप में अस्तित्व में नहीं हो। तो फिर तुम अपने पर पवित्र आत्मा का कार्य कैसे करवाओगे? परिणामस्वरूप, कुछ समयावधि तक कार्य करने के बाद तुम थक जाओगे। अब से, प्रार्थना के बिना, तुम कार्य नहीं कर पाओगे। यह प्रार्थना ही है जो कार्य लाती है, और प्रार्थना ही है जो सेवा लाती है। यदि तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जो एक अगुआ है और परमेश्वर की सेवा करता है, मगर तुमने स्वयं को कभी भी प्रार्थना के प्रति समर्पित नहीं किया है, यहाँ तक कि तुम अपनी प्रार्थनाओं में भी कभी गम्भीर नहीं रहे हो तो जिस तरीके तुम से सेवा करते हो उसके कारण तुम असफल हो जाओगे। लोग ऐसा क्यों महसूस करने लगते हैं कि उन्हें प्रार्थना न करने का हक है? क्या उन्होंने इसलिए प्रार्थना करनी बंद कर दी है क्योंकि परमेश्वर देहधारी है? यह कोई कारण नहीं है; कभी-कभी मैं भी प्रार्थना करता हूँ! जब प्रभु यीशु देह में था, और संकटपूर्ण मसलों के समय वह भी प्रार्थना करता था। वह पर्वतों पर, नावों पर और बागों में प्रार्थना करता था; प्रार्थना करने के लिए वह अपने शिष्यों की भी अगुवाई करता था। यदि तुम प्रायः परमेश्वर के सामने आकर उससे प्रार्थना कर सकते हो, तो यह प्रमाणित करता है कि तुम परमेश्वर को परमेश्वर के रूप में मानते हो। यदि तुम अक्सर प्रार्थना करने की उपेक्षा करते हो, अपने से चीज़ें करने की कोशिश करते हो, उसकी पीठ पीछे कुछ न कुछ करते रहते हो, तो तुम परमेश्वर की सेवा नहीं कर रहे हो; तुम बस अपने कारोबार में लगे हुए हो। इस तरह क्या तुम्हारी निन्दा नहीं की जाएगी? बाहर से देखने पर, ऐसा प्रतीत नहीं होगा मानो कि तुमने कुछ हानिकारक किया है, न ही ऐसा प्रतीत होगा कि तुमने परमेश्वर की ईशनिन्दा की है, बल्कि तुम बस अपना स्वयं का ही कार्य कर रहे होगे। ऐसा करने में, क्या तुम बाधा नहीं डाल रहे हो? भले ही, सतही तौर पर ऐसा लगता है कि तुम बाधा नहीं डाल रहे हो, किन्तु सारभूत रूप से तुम परमेश्वर का विरोध कर रहे हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'प्रार्थना का महत्व और अभ्यास' से उद्धृत

तुम लोगों के लिए प्रार्थना का अत्यधिक महत्व है। जब तुम प्रार्थना करते हो और पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करते हो, तो तुम्हारा हृदय परमेश्वर द्वारा प्रेरित होगा, और तुम्हें तब परमेश्वर से प्रेम करने की ताकत मिलेगी। यदि तुम हृदय से प्रार्थना नहीं करते, यदि तुम पूरे खुले हृदय से परमेश्वर से संवाद नहीं करते, तो परमेश्वर के पास तुममें कार्य करने का कोई तरीका नहीं होगा। यदि प्रार्थना करने और अपने हृदय की बात कहने के बाद, परमेश्वर के आत्मा ने अपना काम शुरू नहीं किया है, और तुम्हें कोई प्रेरणा नहीं मिली है, तो यह दर्शाता है कि तुम्हारे हृदय में ईमानदारी की कमी है, तुम्हारे शब्द असत्य और अभी भी अशुद्ध हैं। यदि प्रार्थना करने के बाद तुम्हें संतुष्टि का एहसास हो, तो तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर को स्वीकार्य हैं और परमेश्वर का आत्मा तुममें काम कर रहा है। परमेश्वर के सामने सेवा करने वाले के तौर पर तुम प्रार्थना से रहित नहीं हो सकते। यदि तुम वास्तव में परमेश्वर के साथ संवाद को ऐसी चीज़ के रूप में देखते हो, जो सार्थक और मूल्यवान है, तो क्या तुम प्रार्थना को त्याग सकते हो? कोई भी परमेश्वर के साथ संवाद किए बिना नहीं रह सकता। प्रार्थना के बिना तुम देह में जीते हो, शैतान के बंधन में रहते हो; सच्ची प्रार्थना के बिना तुम अँधेरे के प्रभाव में रहते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'प्रार्थना के अभ्यास के बारे में' से उद्धृत

हालाँकि, प्रार्थना के लिए घुटनों के बल बैठना परमेश्वर के साथ दिल खोलकर बात करना है, यह जान लो: लोगों की प्रार्थनाएँ पवित्र आत्मा के कार्य की वाहिकाएँ भी होती हैं। जब कोई सही दशा वाला व्यक्ति प्रार्थना करता है या कुछ माँगता है, तो पवित्र आत्मा भी कार्य कर रहा होता है। यह परमेश्वर और मनुष्य के बीच दो भिन्न नज़रियों से अच्छा तालमेल है या यह भी कहा जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के कुछ मसलों को सुलझाने में उसकी मदद करता है और जब लोग परमेश्वर के सामने आते हैं तो यह एक तरह का सहयोग होता है। यह उन तरीकों में से भी एक है जिनसे परमेश्वर लोगों को बचाता है और उन्हें स्वच्छ बनाता है और उससे भी ज़्यादा, यह सामान्य जीवन प्रवेश का एक मार्ग है। यह कोई रस्म नहीं है। प्रार्थना केवल एक ऐसी चीज़ नहीं है जो कि लोगों को ऊर्जा देती है; यदि ऐसा होता तो इसे लापरवाही से निपटाना और कुछ दोहों का उच्चारण करना भी काफ़ी होता और तब परमेश्वर से किसी भी चीज़ के लिए प्रार्थना करने, या आराधना या धर्मनिष्ठा की ज़रूरत ही नहीं होती। प्रार्थना एक गहन महत्व की चीज़ हैं! यदि तुम प्रार्थना करने का तरीका जानते हो और अक्सर प्रार्थना करते हो तो ऐसी अक्सर की जाने वाली, परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी और विवेकसम्मत प्रार्थनाओं के साथ, तुम्हारी आंतरिक दशा ज़्यादातर सामान्य रहेगी। वहीं, दूसरी ओर यदि तुम्हारी प्रार्थना में प्रायः कुछ दोहे ही होते हैं और तुम स्वयं पर कोई बोझ नहीं लेते और इस पर विचार नहीं करते कि प्रार्थना में क्या कहना विवेकसम्मत होगा और क्या नहीं, न ही यह सोचते हो कि क्या कहना सम्मानजनक नहीं होगा और इन मामलों को कभी गंभीरता से नहीं लेते तो तुम्हें अपनी प्रार्थना में कभी सफलता नहीं मिलेगी और तुम्हारी आंतरिक दशा हमेशा असामान्य ही रहेगी। तुम सामान्य समझ, सच्चा समर्पण, सच्ची आराधना और वह परिप्रेक्ष्य जिससे प्रार्थना की जानी चाहिए, इसके सबक को कभी गहराई से नहीं सीख पाओगे और न ही इनमें गहरे प्रवेश कर पाओगे। ये सभी गूढ़ मसले हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'प्रार्थना का महत्व और अभ्यास' से उद्धृत

मैंने पहले भी कहा है कि सभी लोग अपने ही प्रबंधन में संलग्न हैं और अपने ही मामलों को संभालते हैं। लोग अभी तक भी ऐसे ही हैं; वे थोड़ी देर काम करते हैं और फिर प्रार्थना करना बंद कर देते हैं, उनके हृदय में परमेश्वर बिल्कुल भी नहीं है। वे सोचते हैं, "मैं कार्य-प्रबन्धन के अनुसार ही कार्य करता हूँ। वैसे भी, मैंने कोई गलती नहीं की है या किसी काम में बाधा नहीं डाली है..." तुम प्रार्थना नहीं करते हो और शुक्रिया तो और भी अदा नहीं करते हो। यह कितनी भयानक स्थिति है! अधिकांश समय तुम जानते हो कि यह स्थिति सही नहीं है, परन्तु तुम्हारे पास इसे ठीक करने का सही तरीका नहीं है; नतीजतन, तुम अपनी स्थिति बदल नहीं सकते हो और भले ही तुम सत्य को समझते हों, तुम इसे अभ्यास में लाने में असमर्थ हो। तुम जानते हो कि तुम्हारे भीतर एक असामान्य स्थिति है (जैसे कि घमण्ड, भ्रष्टाचार या विद्रोह), फिर भी तुम इसे ठीक नहीं कर पाते और इस पर काबू नहीं कर पाते। लोग हमेशा अपने ही मामलों को संभालते हैं और पवित्र आत्मा के कार्य की या वह कैसे कार्य करता है, इस बात की परवाह नहीं करते हैं, वे मात्र अपने ही कार्यों को करने की परवाह करते हैं। इसके परिणामस्वरूप, पवित्र आत्मा तुम्हें त्याग देगा—और जब वह ऐसा करेगा, तब तुम अंदर से अन्धकार और शिथिलता, और साथ ही कमज़ोरी और आनंदहीनता महसूस करोगे। ऐसे बहुत से लोग हैं जो छह महीने तक कोई प्रार्थना नहीं करते और हालाँकि वे अपना कार्य कर रहे होते हैं, पर वे अंदर से नीरस महसूस करते हैं। कई बार वे सोचते हैं, "मैं क्या कर रहा हूँ? यह कब खत्म होगा?" हाँ, ऐसे विचार भी उनके मन में आते हैं। किसी व्यक्ति के लिए प्रार्थना के बिना लंबे समय तक रहना वास्तव में खतरनाक है! प्रार्थना बहुत ही ज़रूरी है! अगर किसी का कलीसियाई जीवन कभी प्रार्थनापूर्ण नहीं रहा है तो उसके सभा-समारोह भी सूने और आनंदरहित होंगे। इसलिए, जब तुम लोग एकत्र होते हो, तो तुम लोगों को प्रार्थना और स्तुति अवश्य करनी चाहिए, और तब पवित्र आत्मा असाधारण कार्य करेगा। जो ताक़त पवित्र आत्मा मनुष्य को प्रदान करता है, वह अक्षय है; लोग इसे कभी पूरी खपा या उपयोग करके पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते। कोई व्यक्ति खुद पर विश्वास करके कितना भी बोलने या प्रचार करने में सक्षम क्यों न हो, यदि पवित्र आत्मा उस लक्ष्य पर कार्य नहीं करता तो उस व्यक्ति को क्या परिणाम मिल सकते हैं? ऐसा बहुत बार होता है जबकि प्रार्थना के तीन से पाँच सत्रों में किसी व्यक्ति के पास कहने के लिए एक या दो वाक्य ही होते हैं, "हे परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ, मैं तेरी स्तुति करता हूँ", और यह कह चुकने के बाद उन्हें और कुछ नहीं सूझता—उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं रहता। ऐसे विश्वास का क्या पैमाना है? यह खतरनाक है! जब कोई व्यक्ति, परमेश्वर पर अपने विश्वास में, ऐसे शब्द तक नहीं कह सकता जो उसका धन्यवाद करते हों, उसकी स्तुति करते हों या उसे महिमा प्रदान करते हों और इन वचनों को कहने का भी साहस भी नहीं करता हो "हे परमेश्वर, कृपया", और ऐसा करने में जिसे बहुत उलझन होती हो, तो वह व्यक्ति कितना अधम है! भले ही तुम अपने दिल में परमेश्वर को पुकारते और उसे स्वीकार करते हों, लेकिन यदि तुम परमेश्वर के सामने नहीं आते और तुम्हारा हृदय उससे दूर भटकता रहता है, तो पवित्र आत्मा कार्य नहीं करेगा। हर सुबह जब तुम जागते हो, तो प्रार्थना करना अवश्य सुनिश्चित करो। जब तुम प्रार्थना करते हो तो उस दिन की संभावनाएँ खास तौर पर अच्छी और परिपूर्णता लिए होंगी और तुम पवित्र आत्मा को हर समय तुम्हारी रक्षा करते हुए अपने आसपास महसूस करोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'प्रार्थना का महत्व और अभ्यास' से उद्धृत

मैं देखता हूँ कि कई लोगों में अब खुद पर संयम रखने की क्षमता की विशेष रूप से कमी होती है। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि वे कभी प्रार्थना नहीं करते। जब लोग प्रार्थना नहीं करते, तो वे दुर्व्यसनी हो जाते हैं, और जब लोग दुर्व्यसनी होते हैं, तो वे अपने शील और अपनी विनम्रता को खो देते हैं। वे मानवता, सत्यनिष्ठा और स्वयं के भ्रष्ट स्वभाव को जानने की केवल बातें ही करते हैं। जहाँ तक प्रश्न यह है कि पवित्र आत्मा वस्तुतः कैसे कार्य करता है, वह लोगों को कैसे द्रवित करता है, और लोगों को अपने दैनिक जीवन में कैसे परमेश्वर की इच्छा की तलाश करनी चाहिए—ये सभी चीज़ें लुप्त हो जाती हैं। लोग अपने दिलों में बस यह विश्वास रखते हैं कि सचमुच एक परमेश्वर है, और उनके विश्वास में जो कुछ भी बचता है, वह परमेश्वर को मानना है; आत्मा के जीवन के मामले महत्व खो देते हैं। उनका विश्वास केवल भौतिक दुनिया तक होता है और वे आत्मा के मामलों से इनकार करते हैं, और इसलिए, जब वे अपने ही दम पर चलते हैं, तो वे भटक जाते हैं और गिर पड़ते हैं। जब कोई ऐसा व्यक्ति जो प्रार्थना नहीं करता, सत्य का अभ्यास करता है तो वह केवल एक निश्चित दायरे में ही किसी सिद्धांत को थामे रह सकता है—ये सब नियम मात्र होते हैं। हालाँकि, हो सकता है कि तुम अपने कार्यों में ऊपर से आई व्यवस्थाओं का पालन करते हो और परमेश्वर को नाराज नहीं करते हो, लेकिन फिर भी तुम केवल नियमों का पालन ही कर रहे हो। लोगों की आत्माएँ अब बहुत जड़ और शिथिल हैं। परमेश्वर के साथ मनुष्य के संबंधों में कई जटिल बातें होती हैं, जैसे कि आत्मा द्वारा द्रवित और प्रबुद्ध होना। मनुष्य इन चीज़ों को महसूस नहीं कर पाता—वह बहुत जड़ हो गया है! मनुष्य परमेश्वर के वचनों को नहीं पढ़ता, वह आत्मा के जीवन के मामलों के संपर्क में नहीं है, और वह स्वयं अपनी स्थिति का नियंत्रण हासिल नहीं कर सकता है। आत्मा के जीवन की अपनी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए, प्रार्थना नहीं करने से बात नहीं बनेगी, और न ही कलीसिया का जीवन न जीने से कोई बात बनेगी। क्या तुम लोगों को ऐसा महसूस होता है? परमेश्वर में विश्वास करने के लिए, व्यक्ति को प्रार्थना करनी होगी; प्रार्थना के बिना, परमेश्वर में विश्वास की कोई सदृशता नहीं होती है। मैं कहता हूँ, तुम्हें नियमों से चिपके रहने की आवश्यकता नहीं है—तुम कहीं भी और कभी भी प्रार्थना कर सकते हो—और इसलिए कुछ ऐसे हैं जो शायद ही कभी प्रार्थना करते हैं। वे सुबह उठने पर प्रार्थना नहीं करते हैं, बल्कि परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश मात्र पढ़ते हैं और भजन सुनते हैं। दिन में, वे खुद को बाहरी मामलों में व्यस्त रखते हैं, और रात को सोने के लिए लेटने से पहले भी वे प्रार्थना नहीं करते हैं। क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता? यदि तुम परमेश्वर के वचनों को केवल पढ़ते हो और प्रार्थना नहीं करते हो, तो क्या तुम उसके वचनों को पढ़ रहे किसी अविश्वासी की तरह नहीं हो, जिसमें ये वचन आत्मसात नहीं होते? प्रार्थना के बिना, हृदय संलग्न नहीं होता, और व्यक्ति की आत्मा में कोई सूक्ष्म भावनाएँ या हलचल नहीं होती। व्यक्ति जड़ और शिथिल रहता है; वह स्वभाव के परिवर्तन से संबंधित बातों को सतही रूप से कहता है, और वह परमेश्वर में विश्वास करता हुआ प्रतीत तो होता है, फिर भी उसकी आत्मा की गहराई में उसकी भावना इतनी प्रबल नहीं होती है। वह उन लोगों की तरह ही होता है जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते। चाहे वह कैसे भी प्रार्थना करने की कोशिश करे, उसके मुँह से शब्द ही नहीं निकलते। यह बहुत ख़तरनाक है—इसका मतलब यह होता है कि तुम परमेश्वर से बहुत दूर हो, और वह अब तुम्हारे दिल में नहीं है। वस्तुतः, बाहरी मामलों और काम को संभालने, और प्रार्थना करने की भावना में लौट आने, के बीच कोई टकराव नहीं होता है। इनमें न केवल कोई टकराव नहीं होता, बल्कि प्रार्थना करना वास्तव में व्यक्ति के कार्य के लिए अधिक फायदेमंद होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'प्रार्थना का महत्व और अभ्यास' से उद्धृत

जब भी कोई समस्या आए तो लोगों को सबसे पहले क्या करना चाहिए? उन्हें प्रार्थना करनी चाहिए; प्रार्थना सर्वोपरि है। प्रार्थना दर्शाती है कि तुम पवित्र हो, तुम्हारे हृदय ने परमेश्वर का भय मानना शुरू कर दिया है, तुम परमेश्वर को खोजना जानते हो, तुमने उसे अपने हृदय में जगह दे दी है, और तुम एक पवित्र ईसाई हो। कई पुराने विश्वासी प्रतिदिन एक ही समय पर प्रार्थना करने के लिए घुटनों के बल बैठ जाते हैं, वो कभी-कभी इतने लंबे समय तक बैठे रहते हैं कि फिर उठ नहीं पाते। हम इस बारे में कुछ नहीं कहेंगे कि यह कर्मकांड है या नहीं और वो इससे कुछ हासिल कर सकते हैं या नहीं; मान लेते हैं कि ये वृद्ध भाई-बहन बहुत ही पवित्र हैं, तुम युवा लोगों से कहीं बेहतर और ज्यादा मेहनती हैं। किसी भी समस्या के आने पर सबसे पहले प्रार्थना करनी चाहिए। प्रार्थना केवल बेमन से बड़बड़ करना नहीं है; उससे कोई समस्या हल नहीं होगी। हो सकता है आठ-दस बार प्रार्थना करने पर भी, तुम कुछ हासिल न कर पाओ, लेकिन हतोत्साहित मत हो—तुम्हें प्रार्थना करते रहना चाहिए। जब तुम्हारे साथ कुछ हो जाए, तो पहले प्रार्थना करो, पहले परमेश्वर को बताओ, परमेश्वर को सँभालने दो, परमेश्वर को मदद करने दो, परमेश्वर को अगुआई करने दो और उसे राह दिखाने दो। इससे साबित होता है कि तुमने परमेश्वर को पहले स्थान पर रखा है, वह तुम्हारे हृदय में है। कोई समस्या सामने आने पर अगर पहले तुम प्रतिरोध करते हो, क्रोधित हो जाते हो, आगबबूला हो जाते हो—यदि तुम तुरंत, सबसे पहले नकारात्मक हो जाते हो—तो इससे यह ज़ाहिर होता है कि तुम्हारे हृदय में परमेश्वर नहीं है। जब भी तुम्हारे साथ कुछ घटे, तो तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए। सबसे पहले तुम्हें घुटने टेककर प्रार्थना करनी चाहिए—यह महत्त्वपूर्ण है। प्रार्थना परमेश्वर की उपस्थिति में उसके प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण को प्रदर्शित करती है। अगर परमेश्वर तुम्हारे हृदय में नहीं होगा, तो तुम ऐसा नहीं करोगे। कुछ लोग कहते हैं, "मैं प्रार्थना करता हूँ, लेकिन परमेश्वर फिर भी मुझे प्रबुद्ध नहीं करता!" तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए। पहले देखो कि प्रार्थना के लिए तुम्हारी प्रेरणाएँ सही हैं या नहीं; यदि तुम वास्तव में सत्य की खोज करते हो और अक्सर परमेश्वर से प्रार्थना करते हो, तो वह किसी मामले में तुम्हें अच्छी तरह प्रबुद्ध करेगा, ताकि तुम समझ सको—संक्षेप में कहें तो परमेश्वर तुम्हें समझा देगा। परमेश्वर की प्रबुद्धता के बिना तुम अपने आप नहीं समझ सकते : तुममें कुशाग्रता की कमी है, तुम्हारे पास इसके लिए बुद्धि नहीं है, और यह मानव-बुद्धि द्वारा अप्राप्य है। जब तुम समझ जाते हो, तो क्या वह समझ तुम्हारे मन से पैदा होती है? यदि तुम पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध नहीं किए जाते, तो तुम जिस किसी से भी पूछोगे, वह नहीं जानता होगा कि आत्मा के कार्य का क्या अर्थ है या परमेश्वर का क्या अर्थ है; जब स्वयं परमेश्वर तुम्हें इसका अर्थ बताएगा, तभी तुम जान पाओगे। इसलिए, जब तुम्हारे साथ कुछ होता है, तो सबसे पहले प्रार्थना करनी चाहिए। प्रार्थना के लिए एक खोजी दृष्टिकोण के साथ जाँच-पड़ताल, और अपने विचार, मत और दृष्टिकोण व्यक्त करने की आवश्यकता होती है—ये चीज़ें उसमें शामिल होनी चाहिए। केवल बेमन से काम करने का कोई परिणाम नहीं होगा, इसलिए तुम्हें प्रबुद्ध न करने के लिए पवित्र आत्मा को दोष न दो। मैंने पाया है कि कुछ लोग परमेश्वर पर अपनी आस्था में, विश्वास तो करते रहते हैं, लेकिन परमेश्वर केवल उनके होंठों पर रहता है। परमेश्वर उनके दिलों में नहीं रहता, वे आत्मा के कार्य को नकारते हैं, और वे प्रार्थना को भी नकारते हैं; वे केवल परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। क्या इसे परमेश्वर में विश्वास कहा जा सकता है? वे तब तक विश्वास करते रहते हैं, जब तक कि परमेश्वर उनके विश्वास से पूरी तरह से गायब नहीं हो जाता। विशेष रूप से, ऐसे लोग भी हैं, जो अक्सर सामान्य मामले सँभालते हैं और महसूस करते हैं कि वे बहुत व्यस्त हैं, और अपने समस्त प्रयासों के लिए कुछ प्राप्त नहीं करते। यह लोगों द्वारा परमेश्वर पर अपने विश्वास में सही मार्ग पर न चलने का मामला है। क्या सही मार्ग पर चलना मुश्किल काम नहीं है? बहुत से सिद्धांत समझने के बाद भी वे इस मार्ग पर चलने में विफल रहते हैं और उनके पतन के मार्ग की ओर ही उन्मुख होने की संभावना होती है। इसलिए जब तुम्हारे साथ कुछ घटे, तो प्रार्थना करने और खोजने में अधिक समय लगाओ—कम से कम इतना तो तुम्हें करना ही चाहिए। परमेश्वर की इच्छा और पवित्र आत्मा के इरादों को जानना ही कुंजी है। यदि परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग इस प्रकार अनुभव और अभ्यास करने में असमर्थ रहते हैं, तो वे कुछ भी हासिल नहीं कर पाएँगे, और उनका विश्वास अर्थहीन होगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'तुम्हें हर चीज़ सत्य के दृष्टिकोण से ध्यानपूर्वक देखनी ही चाहिए' से उद्धृत

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