4. क्या भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार जीते हुए ठीक ढंग से कर्तव्य निभाया जा सकता है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर की सेवा करना कोई सरल कार्य नहीं है। जिनका भ्रष्ट स्वभाव अपरिवर्तित रहता है, वे परमेश्वर की सेवा कभी नहीं कर सकते हैं। यदि परमेश्वर के वचनों के द्वारा तुम्हारे स्वभाव का न्याय नहीं हुआ है और उसे ताड़ित नहीं किया गया है, तो तुम्हारा स्वभाव अभी भी शैतान का प्रतिनिधित्व करता है जो प्रमाणित करता है कि तुम परमेश्वर की सेवा अपनी भलाई के लिए करते हो, तुम्हारी सेवा तुम्हारी शैतानी प्रकृति पर आधारित है। तुम परमेश्वर की सेवा अपने स्वाभाविक चरित्र से और अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार करते हो। इसके अलावा, तुम हमेशा सोचते हो कि जो कुछ भी तुम करना चाहते हो, वो परमेश्वर को पसंद है, और जो कुछ भी तुम नहीं करना चाहते हो, उनसे परमेश्वर घृणा करता है, और तुम पूर्णतः अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार कार्य करते हो। क्या इसे परमेश्वर की सेवा करना कह सकते हैं? अंततः तुम्हारे जीवन स्वभाव में रत्ती भर भी परिवर्तन नहीं आएगा; बल्कि तुम्हारी सेवा तुम्हें और भी अधिक ज़िद्दी बना देगी और इससे तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव गहराई तक जड़ें जमा लेगा। इस तरह, तुम्हारे मन में परमेश्वर की सेवा के बारे में ऐसे नियम बन जाएँगे जो मुख्यतः तुम्हारे स्वयं के चरित्र पर और तुम्हारे अपने स्वभाव के अनुसार तुम्हारी सेवा से प्राप्त अनुभवों पर आधारित होंगे। ये मनुष्य के अनुभव और सबक हैं। यह दुनिया में जीने का मनुष्य का जीवन-दर्शन है। इस तरह के लोगों को फरीसियों और धार्मिक अधिकारियों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। यदि वे कभी भी जागते और पश्चाताप नहीं करते हैं, तो वे निश्चित रूप से झूठे मसीह और मसीह विरोधी बन जाएँगे जो अंत के दिनों में लोगों को धोखा देते हैं। झूठे मसीह और मसीह विरोधी, जिनके बारे में कहा गया था, इसी प्रकार के लोगों में से उठ खड़े होंगे। जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, यदि वे अपने चरित्र का अनुसरण करते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं, तब वे किसी भी समय बहिष्कृत कर दिए जाने के ख़तरे में होते हैं। जो दूसरों के दिलों को जीतने, उन्हें व्याख्यान देने और नियंत्रित करने तथा ऊंचाई पर खड़े होने के लिए परमेश्वर की सेवा के कई वर्षों के अपने अनुभव का प्रयोग करते हैं—और जो कभी पछतावा नहीं करते हैं, कभी भी अपने पापों को स्वीकार नहीं करते हैं, पद के लाभों को कभी नहीं त्यागते हैं—उनका परमेश्वर के सामने पतन हो जाएगा। ये अपनी वरिष्ठता का घमंड दिखाते और अपनी योग्यताओं पर इतराते पौलुस की ही तरह के लोग हैं। परमेश्वर इस तरह के लोगों को पूर्णता प्रदान नहीं करेगा। इस प्रकार की सेवा परमेश्वर के कार्य में विघ्न डालती है। लोग हमेशा पुराने से चिपके रहते हैं। वे अतीत की धारणाओं और अतीत की हर चीज़ से चिपके रहते हैं। यह उनकी सेवा में एक बड़ी बाधा है। यदि तुम उन्हें छोड़ नहीं सकते हो, तो ये चीज़ें तुम्हारे पूरे जीवन को विफल कर देंगी। परमेश्वर तुम्हारी प्रशंसा नहीं करेगा, थोड़ी-सी भी नहीं, भले ही तुम दौड़-भाग करके अपनी टाँगों को तोड़ लो या मेहनत करके अपनी कमर तोड़ लो, भले ही तुम परमेश्वर की "सेवा" में शहीद हो जाओ। इसके विपरीत वह कहेगा कि तुम एक कुकर्मी हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'धार्मिक सेवाओं का शुद्धिकरण अवश्य होना चाहिए' से उद्धृत

मनुष्य की परमेश्वर की सेवा में सबसे बड़ी वर्जना क्या है? क्या तुम लोग जानते हो? जो अगुवाओं के रूप में सेवा करते हैं वे हमेशा अधिक चतुरता प्राप्त करना चाहते हैं, बाकी सब से श्रेष्ठ बनना चाहते हैं, नई तरकीबें पाना चाहते हैं ताकि परमेश्वर देख सके कि वे वास्तव में कितने सक्षम हैं। हालाँकि, वे सत्य को समझने और परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते हैं। वे हमेशा दिखावा करना चाहते हैं; क्या यह निश्चित रूप से एक अहंकारी प्रकृति का प्रकटन नहीं है? कुछ तो यह भी कहते हैं: "ऐसा करके मुझे विश्वास है कि परमेश्वर बहुत प्रसन्न होगा; वह वास्तव में इसे पसंद करेगा। इस बार मैं परमेश्वर को देखने दूँगा, उसे एक अच्छा आश्चर्य दूँगा।" इस आश्चर्य के परिणामस्वरूप, वे पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हैं और परमेश्वर द्वारा हटा दिए जाते हैं। जो कुछ भी तुम्हारे मन में आता है उसे उतावलेपन में न करें। यदि तुम कृत्यों के परिणामों पर विचार नहीं करते हो तो यह ठीक कैसे हो सकता है? जब तुम परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित करते हो और उसके प्रशासनिक आदेशों का अपमान करते हो, और तब हटा दिए जाते हो, तो तुम्हारे पास कहने के लिये कुछ नहीं बचा होगा। तुम्हारे अभिप्राय पर ध्यान दिए बिना, इस बात पर ध्यान दिए बिना कि तुम जानबूझकर ऐसा करते हो या नहीं, यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझते हो या परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हो, तो तुम आसानी से परमेश्वर को अपमानित करोगे और आसानी से उसके प्रशासनिक आदेशों का अपमान करोगे: इस चीज़ को लेकर प्रत्येक को सतर्क रहना चाहिए। एक बार जब तुम ईश्वर के प्रशासनिक आदेशों का गंभीरता से अपमान करते हो या परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित करते हो, तो परमेश्वर यह विचार नहीं करेगा कि तुमने इसे जानबूझकर किया या अनजाने में; इस चीज़ को तुम्हें स्पष्ट रूप से अवश्य देखना चाहिए। यदि तुम इस मुद्दे को समझ नहीं कर सकते हो, तो तुम्हें निश्चित रूप से समस्या होनी ही है। परमेश्वर की सेवा करने में, लोग महान प्रगति करना, महान कार्यों को करना, महान वचनों को बोलना, महान कार्य निष्पादित करना, महान बैठकें आयोजित करना और महान अगुवा बनना चाहते हैं। यदि तुम हमेशा उच्च महत्वाकांक्षाएँ रखते हो, तो तुम परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का अपमान करोगे; इस तरह के लोग शीघ्र ही मर जाएँगे। यदि तुम परमेश्वर की सेवा में ईमानदार, खरे, धर्मनिष्ठ या विवेकशील नहीं हो, तो तुम कभी न कभी परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करोगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य से रहित होकर कोई परमेश्वर को नाराज़ करने का भागी होता है' से उद्धृत

जो कोई भी परमेश्वर का आदर नहीं करता, और उसका हृदय भय से नहीं काँपता, तो इस बात की प्रबल संभावना है कि वह परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं का उल्लंघन करेगा। बहुत-से लोग अपनी तीव्र भावना के बल पर परमेश्वर की सेवा तो करते हैं, लेकिन उन्हें परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं की कोई समझ नहीं होती, उसके वचनों में छिपे अर्थों का तो उन्हें कोई भान तक नहीं होता। इसलिए, नेक इरादों के बावजूद वे प्रायः ऐसे काम कर बैठते हैं जिनसे परमेश्वर के प्रबंधन में बाधा पहुँचती है। गंभीर मामलों में, उन्हें बाहर निकाल दिया जाता है, आगे से परमेश्वर का अनुसरण करने के किसी भी अवसर से वंचित कर दिया जाता है, नरक में फेंक दिया जाता है और परमेश्वर के घर के साथ उनके सभी संबंध समाप्त हो जाते हैं। ये लोग अपने नादान नेक इरादों की शक्ति के आधार पर परमेश्वर के घर में काम करते हैं, और अंत में परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर बैठते हैं। लोग अधिकारियों और स्वामियों की सेवा करने के अपने तरीकों को परमेश्वर के घर में ले आते हैं, और व्यर्थ में यह सोचते हुए कि ऐसे तरीकों को यहाँ आसानी से लागू किया जा सकता है, उन्हें उपयोग में लाने की कोशिश करते हैं। उन्हें यह पता नहीं होता कि परमेश्वर का स्वभाव किसी मेमने का नहीं बल्कि एक सिंह का स्वभाव है। इसलिए, जो लोग पहली बार परमेश्वर से जुड़ते हैं, वे उससे संवाद नहीं कर पाते, क्योंकि परमेश्वर का हृदय इंसान की तरह नहीं है। जब तुम बहुत-से सत्य समझ जाते हो, तभी तुम परमेश्वर को निरंतर जान पाते हो। यह ज्ञान शब्दों या धर्म सिद्धांतों से नहीं बनता, बल्कि इसे एक खज़ाने के रूप में उपयोग किया जा सकता है जिससे तुम परमेश्वर के साथ गहरा विश्वास पैदा कर सकते हो और इसे एक प्रमाण के रूप में उपयोग सकते हो कि वह तुमसे प्रसन्न होता है। यदि तुममें ज्ञान की वास्तविकता का अभाव है और तुम सत्य से युक्त नहीं हो, तो मनोवेग में की गई तुम्हारी सेवा से परमेश्वर सिर्फ तुमसे घृणा और ग्लानि ही करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

इन दिनों, जब लोगों के सामने चीज़ें आती हैं, तो चाहे वास्तविक स्थिति कुछ भी हो, उन्हें लगता है कि वे बहुत-कुछ कर सकते हैं, लेकिन परमेश्वर उनके दिल में नहीं होते, और वे अपनी इच्छा के अनुसार उसे करते हैं। भले ही उनके कार्य का तरीका उपयुक्त हो या नहीं, या वह सत्य के अनुरूप हो या नहीं, वे बस जिद पर अड़े रहते हैं और अपने व्यक्तिगत इरादों के अनुसार कार्य कर डालते हैं। आम तौर पर ऐसा लग सकता है कि परमेश्वर उनके दिल में हैं, लेकिन जब वे काम करते हैं, तो वस्तुतः परमेश्वर उनके दिल में नहीं होते। कुछ लोग कहते हैं : "मैं अपने कामों में परमेश्वर के निकट नहीं हो सकता। अतीत में मैं धार्मिक अनुष्ठान करने का आदी था, और मैंने परमेश्वर के करीब आने की कोशिश की, लेकिन इसका कुछ परिणाम नहीं हुआ। मैं उसके पास नहीं जा सका।" ऐसे लोगों के दिल में परमेश्वर नहीं होता; वे स्वयं ही अपने दिल में होते हैं, और अपने किसी भी काम में सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते। सत्य के अनुसार काम न करने का अर्थ है अपनी इच्छा के अनुसार काम करना, और अपनी इच्छा के अनुसार काम करने का अर्थ है परमेश्वर को छोड़ देना; अर्थात, उनके दिल में परमेश्वर नहीं हैं। मानवीय अभिप्राय आमतौर पर लोगों को अच्छे और सही लगते हैं, और वे ऐसे दिखते हैं मानो कि वे सत्य का बहुत अधिक उल्लंघन नहीं करते हैं। लोगों को लगता है कि चीज़ों को इस तरह से करना सत्य को अभ्यास में लाना है; उन्हें लगता है कि चीज़ों को उस तरह से करना परमेश्वर के प्रति समर्पण करना है। दरअसल, वे वास्तव में परमेश्वर की तलाश नहीं कर रहे हैं, और वे परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार, उसकी इच्छा को संतुष्ट करने के लिए, इसे अच्छी तरह से करने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। उनके पास यह सच्ची अवस्था नहीं है, न ही उनकी ऐसी अभिलाषा है। यही वह सबसे बड़ी ग़लती है, जो लोग अपने अभ्यास में करते हैं। तुम परमेश्वर पर विश्वास तो करते हो, परन्तु तुम परमेश्वर को अपने दिल में नहीं रखते हो। यह पाप कैसे नहीं है? क्या तुम अपने आप को धोखा नहीं दे रहे हो? यदि तुम इसी तरीके से विश्वास करते रहो तो तुम किस प्रकार के प्रभावों को पाओगे? इसके अलावा, विश्वास के महत्व को कैसे अभिव्यक्त किया जा सकता है?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा को खोजना सत्य के अभ्यास के लिए है' से उद्धृत

अपना कर्तव्य निभाते समय बेमन से कार्य करना एक बड़ी वर्जना है। अगर तुम इसी तरह से कार्य करते रहोगे, तो तुम अपना कर्तव्य सही ढंग से नहीं निभा पाओगे। तुम्हें इसमें अपना दिल लगाना होगा! लोगों को यह अवसर मिलना बहुत कठिन था! जब परमेश्वर उन्हें अवसर देता है लेकिन वे उसे पकड़ नहीं पाते, तो वह अवसर खो जाता है—और अगर बाद में वे ऐसा अवसर खोजना चाहें, तो शायद वह दोबारा न मिले। परमेश्वर का कार्य किसी की प्रतीक्षा नहीं करता, और न ही अपना कर्तव्य निभाने के अवसर किसी की प्रतीक्षा करते हैं। कुछ लोग कहते हैं, "मैंने पहले अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं निभाया था, लेकिन अभी भी मैं उसे पूरा करना चाहता हूँ, इसलिए इस बार मैंने संकल्प किया है; मैं थोड़ा और कर्तव्यनिष्ठ बनूँगा और थोड़ा और काम करूँगा, और उसे पूरा करने का अच्छा प्रयास करूँगा।" लेकिन कभी-कभी वह अवसर मौजूद नहीं रहता। जीवन में कई अवसर नहीं मिलते, इसलिए तुम्हें उन्हें हाथ से जाने नहीं देना चाहिए। जब तुम्हारे सामने एक ऐसा कर्तव्य आता है, जिसके लिए तुम्हारे प्रयास और तुम्हारे खुद को खपाने की आवश्यकता होती है, और जिसके लिए तुम्हें अपने तन, मन और समय को समर्पित करने की आवश्यकता होती है, तो तुम्हें कोई संकोच नहीं करना चाहिए, किसी तरह की तुच्छ चालाकी नहीं करनी चाहिए, और कोई कसर नहीं छोडनी चाहिए। यदि तुमने कोई कसर छोड़ी, या तुम मतलबी, मक्कार या विश्वासघाती बनते हो, तो तुम निश्चित ही एक ख़राब काम करोगे। तुम कह सकते हो, "किसी ने मुझे चालाकी से काम करते हुए नहीं देखा। क्या बात है!" यह किस तरह की सोच है? तुम्हें लगता है कि तुमने लोगों की आँखों में धूल झोंकी, और परमेश्वर की आँखों में भी। हालांकि, वास्तविकता में, तुमने जो किया वो परमेश्वर जानता है या नहीं? (वह जानता है।) आम तौर पर, जो लोग लंबे समय से तुम्हारे साथ बातचीत करते रहे हैं, उन्हें भी पता चल जाएगा, और वे कहेंगे कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो हमेशा मक्कारी दिखाता है, कभी दिल लगाकर मेहनत नहीं करता, और उसका प्रयास केवल पचास या साठ प्रतिशत होता है, या ज़्यादा से ज़्यादा अस्सी प्रतिशत। वे कहेंगे कि तुम सब कुछ बहुत ही उलझे हुए तरीके से करते हो, और जो कुछ भी कर रहे हो उसपर एक नज़र भी नहीं डालते; तुम अपने काम में बिलकुल ईमानदार नहीं हो। जब तुम्हें कुछ करने के लिए ज़ोर दिया जाता है, तभी तुम थोड़ा-सा प्रयास करते हो; अगर तुम्हारे आसपास कोई निगरानी कर रहा है कि काम ठीक से हो रहा है या नहीं, तो तुम थोड़ा बेहतर काम करते हो—लेकिन अगर कोई निगरानी करने के लिए नहीं है, तो तुम थोड़ा सुस्त पड़ जाते हो। अगर कोई तुमसे निपटा जाता है, तो तुम काम में अपना दिल लगाते हो; वरना तुम काम करते हुए लगातार ऊंघते रहते हो और जितना कम हो सके उतना ही काम करने की कोशिश करते हो, यह मानकर कि कोई नहीं देखेगा। समय के साथ, लोग ध्यान देने लगते हैं। वे कहते हैं, "यह व्यक्ति अविश्वसनीय है और भरोसे के लायक नहीं है; यदि तुम उसे कोई महत्वपूर्ण काम सौंपते हो, तो उसपर निगरानी रखने की आवश्यकता होगी। वह साधारण कार्य कर सकता है और ऐसे काम जिनका सिद्धांतों से कोई सरोकार नहीं है, लेकिन यदि तुम उसे कोई महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए दोगे, तो यह बहुत ही संभव है कि वह इसे चौपट कर देगा, और फिर तुम उसके धोखे का शिकार हो जाओगे।" लोग उसकी सही फितरत पहचान लेंगे, और वह पूरी गरिमा और ईमानदारी को त्याग चुका होगा। अगर कोई उस पर भरोसा नहीं कर सकता, तो परमेश्वर कैसे कर सकता है? क्या परमेश्वर उसे कोई बड़े काम सौंपेगा? ऐसा व्यक्ति भरोसे के लायक नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रवेश अपने कर्तव्य को निभाने का अनुभव करने से प्रारंभ होना चाहिए' से उद्धृत

कर्तव्य और परमेश्वर दोनों के प्रति लोगों को ईमानदार हृदय रखना चाहिए—यह परमेश्वर का भय है। एक ईमानदार हृदय से परमेश्वर के साथ व्यवहार करने में लोगों का रवैया क्या होना चाहिए? लोगों को यह प्रश्न किए बिना कि इससे उन पर आपदा आएगी या आशीष मिलेगी, बिना किसी शर्त के और परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित होकर, अपने कर्तव्य में परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाना चाहिए; ऐसा व्यक्ति ईमानदार हृदय का होता है। जो हमेशा संदेह करते हैं, जो हमेशा शर्तें रखते हैं और जो निरंतर शोध में लगे रहते हैं, क्या उनका हृदय ईमानदार होता है? ऐसे व्यक्ति के हृदय में क्या निहित होता है? उनके हृदय में धोखेबाजी और बुराई होती है और वे हमेशा शोध में लगे रहते हैं। जब कुछ ऐसा होता है जो उनके निजी हितों को प्रभावित करता है, तो वे सोचते हैं : "जब परमेश्वर ने मेरे साथ यह किया और जब उसने मेरे लिए इस स्थिति का प्रबंध किया, तो परमेश्वर क्या सोच रहा था? क्या यह कुछ ऐसा है, जो अन्य लोगों के साथ हुआ है? जब मैं इस परीक्षा से बाहर आ जाऊँगा, तो इसके बाद परिणाम क्या होंगे?" वे इन सवालों पर शोध करते हैं; वे शोध करते हैं कि वे क्या प्राप्त कर सकते हैं या खो सकते हैं, क्या मौजूदा प्रसंग उनके लिए आपदा लाएगा या आशीष। एक बार जब वे इन सवालों पर शोध करना आरंभ कर देते हैं, तो क्या वे सत्य का अभ्यास करने में सक्षम होते हैं? क्या वे परमेश्वर की आज्ञा मानने में सक्षम हैं? जब वे एक कर्तव्य शुरू करते हैं, तो वे इस पर शोध करते हैं और पूछते हैं : "यदि मैं इस कर्तव्य को अभ्यास में लाता हूँ तो क्या मुझे पीड़ा होगी? क्या मुझे बहुत समय बिताने की आवश्यकता होगी? क्या मैं नियमित भोजन और आराम कर पाऊँगा? मैं किस तरह के लोगों के संपर्क में आऊँगा?" हालाँकि दिखावे के लिए वे इस कर्तव्य को स्वीकार करते हैं, मगर अपने दिल में वे कपट रखते हैं और निरंतर ऐसी चीजों पर शोध करते रहते हैं। वास्तव में, ये सभी चीजें जिन पर वे शोध करते हैं, उनके निजी हितों से संबंधित हैं; वे परमेश्वर के घर के हितों पर नहीं, सिर्फ अपने हितों पर विचार करते हैं। यदि लोग केवल अपने हितों पर विचार करते हैं, तो उनके लिए सत्य का अभ्यास करना आसान नहीं होता और उनमें परमेश्वर के प्रति सच्ची आज्ञाकारिता नहीं होती। जो इस प्रकार के शोध में लगे हैं, उनमें से कई के साथ अंत में क्या होता है? कुछ परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह करते हैं; अर्थात, वे नकारात्मक भावनाओं से भरी चीजें करते हैं, काम करते समय सावधान रहते हैं। यह किस तरह का स्वभाव है, जो ऐसी भावनाएँ लाता है? यह धोखा और बुराई है; बुराई की इस हद तक जाने के बाद, ये लोग स्वयं को परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा कर रहे हैं! जब लोग लगातार शोध करते हैं, तो उनका ध्यान बँट जाता है, तो क्या वे इस दशा में अपना कर्तव्य ठीक से निभा सकते हैं? वे ईमानदारी और अपने प्राण-पण के साथ परमेश्वर की आराधना नहीं करते, उनके पास ईमानदार हृदय नहीं हैं और अपने कर्तव्य को करने के दौरान वे हमेशा निगरानी रखते हैं और संकोच करते हैं। इससे क्या अर्थ निकलता है? परमेश्वर उन पर कार्य नहीं करता, वे चाहे जो भी करें, वे सिद्धांतों को नहीं पा सकते और वे जो भी करते हैं, वह हमेशा गलत होता है। चीजें हमेशा गलत क्यों हो जाती हैं? कभी-कभी, ऐसा नहीं होता कि परमेश्वर उन्हें उजागर करता है, बल्कि वे स्वयं को बर्बाद कर लेते हैं। वे परमेश्वर के घर के कार्य या परमेश्वर के घर के हितों पर कोई ध्यान नहीं देते; वे हमेशा अपनी ओर से षड्यंत्र कर रहे होते हैं, अपनी प्रतिष्ठा और ओहदे के लिए योजनाएं बना रहे होते हैं। वे ऐसा करते रहते हैं और फिर वे भटकने लगते हैं। अपने स्वयं के हितों और भविष्य की संभावनाओं की योजनाएँ बनाना और परमेश्वर के घर के कार्य और परमेश्वर के घर के हितों के बारे में विचार करना, क्या इनके बीच उनके कार्यों का परिणाम एक समान है? नहीं, परिणाम निश्चित रूप से समान नहीं है। वे उजागर हो चुके हैं और इस व्यवहार से किसी का कर्तव्य निर्मित नहीं होता; इस व्यक्ति के कार्यों का सार और प्रकृति बदल गई है। यदि यह केवल कुछ मामूली नुकसान की बात है, तो उनके पास अभी भी बचाए जाने की संभावना होगी—उनके पास अभी भी एक मौका होगा। किंतु अगर बड़ा नुकसान होता है, तो क्या उनके लिए अभी भी कोई मौका है? यदि तात्कालिक मामला एक गंभीर प्रकरण है, इस हद तक कि यह व्यवधान और गड़बड़ियों का कारण बनता है, तो इसमें शामिल व्यक्ति को बदला और हटाया जाना चाहिए; कुछ लोगों को इसी तरह से हटाया गया है। क्या तुम्हें इसके मूल का पता चला? मामले का मूल यह है कि लोग हमेशा अपने हितों के बारे में सोचते रहते हैं, और वे उसमें ही बह जाते हैं, उनमें नींव रखने के लिए सत्य का एक कण भी नहीं होता या परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारितापूर्ण रवैये का एक अंश भी नहीं होता। तो लोग आज्ञापालन कैसे करें? यहाँ अभ्यास करने का एक मार्ग है। जब वे किसी समस्या का सामना करते हैं, तो कुछ लोग सबसे पहले सोचते हैं, "यदि मैं इसे इस तरह करता हूँ, तो परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान होगा; अगर मैं ऐसा करता हूँ, तो अहित नहीं होगा—लेकिन मेरी नाक कट जाएगी और मुझे बहुत कष्ट होगा, मुझे चीजों का खोजने और लोगों के साथ परामर्श करने में अधिक समय देना होगा।" इसके बारे में उनके मन में असमंजस की स्थिति में रहती है : "यदि परमेश्वर के घर के हितों को थोड़ा नुकसान होता है तो यह कोई बड़ी बात नहीं है। मैं इस काम को ऐसे ही करूँगा, इस मामले में मेरा फैसला ही अंतिम है, इस पर सबके साथ चर्चा करने की कोई जरूरत नहीं है।" उन्हें लगता है कि इस प्रकार पेश आने से उनकी हैसियत और मूल्य नजर आएगा, यह दूसरों को दिखाएगा कि वे निर्णायक, अनुभवी और सक्षम हैं, कमजोर, ढुलमुल और अस्थिर नहीं हैं—लेकिन अंततः, जब काम हो जाता है, तो वे परमेश्वर के घर के काम को बाधित और क्षतिग्रस्त करने वाले बन जाते हैं, ऐसे लोगों को उजागर करके हटा दिया जाएगा। उनका यही अंजाम होगा। लेकिन अगर वे परमेश्वर की व्यवस्थाओं और आयोजनों को समर्पित हो जाएँ, और सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कार्य करें, तो परिणाम अलग होगा। जब उन्हें कोई समस्या आए, तो वे अंतिम निर्णय लेने वाले व्यक्ति नहीं होंगे; कई लोग एक साथ संगति और परामर्श करेंगे, और एक बार जब पवित्र आत्मा काम करना शुरू कर देगा, तो लोग अपने हृदय में प्रबुद्ध हो जाएँगे, उन्हें मनुष्य की कल्पना के अनुसार कार्य करने में कमियों और त्रुटियों का एहसास होगा, उन्हें बेहतर मार्ग मिलेगा, और इस तरह परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान नहीं होगा। चूँकि सभी लोग एक साथ संगति और परामर्श करते हैं, उनकी व्यक्तिगत पहचान, रुतबा, स्वतंत्रता और योग्यता प्रमुखता से उजागर नहीं होगी, इस तरह परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान नहीं होगा। इस प्रकार परिणाम अलग होगा। क्या तब भी उन्हें बदला जाएगा? (नहीं।) यह परमेश्वर द्वारा याद रखे जाने का मामला है। कोई समस्या आने पर, यदि लोग सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर पाते हैं, तो परमेश्वर पर्दे के पीछे से हर चीज को सुरक्षित कर देगा। यदि लोग हर समय अपने हितों को ध्यान में रखते हुए साजिश रचते रहते हैं, हिसाब-किताब करते रहते हैं और योजना बनाते रहते हैं, परमेश्वर के घर के हितों की या परमेश्वर की इच्छा का विचार नहीं करते हैं, और परमेश्वर की व्यवस्था और आयोजनों का पालन करने के प्रति थोड़ी-सी भी रुचि नहीं रखते हैं—यदि उनमें इतनी भी रुचि नहीं है—तो अंतिम परिणाम क्या होगा? तो उनका पतन हो जाएगा; उनकी असलियत उजागर हो जाएगी। क्या वे इसी लायक हैं? क्या ऐसे लोग सहानुभूति के पात्र हैं? (नहीं।) अपने हितों के लिए षड्यंत्र रचने का यही अपरिहार्य परिणाम है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य के सिद्धांतों की खोज करके ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाया जा सकता है' से उद्धृत

कुछ लोग हमेशा इस बात डरे रहते हैं कि दूसरे लोग उनकी प्रसिद्धि को चुरा लेंगे और उनसे आगे निकल जाएंगे, अपनी पहचान बना लेंगे जबकि उनको अनदेखा कर दिया जाएगा। इसी वजह से वे दूसरों पर हमला करते हैं और उन्हें अलग कर देते हैं। क्या यह अपने से ज़्यादा सक्षम लोगों से ईर्ष्या करने का मामला नहीं है? क्या ऐसा व्यवहार स्वार्थी और घिनौना नहीं है? यह किस तरह का स्वभाव है? यह दुर्भावनापूर्ण है! सिर्फ़ खुद के बारे में सोचना, सिर्फ़ अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करना, दूसरों के कर्तव्यों पर कोई ध्यान नहीं देना, और सिर्फ़ अपने हितों के बारे में सोचना और परमेश्वर के घर के हितों के बारे में नहीं सोचना—इस तरह के लोग बुरे स्वभाव वाले होते हैं, और परमेश्वर के पास उनके लिये कोई प्रेम नहीं है। अगर तुम वाकई परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखने में सक्षम हो, तो तुम दूसरे लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार कर पाने में सक्षम होगे। अगर तुम किसी व्यक्ति की सिफ़ारिश करते हो, और वह व्यक्ति एक प्रतिभाशाली इंसान बन जाता है, जिससे परमेश्वर के घर में एक और प्रतिभाशाली व्यक्ति का प्रवेश होता है, तो क्या ऐसा नहीं है कि तुमने अपना काम अच्छी तरह पूरा किया है? तब क्या तुम अपने कर्तव्य के निर्वहन में वफ़ादार नहीं रहे हो? यह परमेश्वर के समक्ष एक अच्छा कर्म है, यह एक तरह का विवेक और सूझ-बूझ है जो इंसानों में होनी चाहिए। जो लोग सत्य को व्यवहार में लाने में सक्षम हैं, वे अपने कार्यों में परमेश्वर की जाँच को स्वीकार कर सकते हैं। जब तुम परमेश्वर की जाँच को स्वीकार करते हो, तो तुम्हें गलती का एहसास होता है। यदि तुम हमेशा दूसरों को दिखाने के लिए ही काम करते हो और परमेश्वर की जाँच को स्वीकार नहीं करते, तो क्या तुम्हारे हृदय में परमेश्वर है? इस तरह के लोगों के हृदय में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा नहीं होती। हमेशा अपने लिए कार्य मत कर, हमेशा अपने हितों की मत सोच, और अपनी स्वयं की हैसियत, प्रतिष्ठा और साख पर विचार मत कर। इंसान के हितों पर गौर मत कर। तुझे सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार करना चाहिए और उसे अपनी पहली प्राथमिकता बनाना चाहिए। तुझे परमेश्वर की इच्छा के बारे में मननशील होना चाहिए, इस पर चिंतन करने के द्वारा आरंभ कर कि तू अपने कर्तव्य को पूरा करने में अशुद्ध रहा है या नहीं, क्या तूने वफादार होने के लिए अपना अधिकतम किया है, क्या अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास किया है और अपना सर्वस्व दिया है, साथ ही क्या तूने अपने कर्तव्य, और परमेश्वर के घर के कार्य के प्रति पूरे दिल से विचार किया है। तुझे इन चीज़ों के बारे में विचार करने की आवश्यकता है। इन चीज़ों पर बार-बार विचार कर, और तू आसानी से अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभा पाएगा। जब तेरी क्षमता कमज़ोर होती है, तेरा अनुभव उथला होता है, या जब तू अपने पेशे में दक्ष नहीं होता है, तब सारी ताकत लगा देने के बावजूद तेरे कार्य में कुछ गलतियाँ या कमियाँ हो सकती हैं, और परिणाम बहुत अच्छे नहीं हो सकते हैं। जब तू कार्यों को करते हुए अपनी स्वयं की स्वार्थी इच्छाओं या अपने स्वयं के हितों के बारे में विचार नहीं करता है, और इसके बजाय हर समय परमेश्वर के घर के कार्य पर विचार करता है, परमेश्वर के घर के हितों के बारे में लगातार सोचता रहता है, और अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाता है, तब तू परमेश्वर के समक्ष अच्छे कर्मों का संचय करेगा। जो लोग ये अच्छे कर्म करते हैं, ये वे लोग हैं जिनमें सत्य-वास्तविकता होती है; इन्होंने गवाही दी है। यदि तू हमेशा देह के अनुसार जीता है, हमेशा अपनी स्वार्थी इच्छाओं को संतुष्ट करता है, तो ऐसे व्यक्ति में सत्य-वास्तविकता नहीं होती। यह परमेश्वर को लज्जित करने का चिह्न है। तुम कहते हो, "मैंने कुछ नहीं किया; मैंने परमेश्वर को कैसे लज्जित किया है?" तुम्हारे विचारों और ख्यालों में, तुम्हारे कार्यों के पीछे के इरादों, लक्ष्यों और मंशाओं में, और तुमने जो किया है उनके परिणामों में—हर तरीके से तुम शैतान को संतुष्ट कर रहे हो, उसके उपहास के पात्र बनकर उसे अपनी गुप्त बातें बता रहे हो जिसका वो तुम्हारे विरुद्ध इस्तेमाल कर सकता है। एक ईसाई के तौर पर तुम्हारे पास जो गवाही होनी चाहिए, वो दूर-दूर तक भी नहीं है। तुम सभी चीज़ों में परमेश्वर का नाम बदनाम करते हो और तुम्हारे पास सच्ची गवाही नहीं है। क्या परमेश्वर तुम्हारे द्वारा किए गए कृत्यों को याद रखेगा? अंत में, परमेश्वर तुम्हारे कृत्यों और कर्तव्य के बारे में क्या निष्कर्ष निकालेगा? क्या उसका कोई नतीजा नहीं निकलना चाहिए, किसी प्रकार का कोई वक्तव्य नहीं आना चाहिए? बाइबल में, प्रभु यीशु कहता है, "उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, 'हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?' तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, 'मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।'" प्रभु यीशु ने ऐसा क्यों कहा? जो लोग बीमारों को चंगा करते हैं और परमेश्वर के नाम पर दुष्टात्माओं को निकालते हैं, जो परमेश्वर के नाम पर उपदेश देने के लिए यात्रा करते हैं, वे कुकर्मी क्यों हो गए हैं? ये कुकर्मी कौन हैं? क्या ये वो लोग हैं जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते? वे सभी परमेश्वर में विश्वास करते हैं और परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। वे परमेश्वर के लिए चीजों का त्याग भी करते हैं, स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाकर कर्तव्य निभाते हैं। लेकिन अपना कर्तव्य निभाते समय उनमें भक्ति और गवाही का अभाव होता है, इसलिए यह दुष्टता करना बन गया है। इसलिए प्रभु यीशु कहता है, "हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।"

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो' से उद्धृत

मेरी पीठ पीछे बहुत-से लोग हैसियत के आशीष की अभिलाषा करते हैं, वे ठूँस-ठूँसकर खाना खाते हैं, सोना पसंद करते हैं तथा देह की इच्छाओं पर पूरा ध्यान देते हैं, हमेशा भयभीत रहते हैं कि देह से बाहर कोई मार्ग नहीं है। वे कलीसिया में अपना उपयुक्त कार्य नहीं करते, पर मुफ़्त में कलीसिया से खाते हैं, या फिर मेरे वचनों से अपने भाई-बहनों की भर्त्सना करते हैं, और अधिकार के पदों से दूसरों के ऊपर आधिपत्य जताते हैं। ये लोग निरंतर कहते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा पूरी कर रहे हैं और हमेशा कहते हैं कि वे परमेश्वर के अंतरंग हैं—क्या यह बेतुका नहीं है? यदि तुम्हारे इरादे सही हैं, पर तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में असमर्थ हो, तो तुम मूर्ख हो; किंतु यदि तुम्हारे इरादे सही नहीं हैं, और फिर भी तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना चाहिए! ऐसे लोगों से मुझे कोई सहानुभूति नहीं है! परमेश्वर के घर में वे मुफ़्तखोरी करते हैं, हमेशा देह के आराम का लोभ करते हैं, और परमेश्वर की इच्छाओं का कोई विचार नहीं करते; वे हमेशा उसकी खोज करते हैं जो उनके लिए अच्छा है, और परमेश्वर की इच्छा पर कोई ध्यान नहीं देते। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें परमेश्वर के आत्मा की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं करते। वे अपने भाई-बहनों के साथ हमेशा छल करते हैं और उन्हें धोखा देते रहते हैं, और दो-मुँहे होकर वे, अंगूर के बाग़ में घुसी लोमड़ी के समान, हमेशा अंगूर चुराते हैं और अंगूर के बाग़ को रौंदते हैं। क्या ऐसे लोग परमेश्वर के अंतरंग हो सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने लायक़ हो? तुम अपने जीवन एवं कलीसिया के लिए कोई उत्तरदायित्व नहीं लेते, क्या तुम परमेश्वर का आदेश लेने के लायक़ हो? तुम जैसे व्यक्ति पर कौन भरोसा करने की हिम्मत करेगा? जब तुम इस प्रकार से सेवा करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें कोई बड़ा काम सौंपने की जुर्रत कर सकता है? क्या इससे कार्य में विलंब नहीं होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें' से उद्धृत

वर्तमान में, तुम्हें कई कलीसियाओं की अगुवाई करने के लिए कहा जाता है, लेकिन न केवल तुम खुद का त्याग नहीं करते, बल्कि तुम अपनी ही धारणाओं और विचारों से चिपके भी रहते हो और इस तरह की बातें कहते हो, "मुझे लगता है यह काम इस तरह से किया जाना चाहिये, क्योंकि परमेश्वर ने कहा है कि हमें दूसरों के नियंत्रण में नहीं रहना चाहिए और आजकल हमें आँखें मूंदकर समर्पण नहीं करना चाहिये।" इसलिए, तुम में से हर कोई अपनी राय पर अड़ा रहता है और कोई भी एक दूसरे की बात नहीं मानता है। हालाँकि तुम स्पष्ट रूप से जानते हो कि तुम्हारी सेवा एक विकट स्थिति में पहुँच गयी है, फिर भी तुम कहते हो, "मेरे हिसाब से, मेरा रास्ता बहुत गलत नहीं है। जो भी हो, हम में से हर एक का अपना पक्ष होता है : तुम अपनी बात करो और मैं अपनी बात करूँगा; तुम अपने दर्शनों के बारे में सहभागिता करो और मैं अपने प्रवेश की बात करूँगा।" तुम कभी भी ऐसी किसी चीज़ की जिम्मेदारी नहीं लेते हो जिनका निपटारा किया जाना चाहिये या तुम बस लापरवाही से काम करते हो, तुम में से हर कोई अपनी ही राय व्यक्त करता है और दिमाग लगाकर अपने ही रुतबे, प्रतिष्ठा और साख को बचाने में लगा रहता है। तुम में से कोई भी विनम्र बनने का इच्छुक नहीं है और कोई भी पक्ष पीछे हटने और एक दूसरे की कमियों को दूर करने की पहल नहीं करेगा, ताकि जीवन ज़्यादा तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ सके। जब तुम लोग साथ मिलकर समन्वय करते हो, तो तुम्हें सत्य खोजना सीखना चाहिए। तुम कह सकते हो, "मुझे सत्य के इस पहलू की स्पष्ट समझ नहीं है। तुम्हें इसके साथ क्या अनुभव हुआ है?" या तुम लोग शायद कहो, "इस पहलू के संबंध में तेरा अनुभव मुझसे अधिक है; क्या तू कृपा करके मुझे कुछ मार्गदर्शन दे सकता है?" क्या यह एक अच्छा तरीका नहीं होगा? तुम लोगों ने ढेर सारे उपदेश सुने होंगे, और सेवा करने के बारे में तुम सबको कुछ अनुभव होगा। अगर कलीसियाओं में काम करते समय तुम लोग एक दूसरे से नहीं सीखते, एक दूसरे की मदद नहीं करते या एक दूसरे की कमियों को दूर नहीं करते हो, तो तुम कैसे कोई सबक सीख पाओगे? जब भी किसी चीज़ से तुम्हारा सामना होता है, तुम लोगों को एक दूसरे से सहभागिता करनी चाहिये ताकि तुम्हारे जीवन को लाभ मिल सके। इसके अलावा, तुम लोगों को किसी भी चीज़ के बारे में कोई भी निर्णय लेने से पहले, उसके बारे में ध्यान से सहभागिता करनी चाहिये। सिर्फ़ ऐसा करके ही तुम लापरवाही से काम करने के बजाय कलीसिया की जिम्मेदारी उठा सकते हो। सभी कलीसियाओं में जाने के बाद, तुम्हें एक साथ इकट्ठा होकर उन सभी मुद्दों और समस्याओं के बारे में सहभागिता करनी चाहिये जो अपने काम के दौरान तुम्हें पता चली हैं; फिर तुम्हें उस प्रबुद्धता और रोशनी के बारे में बात करनी चाहिये जो तुम्हें प्राप्त हुई हैं—यह सेवा का एक अनिवार्य अभ्यास है। परमेश्वर के कार्य के प्रयोजन के लिए, कलीसिया के फ़ायदे के लिये और अपने भाई-बहनों को आगे बढ़ाने के वास्ते प्रोत्साहित करने के लिये, तुम लोगों को सद्भावपूर्ण सहयोग करना होगा। तुम्हें एक दूसरे के साथ सहयोग करना चाहिये, एक दूसरे में सुधार करके कार्य का बेहतर परिणाम हासिल करना चाहिये, ताकि परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रखा जा सके। सच्चे सहयोग का यही मतलब है और जो लोग ऐसा करेंगे सिर्फ़ वही सच्चा प्रवेश हासिल कर पाएंगे। सहयोग करते समय, तुम्हारे द्वारा बोली गई कुछ बातें अनुपयुक्त हो सकती हैं, लेकिन उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। इनके बारे में बाद में सहभागिता करो, और इनके बारे में अच्छी समझ हासिल करो, इन्हें अनदेखा मत करो। इस तरह की सहभागिता करने के बाद, तुम अपने भाई-बहनों की कमियों को दूर कर सकते हो। केवल इस तरह से अपने काम की अधिक गहराई में उतर कर ही तुम बेहतर परिणाम हासिल कर सकते हो। तुम में से हर व्यक्ति, परमेश्वर की सेवा करने वाले के तौर पर सिर्फ़ अपने हितों के बारे में सोचने के बजाय, अपने हर काम में कलीसिया के हितों की रक्षा करने में सक्षम होना चाहिये। हमेशा एक दूसरे को कमतर दिखाने की कोशिश करते हुए, अकेले काम करना अस्वीकार्य है। इस तरह का व्यवहार करने वाले लोग परमेश्वर की सेवा करने के योग्य नहीं हैं! ऐसे लोगों का स्वभाव बहुत बुरा होता है; उनमें ज़रा सी भी मानवता नहीं बची है। वे सौ फीसदी शैतान हैं! वे जंगली जानवर हैं! अब भी, इस तरह की चीज़ें तुम लोगों के बीच होती हैं; तुम लोग तो सहभागिता के दौरान एक दूसरे पर हमला करने की हद तक चले जाते हो, जान-बूझकर कपट करना चाहते हो और किसी छोटी सी बात पर बहस करते हुए भी गुस्से से तमतमा उठते हो, तुम में से कोई भी पीछे हटने के लिये तैयार नहीं होता। हर व्यक्ति अपने अंदरूनी विचारों को एक दूसरे से छिपा रहा होता है, दूसरे पक्ष को गलत इरादे से देखता है और हमेशा सतर्क रहता है। क्या इस तरह का स्वभाव परमेश्वर की सेवा करने के लिये उपयुक्त है? क्या तुम्हारा इस तरह का कार्य तुम्हारे भाई-बहनों को कुछ भी दे सकता है? तुम न केवल लोगों को जीवन के सही मार्ग पर ले जाने में असमर्थ हो, बल्कि वास्तव में तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों को अपने भाई-बहनों में डालते हो। क्या तुम दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचा रहे हो? तुम्हारा ज़मीर बहुत बुरा है और यह पूरी तरह से सड़ चुका है! तुम वास्तविकता में प्रवेश नहीं करते हो, तुम सत्य का अभ्यास भी नहीं करते हो। इसके अतिरिक्त, तुम बेशर्मी से दूसरों के सामने अपनी शैतानी प्रकृति को उजागर करते हो। तुम्हें कोई शर्म है ही नहीं! इन भाई-बहनों की जिम्मेदारी तुम्हें सौंपी गई है, फिर भी तुम उन्हें नरक की ओर ले जा रहे हो। क्या तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जिसका ज़मीर सड़ चुका है? तुम्हें बिलकुल भी शर्म नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'इस्राएलियों की तरह सेवा करो' से उद्धृत

कुछ लोग अपने कर्तव्यपालन के तरीके में ग़ैरज़िम्मेदार होते हैं। इसका परिणाम घटिया कार्य होता है, जिसे हमेशा दोबारा करना पड़ता है, जिसका आगे की प्रगति पर बुरा प्रभाव पड़ता है। क्या अनुभव की कमी और व्यावसायिक अयोग्यता के अतिरिक्त भी इसके और कोई कारण होते हैं? व्यावसयिक कुशलता और अनुभव धीरे-धीरे सीखे और बढ़ाए जा सकते हैं, लेकिन यदि समस्या लोगों के स्वभाव में निहित हो, तो इस समस्या का हल कैसे निकाला जाना चाहिए? इसके लिए ज़रूरी है कि लोगों की काट-छाँट की जाए और उनसे निपटा जाए; इसके लिए ज़रूरी है कि लोग एक-दूसरे की निगरानी करें और सत्य की तलाश करें। सबसे बड़ी समस्या, जो कर्तव्य के पालन में किसी कार्य को हमेशा दोबारा किए जाने का कारण बनती है, वह व्यावसयिक अयोग्यता नहीं है और न ही वह अपर्याप्त अनुभव है; इसका कारण यह है कि लोग अत्यधिक आत्म-संतुष्ट और अभिमानी हैं, और वे सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग नहीं करते, बल्कि अकेले और मनमाने ढंग से काम करते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि जब वे कोई चीज़ पूरी करते हैं, तो उनका कार्य अपनी योग्यता के बल पर खड़ा होने में असमर्थ होता है, और इसलिए उनका प्रयास व्यर्थ हो जाता है। इसके पीछे सबसे गंभीर समस्या क्या है? (मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव।) भ्रष्ट स्वभाव अपने साथ बहुत बड़ी रुकावटें लेकर आता है। और भ्रष्ट स्वभाव के कौन-से पहलू लोगों के कर्तव्य-पालन के परिणाम को प्रभावित करते हैं? (अहंकार और आत्म-संतुष्टि।) अहंकार और आत्म-संतुष्टि व्यवहार में कैसे प्रकट होते हैं? अकेले निर्णय लेना, दूसरों की न सुनना, दूसरों के साथ परामर्श न करना, सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग न करना और हमेशा चीज़ों के बारे में अंतिम निर्णय लेने की चाहत रखना। भले ही कुछ अच्छे भाई और बहनें किसी विशेष कर्तव्य का पालन करने के लिए सहयोग कर रहे हों, किंतु उनमें से हरेक अपना कार्य भी कर रहा होता है, समूह का अगुआ अथवा प्रभारी व्यक्ति हमेशा अंतिम निर्णय लेना चाहता है; वे जो भी कर रहे होते हैं, वे सामंजस्यपूर्ण ढंग से दूसरों के साथ सहयोग नहीं करते और संगति में संलग्न नहीं होते, और वे दूसरों के साथ सर्वसम्मति पर पहुँचने से पहले ही बिना सोचे-विचारे काम करना शुरू कर देते हैं। वे सबको केवल अपनी बात सुनने के लिए मजबूर करते हैं, और समस्या इसी में है। इतना ही नहीं, दूसरे जब समस्या को देख लेते हैं, और फिर भी वे प्रभारी व्यक्ति को रोकने के लिए आगे नहीं आते, तो अंततः यह ऐसी स्थिति में परिणत हो जाता है, जहाँ इसमें शामिल हरेक व्यक्ति को अपना कार्य फिर से करना पड़ता है, और उस प्रक्रिया में स्वयं को थकाना पड़ता है। तो क्या दूसरे लोगों की भी कोई ज़िम्मेदारी है? (हाँ।) एक तरफ़, प्रभारी व्यक्ति अकेले और मनमाने ढंग से काम करता है, अपने तरीके से चीज़ों को करने पर ज़ोर देता है, और दूसरे उसे रोकने के लिए कुछ नहीं करते, और इससे भी गंभीर बात यह है कि वे उसके साथ चलते भी हैं; क्या यह उन्हें सह-अपराधी नहीं बनाता? यदि तुम इस व्यक्ति को नहीं रोकते, टोकते या उसकी असलियत सामने नहीं लाते, बल्कि इसके बजाय उसका अनुसरण करते हो और उसे स्वयं को बहकाने देते हो, तो क्या तुम उसे शैतान के उत्पीड़न-कार्य की खुली छूट नहीं दे रहे? यह निश्चित रूप से तुम्हारी समस्या है। दूसरी तरफ़, जब तुम किसी समस्या को देखते हो, लेकिन उसकी शिकायत नहीं करते, बल्कि उसकी हाँ में हाँ मिलाने की भूमिका निभाते हो, तो क्या यह निष्ठाहीनता की अभिव्यक्ति नहीं है? हाँ, ठीक यही है—परमेश्वर के प्रति निष्ठाहीनता की अभिव्यक्ति। इस समस्या को जो बात और गंभीर बनाती है, वो यह है कि तुम हमेशा शैतान के साथी के रूप में कार्य करते हो, तुम उसके नौकर और अनुयायी के रूप में सेवा करते हो, और तुममें अपने कर्तव्य और ज़िम्मेदारी के प्रति थोड़ी-सी भी निष्ठा नहीं है, लेकिन तुम शैतान के प्रति काफी निष्ठावान हो। जहाँ तक व्यावसायिक अयोग्यता की बात है, यह संभव है कि काम करने के दौरान निरंतर सीखना और अपने अनुभवों को एक-साथ लाना संभव है। ऐसी समस्याओं को आसानी से हल किया जा सकता है। परंतु जिस चीज़ का हल निकालना सबसे कठिन है, वह है मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव। यदि उसका हल न निकाला जाए, यदि तुम लोग सत्य की तलाश नहीं करते, बल्कि हमेशा पीछे हटते और दूसरों की हाँ में हाँ मिलाते रहते हो; और यदि तुम अपने कंधों पर ज़िम्मेदारी नहीं लेते, और किसी के द्वारा कुछ अनुचित कर देने पर भी तुम उस पर प्रकाश नहीं डालते या उसका पर्दाफाश नहीं करते और तुम उससे निपटते नहीं हो; और यदि तुम परमेश्वर के घर के कार्य को मज़ाक या खेल की तरह लेते हो; और यदि तुम अपने कर्तव्य और अपनी ज़िम्मेदारी का पालन नहीं करते, तब कार्य की प्रगति में बार-बार देर होती रहेगी। कर्तव्य का ऐसा निर्वहन निष्ठाहीन है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'उचित कर्तव्यपालन के लिए आवश्यक है सामंजस्यपूर्ण सहयोग' से उद्धृत

कुछ लोग जिम्मेदारी उठाने से खासतौर से डरते हैं। यदि परमेश्वर का घर उन्हें काम सौंपता है, तो वे जानना चाहते हैं कि क्या इसमें जिम्मेदारी उठाना शामिल है। जब कोई उनसे कहता है, "तुम्हें निश्चित रूप से कुछ जिम्मेदारी लेनी होगी, और यदि तुम अच्छा काम नहीं करोगे, तो तुमसे निश्चित रूप से निपटा जाएगा," तो वे कहते हैं, "तो पहले मैं इस बारे में सोच लूँ।" वे रात भर इस बारे में सोचते हैं और अगले दिन यह कहते हुए इनकार कर देते हैं, "मैंने इस पर सचमुच बहुत ध्यान से विचार किया है, और मुझे लगता है कि मैं इस कर्तव्य के उपयुक्त नहीं हूँ। मुझे लगता है कि तुम्हें किसी और को ढूँढ़ना चाहिए।" यह व्यक्ति किस चीज से इनकार कर रहा है? वह एक आज्ञा से इनकार कर रहा है। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जिन्हें जब कोई कार्य दिया जाता है तो पहले वे यह सोचते हैं कि यह आसान होगा, मानो वे अविश्वासियों के बीच कार्य कर रहे हों, ऐसा कार्य जो थोड़े-से प्रयास से ही पूरा किया जा सकता है। फिर, जब वे देखते हैं कि कार्य उतना आसान नहीं है जितना उन्होंने सोचा था, तो वे पैतरेबाजी दिखाते हैं : "जिम्मेदारी से बचने के लिए मैं अपने सामने आने वाले हर मुद्दे की सूचना तुरंत अगुआ को दूँगा और उसी को उससे निपटने दूँगा। अगुआ उसे जैसे चाहे, सँभाल सकता है। वैसे भी, मैं पहले ही अपनी सूचना दे चुका हूँगा, इसलिए उससे निपटना अगुआ का काम होगा। मैं मामले से अपना पल्ला झाड़ चुका हूँगा। अगर वह इसे अच्छी तरह से सँभाल लेता है, तो मैं यह काम करता रह सकता हूँ, और यदि वह नहीं सँभाल पाता, तो इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं होगा। मुझसे निपटा नहीं जाएगा, और कम से कम यह इतना बुरा नहीं होगा कि मुझे बरखास्त कर दिया जाए, और कलीसिया से निष्कासित तो बिलकुल नहीं किया जाएगा।" यही उनकी मंशा रहती है। नतीजतन, जैसे ही वे कोई समस्या अनुभव करते हैं, तो एकमात्र काम जो वे करते हैं, वह है अगुआ को टेलीफोन करना और उसे बताना कि वे स्वयं इसे नहीं सँभाल सकते। यदि अगुआ उन्हें बताता है कि उन्हें क्या करना चाहिए, तो वे उसे न कर पाने का कोई अन्य बहाना खोज लेते हैं और अगुआ से उसे सँभालने के लिए कहते हैं। कोई समस्या सामने आने पर वे उस पर विचार नहीं करते और उसके पीछे के सत्य-सिद्धांतों की तलाश नहीं करते, और न ही वे उससे निपटने का कोई तरीका ढूँढ़ने की कोशिश करते हैं। इसके बजाय, वे उसे सँभालने हेतु किसी अगुआ को ढूँढ़ने के लिए जो कुछ भी कर सकते हैं, करते हैं, और हमेशा अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाने की कोशिश करते हैं, बिना यह सोचे कि वे खुद उसे किस तरह सँभाल सकते हैं। क्या अपना काम इस तरह करना ईश्वर के प्रति समर्पण दिखाता है? (नहीं।) इसे जिम्मेदारी टालना और अपने कर्तव्य की उपेक्षा करना कहा जाता है। वे धूर्त तरीके से व्यवहार करते हैं और जिम्मेदारी लेने से इनकार करते हैं। वे केवल अपना श्रम देते हैं, अपना दिल नहीं। वे सोचते हैं, "अगर मैं यह जिम्मेदारी ले लूँ और अंतत: कोई गलती कर बैठूँ तो क्या होगा?" उनकी चिंताओं के केंद्र में यही बात रहती है। अच्छा, तो क्या तुम गलतियाँ न करने का प्रयास कर सकते हो? गलतियाँ सबसे होती हैं। अगर उनके इरादे सही हैं लेकिन उनके पास अनुभव की कमी है, अगर उन्होंने पहले कभी ऐसी समस्या नहीं सँभाली है और फिर भी वे वह सब-कुछ करते हैं जो वे कर सकते हैं, तो क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर इसे देखेगा? उन्हें नहीं लगता कि वह देखेगा। वे कहते हैं, "नहीं, जब समय आएगा, तो मुझे किसी गलती के लिए दोष लेना होगा। दिल से कोशिश करने का क्या फायदा? किसी को पता भी कैसे चलेगा कि मैंने पूरे दिल से कोशिश की थी? इसे कौन देखता है? क्या मैं वह व्यक्ति नहीं हूँगा, जिससे निपटा जाएगा? क्या मैं प्राथमिक जिम्मेदारी नहीं उठाऊँगा? अपने साथ होने वाले अन्याय के बारे में बात करने के लिए मैं कहाँ जा सकता हूँ?" परमेश्वर के घर में अन्याय भला कैसे हो सकता है? अगर कोई तुम्हारे साथ गलत तरीके से व्यवहार करता भी है, तो परमेश्वर उसे देख सकता है। तुम्हें इसका विश्वास होना चाहिए। परमेश्वर सभी चीजों की जाँच करता है, और वह लोगों के दिलों की भी जाँच करता है। यदि तुम इतना भी नहीं मानते, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम अपना कर्तव्य निभाते हो या नहीं। जिम्मेदारी उठाने से डरते हुए, वे कोई समस्या आने पर पहला काम किसी अगुआ को तलाशने का करते हैं। वे समस्या से पहले खुद निपटने और उसे हल करने के बजाय अगुआ को उसके बारे में बताते हैं। बेशक, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो स्वयं उस पर काम करते हुए अगुआ को सूचित करते हैं, लेकिन अन्य ऐसा नहीं करते—अगुआ को सूचित करने के बाद वे समस्या को सक्रिय होकर हल करने के बजाय बस बैठ जाते हैं और प्रतीक्षा करते हैं। वे निष्क्रियतापूर्वक आदेशों की प्रतीक्षा करते हैं। वे तभी कुछ करते हैं जब अगुआ रास्ता बताता है, और वे केवल उतना ही करते हैं, जितना अगुआ उनसे कहता है। वे तब तक कुछ नहीं करते, जब तक कि उन्हें निर्देश न दिए जाएँ, और इसके बजाय वे काम को टालते रहते हैं और इस बात का इंतजार करते हैं कि कोई उन पर चिल्लाए और उन्हें कुछ करने के लिए बाध्य करे। क्या इस तरह का व्यक्ति वास्तव में अपना कर्तव्य निभा रहा है? यह तो निष्ठा के साथ सेवा प्रदान करना भी नहीं हुआ; वे कोई कर्तव्य निभाने के योग्य नहीं हैं। कुछ लोगों को इसीलिए हटाया गया है, क्योंकि अपना कर्तव्य निभाने के प्रति उनका यही रवैया था। शायद वे अभी भी न समझते हों : "जब मैं खुद को इतने उत्साह से अपने काम में झोंक रहा था, तो मुझे इतनी रुखाई से दूर क्यों भेज दिया गया?" अब भी उन्हें समझ नहीं आ रहा है। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे शायद जीवन भर इसे नहीं समझ पाएँगे, और इसके बजाय अपने ही तर्क से इसकी व्याख्या करते रहेंगे। वे सोचते हैं : "आत्म-सुरक्षा एक स्वाभाविक भावना है, और यह एक ऐसी चीज है, जो हमें करनी चाहिए। अपनी रक्षा कौन नहीं करता? कौन अपने लिए सावधान नहीं रहता? कौन अपने लिए बचने का रास्ता नहीं छोड़ता?" यदि तुम अपनी रक्षा करते हो और अपने लिए बचाव का रास्ता छोड़ते हो, तो क्या तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो? अब तुम परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य निभा रहे हो। कर्तव्य निभाने का पहला सिद्धांत क्या है? वह यह है कि पहले तुम्हें भरसक प्रयास करते हुए अपने पूरे दिल से कर्तव्य निभाना चाहिए, ताकि तुम परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा कर सको। यह एक ऐसा सत्य-सिद्धांत है, जिसे तुम्हें अभ्यास में लाना चाहिए। अपने लिए बचाव का रास्ता छोड़ना और अपनी रक्षा करना अविश्वासियों द्वारा किए जाए जाने वाले अभ्यास का सिद्धांत है, उनका सर्वोच्च दर्शन। सभी मामलों में सबसे पहले अपने बारे में सोचना और अपने हित बाकी सब चीजों से ऊपर रखना, दूसरों के बारे में न सोचना, परमेश्वर के घर के हितों और दूसरों के हितों के साथ कोई संबंध न रखना, अपने हितों के बारे में पहले सोचना और फिर अपने बचाव के रास्ते के बारे में सोचना—क्या यह वह सब नहीं है जो एक अविश्वासी करता है? एक मानक अविश्वासी ठीक ऐसा ही होता है। इस तरह का व्यक्ति कोई कर्तव्य निभाने के योग्य नहीं है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दूसरों से केवल अपना आज्ञापालन करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर का नहीं (I)' से उद्धृत

गैरजिम्मेदारी का स्वभाव क्या होता है? यह चालाकी है। इंसान के जीवन-दर्शनों में चालाकी सबसे अधिक उलल्रेखनीय है। लोग सोचते हैं कि अगर वे चालाक न हों, तो वे दूसरों को नाराज करेंगे और खुद की रक्षा करने में असमर्थ होंगे; उन्हें लगता है कि कोई उनसे नाराज या आहत न हो जाए, इसलिए उन्हें पर्याप्त रूप से चालाक होना चाहिए, जिससे वे खुद को सुरक्षित रख सकें, अपनी आजीविका की रक्षा कर सकें, और जन-साधारण के बीच पाँव जमाने के लिए एक सुदृढ़ जगह हासिल कर सकें। अविश्वासियों की दुनिया में लोग ऐसे ही कार्य करते हैं; ऐसा क्यों है कि परमेश्वर के घर में कुछ लोग अब भी इसी तरह से कार्य करते हैं? यह देखकर कि परमेश्वर के घर के हितों को कोई बात नुकसान पहुँचा रही है, वे कुछ नहीं कहते हैं; वे यह भी कह सकते हैं, "यदि कोई और इस बारे में बोलना चाहता है, तो उसे बोलने दो—मैं यह करने नहीं जा रहा हूँ। मैं किसी को नाराज नहीं करूँगा और न ही खतरा मोल लूँगा।" यह गैरजिम्मेदारी और चालाकी है, और ऐसे लोगों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। अपने आत्म-सम्मान, अपनी प्रतिष्ठा, ईमानदारी और गरिमा की रक्षा करने के लिए, वे कहीं मिले हुए धन को उसके मालिक को लौटा देंगे, दूसरों की मदद करने में आनंद पाएँगे, एक उचित कारण के लिए अपना जीवन अर्पण कर देंगे, दूसरे के लिए कुछ भी करेंगे, और वे किसी भी कीमत को चुकाने में संकोच नहीं करते हैं। लेकिन, जब परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करना, सत्य की रक्षा करना और न्याय की रक्षा करना आवश्यक हो, तो यह सब गायब हो जाता है, और तब वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं। यह क्या मामला है? यहाँ एक स्वभाव काम कर रहा है, सत्य से घृणा करने वाला। मैं क्यों कहता हूँ कि उनके पास सत्य से घृणा करने वाला स्वभाव है? इसके पीछे यह तथ्य है कि जैसे ही कोई चीज सकारात्मक चीजों की वास्तविकता को स्पर्श करती है, तो लोग भाग खड़े होते हैं और कतरा जाते हैं। हालाँकि वे भीतर से आत्म-तिरस्कार का कुछ अंश महसूस कर सकते हैं, पर वे इस ओर ध्यान नहीं देते हैं, और इसे दबाना चाहते हैं, और सोचते हैं, "मैं ऐसा नहीं कर सकता था—यह मूर्खता होगी", या फिर उन्हें लगता है कि यह कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है, और वे इसके बारे में फिर कभी बात कर सकते हैं। जब न्याय और सकारात्मक चीजों को बनाए रखने की बात आती है, तो वे भाग जाते हैं और जिम्मेदारी लेने में असफल रहते हैं। वे आँखें मूंद लेते हैं और इस मामले को गंभीरता से नहीं लेते। यह सकारात्मक चीजों से प्रेम न करने और सत्य से घृणा करने का एक उदाहरण है। तो, इस मामले के सामने आने पर तुम्हें कैसे अभ्यास करना चाहिए? इसके सिद्धांत क्या होते हैं? अगर कोई मामला परमेश्वर के घर के हितों या परमेश्वर के लिए गवाही देने से संबंधित हो, तो तुम्हें इसे अपने ही हितों की तरह गंभीरता से लेना चाहिए, कोई भी कसर न छोड़ते हुए—सत्य और सकारात्मक चीजों से प्रेम करने वाले का, जिम्मेदारी लेने वाले का ऐसा ही रवैया होता है। यदि तुम लोगों में यह रवैया नहीं है, तथा चीजों को संभालने में लापरवाह होने के अलावा तुम और कुछ नहीं हो, और तुम सोचते हो, "मैं अपने कर्तव्य के दायरे में चीजों को करूँगा, लेकिन मुझे किसी और चीज की परवाह नहीं है। यदि तुम मुझसे कुछ पूछते हो, मैं तुम्हें उत्तर दूँगा—यदि मैं अच्छे मूड में हुआ तो। अन्यथा, मैं जवाब नहीं दूँगा। यह मेरा रवैया है", तो तुम्हारा स्वभाव इस तरह का है। केवल अपने पद, अपनी प्रतिष्ठा, अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करना, और केवल उन चीजों की रक्षा करना जो किसी के स्वयं के हितों से संबंधित हों—क्या ऐसा करके कोई किसी न्यायसंगत कारण की रक्षा करता है? क्या वह सकारात्मक चीजों की रक्षा करता है? ये ओछे, स्वार्थी इरादे सत्य से घृणा करने का स्वभाव हैं। तुम लोगों में से अधिकांश अक्सर इस प्रकार के व्यवहारों को व्यक्त करते हो, और जिस क्षण तुम किसी ऐसी बात का सामना करते हो, जो परमेश्वर के परिवार के हितों से संबंधित हो, तो तुम टालमटोल करते हो और कहते हो, "मैंने नहीं देखा...। मुझे पता नहीं...। मैंने सुना नहीं...।" चाहे तुम सचमुच कुछ नहीं जानते या सिर्फ इसका ढोंग कर रहे हो, यहाँ कुल मिलाकर एक स्वभाव काम कर रहा होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने स्‍वभाव का ज्ञान उसमें बदलाव की बुनियाद है' से उद्धृत

ज़्यादातर लोग सत्य का अनुसरण और अभ्यास करना चाहते हैं, लेकिन अधिकतर समय उनके पास ऐसा करने का कोई संकल्प और इच्छा नहीं होती है; उनके अंदर सत्य का जीवन बिल्कुल भी नहीं होता है। इसके परिणाम स्वरूप, जब लोगों का बुरी शक्तियों से वास्ता पड़ता है या ऐसे दुष्ट या बुरे लोगों से उनका सामना होता है जो बुरे कामों को अंजाम देते हैं, या जब ऐसे झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों से उनका सामना होता है जो अपना काम इस तरह से करते हैं जिससे सिद्धांतों का उल्लंघन होता है—इस तरह परमेश्वर के घर के कार्य को नुकसान उठाना पड़ता है, और परमेश्वर के चुने गए लोगों को हानि पहुँचती है—वे डटे रहने और खुलकर बोलने का साहस खो देते हैं। जब तुम्हारे अंदर कोई साहस नहीं होता, इसका क्या अर्थ है? क्या इसका अर्थ यह है कि तुम डरपोक हो या कुछ भी बोल पाने में अक्षम हो? या फ़िर यह कि तुम अच्छी तरह नहीं समझते और इसलिए तुम में अपनी बात रखने का आत्मविश्वास नहीं है? इनमें से तो कोई नहीं; बात यह है कि तुम कई प्रकार के भ्रष्ट स्वभावों द्वारा नियंत्रित किये जा रहे हो। इन सभी स्वभावों में से एक है, कुटिलता। तुम यह मानते हुए सबसे पहले अपने बारे में सोचते हो, "अगर मैंने अपनी बात बोली, तो इससे मुझे क्या फ़ायदा होगा? अगर मैंने अपनी बात बोल कर किसी को नाराज कर दिया, तो हम भविष्य में एक साथ कैसे काम कर सकेंगे?" यह एक कुटिल मानसिकता है, है न? क्या यह एक कुटिल स्वभाव का परिणाम नहीं है? एक अन्‍य स्‍वार्थी और कृपण स्‍वभाव होता है। तुम सोचते हो, "परमेश्‍वर के घर के हित का नुकसान होता है तो मुझे इससे क्‍या लेना-देना है? मैं क्‍यों परवाह करूँ? इससे मेरा कोई ताल्‍लुक नहीं है। अगर मैं इसे होते देखता और सुनता भी हूँ, तो भी मुझे कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। यह मेरी ज़ि‍म्‍मेदारी नहीं है—मैं कोई अगुआ नहीं हूँ।" इस तरह की चीज़ें तुम्‍हारे अंदर हैं, जैसे वे तुम्‍हारे अवचेतन मस्तिष्‍क से अचानक बाहर निकल आयी हों, जैसे उन्‍होंने तुम्‍हारे हृदय में स्‍थायी जगहें बना रखी हों—ये मनुष्‍य के भ्रष्‍ट, शैतानी स्‍वभाव हैं। ये भ्रष्‍ट स्‍वभाव तुम्‍हारे विचारों को नियंत्रित करते हैं और तुम्‍हारे हाथ-पैर बाँध देते हैं, और वे तुम्‍हारी ज़ुबान को नियंत्रित करते हैं। जब तुम अपने दिल में कोई बात कहना चाहते हो, तो शब्‍द तो तुम्‍हारे होठों तक पहुँचते हैं लेकिन तुम उन्‍हें बोलते नहीं हो, या, अगर तुम बोलते भी हो, तो तुम्‍हारे शब्‍द गोलमोल होते हैं, और तुम्‍हें चालबाज़ी करने की गुंजाइश देते हैं—तुम बिल्कुल साफ़-साफ़ नहीं कहते। दूसरे लोग तुम्‍हारी बातें सुनने के बाद कुछ भी महसूस नहीं करते, और तुमने जो कुछ भी कहा होता है उससे समस्‍या हल नहीं होती। तुम मन-ही-मन सोचते हो, "अच्‍छा है, मैंने बोल लिया। मेरा अन्‍त:करण निश्चिंत हुआ। मैंने अपनी ज़ि‍म्‍मेदारी पूरी कर दी।" सचाई यह है कि तुम अपने हृदय में जानते हो कि तुमने वह सब नहीं कहा है जो तुम्‍हें कहना चाहिए, कि तुमने जो कहा है उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और परमेश्‍वर के घर के कार्य का अहित ज्‍यों-का-त्‍यों बना हुआ है। तुमने अपनी ज़ि‍म्‍मेदारी पूरी नहीं की, फिर भी तुम खुल्‍लमखुल्‍ला कहते हो कि तुमने अपनी ज़ि‍म्‍मेदारी पूरी कर दी है, या जो कुछ भी हो रहा था वह तुम्‍हारे लिए स्‍पष्‍ट नहीं था। क्‍या तुम पूरी तरह अपने भ्रष्‍ट, शैतानी स्‍वभाव के वश में नहीं हो? भले ही तुम अपने दिल में जो सोचते और जिन चीजों को सही मानते हो, वे सकारात्मक और सत्य के अनुरूप हों, फिर भी अपने मुँह पर तुम्हारा वश नहीं है, और तुम जो कहते हो, वह जो तुम्हारे दिल में है, उससे कभी मेल नहीं खाता। जोर से बोले जाने से पहले तुम्हारे शब्द हमेशा तुम्हारे दिमाग और विचारों के माध्यम से संसाधित होते हैं। दूसरे लोग उनके पीछे का अर्थ नहीं बता सकते, और तुम स्वयं से बहुत प्रसन्न महसूस करते हो। तुम वास्तव में इस बात की परवाह नहीं करते कि काम हुआ या नहीं—यह तुम्हारी मानसिकता है। तुम्हारा शैतानी, भ्रष्ट स्वभाव तुम्हें नियंत्रित कर रहा है; तुम तो अपने मुँह के मालिक भी नहीं हो। भले ही तुम ईमानदारी भरे शब्दों को कहना चाहते हो, लेकिन इसके बावजूद तुम ऐसा करने में असमर्थ होने के साथ-साथ डरते भी हो। तुम्हें जो करना चाहिए, जो बातें तुमको कहनी चाहिए, जो ज़िम्मेदारियाँ तुम्हें निभानी चाहिए, उनका दस हज़ारवाँ हिस्सा भी तुम नहीं कर पा रहे; तुम्हारे हाथ-पैर, तुम्हारे शैतानी, भ्रष्ट स्वभाव से बंधे हुए हैं। इन पर तुम्हारा कोई नियंत्रण नहीं है। तुम्हारा शैतानी, भ्रष्ट स्वभाव तुम्हें यह बताता है कि बात कैसे करनी है, और तुम उसी तरीके से बात करते हो; यह तुम्हें बताता है कि क्या करना चाहिए और फ़िर तुम वही करते हो। अपने दिल में तुम सोचते हो, "मैं इस बार कड़ी मेहनत करने वाला हूँ, और मैं परमेश्वर से प्रार्थना करूँगा। मुझे दृढ़ रहना है और उन लोगों को फटकारना है, जो परमेश्वर के घर के काम में बाधा डालते हैं, जो अपने कर्तव्य के प्रति गैरजिम्मेदार हैं। मुझे यह जिम्मेदारी सँभालनी चाहिए।" तो बड़ी मुश्किल से तुम हिम्मत जुटाते और बोलते हो। नतीजतन, जैसे ही दूसरा व्यक्ति क्रोधित होता है, तुम स्तब्ध महसूस करते हो और पीछे हट जाते हो। क्या तुम वास्तव में प्रभारी हो? तुम्हारे साहस का क्या उपयोग हुआ? तुम्हारा दृढ़ निश्चय और संकल्प किस काम आया? वे बेकार रहे। तुम सभी लोग निश्चित रूप से कई बार ऐसी परिस्थितियों का सामना कर चुके हो, और अंत में तुम सभी यह कहते हुए दया की याचना करते हो, "सब खत्म हो गया। मुझे सत्य से प्रेम नहीं है, ऐसा लगता है कि मुझे बाहर निकाल दिया गया है और मैं सत्य का अनुसरण करने में असमर्थ हूँ।" यह सच है कि तुम्हें सत्य से प्रेम नहीं है, लेकिन क्या तुम सत्य का अनुसरण करते रहे हो? तुम सत्य की खोज नहीं करते, सत्य का अभ्यास तो तुम और भी कम करते हो, फिर भी तुम प्रार्थना करते रहते हो, अपना निश्चय दृढ़ करते हो, संकल्प करते हो और शपथ लेते हो। यह सब करके तुम्हें क्या मिला है? तुम अब भी हर बात का समर्थन करने वाले व्यक्ति ही हो : "मैं किसी को नहीं उकसाऊंगा और न ही मैं किसी को नाराज करूँगा। अगर कोई बात मेरे किसी मतलब की नहीं है, तो मैं इससे दूर ही रहूँगा; मैं उन चीजों के बारे में कुछ नहीं कहूँगा जिनका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है, इनमें कोई अपवाद नहीं है। अगर कोई चीज़ मेरे हितों, मेरे रुतबे या मेरे आत्म-सम्मान के लिए हानिकारक है, तब भी मैं इस पर कोई ध्यान नहीं दूँगा, इन सब चीज़ों पर सावधानी बरतूंगा; मुझे बिना सोचे-समझे काम नहीं करना चाहिए। जो कील बाहर निकली होती है, सबसे पहली चोट उसी पर की जाती है और मैं इतना बेवकूफ नहीं हूँ!" तुम पूरी तरह से दुष्टता, कपट, कठोरता और सत्य से नफ़रत करने वाले अपने भ्रष्ट स्वभावों के नियंत्रण में हो। वे तुम्हें ज़मीन पर गिरा रहे हैं, ये तुम्हारे लिये इतने कठोर हो गये हैं कि तुम सुनहरे छल्ले वाले सुरक्षा कवच को पहनकर भी इसे बरदाश्त नहीं कर सकते। भ्रष्ट स्वभाव के नियंत्रण में रहना हद से ज़्यादा थकाऊ और कष्टदायी है! मुझे यह बताओ कि अगर तुम लोग सत्य का अनुसरण नहीं करोगे तो क्या तुम्हारे लिए अपनी भ्रष्टता से छुटकारा पाना आसान होगा? क्या इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है? मैं तुम्हें बता रहा हूँ कि अगर तुम लोग सत्य का अनुसरण नहीं करोगे और अपने विश्वास को लेकर भ्रमित रहोगे, तो वर्षों तक धर्मोपदेश सुनने का भी कोई लाभ नहीं होगा, और अगर तुम आखिर तक यही करते रहे तो ज्यादा-से ज्यादा तुम एक धार्मिक ढोंगी और एक फरीसी बनकर रह जाओगे, और बस यही इसका अंत होगा। अगर तुम इससे भी बुरी स्थिति में पहुँच जाते हो, तो एक ऐसा समय आ सकता है जब तुम प्रलोभन के शिकार हो जाओ और तुम अपने कर्तव्य से च्युत होकर परमेश्वर को धोखा दे दो। तुम गिर चुके होगे। तुम हमेशा गर्त के कगार पर रहोगे! इस समय, सत्य का अनुसरण करने से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। किसी भी दूसरी चीज का अनुसरण करना व्यर्थ है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो सत्य का अभ्यास करते हैं केवल वही परमेश्वर का भय मानने वाले होते हैं' से उद्धृत

अधिकांश लोग जब कोई कौशल सीख लेते हैं, और जब वे किसी काम में विशिष्ट योग्यता प्राप्त कर लेते हैं, तो वे अहंकारी हो जाते हैं, वे खुद को असाधारण समझने लगते हैं और अपनी उपलब्धि से इतने संतुष्ट हो जाते हैं कि फिर कुछ और नहीं करते। वे किसी दूसरे की कोई बात नहीं सुनते, और उस मामले में खुद को बेजोड़ समझने लगते हैं—यह कैसा स्वभाव है? यह अहंकार और अतर्कशीलता है। मान लो कुछ लोग अपना कोई कर्तव्य निभा रहे हैं, और कोई दूसरा उन्हें इसकी योजना उपलब्ध करवा रहा है। उस समय वे बहुत अनुकूल रवैया अपनाते हैं और इस पर पूरा ध्यान देते हैं, पर पीठ फेरते ही वे इसे भूल जाते हैं और इस पर अमल करने का कोई इरादा न रखते हुए इसे अपने दिमाग के पीछे धकेल देते हैं। यह किस तरह का रवैया है, और यह किस तरह का स्वभाव है? यह आत्म-तुष्टि और अहंकार भरा स्वभाव है। क्या इसके भीतर कोई अड़ियलपन है? हरेक व्यक्ति के भीतर कुछ-न-कुछ अड़ियलपन और अहंकार होता है। जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से कोई ऐसी बात सुनता है जो सही है और उचित है, तो अगर वे इस मामले में सामान्य मानवता का तर्कशील रवैया अपनाते हैं तो उन्हें लगेगा कि उन्हें इस सुझाव को स्वीकार कर लेना चाहिए। क्या इसका अर्थ अनिवार्य रूप से यही होगा कि वे इसे अमल में लाने में भी सक्षम होंगे? ऐसा करने के लिए उनके रवैये और उनकी मानसिक अवस्था को कैसा होना चाहिए? सबसे पहले तो, उनके लिए अपनी पहले से गढ़ी गई कल्पनाओं, आकलनों या गलतफहमियों का त्याग करना जरूरी है, और फिर सही चीजों का निचोड़ निकालकर उनका निरीक्षण करना और ध्यान से उन पर चिंतन-मनन करना जरूरी है, ताकि खुद को उनके अनुरूप ढाला जा सके और उन्हें अमल में लाया जा सके। यह एक अहंकारी रवैया नहीं है, यह एक तरह का ईमानदारी और जिम्मेदारी भरा रवैया है। यह सत्य को स्वीकार करने और सकारात्मक चीजों से प्रेम करने का रवैया है। यह भी हो सकता है कि, उस समय दूसरे व्यक्ति के सुझाव बहुत अच्छे प्रतीत हों, और झेंप से बचने या अपना अनाड़ीपन न दिखाने के इरादे से, वे उस समय इससे सहमत हो जाएँ। फिर बाद में अपने काम में जुटने के बाद, अगर वे सिर्फ वह करें जो उन्हें करने की जरूरत है, जो वे करना चाहते हैं, और उस सुझाव को दरकिनार कर दें, तो क्या यह रवैया सत्य के अभ्यास का रवैया है? इस तरह का रवैया बहुत घृणित रवैया है। ऊपर-ऊपर से वे अपने सिर हिलाते हुए सब कुछ स्वीकार करते रहते हैं, और पूरे दिल से सहमति जताते हुए यह कहते हैं, "यह मुझ पर छोड़ दो। बिल्कुल चिंता न करो, मैं वादा करता हूँ कि पूरा ध्यान रखूँगा। क्या तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है? क्या तुम्हें पता नहीं कि मैं किस तरह का व्यक्ति हूँ?" वे बहुत विश्वसनीय और ईमानदार प्रतीत होते हैं, लेकिन जब मामलों को संभालने का समय आता है, फिर उनका रवैया बदलने लगता है और उनके अपने विचार सामने आने लगते हैं : "मेरा यह ख्याल है, और मुझे लगता है कि यह बहुत बढ़िया है, इसलिए मैं इसे अपने तरीके से करूँगा।" उन्हें याद नहीं रहता कि दूसरे व्यक्ति ने उनसे क्या कहा था, वे उसे अमल में नहीं लाते, और इसकी बजाय उसे अपने दिमाग के पीछे धकेल देते हैं। यह अहंकार और विद्रोहीपन है; यह सत्य को स्वीकार करने में विफलता है, और अपनी खुद की इच्छा को ऊपर रखना है। उनके अपने विचार और दृष्टिकोण हावी हो जाते हैं, और वे सत्य-सिद्धांतों, सकारात्मक चीजों और परमेश्वर के वचनों को अपने दिमाग के पीछे धकेल देते हैं।

कुछ लोग दूसरों के सामने अपना कर्तव्य निर्वाह बड़ी अच्छी तरह से करते हैं, लेकिन बाद में वे उस तरह से काम नहीं करते और सोचते हैं, "सिद्धांतों के अनुसार काम करना कितना झंझट भरा और थकाऊ काम है। इसमें समय भी बहुत लगता है और बहुत सारी चर्चा भी करनी पड़ती है। मैं झंझट से बचने के लिए इसे इस तरह से करूँगा। अगर वे इससे सहमत न भी हों तो भी उन्हें मेरे तरीके से ही काम करना होगा। जो मैं कहता हूँ वही होगा!" यह कैसा रवैया है? यह चालाकी है। जब वे किसी बात से सहमत होते हैं, तो उस समय वे ईमानदार, निष्ठावान, निश्छल और पावन प्रतीत होते हैं, और दूसरों के सुझावों और सत्य को स्वीकार करते हुए दिखाई देते हैं। पर जब उनका काम करने का समय आता है तो यह सब बदल जाता है। यह बदलाव क्यों आता है? उनका रवैया पूरी तरह क्यों बदल जाता है? ऐसा किस कारण से होता है? उन्हें लगता है कि यह शरीर के लिए बहुत कष्टदायक है, कि यह बहुत झंझट वाला है, इसलिए वे अनिच्छुक और प्रेरणाविहीन हो जाते हैं। वे यह परवाह नहीं करते कि उस समय उन्होंने क्या वादा किया था या किस बात के लिए सहमति जताई थी, या क्या वे चीजों को सिद्धांतों के अनुसार कर रहे हैं। उनके लिए अपने शरीर को संतुष्ट करना सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है—यह पहला स्थान ले लेता है। परमेश्वर के आदेशों को पिछली पंक्ति में रख दिया जाता है, उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता। क्या ऐसा व्यक्ति जिम्मेदारी उठाने वाला व्यक्ति है? क्या ऐसा व्यक्ति विश्वसनीयता वाला व्यक्ति है? क्या ऐसा व्यक्ति सत्य से प्रेम करने वाला व्यक्ति है? कुछ ऐसे लोग भी हैं जो किसी दूसरे को पूरी तरह आश्वस्त करने के लिए उनके सामने यह गारंटी देंगे कि वे बहुत अच्छी तरह से काम कर सकते हैं; वे कहते हैं कि उन्हें इसे करने के सिद्धांत याद हैं। लेकिन जैसे ही वे इस पर काम करना शुरू करते हैं, समस्याएँ आने लगती हैं। वे शुरू में ही यह सोचने लगते हैं, "इस तरीके से काम करने से मुझे थोड़ा नुकसान होगा, मेरा गर्व आहत होगा, और दूसरे मुझे नीची नजर से देखेंगे। मेरे खुद के अभिमान, आत्म-सम्मान, रुतबे और गरिमा पर आंच आएगी, और अगर मैं इस काम को अच्छे तरीके से करना चाहता हूँ, तो मुझे बहुत मेहनत करनी होगी और इस पर बहुत सोच-विचार करना होगा। शायद मैं कई दिनों तक ठीक-से सो या खा भी न पाऊँ। इस बार मुझे खुद को पूरी तरह खपा देना चाहिए, और पूरा जोर लगा देना चाहिए। मुझे दाँत भींचकर यह काम पूरा करना चाहिए। मुझे इसे सत्य-सिद्धांतों के अनुसार करना है, अपने गर्व या प्रतिष्ठा पर कोई ध्यान नहीं देना है, बल्कि परमेश्वर के घर के हितों को सबसे पहले और सबसे ऊपर रखना है।" दो दिन बाद शीशे में अपनी शक्ल देखते हुए वे सोचते हैं, "मैं कितना बेहाल लग रहा हूँ! पिछले दो दिनों ने मुझे कितना थका दिया है, मेरा वजन भी घट गया है। मैं इस तरह काम नहीं कर सकता, नहीं तो मेरा और बुरा हाल हो जाएगा। मुझे कोई आसान रास्ता ढूँढना होगा। मैं इसे अब भी पूरा कर सकता हूँ, पर इसे करते हुए मैं कष्ट नहीं उठाने वाला। आखिर में, मैं जैसे-तैसे इसे निपटा लूँगा, किसी तरह खानापूर्ति कर लूँगा।" इसके बाद, वे मेहनत करना छोड़ देते हैं और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा से पल्ला झाड़ लेते हैं। वे सोचते हैं, "मैं जैसे-तैसे यह कर्तव्य निभाता रहूँगा। जब तक मेरे खुद के हितों को कोई नुकसान नहीं पहुँचता, तब तक सब ठीक है।" उनका रवैया बदल जाता है, है ना? क्या वे अब भी श्रद्धावान हैं? (नहीं)। क्या वे अब भी अपना सर्वस्व अपने कर्तव्य में झोंकने में सक्षम हैं? अपना सर्वोत्तम प्रयास करने में सक्षम हैं? उनका आत्म-प्रेम से भरा हृदय उजागर हो चुका है। अगर उनके खुद के हितों को नुकसान होता हो, तो वे हाथ खड़े कर देते हैं। वे सत्य को भले ही कितनी ही अच्छी तरह से जानते हों, पर खुद की चमड़ी को कष्ट से बचाना उनके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है। उनके अपने हितों को कोई नुकसान नहीं होना चाहिए। जैसे ही कोई ऐसी चीज सामने आती है जिससे उनके अपने हितों पर आंच आए, वे हाथ खड़े कर देते हैं—यह एक व्यक्ति के रूप में उनका सबसे ऊंचा मापदंड है। क्या यह एक जिम्मेदारी भरा रवैया है? क्या यह एक गलत राह अपनाना नहीं है? क्या वे बुरे काम नहीं करने जा रहे? दूसरों को ऐसा लगता है कि वे अपना काम करने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, और वे इसे बहुत अच्छी तरह से करते हैं। पर परमेश्वर को यह कैसा लगता है? क्या परमेश्वर इस तरह के व्यवहार को याद रखता है? क्या परमेश्वर लोगों के दिल और दिमाग की जांच करता है? (वह करता है।) और परमेश्वर इस जांच-पड़ताल में क्या पाता है? वह पाता है कि लोग अपने कर्तव्य में मोल-भाव करने की कोशिश कर रहे हैं, वह पाता है कि लोगों के दिलों में छल और कपट भरा है, वह पाता है कि वे शरीर के हितों की कामना करते हैं, कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते, बल्कि वे सत्य से त्रस्त हो चुके हैं। क्या लोग खुद इन बातों को जान सकते हैं? (नहीं, वे नहीं जान सकते।) क्यों नहीं जान सकते? वे जीवित रहने के लिए अपने भीतर की जिन चीजों पर भरोसा करते हैं वे शैतान के भ्रष्ट स्वभाव हैं, और उनका सार शैतान का सार है। लोग अपने जीवन में इन चीजों पर निर्भर रहते हैं, और अपने खुद के व्यक्तित्व, रुतबे, अस्मिता और दैहिक हितों को कायम रखना उनकी दूसरी प्रकृति बन जाती है। इसलिए, सत्य का अभ्यास करना, चीजों को परमेश्वर की अपेक्षाओं और सत्य-सिद्धांतों के अनुसार करना, परमेश्वर के घर के हितों को कायम रखना, परमेश्वर का आज्ञापालन करना, परमेश्वर के वचनों का पूरी तरह से अनुसरण करना, परमेश्वर की इच्छा के अनुसार और सत्य की अपेक्षाओं और मापदंडों के अनुसार चलना, उनके लिए बड़ी मेहनत का काम है—यह बहुत थका देने वाला है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने स्‍वभाव का ज्ञान उसमें बदलाव की बुनियाद है' से उद्धृत

अपना कर्तव्य पूरा करते हुए अगर तुम कोई कठिनाई अनुभव करो, तो तुम्हें उसे सुलझाना चाहिए; अनसुलझी कठिनाइयाँ हमेशा बनी रहती हैं और समय के साथ बदतर हो जाती हैं। बदतर होने से मेरा क्या मतलब है? मेरा मतलब है कि यदि तुम अपनी कठिनाई को सुलझाते नहीं, तो वह तुम्हारी स्थिति को प्रभावित करेगी, और साथ ही अन्य लोगों को भी प्रभावित करेगी। जैसे-जैसे समय गुज़रेगा, तुम्हारी कठिनाई तुम्हें अपना कर्तव्य अच्छी तरह पूरा करने से, सत्य को समझने से और परमेश्वर के आगे आने से रोकेगी। ये सभी समस्याएँ हैं, है न? यह एक गंभीर समस्या है, कोई मामूली समस्या नहीं। व्यक्ति की शिकायतें, आक्रोश, परमेश्वर के बारे में गलत धारणाएँ, परमेश्वर के परिवार के संबंध में गलतफहमियाँ, दूसरों के बारे में पूर्वाग्रह और लोगों से अनबन—समय के साथ, जैसे-जैसे अंदर ये चीज़ें अधिकाधिक बढ़ती जाती हैं, इनके परिणाम क्या होते हैं? ये तुम्हें सत्य की वास्तविकता के पथ पर ले जाती हैं, या बुरे मनुष्यों के पथ पर? उस पथ पर क्या तुम बेहतर से बेहतर होगे या बदतर से बदतर? (बदतर से बदतर।) कितने बदतर? जब ये चीज़ें एक लंबे समय तक लोगों के अंदर बढ़ती जाती हैं, तो उनका विश्वास धीरे-धीरे गायब हो जाता है; जब उनका तथाकथित विश्वास गायब हो जाता है, तो उनका उत्साह भी चला जाता है। जब उनका उत्साह चला जाता है, तो क्या उनमें अपने कर्तव्य पूरे करने की ऊर्जा और इच्छा-शक्ति कम से कमतर नहीं होती जाएगी? वे परमेश्वर में विश्वास के आनंद को महसूस करने में अक्षम हो जाते हैं, अपने कर्तव्य पूरे करने के दौरान उसके आशीष महसूस नहीं कर पाते; और इस प्रकार वे अपनी आंतरिक शक्ति नहीं ढूँढ़ पाते, और वे शिकायतों, नकारात्मकता, धारणाओं और गलतफहमियों से भर जाते हैं और उनसे नियंत्रित होने लगते हैं। जब वे इन चीज़ों के बीच रहते हैं, उनसे घिर जाते हैं और उनसे नियंत्रित होते हैं, तो वे अपने कर्तव्य पूरे करते हुए केवल उन्हें झेलकर बेमन से ही प्रयास कर पाते हैं; वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें उन्हें धीरज और आत्म-संयम पर भरोसा करना चाहिए। वे परमेश्वर के मार्गदर्शन और उसके आशीष नहीं देख पाते। फिर क्या होता है? चाहे वे कैसे भी अपने कर्तव्य पूरे करें, वे सिद्धांतों को पाने में अक्षम होते हैं। जैसे-जैसे वे इसे जारी रखते हैं, वे अधिकाधिक संभ्रमित हो जाते हैं और आगे का रास्ता नहीं ढूँढ़ पाते, और अपने कर्तव्य पूरे करने का सारा जोश गँवा देते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मानव सदृशता पाने के लिए आवश्यक है अपने समूचे हृदय, मन और आत्मा से अपना कर्तव्य सही-सही पूरा करना' से उद्धृत

पिछला: 3. अपना कर्तव्य निभाने और सेवा करने में क्या अंतर है

अगला: 5. अपना कर्तव्य सही तरह से कैसे निभाया जा सकता है

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

संबंधित सामग्री

3. अंत के दिनों में अपना न्याय का कार्य करने के लिए परमेश्वर मनुष्य का उपयोग क्यों नहीं करता, बल्कि देहधारण कर उसे स्वयं क्यों करता है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :न्याय का कार्य परमेश्वर का अपना कार्य है, इसलिए स्वाभाविक रूप से इसे परमेश्वर द्वारा ही किया जाना चाहिए; उसकी...

5. यह क्यों कहा जाता है कि परमेश्वर के दो देहधारण, देहधारण का अर्थ पूरा करते हैं

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :प्रथम देहधारण मनुष्य को पाप से छुटकारा देने के लिए था, उसे यीशु की देह के माध्यम से छुटकारा देने के लिए था,...

2. यह क्यों कहा जाता है कि भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की अधिक आवश्यकता है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :परमेश्वर द्वारा मनुष्य को सीधे पवित्रात्मा की पद्धति और पवित्रात्मा की पहचान का उपयोग करके नहीं बचाया जाता,...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें