1. कर्तव्य क्या है और इसे कैसे समझना चाहिए

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मानवजाति के एक सदस्य और एक सच्चे ईसाई होने के नाते अपने मन और शरीर परमेश्वर के आदेश की पूर्ति करने के लिए समर्पित करना हम सभी का उत्तरदायित्व और कर्तव्य है, क्योंकि हमारा संपूर्ण अस्तित्व परमेश्वर से आया है, और वह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण अस्तित्व में है। यदि हमारे मन और शरीर परमेश्वर के आदेश और मानवजाति के धार्मिक कार्य के लिए नहीं हैं, तो हमारी आत्माएँ उन लोगों के योग्य नहीं होंगी, जो परमेश्वर के आदेश के लिए शहीद हुए थे, और परमेश्वर के लिए तो और भी अधिक अयोग्य होंगी, जिसने हमें सब-कुछ प्रदान किया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है' से उद्धृत

मनुष्य के कर्तव्य और वह धन्य है या शापित, इनके बीच कोई सह-संबंध नहीं है। कर्तव्य वह है, जो मनुष्य के लिए पूरा करना आवश्यक है; यह उसकी स्वर्ग द्वारा प्रेषित वृत्ति है, जो प्रतिफल, स्थितियों या कारणों पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। केवल तभी कहा जा सकता है कि वह अपना कर्तव्य पूरा कर रहा है। धन्य होना उसे कहते हैं, जब कोई पूर्ण बनाया जाता है और न्याय का अनुभव करने के बाद वह परमेश्वर के आशीषों का आनंद लेता है। शापित होना उसे कहते हैं, जब ताड़ना और न्याय का अनुभव करने के बाद भी लोगों का स्वभाव नहीं बदलता, ऐसा तब होता है जब उन्हें पूर्ण बनाए जाने का अनुभव नहीं होता, बल्कि उन्हें दंडित किया जाता है। लेकिन इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उन्हें धन्य किया जाता है या शापित, सृजित प्राणियों को अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए; वह करते हुए, जो उन्हें करना ही चाहिए, और वह करते हुए, जिसे करने में वे सक्षम हैं। यह न्यूनतम है, जो व्यक्ति को करना चाहिए, ऐसे व्यक्ति को, जो परमेश्वर की खोज करता है। तुम्हें अपना कर्तव्य केवल धन्य होने के लिए नहीं करना चाहिए, और तुम्हें शापित होने के भय से अपना कार्य करने से इनकार भी नहीं करना चाहिए। मैं तुम लोगों को यह बात बता दूँ : मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य का निर्वाह ऐसी चीज़ है, जो उसे करनी ही चाहिए, और यदि वह अपना कर्तव्य करने में अक्षम है, तो यह उसकी विद्रोहशीलता है। अपना कर्तव्य पूरा करने की प्रक्रिया के माध्यम से मनुष्य धीरे-धीरे बदलता है, और इसी प्रक्रिया के माध्यम से वह अपनी वफ़ादारी प्रदर्शित करता है। इस प्रकार, जितना अधिक तुम अपना कार्य करने में सक्षम होगे, उतना ही अधिक तुम सत्य को प्राप्त करोगे, और उतनी ही अधिक तुम्हारी अभिव्यक्ति वास्तविक हो जाएगी। जो लोग अपना कर्तव्य बेमन से करते हैं और सत्य की खोज नहीं करते, वे अंत में हटा दिए जाएँगे, क्योंकि ऐसे लोग सत्य के अभ्यास में अपना कर्तव्य पूरा नहीं करते, और अपना कर्तव्य पूरा करने में सत्य का अभ्यास नहीं करते। ये वे लोग हैं, जो अपरिवर्तित रहते हैं और शापित किए जाएँगे। उनकी न केवल अभिव्यक्तियाँ अशुद्ध हैं, बल्कि वे जो कुछ भी व्यक्त करते हैं, वह दुष्टतापूर्ण होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर' से उद्धृत

कर्तव्य क्या है? कर्तव्य तुम लोगों द्वारा प्रबंधित नहीं है—यह तुम्हारा अपना कार्यक्षेत्र या तुम्हारी अपनी रचना भी नहीं है। इसकी बजाय, यह परमेश्वर का कार्य है। परमेश्वर के कार्य के लिए तुम लोगों के सहयोग की आवश्यकता है, जो तुम लोगों के कर्तव्य को उत्पन्न करता है। परमेश्वर के कार्य का वह हिस्सा जिसमें मनुष्य को अवश्य सहयोग करना चाहिए वह है उसका कर्तव्य। कर्तव्य परमेश्वर के कार्य का एक हिस्सा है—यह तुम्हारा कार्यक्षेत्र नहीं है, तुम्हारा घरेलू मामला नहीं है, और न ही यह तुम्हारा व्यक्तिगत मामला है। चाहे तुम्हारा कर्तव्य आंतरिक या बाहरी मामलों से निपटना हो, यह परमेश्वर के घर का कार्य है, यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना के एक हिस्से का निर्माण करता है, और यही वह आदेश है जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है। यह तुम लोगों का व्यक्तिगत कारोबार नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य के सिद्धांतों की खोज करके ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाया जा सकता है' से उद्धृत

कर्तव्य अस्तित्व में कैसे आता है? आम तौर पर कहें, तो यह मानवता का उद्धार करने के परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आता है; ख़ास तौर पर कहें, तो जब परमेश्वर का प्रबंधन-कार्य मानवजाति के बीच खुलता है, तब विभिन्न कार्य उत्पन्न होते हैं, जिन्हें करने की आवश्यकता होती है, और उन्हें पूरा करने के लिए लोगों का सहयोग चाहिए। इसने लोगों द्वारा पूरे किए जाने के लिए जिम्मेदारियों और विशेष कार्यों को जन्म दिया है, और यही जिम्मेदारियाँ और विशेष कार्य वे कर्तव्य हैं, जो परमेश्वर मानवजाति को सौंपता है। इसलिए, परमेश्वर के घर में, विभिन्न कार्य जिसमें लोगों के सहयोग की आवश्यकता है, वे कर्तव्य हैं जिन्हें उन्हें पूरा करना चाहिए। तो, क्या बेहतर और बदतर, बहुत ऊँचा और नीच या महान और छोटे के अनुसार कर्तव्यों के बीच अंतर हैं? ऐसे अंतर नहीं होते; यदि किसी चीज़ का परमेश्वर के प्रबंधन कार्य के साथ कोई लेना-देना हो, उसके कार्य को कार्यान्वित करने की आवश्यकता हो या उसके घर के काम की आवश्यकता हो, तो यह व्यक्ति का कर्तव्य होता है। यह कर्तव्य की परिभाषा और उत्पत्ति है। परमेश्वर के प्रबंधन कार्य के बिना, क्या पृथ्वी के लोगों के पास—चाहे वे कैसे भी रहते हों—कर्तव्य होंगे? (नहीं।) अब तुम स्पष्ट रूप से देख सकते हो कि सृजित प्राणियों के कर्तव्यों और मानवजाति के उद्धार के परमेश्वर के प्रबंधन कार्य में एक प्रत्यक्ष संबंध है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर द्वारा मानवजाति के उद्धार के बिना और उस प्रबंधन कार्य के बिना जो उसने पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच आरम्भ किया है, लोगों के पास बताने के लिए कोई कर्तव्य न होता। इसे इस परिप्रेक्ष्य से देखते हुए, परमेश्वर का अनुसरण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए कर्तव्य महत्वपूर्ण है, है न? मोटे तौर पर, तुम परमेश्वर की प्रबंधन योजना के काम में हिस्सा ले रहो हो; खासतौर पर, तुम परमेश्वर के विभिन्न प्रकार के कामों में सहयोग कर रहे हो, जिनकी अलग-अलग समय और लोगों के अलग-अलग समूहों के बीच में आवश्यकता है। भले ही तुम्हारा कर्तव्य जो भी हो, यह परमेश्वर ने तुम्हें एक लक्ष्य दिया है। कभी-कभी शायद तुम्हें किसी महत्वपूर्ण वस्तु की देखभाल या सुरक्षा करने की ज़रूरत पड़ सकती है। यह अपेक्षाकृत एक नगण्य-सा मामला हो सकता है जिसे केवल तुम्हारी ज़िम्मेदारी कहा जा सकता है, लेकिन यह एक ऐसा कार्य है जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है; इसे तुमने परमेश्वर से प्राप्त किया है। इसे व्यापक शब्दों में कहें, तो परमेश्वर तुम्हें आदेश देता है जो सुसमाचार को फैलाने या किसी कलीसिया की अगुआई करने के लिए हो सकता है, या ऐसा काम हो सकता है जो और भी जोखिम भरा और महत्वपूर्ण हो। खैर, चाहे जो हो, अगर इसका संबंध परमेश्वर और उसके घर के काम से है, तो लोगों को इसे परमेश्वर से प्राप्त कर्तव्य के रूप में स्वीकार करना चाहिए। इसे और भी व्यापक शब्दों में कहें तो, कर्तव्य व्यक्ति का लक्ष्य होता है, परमेश्वर द्वारा सौंपा गया आदेश होता है; खासतौर पर, यह तुम्हारा दायित्व है, तुम्हारी बाध्यता है। ऐसा मानते हुए कि यह तुम्हारा लक्ष्य है, परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपा गया आदेश है, तुम्हारा दायित्व और बाध्यता है, इसका तुम्हारे व्यक्तिगत मामलों से कोई लेना-देना नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'कर्तव्‍य का समुचित निर्वहन क्‍या है?' से उद्धृत

परमेश्वर के सृजित प्राणियों को अपना कर्तव्य निभाना चाहिए; तुम परमेश्वर के प्रभुत्व में जीते हो, परमेश्वर द्वारा प्रदान की गई हर चीज़ को, उस हर चीज़ को जो परमेश्वर से आती है, तुम स्वीकार करते हो और इसलिए, तुम्हें अपनी ज़िम्मेदारियों और अपने दायित्वों को पूरा करना चाहिए—यह तुम्हारा कर्तव्य है। इससे यह देखा जा सकता है कि मानवजाति के लिए परमेश्वर के सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना इंसान की दुनिया में रहते हुए किए गए किसी भी अन्य काम से कहीं अधिक धार्मिक, सुंदर और भद्र होता है; मानवजाति के बीच कुछ भी इससे अधिक सार्थक या योग्य नहीं होता, और परमेश्वर के एक सृजित प्राणी के कर्तव्य को पूरा करने की तुलना में अन्य कुछ भी परमेश्वर के किसी जीव के जीवन के लिए अधिक अर्थपूर्ण और मूल्यवान नहीं है। परमेश्वर के एक जीव के लिए परमेश्वर के एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने में सक्षम होना, सृष्टिकर्ता को संतुष्ट करने में सक्षम होना, मानवजाति के बीच सबसे अद्भुत चीज़ होती है, और यह कुछ ऐसा है जिसे मानव जाति के बीच प्रशंसित होना चाहिए। परमेश्वर के जीवों को सृष्टिकर्ता द्वारा सौंपी गई कोई भी वस्तु नि:शर्त स्वीकार करनी चाहिए; मानवजाति के लिए, यह एक धन्य और शानदार बात होती है, और समस्त मानवजाति के लिए जो परमेश्वर के एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाते हों, कुछ भी इससे अधिक अद्भुत या स्मरणीय नहीं होता है—यह एक सकारात्मक चीज़ है। और जहाँ तक प्रश्न यह है कि उन लोगों के साथ जो परमेश्वर के सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करते हैं, सृष्टिकर्ता कैसा व्यवहार करता है और वह उनसे क्या वादे करता है, यह सृष्टिकर्ता का मामला है, और मानवजाति का इससे कोई सरोकार नहीं होता। साफ़-साफ़ कहें तो, यह परमेश्वर पर निर्भर है; तुम्हें वही मिलेगा जो परमेश्वर तुम्हें देता है, और यदि वह तुम्हें कुछ भी नहीं देता है, तो तुम्हें इसके बारे में कुछ भी नहीं कहना है। जब परमेश्वर का कोई सृजित प्राणी परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करता है, और अपने कर्तव्य को निभाकर, यथाशक्ति प्रयास करके, सृष्टिकर्ता के साथ सहयोग करता है, तो यह कोई लेन-देन या व्यापार नहीं होता है; परमेश्वर के सृजित प्राणियों को परमेश्वर से आशीर्वाद या वादे प्राप्त करने के लिए किसी भी तरह के रवैये या चीज़ की अदला-बदली का उपयोग करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। जब सृष्टिकर्ता तुम लोगों को यह काम सौंपता है, तो यह सही और उचित है कि परमेश्वर के सृजित प्राणियों के रूप में, तुम इस कर्तव्य और आदेश को स्वीकार करो; इसमें कोई लेन-देन शामिल नहीं होता है। सृष्टिकर्ता की ओर से, वह इस आदेश को तुम लोगों में से हर एक को सौंपने के लिए तैयार होता है; और सृजित मानवजाति की ओर से, लोगों को इसे अपने जीवन के दायित्व के रूप में और उस मूल्य के रूप में जिसे उन्हें जीकर दिखाना है, इस कर्तव्य को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। यहाँ कोई आदान-प्रदान नहीं है, यह एक समकक्ष विनिमय नहीं होता, इसमें किसी भी इनाम या किसी भी तरह की व्याख्या के शामिल होने की संभावना तो और भी कम है। यह कोई व्यापार नहीं है, यह लोगों द्वारा अपने कर्तव्य को करते समय चुकाई गई क़ीमत या उनके श्रम के योगदान का विनिमय नहीं है। परमेश्वर ने ऐसा कभी नहीं कहा है, और न ही इंसान को इसे इस प्रकार समझना चाहिए।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपनी व्यक्तिगत महिमा के बदले उन हितों को बेच तक देते हैं (VII)' से उद्धृत

तुम परमेश्वर के आदेशों को कैसे लेते हो, यह एक बहुत ही गंभीर विषय है! परमेश्वर ने जो तुम्हें सौंपा है, यदि तुम उसे पूरा नहीं कर सकते, तो तुम उसकी उपस्थिति में जीने के योग्य नहीं हो और तुम्हें दण्डित किया जाना चाहिए। यह स्वर्ग का नियम और पृथ्वी का सिद्धांत है कि मनुष्य परमेश्वर द्वारा दिये गए हर आदेश को पूरा करे; यह उसका सर्वोच्च दायित्व है, उसके जीवन जितना ही महत्वपूर्ण है। यदि तुम परमेश्वर के आदेशों को गंभीरता से नहीं लेते, तो तुम उसके साथ सबसे कष्टदायक तरीक़े से विश्वासघात कर रहे हो, और तुम यहूदा से भी अधिक शोकजनक हो और तुम्हें शाप दिया जाना चाहिए। परमेश्वर के सौंपे हुए कार्य को कैसे लिया जाए, लोगों को इसकी एक पूरी समझ पानी चाहिए, और उन्हें कम से कम यह बोध होना चाहिए कि वह मानवजाति को जो आदेश देता है वे परमेश्वर से मिले उत्कर्ष और विशेष कृपाएँ हैं, ये सबसे महिमावान बातें हैं। अन्य सब कुछ छोड़ा जा सकता है; यहाँ तक कि अगर किसी को अपना जीवन भी बलिदान करना पड़े, तो भी उसे परमेश्वर के आदेश को पूरा करना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

वह चीज़ जो सबसे प्रत्यक्ष और गोचर रूप से उस बंधन को दर्शाती है जो तुम्हें परमेश्वर से जोड़ता है, वो यह है कि तुम परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपे जाने वाले मामलों और कार्यों का निपटान कैसे करते हो और तुम्हारा रवैया कैसा है। जो सबसे अधिक प्रत्यक्ष रूप से नज़र आता है, वह यही मुद्दा है। जब तुमने इस महत्वपूर्ण मुद्दे को समझ लिया हो और परमेश्वर ने तुम्हें जो आज्ञा दी है, उसे पूरा कर लिया हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारा सम्बन्ध सामान्य होगा। जब परमेश्वर तुम्हें एक कार्य सौंपे, या तुम्हें किसी एक कर्तव्य को पूरा करने के लिए कहे, तब यदि तुम्हारा दृष्टिकोण सतही और उदासीन हो, और तुम इसे एक प्राथमिकता के रूप में नहीं देखते हो, तो क्या यह अपने पूरे दिल और पूरी ताक़त को लगा देने के ठीक विपरीत नहीं होता है? इसलिए, अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हारा रवैया निर्णायक महत्व का होता है, वैसे ही जैसे कि तुम्हारे द्वारा चुना गया तरीका और मार्ग होते हैं। अपने कर्तव्य को सरसरी तौर पर और जल्दबाज़ी में करने, और इसे महत्व न देने का परिणाम क्या होता है? इसका परिणाम है कि तुम अपना कर्तव्य ठीक ढंग से नहीं निभाओगे, भले ही तुम इसे अच्छी तरह से करने के योग्य हो। तुम्हारा कार्य-निष्पादन कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा, और परमेश्वर तुम्हारे कर्तव्य के प्रति तुम्हारे रवैये से संतुष्ट नहीं होगा। यदि, आरंभ से ही, तुमने सामान्य रूप से खोज की होती और सहयोग दिया होता; यदि तुमने अपने सभी विचारों को इसके लिए समर्पित कर दिया होता; यदि तुमने अपना दिल और अपनी आत्मा इसे करने में लगा दी होती, और अपना सारा प्रयास इसी में जुटा दिया होता, और एक अवधि का श्रम, अपनी मेहनत, और अपने विचारों को इसके लिए समर्पित कर दिया होता, या संदर्भ की सामग्री के लिए कुछ समय दिया होता, और अपने पूरे तन-मन को इसके लिए प्रतिबद्ध कर दिया होता; यदि तुम इस तरह का सहयोग देने में सक्षम होते, तो परमेश्वर तुम्हारी अगुवाई करता, तुम्हारा मार्गदर्शन करता। तुम्हें ज़्यादा प्रयत्न करने की ज़रूरत नहीं है; जब तुम सहयोग देने में कोई कसर नहीं छोड़ते, तो परमेश्वर पहले से ही तुम्हारे लिए सब कुछ व्यवस्थित कर देगा। यदि तुम मक्कार और विश्वासघाती हो, और काम के दौरान ही तुम्हारा हृदय परिवर्तन हो जाता है और तुम भटक जाते हो, तो परमेश्वर तुम में कोई रुचि नहीं लेगा; तुम इस अवसर को खो चुके होगे, और परमेश्वर कहेगा, "तुम योग्य नहीं हो; तुम बेकार हो। दूर खड़े हो जाओ। तुम्हें आलसी बने रहना पसंद है, है न? तुम धोखेबाज़ी और मक्कारी पसंद करते हो, है न? तुम आराम करना पसंद करते हो? ठीक है, फिर आराम करो।" परमेश्वर यह अनुग्रह और अवसर अगले व्यक्ति को दे देगा। तुम लोग क्या कहते हो : यह नुकसान है या फ़ायदा? यह बहुत बड़ा नुकसान है!

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपना कर्तव्‍य करते हुए गैरज़िम्‍मेदार और असावधान होने की समस्‍या का समाधान कैसे करें' से उद्धृत

कुछ लोग अपने कर्तव्यों के निर्वहन को पूँजी के रूप में देखते हैं, कुछ कर्तव्यों के निर्वहन को अपने व्यक्तिगत कार्यों के रूप में देखते हैं और कुछ उन्हें अपने कार्य, उद्यमों या निजी मामलों के रूप में देखते हैं या एक तरह के मनबहलाव, मनोरंजन या शौक के रूप में देखते हैं। संक्षेप में, भले ही अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा चाहे जो रवैया हो, यदि यह तुम्हें परमेश्वर से प्राप्त नहीं होता और यदि तुम इसे एक ऐसे कार्य के रूप में नहीं मान पाते जिसे परमेश्वर के प्रबंधन कार्य के भीतर किसी सृजित प्राणी को करना चाहिए या जिसके साथ उसे सहयोग करना चाहिए, फिर तुम जो कर रहे हो, वह तुम्हारा कर्तव्य पूरा करना नहीं हुआ। मैं इन विषयों को क्यों उठा रहा हूँ? इनके बारे में संगति करके मैं किन समस्याओं को हल करने की कोशिश कर रहा हूं? अपने कर्तव्यों के प्रति लोगों का जो गलत रवैया है, मैं उसे ठीक करने का प्रयास कर रहा हूं। एक बार जब वे इन सच्चाइयों को समझ जाएँगे, तो धीरे-धीरे अपने कर्तव्यों के प्रति उनका रवैया सत्य और उसके सिद्धांतों के अनुरूप हो जाएगा, साथ ही साथ परमेश्वर की आवश्यकताओं के अनुरूप भी। कम से कम, अपने कर्तव्य के संबंध में तुम्हारा परिप्रेक्ष्य और रवैया सत्य और परमेश्वर की आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। कर्तव्य परमेश्वर द्वारा लोगों को सौंपे गए काम हैं; वे लोगों द्वारा पूरा करने के लिए विशेष कार्य हैं। लेकिन, एक कर्तव्य निश्चित रूप से तुम्हारा व्यक्तिगत व्यवसाय नहीं है, और न ही वह भीड़ में बेहतर दिखने का एक माध्यम है। कुछ लोग कर्तव्यों का उपयोग अपने प्रबंधन के लिए और गिरोह बनाने के लिए करते हैं; कुछ अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए करते हैं; कुछ अपने अंदर के खालीपन को भरने के लिए करते हैं; और कुछ भाग्य पर भरोसा करने वाली अपनी मानसिकता को संतुष्ट करने के लिए करते हैं यह सोचकर कि जब तक वे अपने कर्तव्यों को पूरा करते रहेंगे, तब तक परमेश्वर के घर में और परमेश्वर द्वारा मनुष्य के लिए व्यवस्थित अद्भुत गंतव्य में उनका भी एक हिस्सा होगा। कर्तव्य के बारे में इस तरह के दृष्टिकोण गलत हैं; वे परमेश्वर को घिनौने लगते हैं और उन्हें तत्काल दूर किया जाना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'कर्तव्‍य का समुचित निर्वहन क्‍या है?' से उद्धृत

अपने कर्तव्य के प्रति सही दृष्टिकोण क्या है, जिससे यह पता चलता है कि तुम्हारे पास सत्य है? पहली बात, तुम इसकी जाँच नहीं कर सकते कि उसकी किसके द्वारा व्यवस्था की गई है, उसे किस स्तर की अगुआई द्वारा सौंपा गया है—तुम्हें उसे परमेश्वर की ओर से स्वीकार करना चाहिए। इसके अलावा, तुम्हारा चाहे जो भी कर्तव्य हो, उसमें ऊँचे और नीचे के बीच भेद न करो। मान लो तुम कहते हो, "हालाँकि यह काम परमेश्वर का आदेश और परमेश्वर के घर का कार्य है, पर यदि मैं इसे करूँगा, तो लोग मुझे नीची निगाह से देख सकते हैं। दूसरों को ऐसा काम मिलता है, जो उन्हें विशिष्ट बनाता है। मुझे दिए गए इस काम को, जो मुझे विशिष्ट नहीं बनाता, बल्कि परदे के पीछे मुझसे कड़ी मेहनत करवाता है, कर्तव्य कैसे कहा जा सकता है? इस कर्तव्य को मैं स्वीकार नहीं कर सकता; यह मेरा कर्तव्य नहीं है। मेरा कर्तव्य वह होना चाहिए, जो मुझे दूसरों के बीच ख़ास बनाए और मुझे प्रसिद्धि दे—और अगर प्रसिद्धि न भी दे या ख़ास न भी बनाए, तो भी मुझे इससे लाभ होना चाहिए और शारीरिक आराम मिलना चाहिए।" क्या यह कोई स्वीकार्य रवैया है? मीन-मेख निकालना परमेश्वर से आई चीज़ को स्वीकार करना नहीं है; यह अपनी पसंद के अनुसार विकल्प चुनना है। यह अपने कर्तव्य को स्वीकारना नहीं है; यह अपने कर्तव्य से इनकार करना है। जैसे ही तुम सोच-विचारकर चुनने का प्रयास करते हो, तुम सच्ची स्वीकृति के लिए सक्षम नहीं रह जाते। इस तरह मीन-मेख निकालने में तुम्हारी निजी पसंद और आकांक्षाओं की मिलावट होती है; जब तुम अपने लाभ, अपनी ख्याति आदि को महत्त्व देते हो, तो अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा रवैया आज्ञाकारी नहीं होता। कर्तव्य के प्रति सही रवैया यह होता है : पहले तो तुम उसका विश्लेषण न करो, न ही यह सोचो कि उसे तुम्हें किसने सौंपा है; इसके बजाय तुम्हें उसे परमेश्वर से मिला हुआ मानना चाहिए, अपने कर्तव्य के रूप में और उस कार्य के रूप में, जो तुम्हें करना चाहिए। दूसरे, ऊँचे और नीचे के बीच भेद न करो, और उसकी प्रकृति के बारे में न सोचो—वह लोगों के सामने किया जाएगा या लोगों की नज़रों से हटकर, वह तुम्हें लोगों के बीच ख़ास बनाएगा या नहीं। इन चीज़ों पर ग़ौर मत करो। ये उस रवैये की दो विशेषताएँ हैं, जिससे लोगों को अपने कर्तव्य को देखना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'कर्तव्‍य का समुचित निर्वहन क्‍या है?' से उद्धृत

अपने कर्तव्य के प्रति इंसान का सबसे बुनियादी रवैया क्या होना चाहिए? यदि तुमने कहा, "चूंकि परमेश्वर के घर ने मुझे यह कर्तव्य दिया है, तो यह मेरा है और मैं जैसे चाहूँ इसे पूरा कर सकता हूं," क्या यह स्वीकार्य रवैया होगा? बिल्कुल नहीं होगा। यदि तुम्हारे इस तरह के विचार हैं, तो वे परेशानी पैदा करेंगे और इसका मतलब है कि तुमने एक बुरे रास्ते पर चलना शुरू कर दिया है। तुम्हें इस तरह से नहीं सोचना चाहिए। तो, सोचने का सही तरीका क्या है? सबसे पहले, तुम्हें सत्य और सिद्धांतों की तलाश करनी चाहिए। इन चीजों की तलाश करो: इस कर्तव्य को कैसे पूरा किया जाना चाहिए, परमेश्वर की अपेक्षा क्या है, लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाओं के क्या सिद्धांत हैं, तुम्हें क्या करना चाहिए, कार्य के किन हिस्सों को तुम्हें पूरा करना चाहिए, और इस कर्तव्य की पूर्ति करते हुए तुम्हें पूरी तरह से समर्पित और ज़िम्मेदार बनने के लिए कैसे व्यवहार करना चाहिए। तो, समर्पण किसके प्रति किया जाए? परमेश्वर के प्रति—तुम्हें उसके प्रति समर्पित होना चाहिए, अन्य लोगों के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए, और जहाँ तक अपनी बात है, तुम्हें सिद्धांत का पालन करना चाहिए और अपने कर्तव्य का निर्वाह करना चाहिए। सिद्धांत का पालन करने का क्या मतलब है? सिद्धांत का पालन करना परमेश्वर के वचनों और सत्य के अनुसार कार्य करना है। तो फिर, कर्तव्य का पालन करने का क्या अर्थ है? उदाहरण के लिए, तुम्हें एक या दो साल के लिए कोई काम सौंपा गया है, लेकिन अभी तक किसी ने तुमसे कोई पूछताछ नहीं की है। तुम्हें क्या करना चाहिए? यदि कोई पूछताछ नहीं करता है, तो क्या इसका मतलब है कि कर्तव्य का निर्वहन नहीं हुआ? इस बात पर कोई ध्यान न दो कि कोई भी पूछताछ करता है या नहीं, कोई देखता है या नहीं कि तुम अपने कर्तव्य का निर्वहन कैसे कर रहे हो; यह कार्य तुम्हें सौंपा गया था। हालाँकि यह तुम्हारा व्यक्तिगत काम नहीं है, यह तुम्हें सौंपा गया था और यह तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। तुम्हें यह सोचना चाहिए कि यह काम कैसे करना है और इस काम को कैसे बेहतर ढंग से किया जा सकता है और तुम्हें कैसे करना चाहिए। यदि तुम हमेशा इस बात की प्रतीक्षा करते रहते हो कि दूसरे तुमसे पूछताछ करें, वे तुम्हारा निरीक्षण करें और तुम्हें प्रोत्साहित करें, तो क्या इस तरह का रवैया तुम्हारे कर्तव्य में होना चाहिए? यह किस तरह का रवैया है? यह निष्क्रिय रवैया है; तुम्हें अपने कर्तव्य पालन में इस तरह का रवैया नहीं रखना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'कर्तव्‍य का समुचित निर्वहन क्‍या है?' से उद्धृत

तुम लोगों में से प्रत्येक को अपना कर्तव्य अपनी पूरी क्षमता से, खुले और ईमानदार दिलों के साथ पूरा करना चाहिए, और जो भी कीमत ज़रूरी हो, उसे चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए। जैसा कि तुम लोगों ने कहा है, जब दिन आएगा, तो परमेश्वर ऐसे किसी भी व्यक्ति के प्रति लापरवाह नहीं रहेगा, जिसने उसके लिए कष्ट उठाए होंगे या कीमत चुकाई होगी। इस प्रकार का दृढ़ विश्वास बनाए रखने लायक है, और यह सही है कि तुम लोगों को इसे कभी नहीं भूलना चाहिए। केवल इसी तरह से मैं तुम लोगों के बारे में निश्चिंत हो सकता हूँ। वरना तुम लोगों के बारे में मैं कभी निश्चिंत नहीं हो पाऊँगा, और तुम हमेशा मेरी घृणा के पात्र रहोगे। अगर तुम सभी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन सको और अपना सर्वस्व मुझे अर्पित कर सको, मेरे कार्य के लिए कोई कोर-कसर न छोड़ो, और मेरे सुसमाचार के कार्य के लिए अपनी जीवन भर की ऊर्जा अर्पित कर सको, तो क्या फिर मेरा हृदय तुम्हारे लिए अक्सरहर्ष से नहीं उछलेगा? इस तरह से मैं तुम लोगों के बारे में पूरी तरह से निश्चिंत हो सकूँगा, या नहीं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'गंतव्य के बारे में' से उद्धृत

आज तुम लोगों से जो कुछ हासिल करने की अपेक्षा की जाती है, वे अतिरिक्त माँगें नहीं, बल्कि मनुष्य का कर्तव्य है, जिसे सभी लोगों द्वारा किया जाना चाहिए। यदि तुम लोग अपना कर्तव्य तक निभाने में या उसे भली-भाँति करने में असमर्थ हो, तो क्या तुम लोग अपने ऊपर मुसीबतें नहीं ला रहे हो? क्या तुम लोग मृत्यु को आमंत्रित नहीं कर रहे हो? कैसे तुम लोग अभी भी भविष्य और संभावनाओं की आशा कर सकते हो? परमेश्वर का कार्य मानवजाति के लिए किया जाता है, और मनुष्य का सहयोग परमेश्वर के प्रबंधन के लिए दिया जाता है। जब परमेश्वर वह सब कर लेता है जो उसे करना चाहिए, तो मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने अभ्यास में उदार हो और परमेश्वर के साथ सहयोग करे। परमेश्वर के कार्य में मनुष्य को कोई कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए, उसे अपनी वफादारी प्रदान करनी चाहिए, और अनगिनत धारणाओं में सलंग्न नहीं होना चाहिए, या निष्क्रिय बैठकर मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। परमेश्वर मनुष्य के लिए स्वयं को बलिदान कर सकता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर को अपनी वफादारी प्रदान नहीं कर सकता? परमेश्वर मनुष्य के प्रति एक हृदय और मन वाला है, तो क्यों मनुष्य थोड़ा-सा सहयोग प्रदान नहीं कर सकता? परमेश्वर मानवजाति के लिए कार्य करता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के लिए अपना कुछ कर्तव्य पूरा नहीं कर सकता? परमेश्वर का कार्य इतनी दूर तक आ गया है, पर तुम लोग अभी भी देखते ही हो किंतु करते नहीं, सुनते ही हो किंतु हिलते नहीं। क्या ऐसे लोग तबाही के लक्ष्य नहीं हैं? परमेश्वर पहले ही अपना सर्वस्व मनुष्य को अर्पित कर चुका है, तो क्यों आज मनुष्य ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ है? परमेश्वर के लिए उसका कार्य उसकी पहली प्राथमिकता है, और उसके प्रबंधन का कार्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। मनुष्य के लिए परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाना और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करना उसकी पहली प्राथमिकता है। इसे तुम सभी लोगों को समझ लेना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

मनुष्य द्वारा अपना कर्तव्य निभाना वास्तव में उस सबकी सिद्धि है, जो मनुष्य के भीतर अंतर्निहित है, अर्थात् जो मनुष्य के लिए संभव है। इसके बाद उसका कर्तव्य पूरा हो जाता है। मनुष्य की सेवा के दौरान उसके दोष उसके क्रमिक अनुभव और न्याय से गुज़रने की प्रक्रिया के माध्यम से धीरे-धीरे कम होते जाते हैं; वे मनुष्य के कर्तव्य में बाधा या विपरीत प्रभाव नहीं डालते। वे लोग, जो इस डर से सेवा करना बंद कर देते हैं या हार मानकर पीछे हट जाते हैं कि उनकी सेवा में कमियाँ हो सकती हैं, वे सबसे ज्यादा कायर होते हैं। यदि लोग वह व्यक्त नहीं कर सकते, जो उन्हें सेवा के दौरान व्यक्त करना चाहिए या वह हासिल नहीं कर सकते, जो उनके लिए सहज रूप से संभव है, और इसके बजाय वे सुस्ती में समय गँवाते हैं और बेमन से काम करते हैं, तो उन्होंने अपना वह प्रयोजन खो दिया है, जो एक सृजित प्राणी में होना चाहिए। ऐसे लोग "औसत दर्जे के" माने जाते हैं; वे बेकार का कचरा हैं। इस तरह के लोग उपयुक्त रूप से सृजित प्राणी कैसे कहे जा सकते हैं? क्या वे भ्रष्ट प्राणी नहीं हैं, जो बाहर से तो चमकते हैं, परंतु भीतर से सड़े हुए हैं? यदि कोई मनुष्य अपने आपको परमेश्वर कहता है, मगर अपनी दिव्यता व्यक्त करने, स्वयं परमेश्वर का कार्य करने या परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है, तो वह नि:संदेह परमेश्वर नहीं है, क्योंकि उसमें परमेश्वर का सार नहीं है, और परमेश्वर जो सहज रूप से प्राप्त कर सकता है, वह उसके भीतर विद्यमान नहीं है। यदि मनुष्य वह खो देता है, जो उसके द्वारा सहज रूप से प्राप्य है, तो वह अब और मनुष्य नहीं समझा जा सकता, और वह सृजित प्राणी के रूप में खड़े होने या परमेश्वर के सामने आकर उसकी सेवा करने के योग्य नहीं है। इतना ही नहीं, वह परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करने या परमेश्वर द्वारा ध्यान रखे जाने, बचाए जाने और पूर्ण बनाए जाने के योग्य भी नहीं है। कई लोग जो परमेश्वर का भरोसा खो चुके हैं, परमेश्वर का अनुग्रह भी खोते चले जाते हैं। वे न केवल अपने कुकर्मों से घृणा नहीं करते, बल्कि ढिठाई से इस बात का प्रचार भी करते हैं कि परमेश्वर का मार्ग गलत है, और वे विद्रोही परमेश्वर के अस्तित्व तक से इनकार कर देते हैं। इस प्रकार की विद्रोहशीलता रखने वाले लोग परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने के पात्र कैसे हो सकते हैं? जो लोग अपना कर्तव्य नहीं निभाते, वे परमेश्वर के विरुद्ध अत्यधिक विद्रोही और उसके अत्यधिक ऋणी होते हैं, फिर भी वे पलट जाते हैं और हमलावर होकर कहते हैं कि परमेश्वर गलत है। इस तरह के मनुष्य पूर्ण बनाए जाने लायक कैसे हो सकते हैं? क्या यह हटा दिए जाने और दंडित किए जाने की ओर नहीं ले जाता? जो लोग परमेश्वर के सामने अपना कर्तव्य नहीं निभाते, वे पहले से ही सर्वाधिक जघन्य अपराधों के दोषी हैं, जिसके लिए मृत्यु भी अपर्याप्त सज़ा है, फिर भी वे परमेश्वर के साथ बहस करने और उसके साथ अपनी बराबरी करने की धृष्टता करते हैं। ऐसे लोगों को पूर्ण बनाने का क्या महत्व है? जब लोग अपना कर्तव्य पूरा करने में विफल होते हैं, तो उन्हें अपराध और कृतज्ञता महसूस करनी चाहिए; उन्हें अपनी कमजोरी और अनुपयोगिता, अपनी विद्रोहशीलता और भ्रष्टता से घृणा करनी चाहिए, और इससे भी अधिक, उन्हें परमेश्वर को अपना जीवन अर्पित कर देना चाहिए। केवल तभी वे सृजित प्राणी होते हैं, जो परमेश्वर से सच्चा प्रेम करते हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के आशीषों और प्रतिज्ञाओं का आनंद लेने और उसके द्वारा पूर्ण किए जाने के योग्य हैं। और तुम लोगों में से अधिकतर क्या हैं? तुम लोग उस परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार करते हो, जो तुम लोगों के मध्य रहता है? तुम लोगों ने उसके सामने अपना कर्तव्य किस तरह निभाया है? क्या तुमने, अपने जीवन की कीमत पर भी, वह सब कर लिया है, जिसे करने के लिए तुम लोगों से कहा गया था? तुम लोगों ने क्या बलिदान किया है? क्या तुम लोगों को मुझसे कुछ ज्यादा नहीं मिला है? क्या तुम लोग विचार कर सकते हो? तुम लोग मेरे प्रति कितने वफादार हो? तुम लोगों ने मेरी किस प्रकार से सेवा की है? और उस सबका क्या हुआ, जो मैंने तुम लोगों को दिया है और तुम लोगों के लिए किया है? क्या तुम लोगों ने यह सब माप लिया है? क्या तुम सभी लोगों ने इसका आकलन और तुलना उस जरा-से विवेक के साथ कर ली है, जो तुम लोगों के भीतर है? तुम्हारे शब्द और कार्य किसके योग्य हो सकते हैं? क्या तुम लोगों का इतना छोटा-सा बलिदान उस सबके बराबर है, जो मैने तुम लोगों को दिया है? मेरे पास और कोई विकल्प नहीं है और मैं पूरे हृदय से तुम लोगों के प्रति समर्पित रहा हूँ, फिर भी तुम लोग मेरे बारे में दुष्ट इरादे रखते हो और मेरे प्रति अनमने रहते हो। यही तुम लोगों के कर्तव्य की सीमा, तुम लोगों का एकमात्र कार्य है। क्या ऐसा ही नहीं है? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने में बिलकुल असफल हो गए हो? तुम लोगों को सृजित प्राणी कैसे माना जा सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर' से उद्धृत

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