3. परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम कैसे हासिल किया जा सकता है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

आज, जब तुम लोग परमेश्वर को जानने और उससे प्रेम करने की कोशिश करते हो, तो एक ओर तुम लोगों को कठिनाई और शोधन सहन करना चाहिए और दूसरी ओर, तुम लोगों को एक क़ीमत चुकानी चाहिए। परमेश्वर से प्रेम करने के सबक से ज्यादा गहरा कोई सबक नहीं है, और यह कहा जा सकता है कि जीवन भर के विश्वास से लोग जो सबक सीखते हैं, वह यह है कि परमेश्वर से प्रेम कैसे करें। कहने का अर्थ यह है कि यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें उससे प्रेम अवश्य करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर पर केवल विश्वास करते हो परंतु उससे प्रेम नहीं करते, और तुमने परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त नहीं किया है, और कभी भी अपने हृदय के भीतर से आने वाले सच्चे भाव से परमेश्वर से प्रेम नहीं किया है, तो परमेश्वर पर तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ है; यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में तुम परमेश्वर से प्रेम नहीं करते, तो तुम व्यर्थ ही जी रहे हो, और तुम्हारा संपूर्ण जीवन सभी जीवों में सबसे अधम है। यदि अपने संपूर्ण जीवन में तुमने कभी परमेश्वर से प्रेम नहीं किया या उसे संतुष्ट नहीं किया, तो तुम्हारे जीने का क्या अर्थ है? और परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का क्या अर्थ है? क्या यह प्रयासों की बरबादी नहीं है? कहने का अर्थ है कि, यदि लोगों को परमेश्वर पर विश्वास और उससे प्रेम करना है, तो उन्हें एक क़ीमत अवश्य चुकानी चाहिए। बाहरी तौर पर एक खास तरीके से कार्य करने की कोशिश करने के बजाय, उन्हें अपने हृदय की गहराइयों में असली अंतर्दृष्टि की खोज करनी चाहिए। यदि तुम गाने और नाचने के बारे में उत्साही हो, परंतु सत्य को व्यवहार में लाने में अक्षम हो, तो क्या तुम्हारे बारे में यह कहा जा सकता है कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो? परमेश्वर से प्रेम करने के लिए आवश्यक है सभी चीज़ों में उसकी इच्छा को खोजना, और जब तुम्हारे साथ कुछ घटित हो जाए, तो तुम अपने भीतर गहराई में खोज करो, परमेश्वर की इच्छा को समझने की कोशिश करो, और यह देखने की कोशिश करो कि इस मामले में परमेश्वर की इच्छा क्या है, वह तुमसे क्या हासिल करने के लिए कहता है, और कैसे तुम्हें उसकी इच्छा के प्रति सचेत रहना चाहिए। उदाहरण के लिए : जब ऐसा कुछ होता है, जिसमें तुम्हें कठिनाई झेलने की आवश्यकता होती है, तो उस समय तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, और कैसे तुम्हें उसकी इच्छा के प्रति सचेत रहना चाहिए। तुम्हें स्वयं को संतुष्ट नहीं करना चाहिए : पहले अपने आप को एक तरफ़ रख दो। देह से अधिक अधम कोई और चीज़ नहीं है। तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने की कोशिश करनी चाहिए, और अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। ऐसे विचारों के साथ, परमेश्वर इस मामले में तुम पर अपनी विशेष प्रबुद्धता लाएगा, और तुम्हारे हृदय को भी आराम मिलेगा। जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, तो सबसे पहले तुम्हें अपने आपको एक तरफ़ रखना और देह को सभी चीज़ों में सबसे अधम समझना चाहिए। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करोगे, यह उतनी ही अधिक स्वतंत्रता लेता है; यदि तुम इस समय इसे संतुष्ट करते हो, तो अगली बार यह तुमसे और अधिक की माँग करेगा। जब यह जारी रहता है, लोग देह को और अधिक प्रेम करने लग जाते हैं। देह की हमेशा असंयमित इच्छाएँ होती हैं; यह हमेशा चाहता है कि तुम इसे संतुष्ट और भीतर से प्रसन्न करो, चाहे यह उन चीज़ों में हो जिन्हें तुम खाते हो, जो तुम पहनते हो, या जिनमें आपा खो देते हो, या स्वयं की कमज़ोरी और आलस को बढ़ावा देते हो...। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करते हो, उसकी कामनाएँ उतनी ही बड़ी हो जाती हैं, और उतना ही अधिक वह ऐयाश बन जाता है, जब तक कि वह उस स्थिति तक नहीं पहुँच जाता, जहाँ लोगों का देह और अधिक गहरी धारणाओं को आश्रय देता है, और परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करता है और स्वयं को महिमामंडित करता है, और परमेश्वर के कार्य के बारे में संशयात्मक हो जाता है। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करते हो, उतनी ही बड़ी देह की कमज़ोरियाँ होती हैं; तुम हमेशा महसूस करोगे कि कोई भी तुम्हारी कमज़ोरियों के साथ सहानुभूति नहीं रखता, तुम हमेशा विश्वास करोगे कि परमेश्वर बहुत दूर चला गया है, और तुम कहोगे : "परमेश्वर इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है? वह लोगों का पीछा क्यों नहीं छोड़ देता?" जब लोग देह को संतुष्ट करते हैं, और उससे बहुत अधिक प्यार करते हैं, तो वे अपने आपको बरबाद कर बैठते हैं। यदि तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम करते हो, और देह को संतुष्ट नहीं करते, तो तुम देखोगे कि परमेश्वर जो कुछ करता है, वह बहुत सही और बहुत अच्छा होता है, और यह कि तुम्हारे विद्रोह के लिए उसका शाप और तुम्हारी अधार्मिकता के बारे में उसका न्याय तर्कसंगत है। कई बार ऐसा होगा, जब परमेश्वर तुम्हें अपने सामने आने के लिए बाध्य करते हुए ताड़ना देगा और अनुशासित करेगा, और तुम्हें तैयार करने के लिए माहौल बनाएगा—और तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि जो कुछ परमेश्वर कर रहा है, वह अद्भुत है। इस प्रकार तुम ऐसा महसूस करोगे, मानो कोई ज्यादा पीड़ा नहीं है, और यह कि परमेश्वर बहुत प्यारा है। यदि तुम देह की कमज़ोरियों को बढ़ावा देते हो, और कहते हो कि परमेश्वर अति कर देता है, तो तुम हमेशा पीड़ा का अनुभव करोगे और हमेशा उदास रहोगे, और तुम परमेश्वर के समस्त कार्य के बारे में अस्पष्ट रहोगे, और ऐसा प्रतीत होगा मानो परमेश्वर मनुष्यों की कमज़ोरियों के प्रति बिल्कुल भी सहानुभूति नहीं रखता, और वह मनुष्यों की कठिनाइयों से अनजान है। और इस प्रकार से तुम हमेशा दुःखी और अकेला महसूस करोगे, मानो तुमने बड़ा अन्याय सहा है, और उस समय तुम शिकायत करना आरंभ कर दोगे। जितना अधिक तुम इस प्रकार से देह की कमज़ोरियों को बढ़ावा दोगे, उतना ही अधिक तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर बहुत अति कर देता है, जब तक कि यह इतना बुरा नहीं हो जाता कि तुम परमेश्वर के कार्य को नकार देते हो, और परमेश्वर का विरोध करने लगते हो, और अवज्ञा से भर जाते हो। इसलिए तुम्हें देह से विद्रोह करना चाहिए और उसे बढ़ावा नहीं देना चाहिए : "मेरा पति (मेरी पत्नी), बच्चे, सम्भावनाएँ, विवाह, परिवार—इनमें से कुछ भी मायने नहीं रखता! मेरे हृदय में केवल परमेश्वर है, और मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए भरसक प्रयास करना चाहिए और देह को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।" तुममें ऐसा संकल्प होना चाहिए। यदि तुममें हमेशा इस प्रकार का संकल्प रहेगा, तो जब तुम सत्य को अभ्यास में लाओगे, और अपने आप को एक ओर करोगे, तो तुम ऐसा बहुत ही कम प्रयास के द्वारा कर पाओगे। ऐसा कहा जाता है कि एक बार एक किसान ने एक साँप देखा, जो सड़क पर बर्फ में जम कर कड़ा हो गया था। किसान ने उसे उठाया और अपने सीने से लगा लिया, और साँप ने जीवित होने के पश्चात् उसे डस लिया, जिससे उस किसान की मृत्यु हो गई। मनुष्य की देह साँप के समान है : इसका सार उसके जीवन को हानि पहुँचाना है—और जब पूरी तरह से उसकी मनमानी चलने लगती है, तो तुम जीवन पर से अपना अधिकार खो बैठते हो। देह शैतान से संबंधित है। इसके भीतर असंयमित इच्छाएँ हैं, यह केवल अपने बारे में सोचता है, यह आरामतलब है और फुरसत में रंगरलियाँ मनाता है, सुस्ती और आलस्य में धँसा रहता है, और इसे एक निश्चित बिंदु तक संतुष्ट करने के बाद तुम अंततः इसके द्वारा खा लिए जाओगे। कहने का अर्थ है कि, यदि तुम इसे इस बार संतुष्ट करोगे, तो अगली बार यह और अधिक की माँग करने आ जाएगा। इसकी हमेशा असंयमित इच्छाएँ और नई माँगें रहती हैं, और अपने आपको और अधिक पोषित करवाने और उसके सुख के बीच रहने के लिए तुम्हारे द्वारा अपने को दिए गए बढ़ावे का फायदा उठाता है—और यदि तुम इस पर विजय नहीं पाओगे, तो तुम अंततः स्वयं को बरबाद कर लोगे। तुम परमेश्वर के सामने जीवन प्राप्त कर सकते हो या नहीं, और तुम्हारा परम अंत क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम देह के प्रति अपना विद्रोह कैसे कार्यान्वित करते हो। परमेश्वर ने तुम्हें बचाया है, और तुम्हें चुना और पूर्वनिर्धारित किया है, फिर भी यदि आज तुम उसे संतुष्ट करने के लिए तैयार नहीं हो, तुम सत्य को अभ्यास में लाने के लिए तैयार नहीं हो, तुम अपनी देह के विरुद्ध एक ऐसे हृदय के साथ विद्रोह करने के लिए तैयार नहीं हो, जो सचमुच परमेश्वर से प्रेम करता हो, तो अंततः तुम अपने आप को बरबाद कर लोगे, और इस प्रकार चरम पीड़ा सहोगे। यदि तुम हमेशा अपनी देह को खुश करते हो, तो शैतान तुम्हें धीरे-धीरे निगल लेगा, और तुम्हें जीवन या पवित्रात्मा के स्पर्श से रहित छोड़ देगा, जब तक कि वह दिन नहीं आ जाता, जब तुम भीतर से पूरी तरह अंधकारमय नहीं हो जाते। जब तुम अंधकार में रहोगे, तो तुम्हें शैतान के द्वारा बंदी बना लिया जाएगा, तुम्हारे हृदय में अब परमेश्वर नहीं होगा, और उस समय तुम परमेश्वर के अस्तित्व को नकार दोगे और उसे छोड़ दोगे। इसलिए, यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, तो उन्हें पीड़ा की क़ीमत चुकानी चाहिए और कठिनाई सहनी चाहिए। बाहरी जोश और कठिनाई, अधिक पढ़ने तथा अधिक भाग-दौड़ करने की कोई आवश्यकता नहीं है; इसके बजाय, उन्हें अपने भीतर की चीज़ों को एक तरफ रख देना चाहिए : असंयमित विचार, व्यक्तिगत हित, और उनके स्वयं के विचार, धारणाएँ और प्रेरणाएँ। परमेश्वर की यही इच्छा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है' से उद्धृत

मनुष्य सदा अंधकार के प्रभाव में रहा है, शैतान के प्रभाव की क़ैद में रखा गया है, बचकर निकल भी नहीं पाता, और शैतान के द्वारा संसाधित किए जाने के पश्चात्, उसका स्वभाव उत्तरोत्तर भ्रष्ट होता जाता है। कहा जा सकता है कि मनुष्य सदा ही अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के बीच रहा है और परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम करने में असमर्थ है। ऐसे में, यदि मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, तो उसे आत्मदंभ, आत्म-महत्व, अहंकार, मिथ्याभिमान इत्यादि, वह सब कुछ जो शैतान के स्वभाव का है, उतार फेंकना चाहिए। यदि नहीं, तो उसका प्रेम अशुद्ध प्रेम, शैतानी प्रेम, और ऐसा प्रेम है जो कदापि परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर सकता है। पवित्र आत्मा द्वारा प्रत्यक्षतः पूर्ण बनाए, निपटे, तोड़े, काटे-छाँटे, अनुशासित, ताड़ित और शुद्ध किए बिना कोई परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम करने में समर्थ नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है' से उद्धृत

जब लोग अपने हृदय से परमेश्वर से संपर्क करते हैं, जब उनके हृदय पूरी तरह से उसकी ओर मुड़ने में सक्षम होते हैं, तो यह परमेश्वर के प्रति मानव के प्रेम का पहला कदम होता है। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हो, तो तुम्हें सबसे पहले उसकी ओर अपना हृदय मोड़ने में सक्षम होना होगा। परमेश्वर की ओर अपना हृदय मोड़ना क्या है? ऐसा तब होता है, जब तुम्हारे हृदय के हर प्रयास परमेश्वर से प्रेम करने और उसे प्राप्त करने के लिए होते हैं। इससे पता चलता है कि तुमने पूरी तरह से अपना हृदय परमेश्वर की ओर मोड़ लिया है। परमेश्वर और उसके वचनों के अलावा तुम्हारे हृदय में लगभग कुछ नहीं होता (परिवार, धन, पति, पत्नी, बच्चे आदि)। अगर होता भी है, तो ऐसी चीज़ें तुम्हारे हृदय पर अधिकार नहीं कर सकतीं, और तुम अपने भविष्य की संभावनाओं के बारे में नहीं सोचते, केवल परमेश्वर से प्रेम का अनुसरण करने की ही सोचते हो। उस समय तुमने पूरी तरह से अपना हृदय परमेश्वर की ओर मोड़ दिया होगा। मान लो, तुम अब भी अपने हृदय में अपने लिए योजना बना रहे हो और हमेशा अपने निजी लाभ के लिए प्रयास करते रहते हो, और हमेशा सोचते हो कि : "मैं कब परमेश्वर से एक छोटा-सा अनुरोध कर सकता हूँ? कब मेरा परिवार धनी बनेगा? मैं कैसे कुछ अच्छे कपड़े प्राप्त कर सकता हूँ? ..." यदि तुम उस स्थिति में रह रहे हो, तो यह दर्शाता है कि तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की ओर नहीं मुड़ा है। यदि तुम्हारे हृदय में केवल परमेश्वर के वचन हैं और तुम हर समय परमेश्वर से प्रार्थना कर पाते हो और उसके करीब हो सकते हो—मानो वह तुम्हारे बहुत करीब हो, मानो परमेश्वर तुम्हारे भीतर हो और तुम उसके भीतर हो—यदि तुम उस तरह की अवस्था में हो, तो इसका मतलब है कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर की उपस्थिति में है। यदि तुम हर रोज़ परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और उसके वचनों को खाते और पीते हो, हमेशा कलीसिया के कार्य के बारे में सोचा करते हो, यदि तुम परमेश्वर की इच्छा के प्रति विचारशीलता दिखाते हो, अपने हृदय का उपयोग उससे सच्चा प्रेम करने और उसके हृदय को संतुष्ट करने के लिए करते हो, तो तुम्हारा हृदय परमेश्वर का होगा। यदि तुम्हारा हृदय अन्य कई चीजों में लिप्त है, तो उस पर अभी भी शैतान का कब्ज़ा है और वह पूरी तरह से परमेश्वर की ओर नहीं मुड़ा है। जब किसी का हृदय वास्तव में परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है, तो उसमें परमेश्वर के लिए सच्चा, स्वाभाविक प्रेम होगा और वह परमेश्वर के कार्य पर विचार करने में सक्षम होगा। यद्यपि वे अभी भी किसी पल मूर्खता और विवेकहीनता दिखा सकते हैं, फिर भी वे परमेश्वर के घर के हितों, उसके कार्य, और अपने स्वभाव में बदलाव के संबंध में विचार करने में सक्षम होंगे और उनका हृदय सही ठिकाने पर होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है' से उद्धृत

यदि तुम वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना और उसके द्वारा प्राप्त किया जाना चाहते हो, तो उसका पहला चरण है, अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ मोड़ना। हर एक चीज़ में, जो तुम करते हो, आत्म-निरीक्षण करो और पूछो : "क्या मैं यह परमेश्वर के प्रति प्रेम से भरे हृदय के आधार पर कर रहा हूँ? क्या इसके पीछे मेरे कोई निजी इरादे हैं? इसे करने में मेरा वास्तविक लक्ष्य क्या है?" यदि तुम अपना हृदय परमेश्वर को सौंपना चाहते हो, तो तुम्हें पहले अपने हृदय को वश में करना होगा, अपने सभी इरादे छोड़ देने होंगे, और पूरी तरह से परमेश्वर के लिए समर्पित होने की अवस्था हासिल करनी होगी। यह अपना हृदय परमेश्वर को देने के अभ्यास का मार्ग है। अपने हृदय को वश में करने का क्या अभिप्राय है? यह अपनी देह की अनावश्यक इच्छाओं को छोड़ देना है, रुतबे की सुविधाओं और आशीषों का लालच न करना है। यह सब-कुछ परमेश्वर की संतुष्टि के लिए करना है, और अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर के लिए बनाना है, स्वयं के लिए नहीं। इतना काफी है।

परमेश्वर के लिए वास्तविक प्रेम हृदय की गहराई से आता है; यह ऐसा प्रेम है, जिसका अस्तित्व केवल मानव के परमेश्वर के ज्ञान पर आधारित होता है। जब किसी का हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है, तब उसमें परमेश्वर के लिए प्रेम होता है, लेकिन वह प्रेम आवश्यक रूप से शुद्ध और आवश्यक रूप से पूरा नहीं होता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि व्यक्ति के हृदय के परमेश्वर की तरफ पूरी तरह से मुड़ जाने और उस व्यक्ति में परमेश्वर की वास्तविक समझ और उसके लिए वास्तविक श्रद्धा होने के बीच अब भी कुछ दूरी होती है। जिस तरीके से मनुष्य परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम प्राप्त करता है और परमेश्वर के स्वभाव को जान पाता है, वह तरीका अपने हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ना है। जब मनुष्य अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को देता है, तब वह जीवन के अनुभव में प्रवेश करना शुरू कर देता है। इस तरह से उसका स्वभाव बदलना शुरू हो जाता है, परमेश्वर के लिए उसका प्रेम धीरे-धीरे बढ़ने लगता है, और परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान भी धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। इसलिए जीवन-अनुभव के सही मार्ग पर आने के लिए अपना हृदय परमेश्वर की तरफ मोड़ना ही एकमात्र पूर्व-शर्त है। जब लोग अपना हृदय परमेश्वर के सामने रख देते हैं, तो उनके पास केवल उसके लिए लालायित हृदय ही होता है, परंतु उससे प्रेम करने वाला हृदय नहीं होता, क्योंकि उनके पास उसकी समझ नहीं होती। हालाँकि इस परिस्थिति में उनके पास उसके लिए कुछ प्रेम होता है, लेकिन वह स्वाभाविक और सच्चा नहीं होता। इसका कारण यह है कि मनुष्य की देह से उत्पन्न होने वाली हर चीज़ भावना की पैदाइश होती है और वास्तविक समझ से नहीं आती। यह सिर्फ एक क्षणिक आवेग होता है और वह लंबे समय तक चलने वाली श्रद्धा नहीं बन सकता। जब लोगों में परमेश्वर की समझ नहीं होती, तो वे उससे केवल अपनी पसंद और व्यक्तिगत धारणाओं के आधार पर प्रेम कर सकते हैं; इस प्रकार के प्रेम को स्वाभाविक प्रेम नहीं कहा जा सकता, न ही इसे वास्तविक प्रेम कहा जा सकता है। व्यक्ति का हृदय वास्तविक रूप में परमेश्वर की ओर मुड़ सकता है, और वह हर चीज़ में परमेश्वर के हितों के बारे में सोचने में सक्षम हो सकता है, लेकिन अगर उसे परमेश्वर की कोई समझ नहीं है, तो वह वास्तविक रूप में स्वाभाविक प्रेम करने में सक्षम नहीं होगा। वह बस कलीसिया के लिए कुछ कार्य पूरे करने और अपने कर्तव्य का थोड़ा पालन करने में सक्षम होता है, लेकिन वह यह बिना आधार के करेगा। इस तरह के व्यक्ति का स्वभाव बदलना मुश्किल है; ऐसे लोग या तो सत्य का अनुसरण नहीं करते, या उसे समझते नहीं। यहाँ तक कि अगर कोई व्यक्ति अपने हृदय को पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ मोड़ भी लेता है, तो भी इसका यह मतलब यह नहीं कि उसका परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय पूरी तरह से शुद्ध है, क्योंकि जिन लोगों के हृदय में परमेश्वर है, उनके हृदय में परमेश्वर के लिए प्रेम होना आवश्यक नहीं है। इसका संबंध परमेश्वर की समझ प्राप्त करने के लिए प्रयास करने वालों और प्रयास न करने वालों के बीच के अंतर से है। एक बार जब व्यक्ति को उसके बारे में समझ हो जाती है, तो यह दर्शाता है कि उसका हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ मुड़ गया है, इससे पता चलता है कि उसके हृदय में परमेश्वर के लिए उसका विशुद्ध प्रेम स्वाभाविक प्रेम है। केवल इस तरह के लोगों के हृदय में ही परमेश्वर होता है। परमेश्वर की ओर अपना हृदय मोड़ना सही मार्ग पर जाने, परमेश्वर को समझने और परमेश्वर के प्रति प्रेम प्राप्त करने की एक पूर्व-शर्त है। यह परमेश्वर से प्रेम करने का अपना कर्तव्य पूरा करने का चिह्नक (मार्कर) नहीं है, न ही यह उसके लिए वास्तविक प्रेम रखने का चिह्नक (मार्कर) है। व्यक्ति के लिए परमेश्वर के प्रति विशुद्ध प्रेम प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है अपना हृदय उसकी तरफ मोड़ना, जो कि वह पहली चीज़ भी है, जो व्यक्ति को उसकी रचना होने के नाते करनी चाहिए। जो लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे सभी वे लोग हैं जो जीवन की खोज करते हैं, अर्थात् वे लोग, जो सत्य का अनुसरण करते हैं और वास्तव में परमेश्वर को चाहते हैं; उन सभी में पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता होती है और वे उसके द्वारा प्रेरित किए गए होते हैं। वे सब परमेश्वर का मार्गदर्शन पाने में सक्षम होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है' से उद्धृत

आज तुम परमेश्वर से कितना प्रेम करते हो? और जो कुछ भी परमेश्वर ने तुम्हारे भीतर किया है, उस सबके बारे में तुम कितना जानते हो? ये वे बातें हैं जो तुम्हें सीखनी चाहिए। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आया, तो जो कुछ उसने मनुष्य में किया और जो कुछ उसने मनुष्य को देखने की अनुमति दी, वह इसलिए था कि मनुष्य उससे प्रेम करे और सही मायने में उसे जाने। मनुष्य यदि परमेश्वर के लिए कष्ट सहने योग्य है और यहाँ तक आ पाया है, तो यह एक ओर परमेश्वर के प्रेम के कारण है, दूसरी ओर परमेश्वर के उद्धार के कारण; इससे बढ़कर, यह न्याय और ताड़ना के कार्य के कारण है जो परमेश्वर ने मनुष्य में कार्यान्वित किए हैं। यदि तुम लोग परमेश्वर के न्याय, ताड़ना और परीक्षण से रहित हो, और यदि परमेश्वर ने तुम्हें कष्ट नहीं दिया है, तो सच यह है कि तुम लोग परमेश्वर से सच में प्रेम नहीं करते। मनुष्य में परमेश्वर का काम जितना बड़ा होता है, और जितने अधिक मनुष्य के कष्ट होते हैं, उतना ही अधिक यह स्पष्ट होता है कि परमेश्वर का कार्य कितना अर्थपूर्ण है और उतना ही अधिक उस मनुष्य का हृदय परमेश्वर से सच्चा प्रेम कर पाता है। तुम परमेश्वर से प्रेम करना कैसे सीखते हो? यातना और शोधन के बिना, पीड़ादायक परीक्षणों के बिना―और इसके अलावा यदि परमेश्वर ने मनुष्य को अनुग्रह, प्रेम और दया ही प्रदान की होती―तो क्या तुम परमेश्वर को सच्चा प्रेम कर पाते? एक ओर, परमेश्वर की ओर से आने वाली परीक्षाओं के दौरान मनुष्य अपनी कमियों को जान पाता है और देख पाता है कि वह महत्वहीन, घृणित, और निकृष्ट है, और उसके पास कुछ नहीं है, और वह कुछ नहीं है; दूसरी ओर, उसके परीक्षणों के दौरान परमेश्वर मनुष्य के लिए भिन्न वातावरणों की रचना करता है जो मनुष्य को परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव करने के अधिक योग्य बनाता है। यद्यपि पीड़ा अधिक होती है और कभी-कभी तो असहनीय हो जाती है—मिटा कर रख देने वाले कष्ट तक भी पहुँच जाती है—परंतु इसका अनुभव करने के बाद मनुष्य देखता है कि उसमें परमेश्वर का कार्य कितना मनोहर है, और केवल इसी नींव पर मनुष्य में परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम का जन्म होता है। आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर के अनुग्रह, प्रेम और उसकी दया मात्र से वह स्वयं को सही मायने में जान सकने में असमर्थ है, और वह मनुष्य के सार को तो जान ही नहीं सकता है। केवल परमेश्वर के शोधन और न्याय के द्वारा, और शोधन की प्रक्रिया के दौरान ही व्यक्ति अपनी कमियों को और इस बात को जान सकता है कि उसके पास कुछ भी नहीं है। इस प्रकार, मनुष्य का परमेश्वर के प्रति प्रेम परमेश्वर की ओर से आने वाले शोधन और न्याय की नींव पर आधारित होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो' से उद्धृत

जब परमेश्वर मनुष्य को शुद्ध करने के लिए कार्य करता है, तो मनुष्य को कष्ट होता है। जितना अधिक मनुष्य का शुद्धिकरण होगा, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम उतना अधिक विशाल होगा, और परमेश्वर की शक्ति उसमें उतनी ही अधिक प्रकट होगी। इसके विपरीत, मनुष्य का शुद्धिकरण जितना कम होता है, उतना ही कम परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम होता है, और परमेश्वर की उतनी ही कम शक्ति उस में प्रकट होगी। एक व्यक्ति का शुद्धिकरण एवं दर्द जितना ज़्यादा होता है तथा जितनी अधिक यातना वो सहता है, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम उतना ही गहरा होगा एवं परमेश्वर में उसका विश्वास उतना ही अधिक सच्चा होगा, और परमेश्वर के विषय में उसका ज्ञान भी उतना ही अधिक गहन होगा। तुम अपने अनुभवों में देखोगे कि जो शुद्धि पाते हुए अत्यधिक दर्द सहते हैं, जिनके साथ काफी निपटारा तथा अनुशासन का व्यवहार किया जाता है, और तुम देखोगे कि यही लोग हैं जिनके पास परमेश्वर के प्रति गहरा प्रेम होता है, और उनके पास परमेश्वर का अधिक गहन एवं तीक्ष्ण ज्ञान होता है। ऐसे लोग जिन्होंने निपटारा किए जाने का अनुभव नहीं किया है, जिनके पास केवल सतही ज्ञान होता है, और जो केवल यह कह सकते हैं: "परमेश्वर बहुत अच्छा है, वह लोगों को अनुग्रह प्रदान करता है ताकि वे परमेश्वर में आनन्दित हो सकें।" यदि लोगों ने निपटारा किए जाने का अनुभव किया है और अनुशासित किए गए हैं, तो वे परमेश्वर के विषय में सच्चे ज्ञान के बारे में बोलने में समर्थ हैं। अतः मनुष्य में परमेश्वर का कार्य जितना ज़्यादा अद्भुत होता है, उतना ही ज़्यादा यह मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण होता है। यह तुम्हारे लिए जितना अधिक अभेद्य होता है और यह तुम्हारी धारणाओं के साथ जितना अधिक असंगत होता है, परमेश्वर का कार्य उतना ही अधिक तुम्हें जीतने और तुम्हें प्राप्त करने में समर्थ होता है, और तुम्हें परिपूर्ण बना पाता है। परमेश्वर के कार्य का महत्व बहुत अधिक है! यदि उसने मनुष्य को इस तरीके से शुद्ध नहीं किया, यदि उसने इस पद्धति के अनुसार कार्य नहीं किया, तो उसका कार्य अप्रभावी और महत्वहीन होगा। पहले यह कहा गया था कि परमेश्वर इस समूह को चुनेगा और प्राप्त करेगा, वह उन्हें अंत के दिनों में पूर्ण बनाएगा; इसमें असाधारण महत्व है। वह तुम लोगों के भीतर जितना बड़ा काम करता है, उतना ही ज़्यादा तुम लोगों का प्रेम गहरा एवं शुद्ध होता है। परमेश्वर का काम जितना अधिक विशाल होता है, उतना ही अधिक उसकी बुद्धि के बारे में समझने में तुम लोग समर्थ होते हो और उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान उतना ही अधिक गहरा होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण जितना बड़ा होता है, लोगों के हृदय उतने ही अधिक परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम हो जाते हैं। उनके हृदय की यातना उनके जीवन के लिए लाभदायक होती है, वे परमेश्वर के समक्ष अधिक शांत रह सकते हैं, परमेश्वर के साथ उनका संबंध और अधिक निकटता का हो जाता है, और वे परमेश्वर के सर्वोच्च प्रेम और उसके सर्वोच्च उद्धार को और अच्छी तरह से देख पाते हैं। पतरस ने सैकड़ों बार शुद्धिकरण का अनुभव किया, और अय्यूब कई परीक्षणों से गुजरा। यदि तुम लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाना चाहते हो, तो तुम लोगों को भी सैकड़ों बार शुद्धिकरण से होकर गुजरना होगा; केवल इस प्रक्रिया से गुजरने और इस कदम पर निर्भर रहने के माध्यम से ही तुम लोग परमेश्वर की इच्छा पूरी कर पाओगे और परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाओगे। शुद्धिकरण वह सर्वोत्तम साधन है, जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, केवल शुद्धिकरण और कड़वे परीक्षण ही लोगों के हृदय में परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम उत्पन्न कर सकते हैं। कठिनाई के बिना लोगों में परमेश्वर के लिए सच्चे प्रेम की कमी रहती है; यदि भीतर से उनको परखा नहीं जाता, और यदि वे सच में शुद्धिकरण के भागी नहीं बनाए जाते, तो उनके हृदय बाहर ही भटकते रहेंगे। एक निश्चित बिंदु तक शुद्धिकरण किए जाने के बाद तुम अपनी स्वयं की निर्बलताएँ और कठिनाइयाँ देखोगे, तुम देखोगे कि तुममें कितनी कमी है और कि तुम उन अनेक समस्याओं पर काबू पाने में असमर्थ हो, जिनका तुम सामना करते हो, और तुम देखोगे कि तुम्हारी अवज्ञा कितनी बड़ी है। केवल परीक्षणों के दौरान ही लोग अपनी सच्ची अवस्थाओं को सचमुच जान पाते हैं; और परीक्षण लोगों को पूर्ण किए जाने के लिए अधिक योग्य बनाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर का प्रेम देखना चाहते हो, यदि तुम उसका प्रेम सच में अनुभव करना चाहते हो, तो तुम्हें वास्तविकता की गहराई में जाना चाहिए, तुम्हें वास्तविक जीवन की गहराई में जाना चाहिए और देखना चाहिए कि परमेश्वर जो भी करता है वह सब प्रेम और उद्धार है, कि वह सब कुछ इसलिए करता है ताकि जो भी अशुद्ध है लोग उसे पीछे छोड़ पाएँ, और मनुष्य के भीतर परमेश्वर की इच्छा को पूरा नहीं कर पाने वाली चीजों को शुद्ध कर पाएँ। परमेश्वर मनुष्य को पोषण प्रदान करने के लिए वचनों का उपयोग करता है; वह लोगों के अनुभव के लिए वास्तविक जीवन की परिस्थितियाँ सँजोता है, और यदि लोग परमेश्वर के अनेक वचनों को खाते और पीते हैं, और फिर जब वे उन्हें वास्तव में अभ्यास में लाते हैं, तब वे परमेश्वर के अनेक वचनों का उपयोग करके अपने जीवन की सभी कठिनाइयाँ हल कर सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि वास्तविकता की गहराई में जाने के लिए तुम्हारे पास परमेश्वर के वचन होने चाहिए; यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते नहीं हो और परमेश्वर के कार्य से वंचित हो, तो वास्तविक जीवन में तुम्हारे पास कोई मार्ग नहीं होगा। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को कभी भी खाओगे और पीओगे नहीं, तो जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होगा तब तुम भौंचक्के रह जाओगे। तुम बस इतना जानते हो कि तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, लेकिन तुम भेद कर पाने में असमर्थ हो, और तुम्हारे पास अभ्यास का मार्ग नहीं है; तुम मंदबुद्धि और भ्रमित हो, और कभी-कभी तुम यह तक मान लेते हो कि देह को संतुष्ट करके तुम परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हो—यह सब परमेश्वर के वचनों को न खाने और पीने का ही परिणाम है। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि तुम परमेश्वर के वचनों की मदद के बिना हो, और वास्तविकता के भीतर बस टटोलते भर हो, तो तुम अभ्यास का मार्ग खोजने में मूलतः असमर्थ हो। ऐसे लोग समझते ही नहीं कि परमेश्वर में विश्वास करने का क्या अर्थ है, परमेश्वर से प्रेम करने का अर्थ तो वे और भी नहीं समझते। यदि परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन का उपयोग करके तुम प्रायः प्रार्थना, खोजबीन और तलाश करते हो, और इसके माध्यम से तुम उसका पता लगाते हो जिसे तुम्हें अभ्यास में लाना है, यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य के लिए अवसरों को ढूँढ़ पाते हो, परमेश्वर के साथ सचमुच सहयोग करते हो, और मंदबुद्धि तथा भ्रमित नहीं हो, तो वास्तविक जीवन में तुम्हारे पास एक मार्ग होगा और तुम परमेश्वर को सच में संतुष्ट कर पाओगे। जब तुमने परमेश्वर को संतुष्ट कर लिया होगा, तब तुम्हारे भीतर परमेश्वर का मार्गदर्शन होगा और तुम परमेश्वर द्वारा विशेष रूप से धन्य किए जाओगे, जो तुम्हें आनंद की अनुभूति देगा : तुम विशेष रूप से सम्मानित महसूस करोगे कि तुमने परमेश्वर को संतुष्ट किया है, तुम अपने भीतर विशेष रूप से प्रसन्नचित्त महसूस करोगे, और तुम्हारा हृदय शुद्ध और शांत होगा। तुम्हारी अंतरात्मा को सुकून मिलेगा और वह दोषारोपणों से मुक्त होगी, और जब तुम अपने भाइयों और बहनों को देखोगे तो मन में प्रसन्नता महसूस करोगे। परमेश्वर के प्रेम का आनंद लेने का यही अर्थ है, और केवल यही परमेश्वर का सचमुच आनंद लेना है। लोगों द्वारा परमेश्वर के प्रेम का आनंद अनुभव के माध्यम से प्राप्त किया जाता है : कष्ट का अनुभव करके, और सत्य को अभ्यास में लाने का अनुभव करके, वे परमेश्वर के आशीष प्राप्त करते हैं। यदि तुम केवल कहते हो कि परमेश्वर तुमसे वास्तव में प्रेम करता है, कि परमेश्वर ने लोगों की ख़ातिर सचमुच भारी मूल्य चुकाया है, कि उसने धैर्यपूर्वक और कृपापूर्वक इतने सारे वचन कहे हैं और वह हमेशा लोगों को बचाता है, तो तुम्हारे द्वारा इन शब्दों को कहा जाना परमेश्वर के आनंद का बस एक पक्ष है। तथापि इससे भी अधिक बड़ा आनंद—वास्तविक आनंद—तब है जब लोग अपने वास्तविक जीवन में सत्य को अभ्यास में लाते हैं, जिसके बाद वे अपने हृदय में शांत और शुद्ध महसूस करते हैं। वे अपने भीतर बहुत ही द्रवित महसूस करते हैं, और यह महसूस करते हैं कि परमेश्वर सर्वाधिक प्रेम करने योग्य है। तुम महसूस करोगे कि जो कीमत तुमने चुकाई है, वह सर्वथा उपयुक्त है। अपने प्रयासों में भारी कीमत चुकाने के बाद तुम अपने भीतर विशेष रूप से प्रसन्नचित्त महसूस करोगे : तुम महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद ले रहे हो और तुम यह समझ जाओगे कि परमेश्वर ने लोगों में उद्धार का कार्य किया है, कि उसके द्वारा लोगों के शुद्धिकरण का अभीष्ट उन्हें शुद्ध करना है, और परमेश्वर यह परखने के लिए कि लोग उसे सचमुच प्रेम करते हैं या नहीं, उनकी परीक्षा लेता है। यदि तुम हमेशा सत्य को इस तरह अभ्यास में लाते हो, तो तुम धीरे-धीरे परमेश्वर के बहुत-से कार्य का स्पष्ट ज्ञान विकसित कर लोगे, और उस समय तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर के वचन तुम्हारे सामने शीशे की तरह साफ हैं। यदि तुम कई सत्य स्पष्ट रूप से समझ सकते हो, तो तुम महसूस करोगे कि सभी विषयों को अभ्यास में लाना आसान है, कि तुम किसी भी विषय पर विजय पा सकते हो और किसी भी प्रलोभन पर विजय पा सकते हो, और तुम देखोगे कि तुम्हारे लिए कुछ भी कठिन नहीं है, जो तुम्हें अत्यधिक मुक्त कर देगा और स्वतंत्र कर देगा। इस क्षण तुम परमेश्वर के प्रेम का आनंद ले रहे होगे और परमेश्वर का सच्चा प्रेम तुम तक पहुँच गया होगा। परमेश्वर उन्हें धन्य करता है जिनके पास दर्शन होते हैं, जिनके पास सत्य होता है, जिनके पास ज्ञान होता है, और जो उससे सचमुच प्रेम करते हैं। यदि लोग परमेश्वर का प्रेम देखना चाहते हैं, तो उन्हें वास्तविक जीवन में सत्य को अभ्यास में लाना होगा, उन्हें पीड़ा सहने और जिससे वे प्यार करते हैं उसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए त्याग देने के लिए तैयार रहना होगा, और आँखों में आँसू होने के बावजूद उन्हें परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने में सक्षम होना होगा। इस तरह, परमेश्वर तुम्हें निश्चित रूप से धन्य करेगा, और यदि तुम ऐसे कष्ट सहोगे, तो इसके बाद पवित्र आत्मा का कार्य शुरू होगा। वास्तविक जीवन के माध्यम से, और परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने के माध्यम से लोग परमेश्वर की सुंदरता को देख पाने में सक्षम होते हैं, और यदि उन्होंने परमेश्वर के प्रेम का स्वाद चखा है, तभी वे सचमुच उससे प्रेम कर सकते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

तुम सत्य को जितना अधिक अभ्यास में लाते हो, उतना ही अधिक सत्य तुम्हारे पास होता है; तुम सत्य को जितना अधिक अभ्यास में लाते हो, उतना ही अधिक परमेश्वर का प्रेम तुम्हारे पास होता है; और तुम जितना अधिक सत्य को अभ्यास में लाते हो, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाते हो। यदि तुम हमेशा इसी तरह अभ्यास करते हो, तो तुम्हारे प्रति परमेश्वर का प्रेम तुम्हें उत्तरोत्तर देखने में सक्षम बनाएगा, ठीक वैसे ही जैसे पतरस परमेश्वर को जानने लगा था : पतरस ने कहा कि परमेश्वर के पास न केवल स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों का सृजन करने की बुद्धि है, बल्कि इससे भी बढ़कर, उसके पास लोगों में वास्तविक कार्य करने की बुद्धि है। पतरस ने कहा कि परमेश्वर लोगों का प्रेम पाने के योग्य है तो केवल इसलिए नहीं कि उसने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजें बनाई हैं, बल्कि, इससे भी बढ़कर इसलिए कि वह मनुष्य को सृजित करने, मनुष्य को बचाने, मनुष्य को पूर्ण बनाने और मनुष्य को उत्तराधिकार में अपना प्रेम देने में सक्षम है। इसलिए, पतरस ने यह भी कहा कि परमेश्वर में बहुत कुछ है जो मनुष्य के प्रेम के योग्य है। पतरस ने यीशु से कहा : "क्या स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों का सृजन करना ही एकमात्र कारण है कि तुम लोगों के प्रेम के अधिकारी हो? तुममें और भी बहुत कुछ है, जो प्रेम करने के योग्य है। तुम वास्तविक जीवन में कार्य करते और चलते-फिरते हो, तुम्हारा आत्मा मुझे भीतर तक स्पर्श करता है, तुम मुझे अनुशासित करते हो, तुम मुझे डाँट-फटकार लगाते हो—ये चीजें तो लोगों का प्रेम पाने के और भी अधिक योग्य हैं।" यदि तुम परमेश्वर के प्रेम को देखना और अनुभव करना चाहते हो, तो तुम्हें उसे वास्तविक जीवन में खोजना और ढूँढ़ना चाहिए और अपनी देह को एक तरफ रखने के लिए तैयार होना चाहिए। तुम्हें यह संकल्प अवश्य लेना चाहिए। तुम्हें एक ऐसा संकल्पबद्ध व्यक्ति होना चाहिए जो आलसी हुए बिना या देह के आनंदों की अभिलाषा किए बिना सभी चीजों में परमेश्वर को संतुष्ट कर पाए, जो देह के लिए न जिए बल्कि परमेश्वर के लिए जिए। ऐसे भी अवसर हो सकते हैं जब तुम परमेश्वर को संतुष्ट न कर पाओ। वह इसलिए क्योंकि तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हो; अगली बार, भले ही तुम्हें अधिक प्रयास करना पड़े, तुम्हें उसे अवश्य संतुष्ट करना चाहिए, न कि तुम्हें देह को संतुष्ट करना चाहिए। जब तुम इस तरह अनुभव करोगे, तब तुम परमेश्वर को जानने लगे होगे। तुम देखोगे कि परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों की सृष्टि कर सकता है, कि वह देहधारी हुआ ही इसलिए है कि लोग वास्तव में उसे देख सकें और वास्तव में उसके साथ जुड़ सकें; तुम देखोगे कि वह मनुष्यों के बीच चलने में सक्षम है, और उसका पवित्र आत्मा लोगों को वास्तविक जीवन में पूर्ण बना सकता है, और उन्हें अपनी सुंदरता देखने और अपना अनुशासन, अपनी ताड़ना और अपने आशीष अनुभव करने दे सकता है। यदि तुम हमेशा इसी तरह अनुभव करते रहते हो, तो तुम वास्तविक जीवन में परमेश्वर से अविभाज्य रहोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं रह जाता है, तो तुम डाँट-फटकार झेल पाओगे और पश्चात्ताप महसूस कर पाओगे। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होगा, तो तुम परमेश्वर को कभी छोड़ना नहीं चाहोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर कहे कि वह तुम्हें छोड़ देगा, तो तुम भयभीत हो जाओगे, और कहोगे कि परमेश्वर द्वारा छोड़े जाने के बजाय तुम मर जाना पसंद करोगे। जैसे ही तुम्हारे मन में ये भावनाएँ आएंगी, तुम महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर को छोड़ पाने में असमर्थ हो, और इस तरह तुम्हारे पास एक नींव होगी, और तुम परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद लोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

पतरस के जीवन की ऐसी कोई भी चीज़ जो परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं करती थी उसे असहज महसूस करवाती थी। यदि वह परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं करती, तो वह ग्लानि से भरा महसूस करता, और ऐसे उपयुक्त रास्ते की तलाश करता जिसके द्वारा वह परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए पूरा ज़ोर लगा पाता। अपने जीवन के छोटे से छोटे और महत्वहीन पहलुओं में भी, वह अब भी परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने की स्वयं से अपेक्षा करता था। जब उसके पुराने स्वभाव की बात आती तब भी वह स्वयं से ज़रा भी कम अपेक्षा नहीं करता था, सत्य में अधिक गहराई तक आगे बढ़ने के लिए स्वयं से अपनी अपेक्षाओं में सदैव अत्यधिक कठोर होता था। ... परमेश्वर में अपने विश्वास में, पतरस ने प्रत्येक चीज़ में परमेश्वर को संतुष्ट करने की चेष्टा की थी, और उस सब की आज्ञा मानने की चेष्टा की थी जो परमेश्वर से आया था। रत्ती भर शिकायत के बिना, वह ताड़ना और न्याय, साथ ही शुद्धिकरण, घोर पीड़ा और अपने जीवन की वंचनाओं को स्वीकार कर पाता था, जिनमें से कुछ भी परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदल नहीं सका था। क्या यह परमेश्वर के प्रति सर्वोत्तम प्रेम नहीं था? क्या यह परमेश्वर के सृजित प्राणी के कर्तव्य की पूर्ति नहीं थी? चाहे ताड़ना में हो, न्याय में हो, या घोर पीड़ा में हो, तुम मृत्यु पर्यंत आज्ञाकारिता प्राप्त करने में सदैव सक्षम होते हो, और यह वह है जो परमेश्वर के सृजित प्राणी को प्राप्त करना चाहिए, यह परमेश्वर के प्रति प्रेम की शुद्धता है। यदि मनुष्य इतना प्राप्त कर सकता है, तो वह परमेश्वर का गुणसंपन्न सृजित प्राणी है, और ऐसा कुछ भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की इच्छा को इससे बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सकता हो। कल्पना करो कि तुम परमेश्वर के लिए कार्य कर पाते हो, किंतु तुम परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानते हो, और परमेश्वर से सच्चे अर्थ में प्रेम करने में असमर्थ हो। इस तरह, तुमने न केवल परमेश्वर के सृजित प्राणी के अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं किया होगा, बल्कि तुम्हें परमेश्वर द्वारा निंदित भी किया जाएगा, क्योंकि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य से युक्त नहीं है, जो परमेश्वर का आज्ञापालन करने में असमर्थ है, और जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी है। तुम केवल परमेश्वर के लिए कार्य करने की परवाह करते हो, और सत्य को अभ्यास में लाने, या स्वयं को जानने की परवाह नहीं करते हो। तुम सृष्टिकर्ता को समझते या जानते नहीं हो, और सृष्टिकर्ता का आज्ञापालन या उससे प्रेम नहीं करते हो। तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के प्रति स्वाभाविक रूप से अवज्ञाकारी है, और इसलिए ऐसे लोग सृष्टिकर्ता के प्रिय नहीं हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

अपने जीवनकाल में पतरस ने सैकड़ों बार शुद्धिकरण का अनुभव किया और वह कई दर्दनाक अग्निपरीक्षाओं से होकर गुजरा। यह शुद्धिकरण परमेश्वर के लिए उसके सर्वोच्च प्रेम की नींव और उसके संपूर्ण जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अनुभव बन गया। वह परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम एक तरह से परमेश्वर से प्रेम करने के अपने संकल्प के कारण रख पाया; परंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप में, यह उस शुद्धिकरण और पीड़ा के कारण था, जिसमें से वह होकर गुजरा। यह पीड़ा परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग पर उसकी मार्गदर्शक और ऐसी चीज़ बन गई, जो उसके लिए सबसे अधिक यादगार थी। यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करते हुए शुद्धिकरण की पीड़ा से नहीं गुजरते, तो उनका प्रेम अशुद्धियों और अपनी स्वयं की प्राथमिकताओं से भरा होता है; ऐसा प्रेम शैतान के विचारों से भरा होता है, और मूलत: परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में असमर्थ होता है। परमेश्वर से प्रेम करने का संकल्प रखना परमेश्वर से सच में प्रेम करने के समान नहीं है। यद्यपि अपने हृदय में जो कुछ वे सोचते हैं, वह परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने की खातिर ही होता है, और भले ही उनके विचार पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित और मानवीय विचारों से रहित प्रतीत होते हैं, परंतु जब उनके विचार परमेश्वर के सामने लाए जाते हैं, तो वह ऐसे विचारों को प्रशंसा या आशीष नहीं देता। यहाँ तक कि जब लोग समस्त सत्यों को पूरी तरह से समझ लेते हैं—जब वे उन सबको जान जाते हैं—तो इसे भी परमेश्वर से प्रेम करने का संकेत नहीं माना जा सकता, यह नहीं कहा जा सकता कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करते हैं। शुद्धिकरण से गुजरे बिना अनेक सत्यों को समझ लेने के बावजूद लोग इन सत्यों को अभ्यास में लाने में असमर्थ होते हैं; केवल शुद्धिकरण के दौरान ही लोग इन सत्यों का वास्तविक अर्थ समझ सकते हैं, केवल तभी लोग वास्तव में उनके आंतरिक अर्थ जान सकते हैं। उस समय, जब वे पुनः प्रयास करते हैं, तब वे उपयुक्त रूप से और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सत्यों को अभ्यास में ला सकते हैं; उस समय उनके मानवीय विचार कम हो जाते हैं, उनकी मानवीय भ्रष्टता घट जाती है, और उनकी मानवीय संवेदनाएँ कम हो जाती हैं; केवल उसी समय उनका अभ्यास परमेश्वर के प्रति प्रेम की सच्ची अभिव्यक्ति होता है। परमेश्वर के प्रति प्रेम के सत्य का प्रभाव मौखिक ज्ञान या मानसिक तैयारी से हासिल नहीं किया जा सकता, और न ही इसे केवल सत्य को समझने से हासिल किया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि लोग एक मूल्य चुकाएँ, और कि वे शुद्धिकरण के दौरान अधिक कड़वाहट से होकर गुजरें, केवल तभी उनका प्रेम शुद्ध और परमेश्वर के हृदय के अनुसार होगा। अपनी इस अपेक्षा में कि मनुष्य उससे प्रेम करे, परमेश्वर यह माँग नहीं करता कि मनुष्य अपने जोश या मरज़ी का प्रयोग करके उससे प्रेम करे; केवल वफ़ादारी और उसकी सेवा के लिए सत्य के प्रयोग के माध्यम से ही मनुष्य उससे सच में प्रेम कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

मनुष्य को अर्थपूर्ण जीवन जीने का प्रयास अवश्य करना चाहिए और उसे अपनी वर्तमान परिस्थितियों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। पतरस की छवि के अनुरूप अपना जीवन जीने के लिए, उसमें पतरस के ज्ञान और अनुभवों का होना जरूरी है। मनुष्य को ज़्यादा ऊँची और गहन चीजों के लिए अवश्य प्रयास करना चाहिए। उसे परमेश्वर को अधिक गहराई एवं शुद्धता से प्रेम करने का, और एक ऐसा जीवन जीने का प्रयास अवश्य करना चाहिए जिसका कोई मोल हो और जो सार्थक हो। सिर्फ यही जीवन है; तभी मनुष्य पतरस जैसा बन पाएगा। तुम्हें सकारात्मक तरीके से प्रवेश के लिए सक्रिय होने पर ध्यान देना चाहिए, और अधिक गहन, विशिष्ट और व्यावहारिक सत्यों को नजरअंदाज करते हुए क्षणिक आराम के लिए पीछे नहीं हट जाना चाहिए। तुम्हारा प्रेम व्यावहारिक होना चाहिए, और तुम्हें जानवरों जैसे इस निकृष्ट और बेपरवाह जीवन को जीने के बजाय स्वतंत्र होने के रास्ते ढूँढ़ने चाहिए। तुम्हें एक ऐसा जीवन जीना चाहिए जो अर्थपूर्ण हो और जिसका कोई मोल हो; तुम्हें अपने-आपको मूर्ख नहीं बनाना चाहिए या अपने जीवन को एक खिलौना नहीं समझना चाहिए। परमेश्वर से प्रेम करने की चाह रखने वाले व्यक्ति के लिए कोई भी सत्य अप्राप्य नहीं है, और ऐसा कोई न्याय नहीं जिस पर वह अटल न रह सके। तुम्हें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए और इस प्रेम का उपयोग करके उसकी इच्छा को कैसे संतुष्ट करना चाहिए? तुम्हारे जीवन में इससे बड़ा कोई मुद्दा नहीं है। सबसे बढ़कर, तुम्हारे अंदर ऐसी आकांक्षा और कर्मठता होनी चाहिए, न कि तुम्हें एक रीढ़विहीन और निर्बल प्राणी की तरह होना चाहिए। तुम्हें सीखना चाहिए कि एक अर्थपूर्ण जीवन का अनुभव कैसे किया जाता है, तुम्हें अर्थपूर्ण सत्यों का अनुभव करना चाहिए, और अपने-आपसे लापरवाही से पेश नहीं आना चाहिए। यह अहसास किए बिना, तुम्हारा जीवन तुम्हारे हाथ से निकल जाएगा; क्या उसके बाद तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करने का दूसरा अवसर मिलेगा? क्या मनुष्य मरने के बाद परमेश्वर से प्रेम कर सकता है? तुम्हारे अंदर पतरस के समान ही आकांक्षाएँ और चेतना होनी चाहिए; तुम्हारा जीवन अर्थपूर्ण होना चाहिए, और तुम्हें अपने साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए! एक मनुष्य के रूप में, और परमेश्वर का अनुसरण करने वाले एक व्यक्ति के रूप में, तुम्हें इस योग्य होना होगा कि तुम बहुत ध्यान से यह विचार कर सको कि तुम्हें अपने जीवन के साथ कैसे पेश आना चाहिए, तुम्हें अपने-आपको परमेश्वर के सम्मुख कैसे अर्पित करना चाहिए, तुममें परमेश्वर के प्रति और अधिक अर्थपूर्ण विश्वास कैसे होना चाहिए और चूँकि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, तुम्हें उससे कैसे प्रेम करना चाहिए कि वह ज्यादा पवित्र, ज्यादा सुंदर और बेहतर हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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