2. क्या पृथ्वी पर मौजूद मसीह को प्रेम किए बिना बस स्वर्ग के परमेश्वर से प्रेम करना सच में परमेश्वर से प्रेम करना है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर का सार मनुष्य के विश्वास मात्र के लिए नहीं है; इससे भी बढ़कर यह मनुष्य के प्रेम के लिए है। परंतु परमेश्वर में विश्वास करने वालों में से बहुत-से लोग यह "रहस्य" खोज पाने में अक्षम हैं। लोग परमेश्वर से प्रेम करने का साहस नहीं करते, न ही वे उसे प्रेम करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कभी खोजा ही नहीं कि परमेश्वर के विषय में प्रेम करने लायक कितना कुछ है; उन्होंने कभी जाना ही नहीं कि परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मनुष्य से प्रेम करता है, और परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मनुष्य द्वारा प्रेम किए जाने के लिए है। परमेश्वर की सुंदरता उसके कार्य में अभिव्यक्त होती है : लोग उसकी सुंदरता को तभी खोज सकते हैं जब वे उसके कार्य का अनुभव करते हैं; केवल अपने वास्तविक अनुभवों में ही वे परमेश्वर की सुंदरता को महसूस कर सकते हैं; और वास्तविक जीवन में इसका अवलोकन किए बिना कोई परमेश्वर की सुंदरता को नहीं खोज सकता। परमेश्वर के बारे में प्रेम करने के लिए इतना कुछ है, परंतु लोग उसके साथ वास्तव में जुड़े बिना इसे खोज पाने में अक्षम हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि परमेश्वर देहधारी नहीं हुआ होता, तो लोग वास्तव में उसके साथ जुडने में असमर्थ होते, और यदि वे उसके साथ वास्तव में नहीं जुड़ पाते, तो वे उसके कार्य को अनुभव भी नहीं कर पाते—और इसलिए परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम अत्यधिक झूठ और कल्पना से दूषित होता। स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति प्रेम उतना वास्तविक नहीं है जितना पृथ्वी पर परमेश्वर के प्रति प्रेम है, क्योंकि स्वर्ग के परमेश्वर के विषय में लोगों का ज्ञान उनकी कल्पनाओं पर आधारित है, बजाय उस पर आधारित होने के, जो उन्होंने अपनी आँखों से देखा है और जो उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तब लोग उसके वास्तविक कर्मों और उसकी सुंदरता को देख पाते हैं, और वे उसके व्यवहारिक और सामान्य स्वभाव का सब कुछ देख सकते हैं, जो पूरा का पूरा स्वर्ग के परमेश्वर के ज्ञान की अपेक्षा हजारों गुना अधिक वास्तविक है। स्वर्ग के परमेश्वर से लोग चाहे जितना भी प्रेम करते हों, इस प्रेम के विषय में कुछ भी वास्तविक नहीं है, और यह पूरी तरह मानवीय विचारों से भरा हुआ है। पृथ्वी पर परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम चाहे जितना भी कम क्यों न हो, यह प्रेम वास्तविक है; अगर यह बहुत थोड़ा-सा भी है, तो भी यह वास्तविक है। परमेश्वर वास्तविक कार्य के माध्यम से उसे जानने के लिए लोगों को उत्प्रेरित करता है, और इस ज्ञान के माध्यम से वह उनका प्रेम प्राप्त करता है। यह पतरस के समान है : यदि वह यीशु के साथ नहीं रहा होता, तो उसके लिए यीशु को इतना चाह पाना असंभव होता। इसी तरह, यीशु के प्रति उसकी वफादारी भी यीशु से उसके जुड़ाव पर ही आधारित थी। मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करे, इसीलिए परमेश्वर मनुष्यों के बीच आया है और मनुष्य के साथ रहता है, और वह मनुष्य को जो भी दिखाता और अनुभव कराता है, वही परमेश्वर की वास्तविकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे' से उद्धृत

मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह केवल उन्हीं चीजों से प्यार करता है, जिन्हें वह देख या स्पर्श नहीं कर सकता, जो अत्यधिक रहस्यमयी और अद्भुत होती हैं, और जो मनुष्यों द्वारा अकल्पनीय और अप्राप्य हैं। जितनी अधिक अवास्तविक ये वस्तुएँ होती हैं, उतना ही अधिक लोगों द्वारा उनका विश्लेषण किया जाता है, और यहाँ तक कि लोग अन्य सभी से बेपरवाह होकर भी उनकी खोज करते हैं और उन्हें प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। जितना अधिक अवास्तविक ये चीज़ें होती हैं, उतना ही अधिक बारीकी से लोग उनकी जाँच और विश्लेषण करते हैं और, यहाँ तक कि इतनी दूर चले जाते हैं कि उनके बारे में अपने स्वयं के व्यापक विचार बना लेते हैं। इसके विपरीत, चीजें जितनी अधिक वास्तविक होती है, लोग उनके प्रति उतने ही अधिक उपेक्षापूर्ण होते हैं; वे केवल उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं और यहाँ तक कि उनके प्रति तिरस्कारपूर्ण भी हो जाते हैं। क्या यही प्रवृत्ति तुम लोगों की उस यथार्थपरक कार्य के प्रति नहीं है, जो मैं आज करता हूँ? ये चीज़ें जितनी अधिक वास्तविक होती हैं, उतना ही अधिक तुम लोग उनके विरुद्ध पूर्वाग्रही हो जाते हो। तुम उनकी जाँच करने के लिए ज़रा भी समय नहीं निकालते, बल्कि केवल उनकी उपेक्षा कर देते हो; तुम लोग इन यथार्थवादी, निम्नस्तरीय अपेक्षाओं को हेय दृष्टि से देखते हो, और यहाँ तक कि इस परमेश्वर के बारे में कई धारणाओं को प्रश्रय देते हो, जो कि सर्वाधिक वास्तविक है, और बस उसकी वास्तविकता और सामान्यता को स्वीकार करने में अक्षम हो। इस तरह, क्या तुम लोग एक अज्ञात विश्वास नहीं रखते? तुम लोगों का अतीत के अज्ञात परमेश्वर में अचल विश्वास है, और आज के वास्तविक परमेश्वर में कोई रुचि नहीं है। क्या ऐसा इसलिए नहीं है, क्योंकि कल का परमेश्वर और आज का परमेश्वर दो भिन्न-भिन्न युगों से हैं? क्या ऐसा इसलिए भी नहीं है, क्योंकि कल का परमेश्वर स्वर्ग का उच्च परमेश्वर है, जबकि आज का परमेश्वर धरती पर एक छोटा-सा मनुष्य है? इसके अलावा, क्या ऐसा इसलिए नहीं है, क्योंकि मनुष्यों द्वारा आराधना किया जाने वाला परमेश्वर उनकी अपनी धारणाओं से उत्पन्न हुआ है, जबकि आज का परमेश्वर धरती पर उत्पन्न, वास्तविक देह है? हर चीज पर विचार करने के बाद, क्या ऐसा इसलिए नहीं है, क्योंकि आज का परमेश्वर इतना अधिक वास्तविक है कि मनुष्य उसकी खोज नहीं करता? क्योंकि आज का परमेश्वर लोगों से जो कहता है, वह ठीक वही है, जिसे करने के लिए लोग सबसे अधिक अनिच्छुक हैं, और जो उन्हें लज्जित महसूस करवाता है। क्या यह लोगों के लिए चीज़ों को कठिन बनाना नहीं है? क्या यह उसके दागों को उघाड़ नहीं देता? इस प्रकार से, वास्तविकता की खोज न करने वालों में से कई लोग देहधारी परमेश्वर के शत्रु बन जाते हैं, मसीह-विरोधी बन जाते हैं। क्या यह एक स्पष्ट तथ्य नहीं है? अतीत में, जब परमेश्वर का अभी देह बनना बाकी था, तो तुम कोई धार्मिक हस्ती या कोई धर्मनिष्ठ विश्वासी रहे होगे। परमेश्वर के देह बनने के बाद ऐसे कई धर्मनिष्ठ विश्वासी अनजाने में मसीह-विरोधी बन गए। क्या तुम जानते हो, यहाँ क्या चल रहा है? परमेश्वर पर अपने विश्वास में तुम वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित नहीं करते या सत्य की खोज नहीं करते, बल्कि इसके बजाय तुम झूठ से ग्रस्त हो जाते हो—क्या यह देहधारी परमेश्वर के प्रति तुम्हारी शत्रुता का स्पष्टतम स्रोत नहीं है? देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है, इसलिए क्या देहधारी परमेश्वर पर विश्वास न करने वाले सभी लोग मसीह-विरोधी नहीं हैं? इसलिए क्या तुम जिस पर विश्वास करते हो और जिससे प्रेम करते हो, वह सच में देहधारी परमेश्वर है? क्या यही वास्तव में जीवित, श्वास लेता हुआ वह परमेश्वर है, जो बहुत ही वास्तविक और असाधारण रूप से सामान्य है? तुम्हारी खोज का ठीक-ठीक क्या उद्देश्य है? क्या यह स्वर्ग में है या पृथ्वी पर? क्या यह एक धारणा है या सत्य? क्या यह परमेश्वर है या कोई अलौकिक प्राणी? वास्तव में, सत्य जीवन की सर्वाधिक वास्तविक सूक्ति है, और मानवजाति के बीच इस तरह की सूक्तियों में सर्वोच्च है। क्योंकि यही वह अपेक्षा है, जो परमेश्वर मनुष्य से करता है, और यही परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाने वाला कार्य है, इसीलिए इसे "जीवन की सूक्ति" कहा जाता है। यह कोई ऐसी सूक्ति नहीं है, जिसे किसी चीज में से संक्षिप्त किया गया है, न ही यह किसी महान हस्ती द्वारा कहा गया कोई प्रसिद्ध उद्धरण है। इसके बजाय, यह स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीजों के स्वामी का मानवजाति के लिए कथन है; यह मनुष्य द्वारा किया गया कुछ वचनों का सारांश नहीं है, बल्कि परमेश्वर का अंतर्निहित जीवन है। और इसीलिए इसे "समस्त जीवन की सूक्तियों में उच्चतम" कहा जाता है। लोगों की सत्य को अभ्यास में लाने की खोज उनके कर्तव्य का निर्वाह है, अर्थात्, यह परमेश्वर की अपेक्षा पूरी करने की कोशिश है। इस अपेक्षा का सार किसी भी मनुष्य द्वारा प्राप्त न किए जा सकने योग्य खोखले सिद्धांत के बजाय, सभी सत्यों में सबसे अधिक वास्तविक है। यदि तुम्हारी खोज सिद्धांत के अलावा कुछ नहीं है और वह वास्तविकता से युक्त नहीं है, तो क्या तुम सत्य के विरुद्ध विद्रोह नहीं करते हो? क्या तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो, जो सत्य पर आक्रमण करता है? ऐसा व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम की अभिलाषा रखने वाला कैसे हो सकता है? वास्तविकता से रहित लोग वे लोग हैं, जो सत्य के साथ विश्वासघात करते हैं, और वे सभी सहज रूप से विद्रोही हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं' से उद्धृत

तुम सभी परमेश्वर के समक्ष पुरस्कृत होने और उसका अनुग्रह पाने की इच्छा रखते हो; सभी ऐसी चीजों की आशा करते हैं, जब वे परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करते हैं, क्योंकि सभी उच्चतर चीजों की खोज में लीन रहते हैं, और कोई भी दूसरों से पीछे नहीं रहना चाहता। लोग बस ऐसे ही हैं। यही कारण है कि तुम लोगों में से बहुत-से लोग लगातार स्वर्ग के परमेश्वर की चापलूसी करके उसका अनुग्रह पाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि वास्तव में, परमेश्वर के प्रति तुम लोगों की निष्ठा और निष्कपटता अपने प्रति तुम लोगों की निष्ठा और निष्कपटता से बहुत कम है। मैं यह क्यों कह रहा हूँ? क्योंकि मैं परमेश्वर के प्रति तुम लोगों की निष्ठा को बिलकुल भी स्वीकार नहीं करता, और इसलिए भी, क्योंकि मैं उस परमेश्वर के अस्तित्व को नकारता हूँ, जो तुम लोगों के दिलों में है। दूसरे शब्दों में, जिस परमेश्वर की तुम लोग आराधना करते हो, जिस अस्पष्ट परमेश्वर का तुम लोग गुणगान करते हो, उसका कोई अस्तित्व नहीं है। मैं यह इतनी निश्चितता से इसलिए कह सकता हूँ, क्योंकि तुम लोग सच्चे परमेश्वर से बहुत दूर हो। तुम लोगों की निष्ठा का कारण तुम लोगों के दिलों के भीतर की मूर्ति है; इस बीच, मेरी नज़र में, जिस परमेश्वर को तुम लोग मानते हो, वह न तो बड़ा है और न ही छोटा, तुम लोग उसे केवल शब्दों से स्वीकार करते हो। जब मैं कहता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर से बहुत दूर हो, तो मेरा मतलब है कि तुम लोग सच्चे परमेश्वर से दूर हो, जबकि अस्पष्ट परमेश्वर निकट प्रतीत होता है। जब मैं कहता हूँ, "बड़ा नहीं," तो यह इस संदर्भ में है कि आज तुम लोग जिस परमेश्वर में विश्वास रखते हो, वह केवल महान क्षमताओं से रहित कोई व्यक्ति प्रतीत होता है, ऐसा व्यक्ति जो बहुत बुलंद नहीं है। और जब मैं "छोटा नहीं" कहता हूँ, तो इसका मतलब है कि हालाँकि यह व्यक्ति हवा को नहीं बुला सकता और बारिश को आज्ञा नहीं दे सकता, फिर भी वह परमेश्वर के आत्मा को वह कार्य करने के लिए बुलाने में सक्षम है, जो आकाश और पृथ्वी को हिला देता है, और लोगों को पूरी तरह से भौचक्का कर देता है। बाहरी तौर पर, तुम सभी पृथ्वी पर इस मसीह के प्रति अत्यधिक आज्ञाकारी दिखाई देते हो, किंतु सार में, तुम लोगों को उस में विश्वास नहीं है, और न ही तुम उससे प्यार करते हो। दूसरे शब्दों में, जिसमें तुम लोग वास्तव में विश्वास रखते हो, वह तुम लोगों की खुद की भावनाओं का अस्पष्ट परमेश्वर है, और जिसे तुम लोग वास्तव में प्यार करते हो, वह वो परमेश्वर है जिसके लिए तुम दिन-रात तरसते हो, किंतु जिसे तुमने व्यक्तिगत रूप से कभी नहीं देखा है। किंतु इस मसीह के प्रति तुम्हारा विश्वास खंडित और शून्य है। विश्वास का अर्थ है आस्था और भरोसा; प्रेम का अर्थ है व्यक्ति के हृदय में श्रद्धा और प्रशंसा, कभी वियोग नहीं। किंतु आज के मसीह के प्रति तुम लोगों का विश्वास और प्रेम इससे बहुत कम है। जब विश्वास की बात आती है, तो तुम लोग कैसे उसमें विश्वास रखते हो? जब प्यार की बात आती है, तो तुम लोग किस तरह से उससे प्यार करते हो? तुम लोगों को उसके स्वभाव की कोई समझ ही नहीं है, उसके सार को तो तुम बिलकुल भी नहीं जानते, तो फिर तुम लोग उसमें विश्वास कैसे रखते हो? उसमें तुम लोगों के विश्वास की वास्तविकता कहाँ है? तुम लोग उसे कैसे प्यार करते हो? उसके प्रति तुम लोगों के प्यार की वास्तविकता कहाँ है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

कार्य के कई वर्षों के दौरान तुम लोगों ने कई सत्य देखे हैं, किंतु क्या तुम लोग जानते हो कि मेरे कानों ने क्या सुना है? तुम में से कितने लोग सत्य को स्वीकारने के लिए तैयार हैं? तुम सब लोग विश्वास करते हो कि तुम सत्य के लिए कीमत चुकाने को तैयार हो, किंतु तुम लोगों में से कितनों ने वास्तव में सत्य के लिए दुःख झेला है? तुम लोगों के हृदय में अधार्मिकता के सिवाय कुछ नहीं है, जिससे तुम लोगों को लगता है कि हर कोई, चाहे वह कोई भी हो, धोखेबाज और कुटिल है—यहाँ तक कि तुम यह भी विश्वास करते हो कि देहधारी परमेश्वर, किसी सामान्य मनुष्य की तरह, दयालु हृदय या कृपालु प्रेम से रहित हो सकता है। इससे भी अधिक, तुम लोग विश्वास करते हो कि कुलीन चरित्र और दयालु, कृपालु प्रकृति केवल स्वर्ग के परमेश्वर में ही होती है। तुम लोग विश्वास करते हो कि ऐसा कोई संत नहीं होता, कि केवल अंधकार एवं दुष्टता ही पृथ्वी पर राज करते हैं, जबकि परमेश्वर एक ऐसी चीज़ है, जिसे लोग अच्छाई और सुंदरता के लिए अपने मनोरथ सौंपते हैं, वह उनके द्वारा गढ़ी गई एक किंवदंती है। तुम लोगों के विचार से, स्वर्ग का परमेश्वर बहुत ही ईमानदार, धार्मिक और महान है, आराधना और श्रद्धा के योग्य है, जबकि पृथ्वी का यह परमेश्वर स्वर्ग के परमेश्वर का एक स्थानापन्न और साधन है। तुम विश्वास करते हो कि यह परमेश्वर स्वर्ग के परमेश्वर के समकक्ष नहीं हो सकता, उनका एक-साथ उल्लेख तो बिलकुल नहीं किया जा सकता। जब परमेश्वर की महानता और सम्मान की बात आती है, तो वे स्वर्ग के परमेश्वर की महिमा से संबंधित होते हैं, किंतु जब मनुष्य की प्रकृति और भ्रष्टता की बात आती है, तो ये ऐसे लक्षण हैं जिनमें पृथ्वी के परमेश्वर का एक अंश है। स्वर्ग का परमेश्वर हमेशा उत्कृष्ट है, जबकि पृथ्वी का परमेश्वर हमेशा ही नगण्य, कमज़ोर और अक्षम है। स्वर्ग के परमेश्वर में भावना नहीं, केवल धार्मिकता है, जबकि धरती के परमेश्वर के केवल स्वार्थपूर्ण उद्देश्य हैं और वह निष्पक्षता और विवेक से रहित है। स्वर्ग के परमेश्वर में थोड़ी-सी भी कुटिलता नहीं है और वह हमेशा विश्वसनीय है, जबकि पृथ्वी के परमेश्वर में हमेशा बेईमानी का एक पक्ष होता है। स्वर्ग का परमेश्वर मनुष्यों से बहुत प्रेम करता है, जबकि पृथ्वी का परमेश्वर मनुष्य की पर्याप्त परवाह नहीं करता, यहाँ तक कि उसकी पूरी तरह से उपेक्षा करता है। यह त्रुटिपूर्ण ज्ञान तुम लोगों के हृदय में काफी समय से रखा गया है और भविष्य में भी बनाए रखा जा सकता है। तुम लोग मसीह के सभी कर्मों पर अधार्मिकता के दृष्टिकोण से विचार करते हो और उसके सभी कार्यों और साथ ही उसकी पहचान और सार का मूल्यांकन दुष्ट के परिप्रेक्ष्य से करते हो। तुम लोगों ने बहुत गंभीर गलती की है और ऐसा काम किया है, जो तुमसे पहले के लोगों ने कभी नहीं किया। अर्थात्, तुम लोग केवल अपने सिर पर मुकुट धारण करने वाले स्वर्ग के उत्कृष्ट परमेश्वर की सेवा करते हो और उस परमेश्वर की सेवा कभी नहीं करते, जिसे तुम इतना महत्वहीन समझते हो, मानो वह तुम लोगों को दिखाई तक न देता हो। क्या यह तुम लोगों का पाप नहीं है? क्या यह परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध तुम लोगों के अपराध का विशिष्ट उदाहरण नहीं है? तुम लोग स्वर्ग के परमेश्वर की आराधना करते हो। तुम बुलंद छवियों से प्रेम करते हो और उन लोगों का सम्मान करते हो, जो अपनी वाक्पटुता के लिए प्रतिष्ठित हैं। तुम सहर्ष उस परमेश्वर द्वारा नियंत्रित हो जाते हो, जो तुम लोगों के हाथ धन-दौलत से भर देता है, और उस परमेश्वर के लिए बहुत अधिक लालायित रहते हो जो तुम्हारी हर इच्छा पूरी कर सकता है। तुम केवल इस परमेश्वर की आराधना नहीं करते, जो अभिमानी नहीं है; तुम केवल इस परमेश्वर के साथ जुड़ने से घृणा करते हो, जिसे कोई मनुष्य ऊँची नज़र से नहीं देखता। तुम केवल इस परमेश्वर की सेवा करने के अनिच्छुक हो, जिसने तुम्हें कभी एक पैसा नहीं दिया है, और जो तुम्हें अपने लिए लालायित करवाने में असमर्थ है, वह केवल यह अनाकर्षक परमेश्वर ही है। इस प्रकार का परमेश्वर तुम्हारे क्षितिज को विस्तृत करने में, तुम्हें खज़ाना मिल जाने का एहसास करने में सक्षम नहीं बना सकता, तुम्हारी इच्छा पूरी तो बिलकुल नहीं कर सकता। तो फिर तुम उसका अनुसरण क्यों करते हो? क्या तुमने कभी इस तरह के प्रश्न पर विचार किया है? तुम जो करते हो, वह केवल इस मसीह का ही अपमान नहीं करता, बल्कि, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, वह स्वर्ग के परमेश्वर का अपमान करता है। मेरे विचार से परमेश्वर पर तुम लोगों के विश्वास का यह उद्देश्य नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

तुम लोग लालायित रहते हो कि परमेश्वर तुम पर प्रसन्न हो, मगर तुम लोग परमेश्वर से दूर हो। यह क्या मामला है? तुम लोग केवल उसके वचनों को स्वीकार करते हो, उसके व्यवहार या काट-छाँट को नहीं, उसके प्रत्येक प्रबंध को स्वीकार करने, उस पर पूर्ण विश्वास रखने में तो तुम बिलकुल भी समर्थ नहीं हो। तो आखिर मामला क्या है? अंतिम विश्लेषण में, तुम लोगों का विश्वास अंडे के खाली खोल के समान है, जो कभी चूज़ा पैदा नहीं कर सकता। क्योंकि तुम लोगों का विश्वास तुम्हारे लिए सत्य लेकर नहीं आया है या उसने तुम्हें जीवन नहीं दिया है, बल्कि इसके बजाय तुम लोगों को पोषण और आशा का एक भ्रामक बोध दिया है। पोषण और आशा का बोध ही परमेश्वर पर तुम लोगों के विश्वास का उद्देश्य है, सत्य और जीवन नहीं। इसलिए मैं कहता हूँ कि परमेश्वर पर तुम लोगों के विश्वास का आधार चापलूसी और बेशर्मी से परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं रहा है, और उसे किसी भी तरह से सच्चा विश्वास नहीं माना जा सकता। इस प्रकार के विश्वास से कोई चूज़ा कैसे पैदा हो सकता है? दूसरे शब्दों में, इस तरह के विश्वास से क्या हासिल हो सकता है? परमेश्वर पर तुम लोगों के विश्वास का प्रयोजन तुम्हारे अपने लक्ष्य पूरे करने के लिए परमेश्वर का उपयोग करना है। क्या यह तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के स्वभाव के अपमान का एक और तथ्य नहीं है? तुम लोग स्वर्ग के परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो, परंतु पृथ्वी के परमेश्वर के अस्तित्व से इनकार करते हो; लेकिन मैं तुम लोगों के विचार स्वीकार नहीं करता; मैं केवल उन लोगों की सराहना करता हूँ, जो अपने पैरों को ज़मीन पर रखते हैं और पृथ्वी के परमेश्वर की सेवा करते हैं, किंतु उनकी सराहना कभी नहीं करता, जो पृथ्वी के मसीह को स्वीकार नहीं करते। ऐसे लोग स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति कितने भी वफादार क्यों न हों, अंत में वे दुष्टों को दंड देने वाले मेरे हाथ से बचकर नहीं निकल सकते। ये लोग दुष्ट हैं; ये वे बुरे लोग हैं, जो परमेश्वर का विरोध करते हैं और जिन्होंने कभी खुशी से मसीह का आज्ञापालन नहीं किया है। निस्संदेह, उनकी संख्या में वे सब सम्मिलित हैं जो मसीह को नहीं जानते, और इसके अलावा, उसे स्वीकार नहीं करते। क्या तुम समझते हो कि जब तक तुम स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति वफादार हो, तब तक मसीह के प्रति जैसा चाहो वैसा व्यवहार कर सकते हो? गलत! मसीह के प्रति तुम्हारी अज्ञानता स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति अज्ञानता है। तुम स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति चाहे कितने भी वफादार क्यों न हो, यह मात्र खोखली बात और दिखावा है, क्योंकि पृथ्वी का परमेश्वर मनुष्य के लिए न केवल सत्य और अधिक गहरा ज्ञान प्राप्त करने में सहायक है, बल्कि इससे भी अधिक, मनुष्य की भर्त्सना करने और उसके बाद दुष्टों को दंडित करने के लिए तथ्य हासिल करने में सहायक है। क्या तुमने यहाँ लाभदायक और हानिकारक परिणामों को समझ लिया है? क्या तुमने उनका अनुभव किया है? मैं चाहता हूँ कि तुम लोग शीघ्र ही किसी दिन इस सत्य को समझो : परमेश्वर को जानने के लिए तुम्हें न केवल स्वर्ग के परमेश्वर को जानना चाहिए, बल्कि, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, पृथ्वी के परमेश्वर को भी जानना चाहिए। अपनी प्राथमिकताओं को गड्डमड्ड मत करो या गौण को मुख्य की जगह मत लेने दो। केवल इसी तरह से तुम परमेश्वर के साथ वास्तव में एक अच्छा संबंध बना सकते हो, परमेश्वर के नज़दीक हो सकते हो, और अपने हृदय को उसके और अधिक निकट ले जा सकते हो। यदि तुम काफी वर्षों से विश्वासी रहे हो और लंबे समय से मुझसे जुड़े हुए हो, किंतु फिर भी मुझसे दूर हो, तो मैं कहता हूँ कि अवश्य ही तुम प्रायः परमेश्वर के स्वभाव का अपमान करते हो, और तुम्हारे अंत का अनुमान लगाना बहुत मुश्किल होगा। यदि मेरे साथ कई वर्षों का संबंध न केवल तुम्हें ऐसा मनुष्य बनाने में असफल रहा है जिसमें मानवता और सत्य हो, बल्कि, इससे भी अधिक, उसने तुम्हारे दुष्ट तौर-तरीकों को तुम्हारी प्रकृति में बद्धमूल कर दिया है, और न केवल तुम्हारा अहंकार पहले से दोगुना हो गया है, बल्कि मेरे बारे में तुम्हारी गलतफहमियाँ भी कई गुना बढ़ गई हैं, यहाँ तक कि तुम मुझे अपना छोटा सह-अपराधी मान लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हारा रोग अब त्वचा में ही नहीं रहा, बल्कि तुम्हारी हड्डियों तक में घुस गया है। तुम्हारे लिए बस यही शेष बचा है कि तुम अपने अंतिम संस्कार की व्यवस्था किए जाने की प्रतीक्षा करो। तब तुम्हें मुझसे प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है कि मैं तुम्हारा परमेश्वर बनूँ, क्योंकि तुमने मृत्यु के योग्य पाप किया है, एक अक्षम्य पाप किया है। मैं तुम पर दया कर भी दूँ, तो भी स्वर्ग का परमेश्वर तुम्हारा जीवन लेने पर जोर देगा, क्योंकि परमेश्वर के स्वभाव के प्रति तुम्हारा अपराध कोई साधारण समस्या नहीं है, बल्कि बहुत ही गंभीर प्रकृति का है। जब समय आएगा, तो मुझे दोष मत देना कि मैंने तुम्हें पहले नहीं बताया था। मैं फिर से कहता हूँ : जब तुम मसीह—पृथ्वी के परमेश्वर—से एक साधारण मनुष्य के रूप में जुड़ते हो, अर्थात् जब तुम यह मानते हो कि यह परमेश्वर एक व्यक्ति के अलावा कुछ नहीं है, तो तुम नष्ट हो जाओगे। तुम सबके लिए मेरी यही एकमात्र चेतावनी है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

पतरस को सबसे अधिक किस बात का पछतावा हुआ? पतरस के यह कहने के शीघ्र बाद कि "तू जीवित परमेश्वर का पुत्र है", यीशु ने पतरस से एक और प्रश्न पूछा (यद्यपि यह बाइबल में इस प्रकार से दर्ज नहीं है)। यीशु ने उससे पूछा : "पतरस! क्या तूने कभी मुझसे प्रेम किया है?" पतरस उसका अभिप्राय समझ गया और बोला : "प्रभु! मैंने एक बार स्वर्गिक पिता से प्रेम किया था, किंतु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने तुझसे कभी प्रेम नहीं किया।" तब यीशु ने कहा, "यदि लोग स्वर्गिक परमेश्वर से प्रेम नहीं करते, तो वे पृथ्वी पर पुत्र से कैसे प्रेम कर सकते हैं? और यदि लोग परमपिता परमेश्वर द्वारा भेजे गए पुत्र से प्रेम नहीं करते, तो वे स्वर्गिक पिता से कैसे प्रेम कर सकते हैं? यदि लोग वास्तव में पृथ्वी पर पुत्र से प्रेम करते हैं, तो वे स्वर्गिक पिता से भी वास्तव में प्रेम करते हैं।" जब पतरस ने इन वचनों को सुना, तो उसने महसूस किया कि उसमें क्या कमी है। उसे अपने इन शब्दों पर कि "मैंने एक बार स्वर्गिक पिता से प्रेम किया था, किंतु मैंने तुझसे कभी प्रेम नहीं किया," हमेशा इतना पछतावा महसूस होता था कि उसकी आँखों में आँसू आ जाते थे। यीशु के पुनर्जीवित होने और स्वर्गारोहण करने के बाद उसे अपने इन शब्दों पर और भी अधिक पछतावा और दुःख महसूस हुआ। अपने अतीत के कार्यों और अपनी वर्तमान कद-काठी को याद कर, वह प्राय: प्रार्थना करने के लिए यीशु के सामने आता, परमेश्वर की इच्छा पूरी न कर पाने और परमेश्वर के मानकों पर खरा न उतर पाने के कारण हमेशा पछतावा और ऋण महसूस करता। ये मामले उसका सबसे बड़ा बोझ बन गए। उसने कहा : "एक दिन मैं तुझे वह सब अर्पित कर दूँगा, जो मेरे पास है और जो मैं हूँ, मैं तुझे वह दूँगा जो सबसे अधिक मूल्यवान है।" उसने कहा : "परमेश्वर! मेरे पास केवल एक ही विश्वास और केवल एक ही प्रेम है। मेरे जीवन का कुछ भी मूल्य नहीं है, और मेरे शरीर का कुछ भी मूल्य नहीं है। मेरे पास केवल एक ही विश्वास और केवल एक ही प्रेम है। मेरे मन में तेरे लिए विश्वास है और हृदय में तेरे लिए प्रेम है; ये ही दो चीज़ें मेरे पास तुझे देने के लिए हैं, और कुछ नहीं।" पतरस यीशु के वचनों से बहुत प्रोत्साहित हुआ, क्योंकि यीशु को सलीब पर चढ़ाए जाने से पहले उसने पतरस से कहा था : "मैं इस संसार का नहीं हूँ, और तू भी इस संसार का नहीं है।" बाद में, जब पतरस एक अत्यधिक पीड़ादायक स्थिति में पहुँचा, तो यीशु ने उसे स्मरण दिलाया : "पतरस, क्या तू भूल गया है? मैं इस संसार का नहीं हूँ, और मैं सिर्फ अपने कार्य के लिए ही पहले चला गया। तू भी इस संसार का नहीं है, क्या तू सचमुच भूल गया है? मैंने तुझे दो बार बताया है, क्या तुझे याद नहीं है?" यह सुनकर पतरस ने कहा : "मैं नहीं भूला हूँ!" तब यीशु ने कहा : "तूने एक बार मेरे साथ स्वर्ग में एक खुशहाल समय और मेरी बगल में एक समयावधि बिताई थी। तू मुझे याद करता है और मैं तुझे याद करता हूँ। यद्यपि सृजित प्राणी मेरी दृष्टि में उल्लेखनीय नहीं हैं, फिर भी मैं किसी निर्दोष और प्यार करने योग्य प्राणी को कैसे प्रेम न करूँ? क्या तू मेरी प्रतिज्ञा भूल गया है? तुझे धरती पर मेरा आदेश स्वीकार करना चाहिए; तुझे वह कार्य पूरा करना चाहिए, जो मैंने तुझे सौंपा है। एक दिन मैं तुझे अपनी ओर आने के लिए निश्चित रूप से तेरी अगुआई करूँगा।" यह सुनने के बाद पतरस और भी अधिक उत्साहित हो गया तथा उसे और भी अधिक प्रेरणा मिली, इतनी कि जब वह सलीब पर था, तो यह कहने में समर्थ था : "परमेश्वर! मैं तुझे पर्याप्त प्यार नहीं कर सकता! यहाँ तक कि यदि तू मुझे मरने के लिए कहे, तब भी मैं तुझे पर्याप्त प्यार नहीं कर सकता! तू जहाँ कहीं भी मेरी आत्मा को भेजे, चाहे तू अपनी पिछली प्रतिज्ञाएँ पूरी करे या न करे, इसके बाद तू चाहे जो कुछ भी करे, मैं तुझे प्यार करता हूँ और तुझ पर विश्वास करता हूँ।" उसके पास जो था, वह था उसका विश्वास और सच्चा प्रेम।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस ने यीशु को कैसे जाना' से उद्धृत

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परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :जो कोई देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता—अर्थात, जो कोई प्रत्यक्ष परमेश्वर या उसके कार्य और वचनों पर विश्वास...

4. देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले लोगों के बीच मूलभूत अंतर

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है और मसीह परमेश्वर के आत्मा द्वारा धारण की गई देह है। यह देह किसी भी मनुष्य की देह...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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