3. क्यों बिना आत्मज्ञान के स्वभाव में बदलाव और उद्धार नहीं पाया जा सकता

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मनुष्य के स्वभाव में बदलाव उसके सार के ज्ञान से शुरू होता है और यह उसकी सोच, प्रकृति, और मानसिक दृष्टिकोण तक जाना चाहिये—मौलिक परिवर्तन होना चाहिये। केवल इसी ढंग से मनुष्य के स्वभाव में सच्चे बदलाव आ सकेंगे। मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव शैतान के द्वारा उसे जहर दिये जाने और रौंदे जाने के कारण उपजा है, उस प्रबल नुकसान से उपजा है जिसे शैतान ने उसकी सोच, नैतिकता, अंतर्दृष्टि, और समझ को पहुँचाया है। क्योंकि मनुष्य की मौलिक चीजें शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दी गईं हैं, और पूरी तरह से उसके विपरीत हैं जैसा परमेश्वर ने मूल रूप से इंसान को बनाया था, इसी कारण ही मनुष्य परमेश्वर का विरोध करता है और सत्य को नहीं समझता। इस प्रकार, मनुष्य के स्वभाव में बदलाव उसकी सोच, अंतर्दृष्टि और समझ में बदलाव के साथ शुरू होना चाहिए जो परमेश्वर और सत्य के बारे में उसके ज्ञान को बदलेगा। जो लोग अधिकतम गहराई से भ्रष्ट स्थानों में जन्मे हैं वे इस बारे में और अधिक अज्ञानी हैं कि परमेश्वर क्या है, या परमेश्वर में विश्वास करने का क्या अर्थ है। लोग जितने अधिक भ्रष्ट होते हैं, वे उतना ही कम परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में जानते हैं, और उनकी समझ और अंतर्दृष्टि उतनी ही खराब होती है। परमेश्वर के विरुद्ध मनुष्य के विरोध और उसकी विद्रोहशीलता का स्रोत शैतान के द्वारा उसकी भ्रष्टता है। क्योंकि वह शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, इसलिये मनुष्य की अंतरात्मा सुन्न हो गई है, वह अनैतिक हो गया है, उसके विचार पतित हो गए हैं, और उसका मानसिक दृष्टिकोण पिछड़ा हुआ है। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने से पहले, मनुष्य स्वाभाविक रूप से परमेश्वर का अनुसरण करता था और उसके वचनों को सुनने के बाद उनका पालन करता था। उसमें स्वाभाविक रूप से सही समझ और विवेक था, और उचित मानवता थी। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने के बाद, उसकी मूल समझ, विवेक, और मानवता मंद पड़ गई और शैतान के द्वारा दूषित हो गई। इस प्रकार, उसने परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता और प्रेम को खो दिया है। मनुष्य की समझ पथ से हट गई है, उसका स्वभाव एक जानवर के समान हो गया है, और परमेश्वर के प्रति उसकी विद्रोहशीलता और भी अधिक बढ़ गई है और गंभीर हो गई है। लेकिन फिर भी, मनुष्य इसे न तो जानता है और न ही पहचानता है, और केवल आँख बंद करके विरोध और विद्रोह करता है। मनुष्य के स्वभाव का प्रकाशन उसकी समझ, अंतर्दृष्टि, और अंत:करण का प्रकटीकरण है; और क्योंकि उसकी समझ और अंतर्दृष्टि सही नहीं हैं, और उसका अंत:करण अत्यंत मंद पड़ गया है, इसलिए उसका स्वभाव परमेश्वर के प्रति विद्रोही है। यदि मनुष्य की समझ और अंतर्दृष्टि बदल नहीं सकती, तो फिर उसके स्वभाव में ऐसा बदलाव होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, जो परमेश्वर के हृदय के अनुकूल हो। यदि मनुष्य की समझ सही नहीं है, तो वह परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकता और परमेश्वर के द्वारा उपयोग के लिए अयोग्य है। "उचित समझ" के मायने हैं परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना और उसके प्रति निष्ठावान बने रहना, परमेश्वर के लिए तड़पना, परमेश्वर के प्रति पूर्णतया शुद्ध होना, और परमेश्वर के प्रति अंत:करण रखना, यह परमेश्वर के साथ एक हृदय और मन होने को दर्शाता है, जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने को नहीं। पथभ्रष्ट समझ का होना ऐसा नहीं है। चूँकि मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था इसलिये, उसने परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना लीं, और परमेश्वर के लिए उसके अंदर निष्ठा या तड़प नहीं रही है, परमेश्वर के प्रति अंतरात्मा की तो बात ही क्या। मनुष्य जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करता और उस पर दोष लगाता है, और इसके अलावा, उसकी पीठ पीछे उस पर अपशब्दों का प्रहार करता है। मनुष्य स्पष्ट रूप से जानता है कि वह परमेश्वर है, फिर भी उसकी पीठ पीछे उस पर दोष लगाता है, परमेश्वर की आज्ञापालन का उसका कोई भी इरादा नहीं होता, वह सिर्फ परमेश्वर से अंधाधुंध माँग और निवेदन करता रहता है। ऐसे लोग—जिनकी समझ पथभ्रष्ट होती है—वे अपने घृणित स्वभाव को जानने या अपनी विद्रोहशीलता पर पछतावा करने के अयोग्य होते हैं। यदि लोग अपने आप को जानने के योग्य हों, तो फिर वे अपनी समझ को थोड़ा-सा पुनः प्राप्त कर चुके हैं; परमेश्वर के प्रति अधिक विद्रोही लोग, जो अपने आप को अब तक नहीं जान पाये, उनमें समझ उतनी ही कम होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

हमारे दिल में मौजूद हर एक चीज़ परमेश्वर के विरोध में है। इसमें वे चीज़ें शामिल हैं जो हमें लगता है कि अच्छी हैं, और वे चीज़ें भी जिन्हें हम पहले से ही सकारात्मक मानते हैं। हमने इन चीज़ों को सत्यों के रूप में, सामान्य मानवता के हिस्से के रूप में और सकारात्मक चीज़ों के रूप में सूचीबद्ध किया है; हालाँकि, परमेश्वर के दृष्टिकोण से, ये वे चीजें हैं जिनसे वह घृणा करता है। परमेश्वर द्वारा बोले गए सत्यऔर जो हम सोचते हैं, उसके बीच की खाई को नापा नहीं जा सकता। इसलिए, हमें स्वयं को जानना चाहिए। हमारे विचारों, दृष्टिकोणों और क्रियाओं से लेकर हमें जो सांस्कृतिक शिक्षा प्राप्त हुई है, उसमें से प्रत्येक चीज़ गहराई से समझने और विश्लेषण किए जाने के योग्य है। इनमें से कुछ चीज़ें सामाजिक परिवेश से आती हैं, कुछ परिवारों से आती हैं, कुछ स्कूली शिक्षा से आती हैं, और कुछ किताबों से आती हैं। कुछ हमारी कल्पनाओं और धारणाओं से भी आती हैं। इस प्रकार की चीज़ें सबसे अधिक भयावह होती हैं, क्योंकि वे हमारे वचनों और कार्यों को बांधती और नियंत्रित करती हैं, हमारे मन पर हावी होती हैं, और हम जो भी करते हैं, उसमें हमारे उद्देश्यों, इरादों और लक्ष्यों का मार्गदर्शन करती हैं। अगर हम इन चीजों को बाहर न निकालें तो हम स्वयं में कभी भी परमेश्वर के वचनों को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाएँ गे, और हम कभी भी परमेश्वर की अपेक्षाओं को बेझिझक स्वीकार कर उन्हें अभ्यास में नहीं ला पाएँ गे। जब तक तुम अपने स्वयं के विचारों और दृष्टिकोणों को, और जिन चीज़ों को तुम सही मानते हो, उन्हें मन में रखोगे, तब तक तुम परमेश्वर के वचनों को कभी भी पूरी तरह से या बेहिचक स्वीकार नहीं करोगे, न ही तुम उनका मूल रूप में अभ्यास करोगे; निश्चित रूप से पहले अपने मन में उन्हें संसाधित करने के बाद ही तुम उन्हें अभ्यास में डालोगे। तुम इसी तरीक़े से काम करोगे, और दूसरों की मदद करने में भी तुम्हारा यही तरीक़ा होगा : भले ही तुम परमेश्वर के वचनों पर सहभागिता भी करो, लेकिन इसमें सदैव तुम्हारी अशुद्धियाँ मिली होंगी, तुम्हें लगेगा कि सत्य को अभ्यास में लाने का यही अर्थ है, कि तुमने सत्य को समझ लिया है, और तुम्हारे पास सब कुछ है। क्या मानव जाति की स्थिति दयनीय नहीं है? क्या यह भयावह नहीं है? एक-दो शब्द इन चीज़ों को उनकी संपूर्णता में बताने के लिए या उन्हें स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। बेशक, जीवन में और भी कई चीज़ें हैं, जैसे कि शैतान के सौ से भी अधिक विष, जिनका पहले सारांश प्रस्तुत किया गया है। तुम वचनों को समझ गए हो, लेकिन तुम उनसे खुद को कैसे मापते हो? क्या तुमने कभी आत्म-चिंतन किया है? क्या इन विषों में तुम्हारा भी हिस्सा नहीं है? वे यह भी दर्शाते हैं कि तुम कैसे सोचते हो, है ना? जब तुम काम करते हो, तो क्या तुम भी इन विषों पर भरोसा नहीं करते? तुम्हें अपने व्यक्तिगत अनुभव की गहराई से जाँच करनी चाहिए, और उसे उन वचनों से मापना चाहिए। अगर हम शैतान के विषों की उस सूची को लापरवाही से पढ़ते हैं या उडती नजर से देखते हैं और फिर उसे नीचे रख देते हैं, परमेश्वर के वचनों को बिना ध्यान दिए पढ़ते हैं, उन्हें वास्तविकता से जोड़ने में या अपनी वास्तविक स्थिति देखने में असमर्थ रहते हैं, और अपने अभ्यास में केवल परमेश्वर के वचनों के शब्दों और नियमों का ही पालन करते हैं और यह मानते हैं कि हम सत्य का अभ्यास कर रहे हैं—क्या यह इतना आसान है? लोग जीवित प्राणी हैं : उन सभी के पास विचार हैं, और उनके विचारों के भीतर की आकृतियाँ उनके दिलों में जड़ें जमाती हैं। जब व्यक्ति कार्य करता है, तो इन आकृतियों का उभर आना निश्चित है, क्योंकि वे पहले ही उस व्यक्ति का जीवन बन चुकी होती हैं। इसलिए, उस प्रत्येक चीज़ में, जो तुम करते हो, एक दृष्टिकोण और सिद्धांत होता है, जो उसे करने के तरीके को नियंत्रित करता है, तुम्हारे मार्ग को निर्देशित करता है। जब तुम कार्य करते हो, तो तुम्हें पता चल जाएगा कि तुम्हारे अंदर ऐसी चीज़ें मौजूद हैं या नहीं। अब, निश्चित रूप से, जब तुम अपने विचारों और दृष्टिकोणों की जाँच करते हो, तो तुम्हें लगता है मानो परमेश्वर के प्रति शत्रुता वाली कोई बात नहीं है; तुम्हें लगता है कि तुम ईमानदार और वफ़ादार हो, अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए सहर्ष तैयार रहते हो, बलिदान करने और परमेश्वर के लिए खुद को खपाने में सक्षम हो, और कि तुम हर क्षेत्र में काफ़ी मजबूत हो। लेकिन अगर परमेश्वर तुम्हारी क्षमता का परीक्षण करे, या तुम्हें कोई कार्य करने के लिए दे, या परमेश्वर कुछ ऐसा करे जो तुम पर आ पड़े, तो तुम उसे कैसे संभालोगे? ऐसे समय में तुम्हारे विचार और दृष्टिकोण तेजी से बाहर की ओर उमड़ेंगे, मानो बाँध टूट गया हो; वे तुम्हारे नियंत्रण से बाहर होंगे—तुम्हारे वश में नहीं रहेंगे—और चाहे तुम उनसे कितनी भी घृणा करो, वे फिर भी बाहर उमड़ पड़ेंगे, ऐसी चीज़ों का रेला, जो सब परमेश्वर की विरोधी हैं। जब तुम कहते हो, "मैं इसके बारे में कुछ क्यों नहीं कर सकता? मैं परमेश्वर का विरोध नहीं करना चाहता, तो फिर मैं क्यों करूँगा? मैं परमेश्वर की आलोचना नहीं करना चाहता, और मैं उसके कार्य के बारे में धारणाएँ नहीं रखना चाहता, तो फिर मेरे पास ऐसी धारणाएँ कैसे हो सकती हैं?"—यही वह समय है, जब तुम्हें स्वयं को जानने का प्रयास करना चाहिए, यह जाँचने के लिए कि तुम्हारे अंदर वह क्या है जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हारे अंदर की कौन-सी चीज़ उसके वर्तमान कार्य के प्रति शत्रुतापूर्ण और विरोधी है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

लोगों के भीतर कुछ परिस्थितियाँ, यदि वे उन्हें न समझें और उन्हें न लगे कि वे गलत हैं, तो फिर चाहे वे लोग कितनी ही गंभीरता से खोज करें या कितने ही उत्साही हों, एक दिन उनका पतन हो सकता है। आखिरकार, बहुत कम लोग ही सत्य प्राप्त कर पाते हैं। सत्य को समझना साधारण बात नहीं है। थोड़ा-सा समझने के लिए भी लंबा समय लग जाता है, अनुभव-जन्य ज्ञान पाने में, थोड़ी-सी शुद्ध समझ पाने में या थोड़ा-सा प्रकाश हासिल करने में लंबा समय लग जाता है। यदि तुम अपने भीतर की सभी अशुद्धियाँ दूर न करो, तो वह थोड़ा-सा प्रकाश का अंश किसी भी समय या जगह पर समाप्त हो सकता है। आज मनुष्य की सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि हर व्यक्ति के भीतर कुछ कल्पनाएं, अवधारणाएं, इच्छाएं और खोखले आदर्श हैं जिन्हें वे स्वयं भी नहीं खोज पाते। ये बातें लोगों के साथ हमेशा रहती हैं, उन्हें अंदर से गड्ड-मड्ड कर देती हैं। यह वस्तुत: बहुत खतरनाक है और लोग तो किसी भी समय अपनी व्यथा व्यक्त कर देते हैं। मनुष्य के अंदर मिलावट भरी पड़ी है। हालांकि हो सकता है कि लोगों की आकांक्षाएँ अच्छी हों, वे सत्य खोजना चाहते हों और गंभीरता से परमेश्वर में विश्वास रखना चाहते हों, फिर भी वे अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाते। इस तरह की चीज़ अक्सर हर किसी के अनुभव में आती है। उनके सामने कोई छोटा मामला आता है और लोगों को लगता है कि वे आसानी से इससे पीछा छुड़ा लेंगे। लेकिन वे ऐसा क्यों नहीं कर पाते? वे अपेक्षाकृत: अनुभवी लोग, जो दूसरों को तुलनात्मक रूप से मजबूत दिखते हैं, और जिनका मस्तिष्क स्पष्ट होता है, वे अधिकांशत कोई छोटा-सा मामला आते ही बिखर क्यों जाते हैं और इतनी जल्दीत पतित क्यों हो जाते हैं? मनुष्य सच में भाग्य की चंचलता के अधीन है; वह इसकी भविष्यवाणी कैसे कर सकता है? हर व्यक्ति के अंदर कुछ चीजें हैं जिनका वह अनुसरण करना और जिन्हें वह पाना चाहता है, और हर एक की अपनी पसंद होती है। अधिकतर, लोग यह खुद नहीं समझ पाते या उन्हें लगता है कि ये बातें ठीक हैं और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। फिर एक दिन ऐसी कोई चीज़ आ जाती है और वे ठोकर खा जाते हैं; वे नकारात्मक और कमजोर हो जाते हैं और वापस नहीं उठ पाते। संभवतः उन्हें खुद पता नहीं चल पाता कि समस्या क्या है, वे खुद को सही मानते हैं और सोचते हैं कि परमेश्वर ने उनके साथ गलत किया है। अगर लोग खुद को न समझ पाएँ, तो वे कभी नहीं जान पाएंगे कि उनकी समस्या कहाँ हैं या वे किस क्षेत्र में नाकाम और पतित हो सकते हैं। उनकी स्थिति दयनीय होती है। इसलिए जो लोग अपने आपको नहीं समझते, वे पतित और असफल हो सकते हैं और किसी भी समय खुद को तबाह कर सकते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल अपनी खुद की परिस्थितियों को समझ कर तुम सही रास्ते पर चल सकते हो' से उद्धृत

वर्तमान में, यह वह स्थिति है जिसमें अधिकतर लोग मौजूद हैं, जो उनके आध्यात्मिक कद का स्तर है : वे स्वीकार करते हैं कि उनके काम करने के तरीके त्रुटिपूर्ण हैं, कि वे बुरे व्यक्ति हैं, कि वे दानव हैं, शैतान हैं। लेकिन वे शायद ही कभी स्वीकार करते हैं कि उनकी क्षमता खराब है और उनकी समझ गलत है, या उनकी प्रकृति और सार के कौन-से क्षेत्र उस चीज से मेल खाते हैं, जिसे परमेश्वर द्वारा प्रकट किया गया है। इसमें सच्चे आत्मज्ञान का अभाव है। और क्या वे, जो वास्तव में खुद को नहीं जानते, स्वीकार कर सकते हैं कि वे भ्रष्ट हैं? (नहीं।) लोगों से यह स्वीकार करवाना कि वे भ्रष्ट हैं, आसान काम नहीं। लोगों का व्यवहार हमेशा यही रहता है कि कुछ गलत करने के बाद वे मानते हैं कि उन्होंने गलती की है, लेकिन अगर तुम उनसे उनके भ्रष्ट स्वभाव की उनकी समझ के बारे में पूछो, तो वे कहते हैं कि इन दोनों का आपस में कोई संबंध नहीं है। वे दावा करते हैं कि यह सिर्फ एक क्षणिक चूक थी, कि उन्होंने अच्छे से सोच-विचार नहीं किया था, वे आवेग में आकर ऐसा कर बैठे, और ऐसा उन्होंने जानबूझकर नहीं किया। अन्य वस्तुनिष्ठ कारणों के साथ, यह कहना कि यह एक क्षणिक चूक थी या अनजाने में हुई थी, अकसर अपने भ्रष्ट स्वभाव को स्वीकार न करने के लिए एक ढाल और बहाना होता है। क्या यह उनके द्वारा अपने भ्रष्टाचार की वास्तविक स्वीकृति है? अगर तुम स्वयं द्वारा प्रकट किए जाने वाले भ्रष्ट स्वभावों के लिए लगातार बहाने बना रहे हो या बचने का मार्ग तलाश रहे हो, तो तुम वास्तव में अपने भ्रष्ट स्वभाव का सामना करने या वास्तव में उसे स्वीकार करने में सक्षम नहीं हो, उसे जानने में सक्षम तो बिलकुल भी नहीं हो। ... तुम्हारे साथ कुछ होता है और तुम भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हो, लेकिन चाहे लोग कितना भी कहें कि तुमने जो क्या किया है वह गलत है या उसके परिणाम कितने गंभीर हैं, तुम अपनी गलती स्वीकार करने के अलावा कुछ नहीं करते। तुम यह मानने को तैयार नहीं होते कि यह तुम्हारे द्वारा भ्रष्ट स्वभाव उजागर करने का परिणाम है। तुम केवल त्रुटि सुधारने के लिए तैयार होते हो, लेकिन अपने भ्रष्ट स्वभाव के अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए कभी तैयार नहीं होते। और इसलिए, जब तुम्हारे सामने फिर वही समस्या आती है, तो हालाँकि तुम्हारे व्यवहार और चीजों के प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण में बदलाव हो गया होता है, लेकिन तुम्हारा स्वभाव पूरी तरह से अपरिवर्तित रहता है। व्यक्ति के स्वभाव को बदलने में यह कठिनाई है। अगर तुम यह स्वीकार करो कि तुमने जो प्रकट किया, वह इसलिए था क्योंकि तुम्हारा स्वभाव भ्रष्ट है, जिसके परिणामस्वरूप तुमने अपनी मर्जी से काम किया, नियम-कायदों की परवाह नहीं की, दूसरों के साथ अच्छी तरह से काम नहीं कर पाये, और तुमने अहंकार दिखाया, और अगर तुम स्वीकार करते हो कि यह एक अहंकारी स्वभाव के कारण हुआ, तो तुम्हें क्या लाभ होगा? आगे चलकर, तुम इन तथ्यों का खुलासा करोगे और खुद में प्रकट होने वाले भ्रष्ट स्वभावों को सुधारने का प्रयास करोगे। लेकिन अगर तुम केवल कुछ गलत करने की बात स्वीकार करते हो, तो उसके क्या परिणाम होंगे? तुम केवल अपने कार्य करने के तरीके पर ध्यान केंद्रित करोगे और उसी दिशा में प्रयास करोगे; तुम काम करने का तरीका सुधारोगे, और बाहर से ऐसा लगेगा कि तुम उन्हें सही तरीके से करते हो। तुम अपने स्वभाव के खुलासों को अस्पष्ट कर दोगे। ऐसा करने पर तुम और अधिक शातिर हो जाओगे, और दूसरों को धोखा देने की तुम्हारी तकनीकें और भी उन्नत हो जाएँगी। तुम सोचोगे, "इस बार सभी ने मेरी गलती इसलिए देख ली, क्योंकि मैं पर्याप्त सावधान नहीं था; मैंने जो कहा वह बहुत निर्णायक था, और मैंने उन्हें अपनी कमजोरियाँ देखने दीं और अपने खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए कुछ पता लगने दिया। मैं फिर से वही गलती नहीं करूँगा—मैं अस्पष्ट हो जाऊँगा, अपने लिए और गुंजाइश रखूँगा।" तुमने अपने कार्य करने का तरीका बदल दिया है और अपना स्वभाव छिपा लिया है, जिससे तुम और ज्यादा अनिश्चित, और ज्यादा धूर्त, और ज्यादा फरीसी के समान हो गए हो। तुम चीजों को करने या कहने के अपने तरीकों पर ध्यान केंद्रित करते हो और उन्हीं पर काम करते हो; सतह पर किसी भी समस्या का पता नहीं लगाया जा सकता, कोई दोष नहीं ढूँढ़ सकता, वह त्रुटिहीन होता है। लेकिन तुम्हारे आंतरिक स्वभाव में थोड़ा-सा भी बदलाव नहीं आता। जब तक तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव को स्वीकारते और मानते नहीं तब तक यह बदल नहीं सकता।

— परमेश्‍वर की संगति से उद्धृत

क्या भ्रष्ट स्वभाव को आसानी से बदला जा सकता है? इसके साथ व्यक्ति का प्रकृति सार जुड़ा होता है। लोगों में यह सार, यह मूल होता है, और इसे थोड़ा-थोड़ा करके खोद निकालने की जरूरत होती है। इसे हर अवस्था से बाहर निकालना होता है, तुम्हारे द्वारा बोले गए हर शब्द के पीछे छिपे इरादे से। इसे तुम्हारे द्वारा बोले गए शब्दों से विश्लेषित करके समझना होता है। जब यह बोध और स्पष्ट होने लगता है और तुम्हारी आत्मा और ज्यादा चतुर हो जाती है, तो तुम लोग यह बदलाव ला सकते हो। भ्रष्ट स्वभावों को हल करने के लिए देखभाल और परिश्रम की आवश्यकता होती है। तुम्हें बहुत ध्यान देना चाहिए और अपने इरादों और स्थितियों की थोड़ी-थोड़ी जाँच करनी चाहिए। जब तुम इन स्थितियों की लगातार जाँच करोगे, तो वह दिन आएगा जब तुम अचानक आम तौर पर अपने बोलने के तरीके के बारे में जान लोगे : "यह तो बुरा है, और यह सामान्य मानवता की अभिव्यक्ति नहीं है। यह सत्य के साथ बेमेल है और मुझे अपने बोलने के तरीके को बदलना होगा।" जिस दिन से तुम्हारे पास यह जागरूकता होगी, तुम इस बुरे स्वभाव की गंभीर उग्रता को लगातार अधिक स्पष्ट रूप से महसूस करोगे। तो, तुम्हें आगे क्या करना चाहिए? लगातार उन इरादों की जाँच करो जो तुम्हारे उस बोलने के तरीके में मौजूद हैं, और अपनी निरंतर अन्वेषण की प्रक्रिया के माध्यम से, तुम और भी सही मायने में और अधिक सटीक रूप से यह निर्धारित करने में सक्षम होगे कि तुम्हारे पास इस तरह का सार और स्वभाव है। जब वो दिन आता है कि तुम वास्तव में अपने आप से यह स्वीकार कर लो कि तुम्हारे पास एक बुरा स्वभाव है, तो तुम अंततः इससे घृणा और नफ़रत करने में सक्षम होगे। जब कोई इस विश्वास के बदले कि वह एक अच्छा व्यक्ति है, कि वह नेक और न्यायपूर्ण व्यवहार करता है, कि वह न्याय की भावना से संपन्न है, कि वह सम्माननीय और निष्कपट है, अपने स्वभाव-सार को उस रूप में पहचानने लगता है जो अभिमानी, कठोर, धोखेबाज़, दुष्ट हो और जिसे सत्य से कोई प्रेम न हो, केवल तभी वह अपनी जगह को ठीक से जान पाएगा, और वह वास्तव में जो है उसे जान पाएगा। केवल इसे स्वीकार कर, या मज़ाक में इसे पहचान कर, कि उनके पास ऐसी अभिव्यक्तियाँ और स्थितियाँ हैं, वे सच्ची घृणा करने में असमर्थ रहते हैं; सच्ची घृणा केवल तभी हासिल होती है जब वे अपने कार्यों में यह पहचान लेते हैं कि उनके पास ये स्वभाव और सार मौजूद हैं। ...

जब लोग विभिन्न स्वभावों द्वारा निर्मित विभिन्न स्थितियों को पहचानने में सक्षम होते हैं, तभी उनके अपने स्वभाव में परिवर्तन होना शुरू होता है। अगर लोग इन स्थितियों को नहीं पहचानते हैं, अगर वे उन्हें आत्मसात नहीं कर सकते और उन्हें खुद पर लागू नहीं कर सकते हैं, तो क्या उनके स्वभावों में बदलाव हो सकता है? (नहीं।) स्वभाव में परिवर्तन विभिन्न स्वभावों द्वारा उत्पन्न विभिन्न स्थितियों को पहचानने से शुरू होता है। यदि किसी ने इसे पहचानना शुरू नहीं किया है, यदि किसी ने वास्तविकता के इस पहलू में प्रवेश नहीं किया है, तो उसके स्वभाव में बदलाव का प्रश्न ही नहीं उठता है। चूँकि स्वभावगत परिवर्तन का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता, तो अधिकांश लोगों द्वारा अपने कर्तव्य के निर्वहन करने के दौरान क्या भूमिका निभाई जाती है? यह खुद को थकाना है, खुद को कार्यों में व्यस्त रखना है। वे अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं, लेकिन ज्यादातर मजदूरी कर रहे हैं। कभी-कभी जब वे अच्छे मूड में होते हैं तो वे इसमें अधिक मेहनत करते हैं, और जब वे ज्यादा अच्छे मूड में नहीं होते, तो वे इसमें कम मेहनत करते हैं। इस तथ्य के बाद, वे इसके बारे में सोचते हैं और उन्हें थोड़ा-बहुत पछतावा होता है, इसलिए वे थोड़ी अतिरिक्त ऊर्जा लगाते हैं और महसूस करते हैं कि उन्होंने पश्चाताप कर लिया है। वास्तव में, यह सच्चा परिवर्तन नहीं है; यह सच्चा पश्चाताप नहीं है। सच्चा पश्चाताप तुम्हारे व्यवहार से शुरू होता है। यदि तुम्हारे व्यवहार में कोई बदलाव आया है, तुम देह-सुख को त्यागकर वैसे काम करना बंद कर देते हो, यदि तुम्हारे कार्य सिद्धांतों के अनुरूप प्रतीत होते हैं, और धीरे-धीरे तुम शब्दों और कामों में सिद्धांतों का अनुसरण करते हो, तब यह स्वभाव में बदलाव की शुरुआत है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'तुम सत्‍य की खोज तभी कर सकते हो जब आप स्‍वयं को जानें' से उद्धृत

तुम अपनी भ्रष्टता का पता लगाने में जितने अधिक सक्षम होते हो, यह खोज उतनी ही अधिक सटीक होती है, और उतना ही अधिक तुम अपने स्वयं के सार के बारे में जान सकते हो, फिर उतनी ही अधिक संभावना होती है कि तुम्हें बचा लिया जाएगा और तुम उद्धार के और अधिक करीब आ जाओगे; जितना ही अधिक तुम अपनी समस्याओं का पता लगाने में अक्षम होते हो, उतना ही अधिक तुम सोचते हो कि तुम अच्छे व्यक्ति, खासे महान व्यक्ति हो, फिर तुम उद्धार के पथ से और अधिक दूर होते जाते हो, और तुम अब भी बड़े खतरे में होते हो। जो भी व्यक्ति सारा दिन स्वयं का दिखावा करने में बिताता है—अपनी उपलब्धियों को घमंड से दिखाना, कहना कि वे वाक्पटु, तर्कशील हैं, कि वे सत्य को समझते हैं और सत्य को अभ्यास में लाते समय त्याग करने में सक्षम हैं—वह विशेष रूप से छोटे कद का व्यक्ति होता है। किस प्रकार के व्यक्ति में उद्धार की अधिक आशा होती है, एवं उद्धार के पथ पर चलने में सक्षम होता है। वे जो असल में अपना भ्रष्ट स्वभाव जानते हैं। उनका ज्ञान जितना अधिक अथाह होता है, वे उद्धार के उतने ही अधिक पास आ जाते हैं। अपने भ्रष्ट स्वभाव को जानना, जानना कि तुम कुछ नहीं, बेकार हो, कि तुम जीते-जागते शैतान हो-जब तुम सच में अपना सार जानते हो, तब यह गंभीर समस्या नहीं रह जाती। यह अच्छी बात है, बुरी बात नहीं है। क्या कोई है जो स्वयं को जितना अधिक जानता है, उतना ही अधिक नकारात्मक होता जाता है, मन ही मन सोचते हुए : "सब समाप्त हो गया, मुझ पर ईश्वर के न्याय और दंड की गाज़ गिरी है, यह सज़ा एवं प्रतिशोध है, परमेश्वर मुझे नहीं चाहता एवं मेरा उद्धार होने की कोई आशा नहीं है"? क्या इन लोगों को ऐसे भ्रम होते हैं? असल में, लोगों को जितनी अधिक पहचान होगी कि वे कितने निराशाजनक हैं, उनके लिए आशा उतनी ही अधिक होगी; उन्हें नकारात्मक नहीं होना चाहिए एवं हार नहीं माननी चाहिए। स्वयं को जानना अच्छी बात है—यह वह रास्ता है जिस पर उद्धार के लिए चलना ही होगा। यदि तुम अपने ही भ्रष्ट स्वभाव से एवं अपने सार से, जो ईश्वर के प्रति अपने विरोध में बहुविध है, पूर्णतः अनभिज्ञ हो, एवं यदि तुम्हारे पास परिवर्तन की अब भी कोई योजना नहीं हैं, तो तुम संकट में हो; ऐसे लोग पहले ही सुन्न हो चुके हैं, वे मृत हैं। क्या मृतक को पुनः जीवित किया जा सकता है? बिल्कुल नहीं, वे पहले ही मृत हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'तुम सत्‍य की खोज तभी कर सकते हो जब आप स्‍वयं को जानें' से उद्धृत

उन लोगों में जो जीवन की तलाश करते हैं, पौलुस ऐसा व्यक्ति था जो स्वयं अपना सार नहीं जानता था। वह किसी भी तरह विनम्र या आज्ञाकारी नहीं था, न ही वह अपना सार जानता था, जो परमेश्वर के विरुद्ध था। और इसलिए, वह ऐसा व्यक्ति था जो विस्तृत अनुभवों से नहीं गुज़रा था, और ऐसा व्यक्ति था जो सत्य को अभ्यास में नहीं लाया था। पतरस भिन्न था। वह परमेश्वर का सृजित प्राणी होने के नाते अपनी अपूर्णताएँ, कमज़ोरियाँ, और अपना भ्रष्ट स्वभाव जानता था, और इसलिए उसके पास अभ्यास का एक मार्ग था जिसके माध्यम से वह अपने स्वभाव को बदल सके; वह उन लोगों में से नहीं था जिनके पास केवल सिद्धांत था किंतु जो वास्तविकता से युक्त नहीं थे। वे लोग जो परिवर्तित होते हैं नए लोग हैं जिन्हें बचा लिया गया है, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य का अनुसरण करने की योग्यता से संपन्न हैं। वे लोग जो नहीं बदलते हैं उन लोगों में आते हैं जो स्वभाविक रूप से पुराने और बेकार हैं; ये वे लोग हैं जिन्हें बचाया नहीं गया है, अर्थात्, वे लोग जिनसे परमेश्वर घृणा करता है और जिन्हें ठुकरा चुका है। उनका कार्य चाहे जितना भी बड़ा हो, उन्हें परमेश्वर द्वारा याद नहीं रखा जाएगा। जब तुम इसकी तुलना स्वयं अपने अनुसरण से करते हो, तब यह स्वतः स्पष्ट हो जानना चाहिए कि तुम अंततः उसी प्रकार के व्यक्ति हो या नहीं जैसे पतरस या पौलुस थे। यदि तुम जो खोजते हो उसमें अब भी कोई सत्य नहीं है, और यदि तुम आज भी उतने ही अहंकारी और अभद्र हो जितना पौलुस था, और अब भी उतने ही बकवादी और शेखीबाज हो जितना वह था, तो तुम बिना किसी संदेह के पतित व्यक्ति हो जो विफल होता है। यदि तुम पतरस के समान खोज करते हो, यदि तुम अभ्यासों और सच्चे बदलावों की खोज करते हो, और अहंकारी या उद्दंड नहीं हो, बल्कि अपना कर्तव्य निभाने की तलाश करते हो, तो तुम परमेश्वर के सृजित प्राणी होगे जो विजय प्राप्त कर सकता है। पौलुस स्वयं अपना सार या भ्रष्टता नहीं जानता था, वह अपनी अवज्ञाकारिता तो और भी नहीं जानता था। उसने मसीह के प्रति अपनी कुत्सित अवज्ञा का कभी उल्लेख नहीं किया, न ही वह बहुत अधिक पछतावे से भरा था। उसने बस एक स्पष्टीकरण दिया, और, अपने हृदय की गहराई में, उसने परमेश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पण नहीं किया था। यद्यपि वह दमिश्क के रास्ते पर गिर पड़ा था, फिर भी उसने अपने भीतर गहराई से झाँककर नहीं देखा था। वह मात्र काम करते रहने से ही संतुष्ट था, और वह स्वयं को जानने और अपना पुराना स्वभाव बदलने को सबसे महत्वपूर्ण विषय नहीं मानता था। वह तो बस सत्य बोलकर, स्वयं अपने अंतःकरण के लिए औषधि के रूप में दूसरों को पोषण देकर, और अपने अतीत के पापों के लिए अपने को सांत्वना देने और अपने को माफ़ करने की ख़ातिर यीशु के शिष्यों को अब और न सताकर ही संतुष्ट था। उसने जिस लक्ष्य का अनुसरण किया वह भविष्य के मुकुट और क्षणिक कार्य से अधिक कुछ नहीं था, उसने जिस लक्ष्य का अनुसरण किया वह भरपूर अनुग्रह था। उसने पर्याप्त सत्य की खोज नहीं की थी, न ही उसने उस सत्य की अधिक गहराई में जाने की खोज की थी जिसे उसने पहले नहीं समझा था। इसलिए स्वयं के विषय में उसके ज्ञान को झूठ कहा जा सकता है, और उसने ताड़ना और न्याय स्वीकार नहीं किया था। वह कार्य करने में सक्षम था इसका अर्थ यह नहीं है कि वह स्वयं अपनी प्रकृति या सार के ज्ञान से युक्त था; उसका ध्यान केवल बाहरी अभ्यासों पर था। यही नहीं, उसने जिसके लिए कठिन परिश्रम किया था वह बदलाव नहीं, बल्कि ज्ञान था। उसका कार्य पूरी तरह दमिश्क के मार्ग पर यीशु के प्रकटन का परिणाम था। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जिसे उसने मूल रूप से करने का संकल्प लिया था, न ही यह वह कार्य था जो उसके द्वारा अपने पुराने स्वभाव की काँट-छाँट स्वीकार करने के बाद हुआ था। उसने चाहे जिस प्रकार कार्य किया, उसका पुराना स्वभाव नहीं बदला था, और इसलिए उसके कार्य ने उसके अतीत के पापों का प्रायश्चित नहीं किया बल्कि उस समय की कलीसियाओं के मध्य एक निश्चित भूमिका मात्र निभाई थी। इस जैसे व्यक्ति के लिए, जिसका पुराना स्वभाव नहीं बदला था—कहने का तात्पर्य यह, जिसने उद्धार प्राप्त नहीं किया था, तथा सत्य से और भी अधिक रहित था—वह प्रभु यीशु द्वारा स्वीकार किए गए लोगों में से एक बनने में बिलकुल असमर्थ था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

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