1. सच्चा आत्मज्ञान क्या है और उससे क्या पाया जा सकता है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

भ्रष्टाचार के हजारों सालों बाद, मनुष्य संवेदनहीन और मूर्ख बन गया है; वह एक दुष्ट आत्मा बन गया है जो परमेश्वर का विरोध करती है, इस हद तक कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य की विद्रोहशीलता इतिहास की पुस्तकों में दर्ज की गई है, यहाँ तक कि मनुष्य खुद भी अपने विद्रोही आचरण का पूरा लेखा-जोखा देने में असमर्थ है—क्योंकि मनुष्य शैतान के द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट किया जा चुका है, और शैतान के द्वारा रास्ते से भटका दिया गया है इसलिए वह नहीं जानता कि कहाँ जाना है। आज भी, मनुष्य परमेश्वर को धोखा देता है : जब मनुष्य परमेश्वर को देखता है, तो वह उसे धोखा देता है, और जब वह परमेश्वर को नहीं देख पाता, तब भी वह उसे धोखा देता है। कुछ ऐसे भी हैं, जो परमेश्वर के श्रापों और परमेश्वर के कोप का अनुभव करने के बाद भी उसे धोखा देते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य की समझ ने अपने मूल प्रकार्य को खो दिया है, और मनुष्य की अंतरात्मा ने भी, अपने मूल प्रकार्य को खो दिया है। मनुष्य जिसे मैं देखता हूँ, वह मानव रूप में एक जानवर है, वह एक जहरीला साँप है, मेरी आँखों के सामने वह कितना भी दयनीय बनने की कोशिश करे, मैं उसके प्रति कभी भी दयावान नहीं बनूँगा, क्योंकि मनुष्य को काले और सफेद के बीच, सत्य और असत्य के बीच अन्तर की समझ नहीं है, मनुष्य की समझ बहुत ही सुन्न हो गई है, फिर भी वह आशीषें पाने की कामना करता है; उसकी मानवता बहुत नीच है फिर भी वह एक राजा के प्रभुत्व को पाने की कामना करता है। ऐसी समझ के साथ, वह किसका राजा बन सकता है? ऐसी मानवता के साथ, कैसे वह सिंहासन पर बैठ सकता है? सचमुच में मनुष्य को कोई शर्म नहीं है! वह नीच ढोंगी है! तुम सब जो आशीषें पाने की कामना करते हो, मैं सुझाव देता हूँ कि पहले शीशे में अपना बदसूरत प्रतिबिंब देखो—क्या तू एक राजा बनने लायक है? क्या तेरे पास एक ऐसा चेहरा है जो आशीषें पा सकता है? तेरे स्वभाव में ज़रा-सा भी बदलाव नहीं आया है और तूने किसी भी सत्य का अभ्यास नहीं किया, फिर भी तू एक बेहतरीन कल की कामना करता है। तू अपने आप को भुलावे में रख रहा है! ऐसी गन्दी जगह में जन्म लेकर, मनुष्य समाज के द्वारा बुरी तरह संक्रमित किया गया है, वह सामंती नैतिकता से प्रभावित किया गया है, और उसे "उच्च शिक्षा के संस्थानों" में सिखाया गया है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, जीवन पर मतलबी दृष्टिकोण, जीने के लिए तिरस्कार-योग्य दर्शन, बिल्कुल बेकार अस्तित्व, पतित जीवन शैली और रिवाज—इन सभी चीज़ों ने मनुष्य के हृदय में गंभीर रूप से घुसपैठ कर ली है, और उसकी अंतरात्मा को बुरी तरह खोखला कर दिया है और उस पर गंभीर प्रहार किया है। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से और अधिक दूर हो गया है, और परमेश्वर का और अधिक विरोधी हो गया है। दिन-प्रतिदिन मनुष्य का स्वभाव और अधिक शातिर बन रहा है, और एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के लिए कुछ भी त्याग करे, एक भी व्यक्ति नहीं जो स्वेच्छा से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करे, इसके अलावा, न ही एक भी व्यक्ति ऐसा है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रकटन की खोज करे। इसकी बजाय, इंसान शैतान की प्रभुता में रहकर, कीचड़ की धरती पर बस सुख-सुविधा में लगा रहता है और खुद को देह के भ्रष्टाचार को सौंप देता है। सत्य को सुनने के बाद भी, जो लोग अन्धकार में जीते हैं, इसे अभ्यास में लाने का कोई विचार नहीं करते, यदि वे परमेश्वर के प्रकटन को देख लेते हैं तो इसके बावजूद उसे खोजने की ओर उन्मुख नहीं होते हैं। इतनी पथभ्रष्ट मानवजाति को उद्धार का मौका कैसे मिल सकता है? इतनी पतित मानवजाति प्रकाश में कैसे जी सकती है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

स्वयं को जानने का अर्थ है तुम्हारे प्रत्येक वचन व कर्म को, तुम्हारी प्रत्येक हरकत और कार्य को जानना; यह तुम्हारे मन और विचारों, तुम्हारे इरादों और तुम्हारी धारणाओं और कल्पनाशीलता को जानना है; यह यहाँ तक कि दुनिया में जीने के तुम्हारे फलसफे और तुम्हारे भीतर निहित शैतान के विभिन्न विषाक्त पदार्थों, साथ ही साथ स्कूल में तुमने जो ज्ञान व शिक्षा प्राप्त की, उसे जानना भी है। इन सब चीज़ों की चीरफाड़ करना ज़रूरी है। भले ही किसी व्यक्ति ने परमेश्वर में आस्था पैदा होने के बाद कितने ही अच्छे काम किए हों, फिर भी कई मामले उनके लिए अब भी अस्पष्ट हो सकते हैं और सत्य की उनकी समझ तो और भी कम हो सकती है—फिर भी, अपने बहुत-से अच्छे कामों के कारण, उन्हें लगता है कि वे परमेश्वर के वचनों में जीने लगे हैं, और उसके प्रति समर्पित हैं, और उसकी इच्छा को पूरी तरह संतुष्ट कर चुके हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि जब कोई प्रतिकूल परिस्थितियाँ पैदा नहीं होतीं, तो तुम वही करते हो जो तुम्हें कहा जाता है; तुम्हें किसी भी कर्तव्य का पालन करने में कोई झिझक नहीं होती, और तुम प्रतिरोध नहीं करते। जब तुम्हें सुसमाचार फैलाने के लिए कहा जाता है तो तुम इस कष्ट को सहन कर लेते हो, और कोई शिकायत नहीं करते, और जब तुम्हें इधर-उधर भागदौड़ करने के लिए कहा जाता है, या कोई शारीरिक श्रम करने के लिए कहा जाता है, तो तुम यह भी कर देते हो। इन दिखावों के कारण तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर के प्रति समर्पित हो और सत्य के एक सच्चे खोजी हो। फिर भी, अगर कोई तुमसे ज्यादा गहराई में जाकर प्रश्न करे और तुमसे पूछे, "क्या तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो? क्या तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसने सच्चे मन से परमेश्वर को समर्पण किया है? एक बदले हुए स्वभाव वाला व्यक्ति?" तो, इस तरह पूछे जाने के बाद, इस तरह जांच के लिए सत्य की कसौटी पर कसे जाने पर तुम में—बल्कि कहना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति में—कमी पाई जाएगी, और न ही कोई व्यक्ति सत्य के अनुसार अभ्यास करने में सचमुच सक्षम है। इसलिए, जब मनुष्य के सभी कृत्यों और कर्मों के मूल, और साथ ही, उसके कृत्यों के सार और प्रकृति को सत्य पर कसा जाता है, तो सभी दोषी ठहराए जाते हैं। इसका क्या कारण है? इसका कारण यह है कि मनुष्य अपने-आपको जानता नहीं है; वह परमेश्वर पर हमेशा अपने तरीके से विश्वास करता है, अपना कर्तव्य अपने तरीके से निभाता है, और अपने तरीके से ही परमेश्वर की सेवा करता है। इससे भी बढ़कर, उसे लगता है कि वह आस्था और तर्कशीलता से भरपूर है, और, आखिर में, उसे लगता है कि उसने बहुत कुछ पा लिया है। वह अनजाने में ही यह समझने लगता है कि वह पहले से ही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप चल रहा है और इसे पूरी तरह से संतुष्ट कर चुका है, और यह कि वह पहले से ही परमेश्वर की अपेक्षाओं पर खरा उतर चुका है और उसकी इच्छा का अनुसरण कर रहा है। अगर तुम इसी तरह महसूस करते हो, या अगर, परमेश्वर में अपने बहुत-से वर्षों के विश्वास में, तुम्हें लगता है कि तुमने कुछ पा लिया है, तब तो तुम्हें अपने बारे में चिंतन के लिए और भी ज्यादा परमेश्वर के सम्मुख लौट आना चाहिए। तुम्हें उस रास्ते पर नजर दौड़ानी चाहिए जिस पर तुम इतने वर्षों की अपनी आस्था के दौरान चलते रहे हो, और यह देखना चाहिए कि क्या परमेश्वर के सम्मुख तुम्हारे सभी कृत्य और तुम्हारा व्यवहार पूरी तरह उसके हृदय के अनुरूप रहे हैं, तुम ऐसा क्या करते हो जो परमेश्वर का प्रतिरोध है, तुम ऐसा क्या करते हो जो परमेश्वर को संतुष्ट करता है, और क्या जो कुछ तुम करते हो वह परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार है और पूरी तरह उसकी इच्छा के अनुरूप है—तुम्हें इन सभी चीजों को लेकर स्पष्ट होना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

अपने आपको जानना यह जानना है कि हमारे विचारों और दृष्टिकोण में ऐसी कौन सी बातें हैं जो परमेश्वर का विरोध करती हैं, सत्य के बिलकुल अनुरूप नहीं हैं और जिनमें सत्य नहीं है। उदाहरण के लिए, मनुष्य का अहंकार, दंभ, झूठ और धोखा भ्रष्ट स्वभाव के ऐसे पहलू जिन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है। कुछ समय तक सत्य पर संगति करके या अक्सर संगति करके या फिर भा‌ई-बहनों द्वारा तुम्हारी स्थिति का उल्लेख करने पर उनका ज्ञान हो सकता है। इसके अलावा, हर व्यक्ति में अलग-अलग स्तर का अहंकार और कपट छिपा होता है। हालांकि, लोगों के विचारों और दृष्टिकोण को जानना आसान नहीं है; इनके बारे में जानना उतना आसान नहीं है जितना कि लोगों के स्वभावों को जानना है। ये गहराई तक समायी हुई चीज़ें हैं। इसलिये जब तुम अपने व्यवहार और बाहरी आचरण में थोड़ा परिवर्तन ले आते हो, तो भी तुम्हारी सोच, धारणाओं, दृष्टिकोण और तुम्हें प्राप्त पारंपरिक संस्कृति की शिक्षा के अनेक पहलू होते हैं जो परमेश्वर के खिलाफ हैं और जिन्हें तुमने अभी तक उजागर नहीं किया गया है। ये गहराई तक समायी हुई ऐसी चीज़ें है जो हमें परमेश्वर का शत्रु बना देती हैं। इसलिए, जब परमेश्वर कुछ करता है, जो तुम्हारी धारणाओं की पुष्टि नहीं करता या ऐसा कुछ जो उससे भिन्न होता है जैसा तुम परमेश्वर से करने की कल्पना करते हो, तुम उसका प्रतिरोध और विरोध करोगे। तुम यह नहीं समझोगे कि परमेश्वर ने इस तरह से कार्य क्यों किया और हालाँकि तुम जानते हो कि परमेश्वर जो भी करता है, उसमें सत्य होता है और हो सकता है तुम समर्पण करना चाहो, तुम ऐसा करने में स्वयं को असमर्थ पाओगे। तुम समर्पण क्यों नहीं कर सकते हो? ऐसा प्रतिरोध और विरोध क्यों? इसकी वजह यह है कि मनुष्य के विचारों और दृष्टिकोण में कुछ ऐसी चीज़ें हैं जो परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं और वे उन सिद्धांतों, जिनके द्वारा वह कार्य करता है और उसके सार के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं। इन विचारों और दृष्टिकोण को जानना मनुष्य के लिए कठिन है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो' से उद्धृत

स्वयं को कैसे जाना जाता है? पहले तो तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम अपने शब्दों और कर्मों में कौन-सा स्वभाव प्रकट करते हो। कभी वह अहंकार होता है, कभी कुटिलता, और कभी दुष्टता। साथ ही, जब तुम्हारे सामने समस्याएँ आती हैं, तो तुम्हें जानना होगा कि क्या तुम्हारे उद्देश्य परमेश्वर की इच्छा या सत्य के अनुरूप होने में असफल हैं। तुम्हें यह भी जानना चाहिए कि अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा रवैया बोझ उठाने का है या समर्पित होने का, और क्या तुम खुद को परमेश्वर के लिए खपाने में ईमानदार हो या तुम्हारा ऐसा करना लेन-देन है। तुम्हें यह भी पता होना चाहिए कि परमेश्वर से तुम्हारी माँगें असाधारण तो नहीं, तुम्हारे पास समर्पण भरा दिल है या नहीं, और तुम परमेश्वर द्वारा आयोजित परिवेशों, लोगों, घटनाओं और चीज़ों से सामना होने पर सत्य की तलाश करने में सक्षम हो या नहीं। यह भी जानो कि तुम ऐसे व्यक्ति हो या नहीं जो सत्य से प्रेम करता है, तुममें किस प्रकार की मानवता है, और तुममें अंत:करण और विवेक हैं या नहीं, समस्याएँ सामने आने पर क्या तुम औचित्य और सौदेबाजी की स्थिति में रहते हो, या सत्य की तलाश कर सकते हो और अपनी धारणाओं और कल्पनाओं, अपनी महत्वाकांक्षाओं, इच्छाओं और योजनाओं को त्याग सकते हो, और क्या तुम वह हो जो सत्य की तलाश करता है। खुद को जानने का एक और पहलू अपने चरित्र को समझना है, यह जानना कि क्या तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो और क्या तुम्हारे पास विवेक और एक दयालु हृदय है। हर प्रकार के परिवेश, व्यक्ति, घटना और चीज़ के प्रति अपने दृष्टिकोण में तुम अपना चरित्र देख सकते हो, और यह जान सकते हो कि क्या तुम वह व्यक्ति हो, जो सत्य से प्रेम करता है और परमेश्वर में सच्चा विश्वास रखता है। यह भी देखो कि परमेश्वर से सीधे जुड़े मुद्दों के प्रति तुम्हारा किस तरह का रवैया है : उसे किस तरह संदर्भित किया जाता है, उसके नाम, उसका देहधारण—क्या तुम श्रद्धालु हो और क्या तुम समर्पण करते हो? तुम और क्या कहोगे कि स्वयं को जानने के और कौन-से पहलू हैं? (अपनी क्षमता का माप जानना।) (जीवन के बारे में अपना दृष्टिकोण, अपने मूल्य, और जिसके अनुसार हम जीते हैं, उसे समझना। यह जानना कि हमारी खोज क्या है, हम किस रास्ते पर चल रहे हैं।) ये सभी चीज़ें हैं, जिन्हें लोगों को समझना चाहिए। कुल मिलाकर, स्वयं को हर पहलू में जानना सार रूप से यह है : अपनी क्षमता को जानना, अपने व्यक्तित्व को जानना, यह जानना कि तुम सत्य से प्रेम करते हो या नहीं, उस रास्ते को जानना जिस पर तुम चल रहे हो, जीवन और अपने मूल्यों के बारे में अपना दृष्टिकोण जानना, और परमेश्वर के प्रति अपने हर प्रकार के रवैये को जानना। ये सभी चीज़ें शामिल इसमें हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (2)' से उद्धृत

यदि तुम्हारे आत्मज्ञान में केवल सतही चीजों की सरसरी पहचान शामिल है—अगर तुम केवल कहते हो कि तुम अभिमानी और दंभी हो, कि तुम परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करते हो और उसका विरोध करते हो—तो यह सच्चा ज्ञान नहीं है, बल्कि सिद्धांत है। तुम्हें इसमें तथ्य एकीकृत करने चाहिए : तुम जिस भी पहलू में भ्रामक विचार या गलत राय रखते हो, उसमें तुम्हें सहभागिता और विश्लेषण के लिए अपने भीतर की प्रेरणाओं को प्रकाश में लाना चाहिए। केवल यही वास्तव में ज्ञान का होना है। तुम्हें अपनी प्रेरणाओं और अपने सार के स्रोत को जानने पर ध्यान देना चाहिए। तुम्हें केवल अपने कार्यों से समझ हासिल नहीं करनी चाहिए; तुम्हें उसके मर्म को समझना चाहिए और समस्या की जड़ का समाधान करना चाहिए। कुछ समय बीतने के बाद तुम्हें आत्मचिंतन करना चाहिए, और सारांश निकालना चाहिए कि तुमने किन समस्याओं का समाधान किया है, कौन-सी समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं, और उन्हें कैसे हल करना चाहिए। इसलिए तुम्हें सत्य की भी तलाश करनी चाहिए। तुम्हें हमेशा दूसरों को अपनी अगुआई नहीं करने देनी चाहिए; जीवन में प्रवेश के लिए तुम्हारे पास अपना रास्ता होना चाहिए। तुम्हें बार-बार अपनी जाँच करनी चाहिए : ऐसी कौन-सी चीजें हैं जो तुम गलत कर रहे हो और जो सत्य के विपरीत हैं, तुम्हारे कौन-से शब्द और प्रेरणाएँ गलत हैं, तुम कौन-से स्वभाव प्रकट कर रहे हो। अगर तुम इसी तरह लगातार प्रवेश करो, और खुद से सख्त माँगें करो, तो धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से, तुम इस संबंध में अधिक समझ हासिल कर लोगे; अंतत: तुम यह सब एक-साथ जोड़कर देखोगे कि तुम किसी काम के नहीं हो। जब वह दिन आएगा कि तुम्हारे पास वास्तव में ऐसा ज्ञान होगा, फिर तुम अहंकार करने में सक्षम नहीं रहोगे। अभी क्या महत्वपूर्ण है? सहभागिता और विश्लेषण के बाद लोग इन चीजों से अवगत हो जाते हैं और इनके बारे में जान जाते हैं, लेकिन वे अभी भी खुद को नहीं जानते। कुछ लोग कहते हैं : "ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं अपने आप को नहीं जानता? मैं उन मामलों से अवगत हूँ, जिनमें मैं अहंकार प्रकट करता हूँ।" अगर तुम अवगत हो, तो तुम कैसे नहीं जानते कि तुम्हारा स्वभाव अहंकारी है? कई बार ऐसा क्यों होता है, जब तुम व्यक्तिगत उन्नति चाहते हो, जब तुम हैसियत पाने और विशिष्ट होने की लालसा रखते हो? इसका मतलब है कि तुम्हारा अहंकारी स्वभाव नष्ट नहीं हुआ है! इसलिए, परिवर्तन तुम्हारे कार्यों के पीछे की प्रेरणाओं, दृष्टिकोण और मतों से शुरू होना चाहिए। क्या तुम लोग स्वीकार करते हो कि लोग जो कुछ भी कहते हैं, वह चुभने वाला और विषैला होता है, कि उनके स्वर में अहंकार का तत्व होता है? उनके शब्दों में उनकी प्रेरणाएँ और व्यक्तिगत मत होते हैं; यह उनकी बातों से देखा जा सकता है। ऐसे लोग भी होते हैं, जो जब अहंकार प्रकट नहीं करते, तो उनके बोलने और अभिव्यक्त करने का एक निश्चित तरीका होता है, लेकिन जब उनका अहंकार प्रकट होता है, तो उनकी प्रस्तुति बदल जाती है—शैतान का बदसूरत चेहरा खुद को जाहिर कर देता है। सभी लोग प्रेरणाएँ रखते हैं। उन्हें लो, जो शातिर हैं : वे हमेशा फुसफुसाते हैं और बोलते समय कनखी से देखते हैं; इसमें प्रेरणाएँ निहित हैं। कुछ लोग धीमी आवाज में, चुपके से बोलते हैं; उनके शब्दों में षड्यंत्र निहित होते हैं, लेकिन वे स्वर या चेहरे से कुछ पता नहीं लगने देते। ऐसे लोग और भी ज्यादा विश्वासघाती होते हैं, और उन्हें बचाना बहुत मुश्किल है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नए युग में कैसे पार करें' से उद्धृत

तुम लोग अब कुछ हद तक स्वयं द्वारा प्रकट भ्रष्ट स्वभाव को पहचानने में सक्षम हो—कौन-सी भ्रष्ट चीजें तुम्हारे द्वारा अभी भी प्रकट किए जाने की संभावना है, कौन-सी चीजें तुम्हारे द्वारा अभी भी की जानी संभव हैं। यह सब तुम जानते हो। लेकिन सबसे कठिन चीज है अपने आप को नियंत्रित करने में सक्षम होना। तुम नहीं जानते कि तुम कब कुछ कर बैठोगे या कौन-सी गंभीर चीजें करने में तुम सक्षम हो। शायद ऐसी चीजें हैं, जिन्हें तुमने सोचा था कि तुम कभी नहीं करोगे या ऐसे शब्द, जिन्हें तुमने सोचा था कि तुम कभी नहीं कहोगे, लेकिन एक दिए गए समय या परिवेश में तुमने वास्तव में उन्हें किया या कहा। लोग इन अप्रत्याशित चीजों को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं हैं। यह कैसे हो सकता है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोग अपनी प्रकृति और सार को पूरी तरह से नहीं समझते; इनके बारे में उनके ज्ञान की गहराई अपर्याप्त है, इसलिए सत्य को अभ्यास में लाना उनके लिए बहुत कठिन है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग बहुत धोखेबाज, वचन और कर्म में बेईमान होते हैं, लेकिन अगर तुम उनसे पूछो कि उनका भ्रष्टाचार किस संबंध में सबसे गंभीर है, तो वे कहेंगे, "मैं थोड़ा धोखेबाज हूँ।" वे केवल इतना कहेंगे कि वे थोड़े धोखेबाज हैं, लेकिन वे यह नहीं कहते कि उनकी प्रकृति ही धोखा है, और वे यह नहीं कहते कि वे धोखेबाज व्यक्ति हैं। वे अपनी प्रकृति को उतनी गहराई से नहीं देखते, और उसे कोई गंभीर चीज नहीं मानते, और न ही उसे उतनी गहराई से देखते हैं जितनी गहराई से दूसरे देखते हैं। दूसरे देखते हैं कि यह व्यक्ति बहुत धोखेबाज और बहुत कुटिल है, कि इसके हर शब्द में कपट है, कि इसके शब्द और कार्य कभी ईमानदार नहीं होते—लेकिन वे अपने आप को इतनी गहराई से नहीं देख सकते। उनके पास जो भी ज्ञान होता है, वह केवल सतही होता है। जब भी वे बोलते और कार्य करते हैं, तो वे अपनी प्रकृति में कुछ प्रकट करते हैं, लेकिन वे इससे अनजान होते हैं। उन्हें लगता है कि वे जो कुछ कर रहे हैं, उसमें वे ईमानदार हैं और वे सत्य के अनुसार कार्य कर रहे हैं। कहने का अर्थ यह है कि लोगों की अपनी प्रकृति के बारे में जो समझ है वह बहुत ही सतही है, और इसके तथा परमेश्वर के न्याय और प्रकाशन के वचनों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। परमेश्वर जो प्रकट करता है उसमें कोई ग़लती नहीं है, बल्कि मानवजाति की अपनी स्वयं की प्रकृति की समझ की भारी कमी है। लोगों को स्वयं की मौलिक या ठोस समझ नहीं है, इसके बजाय, वे अपनी ऊर्जा को अपने कार्यों और बाहरी अभिव्यक्तियों पर केंद्रित और समर्पित करते हैं। भले ही किसी ने कभी कभार स्वयं को समझने के बारे में कुछ कहा हो, यह बहुत अधिक गहरा नहीं होगा। किसी ने कभी भी नहीं सोचा है कि इस प्रकार की चीज़ के होने के कारण या कुछ प्रकट करने के कारण वह इस तरह का व्यक्ति है या उसकी इस प्रकार की प्रकृति है। परमेश्वर ने मनुष्य की प्रकृति और सार को प्रकट किया है, परंतु मनुष्य समझते हैं कि उनका चीज़ों को करने का तरीका और बोलने का तरीका दोषपूर्ण और ख़राब है; इसलिए लोगों के लिए सत्य को अभ्यास में लाना बहुत श्रमसाध्य कार्य होता है। लोग सोचते हैं कि उनकी गलतियाँ बस क्षणिक अभिव्यक्तियाँ हैं, जो उनकी प्रकृति के प्रकटन होने की बजाय लापरवाही से प्रकट हो जाती हैं। जो लोग इस तरह सोचते हैं वे सत्य को अभ्यास में नहीं ला सकते हैं, क्योंकि वे सत्य को सत्य की तरह स्वीकार नहीं कर पाते हैं और सत्य के प्यासे नहीं होते हैं; इसलिए, सत्य को अभ्यास में लाते समय, वे केवल लापरवाही से नियमों का पालन करते हैं। लोग अपनी स्वयं की प्रकृतियों को अत्यधिक भ्रष्ट के रूप में नहीं देखते हैं, और मानते हैं कि वे इतने बुरे नहीं है कि उन्हें नष्ट या दंडित किया जाना चाहिए। उन्हें लगता है कि कभी-कभी झूठ बोलना कोई बड़ी बात नहीं है, और वे स्वयं को अतीत की अपेक्षा बहुत बेहतर मानते हैं; हालाँकि, वास्तव में, वे मानकों के आसपास भी नहीं हैं, क्योंकि लोगों के केवल कुछ कृत्य होते हैं जो बाहर से सत्य का उल्लंघन नहीं करते हैं, जब वे सत्य को वास्तव में अभ्यास में नहीं ला रहे होते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी प्रकृति को समझना और सत्य को व्यवहार में लाना' से उद्धृत

आजकल, ज़्यादातर लोगों की अपने बारे में समझ बहुत सतही है। वे उन चीज़ों को बिलकुल भी ठीक से नहीं जान पाये हैं जो उनकी प्रकृति का हिस्सा हैं। उन्हें सिर्फ़ कुछ भ्रष्ट स्थितियों, अपने द्वारा की जाने वाली संभावित चीज़ों, या अपनी कुछ कमियों का ज्ञान है और इस वजह से उन्हें लगता है कि वे ख़ुद को जानते हैं। इसके अलावा, अगर वे कुछ नियमों का पालन करते हैं, कुछ क्षेत्रों में गलतियां न करना सुनिश्चित करते हैं, और कुछ पापों को करने से खुद को रोक लेते हैं, फिर तो वे मानने लगते हैं कि परमेश्वर में उनके विश्वास में उनके पास वास्तविकता है और उन्हें बचा लिया जाएगा। यह पूरी तरह से मानवीय कल्पना है। अगर तुम उन चीज़ों का पालन करते हो, तो क्या तुम सच में किसी भी पाप को करने से बच पाओगे? क्या तुमने सच में अपने स्वभाव में सच्चा बदलाव हासिल कर लिया होगा? क्या तुम सच में इंसान की समानता को जी पाओगे? क्या इस तरह तुम सच में परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे? बिल्कुल नहीं, और यह बात तय है। परमेश्वर में विश्वास तभी काम करता है जब किसी व्यक्ति के मानकों का स्तर ऊँचा हो और उसने सत्य को हासिल किया हो और उसके जीवन स्वभाव में कुछ परिवर्तन आया हो। इसलिए, यदि लोगों का स्वयं के बारे में ज्ञान बहुत उथला है, तो समस्याओं को हल करना उनके लिए असंभव होगा, और उसका जीवन स्वभाव नहीं बदलेगा। स्वयं को एक गहरे स्तर पर जानना आवश्यक है, जिसका अर्थ है कि अपनी स्वयं की प्रकृति को जानना : उस प्रकृति में कौन से तत्व शामिल हैं, ये कैसे पैदा हुए और वे कहाँ से आये। इसके अलावा, क्या तुम इन चीजों से वास्तव में घृणा कर पाते हो? क्या तुमने अपनी स्वयं की कुरूप आत्मा और अपनी बुरी प्रकृति को देखा है? यदि तुम सच में सही अर्थों में स्वयं के बारे में सत्य को देख पाओगे, तो तुम स्वयं से घृणा करना शुरू कर दोगे। जब तुम स्वयं से घृणा करते हो और फिर परमेश्वर के वचन का अभ्यास करते हो, तो तुम देह को त्यागने में सक्षम हो जाओगे और तुम्हारे पास बिना कठिनाई के सत्य को कार्यान्वित करने की शक्ति होगी। क्यों कई लोग अपनी दैहिक प्राथमिकताओं का अनुसरण करते हैं? क्योंकि वे स्वयं को बहुत अच्छा मानते हैं, उन्हें लगता है कि उनके कार्यकलाप सही और न्यायोचित हैं, कि उनमें कोई दोष नहीं है, और यहाँ तक कि वे पूरी तरह से सही हैं, इसलिए वे इस धारणा के साथ कार्य करने में समर्थ हैं कि न्याय उनके पक्ष में है। जब कोई यह जान लेता है कि उसकी असली प्रकृति क्या है—कितना कुरूप, कितना घृणित और कितना दयनीय है—तो फिर वह स्वयं पर बहुत गर्व नहीं करता है, उतना बेतहाशा अहंकारी नहीं होता है, और स्वयं से उतना प्रसन्न नहीं होता है जितना वह पहले होता था। ऐसा व्यक्ति महसूस करता है, कि "मुझे ईमानदार और व्यवहारिक होना चाहिए, और परमेश्वर के कुछ वचनों का अभ्यास करना चाहिए। यदि नहीं, तो मैं इंसान होने के स्तर के बराबर नहीं होऊँगा, और परमेश्वर की उपस्थिति में रहने में शर्मिंदा होऊँगा।" तब कोई वास्तव में अपने आपको क्षुद्र के रूप में, वास्तव में महत्वहीन के रूप में देखता है। इस समय, उसके लिए सच्चाई का पालन करना आसान होता है, और वह थोड़ा-थोड़ा ऐसा दिखाई देता है जैसा कि किसी इंसान को होना चाहिए। जब लोग वास्तव में स्वयं से घृणा करते हैं केवल तभी वे शरीर को त्याग पाते हैं। यदि वे स्वयं से घृणा नहीं करते हैं, तो वे देह को नहीं त्याग पाएँगे। स्वयं से घृणा करने में कुछ चीजों का समावेश है: सबसे पहले, अपने स्वयं के स्वभाव को जानना; और दूसरा, स्वयं को अभावग्रस्त और दयनीय के रूप में समझना, स्वयं को अति तुच्छ और महत्वहीन समझना, और स्वयं की दयनीय और गंदी आत्मा को समझना। जब कोई पूरी तरह से देखता है कि वह वास्तव में क्या है, और यह परिणाम प्राप्त हो जाता है, तब वह स्वयं के बारे में वास्तव में ज्ञान प्राप्त करता है, और ऐसा कहा जा सकता है कि किसी ने अपने आपको पूरी तरह से जान लिया है। केवल तभी कोई स्वयं से वास्तव में घृणा कर सकता है, इतना कि स्वयं को शाप दे, और वास्तव में महसूस करे कि उसे शैतान के द्वारा अत्यधिक गहराई तक भ्रष्ट किया गया है इस तरह से कि वह अब इंसान के समान नहीं है। तब एक दिन, जब मृत्यु का भय दिखाई देगा, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, "यह परमेश्वर की धार्मिक सजा है; परमेश्वर वास्तव में धार्मिक है; मुझे वास्तव में मर जाना चाहिए!" इस बिन्दु पर, वह कोई शिकायत दर्ज नहीं करेगा, परमेश्वर को दोष देने की तो बात ही दूर है, वह बस यही महसूस करेगा कि वह बहुत ज़रूरतमंद और दयनीय है, वो इतना गंदा है कि उसे परमेश्वर द्वारा मिटा दिया जाना चाहिए, और उसके जैसी आत्मा पृथ्वी पर रहने के योग्य नहीं है। इस बिन्दु पर, यह व्यक्ति परमेश्वर का विरोध नहीं करेगा, परमेश्वर के साथ विश्वासघात तो बिल्कुल नहीं करेगा। यदि कोई स्वयं को नहीं जानता है, और तब भी स्वयं को बहुत अच्छा मानता है, तो जब मृत्यु दस्तक देते हुए आएगी, तो ऐसा व्यक्ति महसूस करेगा, कि "मैंने अपनी आस्था में इतना अच्छा किया है। मैंने कितनी मेहनत से खोज की है! मैंने इतना अधिक दिया है, मैंने इतने कष्ट झेले हैं, मगत अंततः, अब परमेश्वर मुझे मरने के लिए कहता है। मुझे नहीं पता कि परमेश्वर की धार्मिकता कहाँ है? वह मुझे मरने के लिए क्यों कह रहा है? यदि मेरे जैसे व्यक्ति को भी मरना पड़ता है, तो किसे बचाया जाएगा? क्या मानव जाति का अंत नहीं हो जाएगा?" सबसे पहले, इस व्यक्ति की परमेश्वर के बारे में धारणाएँ हैं। दूसरा, यह व्यक्ति शिकायत कर रहा है, और किसी प्रकार का समर्पण नहीं दर्शा रहा है। यह ठीक पौलुस की तरह है: जब वह मरने वाला था, तो वह स्वयं को नहीं जानता था और जब तक परमेश्वर से दण्ड निकट आया, तब तक पश्चाताप करने के लिए बहुत देर हो चुकी थी।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वयं को जानना मुख्यतः मानवीय प्रकृति को जानना है' से उद्धृत

पतरस ने स्वयं को जानने का और यह देखने का प्रयत्न किया था कि परमेश्वर के वचनों के शुद्धिकरण से और परमेश्वर द्वारा उसके लिए उपलब्ध कराए गए विभिन्न परीक्षणों के भीतर उसमें क्या प्रकट हुआ था। जब वह वास्तव में खुद को समझने लगा, तो पतरस को एहसास हुआ कि मनुष्य कितनी गहराई तक भ्रष्ट हैं, वे परमेश्वर की सेवा करने की दृष्टि से कितने बेकार और अयोग्य हैं, और कि वे परमेश्वर के समक्ष जीने के लायक नहीं है। पतरस तब परमेश्वर के सामने दंडवत हो गया। अंतत:, उसने सोचा, "परमेश्वर को जानना सबसे मूल्यवान है! अगर मैं परमेश्वर को जानने से पहले मर गया, तो यह बहुत दयनीय होगा; मुझे लगता है कि परमेश्वर को जानना सबसे महत्त्वपूर्ण, सबसे अर्थपूर्ण बात है। यदि मनुष्य परमेश्वर को नहीं जानता, तो वह जीने के योग्य नहीं है, और उसके पास कोई जीवन नहीं है।" जब तक पतरस का अनुभव इस बिंदु तक पहुँचा, तब तक वह अपनी प्रकृति को जान गया था और उसने उसकी अपेक्षाकृत अच्छी समझ हासिल कर ली थी। हालाँकि वह शायद इसे उतनी अच्छी तरह नहीं समझा पाता जितनी स्पष्टता के साथ आजकल लोग समझाने में सक्षम होंगे, लेकिन वह निस्संदेह इस स्थिति में पहुँच गया था। इसलिए, जीवन की खोज करने और परमेश्वर से पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के वचनों के भीतर से अपने स्वभाव की गहरी समझ प्राप्त करने, और साथ ही अपनी प्रकृति के पहलुओं को समझने और शब्दों में उसका सटीक रूप से वर्णन करने, स्पष्ट और सादे ढंग से बोलने की ज़रूरत है। सही मायने में खुद को जानना यही है और फिर तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित परिणाम प्राप्त कर लोगे। यदि तुम्हारा ज्ञान इस बिंदु तक नहीं पहुँचा है, फिर भी तुम खुद को समझने का दावा करते हो और कहते हो कि तुमने जीवन प्राप्त कर लिया है, तो क्या तुम केवल डींग नहीं मार रहे हो? तुम खुद को नहीं जानते, और न ही तुम यह जानते हो कि तुम परमेश्वर के सामने क्या हो, तुमने वास्तव में एक इंसान होने के मानक पूरे कर लिए हैं या नहीं, या तुम्हारे भीतर अभी भी कितने शैतानी तत्त्व हैं। तुम अभी भी इस बारे में अस्पष्ट हो कि तुम किससे संबंधित हो, और तुम्हारे पास कोई आत्म-ज्ञान नहीं है—फिर परमेश्वर के सामने तुम्हारे पास विवेक कैसे हो सकता है? जब पतरस जीवन की खोज कर रहा था, तो उसने खुद को समझने और अपने परीक्षणों के दौरान अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान केंद्रित किया, और उसने परमेश्वर को जानने का प्रयास किया, और अंत में उसने सोचा, "लोगों को जीवन में परमेश्वर की समझ पाने की कोशिश करनी चाहिए; उसे जानना सबसे महत्त्वपूर्ण बात है। अगर मैं परमेश्वर को नहीं जानता, तो मरने पर मुझे शांति नहीं मिलेगी। परमेश्वर को जान लेने के बाद, अगर वह मुझे मरने देता है, तो भी मैं ऐसा करने में सर्वाधिक कृतज्ञ महसूस करूँगा; मैं ज़रा भी शिकायत नहीं करूँगा, और मेरा पूरा जीवन सफल हो चुका होगा।" पतरस समझ का यह स्तर हासिल करने या इस बिंदु पर पहुँचने में परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू करने के तुरंत बाद ही सक्षम नहीं हो गया था; पहले उसे बहुत परीक्षणों से गुज़रना पड़ा था। परमेश्वर को जानने का मूल्य समझ सकने से पहले उसके अनुभव को एक निश्चित मील-पत्थर तक पहुँचना पड़ा था, और उसे खुद को पूरी तरह से समझना पड़ा था। इसलिए, पतरस ने जो मार्ग अपनाया, वह जीवन पाने और पूर्ण किए जाने का मार्ग था; उसका विशिष्ट अभ्यास मुख्य रूप से इसी पहलू पर केंद्रित था।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

जैसा कि मैं आज जिस तरह तुम्हारा न्याय कर रहा हूँ, अंत में तुम लोगों के अंदर किस स्तर की समझ होगी? तुम लोग कहोगे कि यद्यपि तुम लोगों की हैसियत ऊँची नहीं है, फिर भी तुम लोगों ने परमेश्वर के उत्कर्ष का आनंद तो लिया ही है। क्योंकि तुम लोग अधम पैदा हुए थे इसलिए तुम लोगों की कोई हैसियत नहीं है, लेकिन तुम हैसियत प्राप्त कर लेते हो क्योंकि परमेश्वर तुम्हारा उत्कर्ष करता है—यह तुम लोगों को परमेश्वर ने प्रदान किया है। आज तुम लोग व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर का प्रशिक्षण, उसकी ताड़ना और उसका न्याय प्राप्त करने में सक्षम हो। यह भी उसी का उत्कर्ष है। तुम लोग व्यक्तिगत रूप से उसके द्वारा शुद्धिकरण और प्रज्ज्वलन प्राप्त करने में सक्षम हो। यह परमेश्वर का महान प्रेम है। युगों-युगों से एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसने उसका शुद्धिकरण और प्रज्ज्वलन प्राप्त किया हो और एक भी व्यक्ति उसके वचनों के द्वारा पूर्ण नहीं हो पाया है। परमेश्वर अब तुम लोगों से आमने-सामने बात कर रहा है, तुम लोगों को शुद्ध कर रहा है, तुम लोगों के भीतर के विद्रोहीपन को उजागर कर रहा है—यह सचमुच उसका उत्कर्ष है। लोगों में क्या योग्यता हैं? चाहे वे दाऊद के पुत्र हों या मोआब के वंशज, कुल मिला कर, लोग ऐसे सृजित प्राणी हैं जिनके पास गर्व करने के लिए कुछ नहीं है। चूँकि तुम लोग परमेश्वर के प्राणी हो, इसलिए तुम लोगों को एक प्राणी का कर्तव्य निभाना चाहिए। तुम लोगों से अन्य कोई अपेक्षाएँ नहीं हैं। तुम लोगों को ऐसे प्रार्थना करनी चाहिए : "हे परमेश्वर, चाहे मेरी हैसियत हो या न हो, अब मैं स्वयं को समझती हूँ। यदि मेरी हैसियत ऊँची है तो यह तेरे उत्कर्ष के कारण है, और यदि यह निम्न है तो यह तेरे आदेश के कारण है। सब-कुछ तेरे हाथों में है। मेरे पास न तो कोई विकल्प हैं न ही कोई शिकायत है। तूने निश्चित किया कि मुझे इस देश में और इन लोगों के बीच पैदा होना है, और मुझे पूरी तरह से तेरे प्रभुत्व के अधीन आज्ञाकारी होना चाहिए क्योंकि सब-कुछ उसी के भीतर है जो तूने निश्चित किया है। मैं हैसियत पर ध्यान नहीं देती हूँ; आखिरकार, मैं मात्र एक प्राणी ही तो हूँ। यदि तू मुझे अथाह गड्ढे में, आग और गंधक की झील में डालता है, तो मैं एक प्राणी से अधिक कुछ नहीं हूँ। यदि तू मेरा उपयोग करता है, तो मैं एक प्राणी हूँ। यदि तू मुझे पूर्ण बनाता है, मैं तब भी एक प्राणी हूँ। यदि तू मुझे पूर्ण नहीं बनाता, तब भी मैं तुझ से प्यार करती हूँ क्योंकि मैं सृष्टि के एक प्राणी से अधिक कुछ नहीं हूँ। मैं सृष्टि के परमेश्वर द्वारा रचित एक सूक्ष्म प्राणी से अधिक कुछ नहीं हूँ, सृजित मनुष्यों में से सिर्फ एक हूँ। तूने ही मुझे बनाया है, और अब तूने एक बार फिर मुझे अपने हाथों में अपनी दया पर रखा है। मैं तेरा उपकरण और तेरी विषमता होने के लिए तैयार हूँ क्योंकि सब-कुछ वही है जो तूने निश्चित किया है। कोई इसे बदल नहीं सकता। सभी चीजें और सभी घटनाएँ तेरे हाथों में हैं।" जब वह समय आएगा, तब तू हैसियत पर ध्यान नहीं देगी, तब तू इससे छुटकारा पा लेगी। तभी तू आत्मविश्वास से, निर्भीकता से खोज करने में सक्षम होगी, और तभी तेरा हृदय किसी भी बंधन से मुक्त हो सकता है। एक बार लोग जब इन चीज़ों से छूट जाते हैं, तो उनके पास और कोई चिंताएँ नहीं होतीं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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