3. ऐसा क्यों कहा जाता है कि वे सभी लोग जो परमेश्वर को नहीं जानते वे उसका विरोध करते हैं

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

जब से लोगों ने परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग पर चलना शुरू किया, तब से ऐसी कई चीजें रही हैं, जिनके बारे में वे अस्पष्ट हैं। वे परमेश्वर के कार्य के बारे में, तथा उन्हें कितना कार्य करना चाहिए, इस बारे में पूरे भ्रम में हैं। एक ओर, यह उनके अनुभव में विचलन और प्राप्त करने की उनकी क्षमता की सीमाओं के कारण है; दूसरी ओर, यह इसलिए है कि परमेश्वर का कार्य लोगों को अभी तक इस चरण में नहीं लाया है। इसलिए, हर कोई अधिकांश आध्यात्मिक मामलों में अस्पष्ट है। तुम लोग न केवल इस बारे में अस्पष्ट हो कि तुम्हें किसमें प्रवेश करना चाहिए; बल्कि तुम परमेश्वर के कार्य के बारे में और भी अधिक अनजान हो। यह सिर्फ़ तुम्हारे भीतर मौजूद कमियों की बात नहीं है : यह धार्मिक जगत के सभी लोगों में आम तौर पर मौजूद एक बड़ा दोष है। इस दोष में ही इसकी कुंजी मौजूद है कि क्यों लोग परमेश्वर को नहीं जानते, और इसलिए यह दोष उन सभी की एक आम कमी है, जो परमेश्वर को खोजते हैं। किसी ने भी परमेश्वर को कभी नहीं जाना, न ही उसका सच्चा चेहरा कभी देखा है। यही कारण है कि परमेश्वर का कार्य इतना कठिन बन जाता है, जितना किसी पहाड़ को हटाना या समुद्र को सुखाना। परमेश्वर के कार्य के लिए बहुत लोगों ने अपने प्राणों का बलिदान किया है; उसके कार्य के कारण बहुत लोगों को निष्कासित कर दिया गया है; उसके कार्य के कारण बहुत लोगों को मौत के घाट उतरा गया है; बहुत लोग अपनी आँखों में परमेश्वर के लिए प्रेम के आँसू लेकर अन्यायसहते हुए मर गए हैं; बहुतों ने क्रूर और अमानवीय उत्पीड़न भोगा है...। क्या ये त्रासदियाँ लोगों में परमेश्वर के बारे में ज्ञान की कमी के कारण नहीं हुईं? कैसे कोई ब्यक्ति, जो परमेश्वर को नहीं जानता, उसके सम्मुख आने का साहस कर सकता है? कैसे कोई व्यक्ति, जो परमेश्वर पर विश्वास करता है और फिर भी उसे सताता है, उसके सम्मुख आने का साहस कैसे कर सकता है? ये केवल धार्मिक जगत के लोगों की ही कमियाँ नहीं हैं, बल्कि ये तुम लोगों और उन लोगों में आम हैं। लोग परमेश्वर को जाने बिना उस पर विश्वास करते हैं; केवल इसी कारण से वे अपने हृदयों में परमेश्वर को आदर नहीं देते, और अपने हृदयों में उससे डरते नहीं। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं, जो खुल्लमखुल्ला और ढिठाई के साथ वह कार्य करते हैं, जिसकी वे इस धारा में खुद ही कल्पना कर लेते हैं, और परमेश्वर द्वारा आदेशित कार्य को अपनी ही माँगों और असंयमित इच्छाओं के अनुसार करते हैं। बहुत लोग परमेश्वर को बिना आदर दिए अपनी ही इच्छा के अनुसार निरंकुश रूप से कार्य करते हैं। क्या ये उदाहरण लोगों के स्वार्थी हृदयों की सटीक अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं? क्या ये उदाहरण लोगों के भीतर प्रचुर मात्रा में मौजूद धोखे को प्रकट नहीं करते? लोग निःसंदेह बहुत बुद्धिमान हो सकते हैं, परंतु कैसे उनके वरदान परमेश्वर के कार्य का स्थान ले सकते हैं? लोग परमेश्वर के दायित्व की परवाह बेशक कर सकते हैं, परंतु वे अत्यधिक स्वार्थपूर्ण ढंग से व्यवहार नहीं कर सकते। क्या लोगों के कार्य वास्तव में ईश्वर-तुल्य हैं? क्या कोई शत-प्रतिशत आश्वस्त हो सकता है? परमेश्वर की गवाही देने के लिए, उसकी महिमा विरासत में पाने के लिए—यह परमेश्वर एक अपवाद प्रस्तुत कर रहा है और लोगों को उन्नत कर रहा है; लोग कैसे योग्य हो सकते हैं? परमेश्वर का कार्य अभी बस शुरू हुआ है, और उसके वचन अभी बोले जाने शुरू ही हुए हैं। इस बिंदु पर, लोग अपने बारे में अच्छा महसूस करते हैं, पर क्या यह केवल अपमान को आमंत्रित करना नहीं है? वे बहुत कम समझते हैं। यहाँ तक कि सर्वाधिक मेधावी सिद्धांतकार, सर्वाधिक वाक्पटु वक्ता भी परमेश्वर की समस्त प्रचुरता का वर्णन नहीं कर सकते, तुम लोगों का तो कहना ही क्या? तुम लोगों को अपना मूल्य स्वर्ग से अधिक निर्धारित नहीं करना चाहिए, बल्कि स्वयं को उन विवेकी लोगों में से किसी से भी कम समझना चाहिए, जो परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करते हैं। यही मार्ग है, जिसके द्वारा तुम लोग प्रवेश करोगे : स्वयं को अन्य सबसे बहुत छोटा समझना। स्वयं को इतना ऊँचा क्यों समझते हो? स्वयं को इतने ऊँचे स्थान पर क्यों रखते हो? जीवन की लंबी यात्रा में तुम लोगों ने केवल कुछ पहले कदम उठाए हैं। तुम लोग परमेश्वर का सिर्फ हाथ देखते हो, न कि पूरे परमेश्वर को। तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य को और अधिक देखना चाहिए, जिसमें तुम्हें प्रवेश करना है, उसकी और अधिक खोज करनी चाहिए, क्योंकि तुम लोग बहुत कम बदले हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (1)' से उद्धृत

परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य, मनुष्यों में उसका कार्य जो प्रभाव प्राप्त करता है, और मनुष्य के प्रति परमेश्वर की जो इच्छा है : इन्हीं बातों को हर उस व्यक्ति को समझना चाहिए जो परमेश्वर का अनुसरण करता है। आजकल सभी इंसानों में परमेश्वर के कार्य के ज्ञान का अभाव है। परमेश्वर ने इंसान पर कौन-से कर्म किए हैं, परमेश्वर के समस्त कार्य और सृष्टि की रचना से लेकर वर्तमान समय तक, इंसान के लिए परमेश्वर की क्या इच्छा रही है—इन बातों को इंसान न तो जानता है न ही समझता है। यह अपर्याप्तता न केवल समस्त धार्मिक जगत में देखी जाती है, बल्कि परमेश्वर के सभी विश्वासियों में भी देखी जाती है। जब वह दिन आता है कि तुम वास्तव में परमेश्वर को देखते हो, उसकी बुद्धि को समझते हो; जब तुम परमेश्वर के किए सभी कर्मों को देखते हो और परमेश्वर के स्वरूप को पहचान जाते हो; जब तुम उसकी विपुलता, बुद्धि, चमत्कार और उन तमाम कार्यों को देखते हो जो उसने लोगों पर किए हैं, उस दिन तुम परमेश्वर में अपने विश्वास में सफलता पा लेते हो। जब परमेश्वर को सर्वव्यापी और अत्यधिक विपुल कहा जाता है, तब वह किन मायनों में सर्वव्यापी होता है? और वह किन मायनों में अत्यधिक विपुल होता है? यदि तुम इस बात को नहीं समझते हो, तो तुम परमेश्वर के विश्वासी नहीं माने जा सकते। मैं क्यों कहता हूँ कि धार्मिक जगत के लोग परमेश्वर के विश्वासी नहीं होते, बल्कि कुकर्मी होते हैं, शैतान की ही किस्म के होते हैं? जब मैं कहता हूँ कि वे कुकर्मी होते हैं, तो ऐसा इसलिये कहता हूँ क्योंकि वे परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते, उसकी बुद्धि को नही देख पाते। परमेश्वर कभी भी अपना कार्य उन पर प्रकट नहीं करता। वे अंधे होते हैं; वे परमेश्वर के कर्मों को नहीं देख पाते, परमेश्वर ने उन्हें त्याग दिया है और उन्हें परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा बिल्कुल भी प्राप्त नहीं है, पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करने की तो बात ही दूर है। जो लोग परमेश्वर के कार्य से वंचित हैं, वे कुकर्मी और परमेश्वर के विरोधी हैं। मैं परमेश्वर के जिस विरोध की बात कहता हूँ, वो उन लोगों के संदर्भ में है जो परमेश्वर को नहीं जानते, जो ज़बान से तो परमेश्वर को स्वीकारते हैं, मगर परमेश्वर को जानते नहीं, जो परमेश्वर का अनुसरण तो करते हैं मगर उसकी आज्ञा का पालन नहीं करते, और जो परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद तो उठाते हैं मगर उसकी गवाही नहीं दे पाते। परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को या मनुष्य में उसके कार्य को समझे बिना, मनुष्य परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं हो सकता, न ही वह परमेश्वर की गवाही दे सकता है। मनुष्य द्वारा परमेश्वर के विरोध का कारण, एक ओर तो मनुष्य का स्वभाव भ्रष्ट है, दूसरी ओर, परमेश्वर के प्रति अज्ञानता, उन सिद्धांतों की जिनसे परमेश्वर कार्य करता है और मनुष्य के लिए उसकी इच्छा की समझ की कमी है। ये दोनों पहलू मिलकर परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रतिरोध के इतिहास को बनाते हैं। नौसिखिए विश्वासी परमेश्वर का विरोध करते हैं क्योंकि ऐसा विरोध उनकी प्रकृति में बसा होता है, जबकि कई वर्षों से विश्वास रखने वाले लोगों में परमेश्वर का विरोध, उनके भ्रष्ट स्वभाव के अलावा, परमेश्वर के प्रति उनकी अज्ञानता का परिणाम है। परमेश्वर के देहधारी बनने से पहले के समय में, क्या किसी मनुष्य ने परमेश्वर का विरोध किया है, यह इस बात से तय होता था कि क्या उसने स्वर्ग में परमेश्वर द्वारा निर्धारित आदेशों का पालन किया है। उदाहरण के लिये, व्यवस्था के युग में, जो कोई यहोवा परमेश्वर की व्यवस्था का पालन नहीं करता था, वह परमेश्वर का विरोध माना जाता था; जो कोई यहोवा के प्रसाद की चोरी करता था या यहोवा के कृपापात्रों के विरुद्ध खड़ा होता था, उसे परमेश्वर-विरोधी मानकर पत्थरों से मार डाला जाता था; जो कोई अपने माता-पिता का आदर नहीं करता था, दूसरों को चोट पहुँचाता था या धिक्कारता था, तो उसे व्यवस्था का पालन न करने वाला माना जाता था। और जो लोग यहोवा की व्यवस्था को नहीं मानते थे, उन्हें यहोवा विरोधी माना जाता था। लेकिन अनुग्रह के युग में ऐसा नहीं था, तब जो कोई भी यीशु के विरुद्ध खड़ा होता था, उसे विरोधी माना जाता था, और जो यीशु द्वारा बोले गये वचनों का पालन नहीं करता था, उसे परमेश्वर विरोधी माना जाता था। इस समय, जिस ढंग से परमेश्वर के विरोध को परिभाषित किया गया, वह ज़्यादा सही भी था और ज़्यादा व्यवाहारिक भी। जिस दौरान, परमेश्वर ने देहधारण नहीं किया था, तब कोई इंसान परमेश्वर विरोधी है या नहीं, यह इस बात से तय होता था कि क्या इंसान स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर की आराधना और उसका आदर करता था या नहीं। उस समय परमेश्वर के प्रति विरोध को जिस ढंग से परिभाषित किया गया, वह उतना भी व्यवाहारिक नहीं था क्योंकि तब इंसान परमेश्वर को देख नहीं पाता था, न ही उसे यह पता था कि परमेश्वर की छवि कैसी है, वह कैसे कार्य करता है और कैसे बोलता है। परमेश्वर के बारे में इंसान की कोई धारणा नहीं थी, परमेश्वर के बारे में उसकी एक अस्पष्ट आस्था थी, क्योंकि परमेश्वर अभी तक इंसानों के सामने प्रकट नहीं हुआ था। इसलिए, इंसान ने अपनी कल्पनाओं में कैसे भी परमेश्वर में विश्वास क्यों न किया हो, परमेश्वर ने न तो इंसान की निंदा की, न ही इंसान से अधिक अपेक्षा की, क्योंकि इंसान परमेश्वर को देख नहीं पाता था। परमेश्वर जब देहधारण कर इंसानों के बीच काम करने आता है, तो सभी उसे देखते और उसके वचनों को सुनते हैं, और सभी लोग उन कर्मों को देखते हैं जो परमेश्वर देह रूप में करता है। उस क्षण, इंसान की तमाम धारणाएँ साबुन के झाग बन जाती हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जिन्होंने परमेश्वर को देहधारण करते हुए देखा है, यदि वे अपनी इच्छा से उसका आज्ञापालन करेंगे, तो उनका तिरस्कार नहीं किया जाएगा, जबकि जो लोग जानबूझकर परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं, वे परमेश्वर का विरोध करने वाले माने जाएँगे। ऐसे लोग मसीह-विरोधी और शत्रु हैं जो जानबूझकर परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं। ऐसे लोग जो परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखते हैं, मगर खुशी से उसकी आज्ञा मानते हैं, वे निंदित नहीं किए जाएँगे। परमेश्वर मनुष्य की नीयत और क्रियाकलापों के आधार पर उसे दंडित करता है, उसके विचारों और मत के आधार पर कभी नहीं। यदि वह विचारों और मत के आधार इंसान को दंडित करता, तो कोई भी परमेश्वर के रोषपूर्ण हाथों से बच कर भाग नहीं पाता। जो लोग जानबूझकर देहधारी परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं, वे उसकी अवज्ञा करने के कारण दण्ड पाएँगे। जो लोग जानबूझकर परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं, उनका विरोध परमेश्वर के प्रति उनकी धारणाओं से उत्पन्न होता है, जिसके परिणामस्वरूप वे परमेश्वर के कार्य में व्यवधान पैदा करते हैं। ये लोग जानते-बूझते परमेश्वर के कार्य का विरोध करते हैं और उसे नष्ट करते हैं। परमेश्वर के बारे में न केवल उनकी धारणाएँ होती हैं, बल्कि वे उन कामों में भी लिप्त रहते हैं जो परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं, और यही कारण है कि इस तरह के लोगों की निंदा की जाएगी। जो लोग जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालने में लिप्त नहीं होते, उनकी पापियों के समान निंदा नहीं की जाएगी, क्योंकि वे अपनी इच्छा से आज्ञापालन कर पाते हैं और विघ्न एवं व्यवधान उत्पन्न करने वाली गतिविधियों में लिप्त नहीं होते। ऐसे व्यक्तियों की निंदा नहीं की जाएगी। लेकिन, जब कोई कई वर्षों तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लेने के बाद भी परमेश्वर के बारे में कई धारणाएँ मन में रखता है और देहधारी परमेश्वर के कार्य को समझने में असमर्थ रहता है, और अनेक वर्षों के अनुभव के बावजूद, वह परमेश्वर के बारे में धारणाओं से भरा रहता है और उसे जान नहीं पाता, और अगर कितने भी सालों तक उसके कार्य का अनुभव करने के बाद भी वह परमेश्वर के बारे में धारणाओं से भरा रहता है और फिर भो उसे जान नहीं पाता तब वह भले ही व्यवधान उत्पन्न करने वाली गतिविधियों में लिप्त न हो, लेकिन उसका हृदय परमेश्वर के बारे में धारणाओं से भरा रहता है, और अगर ये धारणाएँ स्पष्ट न भी हों तो, ऐसे लोग किसी भी प्रकार से परमेश्वर के कार्य के उपयोग लायक नहीं होते। वे सुसमाचार का उपदेश देने या परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग किसी काम के नहीं होते और मंदबुद्धि होते हैं। क्योंकि वे परमेश्वर को नहीं जानते और परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं का परित्याग करने में एकदम अक्षम होते हैं, इसलिए वे निंदित किए जाते हैं। ऐसा कहा जा सकता है : नौसिखिए विश्वासियों के लिये परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखना या परमेश्वर के बारे में कुछ नहीं जानना सामान्य बात है, परंतु जिसने वर्षों परमेश्वर में विश्वास किया है और परमेश्वर के कार्य का बहुत अनुभव किया है, उसका ऐसी धारणाएँ रखे रहना, सामान्य बात नहीं है, और उसे परमेश्वर का ज्ञान न होना तो बिल्कुल भी सामान्य नहीं है। ऐसे लोगों की निंदा करना सामान्य स्थिति नहीं है। ऐसे असामान्य लोग एकदम कचरा हैं; ये ऐसे लोग होते हैं जो परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करते हैं और जिन्होंने व्यर्थ में ही परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाया होता है। ऐसे सभी लोग अंत में मिटा दिए जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं' से उद्धृत

जो लोग परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझते, वे परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं, और जो लोग परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य से अवगत होते हैं फिर भी परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करते, वे तो परमेश्वर के और भी बड़े विरोधी होते हैं। ऐसे भी लोग हैं जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में दिन-भर बाइबल पढ़ते रहते हैं, फिर भी उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को समझता हो। उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो परमेश्वर को जान पाता हो; उनमें से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप तो एक भी नहीं होता। वे सबके सब निकम्मे और अधम लोग हैं, जिनमें से प्रत्येक परमेश्वर को सिखाने के लिए ऊँचे पायदान पर खड़ा रहता है। वे लोग परमेश्वर के नाम का झंडा उठाकर, जानबूझकर उसका विरोध करते हैं। वे परमेश्वर में विश्वास रखने का दावा करते हैं, फिर भी मनुष्यों का माँस खाते और रक्त पीते हैं। ऐसे सभी मनुष्य शैतान हैं जो मनुष्यों की आत्माओं को निगल जाते हैं, ऐसे मुख्य राक्षस हैं जो जानबूझकर उन्हें विचलित करते हैं जो सही मार्ग पर कदम बढ़ाने का प्रयास करते हैं और ऐसी बाधाएँ हैं जो परमेश्वर को खोजने वालों के मार्ग में रुकावट पैदा करते हैं। वे "मज़बूत देह" वाले दिख सकते हैं, किंतु उसके अनुयायियों को कैसे पता चलेगा कि वे मसीह-विरोधी हैं जो लोगों से परमेश्वर का विरोध करवाते हैं? अनुयायी कैसे जानेंगे कि वे जीवित शैतान हैं जो इंसानी आत्माओं को निगलने को तैयार बैठे हैं? जो लोग परमेश्वर के सामने अपने आपको बड़ा मूल्य देते हैं, वे सबसे अधिक अधम लोग हैं, जबकि जो स्वयं को दीन और विनम्र बनाए रखते हैं, वे सबसे अधिक आदरणीय हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि वे परमेश्वर के कार्य को जानते हैं, और दूसरों के आगे परमेश्वर के कार्य की धूमधाम से उद्घोषणा करते हैं, जबकि वे सीधे परमेश्वर को देखते हैं—ऐसे लोग बेहद अज्ञानी होते हैं। ऐसे लोगों में परमेश्वर की गवाही नहीं होती, वे अभिमानी और अत्यंत दंभी होते हैं। परमेश्वर का वास्तविक अनुभव और व्यवहारिक ज्ञान होने के बावजूद, जो लोग ये मानते हैं कि उन्हें परमेश्वर का बहुत थोड़ा-सा ज्ञान है, वे परमेश्वर के सबसे प्रिय लोग होते हैं। ऐसे लोग ही सच में गवाह होते हैं और परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य होते हैं। जो परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते वे परमेश्वर के विरोधी हैं, जो परमेश्वर की इच्छा को समझते तो हैं मगर सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जो परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हैं, फिर भी परमेश्वर के वचनों के सार के विरुद्ध जाते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जिनमें देहधारी परमेश्वर के प्रति धारणाएँ हैं और जिनका दिमाग विद्रोह लिप्त रहता है, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जो लोग परमेश्वर की आलोचना करते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; और जो कोई भी परमेश्वर को जानने या उसकी गवाही देने में असमर्थ है, वो परमेश्वर का विरोधी है। इसलिये मेरा तुम लोगों से आग्रह है : यदि तुम लोगों को सचमुच विश्वास है कि तुम इस मार्ग पर चल सकते हो, तो इस मार्ग पर चलते रहो। लेकिन अगर तुम लोग परमेश्वर के विरोध से परहेज नहीं कर सकते, तो इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, बेहतर है कि तुम लोग यह मार्ग छोड़कर चले जाओ। अन्यथा इस बात की संभावना बहुत ज़्यादा है कि तुम्हारे साथ बुरा हो जाए, क्योंकि तुम लोगों की प्रकृति बहुत ही भ्रष्ट है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं' से उद्धृत

क्या तुम लोग कारण जानना चाहते हो कि फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया? क्या तुम फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे भी ज़्यादा, उन्होंने केवल इस पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, फिर भी जीवन-सत्य की खोज नहीं की। इसलिए, वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं क्योंकि उन्हें जीवन के मार्ग के बारे में कोई ज्ञान नहीं है, और नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है? तुम लोग क्या कहते हो, ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर का आशीष कैसे प्राप्त करेंगे? वे मसीहा को कैसे देख सकते हैं? उन्होंने यीशु का विरोध किया क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु द्वारा बताए गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे और इसके अलावा क्योंकि उन्होंने मसीहा को नहीं समझा था। और चूँकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था और कभी मसीहा के साथ नहीं रहे थे, उन्होंने मसीहा के नाम के साथ व्यर्थ ही चिपके रहने की ग़लती की, जबकि हर मुमकिन ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत था : इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता, तुम मसीह नहीं हो। क्या ये दृष्टिकोण हास्यास्पद और बेतुके नहीं हैं? मैं तुम लोगों से आगे पूछता हूँ : क्या तुम लोगों के लिए वो ग़लतियां करना बेहद आसान नहीं, जो बिल्कुल आरंभ के फरीसियों ने की थीं, क्योंकि तुम लोगों के पास यीशु की थोड़ी-भी समझ नहीं है? क्या तुम सत्य का मार्ग जानने योग्य हो? क्या तुम सचमुच विश्वास दिला सकते हो कि तुम मसीह का विरोध नहीं करोगे? क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने योग्य हो? यदि तुम नहीं जानते कि तुम मसीह का विरोध करोगे या नहीं, तो मेरा कहना है कि तुम पहले ही मौत की कगार पर जी रहे हो। जो लोग मसीहा को नहीं जानते थे, वे सभी यीशु का विरोध करने, यीशु को अस्वीकार करने, उसे बदनाम करने में सक्षम थे। जो लोग यीशु को नहीं समझते, वे सब उसे अस्वीकार करने एवं उसे बुरा-भला कहने में सक्षम हैं। इसके अलावा, वे यीशु के लौटने को शैतान द्वारा किए गए धोखे की तरह देखने में सक्षम हैं और अधिकांश लोग देह में लौटे यीशु की निंदा करेंगे। क्या इस सबसे तुम लोगों को डर नहीं लगता? जिसका तुम लोग सामना करते हो, वह पवित्र आत्मा के ख़िलाफ़ निंदा होगी, कलीसियाओं के लिए कहे गए पवित्र आत्मा के वचनों का विनाश होगा और यीशु द्वारा व्यक्त किए गए समस्त वचनों को ठुकराना होगा। यदि तुम लोग इतने संभ्रमित हो, तो यीशु से क्या प्राप्त कर सकते हो? यदि तुम हठपूर्वक अपनी ग़लतियां मानने से इनकार करते हो, तो श्वेत बादल पर यीशु के देह में लौटने पर तुम लोग उसके कार्य को कैसे समझ सकते हो? मैं तुम लोगों को यह बताता हूँ : जो लोग सत्य स्वीकार नहीं करते, फिर भी अंधों की तरह श्वेत बादलों पर यीशु के आगमन का इंतज़ार करते हैं, निश्चित रूप से पवित्र आत्मा के ख़िलाफ़ निंदा करेंगे और ये वे वर्ग हैं, जो नष्ट किए जाएँगे। तुम लोग सिर्फ़ यीशु के अनुग्रह की कामना करते हो और सिर्फ़ स्वर्ग के सुखद क्षेत्र का आनंद लेना चाहते हो, जब यीशु देह में लौटा, तो तुमने यीशु के कहे वचनों का कभी पालन नहीं किया और यीशु द्वारा व्यक्त किए सत्य को कभी ग्रहण नहीं किया। यीशु के एक श्वेत बादल पर लौटने के तथ्य के बदले तुम लोग क्या दोगे? क्या यह वही ईमानदारी है, जिसमें तुम लोग बार-बार पाप करते हो और फिर बार-बार उनकी स्वीकारोक्ति करते हो? श्वेत बादल पर लौटने वाले यीशु को तुम बलिदान में क्या अर्पण करोगे? क्या ये कार्य के वे वर्ष हैं, जिनके ज़रिए तुम स्वयं अपनी बढ़ाई करते हो? लौटकर आए यीशु को तुम लोगों पर विश्वास कराने के लिए तुम लोग किस चीज को थामकर रखोगे? क्या वह तुम लोगों का अभिमानी स्वभाव है, जो किसी भी सत्य का पालन नहीं करता?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नया बना चुका होगा' से उद्धृत

तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य का विरोध इसलिए करते हो, या आज के कार्य को मापने के लिए अपनी ही धारणाओं का इसलिए उपयोग करते हो, क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों को नहीं जानते हो, और क्योंकि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लेते हो। तुम लोगों का परमेश्वर के प्रति विरोध और पवित्र आत्मा के कार्य में अवरोध तुम लोगों की धारणाओं और तुम लोगों के अंतर्निहित अहंकार के कारण है। ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर का कार्य गलत है, बल्कि इसलिए है कि तुम लोग प्राकृतिक रूप से अत्यंत अवज्ञाकारी हो। परमेश्वर में विश्वास हो जाने के बाद भी, कुछ लोग यकीन से यह भी नहीं कह सकते हैं कि मनुष्य कहाँ से आया, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कार्यों के सही और गलत होने के बारे में बताते हुए सार्वजनिक भाषण देने का साहस करते हैं। यहाँ तक कि वे उन प्रेरितों को भी व्याख्यान देते हैं जिनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य है, उन पर टिप्पणी करते हैं और बेमतलब बोलते रहते हैं; उनकी मानवता बहुत ही निम्न है, और उनमें बिल्कुल भी समझ नहीं होती है। क्या वह दिन नहीं आएगा जब इस प्रकार के लोग पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाएँगे, और नरक की आग द्वारा भस्म कर दिए जाएँगे? वे परमेश्वर के कार्यों को नहीं जानते हैं, फिर भी उसके कार्य की आलोचना करते हैं और परमेश्वर को यह निर्देश देने की कोशिश करते हैं कि कार्य किस प्रकार किया जाए। इस प्रकार के अविवेकी लोग परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं? मनुष्य खोजने और अनुभव करने की प्रक्रिया के दौरान ही परमेश्वर को जान पाता है; न कि अपनी सनक में उसकी आलोचना करने के द्वारा मनुष्य पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के माध्यम से परमेश्वर को जान पाया है। परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान जितना अधिक सही होता जाता है, उतना ही कम वे उसका विरोध करते हैं। इसके विपरीत, लोग परमेश्वर के बारे में जितना कम जानते हैं, उतनी ही ज्यादा उनके द्वारा परमेश्वर का विरोध करने की संभावना रहती है। तुम लोगों की धारणाएँ, तुम्हारी पुरानी प्रकृति, और तुम्हारी मानवता, चरित्र और नैतिक दृष्टिकोण वह "पूँजी" है जिससे तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो, और तुम जितना अधिक भ्रष्ट, तुच्छ और निम्न होगे, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के शत्रु बन जाते हो। जो लोग प्रबल धारणाएँ रखते हैं और आत्मतुष्ट स्वभाव के होते हैं, वे देहधारी परमेश्वर के प्रति और भी अधिक शत्रुतापूर्ण होते हैं; इस प्रकार के लोग मसीह-विरोधी हैं। यदि तुम्हारी धारणाओं में सुधार न किया जाए, तो वे सदैव परमेश्वर की विरोधी रहेंगी; तुम कभी भी परमेश्वर के अनुकूल नहीं होगे, और सदैव उससे दूर रहोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर का कार्य निरंतर आगे बढ़ता रहता है। यद्यपि उसके कार्य का प्रयोजन नहीं बदलता, लेकिन जिन तरीकों से वह कार्य करता है, वे निरंतर बदलते रहते हैं, जिसका अर्थ यह हुआ कि जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे भी निरंतर बदलते रहते हैं। परमेश्वर जितना अधिक कार्य करता है, मनुष्य का परमेश्वर का ज्ञान उतना ही अधिक होता है। परमेश्वर के कार्य के कारण मनुष्य के स्वभाव में तदनुरूप बदलाव आता है। लेकिन चूँकि परमेश्वर का कार्य हमेशा बदलता रहता है, इसलिए पवित्र आत्मा के कार्य को न समझने वाले और सत्य को न जानने वाले बेतुके लोग परमेश्वर का विरोध करने लग जाते हैं। परमेश्वर का कार्य कभी भी मनुष्यों की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता, क्योंकि उसका कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता, न ही वह कभी पुराने कार्य को दोहराता है, बल्कि पहले कभी नहीं किए गए कार्य के साथ आगे बढ़ता जाता है। चूँकि परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं और मनुष्य परमेश्वर द्वारा अतीत में किए गए कार्य के आधार पर ही उसके आज के कार्य का आकलन करता है, इस कारण परमेश्वर के लिए नए युग के कार्य के प्रत्येक चरण को करना लगातार अत्यंत कठिन हो गया है। मनुष्य के सामने बहुत अधिक मुश्किलें हैं! मनुष्य की सोच बहुत ही रूढ़िवादी है! कोई भी मनुष्य परमेश्वर के कार्य को नहीं जानता, फिर भी हर कोई उसे सीमा में बांध देता है। जब मनुष्य परमेश्वर से दूर जाता है, तो वह जीवन, सत्य और परमेश्वर की आशीषों को खो देता है, फिर भी मनुष्य न तो सत्य, और न ही जीवन को स्वीकार करता है, परमेश्वर द्वारा मानवजाति को प्रदान किए जाने वाले अधिक बड़े आशीषों को तो बिल्कुल ग्रहण नहीं करता। सभी मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त करना चाहते हैं, फिर भी परमेश्वर के कार्य में किसी भी बदलाव को सहन नहीं कर पाते। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, उन्हें लगता है परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील है, और परमेश्वर का कार्य हमेशा ठहरा रहता है। उनके विश्वास के अनुसार, परमेश्वर से जो कुछ भी शाश्वत उद्धार प्राप्त करने के लिए आवश्यक है, वह है व्यवस्था का पालन करना, अगर वे पश्चाताप करेंगे और अपने पापों को स्वीकार करेंगे, तो परमेश्वर की इच्छा हमेशा संतुष्ट रहेगी। वे इस विचार के हैं कि परमेश्वर केवल वही हो सकता है जो व्यवस्था के अधीन है और जिसे मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ाया गया था; उनका यह भी विचार है कि परमेश्वर न तो बाइबल से बढ़कर होना चाहिए और न ही वो हो सकता है। उनके इन्हीं विचारों ने उन्हें पुरानी व्यवस्था से दृढ़ता से बाँध रखा है और मृत नियमों में जकड़ कर रखा है। ऐसे लोग तो और भी हैं जो यह मानते हैं कि परमेश्वर का नया कार्य जो भी हो, उसे भविष्यवाणियों द्वारा सही साबित किया जाना ही चाहिए और कार्य के प्रत्येक चरण में, जो भी "सच्चे" मन से उसका अनुसरण करते हैं, उन्हें प्रकटन भी अवश्य दिखाया जाना चाहिए; अन्यथा वह कार्य परमेश्वर का कार्य नहीं हो सकता। परमेश्वर को जानना मनुष्य के लिए पहले ही आसान कार्य नहीं है। मनुष्य के बेतुके हृदय और उसके आत्म-महत्व एवं दंभी विद्रोही स्वभाव को देखते हुए, परमेश्वर के नए कार्य को ग्रहण करना मनुष्य के लिए और भी अधिक कठिन है। मनुष्य न तो परमेश्वर के कार्य पर ध्यान से विचार करता है और न ही इसे विनम्रता से स्वीकार करता है; बल्कि मनुष्य परमेश्वर से प्रकाशन और मार्गदर्शन का इंतजार करते हुए, तिरस्कार का रवैया अपनाता है। क्या यह ऐसे मनुष्य का व्यवहार नहीं है जो परमेश्वर का विरोधी और उससे विद्रोह करने वाला है? इस प्रकार के मनुष्य कैसे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त कर सकते हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वो मनुष्य, जिसने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, किस प्रकार उसके प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है?' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर के मापन और परिसीमन के लिए अपनी धारणाओं का उपयोग करते हो, मानो परमेश्वर कोई मिट्टी की अचल मूर्ति हो, और अगर तुम लोग परमेश्वर को बाइबल के मापदंडों के भीतर सीमांकित करते हो और उसे कार्य के एक सीमित दायरे में समाविष्ट करते हो, तो इससे यह प्रमाणित होता है कि तुम लोगों ने परमेश्वर की निंदा की है। चूँकि पुराने विधान के युग के यहूदियों ने परमेश्वर को एक अचल प्रतिमा के रूप में लिया था, जिसे वे अपने हृदयों में रखते थे, मानो परमेश्वर को मात्र मसीह ही कहा जा सकता था, और मात्र वही, जिसे मसीह कहा जाता था, परमेश्वर हो सकता हो, और चूँकि मानवजाति परमेश्वर की सेवा और आराधना इस तरह से करती थी, मानो वह मिट्टी की एक (निर्जीव) मूर्ति हो, इसलिए उन्होंने उस समय के यीशु को मौत की सजा देते हुए सलीब पर चढ़ा दिया—निर्दोष यीशु को इस तरह मौत की सजा दे दी गई। परमेश्वर ने कोई अपराध नहीं किया था, फिर भी मनुष्य ने उसे छोड़ने से इनकार कर दिया, और उसे मृत्युदंड देने पर जोर दिया, और इसलिए यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया। मनुष्य सदैव विश्वास करता है कि परमेश्वर स्थिर है, और वह उसे एक अकेली पुस्तक बाइबल के आधार पर परिभाषित करता है, मानो मनुष्य को परमेश्वर के प्रबंधन की पूर्ण समझ हो, मानो मनुष्य वह सब अपनी हथेली पर रखता हो, जो परमेश्वर करता है। लोग बेहद बेतुके, बेहद अहंकारी और स्वभाव से बड़बोले हैं। परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान कितना भी महान क्यों न हो, मैं फिर भी यही कहता हूँ कि तुम परमेश्वर को नहीं जानते, कि तुम वह व्यक्ति हो जो परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करता है, और कि तुमने परमेश्वर की निंदा की है, कि तुम परमेश्वर के कार्य का पालन करने और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर चलने में सर्वथा अक्षम हो। क्यों परमेश्वर मनुष्य के कार्यकलापों से कभी संतुष्ट नहीं होता? क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को नहीं जानता, क्योंकि उसकी अनेक धारणाएँ है, क्योंकि उसका परमेश्वर का ज्ञान वास्तविकता से किसी भी तरह मेल नहीं खाता, इसके बजाय वह नीरस ढंग से एक ही विषय को बिना बदलाव के दोहराता रहता है और हर स्थिति के लिए एक ही दृष्टिकोण इस्तेमाल करता है। और इसलिए, आज पृथ्वी पर आने पर, परमेश्वर को एक बार फिर मनुष्य द्वारा सलीब पर चढ़ा दिया गया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दुष्टों को निश्चित ही दंड दिया जाएगा' से उद्धृत

यदि मनुष्य कार्य के तीनों चरणों में देख सकता कि वे विभिन्न समयों, स्थानों और लोगों में स्वयं परमेश्वर के द्वारा किए गए हैं, अगर मनुष्य यह देख सकता है कि, यद्यपि कार्य भिन्न है, तब भी यह सब एक ही परमेश्वर के द्वारा किया गया है, और चूँकि यह कार्य एक ही परमेश्वर द्वारा किया गया है, तो इसे सही और त्रुटिहीन होना चाहिए, और यह भी कि यद्यपि यह मनुष्यों की धारणाओं से मेल नहीं खाता है, तो भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह एक ही परमेश्वर का कार्य है—यदि मनुष्य निश्चित होकर कह सके कि यह एक ही परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य है, तो मनुष्य की धारणाएँ तुच्छ और गौण हो जाएँगी। क्योंकि मनुष्य के दर्शन अस्पष्ट हैं, और क्योंकि मनुष्य केवल यहोवा को परमेश्वर के रूप में और यीशु को प्रभु के रूप में जानता है, और आज के देहधारी परमेश्वर के बारे में दुविधा में है, इसलिए कई लोग यहोवा और यीशु के कार्यों के प्रति समर्पित रहते हैं, और आज के कार्य के बारे में धारणाओं से ग्रस्त हैं, अधिकांश लोग हमेशा संशय में रहते हैं और आज के कार्य को गंभीरता से नहीं लेते हैं। मनुष्य की कार्य के पिछले दो चरणों के बारे में कोई धारणाएँ नहीं हैं, जो अदृश्य थे। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य पिछले दोनों चरणों की वास्तविकता को नहीं समझता है और व्यक्तिगत रूप से वह उनका साक्षी नहीं रहा है। चूँकि कार्य के इन चरणों को देखा नहीं जा सकता है, इसलिए मनुष्य इनके बारे में मनचाही कल्पनाएँ करता है; वह कुछ भी क्यों न सोचता रहे, पर इन कल्पनाओं को सिद्ध करने के लिए कोई तथ्य नहीं हैं, और इन्हें सुधारने वाला भी कोई नहीं है। मनुष्य कोई सावधानी बरते बिना और अपनी कल्पनाओं को बेलगाम दौड़ाते हुए अपनी प्राकृतिक सहज प्रवृत्ति को खुली छूट दे देता है, क्योंकि उसकी कल्पनाओं को सत्यापित करने के लिए कोई तथ्य नहीं हैं, इसलिए मनुष्य की कल्पनाएँ "तथ्य" बन जाती हैं, भले ही उनका कोई प्रमाण हो या न हो। इस प्रकार, मनुष्य अपने मन में कल्पित परमेश्वर को ही मानने लगता है और वास्तविकता के परमेश्वर को नहीं खोजता है। यदि एक व्यक्ति का एक प्रकार का विश्वास है, तो सौ लोगों के बीच सौ प्रकार के विश्वास होंगे। मनुष्य के पास इसी प्रकार के विश्वास हैं क्योंकि उसने परमेश्वर के कार्य की वास्तविकता को नहीं देखा है, क्योंकि उसने इसे सिर्फ अपने कानों से सुना है और अपनी आँखों से नहीं देखा है। मनुष्य ने उपाख्यानों और कहानियों को सुना है, परंतु उसने परमेश्वर के कार्य के तथ्यों के ज्ञान के बारे में शायद ही सुना है। इस प्रकार, वे जो केवल एक वर्ष से विश्वासी रहे हैं, परमेश्वर पर अपनी खुद की धारणाओं के माध्यम से विश्वास करते हैं। यही उन सभी के बारे में भी सत्य है जिन्होंने परमेश्वर पर जीवन भर विश्वास किया है। जो लोग तथ्यों को नहीं देख सकते वे ऐसे विश्वास से बच नहीं सकते जिसमें परमेश्वर के बारे में उनकी अपनी धारणाएँ हैं। मनुष्य यह मानता है कि उसने स्वयं को अपनी सभी पुरानी धारणाओं के बंधनों से मुक्त कर लिया है और एक नए क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है। क्या मनुष्य यह नहीं जानता कि उन लोगों का ज्ञान जो परमेश्वर का असली चेहरा नहीं देख सकते, केवल धारणाएँ और अफ़वाहें हैं? मनुष्य सोचता है कि उसकी धारणाएँ सही हैं और बिना गलतियों की हैं, और सोचता है कि ये धारणाएँ परमेश्वर की ओर से आती हैं। आज, जब मनुष्य परमेश्वर के कार्य देखता है, वह उन धारणाओं को खुला छोड़ देता है जो कई सालों से बनती रही हैं। अतीत की कल्पनाएँ और विचार इस चरण के कार्य में अवरोध बन गए हैं और मनुष्य के लिए इस प्रकार की धारणाओं को छोड़ना और इस प्रकार के विचारों का खंडन करना कठिन हो गया है। इस कदम-दर-कदम कार्य को लेकर ऐसे बहुत-से लोगों की धारणाएँ, जिन्होंने आज तक परमेश्वर का अनुसरण किया है, अत्यंत हानिकारक हो गई हैं और इन लोगों ने देहधारी परमेश्वर के प्रति धीरे-धीरे एक हठी शत्रुता विकसित कर ली है। इस घृणा का स्रोत मनुष्य की धारणाओं और कल्पनाओं में निहित है। मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ आज के कार्य की शत्रु बन गई हैं, वह कार्य जो मनुष्य की धारणाओं से मेल नहीं खाता। ऐसा इसीलिए हुआ है क्योंकि तथ्य मनुष्य को उसकी कल्पनाशीलता को खुली छूट देने की अनुमति नहीं देते, और इसके साथ ही, वे मनुष्य द्वारा आसानी से खंडित नहीं किए जा सकते, और मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ तथ्यों के अस्तित्व को मिटा नहीं सकतीं, और साथ ही, क्योंकि मनुष्य तथ्यों की सटीकता और सच्चाई पर विचार नहीं करता है, और केवल एक ही तरह सोचते हुए अपनी धारणाओं को खुला छोड़ देता है, और अपनी खुद की कल्पनाओं को काम में लाता है। इसे केवल मनुष्यों की धारणाओं का दोष ही कहा जा सकता है, इसे परमेश्वर के कार्य का दोष नहीं कहा जा सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

जो पादरी और एल्डर्स ऊँचे-ऊँचे उपदेश-मंचों पर खड़े होकर लोगों को उपदेश देते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी और शैतान के साथी हैं; तुम लोगों में से वे लोग जो उपदेश-मंचों पर खड़े होकर लोगों को उपदेश नहीं देते, परमेश्वर के और भी अधिक विरोधी नहीं हैं? क्या शैतान के साथ तुम लोगों की मिली-भगत और भी ज़्यादा मज़बूत नहीं है? जो लोग परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझते, वे नहीं जानते हैं कि परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कैसे बनें। निश्चित रूप से, ऐसा तो नहीं हो सकता जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को समझते हैं, वे न जानते हों कि परमेश्वर के अनुरूप कैसे बनें। परमेश्वर के कार्य में कभी भी त्रुटि नहीं होती; बल्कि, त्रुटि इंसान के अनुसरण में होती है। क्या वे पतित लोग जो जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करते हैं, पादरियों और एल्डरों से भी अधिक कुटिल और दुष्ट नहीं हैं? बहुत से लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं और उन लोगों में, ऐसे भी हैं जो बहुत से दूसरे तरीकों से परमेश्वर का विरोध करते हैं। जैसे सभी प्रकार के विश्वासी होते हैं, वैसे ही परमेश्वर का विरोध करने वाले भी सभी प्रकार के होते हैं, सब एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। जो लोग परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से नहीं समझते, उनमें से एक को भी नहीं बचाया जा सकता। अतीत में इंसान ने परमेश्वर का कितना भी विरोध किया हो, लेकिन जब इंसान को परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य समझ में आ जाता है, और वो परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास करता है, तो परमेश्वर उसके पिछले सारे पाप धो देता है। अगर इंसान सत्य की खोज और सत्य का अभ्यास करे, तो परमेश्वर उसके कृत्यों को अपने मन में नहीं रखता। इसके अलावा, इंसान द्वारा सत्य के अभ्यास के आधार पर परमेश्वर उसे सही ठहराता है। यही परमेश्वर की धार्मिकता है। इंसान के परमेश्वर को देखने या उसके कार्य का अनुभव करने से पहले, परमेश्वर के प्रति इंसान का चाहे जो रवैया रहा हो, परमेश्वर उसे अपने मन में नहीं रखता। लेकिन, एक बार जब इंसान परमेश्वर को जान लेता है और उसके कार्य का अनुभव कर लेता है, तो इंसान के सभी कर्म और क्रियाकलाप परमेश्वर द्वारा "ऐतिहासिक अभिलेख" में लिख लिए जाते हैं, क्योंकि इंसान ने परमेश्वर को देख लिया है और उसके कार्य में जीवन जी लिया है।

जब इंसान वास्तव में परमेश्वर का स्वरूप देख लेता है, वह उसकी सर्वश्रेष्ठता को देख लेता है, और परमेश्वर के कार्य को वास्तव में जान लेता है, और इसके अलावा, जब इंसान का पुराना स्वभाव बदल जाता है, तब इंसान परमेश्वर का विरोध करने वाले अपने विद्रोही स्वभाव को पूरी तरह से दूर कर लेता है। ऐसा कहा जा सकता है कि हर इंसान ने कभी न कभी परमेश्वर का विरोध किया होगा और हर इंसान ने कभी न कभी परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया होगा। लेकिन, यदि तुम अपनी खुशी से देहधारी परमेश्वर की आज्ञा मानते हो, और उसके बाद से परमेश्वर के हृदय को अपनी सत्यनिष्ठा द्वारा संतुष्ट करते हो, अपेक्षित सत्य का अभ्यास करते हो, अपेक्षित कर्तव्य का निर्वहन करते हो, और अपेक्षित नियमों को मानते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने विद्रोह को दूर करना चाहते हो, और ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जा सकता है। यदि तुम अपनी गलतियाँ मानने से ढिठाई से इनकार करते हो, और तुम्हारी नीयत पश्चाताप करने की नहीं है, यदि तुम अपने विद्रोही आचरण पर अड़े रहते हो, और परमेश्वर के साथ ज़रा-सा भी सहयोग करने और उसे संतुष्ट करने का भाव नहीं रखते, तब तुम्हारे जैसे दुराग्रही और न सुधरने वाले व्यक्ति को निश्चित रूप से दण्ड दिया जाएगा, और परमेश्वर तुम्हें कभी पूर्ण नहीं बनाएगा। यदि ऐसा है, तो तुम आज परमेश्वर के शत्रु हो और कल भी परमेश्वर के शत्रु रहोगे और उसके बाद के दिनों में भी तुम परमेश्वर के शत्रु बने रहोगे; तुम सदैव परमेश्वर के विरोधी और परमेश्वर के शत्रु रहोगे। ऐसी स्थिति में, परमेश्वर तुम्हें कैसे क्षमा कर सकता है? परमेश्वर का विरोध करना इंसान की प्रकृति है, लेकिन इंसान को महज़ इसलिए जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने के "रहस्य" को पाने का प्रयास नहीं करना चाहिए क्योंकि अपनी प्रकृति बदलना दुर्गम कार्य है। यदि ऐसी बात है, तो बेहतर होगा, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए तुम चले जाओ, ऐसा न हो कि भविष्य में तुम्हारी ताड़ना अधिक कठोर हो जाए, और तुम्हारी क्रूर प्रकृति उभर आए और उच्छृंखल हो जाए, जब तक कि अंत में परमेश्वर द्वारा तुम्हारे भौतिक शरीर को समाप्त न कर दिया जाए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं' से उद्धृत

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