2. परमेश्वर का ज्ञान कैसे प्राप्त किया जा सकता है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

कार्य के तीन चरण मानवजाति को बचाने में परमेश्वर के कार्य की संपूर्णता हैं। मनुष्य को परमेश्वर के कार्य को और उद्धार के कार्य में परमेश्वर के स्वभाव को अवश्य जानना चाहिए; इस तथ्य के बिना, परमेश्वर का तुम्हारा ज्ञान खोखले शब्दों के अलावा कुछ भी नहीं है, यह सैद्धांतिक बातों का दिखावा मात्र है। इस प्रकार का ज्ञान मनुष्य को न तो यकीन दिला सकता है और न ही उसे जीत सकता है; यह वास्तविकता से बेमेल है और यह सत्य नहीं है। यह बहुत भरपूर मात्रा में, और कानों के लिए सुखद हो सकता है, परन्तु यदि यह परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव से विपरीत है, तो परमेश्वर तुम्हें नहीं बख़्शेगा। न केवल वह तुम्हारे ज्ञान की प्रशंसा नहीं करेगा बल्कि उसकी निंदा करने वाले पापी होने के कारण तुमसे प्रतिशोध लेगा। परमेश्वर को जानने के वचन हल्के में नहीं बोले जाते हैं। भले ही तुम चिकनी-चुपड़ी बातें करने वाले और वाक्पटु हो सकते हो, और भले ही तुम्हारे शब्द इतने चतुर हों कि तुम अपनी बहस से काले को सफेद और सफेद को काला बना सकते हो, तब भी जब परमेश्वर के ज्ञान की बात आती है तो तुम्हारी अज्ञानता सामने आ जाती है। परमेश्वर कोई ऐसी चीज नहीं है जिसका तुम जल्दबाजी में आकलन कर सकते हो या जिसकी तुम यूं ही प्रशंसा कर सकते हो या जिसे तुम बेपरवाही से कलंकित कर सकते हो। तुम लोग किसी की भी और हर किसी की प्रशंसा करते हो, फिर भी परमेश्वर के सद्गुणों और अनुग्रह का वर्णन करने के लिए सही शब्द खोजने में तुम्हें संघर्ष करना पड़ता है—यही सभी हारने वालों द्वारा महसूस किया जाता है। भले ही ऐसे कई भाषा के माहिर हैं जो परमेश्वर का वर्णन करने में सक्षम हैं, लेकिन वे जो वर्णन करते हैं उसकी सटीकता उन लोगों द्वारा बोले गए सत्य का सौवाँ हिस्सा ही है जो परमेश्वर से जुड़े हुए होते हैं, ऐसे लोग जिनका शब्द-संग्रह तो सीमित होता है, लेकिन उनका अनुभव समृद्ध होता है, जिससे सीखा जा सकता है। इस प्रकार, यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का ज्ञान सटीकता और वास्तविकता में निहित है, न कि शब्दों का चतुराई से उपयोग करने या समृद्ध शब्द-संग्रह में, और यह कि मनुष्य के ज्ञान और परमेश्वर के ज्ञान का आपस में कोई संबंध नहीं है। परमेश्वर को जानने का पाठ मानवजाति के किसी भी प्राकृतिक विज्ञान से ऊँचा है। यह ऐसा सबक है जो केवल उन्हीं बहुत थोड़े-से लोगों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है जो परमेश्वर को जानने की खोज करते हैं, इसे यूँ ही किसी भी प्रतिभावान व्यक्ति द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इसलिए तुम लोगों को परमेश्वर को जानने और सत्य की तलाश करने को ऐसे नहीं देखना चाहिए मानो कि वे ऐसी चीजें हैं जिन्हें किसी बच्चे द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है। हो सकता है कि तुम अपने पारिवारिक जीवन, अपने कार्यक्षेत्र या अपने वैवाहिक जीवन में पूरी तरह से सफल हो, परंतु जब सत्य की और परमेश्वर को जानने के सबक की बात आती है, तो तुम्हारे पास दिखाने के लिए कुछ नहीं है, तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया है। ऐसा कहा जा सकता है कि सत्य को व्यवहार में लाना तुम लोगों के लिए बहुत ही कठिन बात है, और परमेश्वर को जानना तो और भी बड़ी समस्या है। यही तुम लोगों की कठिनाई है, और इसी कठिनाई का सामना संपूर्ण मानवजाति कर रही है। जिन्होंने परमेश्वर को जानने के ध्येय में कुछ प्राप्त कर लिया है उनमें से शायद ऐसा कोई नहीं है जो मापदंड पर खरा उतरता हो। मनुष्य नहीं जानता है कि परमेश्वर को जानने का अर्थ क्या है, या परमेश्वर को जानना क्यों आवश्यक है या एक व्यक्ति को किस अंश तक ज्ञान हासिल करना चाहिए ताकि वह परमेश्वर को जान सके। यही मानवजाति के लिए बहुत उलझन वाली बात है और सीधे-सीधे यही वह सबसे बड़ी पहेली है जिसका सामना मानवजाति द्वारा किया जा रहा है—कोई भी इस प्रश्न का उत्तर देने में सक्षम नहीं है, न ही कोई इस प्रश्न का उत्तर देने की इच्छा रखता है, क्योंकि आज तक मानवजाति में से किसी को भी इस कार्य के अध्ययन में कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई है। शायद, जब कार्य के तीन चरणों की पहेली मानवजाति को बताई जाएगी, तो अनुक्रम से परमेश्वर को जानने वाले प्रतिभावान लोगों का एक समूह प्रकट होगा। मैं आशा करता हूँ कि ऐसा ही हो, और साथ ही, मैं इस कार्य को करने की प्रक्रिया में हूँ और निकट भविष्य में ऐसे और भी अधिक प्रतिभावान लोगों के प्रकट होने की आशा करता हूँ। वे कार्य के इन तीन चरणों के तथ्य की गवाही देने वाले लोग बन जाएँगे और वे वास्तव में, कार्य के इन तीनों चरणों की गवाही देने वाले प्रथम लोग भी होंगे। परंतु इससे अधिक दुखद और खेदजनक कुछ भी नहीं होगा कि परमेश्वर के कार्य की समाप्ती के दिन इस प्रकार के प्रतिभावान लोग प्रकट न हों, या केवल एक या दो ही लोग सामने आएं जिन्होंने देहधारी परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना व्यक्तिगत रूप से स्वीकार कर लिया हो। फिर भी, यह सिर्फ़ सबसे बुरी संभावना है। चाहे जो भी हो, मैं अभी भी आशा करता हूँ कि जो वास्तव में परमेश्वर की तलाश में लगे हैं, वे इस आशीष को प्राप्त कर पाएँ। समय के आरम्भ से ही, इस प्रकार का कार्य पहले कभी नहीं हुआ; मानव विकास के इतिहास में कभी भी इस प्रकार का कार्य नहीं हुआ है। यदि तुम वास्तव में परमेश्वर को जानने वालों में सबसे प्रथम लोगों में से एक हुए, तो क्या यह सभी प्राणियों में सर्वोच्च आदर की बात नहीं होगी? क्या मानवजाति में ऐसा कोई प्राणी होगा जो परमेश्वर से इससे बेहतर प्रशंसा प्राप्त कर सके?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर का स्‍वरूप और अस्तित्‍व, परमेश्वर का सार, परमेश्वर का स्वभाव—यह सब मानवजाति को उसके वचनों के माध्यम से अवगत कराया जा चुका है। जब मनुष्‍य परमेश्वर के वचनों को अनुभव करता है, तो उन्हें अभ्यास में लाने की प्रक्रिया में व‍ह परमेश्वर के कहे वचनों के पीछे छिपे उद्देश्य को समझेगा, परमेश्वर के वचनों के स्रोत और पृष्ठभूमि को समझेगा, और परमेश्वर के वचनों के अभीष्ट प्रभाव को समझेगा और बूझेगा। जीवन और सत्य में प्रवेश करने, परमेश्वर के इरादों को समझने, अपना स्वभाव परिवर्तित करने, परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति आज्ञाकारी होने में सक्षम होने के लिए मनुष्य को ये सब चीज़ें अनुभव करनी, समझनी और प्राप्त करनी चाहिए। जिस समय मनुष्य इन चीज़ों को अनुभव करता, समझता और प्राप्त करता है, उसी समय वह धीरे-धीरे परमेश्वर की समझ प्राप्त कर लेता है, और साथ ही उसके विषय में वह ज्ञान के विभिन्न स्तरों को भी प्राप्त कर लेता है। यह समझ और ज्ञान मनुष्य द्वारा कल्पित या निर्मित किसी चीज़ से नहीं आती, बल्कि उससे आती है, जिसे वह अपने भीतर समझता, अनुभव करता, महसूस करता और पुष्टि करता है। इन बातों को समझने, अनुभव करने, महसूस करने और पुष्टि करने के बाद ही मनुष्य के परमेश्वर संबंधी ज्ञान में तत्त्व की प्राप्ति होती है; केवल मनुष्य द्वारा इस समय प्राप्त ज्ञान ही वास्तविक, असली और सटीक होता है और यह प्रक्रिया—परमेश्वर के वचनों को समझने, अनुभव करने, महसूस करने और उनकी पुष्टि करने के माध्यम से परमेश्वर की वास्तविक समझ और ज्ञान प्राप्त करने की यह प्रक्रिया, और कुछ नहीं, वरन् परमेश्वर और मनुष्य के मध्य सच्चा संवाद है। इस प्रकार के समागम के मध्य मनुष्य सच में परमेश्वर के उद्देश्यों को समझ-बूझ पाता है, परमेश्वर के स्‍वरूप और अस्तित्‍व को जान पाता है, सच में परमेश्वर के सार को समझ और जान पाता है, धीरे-धीरे परमेश्वर के स्वभाव को जान और समझ पाता है, संपूर्ण सृष्टि के ऊपर परमेश्वर के प्रभुत्व के बारे में निश्चितता और उसकी सही परिभाषा पर पहुँच पाता है और परमेश्वर की पहचान और स्थिति का ठोस निश्चय और उसका ज्ञान प्राप्त कर पाता है। इस प्रकार के समागम के मध्य मनुष्य परमेश्वर के प्रति अपने विचार थोड़ा-थोड़ा करके बदलता है, वह परमेश्वर को अपनी कल्पना की उड़ान नहीं मानता, या वह उसके बारे में अपने संदेहों को बेलगाम नहीं दौड़ाता, या उसे गलत नहीं समझता, उसकी निंदा नहीं करता, उसकी आलोचना नहीं करता या उस पर संदेह नहीं करता। इस प्रकार, परमेश्वर के साथ मनुष्य के विवाद बहुत कम होंगे, वह परमेश्वर के साथ कम संघर्ष करेगा, और ऐसे मौके कम आएँगे, जब वह परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करेगा। इसके विपरीत, मनुष्य द्वारा परमेश्वर की परवाह और आज्ञाकारिता बढ़ेगी और परमेश्वर के प्रति उसका आदर अधिक वास्तविक और गहन होगा। ऐसे समागम के मध्य, मनुष्य न केवल सत्य का पोषण और जीवन का बपतिस्मा प्राप्त करेगा, बल्कि उसी समय वह परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान भी प्राप्त करेगा। ऐसे समागम के मध्य न केवल मनुष्य का स्वभाव बदलेगा और वह उद्धार पाएगा, बल्कि उसी समय वह परमेश्वर के प्रति एक सृजित प्राणी की वास्तविक श्रद्धा और आराधना भी प्राप्त करेगा। इस प्रकार का समागम कर लेने के बाद मनुष्य का परमेश्वर पर विश्वास किसी कोरे कागज़ की तरह या दिखावटी प्रतिज्ञा के समान, या एक अंधानुकरण अथवा मूर्ति-पूजा के रूप में नहीं रहेगा; केवल इस प्रकार के समागम से ही मनुष्य का जीवन दिन-प्रतिदिन परिपक्वता की ओर बढ़ेगा, और तभी उसका स्‍वभाव धीरे-धीरे परिवर्तित होगा और परमेश्वर के प्रति उसका विश्वास कदम-दर-कदम अस्पष्ट और अनिश्चित विश्वास से एक सच्ची आज्ञाकारिता और परवाह में, वास्तविक श्रद्धा में बदलेगा और परमेश्वर के अनुसरण की प्रक्रिया में मनुष्य का रुख भी उत्‍तरोत्‍तर निष्क्रियता से सक्रियता, नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर बढ़ेगा; केवल इस प्रकार के समागम से ही मनुष्य परमेश्वर के बारे में वास्तविक समझ-बूझ और सच्चा ज्ञान प्राप्त करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

मनुष्य की दशा और अपने प्रति मनुष्य का व्यवहार देखकर परमेश्वर ने नया कार्य किया है, जिससे मनुष्य उसके विषय में ज्ञान और उसके प्रति आज्ञाकारिता दोनों से युक्त हो सकता है, और प्रेम और गवाही दोनों रख सकता है। इसलिए मनुष्य को परमेश्वर के शुद्धिकरण, और साथ ही उसके न्याय, व्यवहार और काट-छाँट का अनुभव अवश्य करना चाहिए, जिसके बिना मनुष्य कभी परमेश्वर को नहीं जानेगा, और कभी वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी गवाही देने में समर्थ नहीं होगा। परमेश्वर द्वारा मनुष्य का शुद्धिकरण केवल एकतरफा प्रभाव के लिए नहीं होता, बल्कि बहुआयामी प्रभाव के लिए होता है। केवल इसी तरह से परमेश्वर उन लोगों में शुद्धिकरण का कार्य करता है, जो सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं, ताकि उनका संकल्प और प्रेम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाए। जो लोग सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं और जो परमेश्वर को पाने की लालसा करते हैं, उनके लिए ऐसे शुद्धिकरण से अधिक अर्थपूर्ण या अधिक सहायक कुछ नहीं है। परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य द्वारा सरलता से जाना या समझा नहीं जाता, क्योंकि परमेश्वर आखिरकार परमेश्वर है। अंततः, परमेश्वर के लिए मनुष्य के समान स्वभाव रखना असंभव है, और इसलिए मनुष्य के लिए परमेश्वर के स्वभाव को जानना सरल नहीं है। सत्य मनुष्य द्वारा अंतर्निहित रूप में धारण नहीं किया जाता, और वह उनके द्वारा सरलता से नहीं समझा जाता, जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए हैं; मनुष्य सत्य से और सत्य को अभ्यास में लाने के संकल्प से रहित है, और यदि वह पीड़ित नहीं होता और उसका शुद्धिकरण या न्याय नहीं किया जाता, तो उसका संकल्प कभी पूर्ण नहीं किया जाएगा। सभी लोगों के लिए शुद्धिकरण कष्टदायी होता है, और उसे स्वीकार करना बहुत कठिन होता है—परंतु शुद्धिकरण के दौरान ही परमेश्वर मनुष्य के समक्ष अपना धर्मी स्वभाव स्पष्ट करता है और मनुष्य से अपनी अपेक्षाएँ सार्वजनिक करता है, और अधिक प्रबुद्धता, अधिक वास्तविक काट-छाँट और व्यवहार प्रदान करता है; तथ्यों और सत्य के बीच की तुलना के माध्यम से वह मनुष्य को अपने और सत्य के बारे में बृहत्तर ज्ञान देता है, और उसे परमेश्वर की इच्छा की और अधिक समझ प्रदान करता है, और इस प्रकार उसे परमेश्वर के प्रति सच्चा और शुद्ध प्रेम प्राप्त करने देता है। शुद्धिकरण का कार्य करने में परमेश्वर के ये लक्ष्य हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों को पढ़ और समझकर परमेश्वर को जानना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं : "मैंने देहधारी परमेश्वर को नहीं देखा है, तो मैं परमेश्वर को कैसे जान सकता हूँ?" वास्तव में, परमेश्वर के वचन उसके स्वभाव की एक अभिव्यक्ति हैं। परमेश्वर के वचनों से तुम मनुष्यों के लिए उसके प्रेम और उद्धार के साथ-साथ उन्हें बचाने के उसके तरीके को भी देख सकते हो...। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर के वचन स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए जाते हैं, वे मनुष्यों द्वारा लिखे नहीं जाते। उन्हें परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से व्यक्त किया गया है; स्वयं परमेश्वर ही अपने वचनों और अपनी आंतरिक आवाज़ को व्यक्त कर रहा है। उन्हें दिल से निकले वचन क्यों कहा जाता है? वह इसलिए, क्योंकि वे बहुत गहराई से निकलते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव, उसकी इच्छा, उसके विचारों, मानवजाति के लिए उसके प्रेम, उसके द्वारा मानवजाति के उद्धार, तथा मानवजाति से उसकी अपेक्षाओं को व्यक्त करते हैं...। परमेश्वर के कथनों में कठोर वचन, कोमल और विचारशील वचन, और साथ ही प्रकाशनात्मक वचन भी शामिल हैं, जो इंसान की इच्छाओं के अनुरूप नहीं हैं। यदि तुम केवल प्रकाशनात्मक वचनों को देखो, तो तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर बहुत कठोर है। यदि तुम केवल कोमल वचनों को देखो, तो तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर ज़्यादा अधिकार-संपन्न नहीं है। इसलिए तुम्हें उन्हें संदर्भ से अलग करके नहीं देखना चाहिए; बल्कि उन्हें हर कोण से देखो। कभी-कभी परमेश्वर कोमल एवं करुणामय दृष्टिकोण से बोलता है, और तब लोग मानवजाति के लिए उसके प्रेम को देखते हैं; कभी-कभी वह कठोर दृष्टिकोण से बोलता है, और तब लोग उसके अपमान सहन न करने वाले स्वभाव को देखते हैं। मनुष्य अत्यधिक गंदा है, और वह परमेश्वर के मुख को देखने या परमेश्वर के सामने आने के योग्य नहीं है। अब लोगों को परमेश्वर के सामने आने की जो अनुमति है वो पूरी तरह से परमेश्वर के अनुग्रह की बदौलत है। परमेश्वर के कार्य करने के तरीके और उसके कार्य के अर्थ से उसकी बुद्धि को देखा जा सकता है। लोग इन चीज़ों को परमेश्वर के वचनों में भी देख सकते हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर के सीधे संपर्क में आए बिना भी। जब परमेश्वर की सच्ची समझ रखने वाला कोई व्यक्ति मसीह के संपर्क में आता है, तो मसीह के साथ उसका अनुभव परमेश्वर के बारे में उसकी मौजूदा समझ के साथ मेल खा सकता है, किंतु जब केवल सैद्धांतिक समझ वाला कोई व्यक्ति परमेश्वर के संपर्क में आता है, तो वह इस पारस्परिक संबंध को नहीं देख सकता। सत्य का यह पहलू सबसे गंभीर रहस्य है; इसकी थाह पाना कठिन है। देहधारण के रहस्य के संबंध में परमेश्वर के वचनों का सार निकालो, उन्हें विभिन्न कोणों से देखो, और फिर मिलकर प्रार्थना करो, विचार करो और सत्य के इस पहलू पर आगे और सहभागिता करो। इससे तुम पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता प्राप्त करने और इसे समझने में सक्षम हो जाओगे। चूँकि मनुष्यों के पास परमेश्वर के संपर्क में आने का कोई अवसर नहीं है, इसलिए उन्हें आगे बढ़ने के लिए इस तरह के अनुभव पर भरोसा करना चाहिए और परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक बार में थोड़ा-सा प्रवेश करना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'देहधारी परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

तुम अपने अनुभव की किसी भी अवस्था पर क्यों न पहुँच चुके हो, तुम परमेश्वर के वचन या सत्य से अविभाज्य हो, और जो कुछ तुम परमेश्वर के स्वभाव के बारे में समझते हो और जो कुछ तुम परमेश्वर के स्वरूप के बारे में जानते हो, वह सब परमेश्वर के वचनों में व्यक्त होता है; वह सत्य से अटूट रूप से जुड़ा है। परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप अपने आप में सत्य हैं; सत्य परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप की एक प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। वह परमेश्वर के स्वरूप को ठोस बनाता है और उसका स्पष्ट विवरण देता है; वह तुम्हें और अधिक सीधी तरह से बताता है कि परमेश्वर क्या पसंद करता है और वह क्या पसंद नहीं करता, वह तुमसे क्या कराना चाहता है और वह तुम्हें क्या करने की अनुमति नहीं देता, वह किन लोगों से घृणा करता है और वह किन लोगों से प्रसन्न होता है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्यों के पीछे लोग उसके आनंद, क्रोध, दुःख और खुशी, और साथ ही उसके सार को देख सकते हैं—यह उसके स्वभाव का प्रकट होना है। परमेश्वर के स्वरूप को जानने और उसके वचन से उसके स्वभाव को समझने के अतिरिक्त जो सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है, वह है व्यावहारिक अनुभव के द्वारा इस समझ तक पहुँचने की आवश्यकता। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को जानने के लिए अपने आप को वास्तविक जीवन से हटा लेता है, तो वह उसे प्राप्त नहीं कर पाएगा। भले ही कुछ लोग हों, जो परमेश्वर के वचन से कुछ समझ प्राप्त कर सकते हों, किंतु उनकी समझ सिद्धांतों और वचनों तक ही सीमित रहती है, और परमेश्वर वास्तव में जैसा है, वह उससे भिन्न रहती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान, परमेश्वर की सामर्थ्‍य, परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर के सार को अपनी कल्पनाओं पर भरोसा करके प्राप्त नहीं किया जा सकता है। जबकि तुम परमेश्वर के अधिकार को जानने के लिए कल्पनाओं पर भरोसा नहीं कर सकते हो, तो तुम किस रीति से परमेश्वर के अधिकार के सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सकते हो? परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से, संगति से और परमेश्वर के वचनों के अनुभवों से यह किया जा सकता है। इस प्रकार, तुम्हारे पास परमेश्वर के अधिकार का एक क्रमिक अनुभव और प्रमाणीकरण होगा और इस प्रकार तुम उसकी एक क्रमानुसार समझ और निरन्तर बढ़ने वाले ज्ञान को प्राप्त करोगे। यह परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है; और कोई छोटा रास्ता नहीं है। तुम लोग कल्पना न करो कहने का अर्थ यह नहीं है कि तुम सबको शिथिलता से विनाश के इन्तज़ार में बैठा दिया गया है या तुम सबको कुछ करने से रोका गया है। सोचने और कल्पना करने के लिए अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल न करने का मतलब अनुमान लगाने के लिए अपने तर्क का इस्तेमाल न करना, विश्लेषण करने के लिए ज्ञान का इस्तेमाल न करना, विज्ञान को आधार के रूप में इस्तेमाल न करना, बल्कि समझना, जाँच करना और प्रमाणित करना है कि जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करते हो उसके पास अधिकार है और प्रमाणित करना है कि वह तुम्हारी नियति के ऊपर प्रभुता रखता है और उसकी सामर्थ्‍य हर समय यह साबित करती है कि परमेश्वर के वचनों के द्वारा, सत्‍य के द्वारा, उन सबके द्वारा जिसका तुम अपने जीवन में सामना करते हो, वह स्वयं सच्चा परमेश्वर है। यही एकमात्र तरीका है जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की समझ को प्राप्त कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि वे इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक सरल तरीके की खोज करना चाहते हैं, किन्तु क्या तुम लोग ऐसे किसी तरीके के बारे में सोच सकते हो? मैं तुम्हें बताता हूँ, सोचने की आवश्यकता ही नहीं है : और कोई तरीके नहीं हैं! एकमात्र तरीका है कि हर एक वचन जिसे वह प्रकट करता है और हर एक चीज़ जिसे वह करता है उसके जरिए सचेतता और स्थिरता से जो परमेश्वर के पास है और जो वह है उसे जानो और प्रमाणित करो। यह परमेश्वर को जानने का एकमात्र तरीका है। क्योंकि जो परमेश्वर के पास है और जो वह है और परमेश्वर का सब कुछ, वह सब खोखला या खाली नहीं है, बल्कि वास्तविक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I' से उद्धृत

यह जान लो कि परमेश्वर जब देहधारण कर कार्य करता है, तभी लोग परमेश्वर जो है उस तक, और परमेश्वर के सार और स्वभाव तक पहुँच सकते हैं और देख सकते हैं। परमेश्वर को जानने का यह सबसे अच्छा मौका है। अतीत में लोग कहते थे कि वे परमेश्वर के कार्यों और स्वभाव को जानना चाहते हैं, लेकिन ऐसा करना आसान नहीं था, क्योंकि वे उस तक पहुँच नहीं सकते थे। अतीत में जब मूसा ने पहली बार यहोवा के बारे में जाना और उसके कुछ कार्य देखे, तो उसके पास कितना व्यावहारिक ज्ञान था? क्या वह आजकल के लोगों के ज्ञान से अधिक था? क्या वह आजकल के लोगों के ज्ञान से अधिक व्यावहारिक था? बेशक नहीं। जब यहोवा ने उस समय कार्य किया, तो उसके कार्य इस्राएल में बहुतायत से प्रकट हुए; बहुत-से लोगों ने यहोवा को चमत्कार करते देखा और कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने यहोवा के पीछे से उसकी आकृति देखी। कई लोगों ने स्वर्गदूतों को भी देखा, लेकिन कितने लोग परमेश्वर को जान पाए? बहुत कम! व्यावहारिक रूप से ऐसे कोई लोग नहीं थे, जो वास्तव में परमेश्वर को जानते हों। परमेश्वर देह में रहकर जो कार्य करता है, उसके अनुभव के कारण, केवल अंत के दिनों के लोगों को ही परमेश्वर का बहुत अधिक ज्ञान है, क्योंकि परमेश्वर मनुष्य से आमने-सामने बात करता है : वह क्या कार्य करता है और किस प्रयोजन से करता है; उसकी क्या इच्छा है, मानव-जाति के प्रति उसका क्या दृष्टिकोण है; और मानव-जाति की भ्रष्ट स्थिति और उसका सार...। इन चीजों के माध्यम से लोग देख सकते हैं कि परमेश्वर वाकई ऐसा परमेश्वर है, वह जो मानव-जाति के लिए चाहता है वह वाकई ऐसा है; उसका स्वभाव वाकई ऐसा है; उसके कार्य वाकई बहुत अद्भुत हैं; उसकी बुद्धि वाकई इतनी गहरी है; और मानव-जाति पर उसकी दया वाकई इतनी वास्तविक है। इस बार, ये चीजें सच में अनुभव की जा सकती हैं। ये तुम्हें यह अनुभव कराती हैं कि मानव-जाति के लिए परमेश्वर का प्रेम और सहिष्णुता वाकई असीमित है, और लोगों को बचाने की उसकी इच्छा उसके कार्य और उसके वचनों में पूरी तरह से शामिल है; ये चीजें लोगों को इसका वास्तविक अनुभव प्राप्त कराती हैं। इसलिए देहधारण के सार का तुम्हारा ज्ञान देहधारण की अवधि से है। अन्य अवधि का कोई ज्ञान व्यावहारिक नहीं होता। जब देहधारण का कार्य पूरा हो जाएगा और वह चला जाएगा, तब अगर तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने का प्रयास करोगे, तो वह तुम्हारे लिए उतना वास्तविक नहीं होगा जितना अभी है, क्योंकि वर्तमान में तुम अपनी आँखों से देहधारी परमेश्वर को कार्य करते हुए देख सकते हो, और यह वास्तव में दृष्टिगोचर है; इतना ही नहीं, परमेश्वर लगातार आमने-सामने कार्य कर रहा है, और लोग धीरे-धीरे इसे व्यक्तिगत रूप से अनुभव करने लगे हैं। ... इसलिए अगर तुम परमेश्वर के सार को समझना चाहते हो, तो ऐसा करने का तुम्हारे लिए सबसे फायदेमंद समय वह है, जब देहधारी परमेश्वर कार्य कर रहा होता है। तुम उसके कार्य को देख और छू सकते हो, तुम उसे सुन सकते हो और तुम उसे गहराई से महसूस कर सकते हो। जब देहधारण के दौरान परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा, तब भी अगर तुम यह अनुभव करना जारी रखोगे कि पवित्र आत्मा कैसे कार्य करता है, और उस पर चिंतन करने का प्रयास करोगे, तो वह अब जितना गहरा नहीं होगा, और तुम्हारी समझ उथली होगी। उस समय परमेश्वर केवल लोगों के भ्रष्ट स्वभावों का शोधन करेगा, और जब लोगों का शोधन हो जाता है, तब वे कुछ और सत्यों को समझने और प्राप्त सत्यों का उपयोग अपने जीवन की नींव के रूप में करने और अपने भीतर के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने के लिए करने में सक्षम हो जाते हैं—लेकिन चाहे तुम परमेश्वर से कैसे भी प्रेम करो, तुम उस समय उसे समझने में ज्यादा प्रगति नहीं करोगे। यह उतना फायदेमंद नहीं होगा, जितना परमेश्वर को उस समय जानना होता है जब वह देहधारी होता है और कार्य कर रहा होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्‍यता के लिए परमेश्‍वर का सच्‍चा प्रेम' से उद्धृत

यीशु का अनुसरण करने के दौरान पतरस ने उसके बारे में कई मत बनाए और हमेशा अपने दृष्टिकोण से उसका आकलन किया। यद्यपि पतरस को पवित्रात्मा की एक निश्चित मात्रा में समझ थी, किंतु उसकी समझ कुछ हद तक अस्पष्ट थी, इसीलिए उसने कहा : "मुझे उसका अनुसरण अवश्य करना चाहिए, जिसे स्वर्गिक पिता द्वारा भेजा जाता है। मुझे उसे अवश्य अभिस्वीकृत करना चाहिए, जो पवित्र आत्मा द्वारा चुना जाता है।" उसने यीशु द्वारा की गई चीज़ों को नहीं समझा और उसमें उनके बारे में स्पष्टता का अभाव था। कुछ समय तक उसका अनुसरण करने के बाद उसकी उसके द्वारा किए गए कामों और उसके द्वारा कही गई बातों में और स्वयं यीशु में रुचि बढ़ी। उसने महसूस किया कि यीशु ने स्नेह और सम्मान दोनों प्रेरित किए; उसे उसके साथ जुड़ना और रहना अच्छा लगा, और यीशु के वचन सुनने से उसे आपूर्ति और सहायता मिली। यीशु का अनुसरण करने के दौरान, पतरस ने उसके जीवन के बारे में हर चीज़ का अवलोकन किया और उन्हें हृदय से लगाया : उसके क्रियाकलाप, वचन, गतिविधियाँ, और अभिव्यक्तियाँ। उसने एक गहरी समझ प्राप्त की कि यीशु साधारण मनुष्य जैसा नहीं है। यद्यपि उसका मानवीय रंग-रूप अत्यधिक सामान्य था, वह मनुष्यों के लिए प्रेम, अनुकंपा और सहिष्णुता से भरा हुआ था। उसने जो कुछ भी किया या कहा, वह दूसरों के लिए बहुत मददगार था, और पतरस ने यीशु में वे चीज़ें देखीं और उससे वे चीज़ें पाईं, जो उसने पहले कभी नहीं देखी या पाई थीं। उसने देखा कि यद्यपि यीशु की न तो कोई भव्य कद-काठी है और न ही कोई असाधारण मानवता है, किंतु उसका हाव-भाव सच में असाधारण और असामान्य था। यद्यपि पतरस इसे पूरी तरह से नहीं बता सका, लेकिन वह देख सकता था कि यीशु बाकी सबसे भिन्न तरीके से कार्य करता है, क्योंकि जो चीज़ें उसने कीं, वे सामान्य मनुष्य द्वारा की जाने वाली चीज़ों से बहुत भिन्न थीं। यीशु के साथ संपर्क होने के समय से पतरस ने यह भी देखा कि उसका चरित्र साधारण मनुष्य से भिन्न है। उसने हमेशा स्थिरता से कार्य किया और कभी भी जल्दबाजी नहीं की, किसी भी विषय को न तो बढ़ा-चढ़ाकर बताया, न ही उसे कम करके आँका, और अपने जीवन को इस तरह से संचालित किया, जिससे ऐसा चरित्र उजागर हुआ जो सामान्य और सराहनीय दोनों था। बातचीत में यीशु स्पष्ट रूप से और शिष्टता के साथ बोलता था, हमेशा प्रफुल्लित किंतु शांतिपूर्ण ढंग से संवाद करता था, और अपना कार्य करते हुए कभी अपनी गरिमा नहीं खोता था। पतरस ने देखा कि यीशु कभी बहुत कम बोलता था, तो कभी लगातार बोलता रहता था। कभी वह इतना प्रसन्न होता था कि नाचते-उछलते कबूतर की तरह दिखता था, तो कभी इतना दुःखी होता था कि बिलकुल भी बात नहीं करता था, मानो दुख के बोझ से लदी और बेहद थकी कोई माँ हो। कई बार वह क्रोध से भरा होता था, जैसे कि कोई बहादुर सैनिक शत्रु को मारने के लिए हमलावर हो, और कई बार वह किसी गरजते सिंह जैसा दिखाई देता था। कभी वह हँसता था; तो कभी प्रार्थना करता और रोता था। यीशु ने चाहे कैसे भी काम किया, पतरस का उसके प्रति प्रेम और आदर असीमित रूप से बढ़ता गया। यीशु की हँसी उसे खुशी से भर देती थी, उसका दुःख उसे दुःख में डुबा देता था, उसका क्रोध उसे डरा देता था, और लोगों से की गई उसकी सख्त अपेक्षाओं ने उसे यीशु से सच्चा प्यार करवाया और उसके लिए एक सच्ची श्रद्धा और लालसा विकसित की। निस्संदेह, पतरस को इस सबका एहसास धीरे-धीरे तब तक नहीं हुआ, जब तक वह कई वर्ष यीशु के साथ नहीं रह लिया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस ने यीशु को कैसे जाना' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर को जानना चाहते हो और सचमुच में उसे जानते और समझते हो, तो परमेश्वर के कार्य की केवल तीन अवस्थाओं तक ही सीमित मत रहो, और मात्र उस कार्य की कहानियों तक ही सीमित मत रहो जिसे परमेश्वर ने एक बार किया था। यदि तुम उसे उस तरह से जानने की कोशिश करते हो, तो तुम परमेश्वर को एक निश्चित सीमा तक सीमित कर रहे हो। तुम परमेश्वर को अत्यंत महत्वहीन के रूप में देख रहे हो। ऐसा करना लोगों को कैसे प्रभावित करता है? तुम कभी भी परमेश्वर की अद्भुतता और उसकी सर्वोच्चता को नहीं जान पाओगे, और तुम कभी भी परमेश्वर की सामर्थ्य और सर्वशक्तिमत्ता और उसके अधिकार के दायरे को नहीं जान पाओगे। ऐसी समझ इस सत्य को स्वीकार करने की तुम्हारी योग्यता को कि परमेश्वर सभी चीज़ों का शासक है, और साथ ही परमेश्वर की सच्ची पहचान एवं हैसियत के बारे में तुम्हारे ज्ञान को प्रभावित करेगी। दूसरे शब्दों में, यदि परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ का दायरा सीमित है, तो जो तुम प्राप्त कर सकते हो वह भी सीमित होता है। इसीलिए तुम्हें अवश्य दायरे को बढ़ाना और अपने क्षितिज़ को खोलना चाहिए। चाहे यह परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के प्रबन्धन और परमेश्वर के शासन का, या परमेश्वर के द्वारा शासित और प्रबंधित सभी चीज़ों का दायरा हो, तुम्हें इसे पूरी तरह जानना चाहिए और उसमें परमेश्वर के कार्यकलापों को जानना चाहिए। समझ के ऐसे मार्ग के माध्यम से, तुम अचेतन रूप में महसूस करोगे कि परमेश्वर उनके बीच सभी चीज़ों पर शासन कर रहा है, उनका प्रबन्धन कर रहा है और उनकी आपूर्ति कर रहा है। इसके साथ-साथ, तुम सच में महसूस करोगे कि तुम सभी चीज़ों के एक भाग हो और सभी चीज़ों के एक सदस्य हो। चूँकि परमेश्वर सभी चीज़ों की आपूर्ति करता है, इसलिए तुम भी परमेश्वर के शासन और आपूर्ति को स्वीकार करते हो। यह एक तथ्य है जिससे कोई इनकार नहीं कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII' से उद्धृत

भले ही मनुष्य विज्ञान और सभी चीज़ों के नियमों पर अनुसन्धान करता रहे, फिर भी यह एक सीमित दायरे में होता है, जबकि परमेश्वर सभी चीज़ों को नियन्त्रित करता है। मनुष्य के लिए, यह असीमित है। यदि मनुष्य किसी छोटी सी चीज़ पर अनुसन्धान करते हैं जिसे परमेश्वर ने किया था, तो वे उस पर अनुसन्धान करते हुए बिना किसी सच्चे परिणाम को हासिल किए अपना पूरा जीवन बिता सकते हैं। इसीलिए यदि ज्ञान का और परमेश्वर का अध्ययन करने के लिए जो कुछ भी तुमने सीखा है उसका उपयोग करते हो, तो तुम कभी भी परमेश्वर को जानने या समझने में समर्थ नहीं होगे। किन्तु यदि तुम सत्य को खोजने और परमेश्वर को खोजने के मार्ग का उपयोग करते हो, और परमेश्वर को जानने के दृष्टिकोण से परमेश्वर की ओर देखते हो, तो एक दिन तुम स्वीकार करोगे कि परमेश्वर के कार्य और उसकी बुद्धि हर जगह है, और तुम यह भी जान जाओगे कि बस क्यों परमेश्वर को सभी चीज़ों का स्वामी और सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत कहा जाता है। तुम्हारे पास जितना अधिक ऐसा ज्ञान होगा, तुम उतना ही अधिक समझोगे कि क्यों परमेश्वर को सभी चीज़ों का स्वामी कहा जाता है। सभी चीज़ें और प्रत्येक चीज़, जिसमें तुम भी शामिल हो, निरन्तर परमेश्वर की आपूर्ति के नियमित प्रवाह को प्राप्त कर रही हैं। तुम भी स्पष्ट रूप से आभास करने में समर्थ हो जाओगे कि इस संसार में, और इस मनुष्यजाति के बीच, परमेश्वर के पृथक और कोई नहीं है जिसके पास सभी चीज़ों के ऊपर शासन करने, उनका प्रबन्धन करने, और उन्हें अस्तित्व में बनाए रखने की ऐसी सामर्थ्य और ऐसा सार हो सकता है। जब तुम ऐसी समझ प्राप्त कर लोगे, तब तुम सच में स्वीकार करोगे कि परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर है। जब तुम इस स्थिति तक पहुँच जाते हो, तब तुमने सचमुच में परमेश्वर को स्वीकार कर लिया है और तुमने उसे अपना परमेश्वर एवं अपना स्वामी बनने दिया है। जब तुम्हारे पास ऐसी समझ होगी और तुम्हारा जीवन ऐसी स्थिति पर पहुँच जाएगा, तो परमेश्वर अब और तुम्हारी परीक्षा नहीं लेगा और तुम्हारा न्याय नहीं करेगा, और न ही वह तुमसे कोई माँग करेगा, क्योंकि तुम परमेश्वर को समझते हो, उसके हृदय को जानते हो, और तुमने परमेश्वर को सच में अपने हृदय में स्वीकार कर लिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII' से उद्धृत

लोग अक्ससर कहते हैं कि परमेश्वर को जानना आसान बात नहीं है। किंतु मैं कहता हूँ कि परमेश्वर को जानना बिल्कुकुल भी कठिन बात नहीं है, क्योंकि परमेश्वर मनुष्य को बार-बार अपने कर्म दिखाता है। परमेश्वर ने कभी भी मनुष्य के साथ संवाद करना बंद नहीं किया है, और न ही उसने कभी अपने आपको मनुष्य से गुप्त रखा है, न उसने स्वयं को छिपाया है। उसके विचार, उसकी युक्तियाँ, उसके वचन और उसके कर्म सब मानवजाति के सामने हैं। इसलिए, यदि मनुष्य परमेश्वर को जानना चाहता है, तो वह सभी प्रकार के साधनों और पद्धतियों के जरिये उसे समझ और जान सकता है। मनुष्य के आँख मूँदकर यह सोचने की वजह कि परमेश्वर ने जानबूझकर खुद को मनुष्य से छिपाया है, कि उसका कोई इरादा नहीं है कि मनुष्य परमेश्वर को समझे या जाने, यह है कि मनुष्य नहीं जानता कि परमेश्वर कौन है, और न ही वह परमेश्वर को समझना चाहता है। इससे भी बढ़कर, मनुष्य सृष्टिकर्ता के विचारों, वचनों या कर्मों की परवाह नहीं करता...। सच कहूँ तो, यदि कोई व्यक्ति सृष्टिकर्ता के वचनों या कर्मों पर ध्यान केंद्रित करने और उन्हें समझने के लिए सिर्फ अपने खाली समय का उपयोग करे, और यदि वह सृष्टिकर्ता के विचारों और उसके हृदय की वाणी पर थोड़ा-सा ध्यान दे, तो उसे यह महसूस करने में कठिनाई नहीं होगी कि सृष्टिकर्ता के विचार, वचन और कर्म दृष्टिगोचर और पारदर्शी हैं। इसी प्रकार, यह महसूस करने में बस थोड़ा-सा प्रयास लगेगा कि सृष्टिकर्ता हर समय मनुष्य के मध्य है, कि वह हमेशा मनुष्य और संपूर्ण सृष्टि के साथ वार्तालाप करता रहता है, वह प्रतिदिन नए कर्म कर रहा है। उसका सार और स्वभाव मनुष्य के साथ उसके संवाद में व्यक्त होते हैं; उसके विचार और युक्तियाँ पूरी तरह से उसके कर्मों में प्रकट होते हैं; वह हर समय मनुष्य के साथ रहता है और उसका अवलोकन करता है। वह ख़ामोशी से अपने मौन वचनों के साथ मानवजाति और समूची सृष्टि से बोलता है : मैं स्वर्ग में हूँ, और मैं अपनी सृष्टि के मध्य हूँ। मैं रखवाली कर रहा हूँ, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ; मैं तुम्हारे साथ हूँ...। उसके हाथों में गर्मजोशी है और वे मजबूत हैं, उसके कदम हलके हैं, उसकी आवाज़ कोमल और शिष्ट है; उसका स्वरूप समूची मानवजाति को आगोश में भरता हुआ हमारे पास से होकर गुज़र जाता है और मुड़ जाता है; उसका मुख सुंदर और सौम्य है। वह कभी हमें छोड़कर नहीं गया, कभी विलुप्त नहीं हुआ। रात-दिन, वह मानवजाति का निरंतर साथी है, उसका साथ कभी नहीं छोड़ता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II' से उद्धृत

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