1. परमेश्वर को जानना क्या है और परमेश्वर को जानने की महत्ता क्या है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर में विश्वास करना और परमेश्वर को जानना स्वर्ग की व्यवस्था और पृथ्वी का सिद्धांत है और आज—ऐसे युग के दौरान जब देहधारी परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य कर रहा है—ख़ासतौर पर परमेश्वर को जानने का अच्छा समय है। परमेश्वर को संतुष्ट करना कुछ ऐसा है, जो परमेश्वर की इच्छा की समझ की नींव पर बनाया जाता है और परमेश्वर की इच्छा को समझने के लिए परमेश्वर का कुछ ज्ञान रखना आवश्यक है। परमेश्वर का यह ज्ञान वह दर्शन है, जो परमेश्वर में विश्वास रखने वाले के पास अवश्य होना चाहिए; यह परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास का आधार है। इस ज्ञान के अभाव में, परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास खोखले सिद्धांत के बीच, एक अज्ञात स्थिति में मौजूद होगा। भले ही यह परमेश्वर का अनुसरण करने का लोगों का इस तरह का संकल्प हो, तब भी उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होगा। वो सभी जो इस धारा में कुछ भी प्राप्त नहीं करते, वो हैं जिन्हें हटा दिया जाएगा—वो सभी मुफ़्तखोर हैं। तुम्हें परमेश्वर के कार्य के जिस भी चरण का अनुभव है, तुम्हारे साथ एक शक्तिशाली दर्शन होना चाहिए। अन्यथा, तुम्हारे लिए नए कार्य के हर चरण को स्वीकार करना कठिन होगा क्योंकि परमेश्वर का नया कार्य मनुष्य की कल्पना करने की क्षमता से परे है और उसकी धारणा की सीमाओं से बाहर है। इसलिए मनुष्य की रखवाली के लिए एक चरवाहे के बिना, दर्शनों को संगति में लगाने के लिए एक चरवाहे के बिना, मनुष्य इस नए कार्य को स्वीकार करने में असमर्थ है। यदि मनुष्य दर्शन प्राप्त नहीं कर सकता, तो वह परमेश्वर के नए कार्य को भी प्राप्त नहीं कर सकता और यदि मनुष्य परमेश्वर के नए कार्य का पालन नहीं कर सकता, तो मनुष्य परमेश्वर की इच्छा को समझने में असमर्थ होगा और इसलिए उसे परमेश्वर का कुछ ज्ञान नहीं होगा। इससे पहले कि मनुष्य परमेश्वर के वचन को कार्यान्वित करे, उसे परमेश्वर के वचन को अवश्य जानना चाहिए; यानी उसे परमेश्वर की इच्छा अवश्य समझनी चाहिए। केवल इसी तरह से परमेश्वर के वचन को सही-सही और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्यान्वित किया जा सकता है। यह कुछ ऐसा है कि सच्चाई की तलाश करने वाले हर व्यक्ति के पास अवश्य होना चाहिए और यही वह प्रक्रिया भी है, जिससे परमेश्वर को जानने की कोशिश करने वाले हर व्यक्ति को अवश्य गुज़रना चाहिए। परमेश्वर के वचन जानने की प्रक्रिया ही परमेश्वर को जानने की प्रक्रिया है और परमेश्वर के कार्य को जानने की प्रक्रिया है। और इसलिए, दर्शनों को जानना न केवल देहधारी परमेश्वर की मानवता को जानने का संकेत है बल्कि इसमें परमेश्वर के वचन और कार्य को जानना भी शामिल है। परमेश्वर के वचन से लोग परमेश्वर की इच्छा जान लेते हैं और परमेश्वर के कार्य से वो जान लेते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव और परमेश्वर क्या है। परमेश्वर में विश्वास परमेश्वर को जानने का पहला कदम है। परमेश्वर में इस आरंभिक विश्वास से उसमें अत्यधिक गहन विश्वास की ओर जाने की प्रक्रिया ही परमेश्वर को जान लेने की प्रक्रिया है, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने की प्रक्रिया है। यदि तुम केवल परमेश्वर में विश्वास रखने के वास्ते परमेश्वर में विश्वास रखते हो, न कि उसे जानने के वास्ते, तो तुम्हारे विश्वास की कोई वास्तविकता नहीं है और तुम्हारा विश्वास शुद्ध नहीं हो सकता—इस बारे में कोई संदेह नहीं है। यदि उस प्रक्रिया के दौरान जिसके ज़रिए मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, धीरे-धीरे परमेश्वर को जान लेता है, तो उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाएगा और उसका विश्वास उत्तरोत्तर सत्य होता जाएगा। इस तरह, जब मनुष्य परमेश्वर में अपने विश्वास में सफलता पा लेता है, तो उसने पूरी तरह परमेश्वर को पा लिया होगा। परमेश्वर दूसरी बार व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करने के लिए देह बनने की इतनी हद तक क्यों गया, उसका कारण था कि मनुष्य उसे जानने और देखने में समर्थ हो जाए। परमेश्वर को जानना[क] परमेश्वर के कार्य के समापन पर प्राप्त किया जाने वाला अंतिम प्रभाव है; यह वह अंतिम अपेक्षा है, जो परमेश्वर मनुष्यजाति से करता है। उसके ऐसा करने का कारण अपनी अंतिम गवाही के वास्ते है; परमेश्वर यह कार्य इसलिए करता है ताकि मनुष्य अंततः और पूरी तरह उसकी ओर फिरे। मनुष्य केवल परमेश्वर को जानकर ही परमेश्वर से प्रेम कर सकता है और परमेश्वर से प्रेम करने के लिए उसे परमेश्वर को जानना चाहिए। इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि वह कैसे तलाश करता है या वह क्या प्राप्त करने के लिए तलाश करता है, उसे परमेश्वर के ज्ञान को प्राप्त करने में समर्थ अवश्य होना चाहिए। केवल इसी तरह से मनुष्य परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट कर सकता है। केवल परमेश्वर को जानकर ही मनुष्य परमेश्वर पर सच्चा विश्वास रख सकता है और केवल परमेश्वर को जानकर ही वह वास्तव में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रख सकता है और आज्ञापालन कर सकता है। जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते, वो कभी भी परमेश्वर के प्रति सच्ची आज्ञाकारिता और श्रद्धा नहीं रख सकते। परमेश्वर को जानने में उसके स्वभाव को जानना, उसकी इच्छा को समझना और यह जानना शामिल है कि वह क्या है। फिर भी इंसान किसी भी पहलू को क्यों न जाने, उसे प्रत्येक के लिए क़ीमत चुकाने की आवश्यकता होती है और आज्ञापालन करने की इच्छा की आवश्यकता होती है, जिसके बिना कोई भी अंत तक अनुसरण करते रहने में समर्थ नहीं होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर को जानने का पाठ मानवजाति के किसी भी प्राकृतिक विज्ञान से ऊँचा है। यह ऐसा सबक है जो केवल उन्हीं बहुत थोड़े-से लोगों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है जो परमेश्वर को जानने की खोज करते हैं, इसे यूँ ही किसी भी प्रतिभावान व्यक्ति द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इसलिए तुम लोगों को परमेश्वर को जानने और सत्य की तलाश करने को ऐसे नहीं देखना चाहिए मानो कि वे ऐसी चीजें हैं जिन्हें किसी बच्चे द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है। हो सकता है कि तुम अपने पारिवारिक जीवन, अपने कार्यक्षेत्र या अपने वैवाहिक जीवन में पूरी तरह से सफल हो, परंतु जब सत्य की और परमेश्वर को जानने के सबक की बात आती है, तो तुम्हारे पास दिखाने के लिए कुछ नहीं है, तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया है। ऐसा कहा जा सकता है कि सत्य को व्यवहार में लाना तुम लोगों के लिए बहुत ही कठिन बात है, और परमेश्वर को जानना तो और भी बड़ी समस्या है। यही तुम लोगों की कठिनाई है, और इसी कठिनाई का सामना संपूर्ण मानवजाति कर रही है। जिन्होंने परमेश्वर को जानने के ध्येय में कुछ प्राप्त कर लिया है उनमें से शायद ऐसा कोई नहीं है जो मापदंड पर खरा उतरता हो। मनुष्य नहीं जानता है कि परमेश्वर को जानने का अर्थ क्या है, या परमेश्वर को जानना क्यों आवश्यक है या एक व्यक्ति को किस अंश तक ज्ञान हासिल करना चाहिए ताकि वह परमेश्वर को जान सके। यही मानवजाति के लिए बहुत उलझन वाली बात है और सीधे-सीधे यही वह सबसे बड़ी पहेली है जिसका सामना मानवजाति द्वारा किया जा रहा है—कोई भी इस प्रश्न का उत्तर देने में सक्षम नहीं है, न ही कोई इस प्रश्न का उत्तर देने की इच्छा रखता है, क्योंकि आज तक मानवजाति में से किसी को भी इस कार्य के अध्ययन में कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई है। शायद, जब कार्य के तीन चरणों की पहेली मानवजाति को बताई जाएगी, तो अनुक्रम से परमेश्वर को जानने वाले प्रतिभावान लोगों का एक समूह प्रकट होगा। मैं आशा करता हूँ कि ऐसा ही हो, और साथ ही, मैं इस कार्य को करने की प्रक्रिया में हूँ और निकट भविष्य में ऐसे और भी अधिक प्रतिभावान लोगों के प्रकट होने की आशा करता हूँ। वे कार्य के इन तीन चरणों के तथ्य की गवाही देने वाले लोग बन जाएँगे और वे वास्तव में, कार्य के इन तीनों चरणों की गवाही देने वाले प्रथम लोग भी होंगे। परंतु इससे अधिक दुखद और खेदजनक कुछ भी नहीं होगा कि परमेश्वर के कार्य की समाप्ती के दिन इस प्रकार के प्रतिभावान लोग प्रकट न हों, या केवल एक या दो ही लोग सामने आएं जिन्होंने देहधारी परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना व्यक्तिगत रूप से स्वीकार कर लिया हो। फिर भी, यह सिर्फ़ सबसे बुरी संभावना है। चाहे जो भी हो, मैं अभी भी आशा करता हूँ कि जो वास्तव में परमेश्वर की तलाश में लगे हैं, वे इस आशीष को प्राप्त कर पाएँ। समय के आरम्भ से ही, इस प्रकार का कार्य पहले कभी नहीं हुआ; मानव विकास के इतिहास में कभी भी इस प्रकार का कार्य नहीं हुआ है। यदि तुम वास्तव में परमेश्वर को जानने वालों में सबसे प्रथम लोगों में से एक हुए, तो क्या यह सभी प्राणियों में सर्वोच्च आदर की बात नहीं होगी? क्या मानवजाति में ऐसा कोई प्राणी होगा जो परमेश्वर से इससे बेहतर प्रशंसा प्राप्त कर सके? इस प्रकार का कार्य कर पाना आसान नहीं है, परंतु अंत में प्रतिफल प्राप्त करेगा। लिंग या राष्ट्रीयता से निरपेक्ष, वे सभी लोग जो परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम हैं, अंत में, परमेश्वर का सबसे महान सम्मान प्राप्त करेंगे और एकमात्र वे ही परमेश्वर के अधिकार को प्राप्त करेंगे। यही आज का कार्य है, और भविष्य का कार्य भी है; यह 6,000 सालों के कार्य में निष्पादित किया जाने वाला अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, और यह कार्य करने का ऐसा तरीका है जो मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी को प्रकट करता है। मनुष्य को परमेश्वर का ज्ञान करवाने के कार्य के माध्यम से, मनुष्य की विभिन्न श्रेणियाँ प्रकट होती हैं : जो परमेश्वर को जानते हैं वे परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने और उसकी प्रतिज्ञाओं को स्वीकार करने के योग्य होते हैं, जबकि जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे परमेश्वर के आशीषों और प्रतिज्ञाओं को स्वीकारने के योग्य नहीं होते हैं। जो परमेश्वर को जानते हैं वे परमेश्वर के अंतरंग होते हैं, और जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे परमेश्वर के अंतरंग नहीं कहे जा सकते हैं; परमेश्वर के अंतरंग परमेश्वर का कोई भी आशीष प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु जो उसके घनिष्ठ नहीं हैं वे उसके किसी भी काम के लायक नहीं हैं। चाहे यह क्लेश, शुद्धिकरण या न्याय हो, ये सभी चीजें अंततः मनुष्य को परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने के योग्य बनाने की खातिर हैं, और इसलिए हैं ताकि मनुष्य परमेश्वर के प्रति समर्पण करे। यही एकमात्र प्रभाव है जो अंततः प्राप्त किया जाएगा। कार्य के तीनों चरणों में से कुछ भी छिपा हुआ नहीं है, और यह मनुष्य के परमेश्वर के ज्ञान के लिए लाभकारी है, और परमेश्वर का अधिक पूर्ण और विस्तृत ज्ञान प्राप्त करने में मनुष्य की सहायता करता है। यह समस्त कार्य मनुष्य के लिए लाभप्रद है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सके और उसकी गवाही दे सके। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव का परमेश्वर द्वारा न्याय के बिना, संभवतः मनुष्य अपने धार्मिक स्वभाव को नहीं जान सकता था, जो कोई अपराध नहीं करता और न वह परमेश्वर के अपने पुराने ज्ञान को एक नए रूप में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है, इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के ज़रिए, मनुष्य को परमेश्वर के ज्ञान तक पहुँचने, उसको स्वभाव में रूपांतरित होने और परमेश्वर की ज़बर्दस्त गवाही देने लायक बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का रूपांतरण परमेश्वर के कई विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज़रिए प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में ऐसे बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसके पास जाने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में रूपांतरण दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह और ऐसा व्यक्ति बन गया है, जो परमेश्वर के दिल के क़रीब है। आज देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर अपना कार्य करने के लिए आया है और वह अपेक्षा रखता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति आज्ञाकारी हो, उसके लिए उसकी गवाही दे—उसके व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जाने, उसके उन सभी वचनों और कार्य का पालन करे, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं और उस समस्त कार्य की गवाही दे, जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और साथ ही सभी कर्मों की जिन्हें वह मनुष्य को जीतने के लिए कार्यान्वित करता है। जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही अचूक और वास्तविक होती है और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्‍वर अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने उसके न्याय और उसकी ताड़ना, व्यवहार और काट-छाँट से गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है और इसी तरह वह अपनी गवाही देने के लिए उन लोगों का भी उपयोग करता है, जिनका स्वभाव बदल गया है और जिन्होंने इस प्रकार उसके आशीर्वाद प्राप्त कर लिए हैं। उसे मनुष्य की आवश्यकता नहीं, जो अपने मुँह से उसकी स्तुति करे, न ही उसे शैतान की किस्म के लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जिन्हें उसने नहीं बचाया है। केवल वो जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही देने योग्य हैं और केवल वो जिनके स्वभाव को रूपांतरित कर दिया गया है, उसकी गवाही देने योग्य हैं। परमेश्वर जानबूझकर मनुष्य को अपने नाम को शर्मिंदा नहीं करने देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर को जानने का क्या अभिप्राय है? इसका अभिप्राय है परमेश्वर के आनंद, गुस्से, दुःख और खुशी को समझ पाना, और इस प्रकार उसके स्वभाव को जानना—यही है परमेश्वर को वास्तव में जानना। तुम दावा करते हो कि तुमने उसे देखा है, फिर भी तुम उसके आनंद, गुस्से, दुःख और खुशी को नहीं जानते हो, उसके स्वभाव को नहीं जानते हो। न उसकी धार्मिकता को जानते हो, न ही उसकी दयालुता को, न ही तुम ये जानते हो कि वह किन चीज़ों को पसंद करता है और किनसे घृणा करता है। इसे परमेश्वर को जानना नहीं कहा जा सकता है। इसलिए, कुछ लोग परमेश्वर का अनुसरण तो कर पाते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे सच्चाई से परमेश्वर में विश्वास करने में सक्षम हों; इसी में अंतर निहित है। यदि तुम परमेश्वर को जानते हो, उसे समझते हो, उसकी कुछ इच्छाओं को समझने एवं ग्रहण करने में सक्षम हो, तो तुम सचमुच उस पर विश्वास कर सकते हो, सचमुच में उसके प्रति समर्पित हो सकते हो, सचमुच में उससे प्रेम कर सकते हो, और सचमुच में उसकी आराधना कर सकते हो। यदि तुम इन चीज़ों को नहीं समझते हो, तो तुम सिर्फ एक अनुयायी हो जो भीड़ के साथ में दौड़ता और धारा के साथ बहता है। इसे सच्चा समर्पण या सच्ची आराधना नहीं कहा जा सकता है। सच्ची आराधना कैसे उत्पन्न होती है? बिना किसी अपवाद के, जो भी सचमुच में परमेश्वर को जानते हैं वे जब उसे देखते हैं तो उसकी आराधना और आदर करते हैं। जैसे ही वे परमेश्वर को देखते हैं वे भयभीत हो जाते हैं। वर्तमान में, जब देहधारी परमेश्वर कार्य कर रहा है, तब लोगों के पास उसके स्वभाव की और उसके स्वरूप की जितनी अधिक समझ होती है, उतना ही अधिक लोग इन बातों को संजोकर रखेंगे, उतना ही अधिक वे परमेश्वर का आदर करेंगे। आम तौर पर, जितनी कम समझ लोगों के पास होती है, वे उतना ही अधिक लापरवाह होते हैं, और इसलिए वे परमेश्वर से मनुष्य के समान बर्ताव करते हैं। यदि लोग वास्तव में परमेश्वर को जानते और देखते, तो वे भय के मारे काँपने लगते। "जो मेरे बाद आने वाला है, वह मुझ से शक्तिशाली है; मैं उसकी जूती उठाने के योग्य नहीं"—यूहन्ना ने ऐसा क्यों कहा? यद्यपि अंतरतम में उसके पास गहन समझ नहीं थी, फिर भी वह जानता था कि परमेश्वर विस्मय की भावना जगाता है। आजकल कितने लोग परमेश्वर का आदर करने में सक्षम हैं? अगर वे परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानते, तो वे किस प्रकार उसका आदर कर सकते हैं? लोग न तो मसीह का सार जानते हैं, न ही परमेश्वर के स्वभाव को समझते हैं, न ही परमेश्वर की आराधना करने में और भी समर्थ नहीं होते हैं। यदि वे सिर्फ मसीह के साधारण और सामान्य बाहरी रूप को देखते हैं फिर भी उसके सार को नहीं जानते हैं, तो मसीह के साथ मात्र एक सामान्य मनुष्य की तरह बर्ताव करना लोगों के लिए आसान है। वे उसके प्रति एक अपमानजनक प्रवृत्ति अपना सकते हैं, उसे धोखा दे सकते हैं, उसका प्रतिरोध कर सकते हैं, उसकी अवज्ञा कर सकते हैं, उस पर दोष लगा सकते हैं, और दुराग्रही हो सकते हैं। वे दंभी हो सकते हैं और हो सकता है वे उसके वचन को गंभीरता से न लें, वे परमेश्वर के बारे में धारणाएं भी बना सकते हैं, उसकी निंदा और तिरस्कार कर सकते हैं। इन मुद्दों को सुलझाने के लिए व्यक्ति को मसीह के सार, एवं मसीह की दिव्यता को अवश्य जानना चाहिए। परमेश्वर को जानने का यही मुख्य पहलू है; यही वो है जिसमें व्यवहारिक परमेश्वर में विश्वास करने वाले हर इंसान को प्रवेश और जिसे हासिल करना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'देहधारी परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में क्या पता होना चाहिए? पवित्रात्मा, व्यक्ति और वचन स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर को बनाते हैं; और यही स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर का वास्तविक अर्थ है। यदि तुम सिर्फ़ व्यक्ति को जानते हो—यदि तुम उसकी आदतों और उसके व्यक्तित्व को जानते हो—लेकिन पवित्रात्मा के कार्य को नहीं जानते, या यह नहीं जानते कि पवित्रात्मा देह में क्या करता है, और यदि तुम सिर्फ़ पवित्रात्मा और वचन पर ध्यान देते हो, और केवल पवित्रात्मा के सामने प्रार्थना करते हो, लेकिन व्यावहारिक परमेश्वर में परमेश्वर के पवित्रात्मा के कार्य को नहीं जानते, तो यह साबित करता है कि तुम व्यावहारिक परमेश्वर को नहीं जानते। व्यावहारिक परमेश्वर संबंधी ज्ञान में उसके वचनों को जानना और अनुभव करना, पवित्रात्मा के कार्य के नियमों और सिद्धांतों को समझना, और परमेश्वर के पवित्रात्मा द्वारा देह में कार्य करने के तरीके को समझना शामिल है। इसमें यह जानना भी शामिल है कि देह में परमेश्वर का हर कार्य पवित्रात्मा द्वारा नियंत्रित होता है, और उसके द्वारा बोले जाने वाले वचन पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं। इस प्रकार, व्यावहारिक परमेश्वर को जानने के लिए यह जानना सर्वोपरि है कि परमेश्वर मानवता और दिव्यता में कैसे कार्य करता है; जिसके परिणामस्वरूप यह पवित्रात्मा की अभिव्यक्ति से संबंध रखता है, जिससे सभी लोग जुड़ते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है' से उद्धृत

परमेश्वर के एक प्राणी के रूप में, यदि तुम परमेश्वर के प्राणी के कर्तव्य को निभाना चाहते हो और परमेश्वर की इच्छा को समझते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के कार्य को अवश्य समझना चाहिए, प्राणियों के लिए परमेश्वर की इच्छा को अवश्य समझना चाहिए, तुम्हें उसकी प्रबंधन योजना को अवश्य समझना चाहिए, और उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य के समस्त महत्व को भी अवश्य समझना चाहिए। जो लोग इस बात को नहीं समझते हैं वे परमेश्वर के प्राणी होने के योग्य नहीं हैं! परमेश्वर के प्राणी के रूप में, यदि तुम यह नहीं समझते हो कि तुम कहाँ से आए हो, मानवजाति के इतिहास और परमेश्वर द्वारा किए गए संपूर्ण कार्य को नहीं समझते हो, और, इसके अलावा, यह नहीं समझते हो कि आज तक मानवजाति का विकास कैसे हुआ है, और नहीं समझते हो कि कौन संपूर्ण मानवजाति को नियंत्रित करता है, तो तुम अपने कर्तव्य को करने में अक्षम हो। परमेश्वर ने आज तक मानवजाति की अगुवाई की है, और जब से उसने पृथ्वी पर मनुष्य की रचना की है तब से उसने उसे कभी भी नहीं छोड़ा है। पवित्र आत्मा कभी भी कार्य करना बंद नहीं करता है, उसने मानवजाति की अगुवाई करना कभी भी बंद नहीं किया है, और कभी भी मानवजाति को नहीं त्यागा है। परंतु परमेश्वर के बारे में जानना तो दूर, मानवजाति को यह भी अहसास नहीं होता कि परमेश्वर है, और क्या परमेश्वर के सभी प्राणियों के लिए इससे अधिक अपमानजनक कुछ और हो सकता है? परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से मनुष्य की अगुवाई करता है, परंतु मनुष्य परमेश्वर के कार्य को नहीं समझता है। तुम परमेश्वर के एक प्राणी हो, फिर भी तुम अपने ही इतिहास को नहीं समझते हो, और इस बात से अनजान हो कि किसने तुम्हारी यात्रा में तुम्हारी अगुआई की है, तुम परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के प्रति बेसुध हो और इसलिए तुम परमेश्वर को नहीं जान सकते हो। यदि तुम नहीं जानते हो, तो तुम कभी भी परमेश्वर की गवाही देने के योग्य नहीं बनोगे। आज, सृष्टिकर्ता व्यक्तिगत तौर पर एक बार फिर से सभी लोगों की अगुवाई कर रहा है, और सभी लोगों को अपनी बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता, उद्धार और उत्कृष्टता दिखाता है। फिर भी तुम्हें अब भी न तो इसका अहसास है और न तुम इसे समझते हो—इसलिए क्या तुम वह नहीं हो जिसे उद्धार प्राप्त नहीं होगा? जो शैतान से संबंधित होते हैं वे परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते हैं और जो परमेश्वर से संबंधित होते हैं वे परमेश्वर की आवाज़ को सुन सकते हैं। वे सभी लोग जो मेरे द्वारा बोले गए वचनों को महसूस करते और समझते हैं ऐसे लोग हैं जो बचा लिए जाएँगे, और परमेश्वर की गवाही देंगे; वे सभी लोग जो मेरे द्वारा बोले गए वचनों को नहीं समझते हैं, परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो निकाल दिए जाएँगे। जो लोग परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं और परमेश्वर के कार्य का अहसास नहीं करते हैं वे परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने में अक्षम हैं, और इस प्रकार के लोग परमेश्वर की गवाही नहीं देंगे। यदि तुम परमेश्वर की गवाही देना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर को अवश्य जानना होगा, और परमेश्वर के कार्य के द्वारा ही परमेश्वर के ज्ञान को पाया जा सकता है। कुल मिला कर, यदि तुम परमेश्वर को जानने की इच्छा करते हो, तो तुम्हें उसके कार्य को अवश्य जानना चाहिए : परमेश्वर के कार्य को जानना सबसे महत्वपूर्ण बात है। जब कार्य के तीन चरण समाप्ति पर पहुँचेंगे, तो ऐसे लोगों का एक समूह बनाया जाएगा जो परमेश्वर की गवाही देंगे, ऐसे लोगों का समूह जो परमेश्वर को जानते हैं। ये सभी लोग परमेश्वर को जानेंगे और सत्य को व्यवहार में लाने में समर्थ होंगे। उनमें मानवता और समझ होगी और उन्हें परमेश्वर के उद्धार के कार्य के तीनों चरणों का ज्ञान होगा। यही कार्य अंत में निष्पादित होगा, और यही लोग 6,000 साल के प्रबंधन के कार्य का सघनित रूप हैं, और शैतान की अंतिम पराजय की सबसे शक्तिशाली गवाही हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, स्वयं को जान लेता है, अपने भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करता है और जीवन में विकास की तलाश करता है, यह सब परमेश्वर को जानने के वास्ते करता है। यदि तुम केवल अपने आप को जानने और अपने भ्रष्ट स्वभाव से निपटने का प्रयास करते हो, मगर तुम्हें इसका कोई ज्ञान नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य पर क्या कार्य करता है, उसका उद्धार कितना महान है या इसका कोई ज्ञान नहीं है कि तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे करते हो और उसके कर्मों की गवाही कैसे देते हो, तो तुम्हारा यह अनुभव अनर्गल है। यदि तुम सोचते हो कि किसी के जीवन में केवल इसलिए परिपक्वता आई है क्योंकि वह सत्य को व्यवहार में लाने और सहन करने में समर्थ है, तो इसका मतलब है कि तुमने अभी भी जीवन का सच्चा अर्थ या मनुष्य को पूर्ण करने का परमेश्वर का उद्देश्य नहीं समझा है। एक दिन, जब तुम पश्चाताप कलीसिया (रिपेंटेंस चर्च) या जीवन कलीसिया (लाइफ़ चर्च) के सदस्यों के बीच, धार्मिक कलीसियाओं में होगे, तो तुम कई धर्मपरायण लोगों से मिलोगे, जिनकी प्रार्थनाएं "दर्शनों" से युक्त होती हैं और जो जीवन की अपनी खोज में, स्पर्श किए गए और वचनों द्वारा मार्गदर्शित महसूस करते हैं। इसके अलावा, वो कई मामलों में सहने और स्वयं का त्याग करने और देह द्वारा अगुआई न किए जाने में समर्थ हैं। उस समय, तुम अंतर बताने में समर्थ नहीं होगे: तुम विश्वास करोगे कि वो जो कुछ करते हैं, सही है, जीवन की प्राकृतिक अभिव्यक्ति है और यह कितनी दयनीय बात है कि जिस नाम में वो विश्वास रखते हैं, वही ग़लत है। क्या ऐसे विचार मूर्खतापूर्ण नहीं हैं? ऐसा क्यों कहा जाता है कि कई लोगों का कोई जीवन नहीं है? क्योंकि वो परमेश्वर को नहीं जानते और इसीलिए ऐसा कहा जाता है कि उनके हृदय में कोई परमेश्वर नहीं है और उनका कोई जीवन नहीं है। यदि परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास एक स्थिति तक पहुँच गया है, जहां तुम परमेश्वर के कर्मों, परमेश्वर की वास्तविकता और परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण को पूरी तरह जानने में सक्षम हो, तो तुम सत्य के अधीन हो। यदि तुम परमेश्वर के कार्य और स्वभाव को नहीं जानते, तो तुम्हारे अनुभव में अभी भी कुछ दोष है। यीशु ने कैसे अपने कार्य के उस चरण को कार्यान्वित किया, कैसे इस चरण को कार्यान्वित किया जा रहा है, कैसे अनुग्रह के युग में परमेश्वर ने अपना कार्य किया और क्या कार्य किया, कौन सा कार्य इस चरण में किया जा रहा है—यदि तुम्हें इन बातों का पूरी तरह ज्ञान नहीं है, तो तुम कभी भी आश्वस्त महसूस नहीं करोगे और तुम हमेशा असुरक्षित रहोगे। यदि एक अवधि के अनुभव के बाद, तुम परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य और उसके हर चरण को जानने में समर्थ हो और यदि तुमने परमेश्वर के वचनों के बोलने में उसके लक्ष्यों का और इस बात का पूरी तरह ज्ञान प्राप्त कर लिया है और क्यों उसके द्वारा बोले गए इतने सारे वचन पूरे नहीं हुए हैं, तो तुम साहस के साथ और बिना हिचकिचाए, चिंता और शोधन से मुक्त होकर, आगे के मार्ग पर चल सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप के ज्ञान का मनुष्यों के ऊपर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यह परमेश्वर पर और अधिक विश्वास रखने और उसके प्रति सच्ची आज्ञाकारिता और भय प्राप्त करने में उनकी सहायता कर सकता है। तब वे आँख मूँदकर उसका अनुसरण या आराधना नहीं करते रहते। परमेश्वर को मूर्ख या आँख मूँदकर भीड़ का अनुसरण करने वाले नहीं चाहिए, बल्कि ऐसे लोगों का एक समूह चाहिए, जिनके हृदय में परमेश्वर के स्वभाव की एक स्पष्ट समझ और ज्ञान हो और जो परमेश्वर के गवाह के रूप में कार्य कर सकते हों, ऐसे लोग जो परमेश्वर की मनोहरता की वजह से, उसके स्वरूप की वजह से और उसके धार्मिक स्वभाव की वजह से उसका कभी परित्याग नहीं करेंगे। परमेश्वर के अनुयायी के रूप में, यदि तुम्हारे हृदय में अभी भी स्पष्टता की कमी है, या परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व, उसके स्वभाव, उसके स्वरूप, और मानवजाति के उद्धार की उसकी योजना के बारे में अस्पष्टता या भ्रम है, तो तुम्हारा विश्वास परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकता। परमेश्वर नहीं चाहता कि इस प्रकार के लोग उसका अनुसरण करें, और वह इस प्रकार के लोगों का अपने सामने आना पसंद नहीं करता। चूँकि इस प्रकार के व्यक्ति परमेश्वर को नहीं समझते, इसलिए वे अपना हृदय परमेश्वर को देने में असमर्थ हैं—उनका हृदय उसके लिए बंद है, इसलिए परमेश्वर के प्रति उनका विश्वास अशुद्धताओं से भरा हुआ है। उनका परमेश्वर का अनुसरण केवल अंधानुसरण ही कहा जा सकता है। लोग केवल तभी सच्चा विश्वास प्राप्त कर सकते हैं और केवल तभी सच्चे अनुयायी बन सकते हैं, जब उन्हें परमेश्वर की सच्ची समझ और ज्ञान हो, जो उनके भीतर परमेश्वर के प्रति सच्ची आज्ञाकारिता और भय उत्पन्न करता हो। केवल इसी तरह से वे अपना हृदय परमेश्वर को दे सकते हैं और उसे उसके लिए खोल सकते हैं। परमेश्वर यही चाहता है, क्योंकि जो कुछ भी वे करते और सोचते हैं, वह परमेश्वर की परीक्षा का सामना कर सकता है और परमेश्वर की गवाही दे सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्वर के सार-तत्व से परिचित होना कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। तुम्हें उसके स्वभाव को समझना होगा। इस तरह से तुम धीरे-धीरे, अनजाने में परमेश्वर के सार-तत्व से परिचित हो जाओगे, जब तुम इस ज्ञान में प्रवेश कर लोगे, तुम खुद को एक उच्चतर और अधिक ख़ू़बसूरत राज में प्रवेश करता हुआ पाओगे। अंत में तुम अपनी घृणित आत्मा पर लज्जा महसूस करोगे, और तो और तुम अपनी शक्ल दिखाने से भी लजाओगे। उस समय, तुम्हारे आचरण में ऐसी बातें कम होती चली जाएंगी जो परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुँचायें, तुम्हारा हृदय परमेश्वर के निकट होता जाएगा, और धीरे-धीरे उसके लिए तुम्हारे हृदय में प्रेम बढ़ता जाएगा। ये मानवजाति के ख़ूबसूरत राज में प्रवेश करने का एक चिह्न है। परन्तु तुम सबने इसे अभी प्राप्त नहीं किया है। अपनी नियति के लिए यहाँ-वहाँ भटकते हुए परमेश्वर के सार को जानने की रुचि किसमें है? अगर ये जारी रहा तो तुम अनजाने में प्रशासनिक आदेशों के विरूद्ध अपराध करोगे क्योंकि तुम परमेश्वर के स्वभाव के बारे में बहुत ही कम जानते हो। तो क्या अब तुम सब जो कर रहे हो वो परमेश्वर के स्वभाव के विरूद्ध तुम्हारे अपराधों की नींव नहीं डाल रहा? मेरा तुमसे यह अपेक्षा करना कि तुम परमेश्वर के स्वभाव को समझो, मेरे कार्य के विपरीत नहीं है। क्योंकि यदि तुम लोग बार-बार प्रशासनिक आदेशों के विरूद्ध अपराध करते रहोगे, तो तुम में से कौन है जो दण्ड से बच पाएगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझते, तब तुम्हारे लिए उस काम को करना असंभव होगा जो उसके लिए तुम्हें करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के सार को नहीं जानते हो, तो उसके प्रति आदर और भय को धारण करना तुम्हारे लिए असंभव होगा; तुम केवल बेपरवाह यंत्रवत ढंग से काम करोगे और घुमा-फिराकर बात कहोगे, इसके अतिरिक्त असाध्य ईश-निन्दा करोगे। हालाँकि परमेश्वर के स्वभाव को समझना वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण है, और परमेश्वर के अस्तित्व के ज्ञान को कभी भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता, फिर भी किसी ने भी पूरी तरह इस विषय का परीक्षण नहीं किया है या कोई उसकी गहराई में नहीं गया है। यह बिलकुल साफ-साफ देखा जा सकता है कि तुम सबने मेरे द्वारा दिए गए सभी प्रशासनिक आदेशों को अस्वीकार कर दिया है। यदि तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझते, तो बहुत संभव है कि तुम उसके स्वभाव को ठेस पहुँचा दो। उसके स्वभाव का अपमान ऐसा अपराध है जो स्वयं परमेश्वर के क्रोध को भड़काने के समान है, अगर ऐसा होता है तो अंतत: तुम्हारे क्रियाकलापों का परिणाम प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन होगा। अब तुम्हें एहसास हो जाना चाहिए कि जब तुम उसके सार को जान जाते हो तो तुम परमेश्वर के स्वभाव को भी समझ सकते हो, और जब तुम परमेश्वर के स्वभाव को समझ जाते हो तो तुम उसके प्रशासनिक आदेशों को भी समझ जाओगे। कहने की आवश्यकता नहीं है कि प्रशासनिक आदेशों में जो निहित है उसमें से काफी कुछ परमेश्वर के स्वभाव का जिक्र करता है, परन्तु उसका सम्पूर्ण स्वभाव प्रशासनिक आदेशों में प्रकट नहीं किया गया है; अत: परमेश्वर के स्वभाव की समझ को और ज़्यादा विकसित करने के लिए तुम्हें एक कदम और आगे बढ़ना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

यदि लोग जिसके बारे में जानते हैं या जिसकी समझ प्राप्त करते हैं, वह परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप है, तो वे जो प्राप्त करते हैं, वह जीवन होगा जो परमेश्वर से आता है। जब यह जीवन तुम्हारे भीतर गढ़ दिया जाएगा, तो तुममें परमेश्वर का भय अधिक से अधिक होता जाएगा। यह एक ऐसा लाभ है, जो बहुत स्वाभाविक रूप से आता है। यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव या उसके सार के बारे में समझना और जानना नहीं चाहते, यदि तुम इन चीज़ों के ऊपर मनन करना और ध्यान केंद्रित करना तक नहीं चाहते, तो मैं निश्चित रूप से तुम्हें बता सकता हूँ कि जिस तरह से तुम वर्तमान में परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास का अनुसरण कर रहे हो, वह तुम्हें कभी भी उसकी इच्छा पूरी करने या उसकी प्रशंसा प्राप्त करने नहीं दे सकता। इतना ही नहीं, तुम कभी वास्तव में उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते—ये अंतिम परिणाम हैं। जब लोग परमेश्वर को नहीं समझते और उसके स्वभाव को नहीं जानते, तो उनका हृदय परमेश्वर के लिए वास्तव में कभी नहीं खुल सकता। जब वे परमेश्वर को समझ जाते हैं, तो वे रुचि और विश्वास के साथ जो कुछ परमेश्वर के हृदय में है, उसकी सराहना करना और उसका स्वाद लेना आरंभ कर देते हैं। जब तुम जो परमेश्वर के हृदय में है, उसकी सराहना करने और उसका स्वाद लेने लगोगे, तो तुम्हारा हृदय धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा करके, उसके लिए खुलता जाएगा। जब तुम्हारा हृदय उसके लिए खुल जाएगा, तो तुम्हें महसूस होगा कि परमेश्वर के साथ तुम्हारे लेन-देन, परमेश्वर से तुम्हारी माँगें और तुम्हारी अपनी अनावश्यक अभिलाषाएँ कितनी शर्मनाक और घृणित थीं। जब तुम्हारा हृदय वास्तव में परमेश्वर के लिए खुल जाएगा, तो तुम देखोगे कि उसका हृदय एक असीमित संसार है, और तुम एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करोगे, जिसे तुमने पहले कभी अनुभव नहीं किया है। इस क्षेत्र में कोई छल-कपट नहीं है, कोई धोखेबाज़ी नहीं है, कोई अंधकार नहीं है और कोई बुराई नहीं है। वहाँ केवल ईमानदारी और विश्वसनीयता है; केवल प्रकाश और सत्यपरायणता है; केवल धार्मिकता और दयालुता है। वह प्रेम और परवाह से भरा हुआ है, अनुकंपा और सहनशीलता से भरा हुआ है, और उसके माध्यम से तुम जीवित होने की प्रसन्नता और आनंद महसूस करोगे। ये वे चीज़ें हैं, जिन्हें परमेश्वर तुम्हारे लिए तब प्रकट करेगा, जब तुम अपना हृदय उसके लिए खोलोगे। यह असीमित संसार परमेश्वर की बुद्धि से और उसकी सर्वशक्तिमत्ता से भरा हुआ है; यह उसके प्रेम और अधिकार से भी भरा हुआ है। यहाँ तुम परमेश्वर के स्वरूप के हर पहलू को देख सकते हो, कि किस बात से वह आनंदित होता है, क्यों वह चिंता करता है और क्यों उदास होता है, और क्यों वह क्रोधित होता है...। हर व्यक्ति, जो अपने हृदय को खोलता है और परमेश्वर को भीतर आने देता है, इसे अनुभव कर सकता है। परमेश्वर केवल तभी तुम्हारे हृदय में आ सकता है, जब तुम अपना हृदय उसके लिए खोल देते हो। तुम केवल तभी परमेश्वर के स्वरूप को देख सकते हो, केवल तभी अपने लिए उसके इरादे देख सकते हो, जब वह तुम्हारे हृदय के भीतर आ गया होता है। उस समय तुम्हें पता चलेगा कि परमेश्वर से संबंधित हर चीज़ कितनी बहुमूल्य है, कि उसका स्वरूप कितना सँजोकर रखने लायक है। उसकी तुलना में तुम्हें घेरे रहने वाले लोग, तुम्हारे जीवन की वस्तुएँ और घटनाएँ, यहाँ तक कि तुम्हारे प्रियजन, तुम्हारा जीवनसाथी, और वे चीज़ें जिनसे तुम प्रेम करते हो, वे शायद ही उल्लेखनीय हों। वे इतने छोटे हैं, और इतने निम्न हैं; तुम महसूस करोगे कि कोई भौतिक पदार्थ फिर कभी तुम्हें आकर्षित करने में सक्षम नहीं होगा, या कोई भौतिक पदार्थ तुम्हें फिर कभी अपने लिए कोई कीमत चुकाने हेतु फुसला नहीं सकेगा। परमेश्वर की विनम्रता में तुम उसकी महानता और उसकी सर्वोच्चता देखोगे। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के कुछ कर्मों में, जिन्हें तुम पहले काफी छोटा समझते थे, तुम उसकी असीमित बुद्धि और उसकी सहनशीलता देखोगे, और तुम उसका धैर्य, उसकी सहनशीलता और अपने बारे में उसकी समझ देखोगे। यह तुममें उसके लिए श्रद्धा उत्पन्न करेगा। उस दिन तुम्हें लगेगा कि मानवजाति कितने गंदे संसार में रह रही है, कि तुम्हारे आसपास रहने वाले लोग और तुम्हारे जीवन में घटित होने वाली घटनाएँ, यहाँ तक कि जिनसे तुम प्रेम करते हो, तुम्हारे प्रति उनका प्रेम और उनकी तथाकथित सुरक्षा या तुम्हारे लिए उनकी चिंता भी उल्लेखनीय तक नहीं हैं—केवल परमेश्वर ही तुम्हारा प्रिय है, और केवल परमेश्वर ही है जिसे तुम सबसे ज़्यादा सँजोते हो। जब वह दिन आएगा, तो मैं मानता हूँ कि कुछ लोग होंगे जो कहेंगे : परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है, और उसका सार बहुत पवित्र है—परमेश्वर में कोई धोखा नहीं है, कोई बुराई नहीं है, कोई ईर्ष्या नहीं है, और कोई कलह नहीं है, बल्कि केवल धार्मिकता और प्रामाणिकता है, और मनुष्यों को परमेश्वर के स्वरूप की हर चीज़ की लालसा करनी चाहिए। मनुष्यों को उसके लिए प्रयास करना चाहिए और उसकी आकांक्षा करनी चाहिए। किस आधार पर मानवजाति की इसे प्राप्त करने की योग्यता निर्मित होती है? वह मनुष्यों की परमेश्वर के स्वभाव की समझ, और उनकी परमेश्वर के सार की समझ के आधार पर निर्मित होती है। इसलिए परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप को समझना प्रत्येक व्यक्ति के लिए जीवनभर की शिक्षा है; और यह हर उस व्यक्ति के द्वारा अनुसरण किया जाने वाला एक जीवनभर का लक्ष्य है, जो अपने स्वभाव को बदलने का प्रयास करता है, और परमेश्वर को जानने का प्रयास करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

"परमेश्‍वर का भय मानना और दुष्‍टता का त्‍याग करना" तथा परमेश्‍वर को जानना अभिन्‍न रूप से असंख्य सूत्रों से जुड़े हैं, और उनके बीच का संबंध स्वत: स्‍पष्‍ट है। यदि कोई बुराई से दूर रहना चाहता है, तो उसमें पहले परमेश्‍वर का वास्‍तविक भय होना चाहिए; यदि कोई परमेश्‍वर का वास्‍तविक भय मानना चाहता है, तो उसमें पहले परमेश्‍वर का सच्‍चा ज्ञान होना चाहिए; यदि कोई परमेश्‍वर का ज्ञान हासिल करना चा‍हता है, तो उसे पहले परमेश्‍वर के वचनों का अनुभव करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए, परमेश्वर की ताड़ना, अनुशासन और न्याय का अनुभव करना चाहिए; यदि कोई परमेश्‍वर के वचनों का अनुभव करना चाहता है, तो उसे पहले परमेश्‍वर के वचनों के रूबरू आना चाहिए, परमेश्‍वर के रूबरू आना चाहिए, और परमेश्‍वर से निवेदन करना चाहिए कि वह लोगों, घटनाओं और वस्‍तुओं से युक्त सभी प्रकार के परिवेशों के रूप में परमेश्‍वर के वचनों को अनुभव करने के अवसर प्रदान करे; यदि कोई परमेश्‍वर और उसके वचनों के रूबरू आना चाहता है, तो उसे पहले एक सरल और सच्‍चा हृदय, सत्‍य को स्‍वीकार करने की तत्‍परता, कष्‍ट झेलने की इच्‍छा, और बुराई से दूर रहने का संकल्प और साहस, और एक सच्‍चा सृजित प्राणी बनने की अभिलाषा रखनी चाहिए...। इस प्रकार कदम-दर-कदम आगे बढ़ते हुए, तुम परमेश्‍वर के निरंतर करीब आते जाओगे, तुम्‍हारा हृदय निरंतर शुद्ध होता जाएगा, और तुम्‍हारा जीवन और जीवित रहने के मूल्‍य, परमेश्‍वर के तुम्‍हारे ज्ञान के साथ-साथ, निरंतर अधिक अर्थपूर्ण और दीप्तिमान होते जाएँगे। फिर एक दिन तुम अनुभव करोगे कि स्रष्टा अब कोई पहेली नहीं रह गया है, स्रष्टा कभी तुमसे छिपा नहीं था, स्रष्टा ने कभी अपना चेहरा तुमसे छिपाया नहीं था, स्रष्टा तुमसे बिलकुल भी दूर नहीं है, स्रष्टा अब बिलकुल भी वह नहीं है जिसके लिए तुम अपने विचारों में लगातार तरस रहे हो लेकिन जिसके पास तुम अपनी भावनाओं से पहुँच नहीं पा रहे हो, वह वाकई और सच में तुम्‍हारे दाएँ-बाएँ खड़ा तुम्‍हारी सुरक्षा कर रहा है, तुम्‍हारे जीवन को पोषण दे रहा है और तुम्‍हारी नियति को नियंत्रित कर रहा है। वह सुदूर क्षितिज पर नहीं है, न ही उसने अपने आपको ऊपर कहीं बादलों में छिपाया हुआ है। वह एकदम तुम्‍हारी बगल में है, तुम्‍हारे सर्वस्‍व पर आधिपत्‍य कर रहा है, वह वो सब है जो तुम्‍हारे पास है, और वही एकमात्र चीज़ है जो तुम्‍हारे पास है। ऐसा परमेश्‍वर तुम्‍हें स्वयं को अपने हृदय से प्रेम करने देता है, स्वयं से लिपटने देता है, स्वयं को पकड़ने देता है, अपनी स्तुति करने देता है, गँवा देने का भय पैदा करता है, अपना त्‍याग करने, अपनी अवज्ञा करने, अपने को टालने या दूर करने का अनिच्छुक बना देता है। तुम बस उसकी परवाह करना, उसका आज्ञापालन करना, जो भी वह देता है उस सबका प्रतिदान करना और उसके प्रभुत्व के प्रति समर्पित होना चाहते हो। तुम अब उसके द्वारा मार्गदर्शन किए जाने, पोषण दिए जाने, निगरानी किए जाने, उसके द्वारा देखभाल किए जाने से इंकार नहीं करते और न ही उसकी आज्ञा और आदेश का पालन करने से इंकार करते हो। तुम सिर्फ़ उसका अनुसरण करना चाहते हो, उसके साथ चलना चाहते हो, उसे अपना एकमात्र जीवन स्‍वीकार करना चाहते हो, उसे अपना एकमात्र प्रभु, अपना एकमात्र परमेश्‍वर स्‍वीकार करना चाहते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

फुटनोट :

क. मूल पाठ में "परमेश्वर को जानने का कार्य" लिखा है।

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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