3. परमेश्वर में विश्वास और धर्म में विश्वास के बीच क्या अंतर हैं

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

धर्म में विश्‍वास क्‍या है? परमेश्‍वर में विश्‍वास क्‍या है? क्‍या दोनों में फर्क है? धर्म के सर्वसामान्‍य, प्रमुख लक्षण क्‍या हैं? लोग धर्म में विश्‍वास को आमतौर पर किस तरह परिभाषित करते हैं? धर्म में विश्‍वास आचरण में परिवर्तनों से बनता है—दूसरों से लड़ने, दूसरों को कोसने, दुष्‍कर्म करने, दूसरों का शोषण करने, दूसरों का फायदा उठाने और क्षुद्र चोरी-चकारियाँ करने जैसे आचरणों में परिवर्तन से बनता है। यह मुख्यत: आचरण में परिवर्तनों से सम्‍बन्‍ध रखता है। जब लोग धर्म में विश्‍वास करते हैं, तो वे सद्वयवहार करने की, भला इंसान बनने की कोशिश करते हैं; ये बाह्य आचरण हैं। लेकिन एक मानसिक अवलंब के रूप में धर्म क्‍या है? मानसिक क्षेत्र के बारे में क्‍या कहा जाएगा? आस्‍थावान व्‍यक्ति के पास एक मानसिक अवलंब होता है। इसलिए धर्म में विश्‍वास को इस तरह परिभाषित किया जा सकता है : सदाचारी होना, और मानसिक अवलंब का होना—और कुछ नहीं। जब इस तरह के ब्‍यौरों का सवाल उठता है कि जिसमें वे विश्‍वास करते हैं उसका क्‍या वास्‍तव में अस्तित्‍व है और वह ठीक-ठीक क्‍या है तथा वह उनसे क्‍या माँग करता है, तो लोग अनुमानों और कल्‍पनाओं का सहारा लेने लगते हैं। इस तरह के आधार से युक्त विश्‍वास को धर्म में विश्‍वास कहा जाता है। धर्म में विश्‍वास का मुख्‍यत: मतलब होता है आचरण में परिवर्तन लाने का प्रयास करना और एक मानसिक अवलंब का होना, लेकिन क्‍या इसके लिए व्‍यक्ति के जीवन के मार्ग में किसी तरह का परिवर्तन अनिवार्य होता है? उसमें न तो व्‍यक्ति के जीवन के मार्ग, ध्‍येय या दिशा में रत्ती-भर परिवर्तन होता है, न ही जीवन को जीने के उसके आधार में कोई परिवर्तन होता है। और परमेश्‍वर में विश्‍वास क्‍या है? स्‍वयं में विश्वास रखने के लिए परमेश्‍वर क्‍या परिभाषित करता है और क्‍या अपेक्षा करता है? (उसकी संप्रभुता में विश्‍वास।) यह उसके अस्तित्‍व में विश्‍वास करना और उसकी संप्रभुता में विश्‍वास करना है—यह मूलभूत है। जो लोग परमेश्‍वर में विश्‍वास करते हैं उनसे परमेश्‍वर क्या अपेक्षा रखता है? वह किस चीज़ से सम्‍बन्ध रखता है? (ईमानदार होना, सामान्‍य मनुष्‍यता रखना, सत्‍य की खोज करना, स्‍वभाव में रूपांतरण का प्रयास करना और परमेश्‍वर को जानने की कोशिश करना।) और क्‍या लोगों से उनकी बातों और बाह्य आचरण के संदर्भ में भी कुछ अपेक्षित होता है? बाहरी तौर पर, तुमसे अपेक्षा की जाती है कि तुममें बुनियादी संतोचित विनय हो और तुम सामान्‍य मनुष्‍यता की राह पर चलो। और परमेश्‍वर में विश्‍वास करने की क्‍या परिभाषा है? परमेश्‍वर में विश्‍वास करना परमेश्‍वर के वचनों के प्रति आज्ञाकारी होना है; यह परमेश्‍वर द्वारा बोले गये वचनों के अनुरूप होना, उनके अनुरूप जीना, अपने कर्तव्‍यों का पालन करना और सामान्‍य मनुष्‍यता से संबंधित सारी गतिविधियों में शामिल होना है। इसका अभिप्राय यह है कि परमेश्‍वर में विश्‍वास करना परमेश्‍वर का अनुसरण करना है, परमेश्‍वर तुमसे जो कराना चाहता है वह करना और उस तरह का जीवन जीना है जैसा परमेश्‍वर चाहता है कि तुम जियो। परमेश्‍वर में विश्‍वास करना उसकी बतायी राह पर चलना है। और ऐसा करने में, क्‍या लोगों के जीवन का ध्‍येय और दिशा उन लोगों के जीवन के ध्‍येय और दिशा से पूरी तरह भिन्‍न नहीं होते जो धर्म में विश्‍वास करते हैं? परमेश्‍वर में विश्‍वास के लिए क्‍या अनिवार्य है? लोगों को सामान्‍य मनुष्‍यता की राह पर चलना चाहिए; उन्‍हें परमेश्‍वर के वचनों की आज्ञा माननी चाहिए, भले ही परमेश्‍वर उनसे कुछ भी करने को क्‍यों न कहे; और उन्‍हें परमेश्‍वर के वचनों के अनुरूप अभ्‍यास करना चाहिए। ये सारी चीजे़ं परमेश्‍वर के वचनों में शामिल हैं। परमेश्‍वर के वचन क्‍या हैं? (सत्‍य।) सत्‍य परमेश्‍वर में विश्‍वास का अंग है; वह जीवन का स्रोत और सही मार्ग है; वह उस मार्ग का हिस्‍सा है जिसे लोग अपने जीवन में अपनाते हैं; क्‍या धर्म में विश्‍वास में इनमें से कोई भी चीज़ शामिल है? नहीं। धर्म में विश्‍वास करने के लिए महज़ बाहरी स्‍तर पर अच्‍छा आचरण करना, खुद को संयमित रखना, नियमों का पालन करना, और एक मानसिक अवलंब का होना भर काफी है। अगर लोग अच्‍छा आचरण करते हैं और उनके पास एक मानसिक संबल और अवलंब है, तो क्‍या उनके जीवन का मार्ग बदल जाता है? (नहीं।) कुछ लोग कहते हैं, "धर्म में विश्‍वास करना और परमेश्‍वर में विश्‍वास करना एक ही बात है।" तो क्‍या वे परमेश्‍वर का अनुसरण करते हैं? धर्म में विश्‍वास महज़ आचरण-जन्य बदलाव की कोशिश है, जो एक मानसिक अवलंब तलाशने से ज्‍़यादा कुछ नहीं है और उसमें कोई सत्य शामिल नहीं होता। परिणामस्‍वरूप, इन लोगों के स्‍वभाव में कोई बदलाव नहीं आ सकता। वे सत्‍य को अमल में लाने में या किसी तरह का तात्विक परिवर्तन लाने में अक्षम होते हैं, उन्हें परमेश्‍वर का सच्‍चा ज्ञान नहीं होता। जब कुछ लोग धर्म में विश्‍वास करते हैं, तो उनका आचरण चाहे कितना ही अच्‍छा क्‍यों न हो, उनका मानसिक अवलंब चाहे कितना ही मज़बूत क्‍यों न हो, क्‍या वे परमेश्‍वर का अनुसरण करते हैं? (नहीं।) फिर वे किसका अनुसरण करते हैं? वे शैतान का अनुसरण करते हैं। और वे जिस तरह का जीवन जीते हैं, जिन चीज़ों की तलाश, आकांक्षा, अभ्‍यास करते हैं और अपने जीवन के लिए जिन चीज़ों पर निर्भर करते हैं, उनका आधार क्‍या होता है? वह आधार पूरी तरह से शैतान का भ्रष्‍ट स्‍वभाव और उसका सार होता है। वे स्‍वयं जिस तरह का आचरण करते हैं और जिस तरह दूसरों से बर्ताव करते हैं, वह शैतान की जीवन-शैली के तर्क और फलसफे के अनुरूप होता है; उनकी हर बात एक झूठ होती है, उसमें सत्‍य का रत्ती-भर भी अंश नहीं होता; उनके शैतानी स्‍वभाव में तनिक भी बदलाव नहीं आया होता, और वे शैतान का ही अनुसरण करते हैं। उनकी जीवन-दृष्टि, मूल्‍य, स्थितियों से पेश आने के उनके तौर-तरीके और उनके कार्यकलापों के सिद्धान्‍त, सभी कुछ उनकी शैतानी प्रकृति की अभिव्‍यक्तियाँ होते हैं; उनके बाहरी आचरण में सिर्फ एक छोटा-सा बदलाव आता है; उनके जीवन के मार्ग में, उनके जीने के ढंग में या उनके दृष्टिकोण में ज़रा-सा भी परिवर्तन नहीं आता। अगर तुम लोग परमेश्‍वर में सच्‍चा विश्‍वास करते हो, तो परमेश्‍वर में कई वर्षों तक विश्‍वास करने के बाद तुम में वास्‍तव में क्‍या परिवर्तन आया है? तुम्‍हारे जीवन की बुनियाद परिवर्तन की प्रक्रिया से गुज़रती है। तुम्‍हारे जीने का आधार क्‍या है? तुम हर रोज़ जो कुछ करते और कहते हो, वह किस चीज़ से संचालित होता है? वह सब किस चीज़ पर आधारित होता है? (वह सब परमेश्‍वर के वचनों और सत्‍य पर आधारित होता है।) उदाहरण के लिए, तुम शायद अब झूठ नहीं बोलते—इसका क्‍या आधार है? तुम अब उस तरह बात क्‍यों नहीं करते? (क्‍योंकि परमेश्‍वर को यह अच्‍छा नहीं लगता।) तुम उस तरह नहीं बोलते या आचरण नहीं करते, तो इसका एक आधार है और वह आधार है परमेश्‍वर का वचन, वह जो परमेश्‍वर चाहता है और सत्‍य। इसलिए, क्‍या इस तरह के व्‍यक्ति के जीवन का मार्ग वही रह जाता है? सारांश यह है : धर्म में विश्‍वास क्‍या है? और परमेश्‍वर में विश्‍वास क्‍या है? जब लोग धर्म में विश्‍वास करते हैं, तो वे शैतान का अनुसरण करते हैं; जब वे परमेश्‍वर में विश्‍वास करते हैं, तो वे परमेश्‍वर का अनुसरण करते हैं। यही अंतर है। आज, तुम परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य निभाते हो; तुम धर्म में विश्वास करते हो, या परमेश्वर में? इसमें अंतर क्या है? यह किस पर निर्भर करता है? यह उस मार्ग पर निर्भर करता है जिस पर तुम चलते हो। यदि तुम अच्छे व्यवहार की, एक मनोवैज्ञानिक बैसाखी की, नियमों के अनुपालन की, और निजी लाभ के लिए साज़िशों की तलाश करते हो और यदि तुम ज़रा भी सत्य की तलाश नहीं करते हो, बल्कि केवल एक ऐसा व्यक्ति बनने की कोशिश करते हो जो भला नज़र आता हो, और तुम्हारे प्रकृति-सार, या भ्रष्ट स्वभाव में थोड़ा-सा भी बदलाव नहीं होता है, तो तुम धर्म में विश्वास करते हो। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे उन सभी सच्चाइयों को स्वीकार करने में सक्षम होते हैं जिन्हें परमेश्वर व्यक्त करता है; वे सत्य के अनुसार स्वयं पर आत्म-चिंतन कर स्वयं को जानने में और वास्तव में पश्चाताप करने में सक्षम होते हैं, और अंततः, वे परमेश्वर के वचनों के द्वारा जीने में, परमेश्वर का आज्ञा-पालन करने में, और परमेश्वर की उपासना करने में सक्षम हो जाते हैं—केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर में सच्चा विश्वास रखते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'धर्म में विश्‍वास से कभी उद्धार नहीं होगा' से उद्धृत

परमेश्वर में विश्वास, धर्म और धार्मिकता में विश्वास में क्या अंतर है? हर कोई धर्म में इसलिए विश्वास करने की सोचता है क्योंकि उस व्यक्ति के पास आजीविका नहीं है, शायद उसके घर में समस्याएँ हैं। अन्यथा, बात यह होती है कि इंसान किसी चीज का सहारा चाहता है, वह आध्यात्मिक पोषण पाना चाहता है। धर्म में विश्वास अक्सर बस इसलिए किया जाता है ताकि लोग परोपकारी बनें, दूसरों की मदद करें, दूसरों के प्रति दयालु बनें, पुण्य संचित करने के लिए सत्कर्म करें, हत्या या आगजनी न करें, बुरे काम न करें, लोगों को न मारें या उन्हें शाप न दें। चोरी या लूटपाट न करें और धोखा या ठगी न करें। लोगों के मन में "धर्म में विश्वास" की अवधारणा यही होती है। आज तुम लोगों के मन में धर्म में विश्वास की अवधारणा कितनी है? क्या तुम लोग बता सकते हो कि क्या इन विचारों का होना धर्म में विश्वास है? क्या आस्था रखने की अवस्था और धर्म में विश्वास रखने की अवस्था में कोई अंतर है? धर्म में विश्वास और परमेश्वर में विश्वास में क्या अंतर है? जब तुमने पहली बार परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू किया, तो हो सकता है तुम्हें लगा हो कि धर्म में विश्वास रखना और परमेश्वर में विश्वास रखना एक ही बात है। लेकिन आज, पाँच साल से अधिक समय से परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद, तुम्हें क्या लगता है कि वास्तव में विश्वास रखना क्या है? क्या यह धर्म में विश्वास रखने से अलग है? धर्म में विश्वास रखने का अर्थ है अपनी आत्मा को प्रसन्नता देने और सुख देने के लिए कुछ विशेष प्रकार की रस्मों का पालन करना। यह इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देता कि लोग किस मार्ग पर चलें, लोग किस साधन से जिएँ या वे जीवन कैसे जिएँ। कहने का तात्पर्य यह है कि तुम्हारे हृदय में, तुम्हारे आंतरिक जगत में कोई बदलाव नहीं आता; तुम तुम ही रह जाते हो, तुम्हारी प्रकृति और सार वही रहते हैं। तुमने परमेश्वर से प्राप्त होने वाले सत्यों को स्वीकार कर उन्हें अपना जीवन नहीं बनाया है, बल्कि तुमने मात्र कुछ सत्कर्म किए हैं या रस्मों और नियमों का पालन किया है। तुम मात्र धर्म में विश्वास से संबंधित कुछ गतिविधियों में लिप्त रहे हो—बस, इतना ही किया है। तो परमेश्वर में विश्वास रखने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि इस दुनिया में तुम जैसे जीते जो, उसमें बदलाव आना, इसका मतलब है कि तुम्हारे अस्तित्व के मूल्य और जीवन के लक्ष्यों में पहले से ही बदलाव आ चुका है। तुम पहले अपने पूर्वजों का सम्मान करने, भीड़ से अलग दिखने, अच्छा जीवन जीने, प्रसिद्धि और धन के लिए प्रयास करने जैसी चीजों के लिए जीते थे। आज तुमने उन चीजों को छोड़ दिया है। अब तुम शैतान का अनुसरण नहीं करते, बल्कि तुम इसका त्याग करना चाहते हो, इस दुष्ट प्रवृत्ति का त्याग करना चाहते हो। तुम परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हो, तुम सत्य स्वीकार करते हो, तुम सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलते हो। तुम्हारे जीवन की दिशा पूरी तरह से बदल चुकी है। यह जीवन को अलग दृष्टिकोण से देखना है, अलग तरह की जीवन-शैली का होना है, सृष्टिकर्ता का अनुसरण करना है, सृष्टिकर्ता के नियमों और व्यवस्थाओं को स्वीकार करना और उनके प्रति समर्पित होना है, सृष्टिकर्ता के उद्धार को स्वीकार करना है, और अंततः एक सच्चा सृजित प्राणी बनना है। क्या यह तुम्हारी जीवन-शैली को बदलना नहीं है? यह तुम्हारे पिछले लक्ष्य, जीवन-शैली और तुम्हारे सभी कामों के पीछे की प्रेरणाओं और इरादों के बिल्कुल विपरीत है—ये पूरी तरह से उनसे अलग है, यहाँ तक कि उनके आस-पास भी नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन जीने के लिए लोग ठीक-ठीक किस पर भरोसा करते रहे हैं' से उद्धृत

परमेश्वर में विश्वास के वर्णन का सबसे सरल तरीका है इस भरोसे का होना कि एक परमेश्वर है, और इस आधार पर, उसका अनुसरण करना, उसका आज्ञा-पालन करना, उसके प्रभुत्व, आयोजनों और व्यवस्थाओं को स्वीकार करना, उसके वचनों को सुनना, उसके वचनों के अनुसार जीवन जीना, हर चीज़ को उसके वचनों के अनुसार करना, एक सच्चा सृजित प्राणी बनना, और उसका भय मानना और बुराई से दूर रहना; केवल यही परमेश्वर में सच्चा विश्वास होता है। परमेश्वर के अनुसरण का यही अर्थ होता है। तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, लेकिन, अपने हृदय में, तुम परमेश्वर के वचनों को स्वीकार नहीं करते, और तुम उसके प्रभुत्व, आयोजनों और व्यवस्थाओं को स्वीकार नहीं करते हो। यदि परमेश्वर जो करता है उसके बारे में तुम हमेशा अवधारणाएँ रखते हो, और तुम हमेशा वह जो करे उसे ग़लत समझते हो, और इसके बारे में शिकायत करते हो; यदि तुम हमेशा असंतुष्ट रहते हो, और वह जो भी करे उसे तुम हमेशा अपनी ही अवधारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग करके मापते और उनसे पेश आते हो; अगर तुम्हारे पास हमेशा अपनी ही समझ होती है—तो यह परेशानी का कारण होगा। तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं कर रहे हो, और तुम्हारे पास वास्तव में उसका अनुसरण करने का कोई मार्ग नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करना ऐसा नहीं होता है।

यथार्थ में, परमेश्वर में विश्वास क्या होता है? क्या धर्म में विश्वास परमेश्वर में विश्वास के बराबर होता है? जब लोग धर्म को मानते हैं, तो वे शैतान का अनुसरण करते हैं। केवल जब वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तभी वे परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और केवल वे जो मसीह का अनुसरण करते हैं, वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं। क्या जो कभी भी परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में स्वीकार नहीं करता, एक ऐसा व्यक्ति हो सकता है जो परमेश्वर में विश्वास करता हो? यह किसी काम का नहीं होता, चाहे वो कितने ही वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करता रहा हो। कोई व्यक्ति जो हमेशा अपने विश्वास में धार्मिक अनुष्ठान में संलग्न रहता है, लेकिन सत्य का अभ्यास नहीं करता है, वह परमेश्वर में विश्वास नहीं करता है, और परमेश्वर उसे स्वीकार नहीं करता है। परमेश्वर किस आधार पर तुम्हें स्वीकार करता है? वह तुम्हें इस बात के आधार पर स्वीकार करता है कि क्या तुम सभी मामलों में उसकी अपेक्षाओं के अनुसार काम करते हो। उसकी स्वीकृति उसके वचनों के अनुसार दी जाती है, न कि इस आधार पर कि तुम्हारे बाह्य व्यवहार में कितने बदलाव हुए हैं, या तुम उसके लिए भाग-दौड़ करने में कितना समय लगाते हो, बल्कि इस आधार पर कि तुम किस राह पर चलते हो, और क्या तुम सत्य की तलाश करते हो। ऐसे कई लोग हैं जो कहते हैं कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं और जो परमेश्वर के लिए प्रशंसा के शब्द बोलते हैं—लेकिन, वे दिल से परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों से प्रेम नहीं करते, और न ही उन्हें सत्य में दिलचस्पी होती है। अपने दिलों में वे हमेशा यह मानते हैं कि केवल अगर वे शैतान के दर्शन और बाहरी दुनिया के विभिन्न सिद्धांतों द्वारा जीते हैं, तभी वे सामान्य होंगे, और खुद को बचाने में सक्षम होंगे, और यह कि केवल इस तरह से रहने से ही, इस दुनिया में उनके जीवन का कोई मोल होगा। क्या यह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर में विश्वास करता है और उसका अनुसरण करता है? प्रसिद्ध, महान विभूतियों की सभी बातें सुनने में विशेष रूप से दार्शनिक लगती हैं और लोगों को धोखा देने में विशेष रूप से सक्षम होती हैं। यदि तुम उन्हें सत्य मानते हो और सूत्रवाक्यों की तरह उनका पालन करते हो, लेकिन, जब सवाल आता है परमेश्वर के वचनों का, परमेश्वर के सबसे सामान्य वचनों का, जो यह चाहते हैं कि तुम एक ईमानदार व्यक्ति बनो, कि तुम अपने स्वयं के आवंटित स्थान पर निष्ठापूर्वक संलग्न रहो और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाओ, और तुम स्थिर बने रहो—तब तुम उनका अभ्यास करने में असमर्थ रहते हो, और तुम उन्हें सच्चाई के रूप में नहीं मानते हो, तो तुम परमेश्वर के कोई अनुयायी नहीं हो। तुम यह कह सकते हो कि तुमने उसके वचनों का अभ्यास किया है, लेकिन क्या होगा यदि परमेश्वर तुम पर सच के लिए दबाव डाले और पूछे : "तुमने किसका अभ्यास किया है? उन वचनों को किसने कहा था जिनका तुम अभ्यास करते हो? उन सिद्धांतों का आधार क्या है जिनका तुम पालन करते हो?" यदि वह आधार परमेश्वर के वचन नहीं, तो ये शैतान के शब्द हैं; जिन्हें तुम जी रहे हो, वे शैतान के शब्द हैं, तुम फिर भी यह कहते हो कि तुम सत्य का अभ्यास करते हो और परमेश्वर को संतुष्ट करते हो, क्या यह उसके खिलाफ़ निंदा नहीं है? परमेश्वर कहता है कि लोगों को ईमानदार होना चाहिए, फिर भी ऐसे लोग हैं जो इस बात पर विचार नहीं करते कि ईमानदार होने में क्या शामिल है, कैसे उन्हें ईमानदारी का अभ्यास करना है, या उन चीज़ों में से जिन्हें वे जी रहे हैं और प्रकट करते हैं, कौन-सी ईमानदार नहीं हैं, और कौन-सी हैं। वे परमेश्वर के वचनों में सत्य के सार पर विचार नहीं करते हैं, लेकिन अविश्वासियों की एक पुस्तक ढूँढ लेते हैं और, इसे पढ़कर, वे कहते हैं, "ये अच्छे शब्द हैं—परमेश्वर के वचनों से भी बेहतर। 'निष्कपट लोग हमेशा जीतते हैं'—क्या ये ठीक वैसा नहीं जैसा कि परमेश्वर ने कहा है? यह भी सच ही है!" इस तरह, वे इन वचनों का पालन करते हैं। जब वे इन वचनों का पालन करते हैं तो वे कैसे जीते हैं? क्या वे सच्चाई की वास्तविकता को जीने में सक्षम होते हैं? क्या ऐसे कई लोग हैं? वे थोड़ा ज्ञान प्राप्त करते हैं, कुछ किताबें पढ़ लेते हैं, और थोड़ी अंतर्दृष्टि प्राप्त करते हैं, और वे कोई प्रसिद्ध उक्ति या लोकप्रिय कहावत सुनते हैं और इन्हें सत्य मान लेते हैं। वे इन वचनों के अनुसार कार्य करते हैं, और उन्हें अपने कर्तव्यों और परमेश्वर में विश्वास के अपने जीवन पर लागू करते हैं, और यहाँ तक कि वे सोचते हैं कि यह परमेश्वर को संतुष्ट करता है। क्या यह हाथ की सफ़ाई नहीं है? क्या यह प्रवंचना नहीं है? यह ईश-निन्दा है! लोगों में इसकी बहुतायत है। वे मधुर लगने वाले, सही प्रतीत होने वाले लोक-सिद्धांतों का पालन करते हैं, मानो वे ही सत्य हों। वे परमेश्वर के वचनों को एक तरफ़ रख देते हैं और उनकी ओर कोई ध्यान नहीं देते हैं, और, चाहे वे उन्हें जितनी भी बार पढ़ लें, वे उन्हें गंभीरता से नहीं लेते हैं या उन्हें सच्चाई नहीं मानते। क्या ऐसा करने वाला वो है जो परमेश्वर पर विश्वास करता है? क्या वह परमेश्वर का अनुसरण करता है? ऐसा व्यक्ति धर्म को मानता है; ऐसे लोग शैतान का अनुसरण करते हैं! वे दिल से सोचते हैं कि शैतान द्वारा कहे गए शब्दों में दर्शन होता है, कि इन शब्दों में गहरा अर्थ होता है, कि वे आधिकारिक शब्द हैं, बुद्धिमत्तापूर्ण कथन हैं, और, चाहे वे लोग और कुछ भी त्याग दें, वे इन शब्दों की कभी उपेक्षा नहीं कर सकते। ऐसा करना तो, उनके लिए, जैसे कि अपने जीवन को गंवाना, या उनके दिलों को खोद निकालना होगा। यह किस तरह का व्यक्ति है? यह वो व्यक्ति है जो शैतान का अनुसरण करता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'धर्म में विश्‍वास से कभी उद्धार नहीं होगा' से उद्धृत

यदि कोई परमेश्वर में विश्वास तो करता है लेकिन उसके वचनों पर ध्यान नहीं देता है, सत्य को स्वीकार नहीं करता, या उसकी व्यवस्थाओं और आयोजनों के प्रति समर्पण नहीं करता; यदि वह केवल कुछ अच्छे व्यवहारों का प्रदर्शन करता है, लेकिन देह की इच्छाओं का त्याग करने में असमर्थ है, और अपने अभिमान या स्वार्थ को बिल्कुल भी नहीं त्यागता है; यदि, दिखावे भर के लिए वह अपना कर्तव्य तो निभाता है, फिर भी वह अपने शैतानी स्वभाव के द्वारा जीता है, और उसने शैतान के दर्शन और अस्तित्व के तौर-तरीकों को उसने ज़रा-भी नहीं छोड़ा है, और वह बदलता नहीं है—तो वह संभवतः परमेश्वर में कैसे विश्वास कर सकता है? वह धर्म में आस्था होती है। इस तरह के लोग सतही रूप से चीज़ों को त्यागते हैं और अपने आप को खपाते हैं, लेकिन जिस मार्ग पर वे चलते हैं और जो कुछ वे करते हैं उसका स्रोत और उसकी प्रेरणा, परमेश्वर के वचनों या सत्य पर आधारित नहीं होती; इसके बजाय, वे निरंतर स्वयं अपनी ही कल्पनाओं, इच्छाओं और व्यक्तिपरक मान्यताओं के अनुसार कार्य करते रहते हैं, और शैतान के दर्शन और स्वभाव ही लगातार उनके अस्तित्व और काम के आधार बने रहते हैं। उन मामलों में जिनकी सच्चाई वे नहीं समझते, वे उसकी तलाश नहीं करते हैं; उन मामलों में जिनकी सच्चाई वे नहीं समझते, वे उसका अभ्यास नहीं करते हैं, न तो वे परमेश्वर को महान मानकर उसे ऊँचा उठाते हैं, न ही सत्य को संजोते हैं। हालाँकि नाम के लिए वे परमेश्वर के अनुयायी होते हैं, यह केवल कहने के लिए होता है; उनके कामों का सार उनके भ्रष्ट स्वभावों की अभिव्यक्ति के अलावा और कुछ नहीं होता है। इस बात का कोई संकेत नहीं मिलता है कि उनका उद्देश्य और इरादा सत्य का अभ्यास करना और परमेश्वर के वचनों के अनुसार काम करने का है। जो लोग अपने हितों को ही सब से ऊपर मानते हैं, जो पहले अपनी ही इच्छाओं और इरादों को पूरा करते हैं—क्या वे लोग वो हैं जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं? (नहीं।) और क्या वे लोग जो परमेश्वर का अनुसरण नहीं करते, अपने स्वभावों में बदलाव ला सकते हैं? (नहीं।) और यदि वे अपने स्वभावों को बदल नहीं सकते, तो क्या वे दयनीय नहीं हैं? ... ज्यादातर लोगों के पास जब कोई समस्या नहीं होती है, जब उनके साथ सब कुछ सुचारु रूप से चल रहा होता है, तो उन्हें लगता है कि परमेश्वर शक्तिशाली और धार्मिक है, और मनोहर है। जब परमेश्वर उनका परीक्षण करता है, उनके साथ निपटता है, उन्हें प्रताड़ित करता है, और अनुशासित करता है, जब वह उन्हें अपने स्वार्थों को अलग कर देने के लिए, देह-सुख का त्याग करने और सत्य का अभ्यास करने के लिए कहता है, जब परमेश्वर उन पर कार्य करता है, और उनके भाग्य और उनके जीवन को आयोजित और शासित करता है, वे विद्रोही बन जाते हैं, और अपने और परमेश्वर के बीच अलगाव पैदा करते हैं; वे अपने और परमेश्वर के बीच टकराव और एक खाई पैदा कर लेते हैं। ऐसे समय में, उनके दिलों में, परमेश्वर ज़रा भी मनोहर नहीं होता; वह बिलकुल भी शक्तिशाली नहीं होता, क्योंकि वह जो करता है, उससे उनकी इच्छाओं की पूर्ति नहीं होती है। परमेश्वर उन्हें दुखी करता है; वह उन्हें परेशान करता है; वह उनके लिए कष्ट और पीड़ा लाता है; वह उन्हें अशांत महसूस कराता है। इसलिए वे परमेश्वर के प्रति बिलकुल ही समर्पण नहीं करते, इसके बजाय, वे उसके प्रति विद्रोह करते हैं और उसे नकारते हैं। ऐसा करके क्या वे सत्य का अभ्यास कर रहे हैं? क्या वे परमेश्वर के मार्ग पर चल रहे हैं? क्या वे परमेश्वर का अनुसरण करते हैं? नहीं। इसलिए, चाहे परमेश्वर के कार्य के बारे में तुम्हारी कितनी भी धारणाएँ और कल्पनाएँ हों, और चाहे तुमने पहले अपनी मर्जी के मुताबिक जैसे भी काम किया हो और परमेश्वर के खिलाफ़ जैसे भी बग़ावत की हो, अगर तुम वास्तव में सत्य की तलाश करते हो, और परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करते हो, और परमेश्वर के वचनों द्वारा काट-छाँट और निपटने को स्वीकार करते हो; अगर, हर चीज़ में जिसे परमेश्वर आयोजित करता है, तुम उसके तरीके का पालन करने में सक्षम होते हो, परमेश्वर के वचनों को मानते हो, उसकी इच्छा की तलाश करते हो, उसके वचनों और उसकी इच्छा के अनुसार अभ्यास करते हो, समर्पण की कोशिश करने में सक्षम होते हो, और अपनी समस्त इच्छाओं, अभिलाषाओं, विचारों, अभिप्रेरणाओं, और परमेश्वर के प्रति अपने विरोध को दूर कर सकते हो—केवल तभी तुम परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हो! तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, लेकिन तुम जो भी करते हो, वह सब अपनी मर्जी के मुताबिक़ करते हो। तुम्हारी हर क्रिया में, तुम्हारे अपने उद्देश्य, तुम्हारी अपनी योजनाएँ होती हैं; तुम इसे परमेश्वर पर नहीं छोड़ देते। तो क्या परमेश्वर अभी भी तुम्हारा परमेश्वर है? यदि परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर नहीं है, तो, जब तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, तब क्या ये खोखले शब्द नहीं होते हैं? क्या ऐसे शब्द लोगों को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश नहीं हैं? तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, लेकिन तुम्हारे सारे कार्य और व्यवहार, जीवन पर तुम्हारा दृष्टिकोण, तुम्हारे मूल्य, और तुम्हारे दृष्टिकोण और सिद्धांत जिनके साथ तुम मुद्दों के साथ पेश आते और उन्हें संभालते हो, वे सभी शैतान से आते हैं—तुम यह सब पूरी तरह से शैतान के सिद्धांतों और तर्क के अनुसार संभालते हो। तो, क्या तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'धर्म में विश्‍वास से कभी उद्धार नहीं होगा' से उद्धृत

यदि, अपने विश्वास में, लोग सत्य को पालन किए जाने वाले विनियमों के एक समुच्चय के रूप में मानते हैं, तो क्या उनका विश्वास धार्मिक अनुष्ठानों में बदलने के लिए उत्तरदायी नहीं है? और इस तरह के धार्मिक अनुष्ठानों और ईसाई धर्म के बीच क्या अंतर है? वे चीज़ों को जिस तरह से कहते हैं उसमें अधिक गहरे और अधिक प्रगतिशील हो सकते हैं, लेकिन यदि उनका विश्वास सिर्फ विनियमों का एक समुच्चय और एक प्रकार का अनुष्ठान बन जाता है, तो क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि यह ईसाई धर्म में बदल गया है? (हाँ, ऐसा होता है।) पुरानी और नई शिक्षाओं के बीच अंतर हैं, लेकिन यदि शिक्षाएँ एक तरह के सिद्धांत से ज्यादा कुछ नहीं हों और लोगों के लिए मात्र अनुष्ठान का, सिद्धान्त, का एक रूप बन गयी हों—और, इसी तरह से, यदि वे इससे सत्य प्राप्त नहीं कर सकते हैं या सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर सकते हैं, तो क्या उनका विश्वास केवल ईसाई धर्म के समान नहीं है? सार रूप में, क्या यह ईसाई धर्म नहीं है? (हाँ, है।) इसलिए, तुम लोगों के व्यवहार में और अपने कर्तव्यों को करने में, किन चीज़ों में तुम्हारे दृष्टिकोण और स्थितियाँ ईसाई धर्म में विश्वासियों के समान या उसी तरह की हैं? (विनियमों का पालन करने में, और वचनों और सिद्धान्तों से सज्जित होने में।) (आध्यात्मिक होने के दिखावे और अच्छा व्यवहार दर्शाने वाला होने, और धर्मपरायण और विनम्र होने पर ध्यान केन्द्रित करने में।) तू बाहरी तौर पर अच्छे व्यवहार वाला होने की तलाश करता है, अपने आप को एक प्रकार के आध्यात्मिकता के आभास से भरने, आध्यात्मिक सिद्धान्त बोलने, ऐसी चीज़ों को कहने जो आध्यात्मिक रूप से सही हों, ऐसी चीज़ों को करने जो सापेक्ष रूप से मानव अवधारणाओं और कल्पनाओं में अनुमोदित हैं, और धार्मिक होने का ढोंग करने के लिए अपनी पूरी कोशिश करता है। तू जो कुछ कहता और करता है उसमें तू ऊँचाई से वचनों और सिद्धांतों को बोलता है, लोगों को अच्छा करने, धार्मिक लोग बनने, और सत्य को समझने के लिए सिखाता है; तू आध्यात्मिक होने के बारे में हवा लगाता है, और तू एक सतही आध्यात्मिकता टपकाता है। हालाँकि अभ्यास में, तूने कभी भी सत्य की तलाश नहीं की है; जैसे ही तू किसी समस्या का सामना करता है, तो तू परमेश्वर को एक तरफ उछालते हुए, पूरी तरह से मानवीय इच्छा के अनुसार कार्य करता है। तूने कभी भी सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं किया, तू कभी भी यह नहीं समझ पाया है कि सत्य में किस बारे में बोला गया है, परमेश्वर की इच्छा क्या है, मनुष्य से उसे किन मानकों की अपेक्षा है—तूने इन मामलों को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया है या अपने को उनके साथ चिंतित नहीं किया है। क्या लोगों के ऐसे बाहरी कृत्य और आंतरिक स्थितियाँ—अर्थात्, इस प्रकार का विश्वास—परमेश्वर के लिए भय मानने और बुराई से दूर रहने को शामिल करता है? यदि लोगों की आस्था और उनके सत्य के अनुसरण के बीच कोई संबंध नहीं है, तो क्या वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं या नहीं करते हैं? इस बात की परवाह किए बिना कि वे लोग जिनका सत्य का अनुसरण करने से कोई संबंध नहीं है कितने वर्षों तक विश्वास कर सकते हैं, क्या सच्ची, परमेश्वर का भय मानने वाली श्रद्धा प्राप्त कर सकते हैं अथवा नहीं और बुराई से दूर रह सकते हैं या नहीं? (वे ऐसा नहीं कर सकते हैं।) तो ऐसे लोगों का बाहरी व्यवहार क्या होता है? वे किस प्रकार के मार्ग पर चल सकते हैं? (फरीसियों का मार्ग।) वे अपने आप को किस चीज़ से सज्जित करने में अपने दिनों को बिताते हैं? क्या ये चीज़ें वचन और सिद्धांत नहीं हैं? क्या वे अपने आप को फरीसियों की तरह अधिक बनाने, अधिक आध्यात्मिक, और ऐसे लोगों की तरह अधिक बनाने के लिए जो कथित रूप से परमेश्वर की सेवा करते हैं, अपने आप को वचनों और सिद्धांतों से सज्जित, सुशोभित करते हुए, अपने दिनों को नही बिताते हैं? बस इन सभी पद्धतियों की प्रकृति क्या है? क्या यह परमेश्वर की आराधना करना है? क्या यह उस में वास्तविक विश्वास है? (नहीं, यह विश्वास नहीं है।) तो वे क्या कर रहे हैं? वे परमेश्वर को धोखा दे रहे है; वे बस एक प्रक्रिया के चरण को पूरा कर रहे हैं, और धार्मिक अनुष्ठानों में संलग्न हो रहे हैं। वे विश्वास के ध्वज को लहरा रहे हैं और धार्मिक संस्कारों को निभा रहे हैं, आशीष पाने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश कर रहे हैं। वे परमेश्वर की आराधना बिल्कुल नहीं करते हैं। अंत में, क्या ऐसे लोगों के समूह का अंत ठीक कलीसिया के भीतर के उन लोगों की तरह नहीं होगा जो कथित रूप से परमेश्वर की सेवा करते हैं, और जो कथित रूप से परमेश्वर को मानते और उसका अनुसरण करते हैं?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'यदि तू हर समय परमेश्वर के सामने रह सकता है केवल तभी तू उद्धार के पथ पर चल सकता है' से उद्धृत

जिस पथ का तुम लोग अनुसरण करते हो, अगर वह बिलकुल वही है जिसका धर्मनिष्ठ लोग अनुसरण करते हैं, तो वह तुम लोगों को ईसाइयत में विश्वास करने वाले बना देता है; तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते और तुम उसके कार्य का अनुभव नहीं कर रहे। कुछ लोग, जिन्होंने लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास नहीं किया है, उन विश्वासियों की प्रशंसा करते हैं जिन्होंने ऐसा किया है, जिनकी वाणी पुख्ता है। वे ऐसे लोगों को वहाँ बैठे देखते हैं और दो-तीन घंटे तक आसानी से बोल सकते हैं। ये उनसे सीखने लगते हैं—आध्यात्मिक शब्दावली और हाव-भाव, और यह भी कि ऐसे व्यक्ति कैसे बोलते और व्यवहार करते हैं। तब ये भी आध्यात्मिक शब्दों के कुछ अंश याद करने का निश्चय कर लेते हैं, और तब तक लगे रहते हैं, जब तक कि उनके विश्वास के वर्ष इतने हो जाएँ कि वे कहीं बैठकर धाराप्रवाह बोलते हुए विस्तार से अपना अंतहीन व्याख्यान दे सकें। लेकिन अगर कोई उसे ध्यान से सुने, तो वह सब बकवास होता है, सब खोखले शब्द, मात्र अक्षर और सिद्धांत; और वे स्पष्ट रूप से धार्मिक ठग होते हैं, जो अपने-आपको और दूसरों को धोखा देते हैं। कितने दुख की बात है! तुम लोगों को उस रास्ते पर नहीं चलना चाहिए, जिस पर चलने के बाद सिर्फ बरबादी हाथ लगती है और जिससे लौटना मुश्किल है। ऐसी चीजों का चाव रखना, उन्हें अपनी जिंदगी समझना, और जहाँ भी जाओ वहाँ इसी पैमाने पर दूसरों की तुलना में अपना मूल्यांकन करना; एक भ्रष्ट और शैतानी स्वभाव से भी बढ़कर कुछ आध्यात्मिक सिद्धांतों और पाखंड के तत्वों को अपना लेना—ऐसा व्यक्ति सिर्फ घृणित ही नहीं होता, बल्कि अत्यधिक घृणित, रुग्ण और निर्लज्ज होता है, और दूसरों के लिए उसे देखना भी असहनीय होता है। इसलिए, कभी प्रभु यीशु का अनुसरण करने वालों का संप्रदाय अब ईसाइयत कहलाता है। यह एक संप्रदाय है, और परमेश्वर में अपने विश्वास में वे सख्ती से औपचारिकता से चिपके रहने के अलावा कुछ नहीं करते। उनके जीवन-स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आता, और वे सत्य की खोज करने वाले लोग नहीं हैं; उनकी खोज वह सत्य, मार्ग और जीवन नहीं है, जो परमेश्वर से आता है, बल्कि वे फरीसी बनने की चाह रखते हैं, और परमेश्वर के प्रति शत्रुता रखने वाले हैं—यह लोगों का वह समूह है, जिसे अब ईसाइयत के रूप में परिभाषित किया जाता है। उनके समूह को "ईसाइयत" कैसे कहा जाने लगा? ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि वे स्वयं को पवित्र, आध्यात्मिक और दयालु, और परमेश्वर के सच्चे अनुयायी दिखाते हैं, फिर भी वे समूचे सत्य को और परमेश्वर से आने वाली सभी सकारात्मक चीजों की सच्चाई को नकारते हैं। अपने-आपको छिपाने, हथियारबंद करने और एक नकली चोगा धारण करने के लिए वे परमेश्वर द्वारा पूर्व में कहे गए वचनों का प्रयोग करते हैं, और अंतत: वे हर जगह खाने-पीने से वंचित लोगों को ठगने के लिए इन वचनों को एक प्रकार की पूंजी की तरह प्रयोग करते हैं। वे परमेश्वर के विश्वासियों का स्वांग रचते हैं और इस तरह इठलाते और डींगें मारते हुए दूसरों को ठगते हैं; वे दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा और होड़ करते हैं—उनके लिए ये चीजें महिमा और पूंजी हैं। वे परमेश्वर के आशीष और पुरस्कार भी धोखे से प्राप्त करना चाहते हैं। यही वह रास्ता है, जिसका वे अनुसरण करते हैं। उनके द्वारा इस तरह के रास्ते का अनुसरण किए जाने के कारण ही उनके समूह को अंतत: ईसाइयत के रूप में परिभाषित कर दिया जाता है। अब इसे देखते हुए, "ईसाइयत" नाम अच्छा है या बुरा? यह एक लज्जास्पद नाम है, और यह जरा भी महिमामय या भव्य नहीं है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो सत्य का अभ्यास करते हैं केवल वही परमेश्वर का भय मानने वाले होते हैं' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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