4. ईमानदार व्यक्ति बनने में अभ्यास के सिद्धांत क्या हैं

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; हर बात में उसके साथ सच्चाई से पेश आना; हर बात में उसके साथ खुलापन रखना, कभी तथ्यों को न छुपाना; अपने से ऊपर और नीचे वालों को कभी भी धोखा न देना, और परमेश्वर से लाभ उठाने मात्र के लिए काम न करना। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और शब्दों में शुद्धता रखना, न तो परमेश्वर को और न ही इंसान को धोखा देना। मैं जो कहता हूँ वह बहुत सरल है, किंतु तुम लोगों के लिए दुगुना मुश्किल है। बहुत-से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने की बजाय नरक में दंडित होना पसंद करेंगे। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि जो बेईमान हैं उनके लिए मेरे भंडार में अन्य उपचार भी है। मैं अच्छी तरह से जानता हूँ तुम्हारे लिए ईमानदार इंसान बनना कितना मुश्किल काम है। चूँकि तुम लोग बहुत चतुर हो, अपने तुच्छ पैमाने से लोगों का मूल्यांकन करने में बहुत अच्छे हो, इससे मेरा कार्य और आसान हो जाता है। और चूंकि तुम में से हरेक अपने भेदों को अपने सीने में भींचकर रखता है, तो मैं तुम लोगों को एक-एक करके आपदा में भेज दूँगा ताकि अग्नि तुम्हें सबक सिखा सके, ताकि उसके बाद तुम मेरे वचनों के प्रति पूरी तरह समर्पित हो जाओ। अंततः, मैं तुम लोगों के मुँह से "परमेश्वर एक निष्ठावान परमेश्वर है" शब्द निकलवा लूँगा, तब तुम लोग अपनी छाती पीटोगे और विलाप करोगे, "कुटिल है इंसान का हृदय!" उस समय तुम्हारी मनोस्थिति क्या होगी? मुझे लगता है कि तुम उतने खुश नहीं होगे जितने अभी हो। तुम लोग इतने "गहन और गूढ़" तो बिल्कुल भी नहीं होगे जितने कि तुम अब हो। कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं, वे "शिष्ट व्यवहार" के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, फिर भी आत्मा की उपस्थिति में वे अपने जहरीले दाँत और पँजे दिखाने लगते हैं। क्या तुम लोग ऐसे इंसान को ईमानदार लोगों की श्रेणी में रखोगे? यदि तुम पाखंडी और ऐसे व्यक्ति हो जो "व्यक्तिगत संबंधों" में कुशल है, तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को हल्के में लेने का प्रयास करता है। यदि तुम्हारी बातें बहानों और महत्वहीन तर्कों से भरी हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने से घृणा करता है। यदि तुम्हारे पास ऐसी बहुत-से गुप्त भेद हैं जिन्हें तुम साझा नहीं करना चाहते, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने राज़ और अपनी कठिनाइयाँ उजागर करने के विरुद्ध हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और तुम सरलता से अंधकार से बाहर नहीं निकल पाओगे। यदि सत्य का मार्ग खोजने से तुम्हें प्रसन्नता मिलती है, तो तुम सदैव प्रकाश में रहने वाले व्यक्ति हो। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवाकर्मी बने रहकर बहुत प्रसन्न हो, गुमनाम बनकर कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से काम करते हो, हमेशा देने का भाव रखते हो, लेने का नहीं, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक निष्ठावान संत हो, क्योंकि तुम्हें किसी फल की अपेक्षा नहीं है, तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो। यदि तुम स्पष्टवादी बनने को तैयार हो, अपना सर्वस्व खपाने को तैयार हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन दे सकते हो और दृढ़ता से अपनी गवाही दे सकते हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम्हें केवल परमेश्वर को संतुष्ट करना आता है, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि ऐसे लोग प्रकाश में पोषित किए जाते हैं और वे सदा राज्य में रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

आज, अधिकांश लोग अपने कृत्यों को परमेश्वर के सम्मुख लाने से बहुत डरते हैं; जबकि तू परमेश्वर की देह को धोखा दे सकता है, परन्तु उसके आत्मा को धोखा नहीं दे सकता है। कोई भी बात, जो परमेश्वर की छानबीन का सामना नहीं कर सकती, वह सत्य के अनुरूप नहीं है, और उसे अलग कर देना चाहिए; ऐसा न करना परमेश्वर के विरूद्ध पाप करना है। इसलिए, तुझे हर समय, जब तू प्रार्थना करता है, जब तू अपने भाई-बहनों के साथ बातचीत और संगति करता है, और जब तू अपना कर्तव्य करता है और अपने काम में लगा रहता है, तो तुझे अपना हृदय परमेश्वर के सम्मुख अवश्य रखना चाहिए। जब तू अपना कार्य पूरा करता है, तो परमेश्वर तेरे साथ होता है, और जब तक तेरा इरादा सही है और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए है, तब तक जो कुछ भी तू करेगा, परमेश्वर उसे स्वीकार करेगा; इसलिए तुझे अपने कार्य को पूरा करने के लिए अपने आपको ईमानदारी से समर्पित कर देना चाहिए। जब तू प्रार्थना करता है, यदि तेरे हृदय में परमेश्वर के लिए प्रेम है, और यदि तू परमेश्वर की देखभाल, संरक्षण और छानबीन की तलाश करता है, यदि ये चीज़ें तेरे इरादे हैं, तो तेरी प्रार्थनाएँ प्रभावशाली होंगी। उदाहरण के लिए, जब तू सभाओं में प्रार्थना करता है, यदि तू अपना हृदय खोल कर परमेश्वर से प्रार्थना करता है, और बिना झूठ बोले परमेश्वर से बोल देता है कि तेरे हृदय में क्या है, तब तेरी प्रार्थनाएँ निश्चित रूप से प्रभावशाली होंगी। ...

परमेश्वर में विश्वासी होने का अर्थ है कि तेरे सारे कृत्य उसके सम्मुख लाये जाने चाहिए और उन्हें उसकी छानबीन के अधीन किया जाना चाहिए। यदि तू जो कुछ भी करता है उसे परमेश्वर के आत्मा के सम्मुख ला सकते हैं लेकिन परमेश्वर की देह के सम्मुख नहीं ला सकते, तो यह दर्शाता है कि तूने अपने आपको उसके आत्मा की छानबीन के अधीन नहीं किया है। परमेश्वर का आत्मा कौन है? कौन है वो व्यक्ति जिसकी परमेश्वर द्वारा गवाही दी जाती है? क्या वे एक समान नहीं है? अधिकांश उसे दो अलग अस्तित्व के रूप में देखते हैं, ऐसा विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का आत्मा तो परमेश्वर का आत्मा है, और परमेश्वर जिसकी गवाही देता है वह व्यक्ति मात्र एक मानव है। लेकिन क्या तू गलत नहीं है? किसकी ओर से यह व्यक्ति काम करता है? जो लोग देहधारी परमेश्वर को नहीं जानते, उनके पास आध्यात्मिक समझ नहीं होती है। परमेश्वर का आत्मा और उसका देहधारी देह एक ही हैं, क्योंकि परमेश्वर का आत्मा देह रूप में प्रकट हुआ है। यदि यह व्यक्ति तेरे प्रति निर्दयी है, तो क्या परमेश्वर का आत्मा दयालु होगा? क्या तू भ्रमित नही है? आज, जो कोई भी परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार नहीं कर सकता है, वह परमेश्वर की स्वीकृति नहीं पा सकता है, और जो देहधारी परमेश्वर को न जानता हो, उसे पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। अपने सभी कामों को देख और समझ कि जो कुछ तू करता है वह परमेश्वर के सम्मुख लाया जा सकता है कि नहीं। यदि तू जो कुछ भी करता है, उसे तू परमेश्वर के सम्मुख नहीं ला सकता, तो यह दर्शाता है कि तू एक दुष्ट कर्म करने वाला है। क्या दुष्कर्मी को पूर्ण बनाया जा सकता है? तू जो कुछ भी करता है, हर कार्य, हर इरादा, और हर प्रतिक्रिया, अवश्य ही परमेश्वर के सम्मुख लाई जानी चाहिए। यहाँ तक कि, तेरे रोजाना का आध्यात्मिक जीवन भी—तेरी प्रार्थनाएँ, परमेश्वर के साथ तेरा सामीप्य, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने का तेरा ढंग, भाई-बहनों के साथ तेरी सहभागिता, और कलीसिया के भीतर तेरा जीवन—और साझेदारी में तेरी सेवा परमेश्वर के सम्मुख उसके द्वारा छानबीन के लिए लाई जा सकती है। यह ऐसा अभ्यास है, जो तुझे जीवन में विकास हासिल करने में मदद करेगा। परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करने की प्रक्रिया शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। जितना तू परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करता है, उतना ही तू शुद्ध होता जाता है और उतना ही तू परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होता है, जिससे तू व्यभिचार की ओर आकर्षित नहीं होगा और तेरा हृदय उसकी उपस्थिति में रहेगा; जितना तू उसकी छानबीन को ग्रहण करता है, शैतान उतना ही लज्जित होता है और उतना अधिक तू देहसुख को त्यागने में सक्षम होता है। इसलिए, परमेश्वर की छानबीन को ग्रहण करना अभ्यास का वो मार्ग है जिसका सभी को अनुसरण करना चाहिए। चाहे तू जो भी करे, यहाँ तक कि अपने भाई-बहनों के साथ सहभागिता करते हुए भी, यदि तू अपने कर्मों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है और उसकी छानबीन को चाहता है और तेरा इरादा स्वयं परमेश्वर की आज्ञाकारिता का है, इस तरह जिसका तू अभ्यास करता है वह और भी सही हो जाएगा। केवल जब तू जो कुछ भी करता है, वो सब कुछ परमेश्वर के सम्मुख लाता है और परमेश्वर की छानबीन को स्वीकार करता है, तो वास्तव में तू ऐसा कोई हो सकता है जो परमेश्वर की उपस्थिति में रहता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार हैं' से उद्धृत

एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि तुम्हारा दिल परमेश्वर के लिए खुला होना चाहिए। बाद में, तुम अन्य लोगों के प्रति खुला रहना, ईमानदारी से और सही तरीके से बोलना, अपने दिल की बात कहना, गरिमा, सत्यनिष्ठा और अच्छे चरित्र वाला व्यक्ति बनना, और बढ़ा-चढ़ाकर या झूठ न बोलने वाला बनना या अपने को छिपाने या दूसरों को धोखा देने वाले शब्दों का उपयोग न करना सीख सकते हो। एक ईमानदार व्यक्ति होने के अभ्यास में एक और पहलू शामिल होता है, जो यह है कि व्यक्ति को अपना कर्तव्य निभाने में एक ईमानदार रवैया अपनाना चाहिए और इसे एक नेक दिल के साथ करना चाहिए। तुम्हें सिद्धांतों के अनुसार होना चाहिए और उन्हें अपने अभ्यास में कार्यान्वित करना चाहिए; यह केवल कहने की बात नहीं है, और न ही केवल एक निश्चित रवैया रखने की बात है कि दूसरों को काम बताकर तुम खुद आराम कर रहे हो। जब तुम आराम कर रहे हो तो एक ईमानदार व्यक्ति होने की वास्तविकता कहाँ होती है? बिना किसी वास्तविकता के, केवल नारे लगाने से बात नहीं बनेगी। परमेश्वर मनुष्य को जाँचता है, और मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच करने और मनुष्य के आंतरिक हृदय को देखने के अलावा, वह मनुष्य के व्यवहार और उसके अभ्यास को भी देखता है। यदि तुम अपने आंतरिक हृदय में कुछ सोचते हो लेकिन तुम इसे व्यवहार में नहीं लाते हो, तो क्या यह एक ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्ति है? ऐसा करने अर्थ है कि कहो कुछ, और सोचो कुछ और ही; यह उन कामों को करना है जिससे तुम अच्छे नज़र आते हो, और यह दूसरों को तुम्हारी बातों से बेवकूफ़ बनाना है—ठीक उन फरीसियों की तरह, जो धर्मग्रंथों को पढ़ने में अव्वल थे और उन्हें विस्तार से जानते थे। फिर भी, जब अभ्यास करने का समय आया, जब कीमत चुकाने और पद के आशीष को त्यागने का समय आया, तो उन्होंने ऐसा नहीं किया, उन्होंने परमेश्वर की आलोचना और निंदा करना और उसके पद के लिए स्पर्धा करना शुरू कर दिया। परमेश्वर को यह घृणास्पद लगा; चलने के लिए वह एक अच्छा मार्ग नहीं था! क्या दूसरे लोग इस प्रकार के व्यक्ति पर भरोसा कर सकते हैं? (नहीं।)

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'ईमानदार होकर ही कोई सच्ची मानव सदृशता जी सकता है' से उद्धृत

एक ईमानदार व्यक्ति बनने का अभ्यास करते हुए यह ज़रूरी है कि पहले व्यक्ति अपना हृदय परमेश्वर के समक्ष खोलना सीखना चाहिए और अपने दिल की बात परमेश्वर को बताते हुए प्रतिदिन प्रार्थना करनी चाहिए। मान लो कि आज तुमने झूठ बोला है; किसी को यह बात पता नहीं चली है, और तुम अबतक यह बात सभी को साफ-साफ बताने का साहस नहीं जुटा पाए हो। तो कम से कम आज अपने आचरण की जांच में तुम्हें जो गलतियां और झूठ मिली हैं उन्हें तुरंत परमेश्वर के समक्ष जरूर लाना चाहिए, और अपने पापों की स्वीकारोक्ति में कहना चाहिए : "हे परमेश्वर, मैंने पुनः झूठ बोला है। मैंने फलां कारण से ऐसा किया है। मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे अनुशाषित करो।" अगर तुम्हारी सोच ऐसी है, परमेश्वर तुम्हें स्वीकार करेगा, और इसे याद रखेगा। शायद तुम्हारे लिए इस दोष या झूठ बोलने की भ्रष्ट प्रवृत्ति का समाधान करना काफी तनावपूर्ण और श्रमसाध्य हो, लेकिन डरो नहीं, परमेश्वर तुम्हारे साथ है, वह तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा और बार-बार उभरने वाली इस कठिनाई से उबरने में तुम्हारी मदद करेगा। वह तुम्हें झूठ नहीं बोलने या झूठ को स्वीकारने का साहस देगा; तुम्हें यह स्वीकारने का साहस देगा कि कौन से झूठ तुमने बोले, क्यों बोले, तुम्हारे इरादे और उद्देश्य क्या थे; तुम्हें यह भी स्वीकार करने का साहस देगा कि तुम ईमानदार व्यक्ति नहीं हो, बेईमान हो; और वह तुम्हें इस अवरोध को दूर करने, और शैतान की कैद और नियंत्रण से बाहर निकल आने का साहस देगा। इस तरह, तुम परमेश्वर का मार्गदर्शन और आशीष पा कर धीरे-धीरे प्रकाश में रहने लगोगे। जब तुम दैहिक सीमाओं के इस अवरोध को पार कर लेते हो और सत्य के प्रति समर्पित होने में समर्थ हो जाते हो, तो तुम स्वतंत्र और मुक्त हो जाओगे। जब तुम इस तरह से रहते हो, तो न केवल लोग, बल्कि परमेश्वर भी तुम्हें पसंद करेगा। हालांकि कभी-कभार तुम अब भी गलत कर्म कर सकते हो, झूठ बोल सकते हो, और अब भी कभी-कभी तुम्हारे मन में अपने इरादे, स्वार्थ, स्वार्थी व घृणास्पद कर्म और विचार तुम्हारे पास होंगे, लेकिन तुम परमेश्वर की परीक्षा को स्वीकार कर सकते हो; अपना हृदय, अपनी वास्तविक स्थिति, अपनी भ्रष्ट स्वाभाविक प्रवृत्ति परमेश्वर को दिखा सकते हो, और इस तरह तुम्हारे पास अभ्यास का सही मार्ग होगा। अगर तुम्हारे अभ्यास का मार्ग और आगे की दिशा सही है, तो तुम्हारा भविष्य सुंदर और उज्ज्वल होगा। इस तरह, तुम सुकून भरे दिल के साथ जियोगे; तुम्हारी आत्मा संपोषित होगी, और तुम समृद्ध और आनंदित महसूस करोगे। अगर तुम दैहिक सीमाओं की इस अड़चन को पार नहीं कर पाते हो और अपनी भावनाओं व शैतानी दर्शनों की चपेट में रहते हो, और तुम्हारे कथन व कर्म हमेशा गुपचुप और गुप्त रहते हैं, कभी खुले दिन के उजाले में नहीं होते तो तुम शैतान के अधिकार क्षेत्र में जीते हो। जब तुम सत्य को समझते हो और दैहिक सीमाओं की अड़चन को पार कर लेते हो, तो तुम धीरे-धीरे मानवीय सादृश्य प्राप्त कर लेते हो। तुम साफगोई और सहजता के साथ बोलते और कार्य करते हो। अपने दिल की कोई भी बात या विचार, या अपनी गलतियों को दूसरों के साथ साझा करते हो, जिससे कि सभी लोग इन्हें स्पष्ट देख सकें, और अंततः वे कहेंगे कि तुम एक पारदर्शी व्यक्ति हो। पारदर्शी व्यक्ति क्या होता है? ऐसा व्यक्ति जो झूठ नहीं बोलता, अपने कथन में बेहद ईमानदार होता है, और जिसकी बातों को सभी सत्य मानते हैं। अगर ऐसे लोग अनजाने में कोई झूठ या गलत बात बोलते भी हैं, तो यह जानते हुए कि वे ऐसा अनजाने में कर रहे हैं, सभी लोग उन्हें माफ करने के लिए तैयार रहते हैं। जैसे ही उन्हें अपनी गलती का अहसास होता है वे क्षमायाचना करने तथा इसे सही करने के लिए लौट आएंगे। पारदर्शी व्यक्ति ऐसे ही होते हैं। ऐसे व्यक्ति को सभी पसंद करते हैं और उसपर विश्वास कर सकते हैं। अगर तुम इस स्तर पर पहुंचते हो तथा परमेश्वर और लोगों का विश्वास प्राप्त करते हो तो तुमने कोई साधारण काम नहीं किया है—यह किसी व्यक्ति के लिए सर्वोच्च प्रतिष्ठा है, और केवल ऐसे व्यक्ति के पास ही आत्म-सम्मान होता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'ईमानदार होकर ही कोई सच्ची मानव सदृशता जी सकता है' से उद्धृत

एक ईमानदार व्यक्ति होने के नाते तुम्हें अपना दिल खोलना चाहिए, ताकि हर कोई उसके अंदर देख सके, तुम्हारे विचारों को समझ सके, और तुम्हारा असली चेहरा देख सके; अच्छा दिखने के लिए तुम्हें तुम खुद भेष धारण करने या खुद को आकर्षक बनाने का प्रयास न करो। लोग तभी तुम पर विश्वास करेंगे और तुमको ईमानदार मानेंगे। यह ईमानदार होने का सबसे मूल अभ्यास और ईमानदार व्यक्ति होने की शर्त है। तू हमेशा पवित्रता, सदाचार, महानता का दिखावा करता है, नाटक करता है, और उच्च नैतिक गुणों के होने का नाटक करता है। तू लोगों को अपनी भ्रष्टता और विफलताओं को नहीं देखने देता है। तू लोगों के सामने एक झूठी छवि पेश करता है, ताकि वे मानें कि तू सच्चा, महान, आत्म-त्यागी, निष्पक्ष और निस्वार्थी है। यह धोखा है। भेष धारण मत कर और खुद को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत मत कर; इसके बजाय, अपने आप को स्पष्ट कर और दूसरों के देखने के लिए खुद को और अपने हृदय को पूरी तरह उजागर कर दे। यदि तू दूसरों के देखने के लिए अपने हृदय को उजागर कर सकता है और अपने विचारों और योजनाओं को—चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक—स्पष्ट कर सकता है तो क्या तू ईमानदार नहीं बन रहा है? यदि तू दूसरों के समक्ष अपने आप को उजागर कर सकता है, तो परमेश्वर भी तुझे देखेगा और कहेगा: "तूने दूसरों के देखने के लिए स्वयं को खोल दिया है, और इसलिए मेरे सामने भी तू निश्चित रूप से ईमानदार है।" यदि तू दूसरे लोगों की नज़र से दूर केवल परमेश्वर के सामने अपने आप को उजागर करता है, और उनके साथ रहते हुए हमेशा महान और गुणी या न्यायी और निःस्वार्थ होने का दिखावा करता है, तो परमेश्वर क्या सोचेगा और परमेश्वर क्या कहेगा? वह कहेगा: "तू वास्तव में धोखेबाज़ है; तू विशुद्ध रूप से पाखंडी और क्षुद्र है; और तू ईमानदार व्यक्ति नहीं है।" परमेश्वर इस प्रकार से तेरी निंदा करेगा। यदि तू ईमानदार व्यक्ति होना चाहता है, तो तू परमेश्वर या दूसरों के सामने जो कुछ भी करता है उसकी परवाह किए बिना, तुझे अपने आप को उजागर करने में सक्षम होना चाहिए। क्या यह हासिल करना आसान है? इसके लिए समय की आवश्यकता होती है, इसमें आंतरिक संघर्ष की आवश्यकता होती है और हमें लगातार अभ्यास करना पड़ता है। धीरे-धीरे हमारा हृदय खुल जाता है और हम खुद को उजागर कर पाते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हारा किसी भी चीज़ से सामना हो—नकारात्मकता और कमज़ोरी, या निपटान के बाद बुरी मन:स्थिति में होना—तुम्हें कर्तव्य के साथ ठीक से पेश आना चाहिए, और तुम्हें साथ ही सत्य को खोजना और परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए। ये काम करने से तुम्हारे पास अभ्यास करने का मार्ग होगा। अगर तुम अपना कर्तव्य निर्वाह बहुत अच्छे ढंग से करना चाहते हो, तो तुम्हें अपनी मन:स्थिति से बिल्कुल प्रभावित नहीं होना चाहिए। तुम्हें चाहे जितनी निराशा या कमज़ोरी महसूस हो रही हो, तुम्हें अपने हर काम में पूरी सख्ती के साथ सत्य का अभ्यास करना चाहिए, और सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए। अगर तुम ऐसा करोगे, तो न सिर्फ दूसरे लोग तुम्हें स्वीकार करेंगे, बल्कि परमेश्वर भी तुम्हें पसंद करेगा। इस तरह, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे, जो ज़िम्मेदार है और दायित्व का निर्वहन करता है; तुम सचमुच में एक अच्छे व्यक्ति होगे, जो अपने कर्तव्य को सही स्तर पर निभाता है और जो पूरी तरह से एक सच्चे इंसान की तरह जीता है। ऐसे लोगों का शुद्धिकरण किया जाता है और वे अपना कर्तव्य निभाते समय वास्तविक बदलाव हासिल करते हैं, उन्हें परमेश्वर की दृष्टि में ईमानदार कहा जा सकता है। केवल ईमानदार लोग ही सत्य का अभ्यास करने में डटे रह सकते हैं और सिद्धांत के साथ कर्म करने में सफल हो सकते हैं, और मानक स्तर के अनुसार कर्तव्य निभा सकते हैं। सिद्धांत पर चलकर कर्म करने वाले लोग अच्छी मन:स्थिति में होने पर अपना कर्तव्य ध्यान से निभाते हैं; वे सतही ढंग से कार्य नहीं करते, वे अहंकारी नहीं होते और दूसरे उनके बारे में ऊंचा सोचें इसके लिए दिखावा नहीं करते। बुरी मन:स्थिति में होने पर भी वे अपने रोज़मर्रा के काम को उतनी ही ईमानदारी और ज़िम्मेदारी से पूरा करते हैं और उनके कर्तव्य निर्वाह के लिए नुकसानदेह या उन पर दबाव डालने वाली या उनके काम में बाधा पहुँचाने वाली किसी चीज़ से सामना होने पर भी वे परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत रख पाते हैं और यह कहते हुए प्रार्थना करते हैं, "मेरे सामने चाहे जितनी बड़ी समस्या खड़ी हो जाए—भले ही आसमान फट कर गिर पड़े—जब तक परमेश्वर मुझे जीने देगा, अपना कर्तव्य निभाने की भरसक कोशिश करने का मैं दृढ़ संकल्प लेता हूँ। मेरे जीवन का प्रत्येक दिन वह दिन होगा जब मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए कड़ी मेहनत करूंगा ताकि मैं परमेश्वर द्वारा मुझे दिये गये इस कर्तव्य, और उसके द्वारा मेरे शरीर में प्रवाहित इस सांस के योग्य बना रहूँ। चाहे जितनी भी मुश्किलों में रहूँ, मैं उन सबको परे रख दूंगा क्योंकि कर्तव्य निर्वाह करना मेरे लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है!" जो लोग किसी व्यक्ति, घटना, चीज़ या माहौल से प्रभावित नहीं होते, जो किसी मन:स्थिति या बाहरी हालात से नियंत्रित नहीं होते, और जो परमेश्वर द्वारा उन्हें सौंपे गये कर्तव्यों और आदेशों को सबसे आगे रखते हैं—वही परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं और सच्चाई के साथ उसके सामने समर्पण करते हैं। ऐसे लोगों ने जीवन-प्रवेश हासिल किया है और सत्य की वास्तविकता में प्रवेश किया है। यह सत्य को जीने की सबसे व्यावहारिक और सच्ची अभिव्यक्तियों में से एक है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन में प्रवेश अपने कर्तव्य को निभाने का अनुभव करने से प्रारंभ होना चाहिए' से उद्धृत

तुम्हारे सामने भले ही कोई भी मामला आए, चाहे वह परमेश्वर द्वारा तुम्हें सीधे तौर पर आदेश देने का मामला हो या वह कर्तव्य हो जिसका तुम्हें निर्वहन करना है, या ऐसा कुछ हो जो किसी ने तुम्हें बताया हो, और फिर चाहे इसमें यह शामिल हो कि तुम कैसा आचरण करते हो या मामलों को कैसे संभालते हो, तुम्हें हमेशा इसे ईमानदार हृदय से देखना चाहिए। लेकिन इंसान चीजों को ईमानदार हृदय से देखने का अभ्यास कैसे करे? जो तुम सोचते और बोलते हो, उसे ईमानदारी से कहो; आधिकारिक शब्दावली मत बोलो, मीठी लगने वाली, चापलूसी वाली या पाखंडपूर्ण झूठी बातें मत बोलो, बल्कि वे शब्द बोलो जो तुम्हारे दिल में हैं, अपने दिल की सच्ची बातें और विचार व्यक्त करो—ईमानदार लोगों को ऐसा ही करना चाहिए। यदि तुम कभी अपने दिल की नहीं कहते या नहीं प्रकट करते हो, और तुम्हारे होठों पर वही शब्द कभी नहीं होते जो तुम्हारे दिल में होते हैं, तो यह ईमानदार व्यक्ति का व्यवहार नहीं है। मान लो, तुमने कोई काम अच्छे से नहीं किया। कोई तुमसे पूछता है कि क्या हुआ और तुम कहते हो, "मैं तो उस काम को अच्छी तरह से करना चाहता था, लेकिन किसी कारणवश नहीं कर पाया।" जबकि वास्तव में, तुम अपने दिल में जानते हो कि तुम सावधान नहीं थे, लेकिन तुम खुलकर और ईमानदारी से नहीं बोलते, और तुम उसे किसी और पर डाल देते हो, या फिर उसे छिपाने के लिए हर तरह की बहानेबाजी करते हो। क्या यह ईमानदार होना है? ऐसा कहकर तुम्हें बच निकलने का मौका तो मिल जाता है, लेकिन तुम अपने भीतर की चीजों को सुलझाने के लिए उन्हें प्रकाश में नहीं लाए, यह तुम्हारे दिल को पीड़ा पहुँचाएगा। अगर यह चीज तुम्हारे दिल में जड़ जमा लेती है, तो यह एक परेशान करने वाली बात हो जाती है। तुम्हें खुलकर और ईमानदारी से बोलना चाहिए : "मैंने इस कर्तव्य को निभाते हुए थोड़ी लापरवाही बरती है और इसे गंभीरता से नहीं लिया है। मैं थोड़ी मेहनत करता हूँ और फिर थोड़ा सुस्त हो जाता हूँ। जब मैं अच्छे मूड में होता हूँ, तो मैं थोड़ी-सी कीमत चुका सकता हूँ, लेकिन जब मैं अच्छे मूड में नहीं होता, तो मैं अपने प्रयासों में सुस्त हो जाता हूँ, मैं कीमत चुकाने को तैयार नहीं होता, मैं निकम्मा हो जाता हूँ और भौतिक सुखों का लालच करने लगता हूँ, इसलिए मेरे काम करने का कुछ लाभ नहीं होता। पिछले कुछ दिनों से मैं अपने आप को बदल रहा हूँ और अपने काम की दक्षता में सुधार लाने और तेजी से काम करने के लिए बेहतर से बेहतर होने का प्रयास करके आगे बढ़ रहा हूँ।" क्या कोई बता सकता है कि इन दोनों में से कौन-सी प्रतिक्रिया ईमानदार है? तुम लोग क्या कहते हो? यह स्पष्ट है कि पहली प्रतिक्रिया किसी व्यक्ति की ओर से एक पूर्व बचाव है, क्योंकि उसे निपटाए जाने का डर है, इस बात का डर है कि दूसरों को पता लग जाएगा कि कोई समस्या है, इस बात का डर है कि जाँच-पड़ताल से पता लग जाएगा कि वही जिम्मेदार है, इसलिए वह पहले से ही सच्चाई को छिपाने के बहाने ढूंढता है और आरोपों को दबाने की कोशिश करता है, दूसरों के मत्थे मढ़ता ताकि उससे निपटा न जाए। यही उसकी झूठ का स्रोत है। दूसरा व्यक्ति सच बोल रहा है, हालाँकि यह सही है कि उससे निपटा जाना चाहिए और उसे जिम्मेदारी लेनी चाहिए, लेकिन यह सच है। लोगों की सामान्य स्थिति ऐसी ही होती है–अगर तुम नहीं भी कहोगे, तो भी लोगों को तो पता चल ही जाएगा। तुमने मौन रहना नहीं चुना और तुमने खुद को सही ठहराने या बचाव करने का विकल्प नहीं चुना, बल्कि सीधी बात की। इससे यह साबित होता है कि तुम्हारा रवैया ईमानदार है, तुम वास्तविक सत्य को छिपाने के लिए अपने बहानों से मजबूती से और अड़ियल ढंग से चिपके रहने या दूसरों को धोखा देने के बजाय, बदलना चाहते हो। कौन-सा रास्ता सही है? ईमानदार लोग किस तरीके का अभ्यास करते हैं? खुलापन और पारदर्शिता रखना, ईमानदारी से बोलना, अपनी वास्तविक स्थिति और वास्तविक समस्या का लेखा-जोखा देना—ईमानदार लोग ऐसे ही अभ्यास करते हैं और इस प्रकार अभ्यास करना ही सही है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'ईमानदार होकर ही कोई सच्ची मानव सदृशता जी सकता है' से उद्धृत

जब तुम दूसरों के साथ बातचीत करते हो तब सबसे पहले तुम्हें अपना दिल और अपनी सच्चाई उन्हें दिखानी होगी। यदि बातचीत या संपर्क करने में और दूसरों के साथ कार्य करने में, किसी के शब्द लापरवाह, आडंबरपूर्ण, मजाकिया, चापलूसी करने वाले, गैर-जिम्मेदाराना, और मनगढंत हैं, या उसकी बातें केवल सामने वाले से अपना काम निकालने के लिए हैं, तो उसके शब्द विश्वसनीय नहीं हैं, और वह थोड़ा भी ईमानदार नहीं है। दूसरे किसी भी व्यक्ति के साथ उनके पेश आने का यही तरीका है, चाहे वो व्यक्ति जो भी हो। क्या ऐसे व्यक्ति का दिल सच्चा है? यह व्यक्ति ईमानदार नहीं है। मान लो किसी व्यक्ति में कमियां हैं, और वह सच्चाई और ईमानदारी से तुमसे कहता है : "सही में बताओ मैं क्यों इतना नकारात्मक हूँ। मैं बिल्कुल समझ नहीं पाता।" और मान लो तुम उसकी समस्या को वास्तव में जानते हो, लेकिन उसे बताते नहीं हो, बल्कि उससे कहते हो : "कोई बात नहीं। मैं भी अक्सर नकारात्मक हो जाता हूँ।" ये शब्द सुनने वाले के लिए बहुत बड़ी सांत्वना हैं, लेकिन क्या तुम्हारा रवैया सच्चा है? नहीं, यह सच्चा नहीं है। तुम उस व्यक्ति के साथ अन्यमनस्क भाव से बात कर रहे हो, ताकि वह और अच्छा महसूस करे और उसे सांत्वना मिले, तुमने उसके साथ ईमानदारी से बात नहीं की। तुम सच्चाई से उसकी सहायता नहीं कर रहे जिससे कि वह अपनी नकारात्मकता को छोड़ सके। तुमने उस व्यक्ति को सांत्वना देने के प्रयास में और यह सुनिश्चित करने के लिए कि उसके साथ तुम्हारा कोई मन-मुटाव न हो या संबंधों में कोई खटास पैदा न हो, तुमने उसके लिए न्यूनतम किया है। यह कोई ईमानदार व्यक्ति होना नहीं होता। अतः, इस तरह की परिस्थिति का सामना होने पर एक ईमानदार व्यक्ति को क्या करना चाहिए? उसे बताओ कि तुमने क्या देखा और क्या पहचाना है : "मैं तुम्हें बताऊंगा कि मैंने क्या देखा और अनुभव किया है। यह तुम फैसला करो कि मैं जो कह रहा वह सही है या गलत। अगर गलत है, तो तुम्हें इसे स्वीकार करने की जरूरत नहीं है। अगर सही है तो मैं आशा करता हूँ कि तुम इसे स्वीकार करोगे। अगर मेरी बातों को सुनना तुम्हारे लिए कठिन है और तुम उससे आहत होते हो, तो मुझे उम्मीद है तुम परमेश्वर से स्वीकार कर पाओगे। मेरा इरादा और उद्देश्य तुम्हारी सहायता करना है। मुझे तुम्हारी समस्या स्पष्ट दिखती है : तुम्हारी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा आहत हुई है। तुम्हारे अहम को कोई बढ़ावा नहीं देता, और तुम सोचते हो कि सभी लोग तुम्हें तुच्छ समझते हैं, तुम पर प्रहार किया जा रहा, कि तुम्हारे साथ इतना गलत कभी नहीं हुआ। तुम इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते और नकारात्मक हो जाते हो। तुम्हें क्या लगता—क्या वास्तव में यही बात है?" यह सुन कर वह महसूस करता है कि वास्तव में मामला यही है। यही बात वास्तव में तुम्हारे दिल में है, लेकिन तुम अगर ईमानदार नहीं हो, तो यह बात कहोगे नहीं। तुम कहोगे, "मैं भी अक्सर नकारात्मक हो जाता हूँ," और जब दूसरा व्यक्ति यह सुनता है कि सभी लोग नकारात्मक हो जाते हैं, उसे लगता है कि यह सामान्य बात है, और अंततः, वह अपनी नकारात्मकता नहीं छोड़ता है। यदि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो और सच्चे भाव और हृदय से उसकी सहायता करते हो, तो तुम सत्य को समझने और अपनी नकारात्मकता पीछे छोड़ने में उसकी मदद कर सकते हो।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'ईमानदार होकर ही कोई सच्ची मानव सदृशता जी सकता है' से उद्धृत

वे कौन-से सिद्धांत हैं, जिनके अनुसार लोगों को मसीह के साथ व्यवहार करना चाहिए? वे कौन-से सिद्धांत हैं, जिन्हें लोगों को चापलूसी द्वारा अनुग्रह प्राप्त करने की कोशिश करने और सुखद प्रभाव डालने के लिए अपने शब्दों का चयन करते समय कायम रखना चाहिए? ईमानदार रहो और चापलूसी करने या चापलूसी द्वारा अनुग्रह प्राप्त करने की कोशिश करने में दिलचस्पी न लो। खुशामद करने की कोई जरूरत नहीं—बस ईमानदार रहो। इसे सही तरीके से कैसे अभ्यास में लाया जाना चाहिए? परमेश्वर के साथ खुले दिल से मिलने के लिए तुम लोगों को पहले अपनी निजी इच्छाओं को एक तरफ रखना होगा। यह ध्यान देने की बजाय कि परमेश्वर तुम्हारे साथ किस तरह का व्यवहार करता है, जो कुछ तुम्हारे दिल में है वह कह दो, और इस बात की चिंता या परवाह न करो कि तुम्हारे शब्दों का क्या परिणाम होगा; जो कुछ तुम सोच रहे हो वह कह दो, अपनी मंशाओं को एक तरफ रख दो, और किसी मकसद को हासिल करने के लिए शब्दों का इस्तेमाल करने की कोशिश न करो। "मुझे यह कहना चाहिए, वह नहीं, मुझे सावधानी बरतनी चाहिए कि मैं क्या कहता हूँ, मुझे अपना मकसद हासिल करना है"—क्या यहाँ व्यक्तिगत मंशाएँ जुड़ी हुई हैं? ये लोग कोई शब्द कहने से पहले ही अपने मन में उधेड़बुन में उलझे रहे हैं, उन्होंने जो कुछ कहना है उसे कई बार संसाधित कर लिया है, और अपने दिमाग में कई बार छान लिया है। जब ये शब्द उनके मुंह से बाहर निकलेंगे तो ये शैतान की चालबाजियों में लिपटे हुए होंगे; परमेश्वर के साथ व्यवहार करने का यह खुले दिल का रास्ता नहीं है। अर्थात्, तुम्हारे मुँह से निकलने वाले शब्दों में व्यक्तिगत इरादे और उद्देश्य होते हैं; ऐसे शब्द खरे नहीं होते और वे दिल से नहीं निकलते। यह ईमानदार होना नहीं है। इसे क्या कहा जाता है? इसे दुष्ट इरादे रखना कहा जाता है। इसके अतिरिक्त, तुम बोलते समय लगातार चेहरे और आँखों के भावों का निरीक्षण कर सकते हो, और केवल तभी बोलना जारी रखो, जब उसकी अभिव्यक्ति अनुकूल हो। जब तुम कोई प्रतिकूल अभिव्यक्ति देखो, तो तुम अपने शब्द रोक लो। जैसे ही तुम देखो कि उसे वह पसंद नहीं है जो वह सुन रहा है, तो बोलना बंद कर दो। जैसे ही वह तुम्हें स्वीकार करने के प्रति उदासीन और अनिच्छुक लगे, तो तुम अपने भीतर सोचो, "मैं ऐसा क्या कह सकता हूँ, जो तुम्हें रुचिकर लगे और जिससे तुम मुझ पर ध्यान देना चाहो? मैं तुम्हें कैसे यह सोचने के लिए प्रेरित कर सकता हूँ कि मैं अच्छा हूँ? मैं तुमसे कैसे अपने को पसंद करवा सकता हूँ? मैं कैसे अपने बारे में तुम्हारी धारणा बदल सकता हूँ? मैं ऐसा क्या कह सकता हूँ, जो तुम्हें खुश कर दे, ताकि तुम मेरे साथ निपटो नहीं? मैं ऐसा क्या कह सकता हूँ, जो तुम्हें वास्तविक स्थिति का पता न चलने दे? मैं किसी ऐसे विषय को कैसे टाल सकता हूँ, जिसके बारे में सुनना तुम्हें अप्रिय लगता है? इसे हासिल करने के लिए जो भी कहा जाना चाहिए, मैं कहूँगा।" क्या यही है वह, जिसे ईमानदार होना कहा जाता है? (नहीं, यह नहीं है।) कुछ लोग सोचते हैं, "अगर तुम इस बात से अनजान हो, तो मैं इसे सूचित नहीं करूँगा। इसके बजाय, मैं किसी और के द्वारा इसे सूचित किए जाने की प्रतीक्षा करूँगा और केवल तभी मैं इसके बारे में बोलने में बाकी सभी का अनुसरण करूँगा। ऐसा करके मैं तुम्हें अवगत करा देता हूँ कि मेरी सूचना सत्य है, जबकि अगर मैं इसकी सूचना देने वाला पहला व्यक्ति हुआ, तो मुझसे निपटा जा सकता है। अपना सिर बाहर निकालने वाला पक्षी मारा जाता है, और मैं वह पक्षी नहीं बनना चाहता। मैं निश्चित रूप से पहले आगे आने वाला नहीं बनूँगा।" क्या यह ईमानदार होना है? मान लो, तुम्हें किसी के बारे में कोई सच्ची जानकारी मिलती है और केवल तुम्हीं हो जो इसके बारे में जानते हो और बाकी सभी लोग इससे अनजान हैं, और वे अभी भी सोचते हैं कि वह एक अच्छा व्यक्ति है, और यदि मसीह भी इस बात से अनजान है, तो क्या इन परिस्थितियों में तुम पूरी सच्चाई के साथ मसीह को बताओगे? यदि तुम इसे छिपाते हो, दबाते हो, और इसके बारे में कभी कुछ नहीं कहते, इसे कभी प्रकट नहीं करते, और केवल तभी खड़े होकर बोलते हो, जब उस व्यक्ति की असलियत दिखाई दे जाती है और जब उसे उसके पद से मुक्त कर दिया जाता है या परमेश्वर के घर से हटा दिया जाता है, तो क्या यह ईमानदार होना है? चाहे कोई भी किसी समस्या से ग्रस्त होने के कारण उजागर किया जाए या चाहे कोई भी अन्य समस्या सूचित की जाए, तुम हमेशा अंतिम बोलने वाले होते हो। क्या यह ईमानदार होना है? मान लो, तुम व्यक्तिगत रूप से किसी को नापसंद करते हो, या किसी को तुमसे द्वेष है। यह आवश्यक नहीं कि वह व्यक्ति दुष्ट हो या उसने कोई बुरे कार्य किए हों, लेकिन तुम उससे घृणा करते हो और उसके पतन का कारण बनना चाहते हो, जिससे वह मूर्ख दिखाई दे, और इसलिए तुम उसके बारे में कुछ बुरा कहने के तरीके सोचते और अवसर तलाशते हो। भले ही तुम इस व्यक्ति के बारे में कोई निश्चित बयान दिए बिना बात कर रहे होते हो, फिर भी मामले के तुम्हारे विवरण के हर हिस्से में तुम्हारे इरादे स्पष्ट हो जाते हैं। तुम उससे निपटने के लिए ऊपरवाले के हाथ का उपयोग करने का प्रयास कर रहे हो। सतही तौर पर यह लग सकता है कि तुम सिर्फ सच्चे तथ्यों के बारे में बात कर रहे हो, लेकिन वे तुम्हारे व्यक्तिगत उद्देश्यों से दूषित हैं; यह ईमानदार होना नहीं है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे सत्य से घृणा, सिद्धांतों का खुले आम उल्लंघन और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की अवहेलना करते हैं (II)' से उद्धृत

सच्चा और सीधा-स्पष्ट होने का अर्थ ईमानदार व्यक्ति होना है। इसका मतलब है कि उस व्यक्ति का हृदय और आत्मा पूरी तरह से परमेश्वर के लिए खुला है, उसके पास न छिपाने के लिए कुछ है और न वह किसी से छिपता है। इसी तरह के लोगों का दिल परमेश्वर को दिया जाता है और पूरी तरह से परमेश्वर को दिखाया जाता है। यानी, उनका सर्वस्व परमेश्वर को दे दिया जाता है। अगर परमेश्वर उन्हें बुरा कहता है, तो वे स्वीकार कर लेते हैं। यदि परमेश्वर उन्हें अभिमानी और दंभी कहता है, तो वे मानकर इसे पूरी तरह से स्वीकार कर लेते हैं। वे इसे बस स्वीकार कर लें तो क्या इतना काफी है? उन्हें अभी भी पश्चाताप करना है, सत्य-सिद्धांत को प्राप्त करने का प्रयास करना है, उन त्रुटियों को सुधारना है जिनके बारे में उन्हें पता चलता है, और अपनी गलतियों के मूल का पता लगाना है। फिर इससे पहले कि उन्हें पता चले, वे अपने हर प्रकार के गलत व्यवहार को ठीक कर चुके होते हैं, और जिस तरह वे कपट करते हैं, धोखा देते हैं, बच कर निकल जाते हैं, चीजों में के प्रति लापरवाह होते हैं, वे निरंतर कम होती जाती हैं। वे जितने लंबे समय तक इस तरह जीते हैं, वे उतने ही सीधे-सच्चे होते जाते हैं और ईमानदार व्यक्ति होने के लक्ष्य के करीब पहुँचते जाते हैं। यही प्रकाश में जीना है। यह सारी महिमा परमेश्वर को जाती है! परमेश्वर की वजह से ही लोग प्रकाश में जीते हैं—लोगों के पास घमंड करने के लिए कुछ भी नहीं है। जब लोग प्रकाश में रहते हैं, तो वे सभी सत्यों को समझ जाते हैं, उनके अंदर परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय होता है, वे अपने सामने आने वाली हर समस्या में सत्य की तलाश करना जान लेते हैं, और इंसान की तरह जीने लगते हैं। यद्यपि उन्हें पूरी तरह से एक अच्छा इंसान नहीं कहा जा सकता, लेकिन परमेश्वर की दृष्टि में उनमें थोड़ी-बहुत इंसानियत होती है, फिर वे झगड़ालू या विरोधी-प्रवृत्ति के नहीं रहते, फिर उन पर परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करने या परमेश्वर को अस्वीकार करने का कोई खतरा भी नहीं रहता। भले ही उनमें सत्य की बहुत गहरी समझ न हो, पर वे आज्ञा मानने में सक्षम होते हैं, और जब उन्हें कोई कार्य या कर्तव्य दिया जाता है, तो वे अपने पूरे दिलो-दिमाग से और अपनी इष्टतम योग्यता से उसे करने में सक्षम होते हैं। वे लोग भरोसेमंद होते हैं, परमेश्वर को उनकी कोई चिंता नहीं होती—ऐसे लोग प्रकाश में रहते हैं। क्या प्रकाश में रहने वाले लोग परमेश्वर की जाँच स्वीकारने में सक्षम होते हैं? क्या वे अभी भी अपने हृदय को परमेश्वर से छिपा सकते हैं? क्या वे अभी भी छोटी-मोटी चालें चलते हैं? क्या उनके पास कोई रहस्य होता है? (नहीं।) उनका हृदय परमेश्वर के लिए खुला होता है। यानी, कुछ भी छिपा नहीं होता, ऐसा कुछ भी नहीं होता जिसे बताने में उन्हें शर्म आए, और न ही ऐसा कुछ होता है जिसके लिए उन्हें अपना सिर शर्म से झुकाना पड़े। वे अपना सब-कुछ परमेश्वर को दे देते हैं—और परमेश्वर सब-कुछ जानता है। जब लोग इसे हासिल करने में सक्षम हो जाते हैं, तो वे सहजता, सरलता से जीते हैं और आजादी से रहते हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल ईमानदार व्यक्ति बनकर ही कोई वास्तव में ख़ुश हो सकता है' से उद्धृत

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