3. धोखेबाज़ लोग उद्धार क्यों नहीं प्राप्त कर पाते

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मूल बात यह है कि परमेश्वर निष्ठावान है, अत: उसके वचनों पर हमेशा भरोसा किया जा सकता है; इसके अतिरिक्त, उसका कार्य दोषरहित और निर्विवाद है, यही कारण है कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके साथ पूरी तरह से ईमानदार होते हैं। ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; हर बात में उसके साथ सच्चाई से पेश आना; हर बात में उसके साथ खुलापन रखना, कभी तथ्यों को न छुपाना; अपने से ऊपर और नीचे वालों को कभी भी धोखा न देना, और परमेश्वर से लाभ उठाने मात्र के लिए काम न करना। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और शब्दों में शुद्धता रखना, न तो परमेश्वर को और न ही इंसान को धोखा देना। मैं जो कहता हूँ वह बहुत सरल है, किंतु तुम लोगों के लिए दुगुना मुश्किल है। बहुत-से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने की बजाय नरक में दंडित होना पसंद करेंगे। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि जो बेईमान हैं उनके लिए मेरे भंडार में अन्य उपचार भी है। मैं अच्छी तरह से जानता हूँ तुम्हारे लिए ईमानदार इंसान बनना कितना मुश्किल काम है। चूँकि तुम लोग बहुत चतुर हो, अपने तुच्छ पैमाने से लोगों का मूल्यांकन करने में बहुत अच्छे हो, इससे मेरा कार्य और आसान हो जाता है। और चूंकि तुम में से हरेक अपने भेदों को अपने सीने में भींचकर रखता है, तो मैं तुम लोगों को एक-एक करके आपदा में भेज दूँगा ताकि अग्नि तुम्हें सबक सिखा सके, ताकि उसके बाद तुम मेरे वचनों के प्रति पूरी तरह समर्पित हो जाओ। अंततः, मैं तुम लोगों के मुँह से "परमेश्वर एक निष्ठावान परमेश्वर है" शब्द निकलवा लूँगा, तब तुम लोग अपनी छाती पीटोगे और विलाप करोगे, "कुटिल है इंसान का हृदय!" उस समय तुम्हारी मनोस्थिति क्या होगी? मुझे लगता है कि तुम उतने खुश नहीं होगे जितने अभी हो। तुम लोग इतने "गहन और गूढ़" तो बिल्कुल भी नहीं होगे जितने कि तुम अब हो। कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं, वे "शिष्ट व्यवहार" के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, फिर भी आत्मा की उपस्थिति में वे अपने जहरीले दाँत और पँजे दिखाने लगते हैं। क्या तुम लोग ऐसे इंसान को ईमानदार लोगों की श्रेणी में रखोगे? यदि तुम पाखंडी और ऐसे व्यक्ति हो जो "व्यक्तिगत संबंधों" में कुशल है, तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को हल्के में लेने का प्रयास करता है। यदि तुम्हारी बातें बहानों और महत्वहीन तर्कों से भरी हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने से घृणा करता है। यदि तुम्हारे पास ऐसी बहुत-से गुप्त भेद हैं जिन्हें तुम साझा नहीं करना चाहते, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने राज़ और अपनी कठिनाइयाँ उजागर करने के विरुद्ध हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और तुम सरलता से अंधकार से बाहर नहीं निकल पाओगे। यदि सत्य का मार्ग खोजने से तुम्हें प्रसन्नता मिलती है, तो तुम सदैव प्रकाश में रहने वाले व्यक्ति हो। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवाकर्मी बने रहकर बहुत प्रसन्न हो, गुमनाम बनकर कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से काम करते हो, हमेशा देने का भाव रखते हो, लेने का नहीं, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक निष्ठावान संत हो, क्योंकि तुम्हें किसी फल की अपेक्षा नहीं है, तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो। यदि तुम स्पष्टवादी बनने को तैयार हो, अपना सर्वस्व खपाने को तैयार हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन दे सकते हो और दृढ़ता से अपनी गवाही दे सकते हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम्हें केवल परमेश्वर को संतुष्ट करना आता है, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि ऐसे लोग प्रकाश में पोषित किए जाते हैं और वे सदा राज्य में रहेंगे। तुम्हें पता होना चाहिए कि क्या तुम्हारे भीतर सच्चा विश्वास और सच्ची वफादारी है, क्या परमेश्वर के लिए कष्ट उठाने का तुम्हारा कोई इतिहास है, और क्या तुमने परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पण किया है। यदि तुममें इन बातों का अभाव है, तो तुम्हारे भीतर अवज्ञा, धोखा, लालच और शिकायत अभी शेष हैं। चूँकि तुम्हारा हृदय ईमानदार नहीं है, इसलिए तुमने कभी भी परमेश्वर से सकारात्मक स्वीकृति प्राप्त नहीं की है और प्रकाश में जीवन नहीं बिताया है। अंत में किसी व्यक्ति की नियति कैसे काम करती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या उसके अंदर एक ईमानदार और भावुक हृदय है, और क्या उसके पास एक शुद्ध आत्मा है। यदि तुम ऐसे इंसान हो जो बहुत बेईमान है, जिसका हृदय दुर्भावना से भरा है, जिसकी आत्मा अशुद्ध है, तो तुम अंत में निश्चित रूप से ऐसी जगह जाओगे जहाँ इंसान को दंड दिया जाता है, जैसाकि तुम्हारी नियति में लिखा है। यदि तुम बहुत ईमानदार होने का दावा करते हो, मगर तुमने कभी सत्य के अनुसार कार्य नहीं किया है या सत्य का एक शब्द भी नहीं बोला है, तो क्या तुम तब भी परमेश्वर से पुरस्कृत किए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हो? क्या तुम तब भी परमेश्वर से आशा करते हो कि वह तुम्हें अपनी आँख का तारा समझे? क्या यह सोचने का बेहूदा तरीका नहीं है? तुम हर बात में परमेश्वर को धोखा देते हो; तो परमेश्वर का घर तुम जैसे इंसान को, जिसके हाथ अशुद्ध हैं, जगह कैसे दे सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

मैं उन सभी से प्यार करता हूँ जो ईमानदारी से मेरे लिए स्वयं को खपाते हैं और खुद को मेरे प्रति समर्पित करते हैं। मैं उन सभी से घृणा करता हूँ जो मुझ से जन्मे हैं, फिर भी, मुझे नहीं जानते हैं, और यहाँ तक कि मेरा विरोध भी करते हैं। मैं ऐसे किसी भी व्यक्ति का परित्याग नहीं करूँगा जो ईमानदारी से मेरे प्रति समर्पित है; बल्कि मैं उसके आशीषों को दुगुना कर दूँगा। जो लोग कृतघ्न हैं और मेरी अनुकंपा का अनादर करते हैं, उन्हें मैं दुगुनी सजा दूँगा और हल्के में नहीं छोड़ूँगा। मेरे राज्य में कोई कुटिलता या छल नहीं है, कोई सांसारिकता नहीं है; अर्थात् मृतकों की कोई दुर्गंध नहीं है। बल्कि पूर्ण रूप से सत्यपरायणता, और धार्मिकता है; पूर्ण रूप से शुद्धता और खुलापनहै, कुछ भी छुपाया या गुप्त नहीं रखा गया है। सब कुछ ताज़ा है, सब कुछ आनंदपूर्ण है, और सब कुछ आत्मिक उन्नति है। अगर किसी से अभी भी मृतकों की दुर्गंध आती है, तो वह किसी भी तरीके से मेरे राज्य में नहीं रह सकता है, बल्कि मेरी लोहे की छड़ द्वारा उसका फैसला किया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 70' से उद्धृत

मैं अपने समस्त कोप, अपने असीम सामर्थ्य और अपनी पूरी बुद्धि को प्रकट करने के लिए, मुझसे जन्मे हर उस व्यक्ति को ताड़ना दूँगा जो अभी तक मुझे नहीं जानता है। मुझमें सब कुछ धार्मिक है, कोई अधार्मिकता, कोई धोखेबाज़ी और कोई कुटिलता नहीं है; जो कोई भी कुटिल और धोखेबाज़ है, वह अवश्य ही अधोलोक में पैदा हुआ नरक का पुत्र होगा। मुझमें सब कुछ प्रत्यक्ष है; जो कुछ भी मैं कहता हूँ कि पूरा होगा, वह यकीनन पूरा होगा; जो कुछ भी मैं कहता हूँ कि स्थापित होगा, वह ज़रूर स्थापित होगा, और कोई भी इन चीज़ों को बदल नहीं सकता या इनकी नकल नहीं कर सकता, क्योंकि मैं ही एकमात्र स्वयं परमेश्वर हूँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 96' से उद्धृत

जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं लेकिन फिर भी सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे शैतान के प्रभाव से किसी भी तरह नहीं बच सकते। जो लोग ईमानदारी से अपना जीवन नहीं जीते, जो लोगों के सामने एक तरह से और उनकी पीठ पीछे दूसरी तरह से व्यवहार करते हैं, जो नम्रता, धैर्य और प्रेम का दिखावा करते हैं, जबकि मूलत: उनका सार कपटी और धूर्त होता है और परमेश्वर के प्रति उनकी कोई निष्ठा नहीं होती, ऐसे लोग अंधकार के प्रभाव में रहने वाले लोगों के विशिष्ट नमूने हैं; वे सर्प के किस्म के लोग हैं। जो लोग हमेशा अपने ही लाभ के लिए परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, जो अभिमानी और घमंडी हैं, जो दिखावा करते हैं, और जो हमेशा अपनी हैसियत की रक्षा करते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जो शैतान से प्यार करते हैं और सत्य का विरोध करते हैं। वे लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं और पूरी तरह से शैतान के होते हैं। जो लोग परमेश्वर के बोझ के प्रति सजग नहीं हैं, जो पूरे दिल से परमेश्वर की सेवा नहीं करते, जो हमेशा अपने और अपने परिवार के हितों के लिए चिंतित रहते हैं, जो खुद को परमेश्वर की खातिर खपाने के लिए हर चीज़ का परित्याग करने में सक्षम नहीं हैं, और जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार अपनी ज़िंदगी नहीं जीते, वे परमेश्वर के वचनों के बाहर जी रहे हैं। ऐसे लोगों को परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं हो सकती।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे' से उद्धृत

यह कि परमेश्वर लोगों से ईमानदार बनने का आग्रह करता है यह साबित करता है कि वो वास्तव में उन लोगों से घृणा करता है जो बेईमान हैं और परमेश्वर बेईमान लोगों को पसंद नहीं करताI परमेश्वर कपटी लोगों को पसंद नहीं करता है, इस तथ्य का अर्थ है कि वो उनके कार्यों, स्वभाव, और मंशाओं से नफ़रत करता है; अर्थात, परमेश्वर उनके कार्य करने के तरीके को पसंद नहीं करता। इसलिए, अगर हमें परमेश्वर को प्रसन्न करना है, तो हमें सबसे पहले अपने कार्यों और अपने मौजूदा अस्तित्व को बदलना होगा। इससे पहले, हमने लोगों के बीच रहने के लिए झूठ, दिखावे, और बेईमानी को अपनी पूँजी के रूप में और अस्तित्व संबंधी आधार, जीवन, और बुनियाद जिसके अनुसार हम आचरण करते थे, के रूप में उपयोग करते हुए इन पर पर भरोसा किया। यह कुछ ऐसा है जिससे परमेश्वर घृणा करता था। संसार के अविश्वासियों में यदि तू चालाकी या बेईमानी करना नहीं जानता तो तेरे लिए दृढ़ रहना कठिन हो सकता है। एक बेहतर जीवन पाने के लिए, तू केवल झूठ बोल पाएगा, धोखाधड़ी कर पाएगा, स्वयं को बचाने और छिपाने के लिए कपटी और धूर्त तरीकों का उपयोग करने में सक्षम होगा। परमेश्वर के घर में, ठीक इसका उल्टा होता है: तू जितना अधिक बेईमान होगा, उतना ही अधिक तू दिखावा करने और स्वयं को आकर्षक बनाने के लिए परिष्कृत हेरफेर का उपयोग करेगा, तब तू दृढ़ रहने में उतना ही असमर्थ होगा, परमेश्वर ऐसे लोगों को और अधिक खारिज करता और उनसे नफ़रत करता है। परमेश्वर ने पहले से तय किया है कि स्वर्ग के राज्य में केवल ईमानदार व्यक्ति ही भूमिका निभाएंगे। अगर तू ईमानदार नहीं है और अगर, तेरे जीवन में, तेरा व्यवहार ईमानदार बनने की दिशा में नहीं है और तू अपना वास्तविक चेहरा उजागर नहीं करता है, तब तुझे परमेश्वर के कार्य को प्राप्त करने या परमेश्वर की प्रशंसा हासिल करने का मौका कभी भी नहीं मिलेगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

जो शातिर होते हैं, वे सबसे ज्यादा मूर्ख होते हैं। कुटिल मत बनो। जब तुम अविश्वासियों की दुनिया में शातिर होते हो, तो तुम अपनी रक्षा कर रहे होते हो; कोई भी तुम्हारी असलियत नहीं देख सकता, और कोई भी तुम पर उँगली उठाने की हिम्मत नहीं करता। लेकिन अगर तुम परमेश्वर के घर में भी ऐसे ही हो, तो परमेश्वर कहता है कि तुम बुद्धिमान नहीं हो; तुम एक शातिर मूर्ख हो, और परमेश्वर तुम पर जरा-भी ध्यान नहीं देगा। क्या कभी परमेश्वर के वचनों में यह कहा गया है कि वह उन लोगों को पसंद करता है जो शातिर हैं, जो हमेशा षड्यंत्र रचते रहते हैं, जो खुशामदी और हाजिरजवाब हैं? (नहीं।) परमेश्वर ईमानदार लोगों को चाहता है; चाहे तुम थोड़े मूर्ख ही क्यों न हो, पर तुम्हें ईमानदार होना चाहिए। जो ईमानदार होते हैं, वे जिम्मेदारी उठा सकते हैं, वे अपने बारे में नहीं सोचते, उनके विचार शुद्ध होते हैं, और वे दिल से ईमानदार और दयालु होते हैं। वे पानी के कटोरे की तरह होते हैं—तली स्पष्ट दिखाई देती है। अगर तुम हमेशा चीजें छिपाए रहते हो, उन्हें ढकते रहते हो, उन्हें अपने तक ही रखते हो, तो लोग यह नहीं बता सकते कि तुम्हारे दिल की गहराई में वास्तव में क्या है, लेकिन परमेश्वर तुम्हारे दिल की बड़ी से बड़ी गहराई देख सकता है। परमेश्वर देख लेता है कि तुम क्या हो और वह तुम्हें नहीं चाहता, तुम्हें पसंद नहीं करता। अविश्वासियों की दुनिया में, राक्षस और दानवों के राजा उन लोगों को पसंद करते हैं, जो हाजिरजवाब और वाक्पटु होते हैं; उनके रक्षक और अनुयायी तीक्ष्ण दृष्टि वाले और सुनने की पैनी क्षमता वाले होते हैं, और उनके मुँह शहद के समान होते हैं। वे वही कहते हैं, जो अगुआ सुनना चाहता है और वे वही करते हैं, जो अगुआ उनसे करवाना चाहता है। वे अपने अगुआ की एक ही नजर से चीजों को उसी रूप में व्यवस्थित कर देते हैं। किंतु अगुआ कभी नहीं पूछता या जानना चाहता कि वे अपने दिल में क्या सोच रहे हैं, वे अगुआ को पसंद करते हैं या नहीं, या उनकी क्या योजनाएँ हैं। वे इन बातों के बारे में न तो कभी बोलते हैं और न ही उन्हें प्रकट करते हैं। अगुआ ऐसे व्यक्ति को पसंद करते हैं। लेकिन क्या परमेश्वर भी पसंद करता है? (नहीं।) राक्षस इस तरह के व्यक्ति को पसंद करते हैं, लेकिन वे तो वे लोग हैं जिनसे परमेश्वर सबसे अधिक घृणा करता है। तुम लोग जो कुछ भी करो, इस तरह के व्यक्ति न बनना। जो लोग मधुरभाषी, अनुभव करने में सक्षम हैं, जिनकी दृष्टि तीक्ष्ण और सुनने की क्षमता पैनी है, जो दुनियादार हैं, जो देख लेते हैं कि बयार किस तरफ बह रही है, और जो अपने कार्यों का जबरदस्त प्रदर्शन करते हैं—मैं तुमसे कहता हूँ, परमेश्वर के सामने ऐसे लोग तिरस्कृत होते हैं; परमेश्वर ऐसे लोगों को पसंद नहीं करता, और वह उनसे घृणा करता है। तो क्या परमेश्वर उन पर अनुग्रह कर सकता है और उन्हें प्रबुद्ध कर सकता है? क्या वह ऐसे लोगों को आशीष दे सकता है? नहीं, वे शातिर हैं, और परमेश्वर उन्हें जानवरों की ही श्रेणी में रखता है। वह उन्हें मनुष्य नहीं, जानवर समझता है। परमेश्वर की नजर में, ये लोग केवल इंसान की खाल पहने हुए हैं, लेकिन उनका आंतरिक सार शैतान का है। वे किसी जानवर या चलती-फिरती लाश के समान हैं, और परमेश्वर उन्हें कभी नहीं बचाएगा। तो परमेश्वर क्या करेगा? जब इन लोगों के साथ कुछ होता है, तो उन्हें कभी भी प्रबुद्धता या रोशनी नहीं दी जाती; उनमें सच्चे विश्वास की कमी होती है, और वे वास्तव में परमेश्वर पर निर्भर नहीं रह सकते। यही कारण है कि वे अपने भीतर एक सच्चा दायित्व विकसित नहीं कर सकते। और इन सबके अभाव में, क्या ये लोग सत्य को समझने और प्राप्त करने में सक्षम हैं? (नहीं।) तो तुम लोग क्या कहते हो—ये लोग बुद्धिमान हैं या मूर्ख? वे खुद को चतुर समझते हैं, लेकिन वास्तव में वे चतुर नहीं हैं, वे शातिर हैं और इस शातिरपन ने उन्हें तबाह कर दिया है। परमेश्वर उन्हें नहीं चाहता, और उनकी निंदा की जाती है। और यदि परमेश्वर तुम्हें नहीं चाहता, तो परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हारे लिए क्या आशा है? परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास का महत्व खो गया है, तो विश्वास करते ही क्यों हो? अंतत: कुछ भी प्राप्त न करना ही तुम्हारी नियति है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (8)' से उद्धृत

धोखेबाज व्यक्ति इस बात से अवगत हो सकते हैं कि वे चालाक हैं, कि वे झूठ बोलने के शौकीन हैं और सच बोलना पसंद नहीं करते, और यह कि वे हमेशा दूसरों से यह छिपाने की कोशिश करते हैं कि वे क्या कर रहे हैं, लेकिन फिर भी वे यह सोचते हुए मन-ही-मन खुश होते हैं कि, "इस तरह जीना बहुत अच्छा है। मैं लगातार दूसरों की आँखों में धूल झोंक रहा हूँ, लेकिन वे मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकते। जहाँ तक मेरे अपने हितों, गर्व, हैसियत और अभिमान की बात है, तो मैं लगभग हमेशा संतुष्ट रहता हूँ। चीजें मेरी योजनाओं के अनुसार, त्रुटिहीन ढंग से, निर्बाध रूप से चलती हैं, और कोई उनकी असलियत नहीं देख सकता।" क्या इस तरह का व्यक्ति ईमानदार होने को तैयार है? नहीं। वे अपनी चालाकी और कुटिलता को सकारात्मक चीजों के रूप में देखते हैं। वे उन्हें बड़े चाव से देखते हैं और उन्हें त्यागने से हिचकते हैं। वे मानते हैं कि, "जीने का यही एकमात्र आरामदायक तरीका है, यही जीवन का सही मार्ग है। केवल इसी तरह जीना मुझे एक वास्तविक व्यक्ति बनाता है, मुझे पूर्ण बनाता है, मुझे किसी योग्य बनाता है, मुझे विशिष्ट बनाता है, दूसरों में ईर्ष्या पैदा करता है, और उन्हें मेरा सम्मान करने के लिए बाध्य करता है। अगर मैं एक ईमानदार व्यक्ति होता, तो मुझे लोगों को सब-कुछ बताना होता, जैसा कि प्रभु यीशु ने कहा था : 'परन्तु तुम्हारी बात "हाँ" की "हाँ," या "नहीं" की "नहीं" हो' (मत्ती 5:37)। ऐसे लोग शीशे की तरह पारदर्शी होते हैं; वे दूसरों को पूरी तरह से अपनी असलियत देखने देते हैं, वे दूसरों को हर चीज में अपने साथ चालाकी करने देते हैं, जबकि वे खुद दूसरों के साथ चालाकी करने में असमर्थ होते हैं। मैं वैसा कभी नहीं बन सकता!" क्या ऐसा व्यक्ति अपना छल-कपट छोड़ पाएगा? ऐसे लोगों ने चाहे कितने समय तक भी परमेश्वर में विश्वास किया हो, कितने भी सत्य सुने हों, और सत्य के मार्ग को कितना भी समझा हो, वे वास्तव में कभी भी परमेश्वर का अनुसरण नहीं करेंगे। वे कभी भी खुशी-खुशी परमेश्वर का अनुसरण नहीं करेंगे, क्योंकि ऐसा करने के लिए उन्हें बहुत-कुछ त्यागना होगा। वे सोचते हैं कि ईश्वर में आस्था रखने का अर्थ है केवल धर्म में विश्वास करना, केवल नाम का विश्वासी होना, कुछ अच्छे कर्म करना, और उनके पास कोई ऐसी चीज होना जो उन्हें आध्यात्मिक पोषण दे सके, बस इतना ही। उन्हें नहीं लगता कि उन्हें ऐसी कीमत चुकाने की जरूरत है, जो किसी भी तरह से उनके हितों को प्रभावित कर सकती है, या कि उन्हें कुछ भी त्यागने की जरूरत है। उनके लिए इतना ही काफी है, वे इसी से संतुष्ट हैं, और इस तरह का विश्वास सर्वथा महान है। क्या ऐसे लोग अंत में सत्य हासिल कर पाएँगे? (वे नहीं कर सकते।) ऐसा क्यों है? उन्हें सकारात्मक चीजों से कोई प्रेम नहीं है, वे प्रकाश की लालसा नहीं करते, और वे परमेश्वर के मार्ग से या सत्य से प्रेम नहीं करते। वे बुराई से प्रेम करते हैं, उसका सम्मान करते हैं और उसका चाव रखते हैं—वे नकारात्मक चीजों का चाव रखते हैं। वे अपने दिलों में जिसका सम्मान करते हैं, जिसकी प्रशंसा करते हैं, जिसका अनुसरण करते हैं और जिसके लिए लालसा करते हैं, वह कोई ऐसा व्यक्ति नहीं होता जिसके पास सत्य होता है, न ही वह कोई परमेश्वर का प्रिय व्यक्ति होता है, बल्कि वह ऐसा व्यक्ति होता है जो बाहर से अच्छे कर्म करता प्रतीत होता है। गुप्त रूप से अपनी धोखाधड़ी कर सकने और दूसरों की आँखों में धुल झोंक सकने के लिए वे वही चाहते हैं, जो उन्होंने अपने मन में गढ़ रखा है, और अपनी किसी ऐसी इच्छा या योजना को, जिससे कोई भी उनकी असलियत न देख सके। वे चाहते हैं कि वे किसी भी भीड़ में पूरी सहजता से घुलमिल सकें, पूरे कला-कौशल के साथ हर तरह की चालें, योजनाएँ और दाँव चल सकें, और जहाँ भी वे जाएँ, उनका सम्मान के साथ स्वागत-सत्कार किया जाए। वे इसी तरह का व्यक्ति बनना चाहते हैं। यह किस तरह का मार्ग है? यह राक्षसों का मार्ग है। यह किसी सच्चे इंसान द्वारा अपनाया जाने वाला मार्ग नहीं है। लोगों को उनके व्यक्तिगत भरोसे के कारण ठगने के लिए, उन्हें एक अच्छी अनुभूति और एक झूठा भ्रम देने के लिए वे शैतान के सांसारिक दर्शनों, उसके तर्क, उस दिशा जिसमें वह अपने कार्यों को लक्षित करता है और उसके कार्यों को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों का उपयोग करते हैं; वे हर परिवेश में हर चाल, हर फरेब का इस्तेमाल करते हैं। यह वह मार्ग नहीं है, जिस पर परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों को चलना चाहिए; इसका अंत केवल यह नहीं है कि वे बचाए नहीं जाएँगे, बल्कि उन्हें दंड भी मिलेगा। यह इसी तरह की मंजिल होगी—इसमें जरा भी संदेह नहीं हो सकता।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'धर्म में विश्‍वास से कभी उद्धार नहीं होगा' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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