1. ईमानदार व्यक्ति क्या होता है और परमेश्वर लोगों से ईमानदार होने की अपेक्षा क्यों करता है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

तुम लोगों को पता होना चाहिए कि परमेश्वर ईमानदार इंसान को पसंद करता है। मूल बात यह है कि परमेश्वर निष्ठावान है, अत: उसके वचनों पर हमेशा भरोसा किया जा सकता है; इसके अतिरिक्त, उसका कार्य दोषरहित और निर्विवाद है, यही कारण है कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके साथ पूरी तरह से ईमानदार होते हैं। ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; हर बात में उसके साथ सच्चाई से पेश आना; हर बात में उसके साथ खुलापन रखना, कभी तथ्यों को न छुपाना; अपने से ऊपर और नीचे वालों को कभी भी धोखा न देना, और परमेश्वर से लाभ उठाने मात्र के लिए काम न करना। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और शब्दों में शुद्धता रखना, न तो परमेश्वर को और न ही इंसान को धोखा देना। मैं जो कहता हूँ वह बहुत सरल है, किंतु तुम लोगों के लिए दुगुना मुश्किल है। बहुत-से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने की बजाय नरक में दंडित होना पसंद करेंगे। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि जो बेईमान हैं उनके लिए मेरे भंडार में अन्य उपचार भी है। मैं अच्छी तरह से जानता हूँ तुम्हारे लिए ईमानदार इंसान बनना कितना मुश्किल काम है। चूँकि तुम लोग बहुत चतुर हो, अपने तुच्छ पैमाने से लोगों का मूल्यांकन करने में बहुत अच्छे हो, इससे मेरा कार्य और आसान हो जाता है। और चूंकि तुम में से हरेक अपने भेदों को अपने सीने में भींचकर रखता है, तो मैं तुम लोगों को एक-एक करके आपदा में भेज दूँगा ताकि अग्नि तुम्हें सबक सिखा सके, ताकि उसके बाद तुम मेरे वचनों के प्रति पूरी तरह समर्पित हो जाओ। अंततः, मैं तुम लोगों के मुँह से "परमेश्वर एक निष्ठावान परमेश्वर है" शब्द निकलवा लूँगा, तब तुम लोग अपनी छाती पीटोगे और विलाप करोगे, "कुटिल है इंसान का हृदय!" उस समय तुम्हारी मनोस्थिति क्या होगी? मुझे लगता है कि तुम उतने खुश नहीं होगे जितने अभी हो। तुम लोग इतने "गहन और गूढ़" तो बिल्कुल भी नहीं होगे जितने कि तुम अब हो। कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं, वे "शिष्ट व्यवहार " के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, फिर भी आत्मा की उपस्थिति में वे अपने जहरीले दाँत और पँजे दिखाने लगते हैं। क्या तुम लोग ऐसे इंसान को ईमानदार लोगों की श्रेणी में रखोगे? यदि तुम पाखंडी और ऐसे व्यक्ति हो जो "व्यक्तिगत संबंधों" में कुशल है, तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को हल्के में लेने का प्रयास करता है। यदि तुम्हारी बातें बहानों और महत्वहीन तर्कों से भरी हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने से घृणा करता है। यदि तुम्हारे पास ऐसी बहुत-से गुप्त भेद हैं जिन्हें तुम साझा नहीं करना चाहते, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने राज़ और अपनी कठिनाइयाँ उजागर करने के विरुद्ध हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और तुम सरलता से अंधकार से बाहर नहीं निकल पाओगे। यदि सत्य का मार्ग खोजने से तुम्हें प्रसन्नता मिलती है, तो तुम सदैव प्रकाश में रहने वाले व्यक्ति हो। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवाकर्मी बने रहकर बहुत प्रसन्न हो, गुमनाम बनकर कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से काम करते हो, हमेशा देने का भाव रखते हो, लेने का नहीं, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक निष्ठावान संत हो, क्योंकि तुम्हें किसी फल की अपेक्षा नहीं है, तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो। यदि तुम स्पष्टवादी बनने को तैयार हो, अपना सर्वस्व खपाने को तैयार हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन दे सकते हो और दृढ़ता से अपनी गवाही दे सकते हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम्हें केवल परमेश्वर को संतुष्ट करना आता है, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि ऐसे लोग प्रकाश में पोषित किए जाते हैं और वे सदा राज्य में रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

मैं उन लोगों में प्रसन्नता अनुभव करता हूँ जो दूसरों पर शक नहीं करते, और मैं उन लोगों को पसंद करता हूँ जो सच को तत्परता से स्वीकार कर लेते हैं; इन दो प्रकार के लोगों की मैं बहुत परवाह करता हूँ, क्योंकि मेरी नज़र में ये ईमानदार लोग हैं। यदि तुम धोखेबाज हो, तो तुम सभी लोगों और मामलों के प्रति सतर्क और शंकित रहोगे, और इस प्रकार मुझमें तुम्हारा विश्वास संदेह की नींव पर निर्मित होगा। मैं इस तरह के विश्वास को कभी स्वीकार नहीं कर सकता। सच्चे विश्वास के अभाव में तुम सच्चे प्यार से और भी अधिक वंचित हो। और यदि तुम परमेश्वर पर इच्छानुसार संदेह करने और उसके बारे में अनुमान लगाने के आदी हो, तो तुम यकीनन सभी लोगों में सबसे अधिक धोखेबाज हो। तुम अनुमान लगाते हो कि क्या परमेश्वर मनुष्य जैसा हो सकता है : अक्षम्य रूप से पापी, क्षुद्र चरित्र का, निष्पक्षता और विवेक से विहीन, न्याय की भावना से रहित, शातिर चालबाज़ियों में प्रवृत्त, विश्वासघाती और चालाक, बुराई और अँधेरे से प्रसन्न रहने वाला, आदि-आदि। क्या लोगों के ऐसे विचारों का कारण यह नहीं है कि उन्हें परमेश्वर का थोड़ा-सा भी ज्ञान नहीं है? ऐसा विश्वास पाप से कम नहीं है! कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो मानते हैं कि जो लोग मुझे खुश करते हैं, वे बिल्कुल ऐसे लोग हैं जो चापलूसी और खुशामद करते हैं, और जिनमें ऐसे हुनर नहीं होंगे, वे परमेश्वर के घर में अवांछनीय होंगे और वे वहाँ अपना स्थान खो देंगे। क्या तुम लोगों ने इतने बरसों में बस यही ज्ञान हासिल किया है? क्या तुम लोगों ने यही प्राप्त किया है? और मेरे बारे में तुम लोगों का ज्ञान इन गलतफहमियों पर ही नहीं रुकता; परमेश्वर के आत्मा के खिलाफ तुम्हारी निंदा और स्वर्ग की बदनामी इससे भी बुरी बात है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि ऐसा विश्वास तुम लोगों को केवल मुझसे दूर भटकाएगा और मेरे खिलाफ बड़े विरोध में खड़ा कर देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

मैंने मनुष्य के लिए आरंभ से ही बहुत कठोर मानक रखा है। यदि तुम्हारी वफ़ादारी इरादों और शर्तों के साथ आती है, तो मैं तुम्हारी तथाकथित वफादारी के बिना रहूँगा, क्योंकि मैं उन लोगों से घृणा करता हूँ जो मुझे अपने इरादों से धोखा देते हैं और शर्तों के साथ मुझसे ज़बरन वसूली करते हैं। मैं मनुष्यों से सिर्फ़ यही चाहता हूँ कि वे मेरे प्रति पूरे वफादार हों और सब चीज़े एक शब्द : विश्वास के वास्ते—और उसे साबित करने के लिए करें। मैं तुम्हारे द्वारा मुझे प्रसन्न करने की कोशिश करने के लिए की जाने वाली खुशामद का तिरस्कार करता हूँ, क्योंकि मैंने हमेशा तुम सबके साथ ईमानदारी से व्यवहार किया है, और इसलिए मैं तुम सब से भी यही चाहता हूँ कि तुम भी मेरे प्रति एक सच्चे विश्वास के साथ कार्य करो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?' से उद्धृत

ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्तियाँ क्या होती हैं? इस विषय की मूल बात है सब चीज़ों में सत्य का पालन करना। यदि तुम यह कहते हो कि तुम ईमानदार हो, लेकिन तुम परमेश्वर के उपदेशों को हमेशा अपने दिमाग़ के कोने में रखते हो और वही करते हो जो तुम चाहते हो, तो क्या यह एक ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्ति है? तुम कहते हो, "मेरी क्षमता कम है, लेकिन दिल से ईमानदार हूँ।" लेकिन, जब तुम्हें कोई कर्तव्य पूरा करने के लिए दिया जाता है, तो तुम पीड़ा सहने से या इस बात से डरते हो कि अगर तुमने इसे अच्छी तरह से पूरा नहीं किया तो तुम्हें इसकी ज़िम्मेदारी लेनी होगी, इसलिये तुम इससे बचने के लिये बहाने बनाते हो और उसे पूरा करवाने के लिए दूसरों के नाम सुझाते हो। क्या यह एक ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्ति है? बिल्कुल भी ऐसा नहीं है। तो फिर, एक ईमानदार व्यक्ति को कैसे व्यवहार करना चाहिये? उन्हें अपने कर्तव्यों को स्वीकार करना चाहिये और उसका पालन करना चाहिये, और फिर अपनी सर्वोत्तम क्षमता के अनुसार उसे पूरा करने में पूरी तरह से समर्पित होना चाहिये, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने का प्रयास करना चाहिये। यह कई तरीकों से व्यक्त क्या जाता है। एक तरीका यह है कि तुम्हें अपने कर्तव्य को ईमानदारी से स्वीकार करना चाहिये, तुम्हें किसी और चीज़ के बारे में नहीं सोचना चाहिये, और अधूरे मन से इसके लिए तैयार नहीं होना चाहिये। अपने खुद लाभ के लिये जाल न बिछाओ। यह ईमानदारी की अभिव्यक्ति है। दूसरा तरीका है इसमें पूरी जी-जान लगा देना। तुम कहते हो, "यह वो सब कुछ है जो मैं कर सकता हूँ; मैं सब लगा दूंगा, और सब पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित कर दूंगा।" क्या यह ईमानदारी की अभिव्यक्ति नहीं है? तुम अपना सब कुछ और जो कुछ भी तुम कर सकते हो, उसे समर्पित कर देते हो—यह ईमानदारी की एक अभिव्यक्ति है। यदि तुम अपना सब कुछ समर्पित करने को इच्छुक नहीं हो, यदि तुम इसे छिपा कर, बचा कर रखते हो, तो तुम अपने कामों में फिसड्डी हो, अपने कर्तव्यों से बचते हो और उन्हें किसी और से इसलिए करवाते हो क्योंकि तुम अच्छा काम न कर पाने के परिणामों को भुगतने से डरते हो, तो क्या यह ईमानदार होना है? नहीं, यह नहीं है। इसलिए, ईमानदार व्यक्ति होना केवल एक इच्छा रखना ही नहीं है। यदि तुम इसे तब अभ्यास में नहीं लाते, जब तुम्हारे साथ कोई बात हो जाये तो फिर तुम एक ईमानदार व्यक्ति नहीं हो। जब तुम्हारे सामने समस्याएं आएं तो तुम्हें सत्य का पालन करना चाहिए और व्यावहारिक अभिव्यक्ति रखनी चाहिए। यह ईमानदार व्यक्ति होने का एकमात्र तरीका है, और यही एक ईमानदार हृदय की अभिव्यक्तियां हैं। कुछ लोग ऐसा महसूस करते हैं कि एक ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए, यह पर्याप्त है कि हम केवल सत्य बोलें और झूठ न बोलें। क्या ईमानदार होने की परिभाषा इतनी सीमित है? तुम्हें अपना हृदय प्रकट करना होगा और इसे परमेश्वर को सौंपना होगा, यही वह अभिवृत्ति है जो एक ईमानदार व्यक्ति में होनी चाहिए। इसलिए ईमानदारी इतनी क़ीमती है। यहाँ पर निहितार्थ क्या है? यहाँ निहितार्थ यह है कि यह हृदय तुम्हारे व्यवहार को नियंत्रित करने में सक्षम है और तुम्हारी अवस्थाओं को नियंत्रित करने में सक्षम है। यदि तुम्हारे अंदर इस तरह की ईमानदारी है, तो तुम्हें इसी तरह की अवस्था में जीना चाहिए, इसी तरह का व्यवहार दिखाना चाहिए, इसी तरह खुद को खपाना चाहिए। ईमानदार हृदय इतनी क़ीमती चीज़ है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल ईमानदार व्यक्ति बनकर ही कोई वास्तव में ख़ुश हो सकता है' से उद्धृत

यदि तुमने बरसों परमेश्वर में विश्वास रखा है, और लोग जितना अधिक तुम्हारे संपर्क में आते हैं, उतना ही वे सोचते हैं कि तुम ईमानदार हो—अपने शब्दों में ईमानदार हो, दूसरों के साथ और अपने कर्तव्यों का पालन करने में ईमानदार हो, यानी तुम एक स्पष्ट और पारदर्शी व्यक्ति हो, अपने शब्दों और कार्यों में पारदर्शी हो; और यदि, तुम जो कहते और करते हो उसके जरिए, तुम्हारे द्वारा व्यक्त विचारों और तुम्हारे कर्तव्यों के निर्वहन के जरिए, लोगों से बातचीत के दौरान तुम्हारे ईमानदार रवैये के जरिए, लोग तुम्हारा दिल, तुम्हारा चरित्र, तुम्हारा स्वभाव और लक्ष्य के साथ-साथ तुम्हारी अंतरतम आकांक्षाएं और उद्देश्य देख सकते हैं, और यह भी देख सकते हैं कि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो, तो तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो। यदि तुमने काफी समय से परमेश्वर में विश्वास रखा है और अपना कर्तव्य निभाया है, लेकिन लोगों को लगता है कि तुम अपनी बातचीत में पारदर्शी नहीं हो और वे तुम्हारे विचार ठीक से नहीं बता सकते, और जब तुम काम करते हो तो वे तुम्हारा दिल या तुम्हारे अंतरतम इरादे और प्रयोजन नहीं देख पाते; और तुम चीजों को गुप्त रखने वाले व्यक्ति हो, खुद को छिपाने में माहिर हो, खुद को आवरण में लपेटने में अच्छे हो, स्वयं को गोपनीय रखने और बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने में बहुत अच्छे हो; और बरसों तक तुम्हारे संपर्क में रहने दूसरे लोग भी तुम्हारे दिल को नहीं देख पाते, उन्हें केवल तुम्हारे मिजाज और चरित्र की झलक ही मिल पाती है, वे केवल इतना ही जान पाते हैं कि तुम क्रोधी मिजाज के हो या ठंडे मिजाज के या जी-हुजूरी करने वाले इंसान हो—यदि वे केवल तुम्हारा चरित्र देख पाते हैं, लेकिन यह नहीं देख पाते कि तुम्हारे गहनतम स्वभाव का सार क्या है, तो तुम परेशानी में हो। इससे क्या साबित होता है? इससे साबित होता है कि तुम्हारा हृदय अभी भी शैतान द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है, तुमने लेश-मात्र भी सत्य प्राप्त नहीं किया है, और तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव बिल्कुल भी शुद्ध नहीं हुआ है। ऐसे व्यक्ति को बचाना बहुत कठिन है। इस तथ्य के बावजूद कि वे टालमटोल करते हैं, उनमें वाक्-चातुर्य होता है, वे चतुर और तेज-तर्रार होते हैं और पारस्परिक संबंधों में अच्छे होते हैं, लेकिन जो लोग उनके साथ काम करते हैं, उनमें हमेशा एक अनिश्चितता, अविश्वसनीयता और विश्वासहीनता का भाव रहता है—उन्हें लगता है कि ऐसा व्यक्ति भरोसे के काबिल नहीं है। उसके साथ काम करने वाले लोगों को लगता है कि यह व्यक्ति जितना बता रहा है, उससे अधिक छिपा रहा है, जिसे जाना नहीं जा सकता। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर का सच्चा विश्वासी नहीं होता।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'ईमानदार होकर ही कोई सच्ची मानव सदृशता जी सकता है' से उद्धृत

परमेश्वर ने हमेशा इस बात पर ज़ोर क्यों दिया है कि लोगों को ईमानदार होना चाहिए? क्योंकि यह बहुत महत्वपूर्ण है, और यह सीधे तौर पर इस बात से संबंधित है कि तुझे बचाया जा सकता है या नहीं। कुछ लोग कहते हैं: "मैं बहुत अहंकारी, बहुत पाखंडी हूँ, बहुत तुनक-मिजाज हूँ, मैं अक्सर अपनी वास्तविकता को उजागर करता हूँ, मैं बनावटी और निरथक व्यक्ति हूँ, मुझे लोगों को हँसाना पसंद है, मैं हमेशा दूसरों का अनुमोदन चाहता हूँ...।" यह सब छोटी-मोटी बातें हैं। हमेशा उनके बारे में ही बातें न करते रहो। तुम्हारा स्वभाव या व्यक्तित्व कैसा भी हो, अगर तुम परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार ईमानदार बने रहते हो, तो तुम बचाए जा सकते हो। अच्छा तुम लोग क्या कहते हो, क्या ईमानदार होना महत्वपूर्ण है? यह सबसे महत्वपूर्ण चीज है और इसलिए परमेश्वर के वचनों के अंश, तीन चेतावनियाँ में भी ऐसा ही लिखा है, परमेश्वर ईमानदार बनने की बात करता है। इस तथ्य के बावजूद कि परमेश्वर आत्मा में निवास करने, सामान्य आध्यात्मिक जीवन जीने, उचित कलीसियाई जीवन जीने या अन्य ग्रंथों में सामान्य मानवता में जीने की बात करता है, लेकिन वह कहीं भी स्पष्ट रूप से नहीं बताता कि तुम्हें किस तरह का इंसान होना चाहिए या कैसे अभ्यास करना है—लेकिन ईमानदार होने के बारे में बात करते समय, वह लोगों को मार्ग दिखाता है और उन्हें बताता है कि इसे अभ्यास में कैसे लाएँ; यह बहुत स्पष्ट है। परमेश्वर कहता है, "यदि तुम्हारे पास ऐसी बहुत-से गुप्त भेद हैं जिन्हें तुम साझा नहीं करना चाहते, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने राज़ और अपनी कठिनाइयाँ उजागर करने के विरुद्ध हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा।" ईमानदार होना उद्धार पाने से संबंधित है। तुम क्या कहते हो, क्या ईमानदार होना महत्वपूर्ण है? (हाँ।) परमेश्वर जिन्हें चाहता है वे हैं ईमानदार लोग। यदि तू झूठ और धोखे में सक्षम है, तो तू एक विश्वासघाती, कुटिल और कपटी व्यक्ति है, और एक ईमानदार व्यक्ति नहीं है। और यदि तू एक ईमानदार व्यक्ति नहीं है, तो कोई अवसर नहीं है कि परमेश्वर तुझे बचाएगा, ना ही तू संभवतः बचाया जा सकता है। तुम कोई ऐसे व्यक्ति नहीं बन गए जो ईमानदार हो और तुम कहते हो, तुम पहले से ही बहुत बड़े भक्त हो, तुम अहंकारी या दंभी नहीं हो, तुम कीमत चुका सकते हो या तुम सुसमाचार का प्रचार करके अनेक लोगों को परमेश्वर के पास ला सकते हो। लेकिन तुम ईमानदार नहीं हो, तुम अभी भी कपटी हो और तुममें कोई बदलाव नहीं आया है। क्या तुम्हें बचाया जा सकता है? (नहीं।) इसलिए परमेश्वर के ये वचन हम में से प्रत्येक को याद दिलाते हैं कि बचाए जाने के लिए, हमें सबसे पहले परमेश्वर के वचनों और उसकी आवश्यकताओं के अनुसार ईमानदार होना होगा। हमें स्वयं को खोलकर रख देना होगा, अपने भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करना होगा और प्रकाश के मार्ग की खोज के लिए हमें अपनी मंशाओं और रहस्यों को उजागर करके, प्रकाश-मार्ग की खोज करनी होगी।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

यह कि परमेश्वर लोगों से ईमानदार बनने का आग्रह करता है यह साबित करता है कि वो वास्तव में उन लोगों से घृणा करता है जो बेईमान हैं और परमेश्वर बेईमान लोगों को पसंद नहीं करताI परमेश्वर कपटी लोगों को पसंद नहीं करता है, इस तथ्य का अर्थ है कि वो उनके कार्यों, स्वभाव, और मंशाओं से नफ़रत करता है; अर्थात, परमेश्वर उनके कार्य करने के तरीके को पसंद नहीं करता। इसलिए, अगर हमें परमेश्वर को प्रसन्न करना है, तो हमें सबसे पहले अपने कार्यों और अपने मौजूदा अस्तित्व को बदलना होगा। इससे पहले, हमने लोगों के बीच रहने के लिए झूठ, दिखावे, और बेईमानी को अपनी पूँजी के रूप में और अस्तित्व संबंधी आधार, जीवन, और बुनियाद जिसके अनुसार हम आचरण करते थे, के रूप में उपयोग करते हुए इन पर पर भरोसा किया। यह कुछ ऐसा है जिससे परमेश्वर घृणा करता था। संसार के अविश्वासियों में यदि तू चालाकी या बेईमानी करना नहीं जानता तो तेरे लिए दृढ़ रहना कठिन हो सकता है। एक बेहतर जीवन पाने के लिए, तू केवल झूठ बोल पाएगा, धोखाधड़ी कर पाएगा, स्वयं को बचाने और छिपाने के लिए कपटी और धूर्त तरीकों का उपयोग करने में सक्षम होगा। परमेश्वर के घर में, ठीक इसका उल्टा होता है: तू जितना अधिक बेईमान होगा, उतना ही अधिक तू दिखावा करने और स्वयं को आकर्षक बनाने के लिए परिष्कृत हेरफेर का उपयोग करेगा, तब तू दृढ़ रहने में उतना ही असमर्थ होगा, परमेश्वर ऐसे लोगों को और अधिक खारिज करता और उनसे नफ़रत करता है। परमेश्वर ने पहले से तय किया है कि स्वर्ग के राज्य में केवल ईमानदार व्यक्ति ही भूमिका निभाएंगे। अगर तू ईमानदार नहीं है और अगर, तेरे जीवन में, तेरा व्यवहार ईमानदार बनने की दिशा में नहीं है और तू अपना वास्तविक चेहरा उजागर नहीं करता है, तब तुझे परमेश्वर के कार्य को प्राप्त करने या परमेश्वर की प्रशंसा हासिल करने का मौका कभी भी नहीं मिलेगा।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर लोगों से धोखेबाज न बनने के लिए कहता है, उनसे ईमानदार बनने, ईमानदारी से बात करने और ईमानदार चीज़ें करने के लिए कहता है। परमेश्वर के यह कहने का अर्थ लोगों को एक सच्ची मानवीय समानता रखने देना है, ताकि उनमें शैतान की समानता न हो, जो जमीन पर रेंगते साँप की तरह बोलता है, मामले की सच्चाई को ढकते हुए हमेशा गोलमोल बातें करता है। अर्थात्, ऐसा इसलिए कहा गया है, ताकि लोग बिना किसी अंधकारमय पहलू के, बिना किसी शर्मनाक बात के, साफ दिल के साथ, वचन और कर्म दोनों से गरिमापूर्ण और ईमानदार जीवन जी सकें, जहाँ बाहर-भीतर की बातों में तारतम्य हो; वे वही कहते हैं जो वे अपने दिल में सोचते हैं, और वे न तो किसी व्यक्ति को, न ही परमेश्वर को धोखा देते हैं, कुछ भी छिपाकर नहीं रखते, और उनका दिल शुद्ध भूमि के टुकड़े की तरह होता है। लोगों से ईमानदार होने की अपेक्षा करने के पीछे परमेश्वर का यही उद्देश्य है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्‍वर की प्रबंधन योजना का सर्वाधिक लाभार्थी मनुष्‍य है' से उद्धृत

लोग ईमानदार होकर ही जान सकते हैं कि वे कितनी बुरी तरह से भ्रष्ट हैं और उनमें इंसानियत बची है या नहीं; ईमानदारी पर अमल करने पर ही वे जान सकते हैं कि वे कितने झूठ बोलते हैं और कपट और बे‌ईमानी उनके अंदर कितनी गहराई में छिपे हैं। ईमानदारी पर अमल करने का अनुभव होने पर ही वे धीरे-धीरे अपनी भ्रष्टता की सच्चाई को जान सकते हैं और अपने प्रकृति सार को पहचान सकते हैं और तभी उनका भ्रष्ट स्वभाव निरंतर शुद्ध हो सकता है। अपने भ्रष्ट स्वभाव की निरंतर शुद्धि के दौरान ही लोग सत्य पा सकते हैं। इन वचनों का अनुभव करने के लिए समय लो। परमेश्वर उन लोगों को सिद्ध नहीं बनाता है जो धोखेबाज हैं। यदि तुम लोगों का हृदय ईमानदार नहीं है, यदि तुम ईमानदार व्यक्ति नहीं हो, तो परमेश्वर कभी भी तुम्हें प्राप्त नहीं करेगा। इसी तरह, तुम भी कभी भी सत्य को प्राप्त नहीं कर पाओगे, और परमेश्वर को पाने में भी असमर्थ रहोगे। यदि तुम परमेश्वर को प्राप्त नहीं कर पाते हो और सत्य को नहीं समझते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर से शत्रुता रखते हो, तुम परमेश्वर से असंगत हो और वह तुम्हारा परमेश्वर नहीं है। यदि परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर नहीं है, तो तुम उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते। यदि तुम उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते, तो तुम हमेशा परमेश्वर के कट्टर शत्रु बनकर रहोगे और तुम्हारा परिणाम निर्धारित होगा। इस प्रकार, यदि लोग चाहते हैं कि उन्हें बचाया जाए, तो उन्हें ईमानदार बनना शुरू करना होगा। ऐसा एक संकेत है जो उन लोगों को चिह्नित करता है, जिन्हें अंतत: परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाएगा। क्या तुम लोग जानते हो कि वह क्या है? बाइबल में, प्रकाशित-वाक्य में लिखा है: "और उनके मुँह में कोई झूठ नहीं था; उन पर कोई कलंक नहीं है।" कौन हैं "वे"? ये वो लोग हैं जिन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण और प्राप्त किया जाता है और बचाया जाता है। परमेश्वर उनका वर्णन कैसे करता है? उनके क्रियाकलापों की विशिष्टताएँ और अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? (उन पर कोई कलंक नहीं है। वे झूठ नहीं बोलते।‌) तुम सबको इस बात को समझना और ग्रहण करना चाहिए कि झूठ न बोलने का क्या अर्थ है: इसका अर्थ ईमानदार होना है। उन पर कोई कलंक नहीं है का क्या अर्थ है? जो व्यक्ति कलंकित नहीं है, उसे परमेश्वर कैसे परिभाषित करता है? जो लोग कलंकित नहीं हैं वे परमेश्वर का भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं; ऐसे ही लोग परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर की दृष्टि में पूर्ण होते हैं; ऐसे लोग कलंकित नहीं हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन संवृद्धि के छह संकेतक' से उद्धृत

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