3. क्या बाइबल के ज्ञान और धर्मशास्त्रीय सिद्धांत को समझने का अर्थ सत्य को समझना और परमेश्वर को जानना है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

कई लोग परमेश्वर के वचनों को दिन-रात पढ़ते रहते हैं, यहाँ तक कि उनके उत्कृष्ट अंशों को सबसे बेशकीमती संपत्ति के तौर पर स्मृति में अंकित कर लेते हैं, इतना ही नहीं, वे जगह-जगह परमेश्वर के वचनों का प्रचार करते हैं, और दूसरों को भी परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति करके उनकी सहायता करते हैं। वे सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर की गवाही देना है, उसके वचनों की गवाही देना है; ऐसा करना परमेश्वर के मार्ग का पालन करना है; वे सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीना है, ऐसा करना उसके वचनों को अपने जीवन में लागू करना है, ऐसा करना उन्हें परमेश्वर की सराहना प्राप्त करने, बचाए जाने और पूर्ण बनाए जाने योग्य बनाएगा। परंतु परमेश्वर के वचनों का प्रचार करते हुए भी वे कभी परमेश्वर के वचनों पर खुद अमल नहीं करते या परमेश्वर के वचनों में जो प्रकाशित किया गया है, उसके अनुरूप अपने आप को ढालने की कोशिश नहीं करते। इसके बजाय, वे परमेश्वर के वचनों का उपयोग छल से दूसरों की प्रशंसा और विश्वास प्राप्त करने, अपने दम पर प्रबंधन में प्रवेश करने, परमेश्वर की महिमा का गबन और उसकी चोरी करने के लिए करते हैं। वे परमेश्‍वर के वचनों के प्रसार से मिले अवसर का दोहन परमेश्‍वर का कार्य और उसकी प्रशंसा पाने के लिए करने की व्‍यर्थ आशा करते हैं। कितने ही वर्ष गुज़र चुके हैं, परंतु ये लोग परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने की प्रक्रिया में न केवल परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करने में असमर्थ रहे हैं, परमेश्वर के वचनों की गवाही देने की प्रक्रिया में न केवल उस मार्ग को खोजने में असफल रहे हैं जिसका उन्हें अनुसरण करना चाहिए, दूसरों को परमेश्वर के वचनों से सहायता और पोषण प्रदान करने की प्रक्रिया में न केवल उन्होंने स्वयं सहायता और पोषण नहीं पाया है, और इन सब चीज़ों को करने की प्रक्रिया में वे न केवल परमेश्वर को जानने या परमेश्वर के प्रति स्वयं में वास्तविक श्रद्धा जगाने में असमर्थ रहे हैं; बल्कि, इसके विपरीत, परमेश्वर के बारे में उनकी गलतफहमियाँ और अधिक गहरी हो रही हैं; उस पर अविश्वास और अधिक बढ़ रहा है और उसके बारे में उनकी कल्पनाएँ और अधिक अतिशयोक्तिपूर्ण होती जा रही हैं। परमेश्वर के वचनों के बारे में अपने सिद्धांतों से आपूर्ति और निर्देशन पाकर वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे बिलकुल मनोनुकूल परिस्थिति में हों, मानो वे अपने कौशल का सरलता से इस्तेमाल कर रहे हों, मानो उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य, अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया हो, और मानो उन्होंने एक नया जीवन जीत लिया हो और वे बचा लिए गए हों, मानो परमेश्वर के वचनों को धाराप्रवाह बोलने से उन्‍होंने सत्य प्राप्त कर लिया हो, परमेश्वर के इरादे समझ लिए हों, और परमेश्वर को जानने का मार्ग खोज लिया हो, मानो परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने की प्रक्रिया में वे अकसर परमेश्वर से रूबरू होते हों। साथ ही, अक्सर वे "द्रवित" होकर बार-बार रोते हैं और बहुधा परमेश्वर के वचनों में "परमेश्वर" की अगुआई प्राप्त करते हुए, वे उसकी गंभीर परवाह और उदार मंतव्य समझते प्रतीत होते हैं और साथ ही लगता है कि उन्होंने मनुष्य के लिए परमेश्वर के उद्धार और उसके प्रबंधन को भी जान लिया है, उसके सार को भी जान लिया है और उसके धार्मिक स्वभाव को भी समझ लिया है। इस नींव के आधार पर, वे परमेश्वर के अस्तित्‍व पर और अधिक दृढ़ता से विश्वास करते, उसकी उत्कृष्टता की स्थिति से और अधिक परिचित होते और उसकी भव्यता एवं श्रेष्ठता को और अधिक गहराई से महसूस करते प्रतीत होते हैं। परमेश्वर के वचनों के सतही ज्ञान से ओतप्रोत होने से ऐसा प्रतीत होता है कि उनके विश्वास में वृद्धि हुई है, कष्ट सहने का उनका संकल्प दृढ़ हुआ है, और परमेश्वर संबंधी उनका ज्ञान और अधिक गहरा हुआ है। वे नहीं जानते कि जब तक वे परमेश्वर के वचनों का वास्तव में अनुभव नहीं करेंगे, तब तक उनका परमेश्वर संबंधी सारा ज्ञान और उसके बारे में उनके विचार उनकी अपनी इच्छित कल्पनाओं और अनुमान से निकलते हैं। उनका विश्वास परमेश्वर की किसी भी प्रकार की परीक्षा के सामने नहीं ठहरेगा, उनकी तथाकथित आध्‍यात्मिकता और उनका आध्‍यात्मिक कद परमेश्वर के किसी भी परीक्षण या निरीक्षण के तहत बिलकुल नहीं ठहरेगी, उनका संकल्प रेत पर बने हुए महल से अधिक कुछ नहीं है, और उनका परमेश्वर संबंधी तथाकथित ज्ञान उनकी कल्पना की उड़ान से अधिक कुछ नहीं है। वास्तव में इन लोगों ने, जिन्होंने एक तरह से परमेश्वर के वचनों पर काफी परिश्रम किया है, कभी यह एहसास ही नहीं किया कि सच्ची आस्था क्या है, सच्ची आज्ञाकारिता क्या है, सच्ची देखभाल क्या है, या परमेश्वर का सच्चा ज्ञान क्या है। वे सिद्धांत, कल्पना, ज्ञान, हुनर, परंपरा, अंधविश्वास, यहाँ तक कि मानवता के नैतिक मूल्यों को भी परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने के लिए "पूँजी" और "हथियार" का रूप दे देते हैं, उन्‍हें परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने का आधार बना लेते हैं। साथ ही, वे इस पूँजी और हथियार का जादुई तावीज़ भी बना लेते हैं और उसके माध्यम से परमेश्वर को जानते हैं और उसके निरीक्षणों, परीक्षणों, ताड़ना और न्याय का सामना करते हैं। अंत में जो कुछ वे प्राप्त करते हैं, उसमें फिर भी परमेश्वर के बारे में धार्मिक संकेतार्थों और सामंती अंधविश्वासों से ओतप्रोत निष्कर्षों से अधिक कुछ नहीं होता, जो हर तरह से रोमानी, विकृत और रहस्‍यमय होता है। परमेश्वर को जानने और उसे परिभाषित करने का उनका तरीका उन्हीं लोगों के साँचे में ढला होता है, जो केवल ऊपर स्वर्ग में या आसमान में किसी वृद्ध के होने में विश्वास करते हैं, जबकि परमेश्वर की वास्तविकता, उसका सार, उसका स्वभाव, उसका स्‍वरूप और अस्तित्‍व आदि—वह सब, जो वास्तविक स्वयं परमेश्वर से संबंध रखता है—ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें समझने में उनका ज्ञान विफल रहा है, जिनसे उनके ज्ञान का पूरी तरह से संबंध-विच्छेद हो गया है, यहाँ तक कि वे इतने अलग हैं, जितने उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

फरीसियों के पाखंड की मुख्य अभिव्यक्ति क्या थी? उन्होंने केवल पवित्र ग्रंथ को डूबकर पढ़ा और सत्य को तलाश नहीं किया। उन्होंने जब परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, तो प्रार्थना या तलाश नहीं की; इसके बजाय, उन्होंने परमेश्वर के वचनों को पढ़ा, परमेश्वर ने क्या कहा और क्या किया था उसे पढ़ा, और इस तरह उसके वचनों को एक प्रकार के मत, एक सिद्धांत में बदल दिया जिसे उन्होंने दूसरों को पढ़ाया। यही है परमेश्वर के वचनों को डूबकर पढ़ना। तो उन्होंने ऐसा क्यों किया? ऐसी क्या चीज़ थी जिसे उन्होंने डूबकर पढ़ा? उनकी दृष्टि में, ये परमेश्वर के वचन नहीं थे, परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं थे, सत्य तो और भी कम थे, बल्कि वे विद्या का एक रूप थे। ऐसी विद्या को, उनकी दृष्टि में, आगे बढ़ाया जाना चाहिए था, इसका प्रसार किया जाना चाहिए था, और यही परमेश्वर और सुसमाचार के मार्ग का प्रसार भी था। इसी को उन्होंने "प्रवचन" कहा, और जिस धर्मोपदेश का उन्होंने प्रवचन दिया वह धर्मशास्त्र था।

... फरीसियों को जिस धर्मशास्त्र और मत में एक प्रकार के ज्ञान के रूप में महारत हासिल थी उसका उपयोग उन्होंने लोगों की निंदा करने और उन्हें सही या गलत आँकने के औज़ार के रूप में किया। इसका उपयोग उन्होंने प्रभु यीशु पर भी किया—और इस तरह प्रभु यीशु की निंदा की गई। उनके द्वारा लोगों का मूल्यांकन, और उनके साथ उनका व्यवहार कभी भी उनके सार पर या इस बात पर आधारित नहीं था कि उन्होंने जो कुछ कहा वह सही था या गलत, उनके वचनों का स्रोत या उत्पत्ति तो दूर की बात थी। उन्होंने केवल उन्ही कड़े शब्दों और सिद्धांतों के आधार पर लोगों की निंदा की और उन्हें आँका, जिसमें उन्हें महारत हासिल थी। और इसीलिए, इन फरीसियों ने यह जानते हुए भी कि प्रभु यीशु ने जो कुछ किया वह पाप नहीं था, और कानून का उल्लंघन नहीं था, उसकी निंदा की, क्योंकि प्रभु यीशु ने जो कहा वह उनकी महारत वाले ज्ञान और विद्या तथा उनके द्वारा प्रतिपादित धर्मशास्त्र के मत के विपरीत लग रहा था। और फरीसी इन शब्दों और वाक्यांशों के ऊपर अपनी पकड़ ढीली नहीं करना चाहते थे, वे इस ज्ञान से चिपट गए थे और इसे छोडना नहीं चाहते थे। अंत में एकमात्र संभावित परिणाम क्या रहा? उन्होंने इस बात को स्वीकार नहीं किया कि प्रभु यीशु मसीहा हैं जो आएंगे, या प्रभु यीशु ने जो कहा उसमें सत्य था, यह मानना तो दूर की बात थी कि प्रभु यीशु ने जो किया वह सत्य के अनुरूप था। उन्होंने प्रभु यीशु की निंदा करने के लिए कुछ निराधार आरोप ढूँढ निकाले—लेकिन वास्तव में, क्या वे अपने हृदय में इस बात को जानते थे कि उन्होंने जिन पापों के लिए उसकी निंदा की, क्या वे जायज़ थे? वे जानते थे। फिर भी उन्होंने इस तरह उसकी निंदा क्यों की? (वे इस बात पर विश्वास नहीं करना चाहते थे कि उनके मन में जो उच्च और शक्तिशाली परमेश्वर है वह प्रभु यीशु हो सकता है, एक साधारण मनुष्य के पुत्र की इस छवि वाला।) वे इस तथ्य को स्वीकार नहीं करना चाहते थे। और इसे स्वीकार करने से इनकार की उनकी प्रकृति क्या थी? क्या इसमें परमेश्वर से तर्क करने की कोशिश नहीं की गई थी? उनका मतलब यह था, "क्या परमेश्वर ऐसा कर सकता है? यदि परमेश्वर देहधारण करता, तो उसने निश्चित रूप से किसी प्रतिश्ठित वंश में जन्म लिया होता। इसके अलावा, उसे शास्त्रियों और फरीसियों का संरक्षण स्वीकार करना चाहिए, इस ज्ञान को सीखना चाहिए, और पवित्र ग्रंथ को खूब पढ़ना चाहिए। इस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद ही वह 'देहधारी' की उपाधि ग्रहण कर सकता है।" उनका विश्वास था कि, सबसे पहले, तुम इस प्रकार योग्य नहीं हो, इसलिए तुम परमेश्वर नहीं हो; दूसरे, इस ज्ञान के बिना तुम परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकते, तुम्हारा परमेश्वर होना तो दूर की बात रही; तीसरे, तुम मंदिर के बाहर काम नहीं कर सकते—तुम अब मंदिर में नहीं हो, तुम हमेशा पापियों के बीच रहते हो, इसलिए तुम जो काम करते हो वह परमेश्वर के कार्य क्षेत्र से परे है। उनकी निंदा का आधार कहाँ से आया? पवित्र ग्रंथ से, मनुष्य के मन से, और उस धर्मशास्त्रीय शिक्षा से जो उन्होंने प्राप्त की थी। क्योंकि वे धारणाओं, कल्पनाओं, और ज्ञान के घमंड में डूबे हुए थे, इसलिए वे इस ज्ञान को सही, सत्य और मूल आधार मान रहे थे, और यह कि परमेश्वर कभी भी इन चीज़ों के विरुद्ध नहीं जा सकता। क्या उन्होंने सत्य की तलाश की? नहीं की। उन्होंने केवल खुद की धारणाओं और कल्पनाओं, और ख़ुद के अनुभवों को खंगाला, और इनका उपयोग उन्होंने परमेश्वर को परिभाषित करने और यह निर्धारित करने के लिए किया कि वह सही है या गलत। इसका अंतिम परिणाम क्या निकला? उन्होंने परमेश्वर के कार्य की निंदा की और उसे क्रूस पर चढ़ा दिया।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दुष्ट, धूर्त और कपटी हैं (III)' से उद्धृत

ऐसा कैसे है कि धर्म के लोग, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, "ईसाइयत" में सिमटकर रह गए हैं? ऐसा क्यों है कि आज उन्हें परमेश्वर के घर, परमेश्वर की कलीसिया, परमेश्वर के कार्य की वस्तु के बजाय एक धार्मिक समूह के रूप में वर्गीकृत किया जाता है? उनमें हठधर्मिता है, वे परमेश्वर द्वारा किए गए कार्यों और उसके द्वारा बोले गए वचनों को एक पुस्तक में, शिक्षण-सामग्री में संकलित करते हैं, और फिर सभी प्रकार के धर्मशास्त्रियों को भर्ती और प्रशिक्षित करने के लिए वे स्कूल खोलते हैं। क्या ये धर्मशास्त्री सत्य का अध्ययन कर रहे हैं? (नहीं)। तो वे किस चीज का अध्ययन कर रहे हैं? वे धर्मशास्त्रीय ज्ञान का अध्ययन कर रहे हैं, जिसका परमेश्वर के कार्य से या परमेश्वर द्वारा बोले जाने वाले सत्यों से कोई सरोकार नहीं होता। और ऐसा करके वे खुद को ईसाइयत में सिमटा रहे हैं। ईसाइयत किस चीज की हिमायत करती है? यदि तुम किसी कलीसिया में जाते हो, तो लोग तुमसे पूछेंगे कि तुमने परमेश्वर में कितने समय से विश्वास किया है, और जब तुम कहते हो कि तुमने अभी-अभी शुरू किया है, तो वे तुम्हारी उपेक्षा करेंगे। लेकिन अगर तुम बाइबल को सीने से लगाकर भीतर जाते हो और कहते हो कि "मैं फलाँ-फलाँ धर्मशास्त्रीय मदरसे का स्नातक हूँ," तो वे तुमसे आकर एक सम्मान का स्थान लेने के लिए कहेंगे। यह ईसाइयत है। उन सभी लोगों ने, जो मंच पर खड़े होते हैं, धर्मशास्त्र का अध्ययन किया होता है, वे मदरसा-प्रशिक्षित होते हैं, धर्मशास्त्रीय ज्ञान और सिद्धांत से युक्त होते हैं—वे मूल रूप से ईसाइयत के आधार-स्तंभ हैं। ईसाइयत ऐसे लोगों को मंच पर उपदेश देने, घूम-घूमकर प्रचार और काम करने के लिए प्रशिक्षित करती है। उन्हें लगता है कि ईसाइयत का मूल्य धर्मशास्त्र के ऐसे सक्षम लोगों में ही निहित है, क्योंकि धर्मशास्त्र के ये विद्यार्थी, ये पादरी और धर्मशास्त्री, जो उपदेश देते हैं; उनकी पूँजी हैं। यदि किसी कलीसिया का पादरी एक मदरसे का स्नातक हो, पवित्रशास्त्र की व्याख्या करने में कुशल हो, उसने कुछ आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ी हों, और उसके पास थोड़ा ज्ञान और वक्तृत्व-कौशल हो, तो वह कलीसिया पनपती है, और अन्य कलीसियाओं की तुलना में उसकी प्रतिष्ठा बहुत बेहतर होती है। ईसाइयत में ये लोग किसकी हिमायत करते हैं? ज्ञान की। और यह ज्ञान कहाँ से आता है? इसे प्राचीन काल से सौंपा गया है। प्राचीन काल में पवित्रशास्त्र था, जिसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दिया गया था, ठीक आज तक प्रत्येक पीढ़ी उसे पढ़ती और सीखती आई है। इंसान ने बाइबल को अलग-अलग खंडों में विभाजित किया और लोगों के पढ़ने और सीखने के लिए उसके अलग-अलग संस्करण तैयार किए। लेकिन वे जो सीखते हैं, वह यह नहीं है कि सत्य को कैसे समझें और परमेश्वर को कैसे जानें, या परमेश्वर की इच्छा को कैसे समझें और परमेश्वर का भय कैसे हासिल करें और बुराई से कैसे दूर रहें, बल्कि वे उनमें निहित ज्ञान का अध्ययन करते हैं। ज्यादा से ज्यादा, वे उनके भीतर निहित रहस्यों का पता लगते हैं, वे यह देखने के लिए उसकी जाँच करते हैं कि प्रकाशित वाक्य की पुस्तक की कौन-सी भविष्यवाणियाँ एक निश्चित अवधि में पूरी हुईं, महान आपदाएँ कब आएँगी, सहस्राब्दी कब आएगी—ये वे चीजें हैं, जिनका वे अध्ययन करते हैं। और जिसका वे अध्ययन करते हैं, क्या वह वह सत्य से जुड़ा होता है? नहीं। वे उन चीजों का अध्ययन क्यों करते हैं, जिनका सत्य से कोई संबंध नहीं? जितना अधिक वे उनका अध्ययन करते हैं, उतना ही अधिक वे सोचते हैं कि वे समझते हैं, और उतना ही अधिक वे खुद को शब्दों और सिद्धांत से लैस करते हैं। उनकी पूँजी भी बढ़ती है। उनकी योग्यताएँ जितनी अधिक होती हैं, उन्हें लगता है कि वे उतने ही अधिक सक्षम हैं, वे मानते हैं कि परमेश्वर में उनका विश्वास उतना ही अधिक मुकम्मल है, और उन्हें लगता है कि उनके बचाए जाने और स्वर्गिक राज्य में प्रवेश करने की उतनी ही अधिक संभावना है।

... ईसाइयत में वे सभी जो धर्मशास्त्र, पवित्र ग्रंथ और यहाँ तक कि परमेश्वर के कार्य का इतिहास भी पढ़ते हैं—क्या वे सच्चे विश्वासी हैं? क्या वे उन विश्वासियों और अनुयायियों से भिन्न हैं, जिनके बारे में परमेश्वर बात करता है? क्या परमेश्वर की दृष्टि में वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं? (नहीं।) वे धर्मशास्त्र का अध्ययन करते हैं, वे परमेश्वर का अध्ययन करते हैं। क्या उनमें कोई अंतर है, जो परमेश्वर का अध्ययन करते हैं और जो अन्य चीजों का अध्ययन करते हैं? कोई अंतर नहीं है। वे बिलकुल उन्हीं लोगों के समान हैं जो इतिहास पढ़ते हैं, जो दर्शन-शास्त्र पढ़ते हैं, जो कानून पढ़ते हैं, जो जीव विज्ञान पढ़ते हैं, जो खगोल विज्ञान पढ़ते हैं—वे बस विज्ञान या जीव विज्ञान या अन्य विषयों को पसंद नहीं करते; वे सिर्फ धर्मशास्त्र पसंद करते हैं। ये लोग परमेश्वर के कार्य में सुरागों और सूत्रों की खोज करते हुए परमेश्वर का अध्ययन करते हैं—और इनकी शोध से क्या निकलता है? क्या वे यह तय कर पाते हैं कि क्या परमेश्वर का अस्तित्व है? वे ऐसा कभी नहीं कर पाएंगे। क्या वे परमेश्वर की इच्छा को तय कर पाते हैं? (नहीं।) क्यों? क्योंकि वे शब्दों और वाक्यांशों में जीते हैं, वे ज्ञान में जीते हैं, वे दर्शन-शास्त्र में जीते हैं, वे मनुष्यों के मस्तिष्कों और विचारों में जीते हैं। वे कभी भी परमेश्वर को नहीं देख पाएंगे, वे कभी भी पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता प्राप्त नहीं कर पाएंगे। परमेश्वर उन्हें किस तरह परिभाषित करता है? अविश्वासियों के रूप में, गैर-विश्वासियों के रूप में। ये अविश्वासी और गैर-विश्वासी तथाकथित ईसाई समुदाय में घुलमिल जाते हैं, परमेश्वर में विश्वास करने वालों की तरह व्यवहार करते हुए, ईसाइयों की तरह व्यवहार करते हुए—पर क्या वे सचमुच परमेश्वर की आराधना करते हैं? क्या वे सचमुच उसकी आज्ञा का पालन करते हैं? नहीं। क्यों? एक बात निश्चित है : ऐसा इसलिए है क्योंकि अपने हृदयों में वे यह विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर ने दुनिया बनाई है, कि वह सभी चीजों पर शासन करता है, कि वह देहधारण कर सकता है, और इससे भी कम वे यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का अस्तित्व है। यह अविश्वास क्या दर्शाता है? संदेह, नकार, और यह उम्मीद करने का रवैया भी कि परमेश्वर की भविष्यवाणियाँ—खासकर आपदाओं के बारे में—सच साबित नहीं होंगी और पूरी नहीं होंगी। यह वह रवैया है जो वे परमेश्वर में विश्वास के प्रति अपनाते हैं और यह उनकी तथाकथित आस्था का सार और असली चेहरा भी है। ये लोग परमेश्वर का अध्ययन करते हैं क्योंकि उनकी विद्वत्ता और धर्मशास्त्र के ज्ञान में विशेष रुचि है और उन्हें परमेश्वर के कार्यों के ऐतिहासिक तथ्यों में भी दिलचस्पी है। वे धर्मशास्त्र पढ़ने वाले बुद्धिजीवियों के एक झुंड से ज्यादा और कुछ भी नहीं हैं। ये "बुद्धजीवी" परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते, तो जब परमेश्वर अपने काम पर आता है और उसके वचन साकार होते हैं तो ये लोग क्या करते हैं? जब वे सुनते हैं कि परमेश्वर देहधारी बन गया है और नया कार्य कर रहा है तो उनकी पहली प्रतिक्रिया क्या होती है? "असंभव!" वे परमेश्वर के नए कार्य का उपदेश देने वाले की निंदा करते हैं, और ऐसे लोगों को मार देना तक चाहते है। यह किस चीज की अभिव्यक्ति है? क्या यह इस बात की अभिव्यक्ति नहीं है कि वे पक्के मसीह-विरोधी हैं? वे परमेश्वर के कार्य और उसके वचनों के पूरे होने के प्रति शत्रुता का भाव रखते हैं, उसके देहधारी अस्तित्व की तो बात ही क्या: "अगर तुमने देहधारण नहीं किया था और तुम्हारे वचन पूरे नहीं हुए हैं, तो तुम परमेश्वर हो। अगर तुम्हारे वचन पूरे हुए हैं और तुमने देहधारण किया था, तो तुम नहीं हो।" इसका दूसरा पहलू क्या है? यह कि जब तक उनका अपना अस्तित्व है, वे परमेश्वर के देहधारण की अनुमति नहीं देंगे। क्या यह एक प्रामाणिक मसीह-विरोधी होना नहीं है? यह असली मसीह-विरोध है। क्या धर्मपरायण समुदाय में ऐसे दावे मौजूद हैं? ऐसे दावे बड़े जोर-शोर से और पूरी दृढ़ता से किए जाते हैं : "यह गलत है कि परमेश्वर ने देहधारण किया है, यह असंभव है! कोई भी देहधारण एक ढोंग है।" कुछ लोग पूछते हैं, "क्या इन लोगों को गुमराह किया गया है?" बिलकुल नहीं। उनकी बस परमेश्वर में सच्ची आस्था ही नहीं है। वे परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते, वे परमेश्वर के देहधारण में विश्वास नहीं करते, वे दुनिया को बनाने के परमेश्वर के कार्य में विश्वास नहीं करते, और इससे भी कम वे परमेश्वर के क्रूस पर चढ़ने और समूची मानवजाति को पाप से मुक्ति दिलाने के कार्य में विश्वास करते हैं। उनके लिए वह धर्मशास्त्र, जिसका वे अध्ययन करते हैं, ऐतिहासिक घटनाओं की एक शृंखला है, यह एक तरह का सिद्धांत या मत है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दुष्ट, धूर्त और कपटी हैं (III)' से उद्धृत

क्या बहुत से लोग इसलिए परमेश्वर का विरोध नहीं करते और पवित्र आत्मा के कार्य में इसलिए बाधा नहीं डालते क्योंकि वे परमेश्वर के विभिन्न और विविधतापूर्ण कार्यों को नहीं जानते हैं, और इसके अलावा, क्योंकि वे केवल चुटकीभर ज्ञान और सिद्धांत से संपन्न होते हैं जिससे वे पवित्र आत्मा के कार्य को मापते हैं? यद्यपि इस प्रकार के लोगों का अनुभव केवल सतही होता है, किंतु वे घमंडी और आसक्त प्रकृति के होते हैं और वे पवित्र आत्मा के कार्य को अवमानना से देखते हैं, पवित्र आत्मा के अनुशासन की उपेक्षा करते हैं और इसके अलावा, पवित्र आत्मा के कार्यों की "पुष्टि" करने के लिए अपने पुराने तुच्छ तर्कों का उपयोग करते हैं। वे दिखावा भी करते हैं, और अपनी शिक्षा और पांडित्य को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त होते हैं, और उन्हें यह भी भरोसा रहता है कि वे संसार भर में यात्रा करने में सक्षम हैं। क्या ये ऐसे लोग नहीं हैं जो पवित्र आत्मा द्वारा तिरस्कृत और अस्वीकृत कर दिए गए हैं और क्या ये नए युग के द्वारा हटा नहीं दिए जाएँगे? क्या ये वही अज्ञानी और अल्पसूचित तुच्छ लोग नहीं हैं जो परमेश्वर के सामने आते हैं और खुलेआम उसका विरोध करते हैं, जो केवल यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि वे कितने मेधावी हैं? बाइबल के अल्प ज्ञान के साथ, वे संसार के "शैक्षणिक समुदाय" में पैर पसारने की कोशिश करते हैं, और केवल एक सतही सिद्धांत के साथ लोगों को सिखाते हुए, वे पवित्र आत्मा के कार्य को पलटने का प्रयत्न करते हैं, और इसे अपने खुद के विचारों की प्रक्रिया के इर्दगिर्द घुमाने का प्रयास करते हैं। अपनी अदूरदर्शिता के कारण वे एक ही झलक में परमेश्वर के 6,000 सालों के कार्यों को देखने की कोशिश करते हैं। इन लोगों के पास समझ नाम की कोई चीज ही नहीं है! वास्तव में, परमेश्वर के बारे में लोगों को जितना अधिक ज्ञान होता है, वे उसके कार्य का आकलन करने में उतने ही धीमे होते हैं। इसके अलावा, वे परमेश्वर के आज के कार्य के बारे में अपने ज्ञान की बहुत कम बात करते हैं, लेकिन वे अपने निर्णय में जल्दबाज़ी नहीं करते हैं। लोग परमेश्वर के बारे में जितना कम जानते हैं, वे उतने ही अधिक घमंडी और अति आत्मविश्वासी होते हैं और उतनी ही अधिक बेहूदगी से परमेश्वर के अस्तित्व की घोषणा करते हैं—फिर भी वे केवल सिद्धांत की बात ही करते हैं और कोई भी वास्तविक प्रमाण प्रस्तुत नहीं करते। इस प्रकार के लोगों का कोई मूल्य नहीं होता है। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य को एक खेल की तरह देखते हैं वे ओछे लोग होते हैं! जो लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य का सामना करते समय सचेत नहीं रहते हैं, जो अपना मुँह चलाते रहते हैं, जो मीन-नेख निकालते रहते हैं, जो पवित्र आत्मा के धार्मिक कार्यों को नकारने की अपनी सहज प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लगाते हैं, और जो उसका अपमान और ईशनिंदा भी करते हैं—क्या इस प्रकार के अशिष्ट लोग पवित्र आत्मा के कार्य से अनभिज्ञ नहीं हैं? इसके अलावा, क्या वे अत्यंत अहंकारी, अंतर्निहित रूप से घमंडी और दुर्दमनीय लोग नहीं हैं? कोई ऐसा दिन आ भी जाए जब ऐसे लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार कर लें, तो भी परमेश्वर उन्हें सहन नहीं करेगा। न केवल वे उन्हें तुच्छ समझते हैं जो परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं, बल्कि वे स्वयं भी परमेश्वर के विरुद्ध ईशनिंदा करते हैं, इस प्रकार के दुस्साहसी लोग, न तो इस युग में और न ही आने वाले युग में क्षमा किए जाएँगे, और वे हमेशा के लिए नरक में सड़ेंगे! इस प्रकार के अशिष्ट, आसक्त लोग परमेश्वर में भरोसा करने का दिखावा करते हैं और लोग जितने अधिक इस तरह के होते हैं, उतनी ही अधिक उनकी परमेश्वर के प्रशासकीय आदेशों का उल्लंघन करने की संभावना रहती है। क्या वे सभी अहंकारी लोग, जो स्वाभाविक रूप से उच्छृंखल हैं, और जिन्होंने कभी भी किसी का भी आज्ञापालन नहीं किया है, इसी मार्ग पर नहीं चलते हैं? क्या वे दिन प्रतिदिन परमेश्वर का विरोध नहीं करते हैं, वह परमेश्वर जो हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

मनुष्य भ्रष्ट हो चुका है और शैतान के फंदे में जी रहा है। सभी लोग देह में जीते हैं, स्वार्थपूर्ण अभिलाषाओं में जीते हैं, और उनके मध्य एक भी व्यक्ति नहीं, जो मेरे अनुकूल हो। ऐसे लोग भी हैं, जो कहते हैं कि वे मेरे अनुकूल हैं, परंतु वे सब अस्पष्ट मूर्तियों की आराधना करते हैं। हालाँकि वे मेरे नाम को पवित्र मानते हैं, पर वे उस रास्ते पर चलते हैं जो मेरे विपरीत जाता है, और उनके शब्द घमंड और आत्मविश्वास से भरे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मूलत: वे सब मेरे विरोध में हैं और मेरे अनुकूल नहीं हैं। प्रतिदिन वे बाइबल में मेरे निशान ढूँढ़ते हैं, और यों ही "उपयुक्त" अंश तलाश लेते हैं, जिन्हें वे अंतहीन रूप से पढ़ते रहते हैं और उनका वाचनपवित्रशास्त्र के रूप में करते हैं। वे नहीं जानते कि मेरे अनुकूल कैसे बनें, न ही वे यह जानते हैं कि मेरे विरुद्ध होने का क्या अर्थ है। वे केवल पवित्रशास्त्रों को आँख मूँदकर पढ़ते रहते हैं। वे बाइबल के भीतर एक ऐसे अज्ञात परमेश्वर को कैद कर देते हैं, जिसे उन्होंने स्वयं भी कभी नहीं देखा है, और जिसे देखने में वे अक्षम हैं, और जिसे वे फ़ुरसत के समय में ही निगाह डालने के लिए बाहर निकालते हैं। वे मेरा अस्तित्व मात्र बाइबल के दायरे में ही सीमित मानते हैं, और वे मेरी बराबरी बाइबल से करते हैं; बाइबल के बिना मैं नहीं हूँ, और मेरे बिना बाइबल नहीं है। वे मेरे अस्तित्व या क्रियाकलापोंपर कोई ध्यान नहीं देते, बल्कि पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर परम और विशेष ध्यान देते हैं। बहुत सेलोग तो यहाँ तक मानते हैं कि अपनी इच्छा से मुझे ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए, जो पवित्रशास्त्र द्वारा पहले से न कहा गया हो। वे पवित्रशास्त्र को बहुत अधिक महत्त्व देते हैं। कहा जा सकता है कि वे वचनों और उक्तियों को बहुत महत्वपूर्ण समझते हैं, इस हद कि हर एक वचन जो मैं बोलता हूँ, वे उसे मापने और मेरी निंदा करने के लिए बाइबल के छंदों का उपयोग करते हैं। वे मेरे साथ अनुकूलता का मार्ग या सत्य के साथ अनुकूलता का मार्ग नहीं खोजते, बल्कि बाइबल के वचनों के साथ अनुकूलता का मार्ग खोजते हैं, औरविश्वास करते हैं कि कोई भी चीज़ जो बाइबल के अनुसार नहीं है, बिना किसी अपवाद के, मेरा कार्य नहीं है। क्या ऐसे लोग फरीसियों के कर्तव्यपरायण वंशज नहीं हैं? यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। उन्होंने उस समय के यीशु के साथ अनुकूल होने की कोशिश नहीं की, बल्कि कर्मठतापूर्वक व्यवस्था का इस हद तक अक्षरशः पालन किया कि—यीशु पर पुराने विधान की व्यवस्था का पालन न करने और मसीहा न होने का आरोप लगाते हुए—निर्दोष यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। उनका सार क्या था? क्या यह ऐसा नहीं था कि उन्होंने सत्य के साथ अनुकूलता के मार्ग की खोज नहीं की? उनके दिमाग़ में पवित्रशास्त्र का एक-एक वचन घर कर गया था, जबकि मेरी इच्छा और मेरे कार्य के चरणों और विधियों पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। वे सत्य की खोज करने वाले लोग नहीं, बल्कि सख्तीसे पवित्रशास्त्र के वचनों से चिपकने वाले लोग थे; वे परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग नहीं, बल्कि बाइबल में विश्वास करने वाले लोग थे। दरअसल वे बाइबल की रखवाली करने वाले कुत्ते थे। बाइबल के हितों की रक्षा करने, बाइबल की गरिमा बनाए रखने और बाइबल की प्रतिष्ठा बचाने के लिए वे यहाँ तक चले गए कि उन्होंने दयालु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। ऐसा उन्होंने सिर्फ़ बाइबल का बचाव करने के लिए और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक वचन की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए किया। इस प्रकार उन्होंने अपना भविष्य त्यागने और यीशु की निंदा करने के लिए उसकी मृत्यु के रूप में पापबलि देने को प्राथमिकता दी, क्योंकि यीशु पवित्रशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था। क्या वे लोग पवित्रशास्त्र के एक-एक वचन के नौकर नहीं थे?

और आज के लोगों के बारे में क्या कहूँ? मसीह सत्य बताने के लिए आया है, फिर भी वे निश्चित ही उसे इस दुनिया से निष्कासित कर देंगे, ताकि वे स्वर्ग में प्रवेश हासिल कर सकें और अनुग्रह प्राप्त कर सकें। वे बाइबल के हितों की रक्षा करने के लिए सत्य के आगमन को पूरी तरह से नकार देंगे और बाइबल का चिरस्थायी अस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए देह में लौटे मसीह को फिर से सूली पर चढ़ा देंगे। मनुष्य मेरा उद्धार कैसे प्राप्त कर सकता है, जब उसका हृदय इतना अधिक द्वेष से भरा है और उसकी प्रकृति मेरेइतनी विरोधी है? मैं मनुष्य के मध्य रहता हूँ, फिर भी मनुष्य मेरे अस्तित्व के बारे नहीं जानता। जब मैं मनुष्य पर अपना प्रकाश डालता हूँ, तब भी वह मेरे अस्तित्व से अनभिज्ञ रहता है। जब मैं लोगों पर क्रोधित होता हूँ, तो वे मेरे अस्तित्व को और अधिक प्रबलता से नकारते हैं। मनुष्य वचनों और बाइबल के साथ अनुकूलता की खोज करता है, लेकिन सत्य के साथ अनुकूलता का मार्ग खोजने के लिए एक भी व्यक्ति मेरे समक्ष नहीं आता। मनुष्य मुझे स्वर्ग में खोजता है और स्वर्ग में मेरे अस्तित्व की विशेष चिंता करता है, लेकिन देह में कोई मेरी परवाह नहीं करता, क्योंकि मैं जो देह में उन्हीं के बीच रहता हूँ, बहुत मामूली हूँ। जो लोग सिर्फ़ बाइबल के वचनों के साथ अनुकूलता की खोज करते हैं और जो लोग सिर्फ़ एक अज्ञात परमेश्वर के साथ अनुकूलता की खोज करते हैं, वे मेरे लिए एक घृणित दृश्य हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे मृत शब्दों की आराधना करते हैं, और एक ऐसे परमेश्वर की आराधना करते हैं, जो उन्हें अनकहा खज़ाना देने में सक्षम है; जिस परमेश्वर की वे आराधना करते हैं, वह एक ऐसा परमेश्वर है, जो अपने आपको मनुष्य के नियंत्रण मेंछोड़ देता है—ऐसा परमेश्वर, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। तो फिर, ऐसे लोग मुझसे क्या प्राप्त कर सकते हैं? मनुष्य बस वचनों के लिए बहुत नीच है। जो मेरे विरोध में हैं, जो मेरे सामने असीमित माँगें रखते हैं, जिनमें सत्य के लिए कोई प्रेम नहीं है, जो मेरे प्रति विद्रोही हैं—वे मेरे अनुकूल कैसे हो सकते हैं?

जो लोग मेरे विरुद्ध हैं, वे मेरे अनुकूल नहीं हैं। ऐसा ही मामला उनका है, जो सत्य से प्रेम नहीं करते। जो मेरे प्रति विद्रोह करते हैं, वे मेरे और भी अधिक विरुद्ध हैं और मेरे अनुकूल नहीं हैं। जो मेरे अनुकूल नहीं हैं, मैं उन सभी को बुराई के हाथों में छोड़ देता हूँ, जो मेरे अनुकूल नहीं हैं, मैं उन सभी को बुराई द्वारा भ्रष्ट किए जाने के लिए त्याग देता हूँ, उन्हें अपने दुष्कर्म प्रकट करने के लिए असीमित स्वतंत्रता दे देता हूँ, और अंत में उन्हें बुराई को सौंप देता हूँ कि वह उन्हें निगल जाए। मैं इस बात की परवाह नहीं करता कि कितने लोग मेरी आराधना करते हैं, अर्थात्, मैं इस बात की परवाह नहीं करता कि कितने लोग मुझ पर विश्वास करते हैं। मुझे सिर्फ इस बात की फिक्र है कि कितने लोग मेरे अनुकूल हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे सब जो मेरे अनुकूल नहीं हैं, वे ऐसे दुष्ट हैं जो मुझे धोखा देते हैं; वे मेरे शत्रु हैं, और मैं अपने शत्रुओं को अपने घर में "प्रतिष्ठापित" नहीं करूँगा। जो मेरे अनुकूल हैं, वे हमेशा मेरे घर में मेरी सेवा करेंगे, और जो मेरे विरुद्ध जाते हैं, वे हमेशा मेरी सज़ा भुगतेंगे। जो सिर्फ़ बाइबल के वचनों पर ही ध्यान देते हैं और न तो सत्य में दिलचस्पी रखते हैं और न मेरे पदचिह्न खोजने में—वे मेरे विरुद्ध हैं, क्योंकि वे मुझे बाइबल के अनुसार सीमित कर देते हैं, मुझे बाइबल में ही कैद कर देते हैं, और इसलिए वे मेरे परम निंदक हैं। ऐसे लोग मेरे सामने कैसे आ सकते हैं? वे मेरे कर्मों या मेरी इच्छा या सत्य पर कोई ध्यान नहीं देते, बल्कि वचनों से ग्रस्त हो जाते हैं—वचन जो मार देते हैं। ऐसे लोग मेरे अनुकूल कैसे हो सकते हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें मसीह के साथ अनुकूलता का तरीका खोजना चाहिए' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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