2. सत्‍य-वास्तविकता क्या है, और शब्द और सिद्धांत क्या हैं

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर व्यावहारिक परमेश्वर है : उसका समस्त कार्य व्यावहारिक है, उसके द्वारा कहे जाने वाले सभी वचन व्यावहारिक हैं, और उसके द्वारा व्यक्त किए जाने वाले सभी सत्य व्यावहारिक हैं। हर वह चीज़, जो उसका वचन नहीं है, खोखली, अस्तित्वहीन और अनुचित है। आज पवित्र आत्मा परमेश्वर के वचनों में लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए उपलब्ध है। यदि लोगों को वास्तविकता में प्रवेश करना है, तो उन्हें वास्तविकता को खोजना चाहिए, और वास्तविकता को जानना चाहिए, जिसके बाद उन्हें वास्तविकता का अनुभव करना चाहिए और वास्तविकता को जीना चाहिए। लोग वास्तविकता को जितना अधिक जानते हैं, उतना ही अधिक वे यह पहचानने में समर्थ होते हैं कि दूसरों के शब्द वास्तविक हैं या नहीं; लोग वास्तविकता को जितना अधिक जानते हैं, उनमें धारणाएँ उतनी ही कम होती हैं; लोग वास्तविकता का जितना अधिक अनुभव करते हैं, उतना ही अधिक वे वास्तविकता के परमेश्वर के कर्मों को जानते हैं, और उनके लिए अपने भ्रष्ट, शैतानी स्वभावों के बंधन से मुक्त होना उतना ही अधिक आसान होता है; लोगों के पास जितनी अधिक वास्तविकता होती है, वे उतना ही अधिक परमेश्वर को जानते हैं, और उतना ही अधिक देह से घृणा और सत्य से प्रेम करते हैं; और लोगों के पास जितनी अधिक वास्तविकता होती है, वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों के उतना ही अधिक निकट होते हैं। जो लोग परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाते हैं, वे वो लोग होते हैं जिनमें वास्तविकता होती है, जो वास्तविकता को जानते हैं और जो वास्तविकता का अनुभव करके परमेश्वर के वास्तविक कर्मों को जान गए हैं। तुम परमेश्वर के साथ व्यावहारिक ढंग से जितना अधिक सहयोग करोगे और अपने शरीर को जितना अधिक अनुशासित करोगे, उतना ही अधिक तुम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करोगे, उतना ही अधिक तुम वास्तविकता को प्राप्त करोगे, और उतना ही अधिक तुम परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध किए जाओगे, और इस तरह तुम्हें परमेश्वर के वास्तविक कर्मों का उतना ही अधिक ज्ञान होगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश में रह पाओ, तो तुम्हें अभ्यास का वर्तमान मार्ग अधिक स्पष्ट हो जाएगा, और तुम अतीत की धार्मिक धारणाओं एवं पुराने अभ्यासों से अपने आपको अलग करने में अधिक सक्षम हो जाओगे। आज केंद्रबिंदु वास्तविकता है : लोगों में जितनी अधिक वास्तविकता होगी, सत्य का उनका ज्ञान उतना ही अधिक स्पष्ट होगा, और परमेश्वर की इच्छा की उनकी समझ अधिक बड़ी होगी। वास्तविकता सभी शब्दों और वादों पर विजय पा सकती है, यह समस्त सिद्धांतों और विशेषज्ञताओं पर विजय पा सकती है, और लोग जितना अधिक वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वे उतना ही अधिक परमेश्वर से सच्चा प्रेम करते हैं, और उसके वचनों के लिए भूखे एवं प्यासे होते हैं। यदि तुम हमेशा वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो तुम्हारा जीवन-दर्शन, धार्मिक धारणाएँ एवं प्राकृतिक चरित्र परमेश्वर के कार्य का अनुसरण करने से स्वाभाविक रूप से मिट जाएगा। जो वास्तविकता की खोज नहीं करते, और जिन्हें वास्तविकता का कोई ज्ञान नहीं है, उनके द्वारा अलौकिक चीज़ों की खोज किए जाने की संभावना है, और वे आसानी से छले जाएँगे। पवित्र आत्मा के पास ऐसे लोगों में कार्य करने का कोई उपाय नहीं है, और इसलिए वे खालीपन महसूस करते हैं, और उनके जीवन का कोई अर्थ नहीं होता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वास्तविकता को कैसे जानें' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों को मानते हुए स्थिरता के साथ उनकी व्याख्या करने के योग्य होने का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हारे पास वास्तविकता है; बातें इतनी भी सरल नहीं हैं जितनी तुम सोचते हो। तुम्हारे पास वास्तविकता है या नहीं, यह इस बात पर आधारित नहीं है कि तुम क्या कहते हो; अपितु यह इस पर आधारित है कि तुम किसे जीते हो। जब परमेश्वर के वचन तुम्हारा जीवन और तुम्हारी स्वाभाविक अभिव्यक्ति बन जाते हैं, तभी कहा जा सकता है कि तुममें वास्तविकता है और तभी कहा जा सकता है कि तुमने वास्तविक समझ और असल आध्यात्मिक कद हासिल कर लिया है। तुम्हारे अंदर लम्बे समय तक परीक्षा को सहने की क्षमता होनी चाहिए, और तुम्हें उस समानता को जीने के योग्य होना अनिवार्य है, जिसकी अपेक्षा परमेश्वर तुम से करता है; यह मात्र दिखावा नहीं होना चाहिए; बल्कि यह तुम में स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होना चाहिए। तभी तुम में वस्तुतः वास्तविकता होगी और तुम जीवन प्राप्त करोगे। मैं सेवाकर्मियों के परीक्षण का उदाहरण देना चाहता हूँ, जिससे सभी अच्छी तरह से अवगत हैं: सेवाकर्मियों के विषय में कोई भी बड़े-बड़े सिद्धांत बता सकता है। इस विषय के बारे में सभी को अच्छा ज्ञान है; वे लोग इस विषय पर बोलते हैं और हर भाषण पिछले से बेहतर होता है, जैसे कि यह कोई प्रतियोगिता हो। परन्तु, यदि मनुष्य किसी बड़े परीक्षण से न गुजरा हो, तो यह कहना कठिन होगा कि उसके पास देने के लिए अच्छी गवाही है। संक्षेप में, मनुष्य के जीवन जीने में अभी भी बहुत कमी है, यह पूरी तरह से उसकी समझ के विपरीत है। इसलिए इसका, मनुष्य का वास्तविक आध्यात्मिक कद बनना अभी शेष है, और यह अभी मनुष्य का जीवन नहीं है। क्योंकि मनुष्य के ज्ञान को वास्तविकता में नहीं लाया गया है, उसका आध्यात्मिक कद रेत पर निर्मित एक किले के समान है जो हिल रहा है और ढह जाने की कगार पर है। मनुष्य में बहुत कम वास्तविकता है। मनुष्य में कोई भी वास्तविकता पाना लगभग असम्भव है। मनुष्य से स्वाभाविक रूप से बहुत ही अल्प वास्तविकता प्रवाहित हो रही है और उसके जीवन में समस्त वास्तविकता ज़बरदस्ती लाई गई है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य में कोई वास्तविकता नहीं है। हालाँकि लोग ये दावा करते हैं कि परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम कभी परिवर्तित नहीं होता, लेकिन वे ऐसा परीक्षणों का सामना होने से पहले कहते हैं। एक दिन अचानक परीक्षणों से सामना हो जाने पर जो बातें वे कहते हैं, वे फिर से वास्तविकता से मेल नहीं खाएँगी और यह फिर से प्रमाणित करेगा कि मनुष्य में वास्तविकता नहीं है। यह कहा जा सकता है कि जब कभी तुम्हारा सामना उन बातों से होता है, जो तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खातीं और यह माँग करती हैं कि तुम स्वयं को दरकिनार कर लो, ये ही तुम्हारी परीक्षाएँ होती हैं। परमेश्वर की इच्छा को प्रकट किए जाने से पहले, प्रत्येक मनुष्य एक कठोर परीक्षण, एक बहुत बड़े परीक्षण से गुज़रता है। क्या तुम इस विषय को सुस्पष्टता से समझ सकते हो? जब परमेश्वर मनुष्य की परीक्षा लेना चाहता है, तो वह हमेशा सत्य के तथ्यों को प्रकट करने से पहले मनुष्य को चुनाव करने देता है। कहने का अर्थ यह है कि परमेश्वर जब मनुष्य का परीक्षण ले रहा होता है, तो वह कभी भी तुम्हें सत्य नहीं बताएगा; और इसी प्रकार मनुष्य को उजागर किया जाता है। यह एक विधि है, जिससे परमेश्वर यह जानने के लिए अपना कार्य करता है कि क्या तुम आज के परमेश्वर को जानते हो और साथ ही तुम में कोई वास्तविकता है या नहीं। क्या तुम परमेश्वर के कार्यों को लेकर सन्देहों से सचमुच मुक्त हो? जब तुम पर कोई बड़ा परीक्षण आयेगा तो क्या तुम दृढ़ रह सकोगे? कौन यह कहने की हिम्मत कर सकता है "मैं गारंटी देता हूँ कि कोई समस्या नहीं आएगी?" कौन दृढ़तापूर्वक कहने की हिम्मत कर सकता है, "हो सकता है दूसरों को सन्देह हो, परन्तु मैं कभी भी सन्देह नहीं करूँगा?" यह ठीक वैसे ही है जैसे जब पतरस का परीक्षण हुआ : वह हमेशा सत्य के प्रकट किए जाने से पहले बड़ी-बड़ी बातें करता था। यह पतरस की ही एक अनोखी कमी नहीं थी; यह सबसे बड़ी कठिनाई है, जिसका सामना प्रत्येक मनुष्य वर्तमान में कर रहा है। यदि परमेश्वर के आज के कार्य के तुम्हारे ज्ञान को देखने के लिए मैं कुछ स्थानों पर जाऊँ, या कुछ भाइयों और बहनों से भेंट करूँ, तो तुम सब निश्चित रूप से अपने ज्ञान के विषय में बहुत कुछ कह पाओगे, और ऐसा प्रतीत होगा कि तुम्हारे अंदर कोई सन्देह नहीं है। यदि मैं तुम से पूछूँ : "क्या तुम वास्तव में तय कर सकते हो कि आज का कार्य स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया जा रहा है? बिना किसी सन्देह के?" तुम निश्चित रूप से उत्तर दोगे : "बिना किसी सन्देह के, यह कार्य परमेश्वर के आत्मा के द्वारा ही किया जा रहा है।" एक बार जब तुम इस प्रकार से उत्तर दे दोगे, तो तुम में थोड़ा-सा भी सन्देह नहीं होगा बल्कि तुम बहुत आनन्द का अनुभव कर रहे होगे, यह सोचकर कि तुम ने थोड़ी-सी वास्तविकता प्राप्त कर ली है। जो लोग बातों को इस रीति से समझते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जिनमें बहुत कम वास्तविकता होती है; जो व्यक्ति जितना अधिक सोचता है कि उसने इसे प्राप्त कर लिया है, वह परीक्षणों में उतना ही कम स्थिर रह पाता है। धिक्कार है उन पर जो अहंकारी और दंभी होते हैं, और धिक्कार है उन्हें जिन्हें स्वयं का कोई ज्ञान नहीं है; ऐसे लोग बातें करने में कुशल होते हैं, परन्तु अपनी बातों पर अमल करने में ऐसे लोग बहुत ही खराब होते हैं। छोटी-सी भी समस्या नज़र आते ही ये लोग सन्देह करना आरम्भ कर देते हैं और त्याग देने का विचार उनके मस्तिष्क में प्रवेश कर जाता है। उनमें कोई वास्तविकता नहीं होती; उनके पास मात्र सिद्धान्त हैं, जो धर्म से ऊपर हैं और ये उन समस्त वास्तविकताओं से रहित हैं जिनकी परमेश्वर अभी अपेक्षा करता है। मुझे उनसे अधिक घृणा होती है जो मात्र सिद्धान्तों की बात करते हैं और जिनमें कोई वास्तविकता नहीं होती। जब वे कोई कार्य करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते हैं, परन्तु जैसे ही उनका सामना वास्तविकता से होता है, वे बिखर जाते हैं। क्या यह ये नहीं दर्शाता कि इन लोगों के पास कोई वास्तविकता नहीं है? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हवा और लहरें कितनी भयंकर हैं, यदि तुम अपने मन में थोड़-सा भी सन्देह किए बिना खड़े रह सकते हो और तुम स्थिर रह सकते हो और उस समय भी इन्कार करने की स्थिति में नहीं रहते हो जब तुम ही अकेले बचते हो, तब यह माना जाएगा कि तुम्हारे पास सच्ची समझ है और वस्तुतः तुम्हारे पास वास्तविकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल सत्य का अभ्यास करना ही इंसान में वास्तविकता का होना है' से उद्धृत

मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षा मात्र वास्तविकता के विषय में बात करने के योग्य होना ही नहीं है; अगर ऐसा हो तो क्या यह अति सरल नहीं होगा? तब परमेश्वर जीवन में प्रवेश के विषय में बात क्यों करता है? वह रूपांतरण के विषय में बात क्यों करता है? यदि लोग केवल वास्तविकता की खोखली बातें ही कर पायेंगे, तो क्या वे अपने स्वभाव में रूपांतरण ला सकते हैं? राज्य के अच्छे सैनिक उन लोगों के समूह के रूप में प्रशिक्षित नहीं होते जो मात्र वास्तविकता की बातें करते हैं या डींगें मारते हैं; बल्कि वे हर समय परमेश्वर के वचनों को जीने के लिए प्रशिक्षित होते हैं, ताकि किसी भी असफलता को सामने पाकर वे झुके बिना लगातार परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकें और वे फिर से संसार में न जाएँ। इसी वास्तविकता के विषय में परमेश्वर बात करता है; और मनुष्य से परमेश्वर की यही अपेक्षा है। इसलिए परमेश्वर द्वारा कही गई वास्तविकता को इतना सरल न समझो। मात्र पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध होना वास्तविकता रखने के समान नहीं है। मनुष्य का आध्यात्मिक कद ऐसा नहीं है, अपितु यह परमेश्वर का अनुग्रह है और इसमें मनुष्य का कोई योगदान नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को पतरस की पीड़ाएँ सहनी होंगी और इसके अलावा उसमें पतरस का गौरव होना चाहिए जिसे वे परमेश्वर के कार्य प्राप्त कर लेने के बाद जीते हैं। मात्र इसे ही वास्तविकता कहा जा सकता है। यह मत सोचो चूँकि तुम वास्तविकता के विषय में बात कर सकते हो इसलिए तुम्हारे पास वास्तविकता है। यह एक भ्रम है। यह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं है और इसके कोई वास्तविक मायने नहीं हैं। भविष्य में ऐसी बातें मत करना—ऐसी बातों को समाप्त कर दो! वे सभी जो परमेश्वर के वचनों की गलत समझ रखते हैं, वे सभी अविश्वासी हैं। उनमें कोई भी वास्तविक ज्ञान नहीं है, उनमें वास्तविक आध्यात्मिक कद होने का तो सवाल ही नहीं है; वे वास्तविकता रहित अज्ञानी लोग हैं। कहने का अर्थ यह है कि वे सभी जो परमेश्वर के वचनों के सार से बाहर जीवन जीते हैं, वे सभी अविश्वासी हैं। जिन्हें मनुष्यों के द्वारा अविश्वासी समझ लिया गया है, वे परमेश्वर की दृष्टि में जानवर हैं और जिन्हें परमेश्वर के द्वारा अविश्वासी समझा गया है, वे ऐसे लोग हैं जिनके पास जीवन के रूप में परमेश्वर के वचन नहीं हैं। अतः, वे लोग जिनमें परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता नहीं है और वे जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीने में असफल हो जाते हैं, वे अविश्वासी हैं। परमेश्वर की इच्छा प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा बनाना है जिससे वह परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन करे। न कि उसे ऐसा व्यक्ति बनाना कि वह केवल वास्तविकता के विषय में बात करे, बल्कि इस योग्य बनाना है कि हर कोई उसके वचनों की वास्तविकता को जी सके। वह वास्तविकता जिसे मनुष्य समझता है, बहुत ही छिछली है, इसका कोई मूल्य नहीं है, यह परमेश्वर की इच्छा को पूर्ण नहीं कर सकती। यह अत्यधिक तुच्छ है और उल्लेख किए जाने के योग्य तक नहीं है। इसमें बहुत कमी है और यह परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों से बहुत ही दूर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल सत्य का अभ्यास करना ही इंसान में वास्तविकता का होना है' से उद्धृत

वास्तविकता कैसे सामने आती है? ऐसा सत्य के अभ्यास की प्रक्रिया के दौरान होता है, जब लोग तरह-तरह के अनुभवों से गुजरते हैं और तरह-तरह की अवस्थाओं को जन्म देते हैं। यह बदलाव की एक प्रक्रिया होती है कि लोग अपनी विभिन्न अवस्थाओं को कैसे लेते हैं, उनके विचार और दृष्टिकोण क्या होते हैं, और इनके समाधान के लिए वे सत्य को कैसे खोजते हैं। यह प्रक्रिया वास्तविकता है। अगर तुम परमेश्वर के वचनों के अभ्यास और अनुभव की प्रक्रिया से नहीं गुजरते हो, बल्कि उन्हें सिर्फ शाब्दिक और सैद्धांतिक स्तर पर जानते और समझते हो, तब तुम्हारे पास एक सिद्धांत के अलावा कुछ नहीं होता, क्योंकि तुम्हारी शाब्दिक समझ और तुम्हारे प्रत्यक्ष अनुभव के बीच एक विसंगति होती है। सिद्धांत कैसे उपजता है? जब कोई अभ्यास न करके सिर्फ समझता है, विश्लेषण करता है, और परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या करता है, और इतना ही नहीं, बल्कि उनका उपदेश देता है, तो सिद्धांत पैदा होता है। क्या सिद्धांत वास्तविकता बन सकता है? अगर तुम लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हो, तो तुम कभी भी इसे समझ नहीं सकते। सिर्फ शाब्दिक व्याख्या हमेशा एक सिद्धांत रहेगी। लेकिन अगर तुम अभ्यास करते हो, अनुभव करते हो, महसूस करते हो, और सीखते हो, तो इस तरह पैदा हुआ ज्ञान, विचार, अवधारणाएँ और अनुभव व्यावहारिक होंगे। सच्चाई या वास्तविकता अभ्यास से ही प्राप्त होती है; अभ्यास के बिना वास्तविकता हमेशा अनुपस्थित रहती है। क्या किसी ने कभी कहा है, "मैं सत्य का अभ्यास नहीं करता, पर मैं फिर भी व्यावहारिक धर्मोपदेश दे सकता हूँ"? तुम जो उपदेश देते हो, वह उस समय दूसरों को सही और व्यावहारिक प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन बाद में उनके पास अभ्यास का कोई मार्ग ही नहीं होगा। इसलिए वह सब जो तुम समझते हो, सिर्फ सिद्धांत ही है। अगर तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं लाते हो और तुम्हारे पास कोई व्यावहारिक अनुभव या सत्य की कोई समझ नहीं है, तो जब कोई दूसरा ऐसी अवस्था में होगा जिसके बारे में तुमने पहले कभी सोचा ही नहीं है, तो तुम्हें पता ही नहीं होगा कि इसका समाधान कैसे करें। जब कोई कभी-कभार ही सत्य का अभ्यास करता है, तो वे कभी भी इसे सही अर्थों में नहीं समझ सकते। वे सत्य के अभ्यास को बढ़ाने के बाद ही इसे सचमुच समझ सकते हैं, और तभी वे सत्य के अभ्यास के सिद्धांतों को आत्मसात कर सकते हैं। अगर तुम्हें सत्य का कोई अनुभव नहीं है, तो तुम स्वाभाविक रूप से सिर्फ सिद्धांत की सीख दे सकते हो। तुम दूसरों को सिर्फ नियमों का पालन करना सिखा सकते हो, जैसेकि तुम खुद करते हो। अभ्यास और अनुभव की वास्तविकता के बिना तुम कभी भी वास्तविकता की सीख नहीं दे पाओगे।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'भ्रष्‍ट स्‍वभाव को दूर करने का मार्ग' से उद्धृत

अगर तुम लोगों ने परमेश्वर के बहुत सारे वचन पढ़े हैं, लेकिन केवल पाठ के अर्थ को समझा है और तुममें अपने व्यवहारिक अनुभव से परमेश्वर के वचनों का प्रत्यक्ष ज्ञान का अभाव है, तो तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझोगे। तुम्हारे विचार से, परमेश्वर के वचन जीवन नहीं हैं, बल्कि महज़ बेजान शब्द हैं। और अगर तुम केवल बेजान शब्दों का पालन करते रहोगे, तब न तो तुम परमेश्वर के वचनों के सार को ग्रहण कर पाओगे, न ही उसकी इच्छा को समझ पाओगे। जब तुम अपने वास्तविक अनुभव में उसके वचनों का अनुभव कर लोगे, तभी परमेश्वर के वचनों का आध्यात्मिक अर्थ तुम्हारे सामने स्वयं को प्रकट करेगा, और अनुभव से ही तुम बहुत-से सत्यों के आध्यात्मिक अर्थ को ग्रहण कर पाओगे और परमेश्वर के वचनों के रहस्यों को खोल पाओगे। अगर तुम इन्हें अमल में न लाओ, तो उसके वचन कितने भी स्पष्ट क्यों न हों, तुमने बस उन खोखले शब्दों और सिद्धांतों को ही ग्रहण किया है, जो तुम्हारे लिए धर्म संबंधी नियम बन चुके हैं। क्या यही फरीसियों ने नहीं किया था? अगर तुम लोग परमेश्वर के वचनों को अमल में लाओ और उनका अनुभव करो, तो ये तुम लोगों के लिए व्यवहारिक बन जाएंगे; अगर तुम इनका अभ्यास करने का प्रयास न करो, तो तुम्हारे लिए परमेश्वर के वचन तीसरे स्वर्ग की किंवदंती से ज़्यादा कुछ नहीं है। दरअसल, तुम लोगों द्वारा परमेश्वर में विश्वास रखने की प्रक्रिया ही उसके वचनों का अनुभव करने और उसके द्वारा प्राप्त किए जाने की प्रक्रिया है, या इसे और अधिक साफ तौर कहें तो, परमेश्वर में विश्वास रखना उसके वचनों को जानना, समझना, उनका अनुभव करना और उन्हें जीना है; परमेश्वर में तुम लोगों की आस्था की सच्चाई ऐसी ही है। अगर तुम लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हो और अनंत जीवन पाने की आशा करते हो लेकिन परमेश्वर के वचनों को इस प्रकार अमल में लाने का प्रयास नहीं करते मानो कि वह ऐसी कोई चीज़ है जो तुम्हारे भीतर है, तो तुम मूर्ख हो। यह बिल्कुल ऐसा ही होगा जैसे किसी दावत में जा कर केवल भोज्य-पदार्थों को देखा और उनमें से किसी भी चीज़ का स्वाद चखे बिना स्वादिष्ट चीज़ों को रट लिया। क्या ऐसा व्यक्ति मूर्ख नहीं होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए' से उद्धृत

तू उतना अधिक ज्ञान बोल पाता है जितनी समुद्र तट पर रेत है, फिर भी इसमें से कुछ भी वास्तविक मार्ग नहीं है। यह करके क्या तू लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयत्न नहीं कर रहा है? क्या तू खोखला प्रदर्शन नहीं कर रहा है, जिसके समर्थन के लिए कुछ भी ठोस नहीं है? ऐसा समूचा व्यवहार लोगों के लिए हानिकारक है! जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत और उतना ही अधिक यह वास्तविकता से रहित, उतना ही अधिक यह लोगों को वास्तविकता में ले जाने में अक्षम; जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत, उतना ही अधिक यह तुझसे परमेश्वर की अवज्ञा और विरोध करवाता है। ऊँचे से ऊँचे सिद्धांतों को अनमोल खजाने की तरह मत बरत; वे दुखदाई हैं और किसी काम के नहीं हैं! शायद कुछ लोग ऊँचे से ऊँचे सिद्धांतों की बात कर पाते हैं—लेकिन इनमें वास्तविकता का लेशमात्र भी नहीं होता, क्योंकि इन लोगों ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से अनुभव नहीं किया है, और इसलिए उनके पास अभ्यास करने का कोई मार्ग नहीं है। ऐसे लोग दूसरों को सही राह पर ले जाने में अक्षम होते हैं और उन्हें केवल गुमराह ही करेंगे। क्या यह लोगों के लिए हानिकारक नहीं है? कम से कम, तुझे लोगों के वर्तमान कष्टों का निवारण तो करना ही चाहिए, उन्हें प्रवेश करने देना चाहिए; केवल यही समर्पण माना जाता है, और तभी तू परमेश्वर के लिए कार्य करने योग्य होगा। हमेशा आडंबरपूर्ण, काल्पनिक शब्द मत बोला कर, और दूसरों को अपने आज्ञापालन में बाँधने के लिए अनुपयुक्त अभ्यासों का उपयोग मत कर। ऐसा करने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और यह केवल उनके भ्रम को ही बढ़ा सकता है। इस तरह करते रहने से बहुत वाद उत्पन्न होगा, जो लोगों को तुझसे घृणा करवाएगा। ऐसी है मनुष्य की कमी, और यह सचमुच अत्यंत लज्जाजनक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वास्तविकता पर अधिक ध्यान केंद्रित करो' से उद्धृत

अगर कोई व्यक्ति सत्य की तलाश नहीं करता, तो वह इसे कभी नहीं समझेगा। तुम शब्दों और सिद्धांतों को दस हजार बार कह सकते हो, लेकिन वे फिर भी केवल शब्द और सिद्धांत ही रहेंगे। कुछ लोग बस यही कहते हैं, "मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है।" अगर तुम इन शब्दों को दस हजार बार भी दोहराते हो, तो भी यह व्यर्थ होगा; तुम्हें इसके अर्थ की कोई समझ नहीं है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है? क्या तुम इसके बारे में अनुभव से प्राप्त ज्ञान को साफ़-साफ़ बता सकते हो? क्या तुमने सत्य, मार्ग और जीवन की वास्तविकता में प्रवेश किया है? परमेश्वर ने अपने वचन इसलिए बोले हैं, ताकि तुम उन्हें अनुभव कर सको और ज्ञान प्राप्त कर सको; केवल शब्दों और सिद्धांतों का उच्चारण करना बेकार है। परमेश्वर के वचनों को समझने और उनमें प्रवेश करने के बाद ही तुम स्वयं को जान सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते, तो तुम स्वयं को नहीं जान सकते। तुम्हारे पास सत्य हो, तभी तुम जान सकते हो; सत्य के बिना तुम नहीं जान सकते। तुम किसी मुद्दे को पूरी तरह से तभी समझ सकते हो, जब तुम्हारे पास सत्य हो; सत्य के बिना तुम किसी मुद्दे को नहीं समझ सकते। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम स्वयं को जान सकते हो; सत्य के बिना तुम स्वयं को नहीं जान सकते। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम्हारा स्वभाव बदल सकता है; सत्य के बिना तुम्हारा स्वभाव नहीं बदल सकता। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कर सकते हो; सत्य के बिना तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा नहीं कर सकते। तुम्हारे पास सत्य होने पर ही तुम परमेश्वर की आराधना कर सकते हो; सत्य के बिना, तुम्हारी आराधना धार्मिक कर्म-कांडों के आयोजन से ज्यादा कुछ नहीं होगी। ये सभी चीज़ें परमेश्वर के वचनों से सत्य प्राप्त करने पर निर्भर हैं।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

कुछ लोग कार्य और प्रचार करते हैं, हालाँकि वे सतही तौर पर परमेश्वर के वचनों पर सहभागिता करते नज़र आते हैं, मगर वे परमेश्वर के वचनों पर मात्र शाब्दिक चर्चा कर रहे होते हैं, उनकी बातों में सार्थक कुछ नहीं होता। उनके उपदेश किसी भाषा की पाठ्य-पुस्तक की शिक्षा की तरह होते हैं, मद-दर-मद, पहलू-दर-पहलू क्रम-बद्ध किये हुए, और जब वे बोल लेते हैं, तो यह कहकर हर कोई उनका स्तुति गान करता है: "इस व्यक्ति में वास्तविकता है। उसने इतने अच्छे ढंग से और इतने विस्तार से समझाया।" जब उनका उपदेश देना समाप्त हो जाता है, तो ये लोग दूसरे लोगों से इन सारी चीज़ों को इकट्ठा करके सभी को भेज देने के लिये कहते हैं। उनके कृत्य दूसरों का कपट बन जाते हैं और वे लोग जिन बातों का प्रचार करते हैं, वे सब भ्राँतियाँ होती हैं। देखने में ऐसा लगता है, जैसे ये लोग मात्र परमेश्वर के वचनों का प्रचार कर रहे हैं और यह सत्य के अनुरूप दिखता है। लेकिन अगर अधिक गौर से समझेंगे तो तुम देखोगे कि यह शब्दों और सिद्धांतों के अलावा कुछ नहीं है। यह सब इंसानी कल्पनाओं और धारणाओं के साथ झूठी विवेक-बुद्धि है, साथ ही कुछ हिस्सा ऐसा है जो परमेश्वर को सीमांकित करता है। क्या इस तरह का उपदेश परमेश्वर के कार्य में बाधा नहीं है? यह एक ऐसी सेवा है जो परमेश्वर का विरोध करती है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

तुम सब सत्य का सार निकालने में भटक गए हो; जब तुम ये सभी सार निकाल लेते हो, तो इससे केवल नियम ही प्राप्त होते हैं। तुम्हारा "सत्य का सार प्रस्तुत करना" लोगों को जीवन प्राप्त करने या अपने स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त करने देने के लिए नहीं है। इसके बजाय, इसके कारण लोग सत्य के भीतर से कुछ ज्ञान और सिद्धांतों में निपुणता प्राप्त करते हैं। वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो कि वे परमेश्वर के कार्य के पीछे के प्रयोजन को समझते हैं, जबकि वास्तव में उन्होंने केवल कुछ शब्दों और सिद्धांतों में निपुणता हासिल की है। वे सत्य के मर्म को नहीं समझते हैं, और यह धर्मशास्त्र का अध्ययन करने या बाइबल पढ़ने से भिन्न नहीं है। तुम हमेशा इन पुस्तकों या उन सामग्रियों को संकलित करते रहते हो, और इसलिए सिद्धांत के इस पहलू या ज्ञान के उस पहलू को धारण करने वाले बन जाते हो। तुम सिद्धांतों के प्रथम श्रेणी के वक्ता हो—लेकिन जब तुम बोल लेते हो तो क्या होता है? तब लोग अनुभव करने में असमर्थ होते हैं, उन्हें परमेश्वर के कार्य की कोई समझ नहीं होती है और स्वयं की भी समझ नहीं होती है। अंत में, उन्होंने जो कुछ प्राप्त किया होगा वे बस सूत्र और नियम ही होंगे। तुम उन चीजों के बारे में बात कर सकते हो लेकिन और कुछ नहीं। यदि परमेश्वर ने कुछ नया किया, तो क्या तुम लोगों को ज्ञात सभी सिद्धांत उस काम से मेल खाने वाले हो सकते हैं जो परमेश्वर करता है? तुम्हारी ये बातें केवल नियम हैं और तुम लोगों से केवल धर्मशास्त्र का अध्ययन करवा रहे हो: तुम उन्हें परमेश्वर के वचन या सत्य का अनुभव करने की अनुमति नहीं दे रहे हो। इसलिए वे पुस्तकें जिन्हें तुम संकलित करते हो, वे लोगों को केवल धर्मशास्त्र और ज्ञान में, नए सूत्रों, नियमों और प्रथाओं में ही ला सकती हैं। वे लोगों को परमेश्वर के सामने नहीं ला सकती हैं, या लोगों को सत्य को समझने या परमेश्वर की इच्छा को समझने में मदद नहीं कर सकती हैं। तुम सोच रहे हो कि प्रश्न पर प्रश्न पूछने से, जिनके तब तुम उत्तर देते हो, और जिनके लिए तुम एक रूपरेखा या सारांश लिखते हो, इस तरह के व्यवहार से तुम्हारे भाई-बहन आसानी से समझ जाएंगे। याद रखने में आसान होने के अलावा, एक नज़र में ये इन प्रश्नों के बारे में स्पष्ट हैं, और तुमको लगता है कि इस तरह से कार्य करना बहुत अच्छा है। लेकिन वे जो समझ रहे हैं वह वास्तविक मर्म नहीं है; यह वास्तविकता से भिन्न है और सिर्फ शब्द और सिद्धांत हैं। तो यह बेहतर होगा कि तुम इन चीजों को बिल्कुल भी नहीं करो। तुम लोगों को ज्ञान को समझने और ज्ञान में निपुणता प्राप्त करने की ओर ले जाने के लिए ये कार्य करते हो। तुम अन्य लोगों को सिद्धान्तों में, धर्म में लाते हो, और उनसे परमेश्वर का अनुसरण और धार्मिक सिद्धांतों के भीतर परमेश्वर में विश्वास करवाते हो। क्या तब तुम बस पौलुस के समान नहीं हो? तुम सबको लगता है कि सत्य के ज्ञान में निपुणता प्राप्त करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, और उसी तरह परमेश्वर के वचनों के कई अंशों को कंठस्थ करना भी महत्वपूर्ण है। लेकिन लोग परमेश्वर के वचन को कैसे समझते हैं, यह बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नहीं है। तुम सबको लगता है कि लोगों के लिए ये बहुत आवश्यक है कि वे परमेश्वर के कई वचनों को कंठस्थ करें, कई सिद्धांतों को बोलने में सक्षम हों और परमेश्वर के वचनों के भीतर कई सूत्रों को खोजने में सफल हों। इसलिए, तुम सब हमेशा इन चीजों को व्यवस्थित करना चाहते हो ताकि हर कोई एक से भजन पत्र से गा रहा हो और एक सी बात कह रहा हो, हर कोई वही सिद्धांत बोलता हो, ताकि हर किसी के पास एक सा ज्ञान हो और हर कोई एक से नियम रखता हो—यही तुम सब लोगों का उद्देश्य है। तुम लोग ऐसा करते हो मानो कि लोगों को बेहतर समझाते हो, जबकि इसके विपरीत तुम सबको कोई अंदाज़ा नहीं है कि ऐसा करके तुम लोगों को उन नियमों के बीच ला रहे हो जो परमेश्वर के वचनों के सत्य के बाहर हैं। लोगों को सत्य की वास्तविक समझ प्राप्त करवाने के लिए, तुमको वास्तविकता के साथ जुड़ना चाहिए, कार्य के साथ जुड़ना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों के सत्य के अनुसार व्यावहारिक समस्याओं को हल करना चाहिए। केवल इसी तरह से लोग सत्य को समझ सकते हैं और वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं। केवल इस तरह का परिणाम हासिल करना ही लोगों को परमेश्वर के सामने लाना है। अगर तुम सिर्फ आध्यात्मिक सिद्धांतों, मतों और नियमों के बारे में बात करते हो, यदि तुम्हारे प्रयास केवल लिखित शब्दों पर केन्द्रित होते हैं, तो तुम लोगों को सत्य की समझ तक नहीं पहुँचा पाओगे, तुम लोगों से वही बातें कहने और नियमों का पालन करने के लिए निर्देशित करोगे। तुम विशेष रूप से लोगों को अपने आपको बेहतर समझने में सक्षम नहीं बना पाओगे, तुम उन्हें पश्चाताप और परिवर्तन की ओर नहीं ले जा पाओगे। यदि आध्यात्मिक सिद्धांतों के बारे में बात कर पाना लोगों के लिए सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने का विकल्प बन पाता, तो कलीसियाओं की अगुवायी करने के लिए तुम लोगों की आवश्यकता न होती।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य से रहित होकर कोई परमेश्वर को नाराज़ करने का भागी होता है' से उद्धृत

तुम लोगों का ज्ञान केवल कुछ समय के लिए लोगों को पोषित कर सकता है। जैसे-जैसे समय बीतता है, यदि तुम वही एक बात कहते रहे, तो कुछ लोग इसे जान लेंगे; वे कहेंगे कि तुम अत्यधिक सतही हो, तुममें गहराई की कमी है। तुम्हारे पास सिद्धांतों की बात कहकर लोगों को धोखा देने की कोशिश करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा। अगर तुम इसे हमेशा इस तरह से जारी रखोगे, तो तुम्हारे नीचे के लोग तुम्हारे तरीकों, कदमों, और परमेश्वर में विश्वास करने और अनुभव करने के तुम्हारे प्रतिमान का अनुसरण करेंगे, वे उन शब्दों और सिद्धांतों को व्यवहार में रखेंगे। अंततः, तुम जिस तरह उपदेश पर उपदेश देते चले जाते हो, वे तुम्हारा एक प्रतिमान के रूप में इस्तेमाल करेंगे। तुम सिद्धांतों की बात करने के लिए लोगों की अगुवाई करते हो, इसलिए तुम्हारे नीचे के लोग तुम से सिद्धांतों को सीखेंगे, और जैसे-जैसे बात आगे बढ़ेगी, तुम एक गलत रास्ता अपना चुके होगे। तुम्हारे नीचे के सभी लोग तुम्हारा अनुसरण करते हैं, इसलिए तुम महसूस करते हो: "मैं अब शक्तिशाली हूँ; इतने सारे लोग मेरी बात सुनते हैं, और कलीसिया मेरे इशारे पर चलती है।" मनुष्य के अंदर का यह विश्वासघात की यह प्रकृति अचेतन रूप से तुम्हारे द्वारा परमेश्वर को एक नाम मात्र में बदल देती है, और तब तुम स्वयं कोई एक पंथ, कोई संप्रदाय बना लेते हो। पंथ और संप्रदाय कैसे उत्पन्न होते हैं? वे इसी तरह से बनते हैं। हर पंथ और संप्रदाय के अगुवाओं को देखो। वे सभी अभिमानी और आत्म-तुष्ट हैं, और वे बाइबल की व्याख्या संदर्भ के बाहर और उनकी अपनी कल्पना के अनुसार करते हैं। वे सभी अपना काम करने के लिए प्रतिभा और पांडित्य पर भरोसा करते हैं। यदि वे कुछ भी उपदेश करने में असमर्थ होते, तो क्या वे लोग उनका अनुसरण करते? कुछ भी हो, उनके पास कुछ ज्ञान तो है ही, और वे सिद्धांत के बारे में थोड़ा-बहुत बोल सकते हैं, या वे जानते हैं कि दूसरों को कैसे जीता जाए, और कुछ चालाकियों का उपयोग कैसे करें, जिनके माध्यम से वे लोगों को अपने सामने ले आए हैं और उन्हें धोखा दे चुके हैं। नाम मात्र के लिए, वे लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वास्तव में वे अपने अगुवाओं का अनुसरण करते हैं। अगर वे उन लोगों का सामना करते हैं जो सच्चे मार्ग का प्रचार करते हैं, तो उनमें से कुछ कहेंगे, "हमें परमेश्वर में अपने विश्वास के बारे में हमारे अगुवा से परामर्श करना है।" देखिये, परमेश्वर में विश्वास करने के लिए कैसे उन्हें किसी की सहमति की आवश्यकता है; क्या यह एक समस्या नहीं है? तो फिर, वे सब अगुवा क्या बन गए हैं? क्या वे फरीसी, झूठे चरवाहे, मसीह-विरोधी, और लोगों के सही मार्ग को स्वीकार करने में अवरोध नहीं बन चुके हैं?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य का अनुसरण करना ही परमेश्वर में सच्चे अर्थ में विश्वास करना है' से उद्धृत

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