1. सत्‍य क्या है और क्या धर्मशास्त्रीय ज्ञान सत्य है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

परमेश्वर स्वयं ही जीवन है, और सत्य है, और उसका जीवन और सत्य साथ-साथ विद्यमान हैं। वे लोग जो सत्य प्राप्त करने में असमर्थ हैं कभी भी जीवन प्राप्त नहीं करेंगे। मार्गदर्शन, समर्थन, और पोषण के बिना, तुम केवल अक्षर, सिद्धांत, और सबसे बढ़कर, मृत्यु ही प्राप्त करोगे। परमेश्वर का जीवन सतत विद्यमान है, और उसका सत्य और जीवन साथ-साथ विद्यमान हैं। यदि तुम सत्य का स्रोत नहीं खोज पाते हो, तो तुम जीवन की पौष्टिकता प्राप्त नहीं करोगे; यदि तुम जीवन का पोषण प्राप्त नहीं कर सकते हो, तो तुममें निश्चित ही सत्य नहीं होगा, और इसलिए कल्पनाओं और धारणाओं के अलावा, संपूर्णता में तुम्हारा शरीर तुम्हारी देह—दुर्गंध से भरी तुम्हारी देह—के सिवा कुछ न होगा। यह जान लो कि किताबों की बातें जीवन नहीं मानी जाती हैं, इतिहास के अभिलेख सत्य नहीं माने जा सकते हैं, और अतीत के नियम वर्तमान में परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों के वृतांत का काम नहीं कर सकते हैं। परमेश्वर पृथ्वी पर आकर और मनुष्य के बीच रहकर जो अभिव्यक्त करता है, केवल वही सत्य, जीवन, परमेश्वर की इच्छा, और उसका कार्य करने का वर्तमान तरीक़ा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है' से उद्धृत

सत्य जीवन की सर्वाधिक वास्तविक सूक्ति है, और मानवजाति के बीच इस तरह की सूक्तियों में सर्वोच्च है। क्योंकि यही वह अपेक्षा है, जो परमेश्वर मनुष्य से करता है, और यही परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाने वाला कार्य है, इसीलिए इसे "जीवन की सूक्ति" कहा जाता है। यह कोई ऐसी सूक्ति नहीं है, जिसे किसी चीज में से संक्षिप्त किया गया है, न ही यह किसी महान हस्ती द्वारा कहा गया कोई प्रसिद्ध उद्धरण है। इसके बजाय, यह स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीजों के स्वामी का मानवजाति के लिए कथन है; यह मनुष्य द्वारा किया गया कुछ वचनों का सारांश नहीं है, बल्कि परमेश्वर का अंतर्निहित जीवन है। और इसीलिए इसे "समस्त जीवन की सूक्तियों में उच्चतम" कहा जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं' से उद्धृत

सत्य सूत्रबद्ध नहीं होता, न ही वह कोई विधि है। वह मृत नहीं है—वह स्वयं जीवन है, वह एक जीवित चीज़ है, और वह वो नियम है, जिसका अनुसरण प्राणी को अपने जीवन में अवश्य करना चाहिए और वह वो नियम है, जो मनुष्य के पास अपने जीवन में अवश्य होना चाहिए। यह ऐसी चीज़ है, जिसे तुम्हें जितना संभव हो, अनुभव के माध्यम से समझना चाहिए। तुम अपने अनुभव की किसी भी अवस्था पर क्यों न पहुँच चुके हो, तुम परमेश्वर के वचन या सत्य से अविभाज्य हो, और जो कुछ तुम परमेश्वर के स्वभाव के बारे में समझते हो और जो कुछ तुम परमेश्वर के स्वरूप के बारे में जानते हो, वह सब परमेश्वर के वचनों में व्यक्त होता है; वह सत्य से अटूट रूप से जुड़ा है। परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप अपने आप में सत्य हैं; सत्य परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप की एक प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। वह परमेश्वर के स्वरूप को ठोस बनाता है और उसका स्पष्ट विवरण देता है; वह तुम्हें और अधिक सीधी तरह से बताता है कि परमेश्वर क्या पसंद करता है और वह क्या पसंद नहीं करता, वह तुमसे क्या कराना चाहता है और वह तुम्हें क्या करने की अनुमति नहीं देता, वह किन लोगों से घृणा करता है और वह किन लोगों से प्रसन्न होता है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्यों के पीछे लोग उसके आनंद, क्रोध, दुःख और खुशी, और साथ ही उसके सार को देख सकते हैं—यह उसके स्वभाव का प्रकट होना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

परमेश्‍वर द्वारा बोले गए वचन दिखने में भले ही सीधे-सादे या गहन हों, लेकिन वे सभी सत्य हैं, और जीवन में प्रवेश करने वाले मनुष्य के लिए अपरिहार्य हैं; वे जीवन-जल के ऐसे झरने हैं, जो मनुष्य को आत्मा और देह दोनों से जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं। वे मनुष्‍य को जीवित रहने के लिए हर ज़रूरी चीज़ मुहैया कराते हैं; उसके दैनिक जीवन के लिए सिद्धांत और मत; मार्ग, लक्ष्‍य और दिशा, जिससे होकर गुज़रना उद्धार पाने के लिए आवश्‍यक है; उसके अंदर परमेश्वर के समक्ष एक सृजित प्राणी के रूप में हर सत्‍य होना चाहिए; तथा हर वह सत्य होना चाहिए कि मनुष्‍य परमेश्‍वर की आज्ञाकारिता और आराधना कैसे करता है। वे मनुष्य का अस्तित्व सुनिश्चित करने वाली गारंटी हैं, वे मनुष्य का दैनिक आहार हैं, और ऐसा मजबूत सहारा भी हैं, जो मनुष्य को सशक्त और अटल रहने में सक्षम बनाते हैं। वे उस सामान्य मानवता के सत्य की वास्तविकता से संपन्‍न हैं जिसे सृजित मनुष्य जीता है, वे उस सत्य से संपन्‍न हैं, जिससे मनुष्य भ्रष्टता से मुक्त होता है और शैतान के जाल से बचता है, वे उस अथक शिक्षा, उपदेश, प्रोत्साहन और सांत्वना से संपन्‍न हैं, जो स्रष्टा सृजित मानवजाति को देता है। वे ऐसे प्रकाश-स्तंभ हैं, जो मनुष्य को सभी सकारात्‍मक बातों को समझने के लिए मार्गदर्शन और प्रबुद्धता देते हैं, ऐसी गारंटी हैं जो यह सुनिश्चित करती है कि मनुष्य उस सबको जो धार्मिक और अच्‍छा है, उन मापदंडों को जिन पर सभी लोगों, घटनाओं और वस्‍तुओं को मापा जाता है, तथा ऐसे सभी दिशानिर्देशों को जिए और प्राप्त करे, जो मनुष्‍य को उद्धार और प्रकाश के मार्ग पर ले जाते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

सत्य सभी सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता है। यह इंसान का जीवन और उसकी यात्रा की दिशा बन सकता है; यह उसके भ्रष्ट स्वभाव को दूर करने में, परमेश्वर का भय मानने और बुराई को दूर करने में, एक ऐसा व्यक्ति बनने में जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी हो तथा जो एक योग्य सृजित प्राणी हो, और जिसे परमेश्वर का प्रेम और अनुग्रह प्राप्त हो, उसकी अगुवाई कर सकता है। इसकी बहुमूल्यता को देखते हुए, परमेश्वर के वचनों और सत्य के प्रति किसी व्यक्ति का क्या दृष्टिकोण और परिप्रेक्ष्य होना चाहिए? यह बिल्कुल स्पष्ट है: जो लोग परमेश्वर में सचमुच विश्वास करते हैं और उसके प्रति एक श्रद्धापूर्ण हृदय रखते हैं, उनके लिए उसके वचन उनके जीवन के प्राण होते हैं। इंसान को परमेश्वर के वचनों को संजोए रखना चाहिए, उन्हें खाना और पीना चाहिए, उनका आनंद लेना चाहिए, और उन्हें अपने जीवन के रूप में, उस दिशा के रूप में जिसमें उसे चलना है, और उसके लिए तैयार उपादान और प्रावधान के रूप में, स्वीकार करना चाहिए; इंसान को सत्य के कथनों और आवश्यकताओं के अनुसार जीना, अभ्यास करना और अनुभव करना चाहिए, सत्य की माँगों के प्रति, उसे प्रदत्त प्रत्येक कथन और अपेक्षा के प्रति, समर्पण करना चाहिए, बजाय इसके कि उसका अध्ययन, विश्लेषण, उस पर अटकलबाज़ी या संदेह किया जाए। चूँकि सत्य इंसान के लिए एक तैयार सहायता, उसका तैयार प्रावधान है, और यह उसका जीवन हो सकता है, उसे सत्य को सबसे अनमोल मानना चाहिए, क्योंकि उसे जीने के लिए, परमेश्वर की माँगों को पूरा करने के लिए, उसका भय मानने और बुराई से दूर रहने के लिए और अपने दैनिक जीवन के भीतर अभ्यास के मार्ग को खोजने के लिए, सत्य पर भरोसा करना चाहिए, उसे अभ्यास के सिद्धांतों को समझना और परमेश्वर के प्रति समर्पित होना चाहिए। इंसान को अपने भ्रष्ट स्वभाव को त्यागने के लिए भी, एक ऐसा व्यक्ति बनने के लिए जिसे बचाया गया हो और जो एक योग्य सृजित प्राणी हो, सत्य पर भरोसा करना करना चाहिए।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे सत्य से घृणा, सिद्धांतों का खुले आम उल्लंघन और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की अवहेलना करते हैं (VII)' से उद्धृत

परमेश्वर, सत्य की अपनी अभिव्यक्ति में, अपने स्वभाव और सार को व्यक्त करता है; सत्य की उसकी अभिव्यक्ति मानवों के विभिन्न सकारात्मक चीजों के सार और उन वक्तव्यों पर आधारित नहीं है, जिसे मनुष्य जानते हैं। परमेश्वर के वचन परमेश्वर के वचन हैं; परमेश्वर के वचन सत्य हैं। वे नींव और नियम हैं, जिनके अनुसार मानव जाति का अस्तित्व होना चाहिए और मानवता के साथ उत्पन्न होने वाली उन तथाकथित मान्यताओं की परमेश्वर द्वारा निंदा की जाती है। उन्हें परमेश्वर की स्वीकृति नहीं मिलती और वे उसके कथनों के मूल या आधार तो बिलकुल नहीं हैं। परमेश्वर अपने वचनों के माध्यम से अपने स्वभाव और अपने सार को व्यक्त करता है। परमेश्वर की अभिव्यक्ति द्वारा लाए गए सभी वचन सत्य हैं, क्योंकि उसमें (परमेश्वर में) परमेश्वर का सार है, और वह सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता है। भ्रष्ट मानव चाहे परमेश्वर के वचनों को कैसे भी प्रस्तुत या परिभाषित करे, यह तथ्य कभी नहीं बदलता कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, न ही इससे बदलता है कि वह उन्हें कैसे देखता या समझता है। परमेश्वर ने चाहे कितने भी शब्द क्यों न बोले हों, और यह भ्रष्ट, पापी मानव जाति चाहे उनकी कितनी भी निंदा क्यों न करे, उन्हें कितना भी अस्वीकार क्यों न करे, एक तथ्य है जिसे परिवर्तित नहीं किया जा सकता : इन परिस्थितियों में भी तथाकथित संस्कृति और परंपराएं, जिन्हें मानव जाति महत्व देती है, वे सकारात्मक बातें नहीं बन सकती हैं, सत्य नहीं बन सकती हैं। यह अटल है। मानव जाति की पारंपरिक संस्कृति और अस्तित्व का तरीका परिवर्तनों या समय के अंतराल के कारण सत्य नहीं बन जाएगा, और न ही परमेश्वर के वचन मानव जाति की निंदा या विस्मृति के कारण मनुष्य के शब्द बन जाएंगे। यह सार कभी नहीं बदलेगा; सत्य हमेशा सत्य होता है। यहाँ कौन-सा तथ्य मौजूद है? मानव जाति द्वारा संक्षेप में बताई गई वे सभी बातें जो शैतान से उत्पन्न होती हैं—वे सभी मानवीय कल्पनाएँ और धारणाएँ हैं, यहाँ तक कि मनुष्य के जोश से भी हैं, और सकारात्मक चीजों से उनका कोई लेना-देना नहीं है। दूसरी ओर, परमेश्वर के वचन, परमेश्वर के सार और हैसियत की अभिव्यक्ति हैं। वह इन वचनों को किस कारण से व्यक्त करता है? मैं क्यों कहता हूँ कि वे सत्य हैं? इसका कारण यह है कि परमेश्वर सभी चीजों के सभी नियमों, सिद्धांतों, जड़ों, सारों, वास्तविकताओं और रहस्यों पर शासन करता है, वे उसकी मुट्ठी में हैं, और एकमात्र परमेश्वर ही उनकी उत्पत्ति जानता है और जानता है कि वास्तव में उनकी जड़ें क्या हैं। इसलिए, परमेश्वर के वचनों में सभी चीजों की जो उल्लिखित परिभाषाएं हैं, बस वही सबसे सही हैं, और परमेश्वर के वचनों में मानव जाति से अपेक्षाएँ मानव जाति के लिए एकमात्र मानक हैं—एकमात्र मापदंड जिसके अनुसार मानव जाति को अस्तित्व में रहना चाहिए।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में "'सत्य क्या है' पर" से उद्धृत

धर्म से जुड़े लोग, जो प्रभु में विश्वास रखते हैं, बाइबल के कुछ जाने-पहचाने अंश याद करने पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं; जो जितना ज्यादा याद कर लेता है, वह उतना ही आध्यात्मिक और दूसरों की प्रशंसा का पात्र बन जाता है। वे प्रतिष्ठित होते हैं और उच्च स्थान प्राप्त करते हैं। पर दरअसल, असली जिंदगी में दुनिया, मानवजाति और सभी तरह के लोगों के प्रति उनका दृष्टिकोण सांसारिक लोगों के दृष्टिकोण जैसा ही होता है—उसमें कोई बदलाव नहीं आता। इससे एक बात साबित होती है : वे अंश, जो उन्होंने याद कर लिए हैं, उनकी जिंदगी का हिस्सा नहीं बने हैं; यह बिलकुल साफ दिखाई देता है कि वे सिद्धांतों और धार्मिक मतों का एक बोझ भर हैं, और उन्होंने उनका जीवन नहीं बदला है। जिस पथ का तुम लोग अनुसरण करते हो, अगर वह बिलकुल वही है जिसका धर्मनिष्ठ लोग अनुसरण करते हैं, तो वह तुम लोगों को ईसाइयत में विश्वास करने वाले बना देता है; तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते और तुम उसके कार्य का अनुभव नहीं कर रहे। कुछ लोग, जिन्होंने लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास नहीं किया है, उन विश्वासियों की प्रशंसा करते हैं जिन्होंने ऐसा किया है, जिनकी वाणी पुख्ता है। वे ऐसे लोगों को वहाँ बैठे देखते हैं और दो-तीन घंटे तक आसानी से बोल सकते हैं। ये उनसे सीखने लगते हैं—आध्यात्मिक शब्दावली और हाव-भाव, और यह भी कि ऐसे व्यक्ति कैसे बोलते और व्यवहार करते हैं। तब ये भी आध्यात्मिक शब्दों के कुछ अंश याद करने का निश्चय कर लेते हैं, और तब तक लगे रहते हैं, जब तक कि उनके विश्वास के वर्ष इतने हो जाएँ कि वे कहीं बैठकर धाराप्रवाह बोलते हुए विस्तार से अपना अंतहीन व्याख्यान दे सकें। लेकिन अगर कोई उसे ध्यान से सुने, तो वह सब बकवास होता है, सब खोखले शब्द, मात्र अक्षर और सिद्धांत; और वे स्पष्ट रूप से धार्मिक ठग होते हैं, जो अपने-आपको और दूसरों को धोखा देते हैं। कितने दुख की बात है! तुम लोगों को उस रास्ते पर नहीं चलना चाहिए, जिस पर चलने के बाद सिर्फ बरबादी हाथ लगती है और जिससे लौटना मुश्किल है। ऐसी चीजों का चाव रखना, उन्हें अपनी जिंदगी समझना, और जहाँ भी जाओ वहाँ इसी पैमाने पर दूसरों की तुलना में अपना मूल्यांकन करना; एक भ्रष्ट और शैतानी स्वभाव से भी बढ़कर कुछ आध्यात्मिक सिद्धांतों और पाखंड के तत्वों को अपना लेना—ऐसा व्यक्ति सिर्फ घृणित ही नहीं होता, बल्कि अत्यधिक घृणित, रुग्ण और निर्लज्ज होता है, और दूसरों के लिए उसे देखना भी असहनीय होता है। इसलिए, कभी प्रभु यीशु का अनुसरण करने वालों का संप्रदाय अब ईसाइयत कहलाता है। यह एक संप्रदाय है, और परमेश्वर में अपने विश्वास में वे सख्ती से औपचारिकता से चिपके रहने के अलावा कुछ नहीं करते। उनके जीवन-स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आता, और वे सत्य की खोज करने वाले लोग नहीं हैं; उनकी खोज वह सत्य, मार्ग और जीवन नहीं है, जो परमेश्वर से आता है, बल्कि वे फरीसी बनने की चाह रखते हैं, और परमेश्वर के प्रति शत्रुता रखने वाले हैं—यह लोगों का वह समूह है, जिसे अब ईसाइयत के रूप में परिभाषित किया जाता है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जो सत्य का अभ्यास करते हैं केवल वही परमेश्वर का भय मानने वाले होते हैं' से उद्धृत

ऐसा कैसे है कि धर्म के लोग, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, "ईसाइयत" में सिमटकर रह गए हैं? ऐसा क्यों है कि आज उन्हें परमेश्वर के घर, परमेश्वर की कलीसिया, परमेश्वर के कार्य की वस्तु के बजाय एक धार्मिक समूह के रूप में वर्गीकृत किया जाता है? उनमें हठधर्मिता है, वे परमेश्वर द्वारा किए गए कार्यों और उसके द्वारा बोले गए वचनों को एक पुस्तक में, शिक्षण-सामग्री में संकलित करते हैं, और फिर सभी प्रकार के धर्मशास्त्रियों को भर्ती और प्रशिक्षित करने के लिए वे स्कूल खोलते हैं। क्या ये धर्मशास्त्री सत्य का अध्ययन कर रहे हैं? (नहीं)। तो वे किस चीज का अध्ययन कर रहे हैं? वे धर्मशास्त्रीय ज्ञान का अध्ययन कर रहे हैं, जिसका परमेश्वर के कार्य से या परमेश्वर द्वारा बोले जाने वाले सत्यों से कोई सरोकार नहीं होता। और ऐसा करके वे खुद को ईसाइयत में सिमटा रहे हैं। ईसाइयत किस चीज की हिमायत करती है? यदि तुम किसी कलीसिया में जाते हो, तो लोग तुमसे पूछेंगे कि तुमने परमेश्वर में कितने समय से विश्वास किया है, और जब तुम कहते हो कि तुमने अभी-अभी शुरू किया है, तो वे तुम्हारी उपेक्षा करेंगे। लेकिन अगर तुम बाइबल को सीने से लगाकर भीतर जाते हो और कहते हो कि "मैं फलाँ-फलाँ धर्मशास्त्रीय मदरसे का स्नातक हूँ," तो वे तुमसे आकर एक सम्मान का स्थान लेने के लिए कहेंगे। यह ईसाइयत है। उन सभी लोगों ने, जो मंच पर खड़े होते हैं, धर्मशास्त्र का अध्ययन किया होता है, वे मदरसा-प्रशिक्षित होते हैं, धर्मशास्त्रीय ज्ञान और सिद्धांत से युक्त होते हैं—वे मूल रूप से ईसाइयत के आधार-स्तंभ हैं। ईसाइयत ऐसे लोगों को मंच पर उपदेश देने, घूम-घूमकर प्रचार और काम करने के लिए प्रशिक्षित करती है। उन्हें लगता है कि ईसाइयत का मूल्य धर्मशास्त्र के ऐसे सक्षम लोगों में ही निहित है, क्योंकि धर्मशास्त्र के ये विद्यार्थी, ये पादरी और धर्मशास्त्री, जो उपदेश देते हैं; उनकी पूँजी हैं। यदि किसी कलीसिया का पादरी एक मदरसे का स्नातक हो, पवित्रशास्त्र की व्याख्या करने में कुशल हो, उसने कुछ आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ी हों, और उसके पास थोड़ा ज्ञान और वक्तृत्व-कौशल हो, तो वह कलीसिया पनपती है, और अन्य कलीसियाओं की तुलना में उसकी प्रतिष्ठा बहुत बेहतर होती है। ईसाइयत में ये लोग किसकी हिमायत करते हैं? ज्ञान की। और यह ज्ञान कहाँ से आता है? इसे प्राचीन काल से सौंपा गया है। प्राचीन काल में पवित्रशास्त्र था, जिसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दिया गया था, ठीक आज तक प्रत्येक पीढ़ी उसे पढ़ती और सीखती आई है। इंसान ने बाइबल को अलग-अलग खंडों में विभाजित किया और लोगों के पढ़ने और सीखने के लिए उसके अलग-अलग संस्करण तैयार किए। लेकिन वे जो सीखते हैं, वह यह नहीं है कि सत्य को कैसे समझें और परमेश्वर को कैसे जानें, या परमेश्वर की इच्छा को कैसे समझें और परमेश्वर का भय कैसे हासिल करें और बुराई से कैसे दूर रहें, बल्कि वे उनमें निहित ज्ञान का अध्ययन करते हैं। ज्यादा से ज्यादा, वे उनके भीतर निहित रहस्यों का पता लगते हैं, वे यह देखने के लिए उसकी जाँच करते हैं कि प्रकाशित वाक्य की पुस्तक की कौन-सी भविष्यवाणियाँ एक निश्चित अवधि में पूरी हुईं, महान आपदाएँ कब आएँगी, सहस्राब्दी कब आएगी—ये वे चीजें हैं, जिनका वे अध्ययन करते हैं। और जिसका वे अध्ययन करते हैं, क्या वह वह सत्य से जुड़ा होता है? नहीं। वे उन चीजों का अध्ययन क्यों करते हैं, जिनका सत्य से कोई संबंध नहीं? जितना अधिक वे उनका अध्ययन करते हैं, उतना ही अधिक वे सोचते हैं कि वे समझते हैं, और उतना ही अधिक वे खुद को शब्दों और सिद्धांत से लैस करते हैं। उनकी पूँजी भी बढ़ती है। उनकी योग्यताएँ जितनी अधिक होती हैं, उन्हें लगता है कि वे उतने ही अधिक सक्षम हैं, वे मानते हैं कि परमेश्वर में उनका विश्वास उतना ही अधिक मुकम्मल है, और उन्हें लगता है कि उनके बचाए जाने और स्वर्गिक राज्य में प्रवेश करने की उतनी ही अधिक संभावना है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दुष्ट, धूर्त और कपटी हैं (III)' से उद्धृत

उन चीजों पर विचार करें, जिनकी मसीह-विरोधी पूजा करते हैं। वे किनकी पूजा करते हैं? तथाकथित दर्शनों और सिद्धांतों की, जो ऊँचे, खोखले और अमूर्त हैं। ये दर्शन और सिद्धांत उनके लिए अत्यधिक कीमती हैं, उनकी सबसे गहराई से सँजोई गई चीजें हैं। जब वे बोले जाने पर उन्हें सुन लेते हैं, और जब वे उन्हें पकड़ लेते हैं, उन्हें प्राप्त कर लेते हैं और उन्हें समझ जाते हैं, तो वे इन चीजों को अपने दिलों में उकेरने और अपनी जिंदगी, अपनी व्यक्तिगत पूँजी बनाने के लिए यथाशक्ति सब-कुछ करते हैं। वे उन्हें जीवन में अपनी प्रेरणा-शक्ति और दिशा बना लेते हैं। वे नहीं जानते कि ये चीजें वास्तव में उन्हें परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्यों की जाँच करने की ओर ले जाएँगी। वे इन चीजों की पूजा और अनुसरण करते हैं, और इसलिए जब भी परमेश्वर वचन कहता है, जब भी परमेश्वर बोलता है, तो वे बौद्धिक दृष्टिकोणों और सोच का उपयोग करते हुए खुद को यह विश्लेषण करने से नहीं रोक पाते कि ज्ञान के परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर ने क्या कहा है। कुछ लोग तो यह कहते हुए परमेश्वर के कथनों की आलोचना तक करते हैं, "परमेश्वर के वचन बहुत लंबे और उबाऊ हैं और उसकी कुछ बातें तर्कसंगत नहीं हैं। कुछ व्याकरण-सम्मत नहीं हैं, और कुछ शब्द-चयन कोई अर्थ तक नहीं रखते।" परमेश्वर के वचनों का विश्लेषण और जाँच करने के लिए अपने ज्ञान और शिक्षा का उपयोग करते हुए वे अपने मन, अपने विचारों के भीतर रह रहे हैं। ऐसे भी कई लोग हैं, जो अपने अनुभव के आधार पर परमेश्वर के वचनों में खोज करने की कोशिश करते हैं और कुछ लोगों के लिए परमेश्वर के अंतिम गंतव्यों का पता लगाते हैं, या यह कि कुछ लोग किस तरह परिभाषित किए जाते हैं, और उसके बाद वे विश्लेषण करते हैं। लेकिन क्या तुम्हें ऐसा एहसास हुआ कि कोई चीज है, जो तब घटित होती है, जब तुम परमेश्वर की जाँच करते हो, जब तुम ज्ञान के परिप्रेक्ष्य से उसके वचनों और कार्यों की जाँच करते हो? (पवित्र आत्मा काम पर नहीं होता।) यह सही है—पवित्र आत्मा काम पर नहीं होता। पवित्र आत्मा तुमसे बहुत दूर होता है। यह ज्ञान और शिक्षा कहाँ से आती है? यह क्या दिखाती हैं? शैतान। इस सारे ज्ञान में क्या शामिल होता है? इसमें तर्क और विचार, धारणाएँ और कल्पनाएँ, और अनुभव शामिल होते हैं। इसमें आचार और नैतिकता, पुरानी उक्तियाँ, पुराने कानून और पुरानी आज्ञाएँ भी शामिल होती हैं। यह इसी से बनता है। जब लोग परमेश्वर के वचनों और उसके कार्य को मापने के लिए इन चीजों का उपयोग करते हैं, तो पवित्र आत्मा विदा हो जाता है और परमेश्वर अपना चेहरा छिपा लेता है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दुष्ट, धूर्त और कपटी हैं (III)' से उद्धृत

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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