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4. सच्ची प्रार्थना करने का क्या मतलब है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

सच्चाई के साथ प्रार्थना करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है अपने हृदय में शब्दों को कहना, और परमेश्वर की इच्छा को समझकर और उसके वचनों पर आधारित होकर परमेश्वर के साथ वार्तालाप करना; इसका अर्थ है विशेष रूप से परमेश्वर के निकट महसूस करना, यह महसूस करना कि वह तुम्हारे सामने है, और कि तुम्हारे पास उससे कहने के लिए कुछ है; और इसका अर्थ है अपने हृदय में विशेष रूप से प्रज्ज्वलित या प्रसन्न होना, और यह महसूस करना कि परमेश्वर विशेष रूप से मनोहर है। तुम विशेष रूप से प्रेरणा से भरे हुए महसूस करोगे, और तुम्हारे शब्दों को सुनने के बाद तुम्हारे भाई और तुम्हारी बहनें आभारी महसूस करेंगे, वे महसूस करेंगे कि जो शब्द तुम बोलते हो वे उनके हृदय के भीतर के शब्द हैं, वे ऐसे शब्द हैं जो वे कहना चाहते हैं, और जो तुम कहते हो वह वही है जो वे कहना चाहते हैं। सच्चाई के साथ प्रार्थना करने का अर्थ यही है। सच्चाई के साथ प्रार्थना करने के बाद, अपने हृदय में तुम शांतिपूर्ण, और आभारी महसूस करोगे; परमेश्वर से प्रेम करने की सामर्थ्य बढ़ जाएगी, और तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे जीवन में परमेश्वर से प्रेम करने से अधिक योग्य और महत्वपूर्ण कुछ नहीं है - और यह सब प्रमाणित करेगा कि तुम्हारी प्रार्थनाएँ प्रभावशाली रही हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "प्रार्थना की क्रिया के विषय में" से

परमेश्वर द्वारा लोगों से माँग किया जाने वाला सबसे निम्नतम स्तर यह है कि वे अपने हृदयों को परमेश्वर के प्रति खोल सकें। यदि मनुष्य अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दे दे और परमेश्वर से वह कहे जो वास्तव में उसके हृदय में परमेश्वर के लिए है, तो परमेश्वर मनुष्य में कार्य करने के लिए तैयार है; परमेश्वर मनुष्य का विकृत हृदय नहीं चाहता, बल्कि उसका शुद्ध और खरा हृदय चाहता है। यदि मनुष्य सच्चाई के साथ परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय से नहीं बोलता है, तो परमेश्वर मनुष्य के हृदय को स्पर्श नहीं करता या उसके भीतर कार्य नहीं करता। इस प्रकार, प्रार्थना करने के विषय में सबसे महत्वपूर्ण बात अपने सच्चे हृदय के शब्दों को परमेश्वर से बोलना है, परमेश्वर को अपनी कमियों या विद्रोही स्वभाव के बारे में बताना है और संपूर्ण रीति से स्वयं को परमेश्वर के समक्ष खोल देना है। केवल तभी परमेश्वर तुम्हारी प्रार्थनाओं में रूचि रखेगा; यदि नहीं, तो परमेश्वर अपने चेहरे को तुमसे छिपा लेगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "प्रार्थना की क्रिया के विषय में" से

प्रार्थना औपचारिकताओं से होकर जाने, या प्रक्रिया का अनुसरण करने, या परमेश्वर के वचनों का उच्चारण करने का विषय नहीं है, कहने का अर्थ यह है कि प्रार्थना का अर्थ शब्दों को रटना और दूसरों की नकल करना नहीं है। प्रार्थना में तुम्हें अपना हृदय परमेश्वर को देना आवश्यक है, जिसमें अपने हृदय में परमेश्वर के साथ वचनों को बांटा जाता है ताकि तुम परमेश्वर के द्वारा स्पर्श किए जाओ। यदि तुम्हारी प्रार्थनाओं को प्रभावशाली होना है तो उन्हें तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के वचनों के पढ़े जाने पर आधारित होना आवश्यक है। परमेश्वर के वचनों के मध्य में प्रार्थना करने के द्वारा ही तुम और अधिक प्रकाशन और प्रज्ज्वलन को प्राप्त कर सकोगे। एक सच्ची प्रार्थना एक ऐसे हृदय को रखने के द्वारा ही दर्शाई जाती है जो परमेश्वर के द्वारा रखी माँगों की लालसा रखता है, और इन माँगों को पूरा करने की इच्छा रखने के द्वारा तुम उन सब बातों से घृणा कर पाओगे जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, उसी के आधार पर तुम्हें ज्ञान प्राप्त होगा, और परमेश्वर के द्वारा स्पष्ट किए गए सत्यों को जानोगे और उनके विषय में स्पष्ट हो जाओगे। दृढ़ निश्चय, और विश्वास, और ज्ञान, और उस मार्ग को प्राप्त करना, जिसके द्वारा प्रार्थना के पश्चात् अभ्यास किया जाता है, ही सच्चाई के साथ प्रार्थना करना है, केवल ऐसी प्रार्थना ही प्रभावशाली हो सकती है। फिर भी प्रार्थना की रचना परमेश्वर के वचनों का आनंद लेने और परमेश्वर के वचनों में उसके साथ वार्तालाप करने की बुनियाद पर होनी चाहिए, इससे तुम्हारा हृदय परमेश्वर को खोजने और परमेश्वर के समक्ष शांतिपूर्ण बनने में सक्षम होगा। ऐसी प्रार्थना परमेश्वर के साथ सच्ची वार्तालाप के बिंदु तक पहले ही पहुँच चुकी है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "प्रार्थना की क्रिया के विषय में" से

मैं आशा करता हूँ कि भाई और बहन प्रत्येक दिन सच्चाई के साथ प्रार्थना करने के योग्य हैं। यह किसी धर्मसिद्धांत का पालन करना नहीं है, परंतु एक ऐसा प्रभाव है जिसे पूरा किया जाना चाहिए। … तुम्हें कहना चाहिए: "हे परमेश्वर! मैं अपने कर्त्तव्य को पूरा करना चाहता हूँ। इसलिए कि तू हम में महिमा को प्राप्त करे, और हम में, लोगों के इस समूह में गवाही का आनंद ले, मैं बस यह कर सकता हूँ कि अपने संपूर्ण अस्तित्व को तेरे प्रति भक्तिमय रूप में समर्पित कर दूँ। मैं तुझसे विनती करता हूँ कि तू हम में कार्य कर, ताकि मैं सच्चाई के साथ तुझसे प्रेम कर सकूँ और तुझे संतुष्ट कर सकूँ, और तुझे वह लक्ष्य बना सकूँ जिसको मैं पाना चाहता हूँ।" जब तुम में यह बोझ होगा, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें सिद्ध बनाएगा; तुम्हें केवल अपने लिए ही प्रार्थना नहीं करनी चाहिए, बल्कि परमेश्वर की इच्छा को पूरी करने के लिए भी, और परमेश्वर से प्रेम करने के लिए भी। ऐसी प्रार्थना सबसे सच्ची प्रार्थना होती है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "प्रार्थना की क्रिया के विषय में" से

जितना अधिक आत्मिक जीवन तुम जीओगे, उतना अधिक तुम्हारा हृदय परमेश्वर के वचनों से भरा रहेगा, इन विषयों के साथ हमेशा संबंधित रहेगा और हमेशा इस बोझ को रखेगा। उसके बाद, तुम अपने आत्मिक जीवन के द्वारा अपने भीतर छुपे सत्यों को परमेश्वर के सामने प्रकट कर सकते हो, उसे बता सकते हो कि तुम क्या करना चाहते हो, तुम किस विषय में सोच रहे हो, परमेश्वर के वचन के बारे में अपनी समझ और उसे देखने के अपने तरीके के बारे में बता सकते हो। कुछ भी न छुपाओ, थोडा सा भी नहीं! अपने मन में परमेश्वर से वचनों को कहने का प्रयास करो, सच बताओ, और वह बोलने से न हिचको जो तुम्हारे मन में है। जितना अधिक तुम यह करते हो उतना अधिक तुम परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव करोगे, और तुम्हारा हृदय भी परमेश्वर की ओर अधिक से अधिक आकर्षित होगा। जब ऐसा होता है, तो तुम अनुभव करोगे कि किसी और की अपेक्षा परमेश्वर तुम्हें अधिक प्रिय है। फिर चाहे कुछ भी हो जाए, तुम कभी भी परमेश्वर के साथ को नहीं छोड़ोगे। यदि प्रतिदिन तुमइस प्रकार के आत्मिक भक्तिमय समय बिताओ और इसे अपने मन से बाहर न निकालो, बल्कि इसे अपने जीवन की बुलाहट मानो, तो परमेश्वर का वचन तुम्हारे हृदय को भर देगा। पवित्र आत्मा के द्वारा स्पर्श पाने का अर्थ यही है। यह ऐसे होता है जैसे कि तुम्हारा हृदय हमेशा परमेश्वर के पास हो, जैसे कि तुम्हारे हृदय में हमेशा प्रेम रहा हो। कोई भी तुमसे उसे छीन नहीं सकता। जब यह होता है, तो परमेश्वर सचमुच तुम्हारे भीतर वास करेगा और तुम्हारे हृदय में अपना निवास बनाएगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "एक सामान्य आत्मिक जीवन लोगों की सही मार्ग पर अगुवाई करता है" से

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प्रश्न 22: प्रभु यीशु ने कहा: "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा।" (यूहन्ना 4:14)। अधिकांश लोग सोचते हैं कि प्रभु यीशु ने हमें पहले से ही अनन्त जीवन का मार्ग प्रदान किया है, लेकिन मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा है: "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है।" यह सब क्या है? यह क्यों कहता है कि आखिरी दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है? प्रश्न 31: बाइबल में जकर्याह की पुस्तक में, यह भविष्यवाणी की गई है: "यरूशलेम नगर के पूर्व में जैतून पहाड़ है। प्रभु उस दिन उस पहाड़ पर खड़ा होगा।…" परमेश्वर की वापसी निश्चित रूप से यहूदिया में जैतून के पहाड़ पर होगी, और फिर भी तुम गवाही देते हो कि प्रभु यीशु पहले ही वापस आ चुका है, चीन में प्रकट हुआ है और कार्यरत है। चीन एक नास्तिक देश है और यह सबसे अंधकारमय, सबसे पिछड़ा राष्ट्र है जो परमेश्वर को सबसे गंभीर रूप से नकारता है, तो प्रभु की वापसी चीन में कैसे हो सकती है? हम वास्तव में इसको समझ नहीं सकते, इसलिए कृपया हमारे लिए इसका उत्तर दो। प्रश्न 26: बाइबल ईसाई धर्म का अधिनियम है और जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, उन्होंने दो हजार वर्षों से बाइबल के अनुसार ऐसा विश्वास किया हैं। इसके अलावा, धार्मिक दुनिया में अधिकांश लोग मानते हैं कि बाइबल प्रभु का प्रतिनिधित्व करती है, कि प्रभु में विश्वास बाइबल में विश्वास है, और बाइबल में विश्वास प्रभु में विश्वास है, और यदि कोई बाइबल से भटक जाता है तो उसे विश्वासी नहीं कहा जा सकता। कृपया बताओ, क्या मैं पूछ सकता हूँ कि इस तरीके से प्रभु पर विश्वास करना प्रभु की इच्छा के अनुरूप है या नहीं? बाइबल के धर्म-शास्त्रीय ज्ञान पर भरोसा करते हुए यदि कोई परमेश्वर पर विश्वास करता है तो इसका क्या अंजाम होगा?