मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 18.परमेश्वर की सेवा करने के लिए व्यक्ति को पतरस के मार्ग पर चलना चाहिए

अधिकतर लोग अन्तर करने में असमर्थ होते हैं कि किन लोगों के पास सत्य है, किन लोगों के पास सत्य नहीं है और कौन लोग ऐसी चीज़ें कहते हैं जिनमें उस सत्य का समावेश होता है। जब आपसे कहा जाता है कि समझाइए कि “सत्य” का क्या अभिप्राय होता है, तो आप स्पष्ट तरीके से इसे समझा नहीं सकते हैं। परन्तु जैसे ही कोई कुछ कहता है, आप कहते हैं: “उसका दृष्टिकोण सही है। वे वचन जो वह कहता है एक व्यावहारिक समझ को दिखाते हैं जिसे अनुभव के जरिए हासिल किया गया है।” जैसे ही आप उन्हें बोलते हुए सुनते हैं आप समझ जाते हैं। यहाँ उपस्थित लोगों में से वे लोग जो नए हैं, यदि मैं आपसे पूछता हूँ कि “वास्तविकता,” का क्या अभिप्राय है तो आप न केवल मुझे उत्तर देने में असमर्थ होंगे, बल्कि साथ ही आप एक व्यक्ति जो वास्तविकता के विषय में बात कर रहा है और एक व्यक्ति जो सिद्धान्त के विषय में बात कर रहा है उनके बीच अन्तर करने में भी असमर्थ होंगे। इसे आप सभी का महत्व कम करने के लिए नहीं कहा गया है, यह बस इसलिए है क्योंकि आप सभी के पास अनुभव नहीं है। कलीसिया के उन पुराने अनुभवी लोगों को देखिए; यद्यपि कुछ समृद्ध प्रलोभक ऐसी चीज़ों से उन्हें व्यग्र कर सकते हैं जिनके ऊपर वे ऊंगली उठाने के बिलकुल भी योग्य नहीं हैं, तब भी वे जानते हैं कि जो वे लोग कहते हैं वह सही नहीं है। वे यह परखने में सक्षम हैं कि कौन लोग सिद्धान्त की बात कर रहे हैं, और कौन लोग वास्तविकता की बात कर रहे हैं। फिर भी, आप लोगों ने तो अभी तक सतह को भी नहीं खुरचा है। इसे आप सभों को नीचा दिखाने के लिए नहीं कहा गया है, अतः इसके कारण नकारात्मक मत होइए। यह अनुभव की वह सामान्य प्रक्रिया है जिससे होकर हर एक को गुज़रना होगा। हर एक को अनेक वर्षों की सिंचाई, चरवाही, सुनने, एहसास करने, महसूस करने और अनुभव से होकर गुज़रना होगा इससे पहले कि वे धीरे धीरे किन्तु पूरी तरह से जीवन के अनुभवों को समझ सकें, इससे पहले कि वे दहलीज़ को पार कर सकें और अपनी आँखें खोल सकें। यदि आप केवल सिद्धान्त की बात करते हैं और सिद्धान्त सुनते हैं, यदि आप उन विषयों को नहीं समझ सकते हैं जो वास्तविकता से सम्बन्धित हैं और आपके पास कोई सूझ-बूझ नहीं है, तो आपकी आँखों को खोला नहीं गया है; उन्हें बस अभी तक खोला नहीं गया है। “आपकी आँखों को खोला नहीं गया है” का क्या अभिप्राय है? इसका मतलब है कि आपने अभी तक दहलीज़ को पार नहीं किया है, और यह एक प्रमाणित तथ्य है। इसका मतलब है कि आपने अभी तक दहलीज़ को पार नहीं किया है जहाँ सत्य संबंधित है। फिलहाल अपने आपको देखिए। हो सकता है कि आप पासबानी का कार्य, दूसरों की सहायता, दान और खर्च कर सकते हैं, या परमेश्वर के परिवार में कुछ दैनिक चीज़ें कर सकते हैं। किन्तु आपके पास आवश्यक रूप से वास्तविकता नहीं है, और न ही आपके पास आवश्यक रूप से वास्तविकता के प्रति या अक्षरों और सिद्धान्तों के प्रति कोई सूझ-बूझ होगी। कदाचित् आप लोगों को इसका यकीन नहीं है, उस दिन तक जब कोई आता है जो सिद्धान्त की बात करता है, जो वाक्पटु हैं, और तब कदाचित् आप लोग उन्हें कुर्सी पर बैठाएंगे। और जब वह व्यक्ति आता है जिसके पास सचमुच में वास्तविकता है, जो शांत है, जो बोलता नहीं है, तो कदाचित् आप सभी उनपर ध्यान नहीं देंगे। जैसे ही आप लोग ऐसा करते हैं, वैसे आप सभी जानेंगे कि आपकी स्वयं की कद-काठी कहाँ पर है। हाँ, एक मनुष्य की कद-काठी, वास्तविकता और स्वयं के प्रति मनुष्य की समझ, सत्य के प्रति मनुष्य का अनुभव, परमेश्वर के प्रति मनुष्य की समझ-ये सभी चीज़ें अनुभव से, प्रति दिन के जीवन को जीने से, और शुद्धता एवं सादगी से आती हैं। ये चीज़ें निश्चित तौर पर अध्ययन से नहीं आती हैं न ही जितना अधिक आपने सुना है उससे आती हैं। “मेरे पास ये चीज़ें हैं, मैंने उन्हें सुना हैं और मैं उन्हें स्मरण रखता हूँ। ज्ञान का मेरा स्तर ऊंचा है, मैं महाविद्यालय का विद्यार्थी हूँ, मैं कुछ काम करता हूँ, मैं किसी चीज़ का अनुसन्धान करता हूँ, और जैसे ही मैं उन्हें सुनता हूँ मैं चीज़ों को जान जाता हूँ।” आप उस ज्ञान का इस्तेमाल कर सकते हैं जिसे आपने दर्शनकी बातों, राजनीति की बातों या साहित्य को सुनने से सीखा है। किन्तु आप उसे यहाँ इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं, यह बेकार है!तो हमारे पास, यहाँ क्या है? वह ज्ञान जो आपने सीखा है वह सत्य के लिखित वचनों या जिस तरह से उसे दूसरों से बेहतर ढंग से शब्दों में व्यक्त किया गया है उसे जानने के लिए आपकी सहायता कर सकता है, किन्तु जब आपके द्वारा सत्य का अनुभव करने की बात आती है तो आप अन्य लोगों से बेहतर नहीं हैं; उस लिहाज़ से आपको लाभ नहीं है। आप सभी इसे स्वीकार करते हैं, सही है? आप लोग जीवन के अनुभवों के विषयों की खोज नहीं करते हैं और आप सभी में बहुत सी चीज़ों की कमी है। परन्तु आप में से वे लोग जिनके पास कुछ ज्ञान है, जो अब अन्य लोगों के ऊपर एक अगुवे के रूप में एक लाभप्रद स्थिति में हैं, जो अक्सर काम में लगे रहते हैं और जो उच्च स्तरों में कलीसिया के पुराने अनुभवी लोगों के साथ सम्पर्क में हैं, और जो कुछ विशेष कार्य करते हैं, आप सभी तेजी से उन्नति कर सकते हैं। जैसा कलीसिया के पुराने अनुभवी लोग पहले कर सकते थे आप सभी सत्य के किसी एक पहलु के साथ और स्वयं की समझ के साथ उनकी अपेक्षा ज़्यादा तेजी से, और वास्तविकता की अपनी समझ के साथ द्रुत गति से उन्नति कर सकते हैं। शायद आप लोग एक टेढ़े मार्ग पर नहीं चलेंगे या शायद आप सभों को भी कुछ असफलताओं को झेलना होगा। हर एक की स्थिति अलग अलग है, उनकी परिस्थितियां अलग अलग हैं। कुछ लोगों को कुछ असफलताओं को झेलने की आवश्यकता है इससे पहले कि वे बड़े परिवर्तन का अनुभव करें। और तब कुछ लोग हैं जिन्हें बड़ी असफलताओं को झेलने की आवश्यकता नहीं है, परन्तु उस मार्ग को खोजने की आवश्यकता है जिस पर उनको चलना चाहिए और उन चीज़ों में उनकी स्वयं की भ्रष्टता को खोजने की आवश्यकता है जो उनके इर्द-गिर्द घटित होती हैं, और वे लोगों, चीज़ों और उनके चारों ओर के पदार्थों के भीतर कुछ अंत:दृष्टि प्राप्त करते हैं-यह एक ऐसा व्यक्ति है जो अपेक्षाकृत तेजी से उन्नति करता है।

अतः अब आप लोगों को किस पर ध्यान देना चाहिए? यदि आप सभी केवल दूसरे दर्जे के मामलों पर कार्य करने और उसके इर्द-गिर्द भागते रहने पर ध्यान देते हैं, तो आप लोगों की उन्नति में विलम्ब हो जाएगा। जब आप लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, तो जीवन में आप सभों की उन्नति बहुत ही ख़ास है और वह बहुत ही महत्वपूर्ण है। आप अपने आपको सिद्धान्तों के साथ, या कार्य करने की योग्यता के साथ सुसज्जित कर सकते हैं, या आप कुछ बेहतरीन पद्धति का उपयोग करके, या बुद्धि के साथ कुछ कर सकते हैं; ये सभी चीज़ें दूसरे दर्ज़े की हैं, यद्यपि आप अभी भी उनके बिना काम नहीं कर सकते हैं। परमेश्वर में आपके विश्वास के लिए मुख्य विषय है कि आपको सत्य को पूर्ण रूप से जानना होगा, सत्य का अनुभव करना होगा, और इसकी कुछ समझ रखनी होगी, और एक आज्ञाकारी हृदय रखने के योग्य होना होगा और परमेश्वर के सामने उसकी इच्छा को सन्तुष्ट करना होगा। यदि आप परमेश्वर पर विश्वास करते हैं किन्तु जितना अधिक आप विश्वास करते हैं, उतना ही अधिक परमेश्वर के साथ आपका रिश्ता दूर होता जाता है, आप परमेश्वर से और अधिक दूर हो जाते हैं और आपके भीतर उतना ही अधिक स्थान होता है जो सत्य के साथ संघर्ष करता है, तो यह साबित करता है कि आपका विश्वास उन्नति करने में आपकी अगुवाई नहीं कर रहा है, यह कि पवित्र आत्मा ने आप के ऊपर कार्य नहीं किया है, और यह कि आप भटक गए हैं और बहुत अधिक दूर चले गए हैं। यदि आप एक समय के लिए विश्वास करते हैं और तब आपके पास वास्तविकता की कुछ समझ, एवं स्वयं की कुछ समझ होती है, और आप सोचते हैं कि आपने वास्तविकता की कुछ चीज़ों का आभास कर लिया है, तो यह साबित करता है कि आप आत्मिक विषयों को समझते हैं, आपकी आँखें खुल जाती हैं और आप सही मार्ग पर चल रहे हैं। फिलहाल कुछ पुराने अनुभवी लोग हैं जिन्होंने दो या तीन वर्षों तक अनुसरण किया है, जिन्होंने सतह को खुरचा तक नहीं है, जो उपेक्षापूर्ण एवं असंयमित हैं और जिन्होंने आशीषों को प्राप्त करने के लिए तैयारी की है, जो एक बार कार्य के समाप्त होने पर अपने अच्छे सौभाग्य का आनन्द उठाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने जीवन के अनुभवों के लिहाज़ से सतह को खुरचा तक नहीं है, और उनके पास परमेश्वर के साथ थोड़ा सा भी सामंजस्यपूर्ण रिश्ता तक नहीं है। उनके साथ थोड़े समय के लिए रहना ठीक है, और वे अनिच्छापूर्वक आज्ञा मानते हैं, और यदि उनके पास अवधारणाएं हैं तो वे बोलने की हिम्मत नहीं करेंगे। किन्तु जब एक बार कुछ समय बीत जाता है, तो जिस घड़ी वे प्रतिरोध करना शुरू कर देते हैं, वे पतन का विषय बन जाते हैं। हर कोई ख़तरनाक ज़मीन पर है, और यह एक भयानक चीज़ है। यदि आप परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और सही पथ पर चलते हैं, तो आपका विश्वास सही है और आप आशीषों को प्राप्त करेंगे। यदि आप टेढ़ा-मेढ़ा जाते हैं, यदि आप ग़लत मार्ग या टेढ़े-मेढ़े मार्ग पर चलते हैं, यदि आप द्रुत गति से बलपूर्वक आगे नहीं बढ़ते हैं, अपनी पूरी सामर्थ्य से द्रुत गति से बलपूर्वक आगे नहीं बढ़ते हैं, तो आप नष्ट हो जाएंगे और दंड सहेंगे।

लोगों के पास परमेश्वर पर विश्वास करने के दो मार्ग होते हैं: पहला है परमेश्वर पर पूरी तरह विश्वास करने के योग्य होना; दूसरा है परमेश्वर की अवहेलना करना और उसके विरुद्ध जाना। केवल ये ही दो मार्ग हैं। ऐसा नहीं हो सकता है कि आप परमेश्वर के विरुद्ध नहीं जाते हैं किन्तु यह कि आप उसकी आज्ञा भी नहीं मानते हैं; यह सम्भव नहीं है। यदि आप परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानते हैं और यदि आपके पास कोई विशुद्ध समझ नहीं है, तो आप केवल विद्रोही और उपेक्षापूर्ण हो सकते हैं। हो सकता है कि उन चीज़ों के साथ जिन्हें आप कहते हैं आप आज्ञाओं के उल्लंघन को न दिखाते हों, और हो सकता है की आप खुले तौर पर हथियार निकालकर उसके विरुद्ध नहीं जाते हैं, किन्तु आपका हृदय अभी भी विद्रोही है। या जब आपसे कुछ करने के लिए पूछा नहीं जा रहा है, हो सकता है कि आप महसूस करें कि आप परमेश्वर के लिए प्रेम से भर गए हैं और यह महसूस करें कि आप परमेश्वर के बेहद करीब हैं। परन्तु जैसे ही आपसे कुछ करने को कहा जाता है, तब आपका विद्रोह, आपका अहंकार, आपकी आत्म-धार्मिकता और शैतान के लिए आपकी बातें प्रकट हो जाती हैं; जब एक बार उन्हें प्रकट कर दिया जाता है, तो आपका विद्रोह प्रमाणित तथ्य बन जाता है। क्या यह सही नहीं है? हो सकता है कि आप परमेश्वर में अपने विश्वास को महज इस रूप में देखते हैं “मैं परमेश्वर पर विश्वास करने के द्वारा धन्य हूँ और उसके बाद मैं उसकी आशीषों का व्यक्ति बन जाऊंगा। मैं परमेश्वर के परिवार का एक सदस्य हूँ और मुझे परमेश्वर के द्वारा ऊंचा उठाया गया है; मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जिसे परमेश्वर के द्वारा ऊपर उठाया गया है। मैं धन्य हूँ और परमेश्वर मेरे प्रति दयालु है।” परन्तु यदि आप इसे इस तरीके से देखते हैं, तो उपयोगिता क्या है? इन नारों के खोखले शब्दों को चिल्लाने की क्या उपयोगिता है? अब मुख्य बात यह है कि आपको बचाया जा सकता है या नहीं, आप जीवन के सही मार्ग पर चलते हैं या नहीं, परमेश्वर आपके विश्वास में आपकी प्रशंसा करता है या नहीं, परमेश्वर के परिवार में आपकी सदस्यता को परमेश्वर स्वीकार करता है या नहीं, और परमेश्वर आपको स्वीकार करता है या नहीं; केवल इससे ही समझा जाएगा कि आप परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में गम्भीर हैं या नहीं। एक नासमझ विश्वास, जैसे “आहा, परमेश्वर मेरे प्रति दयालु है, परमेश्वर मेरी तरफदारी करता है, मैं धन्य हूँ और मैं हर जगह उन्नति करता हूँ। देखिए, परमेश्वर ने मुझे ऊंचा उठाया है और मुझे अपने परिवार में एक अगुवा बनाया है। मैं बहुत ही सौभाग्यशाली रहा हूँ और जब से मैं परमेश्वर के परिवार में आया हूँ मेरा सितारा उदय होता रहा है।” केवल इस प्रकार की चीज़ को दिखाना किसी काम का नहीं है। यह खोखला है; बेकार है! यदि आपको एक अवसर दिया जाता है किन्तु आप झपटकर उसे नहीं पकड़ते हैं, तो उसे व्यर्थ में दिया गया था, और यह किसी काम का नहीं होगा भले ही आपको बहुत सारे अवसर दिए जाएँ। कुछ सच्ची और वास्तविक बातों को झपटकर पकड़ लीजिए। कुछ पुराने अनुभवी विश्वासी कहते हैं: “आहा, मैं धन्य हूँ! मैं धन्य हूँ और मैं इस संसार में, सारे विश्व में सबसे धन्य व्यक्ति हूँ।” भले ही आप एक स्वर्गदूत होते फिर भी यह आपके लिए उपयोगी नहीं होता; आप बस यों ही इस प्रकार की चीज़ों को नहीं कह सकते हैं, आपको सच्ची बातों को झपटकर पकड़ना होगा। विशेषकर आप में से वे लोग जिन्होंने केवल थोड़े समय के लिए ही परमेश्वर पर विश्वास किया है और कम अनुभव प्राप्त किया है, जिन्होंने शुरुआत में कार्य के उन क़दमों का अनुभव नहीं किया था, और जो सबसे अंत में आए थे-क्या आप अपने जीवन की बाजी लगाने को तैयार हैं कि इसके बाद आपको बचा लिया जाएगा। क्या आप तैयार हैं? आप तैयार नहीं हैं, क्या आप तैयार हैं? यदि आप इस पर अपने जीवन की बाजी लगाने को तैयार नहीं हैं, तो आप एक खतरनाक स्थिति में हैं!

यदि आप नहीं समझते हैं कि परमेश्वर की सेवा करना क्या है या परमेश्वर की आज्ञा मानना क्या है, और आप यह बिलकुल भी नहीं समझते हैं कि परमेश्वर की सेवा कैसे करना है या लोगों को किस प्रकार परमेश्वर पर विश्वास करना चाहिए; यदि आपने इन चीज़ों का आभास नहीं किया है और आपके हृदय में इनकी कोई समझ नहीं है, तो आप आसानी से भटक जाएंगे और आसानी से परमेश्वर की अवहेलना करेंगे। उनके समान जो पहले गिर गए थे जिन्होंने कहा था: “पवित्र आत्मा को इसे हम पर प्रकट करने दीजिए!” अब आप सभी इस मामले को साफ-साफ देखते हैं। उस समय उनके पास कुछ बुरा करने एवं परमेश्वर की अवहेलना करने का कोई इरादा नहीं था, और वे जानते थे कि परमेश्वर ने उनको ऊपर उठाया है और उन्हें कठिन परिश्रम करना ही होगा। फिर भी वे सही मार्ग पर नहीं चलते थे, केवल यह सोचते हुए कि परमेश्वर ने उन्हें ऊपर उठाया था, यह कि वे कड़ी मेहनत करना, और वे जो कलीसिया में उनके नीचे हैं उनकी चरवाही करने का अच्छा काम करना चाहते थे; उन्होंने सोचा था जो कुछ भी उनके ऊपर के लोग उनसे करवाना चाहेंगे वे उसे करेंगे। उन्होंने व्यावहारिक बातों का आभास नहीं किया था और वे असल में चीज़ों को आँख बंद करके कर रहे थे, और अपनी स्वयं की इच्छा पर भरोसा कर रहे थे। जब उन्हें आगे से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था, तो वे क्रोधित हो गए और उन्होंने कहा: “परमेश्वर धर्मी है। पवित्र आत्मा को इसे प्रकट करने दीजिए!मेरा विश्वास मनुष्य पर नहीं है, यह परमेश्वर पर है।” उन्होंने पहले से ही इन शब्दों को कहने की योजना नहीं बनाई थी, अतः क्या इसे अनैच्छिक रूप से कहा गया था? उसका क्या कारण था? यह इसलिए था क्योंकि मनुष्य परमेश्वर का भय नहीं मानता है और उसे नहीं समझता है। आप देखिए कि कुछ लोग कुछ बातें करते हैं जो मूर्ख और अज्ञानी हैं, और उन्हें क्षमा कर दिया जाता है। उनकी अज्ञानता के लिए उन्हें क्षमा कर दिया जाता है और जो उनकी ज़िम्मेदारियां थीं उन्हें नहीं देखा जाता है। कुछ अन्य लोगों के साथ ऐसा ही क्यों नहीं होता है? क्योंकि उन्होंने ऐसी बातें कहीं जो बहुत ही गम्भीर थीं: “आप परमेश्वर हैं, किन्तु मैं तब भी आपकी आज्ञा को नहीं मानूंगा।” ये लोग मसीह विरोधी हैं; वे परमेश्वर की अवहेलना करते हैं और सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं। कुछ लोग मूर्ख और अज्ञानी हैं। एक या दो बार अपनी मूर्खता और अज्ञानता को दिखाना ठीक है; परन्तु यदि आप परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करते हैं या परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुंचाते हैं, तो आप परेशानी में पड़ जाएंगे। उस मार्ग को देखिए जिस पर पतरस चला था। उसने प्रारम्भ में पवित्र आत्मा से विशेष प्रकाशन प्राप्त किया था और यीशु से कहा था: “तू मसीह है, जीवित परमेश्वर का पुत्र।” जब एक बार पवित्र आत्मा ने उसे प्रकाशित किया था, तब उसने कुछ अंत:दृष्टी प्राप्त की थी और उसका हृदय प्रकाश से भर गया था। यद्यपि उस समय उसके पास एक गहरी समझ नहीं थी, फिर भी उसने परमेश्वर को समझने की कोशिश की थी, और वह परमेश्वर की सेवा के सही मार्ग पर चला था। परमेश्वर की सेवा करना एक बहुत ही ख़तरनाक बात है, और साथ ही यह एक बहुत ही महान बात भी है। क्योंकि मनुष्य विद्रोही और भ्रष्ट है, जब एक बार वे भटक जाते हैं, तो वे ख़त्म हो जाते हैं। लोग परमेश्वर की सेवा करते हैं, दूसरों की नहीं; परमेश्वर की सेवा करना एक भयंकर चीज़ है। पतरस इस मार्ग पर चला था और उसमें यह विश्वास था। तो पौलुस के विषय में क्या? उसने नहीं पहचाना था कि यीशु ही मसीह था। उसने बिना रुके उसका पीछा किया था और, उसे नीचे गिरा दिए जाने के बाद, पौलुस ने तब भी यह एहसास नहीं किया था कि परमेश्वर सभी चीज़ों का प्रभु है, न ही यह कि मनुष्य को उसकी आज्ञा कैसे माननी चाहिए। उसके पास तर्क का कोई सामान्य एहसास नहीं था, किन्तु प्रारम्भ से लेकर अंत तक उसने एक अहंकारी मानसिकता को आश्रय दिया था: “मैं आपको इतना कुछ देता हूँ इसलिए आपको भी मुझे उतना ही देना चाहिए; मैं इतना खर्च करता हूँ, अतः आपको भी मुझे उतना ही प्रतिफल देना चाहिए और मुझे उतना ही पारिश्रमिक देना चाहिए।” उसका कार्य निरन्तर इस प्रकार की सोच के प्रभुत्व के आधीन था। अतः उसके पास परमेश्वर का आदर करनेवाला हृदय और परमेश्वर का भय माननेवाला हृदय कभी नहीं था। उसके वचनों का अंदाज़ देखिए: “मैंने उस कुश्ती को लड़ा है”-मैंने उस कुश्ती को लड़ा है जिससे आपने मुझे लड़वाया है; “मैंने अपना कोर्स पूरा किया है”-मैंने उस दौड़ को पूरा किया है जिसे दौड़ने के लिए आपने मुझे कहा है; “मैंने विश्वास की रक्षा की है”-क्या आपने मुझसे इसकी रक्षा नहीं करवाया था। मैंने इसकी रक्षा की है, अतः क्या मेरे लिए महिमामय मुकुट को आरक्षित नहीं किया जाना चाहिए? क्या वह इस प्रकार के अंदाज़ के साथ नहीं बोलता है? हाँ वास्तव में वह पत्री में इस रूखेपन से नहीं बोल सकता है। वह कठोर शब्दों के बदले मधुरता से और गूढ़ अर्थ के साथ बोलता है, किन्तु उसके वचन इन विचारों से प्रस्फुटित हुए हैं। अंत में क्या होता है? तब भी उसे दण्ड दिया जाना था, क्या उसे दण्ड नहीं दिया जाना था? आपको स्पष्ट रूप से देखना होगा कि किस प्रकार एक मनुष्य को परमेश्वर की सेवा करने का मार्ग, और परमेश्वर पर विश्वास करने का मार्ग चुनना चाहिए। परमेश्वर की सेवा करने के लिए कौन से मार्ग पौलुस के मार्गों से सम्बन्धित हैं? विश्वास करने के लिए कौन से मार्ग पौलुस के मार्गों से सम्बन्धित हैं? पतरस के समान परमेश्वर की सेवा करने के भक्तिपूर्ण मार्ग को कैसे हासिल किया जा सकता है? परमेश्वर की सेवा करने के लिए एक रास्ता है जिस पर परमेश्वर की रचनाओं को चलना चाहिए; उस रास्ते को सही रीति से चुना जाना चाहिए और आप लोगों के उद्देश्य स्पष्ट होने चाहिए। नासमझ मत बनिए, किन्तु ईमानदारी से चलिए और ठोस ज़मीन पर एक दर्शन के साथ खड़े होइए जो बिलकुल स्पष्ट हो। नासमझ तरीके से आगे चलना आपके लिए बहुत ख़तरनाक है और यह आश्वस्त करता है कि आप एक दिन परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों को ठेस पहुंचाएंगे या असंतोष प्रकट करना शुरू कर देंगे।

क्या आप लोग स्पष्ट हैं कि मनुष्य में कौन सा स्वभाव या कौन सी स्थिति है जो उन्हें बहुत आसानी से बर्बादी की ओर ले जाती है, इसकी परवाह किए बगैर कि वे एक अगुवे हैं या एक अनुयायी? क्या आप मनुष्य के सामान्य स्वभाव के विषय में जानते हैं? मनुष्य के स्वभाव की साधारणता परमेश्वर को धोखा देने के लिए है; हर एक और प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर को धोखा दे सकता है। क्या केवल विश्वास न करना परमेश्वर के प्रति धोखा है? परमेश्वर के प्रति धोखा क्या है? किन चीज़ों का अर्थ होता है परमेश्वर के प्रति धोखा? आपको समझना होगा कि मनुष्य का सार-तत्व किस से बना है; आपको इसे समझना होगा और मुद्दों के जड़ का आभास करना होगा। आपकी घातक कमज़ोरियां, शीघ्र नाराज़ हो जानेवाला स्वभाव, बुरे तरीके, बुरी आदतें या बुरा संस्कार-ये सभी छिछले हैं। यदि आप केवल इन चीज़ों क ही मज़बूती से आभास करते हैं और आपका सार-तत्व जटिल बना रहता है, तो आप अब भी टेढ़े-मेढ़े रास्ते पर चलेंगे और आप अब भी परमेश्वर की अवहेलना करेंगे। क्या यह सही नहीं है? आप लोग सदा सतह को खुरचते रहते हैं और छोटे छोटे विवरणों को मुट्ठी में पकड़े रहते हैं। मनुष्य परमेश्वर को किसी भी समय या किसी भी स्थान पर धोखा दे सकता है और यह एक गम्भीर समस्या है। शायद आप इस घड़ी परमेश्वर से बहुत अधिक प्रेम कर सकते हैं, परमेश्वर के लिए बहुत कुछ खर्च कर सकते हैं, और विशेष रूप से वफादार हो सकते हैं; शायद इस घड़ी आप व्यावहारिक रूप से तर्कसंगत हो सकते हैं और आपके पास एक विवेक हो सकता है। किन्तु एक ऐसा समय और एक ऐसा स्थान आ सकता है जहाँ कोई चीज़ परमेश्वर को धोखा देने के लिए आपकी अगुवाई कर सकती है। यह कहना कि एक व्यक्ति इस वक्त विशेष रूप से तर्कसंगत है; पवित्र आत्मा उन पर कार्य कर रही है, उनके पास कुछ व्यावहारिक अनुभव है, उन्होंने एक बोझ को कन्धे पर उठा लिया है, वे वफादारी से अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाते हैं और उनके पास बहुत मज़बूत विश्वास है। तब मान लीजिए कि परमेश्वर ने कुछ किया था जिसने उन्हें निराश कर दिया था, कुछ ऐसी चीज़ जिसके बारे में उन्होंने सोचा था कि वह ग़लत है। तब उनके भीतर अवधारणाएँ पैदा होंगी, वे एकदम से ही नकारात्मक हो जाएंगे, और वे उत्साह खो देंगे और वे अपने काम में असावधान हो जाएंगे, और वे यह कहते हुए प्रार्थना करना छोड़ देंगे, “मैं किस के लिए प्रार्थना कर रहा हूँ? परमेश्वर को यह नहीं करना चाहिए था!मैं कैसे प्रार्थना कर सकता हूँ?” उनका बल चला जाएगा और प्रार्थना के लिए उनका उत्साह भी चला जाएगा। इसे क्या कहते हैं? क्या यह धोखे का प्रकटीकरण नहीं है? किसी भी समय और स्थान पर मनुष्य परमेश्वर को छोड़ सकता है, परमेश्वर की अवहेलना कर सकता है और परमेश्वर पर दोष लगा सकता है-क्या ये सभी धोखे नहीं हैं। यह एक भयानक बात है। देखिए, आप सोचते हैं कि फिलहाल आपके पास कोई अवधारणाएं नहीं हैं और आप अधिकांश समय परमेश्वर की आज्ञा को मान सकते हैं, यह कि जब आपके साथ व्यवहार किया जाता है और कांट-छांट किया जाता है तो आप परमेश्वर को नहीं छोड़ेंगे। फिर भी आप किसी भी समय या स्थान पर परमेश्वर को अब भी धोखा दे सकते हैं। आपको पूरी तरह से मनुष्य के स्वभाव को समझना होगा। हाँ वास्तव में, कुछ लोगों के पास समय-समय पर कुछ विवेक होगा, और वे ऐसे लोग होंगे जिनका स्वभाव अपेक्षाकृत अच्छा होगा। कुछ लोगों के पास बुरी मानवता होगी, और उनका स्वभाव बुरा होगा। परन्तु इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई आपकी मानवता को अच्छा कहता है या बुरा, या आपकी योग्यता अच्छी है या ख़राब, सामान्य स्वभाव यह है कि आप परमेश्वर को धोखा देने में सक्षम हैं। मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर को धोखा देना है, अतः क्या लोग परमेश्वर को धोखा दे सकते हैं यदि उन्हें भ्रष्ट नहीं किया गया है? आप लोग अभी भी सोचेंगे: “लोगों के स्वभाव जिन्हें शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया गया है वे परमेश्वर को धोखा देंगे इसलिए ऐसा कुछ नहीं हैं जो मैं कर सकता हूँ। मुझे बस थोड़ा थोड़ा करके बदलना होगा।” क्या आप लोग अभी भी इस तरह से सोचते हैं? अतः मुझे बताइए, क्या लोग परमेश्वर को धोखा देने में सक्षम थे यदि उन्हें भ्रष्ट नहीं किया गया होता? लोग परमेश्वर को धोखा देने में भी सक्षम थे यदि उन्हें भ्रष्ट नहीं किया गया होता। जब मनुष्य का निर्माण किया गया था, उन्हें स्वतन्त्र इच्छा दी गई थी, वे बहुत ही कमज़ोर थे, और उनके पास वह हृदय नहीं था जो सक्रियता से परमेश्वर के पास पहुँच सकता था या जो सक्रियता से परमेश्वर की ओर फिर सकता था: परमेश्वर हमारा सृजनहार है और हम उसकी रचनाएँ हैं। मनुष्य के पास यह हृदय नहीं था। मनुष्य के भीतर कभी वह सत्य नहीं था और न ही कुछ ऐसा था जो परमेश्वर की आराधना करने में उनकी सहायता कर सकता था। परमेश्वर ने उन्हें स्वतन्त्र इच्छा दी थी ताकि मनुष्य सोच सके, किन्तु मनुष्य ने नहीं जाना कि परमेश्वर क्या था और नहीं समझा कि परमेश्वर की आराधना कैसे करें। उनके भीतर इस प्रकार का कुछ भी नहीं था। यदि भ्रष्ट नहीं भी किया जाता, तब भी आप परमेश्वर को धोखा दे सकते हैं। ऐसा क्यों है? शैतान आपको बहकाता है ताकि आप उसका अनुसरण करें और परमेश्वर को धोखा दें। आपको परमेश्वर के द्वारा निर्मित किया गया है किन्तु आप उसका अनुसरण नहीं करते हैं। उसके बजाय आप शैतान का अनुसरण करते हैं। क्या आप एक विश्वासघाती नहीं हैं? विश्वासघाती धोखा देते हैं। आप पूरी तरह से इस सार-तत्व को समझते हैं, क्या नहीं समझते हैं? अतः मनुष्य किसी भी समय और किसी भी स्थान पर परमेश्वर को धोखा दे सकते हैं। केवल जब मनुष्य सम्पूर्ण रीति से परमेश्वर के राज्य के भीतर रहता है और परमेश्वर की ज्योति में रहता है, जब शैतान का विनाश कर दिया जाता है और कोई प्रलोभन नहीं होता है, केवल तभी मनुष्य आगे से परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकता है। जबकि प्रलोभन अभी भी है, मनुष्य अब भी परमेश्वर को धोखा दे सकता है; अतः ऐसा कहा जाता है कि मनुष्य निकम्मा है। आप अभी भी सोचते हैं: “अब मैंने कुछ हासिल कर लिया है। मेरे पास कुछ है जो परमेश्वर को धोखा नहीं देता है किन्तु वे परमेश्वर के अनुरूप हैं। मुझे कांच का गिलास नहीं समझा जा सकता है, किन्तु कम से कम मिट्टी का बर्तन समझा जा सकता है। मुझे सोना नहीं समझा जा सकता है, किन्तु शायद तांबा समझा जा सकता है।” आप अपने आपको बहुत ही ऊंचा समझते हैं। क्या आप जानते हैं कि मनुष्य किस किस्म का प्राणी है? मनुष्य परमेश्वर को किसी भी समय या स्थान पर धोखा दे सकता है और उसकी क़ीमत एक कौड़ी की नहीं है। जैसा परमेश्वर ने कहा था: “वे कुत्ते के मल का ढेर, जानवर और नीच हैं।” लोग सोचते हैं: “मैं नीच नहीं हूँ! मैं बिलकुल भी नीच नहीं हूँ!मैं इस मामले को क्यों नहीं समझ सकता हूँ? मैंने इसका अनुभव क्यों नहीं किया था? यदि मुझे भ्रष्ट नहीं किया गया होता, तो मैं परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकता था।” इसके उदाहरण हैं, और प्रमाणित तथ्य हैं। अब जो मैं आप सभी को बता रहा हूँ वह बेबुनियाद नहीं है। ये सभी चीज़ें आप लोगों को दिखाने के लिए हैं, और आप सभी को यकीन दिलाने के लिए हैं; केवल इस तरह से ही आप लोग अपने स्वयं की भ्रष्टता की एक समझ तक पहुँच सकते हैं और धोखे की समस्या का समाधान कर सकते हैं। राज्य में आगे से मनुष्य में कोई धोखा नहीं होगा, मनुष्य परमेश्वर के प्रभुत्व के आधीन रहेगा और शैतान का उन पर कोई स्वामित्व नहीं होगा, और मनुष्य स्वतन्त्रता से जीवन बिताएगा और उसे यह सोचते हुए चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी कि, “क्या मैं परमेश्वर को धोखा दे सकता हूँ?” चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी; यह अनावश्यक होगा!उसके बाद, यह घोषणा की जा सकती है कि आप लोगों के भीतर कभी ऐसा कुछ नहीं होगा जो परमेश्वर को धोखा देता है। किन्तु अब, चीज़ें अभी तक ठीक नहीं हैं, जैसे मनुष्य का सार-तत्व कुछ ऐसा है जो परमेश्वर को किसी भी समय और किसी भी स्थान में धोखा दे सकता है। ऐसा नहीं है कि आप कुछ विपरीत परिस्थिति, या बिना किसी विपरीत परिस्थिति या बिना किसी के द्वारा दिए गए दबाव के कारण परमेश्वर को धोखा देंगे तब आप परमेश्वर को धोखा नहीं देंगे। आप तब भी परमेश्वर को धोखा दे सकते हैं उस समय भी जब कोई आप पर दबाव नहीं डाल रहा है; यह मनुष्य के भ्रष्ट सार-तत्व की एक समस्या है, और यह उनके स्वभाव की समस्या है। देखिए बस अभी अभी आपने कैसे साँस ली है, आपने कैसे कुछ भी नहीं किया है, आपने कोई हलचल नहीं की है, किसी भी चीज़ के बारे में नहीं सोचा है, और फिर भी वह स्वभाव जो परमेश्वर को धोखा देता है आपके भीतर है-क्या यह सही है? क्यों? क्योंकि मनुष्य के भीतर धोखा है और परमेश्वर उनके भीतर नहीं है। मनुष्य के आत्मा और मनुष्य के प्राण के भीतर परमेश्वर का कोई भाग नहीं है। अतः आप किस भी समय या किसी भी स्थान पर परमेश्वर को धोखा दे सकते हैं। देखिए, स्वर्गदूत अलग हैं। उनके पास परमेश्वर का स्वभाव नहीं है, न ही उसके पास परमेश्वर का सार-तत्व है। किन्तु वे सम्पूर्ण तरीके से परमेश्वर की आज्ञा को मान सकते हैं क्योंकि उन्हें परमेश्वर के द्वारा विशेष रूप से उसकी सेवा के लिए निर्मित किया गया था और उन्हें हर जगह भेजा गया है; वे परमेश्वर के हैं। फिर भी मानवजाति को पृथ्वी पर रहने के लिए बनाया गया था और उन्हें परमेश्वर की आराधना करने की योग्यता के साथ निर्माण नहीं किया गया था। मनुष्य परमेश्वर को धोखा देने में सक्षम हैं और वे ऐसे प्राणी हैं जिन्हें इस्तेमाल किया जा सकता है या किसी के भी द्वारा उनसे लड़ा जा सकता है। वे निकम्मे हैं!मनुष्य के इस स्वभाव को प्रकट किया गया है ताकि लोग इस विषय और अपने आपकी सही समझ प्राप्त कर सकें। इस पहलु से, लोग बदलना प्रारम्भ कर सकते हैं, और यहाँ से वे अभ्यास के मार्ग की खोज कर सकते हैं। यह समझना कि किन मामलों में आप परमेश्वर को धोखा दे सकते हैं और परमेश्वर को धोखा न देने के लिए आपको किन कमियों को पूरा करने की आवश्यकता है, तब आप एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाएंगे जहाँ आप अनेक पहलुओं में आगे से परमेश्वर को धोखा नहीं देंगे और उनमें से आधिकांश पहलुओं में आप उसे धोखा देने से परहेज करेंगे। बाद में आप परमेश्वर को धोखा देंगे या नहीं यह आपके ऊपर निर्भर नहीं है। आपकी जीवन यात्रा अपने अंत को पहुंचेगी, और उस पल तक पहुंचेगी जब परमेश्वर का कार्य पूरा हो जाता है, किन्तु बाद में आप परमेश्वर को धोखा देंगे या नहीं यह आपकी ज़िम्मेदारी नहीं है। इसे अभी क्यों कहा गया था? शैतान के द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट कर दिए जाने से पहले, वह आया और उसने मनुष्य को बहकाया था, और तब वे परमेश्वर को धोखा देने में सक्षम थे। शैतान के विनाश के बाद, क्या मनुष्य फिर से परमेश्वर को धोखा नहीं देगा? वह समय अभी तक नहीं आया है। अतः मनुष्य के भीतर अभी भी वह भ्रष्ट शैतानी स्वभाव है, और वह किसी भी समय और किसी भी स्थान पर परमेश्वर को धोखा दे सकता है। जब एक बार आपके जीवन का अनुभव एक निश्चित अवस्था तक पहुँच जाता है, तो आपके भीतर की बहुत सी चीज़ें जो परमेश्वर को धोखा देती हैं उन सब को निकाल कर फेंक दिया जाएगा। तब आप बहुत सी सकारात्मक चीज़ों को धारण करेंगे, आप आत्म-संयम का अभ्यास करने के योग्य होंगे और अपने आपको वश में रखने में सक्षम होंगे। आप अधिकांश समय फिर से परमेश्वर को धोखा देने में समर्थ नहीं होंगे, और जब शैतान का नाश हो जाता है तब आप एक सम्पूर्ण परिवर्तन से होकर गुज़रेंगे। कार्य की यह अवस्था अब मनुष्य के धोखे का समाधान करने और मनुष्य के विद्रोह का समाधान करने के लिए है। उसके बाद वे लोग परमेश्वर को धोखा नहीं देंगे चूँकि शैतान को निपटाया जा चुका होगा, और इसका मनुष्य के साथ कोई सरोकार नहीं है। क्या आप समझ गए? मनुष्य के धोखा देनेवाले स्वभाव को समझना यहाँ से शुरू होता है: कौन सी चीज़ें उस स्वभाव से सम्बन्धित हैं जो परमेश्वर को धोखा देती हैं, कौन सी चीज़ें धोखे की अभिव्यक्तियों के भाग हैं, मनुष्य को कैसे प्रवेश करना चाहिए और उन्हें कैसे समझना चाहिए। मनुष्य का यह सार-तत्व अभी भी उनके भीतर है, वे अभी भी परमेश्वर को किसी भी समय या स्थान पर धोखा दे सकते हैं, और वे अभी भी ऐसी चीज़ें कर सकते हैं जिन्हें वे परमेश्वर के प्रति धोखा नहीं मानते हैं। मनुष्य परमेश्वर को किसी भी समय या स्थान पर धोखा दे सकता है, दूसरे शब्दों में यह कि मनुष्य के पास कोई स्वायत्ता नहीं है, चूँकि शैतान ने उन पर कब्ज़ा कर लिया है। भले ही आपको भ्रष्ट नहीं किया गया है तब भी आप परमेश्वर को धोखा दे सकते हैं, आज की तो बात ही छोड़ दीजिए जब आप उस भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से भरे हुए हैं। आप किसी भी समय और किसी भी स्थान पर परमेश्वर को धोखा देने के लिए और भी अधिक समर्थ हैं। अब आपको भ्रष्ट स्वभाव को दूर फेंकने के लिए बुलाया गया है, ताकि आपके भीतर की वे चीज़ें जो परमेश्वर को धोखा देती हैं वे कम और कम हो जाएंगी, और आपके पास परमेश्वर के सामने और अधिक अवसर होंगे कि आप उसे अनुमति दें कि वह आपको सिद्ध करे और आपको स्वीकार करे। यदि आप सभी बातों में परमेश्वर के उद्धार के विषय में अधिक अनुभव हासिल करते हैं, तो आपको इस अवस्था के दौरान सिद्ध किया जाएगा। अतः यदि शैतान का कोई जन, या एक बुरी आत्मा, आपको धोखा देने और परेशान करने के लिए आती है, तो आप संभालने के लिए अपने सूझ-बूझ का इस्तेमाल कर सकते हैं, क्या आप नहीं कर सकते हैं। इस तरीके से, आपका धोखा देनेवाला स्वभाव कम हो जाएगा, और यह कुछ ऐसा है जिसे बाद के दिनों में आपके भीतर किया जाएगा। जब मनुष्य का पहले निर्माण किया गया था, तब उनके पास यह क्षमता नहीं थी, न ही वे परमेश्वर की आराधना, परमेश्वर की आज्ञा को कैसे मानें या परमेश्वर के प्रति धोखा क्या था उसे जानते थे। शैतान मनुष्य को बहकाने आया था और उन्होंने उसका अनुसरण किया था, उन्होंने परमेश्वर को धोखा दिया था, और वे परमेश्वर के प्रति विश्वासघाती हो गए थे। यह इसलिए था क्योंकि मनुष्य के पास बुराई से अच्छाई को परखने की कोई योग्यता नहीं थी, उनके पास कोई क्षमता नहीं थी जिसके साथ वे परमेश्वर की आराधना करें, उनके पास यह समझ तो बिलकुल भी नहीं थी कि परमेश्वर सृजनहार था या इसकी कोई समझ नहीं थी कि मनुष्य को परमेश्वर की आराधना कैसे करना चाहिए। बाद के दिनों में, अब परमेश्वर मनुष्य में काम कर रहा है ताकि इन सच्चाइयों (परमेश्वर के सार-तत्व और उसके स्वभाव का ज्ञान...) को मनुष्य के भीतर डाला जा सके, ताकि वे इन पहलुओं को समझ सकें और उनके पास इन पहलुओं को लेकर कुछ स्वायत्ता हो सके। अर्थात्, आपका अनुभव जितना अधिक गहरा होगा, उतना ही अधिक आप परमेश्वर को समझेंगे और उतना ही कम आप उन चीज़ों को धारण करेंगे जो परमेश्वर को धोखा देते हैं। आप जितना अधिक उन चीज़ों को धारण करते हैं जो परमेश्वर के अनुरूप हैं, उतना ही अधिक आप शैतान को हराने के योग्य होंगे, उतना ही अधिक आपके पास स्वायत्ता होगी, और उतना ही अधिक आप एक सच्चे जीवन को जीने के योग्य होंगे। कुछ लोग पूछते हैं: “मनुष्य के भीतर भ्रष्ट सार-तत्व है और वह किसी भी समय या स्थान पर परमेश्वर को धोखा दे सकता है; तो क्या परमेश्वर तब भी कह सकता है कि उसने मनुष्य को पूर्ण बनाया है?” पूर्ण होना अनुभव के जरिए परमेश्वर को समझना है, और साथ ही यह अपने स्वयं के स्वभाव को समझना, परमेश्वर की आराधना कैसे करते हैं उसे जानना और परमेश्वर की आज्ञाओं को मानना, परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य के बीच परखने के योग्य होना, और अनुभव के जरिए पवित्र आत्मा के कार्य और दुष्ट आत्माओं के कार्यों के बीच अन्तर का एहसास करना है। साथ ही यह समझ रखना भी है कि वह दुष्ट शैतान किस प्रकार परमेश्वर की अवहेलना करता है, किस प्रकार मानवजाति परमेश्वर की अवहेलना करती है, सृष्टि क्या है और सृष्टिकर्ता कौन है। आप सभी इन बातों को जानते हैं, क्या आप सभी नहीं जानते हैं? इन सभी चीज़ों को परमेश्वर के कार्य के द्वारा बाद के दिनों में मनुष्य को दिया गया है। अतः, ऐसे लोग जिन्हें पूर्ण बना लिया जाएगा वे अंत में और भी अधिक भार उठाएंगे और वे प्रारम्भ के उन लोगों की अपेक्षा अधिक मूल्यवान होंगे जो भ्रष्टता से होकर नहीं गुज़रे थे। क्योंकि कुछ चीज़ें हैं जिन्हें मनुष्य के भीतर जोड़ दिया गया है और कुछ चीज़ें हैं जिन्हें उनके भीतर किया गया है, ऐसे लोग जिन्हें पूर्ण बनाया गया है अंत में उनके पास उस समय के आदम और हव्वा की अपेक्षा अधिक स्वायत्ता होगी, और वे परमेश्वर की आराधना कैसे करें और उसकी आज्ञा कैसे मानें उसके विषय में और अधिक सच्चाई को समझेंगे; वे और अधिक समझेंगे कि मानव कैसे बना जाता है। आदम और हव्वा इन बातों को नहीं जानते थे और सांप उन्हें बहकाने आया था और उन्होंने भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष से उस फल को खा लिया था। अंत में उन्होंने लज्जा को जाना, और निरन्तर यह नहीं जान पाए कि परमेश्वर की आराधना कैसे करते हैं, तथा और भी अधिक भ्रष्ट हो गए, आज के दिन तक। यह एक बहुत ही गम्भीर विषय है, और भ्रष्ट मानवता में से कोई भी इसे पूरी तरह नहीं समझ सकता है। मनुष्य अपनी देह की सहज प्रवृत्तियों से अभी भी किसी भी समय और किसी भी स्थान पर परमेश्वर को धोखा दे सकता है। फिर भी, अंत में, परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाएगा और उन्हें अगले युग में लाएगा; यह कुछ ऐसी बात है जिसे समझना लोगों को कठिन जान पड़ता है।

मनुष्य से क्यों यह अपेक्षा की जाती है कि वह परमेश्वर को समझेगा? यदि मनुष्य परमेश्वर को नहीं समझता है या सत्य के इस पहलु को नहीं समझता है, तो उन्हें आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है और दुष्ट आत्माओं के द्वारा छला जा सकता है। जब एक बार वे उस सत्य को समझ जाते हैं, तो यह आसान नहीं होगा कि उन्हें दुष्ट आत्माओं के द्वारा छला जाए और उनका इस्तेमाल किया जाए। किन्तु, इस समझ को पाने के बाद, यदि आप निरन्तर कुछ ऐसा करें जिसे आप जानते हैं कि यह परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों के विरुद्ध अपराध है और यह कि इसे परमेश्वर की अवहेलना में किया गया है, तो आप छुटकारे से परे होंगे। अब आप किस प्रकार की स्थिति में हैं? फिलहाल जब तक आप लोगों के पास एक आशा है, इसकी परवाह न करते हुए कि परमेश्वर अतीत की बातों को स्मरण रखता है या नहीं, आप सभी को इस मानसिकता को बनाये रखना चाहिए: मुझे अपने स्वभाव में परिवर्तन का प्रयास करना होगा, परमेश्वर को समझने का प्रयास करना होगा, मुझे फिर से शैतान के द्वारा मूर्ख नहीं बनना चाहिए और मुझे ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जो परमेश्वर के नाम को शर्मिन्दा करे। वे कौन से मुख्य क्षेत्र हैं जो यह निर्धारित करते हैं कि एक व्यक्ति की फिलहाल कोई क़ीमत है या नहीं, उनको बचाया जाएगा या नहीं या उनके पास कोई आशा है या नहीं? वे हैं, आपने प्रचार सुना उसके पश्चात्, आप सत्य को स्वीकार कर सकते हैं या नहीं, आप सत्य को अभ्यास में ला सकते हैं या नहीं और आप बदल सकते हैं या नहीं। ये मुख्य क्षेत्र हैं। यदि आप सिर्फ पछतावे का एहसास करते हैं, यदि आप सिर्फ जाते हैं और कार्य करते हैं और उसी पुराने तरीके से लगातार सोचते हैं, और आपके पास इस विषय में बिलकुल भी समझ नहीं है किन्तु उसके बजायआप बद से बदतर होते जाते हैं, तो आप आशाहीन होंगे और आपको निकम्मा घोषित किया जाना चाहिए। आप जितना अधिक परमेश्वर को जानते हैं, और आप जितना अधिक अपने आपको समझते हैं, तो उतना ही अधिक आप अपने आपको वश में रखने में समर्थ होंगे। आप अपने स्वयं के स्वभाव को समझ के साथ भेदने में जितना अधिक सक्षम होते हैं, उतना ही अधिक आप अपने आपको वश में रखने में समर्थ होंगे। जब आप अपने अनुभव का सार निकाल लेते हैं उसके पश्चात्, आप फिर से इस विषय पर कभी भी असफल नहीं होंगे। वास्तविक तथ्य में, हर एक में कुछ न कुछ धब्बे हैं जिनके भीतर बस यों ही देखा नहीं गया है। हर एक के पास वे धब्बे हैं, कुछ के ऊपर छोटे धब्बे हैं, कुछ के ऊपर बड़े धब्बे हैं; कुछ खुलकर बोलते हैं, और कुछ अपने इरादों को छिपा लेते हैं और गुप्त में कार्य करते हैं। हर एक के पास वे धब्बे हैं; कुछ लोग ऐसी चीज़ें करते हैं जिनके विषय में अन्य लोग जानते हैं और कुछ लोग ऐसी चीज़ें करते हैं जिनके विषय में अन्य लोग नहीं जानते हैं। हर एक के ऊपर धब्बे हैं और वे सभी कुछ भ्रष्ट स्वभावों को प्रकट करते हैं, जैसे अहंकार और मिथ्याभिमान, या वे कुछ अपराध करते हैं, या कार्य में कुछ ग़लतियां और त्रुटियां करते हैं, या वे कुछ छोटे छोटे बलवों को दिखाते हैं। ये सभी क्षमायोग्य बाते हैं चूँकि वे ऐसी बातें हैं जिनसे कोई भ्रष्ट व्यक्ति परहेज नहीं कर सकता है। फिर भी जब आप एक बार सत्य को समझ जाते हैं तो उनसे परहेज किया जाना चाहिए। तब यह आगे से जरुरी नहीं होगा कि हमेशा उन चीज़ों के द्वारा परेशान हुआ जाए जो अतीत में घटित हुई थीं। उसके बजाय, इससे भयभीत होना है कि समझने के बाद भी आप नहीं बदलेंगे, यह कि आप जानेंगे कि ऐसा कुछ करना ग़लत है और फिर भी लगातार उसे करेंगे, और यह कि आपको बताने के बाद भी कि यह ग़लत है आप निरन्तर कुछ न कुछ करेंगे। ये लोग छुटकारे से परे हैं।