3. बचाए जाने के लिए लोगों को परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना का अनुभव कैसे करना चाहिए?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

सारांश में, अपने विश्वास में पतरस के मार्ग को अपनाने का अर्थ है, सत्य को खोजने के मार्ग पर चलना, जो वास्तव में स्वयं को जानने और अपने स्वभाव को बदलने का मार्ग भी है। केवल पतरस के मार्ग पर चलने के द्वारा ही कोई परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने के मार्ग पर होगा। किसी को भी इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि वास्तव में कैसे पतरस के मार्ग पर चलना है साथ ही कैसे इसे अभ्यास में लाना है। सबसे पहले, किसी को भी अपने स्वयं के इरादों, अनुचित कार्यों, और यहाँ तक कि अपने परिवार और अपनी स्वयं की देह की सभी चीज़ों को एक ओर रखना होगा। एक व्यक्ति को पूर्ण हृदय से समर्पित अवश्य होना चाहिए, अर्थात्, स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, सत्य की खोज पर ध्यान लगाना, और परमेश्वर के वचनों में उसके इरादों की खोज पर अवश्य ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, और हर चीज़ में परमेश्वर की इच्छा को समझने का प्रयास करना चाहिए। यह अभ्यास की सबसे बुनियादी और प्राणाधार पद्धति है। यह वही था जो पतरस ने यीशु को देखने के बाद किया था, और केवल इस तरह से अभ्यास करने से ही कोई सबसे अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर के वचनों के प्रति हार्दिक समर्पण में मुख्यत: सत्य की खोज करना, परमेश्वर के वचनों में उसके इरादों की खोज करना, परमेश्वर की इच्छा को समझने पर ध्यान केन्द्रित करना, और परमेश्वर के वचनों से सत्य को समझना तथा और अधिक प्राप्त करना शामिल है। उसके वचनों को पढ़ते समय, पतरस ने सिद्धांतों को समझने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था और धार्मिक ज्ञान प्राप्त करने पर तो उसका ध्यान और भी केंद्रित नहीं था; इसके बजाय, उसने सत्य को समझने और परमेश्वर की इच्छा को समझने पर, साथ ही उसके स्वभाव और उसकी सुंदरता की समझ को प्राप्त करने पर ध्यान लगाया था। पतरस ने परमेश्वर के वचनों से मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट अवस्थाओं के साथ ही मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति को तथा मनुष्य की वास्तविक कमियों को समझने का भी प्रयास किया, और इस प्रकार परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए, उसकी इंसान से अपेक्षाओं के सभी पहलुओं को प्राप्त किया। पतरस के पास ऐसे बहुत से अभ्यास थे जो परमेश्वर के वचनों के अनुरूप थे; यह परमेश्वर की इच्छा के सर्वाधिक अनुकूल था, और यह वो सर्वोत्त्म तरीका था जिससे कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए सहयोग कर सकता है। परमेश्वर से सैकड़ों परीक्षणों का अनुभव करते समय, पतरस ने मनुष्य के लिए परमेश्वर के न्याय के प्रत्येक वचन, मनुष्य के प्रकाशन के परमेश्वर के प्रत्येक वचन और मनुष्य की उसकी माँगों के प्रत्येक वचन के विरुद्ध सख्ती से स्वयं की जाँच की, और उन वचनों के अर्थ को जाने का पूरा प्रयास किया। उसने उस हर वचन पर विचार करने और याद करने की ईमानदार कोशिश की जो यीशु ने उससे कहे थे, और बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त किए। अभ्यास करने के इस तरीके के माध्यम से, वह परमेश्वर के वचनों से स्वयं की समझ प्राप्त करने में सक्षम हो गया था, और वह न केवल मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट स्थितियों को समझने लगा, बल्कि मनुष्य के सार, प्रकृति और विभिन्न कमियों को समझने लगा—स्वयं को वास्तव में समझने का यही अर्थ है। परमेश्वर के वचनों से, पतरस ने न केवल स्वयं की सच्ची समझ प्राप्त की, बल्कि परमेश्वर के वचनों में व्यक्त की गई बातों—परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव, उसके स्वरूप, परमेश्वर की अपने कार्य के लिए इच्छा, मनुष्यजाति से उसकी माँगें—से इन वचनों से उसे परमेश्वर के बारे में पूरी तरह से पता चला। उसे परमेश्वर का स्वभाव, और उसका सार पता चला; उसे परमेश्वर के स्वरूप का ज्ञान और समझ मिली, साथ ही परमेश्वर की प्रेममयता और मनुष्य से परमेश्वर की माँगें पता चलीं। भले ही परमेश्वर ने उस समय उतना नहीं बोला, जितना आज वह बोलता है, किन्तु पतरस में इन पहलुओं में परिणाम उत्पन्न हुआ था। यह एक दुर्लभ और बहुमूल्य चीज़ थी।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस का मार्ग कैसे अपनाएँ' से उद्धृत

परमेश्वर के वचनों के न्याय को प्राप्त करते समय, हमें कष्टों से नहीं घबराना चाहिये, न ही पीड़ा से डरना चाहिये; इस बात से तो बिल्कुल भी ख़ौफ़ नहीं खाना चाहिये कि परमेश्वर के वचन हमारे हृदय को बेध देंगे। हमें उसके वचनों को और अधिक पढ़ना चाहिये कि कैसे परमेश्वर न्याय करता है, ताड़ना देता है और कैसे हमारे भ्रष्ट सार को उजागर करता है, हमें उन्हें पढ़ना चाहिए और खुद को और अधिक उनके अनुसार बनाना चाहिए। उनसे दूसरों की तुलना नहीं करनी चाहिये। हमारे अंदर इनमें से किसी भी चीज़ का अभाव नहीं है; हम सभी उनसे सहमत हो सकते हैं। अगर तुम्हें विश्वास नहीं है, तो खुद अनुभव करके देख लो। ... हमारी आस्‍था में, हमें दृढ़ता से यह बनाए रखना चाहिए कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं। चूँकि वे सचमुच सत्य हैं, हमें उन्हें तर्कसंगत ढंग से स्वीकार कर लेना चाहिये। हम इस बात को भले ही न पहचानें या स्वीकार न करें, लेकिन परमेश्वर के वचनों के प्रति हमारा पहला रुख़ पूर्ण स्वीकृति का होना चाहिये। परमेश्वर के वचनों की प्रत्येक पंक्ति एक स्थिति-विशेष से जुड़ी है। यानी, परमेश्वर के कथनों की सभी पंक्तियाँ बाह्य घटनाओं के विषय में नहीं हैं, बाह्य नियमों के बारे में या लोगों के व्यवहार के किसी सामान्य रूप के विषय में तो बिल्कुल भी नहीं हैं। बात ऐसी नहीं है। अगर तुम परमेश्वर द्वारा व्यक्त हर पँक्ति को इंसानी व्यवहार के सामान्य प्रकार के प्रदर्शन के तौर पर या किसी बाह्य घटना के रूप में देखते हो, तो फिर तुम्हारे अंदर आध्यात्मिक समझ नहीं हैं, तुम नहीं समझते कि सत्य क्या होता है। परमेश्‍वर के वचन गहन होते हैं। वे कैसे गहन होते हैं? परमेश्वर द्वारा कही गयी हर चीज़, प्रकट की गयी हर चीज़ इंसान के भ्रष्ट स्वभाव और उन चीजों के बारे में है जो उसके जीवन के भीतर गहरी जड़ें जमाये हुए और मौलिक हैं। वे आवश्यक चीज़ें होती हैं, ये बाह्य घटनायें नहीं होतीं, विशेषकर बाह्य व्यवहार नहीं होते।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण का महत्व और मार्ग' से उद्धृत

यदि तू परमेश्वर के शासन में विश्वास करता है, तो तुझे यह विश्वास करना होगा कि जो चीजें हर दिन होती हैं, वे अच्छी हों या बुरी, यूँ ही हुई घटनाएँ नहीं होती हैं। ऐसा नहीं है कि कोई व्यक्ति जानबूझकर तुझ पर सख़्त है या तुझ पर निशाना साध रहा है; वास्तव में यह सब परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित है। परमेश्वर इन चीज़ों को किस लिए आयोजित करता है? यह तेरी कमियों को प्रकट करने के लिए या तुझे उजागर करने के लिए नहीं है; तुझे उजागर करना अंतिम लक्ष्य नहीं है। अंतिम लक्ष्य तुझे सिद्ध बनाना और तुझे बचाना है। परमेश्वर ऐसा कैसे करता है? सबसे पहले, वह तुझे तेरे स्वयं के भ्रष्ट स्वभाव, तेरी प्रकृति और सार, तेरे दोषों और तेरी कमी के बारे में अवगत कराता है। केवल अपने हृदय में उन्हें समझ कर और जान कर ही तू सत्य की खोज कर सकता है और धीरे-धीरे अपने भ्रष्ट स्वभाव को दूर कर सकता है। यह परमेश्वर का तुझे एक अवसर प्रदान करना है। तुझे यह जानना होगा कि इस अवसर को कैसे हाथ में लिया जाए, और परमेश्वर के साथ लड़ाई में कैसे न उलझा जाए। विशेष रूप से उन लोगों, घटनाओं और चीज़ों का सामना करते समय, जिनकी परमेश्वर तेरे आस-पास व्यवस्था करता है, हमेशा बचकर निकलना चाहते हुए, हमेशा परमेश्वर को दोष देते और ग़लत समझते हुए, यह मत सोच कि चीजें तेरे मन के हिसाब से नहीं हैं। यह परमेश्वर के कार्य से गुज़रना नहीं है, और इससे सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करना तेरे लिए बहुत मुश्किल बन जाएगा। जो भी बात तू पूरी तरह से नहीं समझ पाता है, या जब तुझ पर कठिनाइयाँ आती हैं, तो तुझे समर्पण करना अवश्य सीखना चाहिए। तुझे सबसे पहले परमेश्वर के सामने आना चाहिए तथा और अधिक प्रार्थना करनी चाहिए। इस तरह, इससे पहले कि तू इसे जाने तेरी आंतरिक स्थिति में एक बदलाव होगा और तू अपनी समस्या को हल करने के लिए सत्य की तलाश कर पाएगा—तू परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में सक्षम होगा। इस अवधि के दौरान, तेरे भीतर सत्य की वास्तविकता को गढ़ा जा रहा है, और इसी तरह से तू प्रगति करेगा और तेरे जीवन की स्थिति में बदलाव आएगा। एक बार जब तू इस बदलाव से गुज़र जाएगा और तेरे पास सत्य की इस तरह की वास्तविकता होगी, तो तेरे पास कद-काठी होगी, और कद-काठी के साथ जीवन आता है। यदि कोई हमेशा भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के आधार पर रहता है, तो फिर चाहे उसमें कितना ही उत्साह या ऊर्जा क्यों न हो, उसे कद-काठी, या जीवन धारण करने वाला नहीं माना जा सकता है। परमेश्वर हर एक व्यक्ति में कार्य करता है, और इससे फर्क नहीं पड़ता है कि उसकी विधि क्या है, सेवा करने के लिए वो किस प्रकार के लोगों, चीज़ों या मामलों का प्रयोग करता है, या उसके वचनों के लहजे किस तरह के हो, उसका केवल एक ही अंतिम लक्ष्य होता है: तुझे बचाना। तुझे बचाने के पहले, उसे तुझे रूपांतरित करने की आवश्यकता है, तो तू थोड़ी-सी पीड़ा कैसे सहन नहीं कर सकता है? तुझे पीड़ा सहनी होगी। इस पीड़ा में कई चीजें शामिल हो सकती हो। परमेश्वर तेरे आसपास के लोगों, मामलों, और चीज़ों को उठाता है, ताकि तू खुद को जान सके या फिर सीधे तेरे साथ निपटा जा सके, तेरी काट-छाँट और तुझे उजागर किया जा सके। ऑपरेशन की मेज़ पर पड़े किसी व्यक्ति की तरह—तुझे अच्छे परिणाम के लिए कुछ दर्द सहना होगा। यदि हर बार जब तेरी काट-छाँट होती है और तुझसे निपटा जाता है और हर बार जब वह लोगों, मामलों, और चीज़ों को उठाता है, इससे तेरी भावनाओं में हलचल पैदा होती है और तुझे प्रोत्साहन मिलता है, तो यह सही है, और तेरे पास कद-काठी होगी और तू सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करेगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य को प्राप्त करने के लिए,तुझे लोगों, मामलों और अपने आसपास की चीज़ों से अवश्य सीखना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर पर अपने विश्वास में, पतरस ने हर एक बात में परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास किया था और उन सब में जो परमेश्वर से आया था, उसमें उसने आज्ञा मानने का प्रयास किया। बिना ज़रा सी भी शिकायत के, वह ताड़ना एवं न्याय, साथ ही साथ शुद्धिकरण, क्लेश एवं अपने जीवन में मौजूद कमी को स्वीकार कर सकता था, उसमें से कुछ भी परमेश्वर के लिए उसके प्रेम को पलट नहीं सकता था। क्या यह परमेश्वर के लिए चरम प्रेम नहीं है? क्या यह परमेश्वर के एक प्राणी के कर्तव्य की परिपूर्णता नहीं है? चाहे ताड़ना हो, न्याय हो, या क्लेश—तू मृत्यु तक आज्ञाकारिता हासिल करने में सदैव सक्षम हो, यह वह चीज़ है जिसे परमेश्वर के एक प्राणी के द्वारा हासिल किया जाना चाहिए, यह परमेश्वर के लिए प्रेम की शुद्धता है। यदि मनुष्य इतना कुछ हासिल कर सकता है, तो वह परमेश्वर का एक योग्य प्राणी है, तथा ऐसा और कुछ नहीं है जो सृष्टिकर्ता की इच्छा को बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या असफलताउस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

इंसान के लिए आवश्यक सत्य परमेश्वर के वचनों में निहित है, और सत्य ही इंसान के लिए अत्यंत लाभदायक और सहायक होता है। तुम लोगों के शरीर को इस टॉनिक और पोषण की आवश्यकता है, इससे इंसान को अपनी उपयुक्त मानवीयता को फिर से प्राप्त करने में सहायता मिलती है। यह ऐसा सत्य है जो इंसान के अंदर होना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के वचनों का जितना अधिक अभ्यास करोगे, उतनी ही तेज़ी से तुम लोगों का जीवन विकसित होगा, और सत्य उतना ही अधिक स्पष्ट होता जाएगा। जैसे-जैसे तुम लोगों का आध्यात्मिक कद बढ़ेगा, तुम आध्यात्मिक जगत की चीज़ों को उतनी ही स्पष्टता से देखोगे, और शैतान पर विजय पाने के लिए तुम्हारे अंदर उतनी ही ज़्यादा शक्ति होगी। जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों पर अमल करोगे, तो तुम लोग ऐसा बहुत-सा सत्य समझ जाओगे जो तुम लोग समझते नहीं हो। अधिकतर लोग अमल में अपने अनुभव को गहरा करने के बजाय महज़ परमेश्वर के वचनों के पाठ को समझकर और सिद्धांतों से लैस होकर ध्यान केंद्रित करके ही संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन क्या यह फरीसियों का तरीका नहीं है? तो उनके लिए यह कहावत "परमेश्वर के वचन जीवन हैं" वास्तविक कैसे हो सकती है? किसी इंसान का जीवन मात्र परमेश्वर के वचनों को पढ़कर विकसित नहीं हो सकता, बल्कि परमेश्वर के वचनों को अमल में लाने से ही होता है। अगर तुम्हारी सोच यह है कि जीवन और आध्यात्मिक कद पाने के लिए परमेश्वर के वचनों को समझना ही पर्याप्त है, तो तुम्हारी समझ विकृत है। परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ तब पैदा होती है जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो, और तुम्हें यह समझ लेना चाहिए कि "इसे हमेशा सत्य पर अमल करके ही समझा जा सकता है।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए' से उद्धृत

यदि कोई अपना कर्तव्य पूरा करते हुए परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है, और अपने कार्यों और क्रियाकलापों में सैद्धांतिक है और सत्य के समस्त पहलुओं की वास्तविकता में प्रवेश कर सकता है, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर द्वारा सिद्ध किया जाता है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य और उसके वचन ऐसे लोगों के लिए पूरी तरह से प्रभावी हो गए हैं, कि परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन गए हैं, उन्होंने सच्चाई को प्राप्त कर लिया है, और वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने में समर्थ हैं। इसके बाद, उनके देह की प्रकृति—अर्थात, उनके मूल अस्तित्व की नींव—हिलकर अलग हो जाएगी और ढह जाएगी। जब लोग परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में धारण कर लेंगे, तो वे नए लग बन जाएंगे। अगर परमेश्वर के वचन उनका जीवन बन जाते हैं; परमेश्वर के कार्य का दर्शन, मानवता से उसकी अपेक्षाएँ, मनुष्यों को उसके प्रकाशन, और एक सच्चे जीवन के वे मानक जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि वे प्राप्त करे, उनका जीवन बन जाते हैं, अगर वे इन वचनों और सच्चाइयों के अनुसार जीते हैं, और वे परमेश्वर के वचनों द्वारा सिद्ध बनाए जाते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के माध्यम से पुनर्जन्म लेते हैंऔर नए लोग बन गए हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस का मार्ग कैसे अपनाएँ' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

अंत के दिनों में परमेश्‍वर का कार्य उनके वचन के माध्यम से न्याय कर रहा है। अगर हम चाहते हैं कि हमारा भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध हो जाए और हम उद्धार प्राप्त करें, तो हमें पहले परमेश्‍वर के वचन को जानने के कुछ प्रयास करना चाहिए, दिल से परमेश्‍वर के वचनों को खाना-पीना चाहिए, और उनके वचन में परमेश्‍वर के न्याय और प्रकाशन को स्वीकार करना चाहिए। चाहे परमेश्‍वर के वचन कितना ही हृदय को बींधे, वे कितने ही कठोर क्‍यों न हों, या इससे हमें कितनी ही पीड़ा क्‍यों न सहनी पड़े, हमें सबसे पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि परमेश्‍वर के वचन सभी सत्य और जीवन की सच्‍चाई हैं, जिनमें हमें प्रवेश करना चाहिए। परमेश्‍वर के वचन की हर अभिव्‍यक्ति मानवजाति को शुद्ध करने और बदलने के लिए, हमें हमारे भ्रष्ट स्वभाव को छुड़ाकर उद्धार प्राप्‍त कराने के लिए, और इससे भी अधिक हमें परमेश्‍वर का ज्ञान प्राप्त कर सत्य को समझने के योग्‍य बनाने के लिए है। इसलिए हमें परमेश्‍वर के वचन के न्याय और ताड़ना, कांट-छांट और व्यवहार को स्वीकार करना चाहिए। अगर हम परमेश्‍वर के वचन के सत्य को पाना चाहते हैं, तो हमें परमेश्‍वर के वचन और सत्‍य को स्वीकारने और उसका पालन करने के लिए कष्ट झेलने में सक्षम होना चाहिए। हमें परमेश्‍वर के वचन में सत्‍य की खोज करनी चाहिए, परमेश्‍वर की इच्छा को महसूस करना चाहिए, और स्वयं पर चिंतन करना और स्‍वयं को जानना चाहिए, परमेश्‍वर के वचन पर मनन कर अपने स्वयं के अहंकार, धोखे, स्वार्थ और अधमता को जानना चाहिए, हमें यह जानना चाहिए कि हम कैसे परमेश्‍वर का लाभ उठाते हैं, परमेश्‍वर को धोखा देते हैं, सत्‍य और अन्य शैतानी प्रवृत्तियों के साथ खिलवाड़ करते हैं, और साथ ही हमें परमेश्‍वर में विश्‍वास की अशुद्धियों और परमेश्‍वर का आशीष पाने के हमारे इरादों के विषय में भी जानना चाहिये। इस तरह, हम धीरे-धीरे हमारे भ्रष्टाचार के सत्‍य और हमारे स्वभाव के सार को जान सकते हैं। और अधिक सत्‍य को समझने के बाद, परमेश्‍वर के बारे में हमारा ज्ञान धीरे-धीरे गहरा होता जाएगा, और हम स्वाभाविक रूप से जान पायेंगे कि परमेश्‍वर किस तरह के व्यक्तियों को पसंद और नापसंद करते हैं, वे किस तरह के व्यक्तियों को बचायेंगे या समाप्‍त करेंगे, किस तरह के व्यक्ति का वे इस्तेमाल करेंगे और किस तरह के व्यक्ति को वे आशीष देंगे। इन बातों को समझने के बाद, हम परमेश्‍वर के स्वभाव को समझना शुरू कर देंगे। ये सभी परमेश्‍वर के वचन के न्याय और ताड़ना का अनुभव करने के परिणाम हैं। जो लोग सत्‍य की खोज करते हैं, वे परमेश्‍वर के वचन के न्याय और ताड़ना का अनुभव करने पर ध्यान देते हैं, वे हर बात में सत्‍य की खोज करने पर, और परमेश्‍वर के वचन का अभ्‍यास करने और परमेश्‍वर का आज्ञापालन करने पर ध्यान देते हैं। ऐसे लोग धीरे-धीरे सत्य को समझने और परमेश्‍वर के वचन का अनुभव करके वास्तविकता में प्रवेश करने, और उद्धार प्राप्त करने में सक्षम होंगे और पूर्ण किये जायेंगे। जो लोग सत्‍य से प्रेम नहीं करते, वे परमेश्‍वर की उपस्थिति को पहचान सकते हैं और परमेश्‍वर द्वारा व्यक्त किये गए सत्य के अनुसार कार्य करते हैं, लेकिन फिर भी वे सोचते हैं कि परमेश्‍वर के लिए कुछ छोड़ देने और अपना कर्तव्य पूरा करने मात्र से वे निश्चित रूप से उद्धार प्राप्त कर सकते हैं। अंत में, वे कई सालों तक परमेश्‍वर पर विश्वास करने के बाद भी सत्‍य और जीवन नहीं पा सकते। वे केवल कुछ वचनों, पत्रों और सिद्धांतों को समझते हैं, लेकिन उन्‍हें लगता है कि वे सत्‍य को जानते हैं और उनके पास सच्‍चाई है। वे खुद से झूठ बोल रहे हैं और निश्चित रूप से परमेश्‍वर द्वारा समाप्त कर दिए जायेंगे।

— 'राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्नोत्तर' से उद्धृत

आज जब हम परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करते हैं। मुख्य बात है परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करना, जो कि सबसे बुनियादी चीज़ है। ... तुम सभी कहते हो कि तुम न्याय और ताड़ना की पीड़ा को सहन करने के लिए तैयार हो। चूँकि तुम इस पीड़ा को सहने के लिए तैयार हो, तो तुम कैसे समर्पण करोगे? तुम इसे कैसे स्वीकार करोगे? यदि तुम न्याय और ताड़ना के बारे में परमेश्वर के वचनों को देखते हो, तो क्या तुम उन्हें स्वीकार कर पाओगे, और कह पाओगे कि परमेश्वर के वचन तुम्हारा उल्लेख कर रहे हैं, कि ये वचन तुम्हारे बारे में परमेश्वर का न्याय हैं और कि तुम्हें इन्हें अवश्य स्वीकार करना चाहिए? या क्या तुम इसी बात का आग्रह करोगे कि ये वचन दूसरों का न्याय कर रहे हैं, कि उनके साथ तुम्हारा कोई सरोकार नहीं है, और इस तरह परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना से बचोगे? क्या तुम अंत में इस मार्ग को अपनाओगे? कुछ भाई-बहन हैं जो परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को सहने के लिए तैयार हैं। यह अच्छा है। यदि हम परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को सहन करने के लिए तैयार हैं, तो जब हम घर पर परमेश्वर के वचन को पढ़ रहे हों, तो हमें इससे बचना नहीं चाहिए। चाहे ये वचन कितने भी तीक्ष्ण और कठोर क्यों न हों, तुम्हें उन सभी को स्वीकार करना चाहिए और प्रार्थना करनी चाहिए। तुम कहो: "हे परमेश्वर, न्याय के बारे में तेरे वचन मेरी ओर निर्देशित हैं। मैं इस तरह का एक भ्रष्ट व्यक्ति हूँ, इसलिए मुझे तेरे न्याय और तेरी ताड़ना को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि यह मेरे लिए तेरा प्रेम है, यह तेरे द्वारा मेरा उत्कर्ष है।" फिर अपनी समझ को गहरा करने के लिए अपने हालातों से परमेश्वर के वचनों की तुलना करो। यह परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना के प्रति समर्पण की एक अभिव्यक्ति है। लेकिन यदि तुम परमेश्वर के वचनों को देखते हो जो काफी कठोर हैं, और कहते हो: "परमेश्वर, ये वचन मेरा न्याय नहीं हैं, ये दूसरों के न्याय के बारे में हैं, ये शैतान के न्याय के बारे में हैं। उनका मेरे साथ कोई सरोकार नहीं है, मैं उन्हें नहीं पढूँगा," तो यह परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना से बचना है। क्या तुम परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना से बचना चाहते हो? यदि तुम अनिच्छुक हो तो तुम्हें क्या करना चाहिए? यदि तुम अनिच्छुक हो, तो तुम्हें अवश्य प्रार्थना करनी चाहिए। तुम कहो: "परमेश्वर, मैं तेरे न्याय और तेरी ताड़ना को स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ। ये वचन मेरे न्याय के बारे में हैं। मुझमें भ्रष्टता की ये समस्याएँ हैं, इसलिए मैं इन्हें पूरी तरह से स्वीकार करता हूँ और इनका पालन करता हूँ, और मैं तेरे प्रेम के लिए आभारी हूँ!" जैसे ही तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो, तुम उन्हें स्वीकार कर लोगे, तुम्हें यह मुश्किल नहीं लगेगा; इसे इसी तरह से किया जा सकता है। यदि कुछ भाई-बहन तुम्हारी काट-छाँट करते हैं और तुमसे निपटते हैं, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें जल्दी से परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और कहना चाहिए: "परमेश्वर, मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ! तेरा प्रेम मुझ तक पहुँचा है। मेरे लिए तेरे प्रेम की वजह से ही तूने मेरे भाइयों और बहनों को मेरी काट-छाँट करने और मुझसे निपटने के लिए प्रेरित किया है। मैं समर्पण करता हूँ।" तुम्हें प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए। यदि तुम प्रार्थना नहीं करते हो तो तुम्हारे लिए इनकार करना आसान होगा, तुम्हारी देह के लिए विद्रोह करना आसान होगा, तुम्हारे लिए दूसरों के साथ विवाद में उलझना आसान होगा। तुम फ़ौरन शिकायत करोगे और तुम्हारे लिए नकारात्मक होना और भी अधिक आसान होगा। ऐसे समय में, जल्दी से जाओ और प्रार्थना करो। प्रार्थना करने के बाद, तुम्हारा मन शांत हो जाएगा और तुम समर्पण करने में सक्षम हो जाओगे। वाकई समर्पण करने में सक्षम होने के बाद, तुम संतुष्ट महसूस करने में सक्षम हो जाओगे। घर लौटने के बाद तुम कहोगे: "उस वक्त मैंने अपना आपा नहीं खोया बल्कि इसे स्वीकार कर लिया था। मैं प्रार्थना द्वारा ऐसे परिणाम प्राप्त करने में सक्षम हुआ था, अब अंततः मैं परमेश्वर के सामने समर्पण कर सकता हूँ।" तुम देखो, यह अंततः तुम्हें परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास में सफलता की आशा की एक झलक देखने देता है, अंततः यह तुम्हें कुछ कद-काठी देता है; इसी तरह एक व्यक्ति विकसित होता है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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