4. परमेश्वर का तीन चरणों का कार्य कैसे क्रमशः गहन होता जाता है, ताकि लोगों को बचाकर उन्हें पूर्ण किया जा सके?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रबंधन को तीन चरणों में विभाजित किया जाता है, और प्रत्येक चरण में, मनुष्य से यथोचित अपेक्षाएँ की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, जैसे-जैसे युग बीतते और प्रगति करते जाते हैं, परमेश्वर की समस्त मनुष्यजाति से अपेक्षाएँ और अधिक ऊँची होती जाती हैं। इस प्रकार, कदम दर कदम, परमेश्वर का प्रबंधन अपने चरम पर पहुँच जाता है, जब तक कि मनुष्य "देह में वचन का प्रकटन" देख नहीं लेता है, और इस तरह मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ और अधिक ऊँची हो जाती हैं, और गवाही देने की मनुष्य से अपेक्षाएँ और अधिक ऊँची हो जाती हैं। वह मनुष्य परमेश्वर के साथ सचमुच में सहयोग करने में जितना अधिक सक्षम होता है, उतना ही अधिक वह परमेश्वर को महिमा देता है। मनुष्य का सहयोग वह गवाही है जिसे देने की उससे अपेक्षा की जाती है, और जो वह गवाही देता है वह मनुष्य का व्यवहार है। और इसलिए, परमेश्वर के कार्य का उचित प्रभाव हो सकता है या नहीं, और सच्ची गवाही हो सकती है या नहीं, ये पेचीदा रूप से मनुष्य के सहयोग और गवाही से जुड़े हुए हैं। जब कार्य समाप्त हो जाता है, कहने का अर्थ है कि, जब परमेश्वर का सम्पूर्ण प्रबंधन अपनी समाप्ति पर पहुँच जाएगा, तो मनुष्य से अधिक ऊँची गवाही देने की अपेक्षा की जाएगी, और जब परमेश्वर का कार्य अपनी समाप्ति पर पहुँच जाएगा, तब मनुष्य का व्यवहार और प्रवेश अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाएँगे। अतीत में, मनुष्य से अपेक्षा की गई थी कि वह व्यवस्था और आज्ञाओं का पालन करे, और उससे अपेक्षा की गई थी कि वह धैर्यवान और विनम्र बने। आज, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह परमेश्वर के समस्त प्रबंधन का पालन करे और परमेश्वर के लिए सर्वोच्च प्रेम धारण करे, और अन्ततः उससे अपेक्षा की जाती है कि वह क्लेश के बीच भी परमेश्वर से प्रेम करे। ये तीन चरण ऐसी अपेक्षाएँ हैं जिन्हें परमेश्वर अपने सम्पूर्ण प्रबंधन के दौरान कदम दर कदम मनुष्य से करता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण पिछले चरण की तुलना में अधिक गहरा होता है, और प्रत्येक चरण में मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ पिछले चरण की तुलना में और अधिक गम्भीर होती हैं, और इस तरह, परमेश्वर का सम्पूर्ण प्रबंधन धीरे-धीरे आकार लेता है। यह निश्चित रूप से इसलिए है क्योंकि मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ हमेशा उससे कहीं अधिक ऊँची होती है जितना मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर के द्वारा अपेक्षित मानकों के कहीं अधिक नज़दीक आता है, और केवल तभी होगा कि सम्पूर्ण मनुष्यजाति धीरे-धीरे शैतान के प्रभाव से अलग हो जाएगी, जब तक कि, जब परमेश्वर का कार्य पूर्ण समाप्ति पर आ जाता है, सम्पूर्ण मनुष्यजाति शैतान के प्रभाव से बचा नहीं ली गई होगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के प्रबंधन का कार्य संसार की उत्पत्ति से प्रारम्भ हुआ था और मनुष्य उसके कार्य का मुख्य बिन्दु है। ऐसा कह सकते हैं कि परमेश्वर की सभी चीज़ों की सृष्टि, मनुष्य के लिए ही है। क्योंकि उसके प्रबंधन का कार्य हज़ारों सालों से अधिक में फैला हुआ है, और यह केवल एक ही मिनट या सेकंड में या पलक झपकते या एक या दो सालों में पूरा नहीं होता है, उसे मनुष्य के अस्तित्व के लिए बहुत-सी आवश्यक चीज़ों का निर्माण करना पड़ा जैसे सूर्य, चंद्रमा, सभी जीवों का सृजन और मानवजाति के लिए आहार और रहने योग्य पर्यावरण। यही परमेश्वर के प्रबंधन का प्रारम्भ था।

इसके बाद, परमेश्वर ने मनुष्य को शैतान के हाथों में सौंप दिया, मनुष्य शैतान की प्रभुता के अधीन रहने लगा और यहीं से परमेश्वर के कार्य का प्रथम युग आरंभ हुआ: व्यवस्था के युग की कहानी...। व्यवस्था के युग के हज़ारों सालों के दौरान, मानवजाति व्यवस्था के युग के मार्गदर्शन की आदी हो गई, और वह इसे हल्के तौर पर लेने लगी और धीरे-धीरे परमेश्वर की देखभाल से दूर हो गई। और इस तरह, उसी दौरान व्यवस्था से जुड़ी रहते हुए, मूर्तिपूजा और कुकृत्य भी करने लगी। वे यहोवा की सुरक्षा से वंचित थे, और केवल मंदिर की वेदी के सामने अपना जीवनयापन कर रहे थे। वास्तव में, परमेश्वर का कार्य उन्हें काफी समय पहले छोड़ चुका था, और हालांकि इस्राएली नियमों से अभी भी चिपके हुए थे, और यहोवा का नाम लेते थे, और घमण्ड से विश्वास करते थे कि वे ही केवल यहोवा के लोग हैं और यहोवा के चुने हुए लोग हैं, लेकिन परमेश्वर की महिमा उन्हें चुपचाप छोड़कर जा चुकी थी ...

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जैसा कि हमेशा होता रहा है, व्यवस्था के युग में यहोवा के कार्य के बाद, परमेश्वर ने दूसरे चरण का अपना कार्य प्रारम्भ किया: देह-धारण कर—दस, बीस साल के लिए मनुष्य के समान अवतरण लेकर—विश्वासियों के मध्य बातचीत करते हुए अपना कार्य किया। फिर भी बिना किसी अपवाद के, कोई भी नहीं जान पाया और प्रभु यीशु को क्रूस पर लटकाने और उसके पुनर्जीवित होने के बाद बहुत थोड़े से लोगों ने इस बात को माना कि वह परमेश्वर था जो देहधारण करके आया था। ... जैसे ही परमेश्वर के कार्य का दूसरा चरण पूर्ण हुआ—सूली पर चढ़ाने के बाद—परमेश्वर का मनुष्यों को पाप से बचाने का कार्य (अर्थात मनुष्यों को शैतान की अधीनता से छुड़ाना) पूर्ण किया गया। इसलिए, उस क्षण के बाद से, मानवजाति को प्रभु यीशु को उसके पापों की क्षमा के लिये उद्धारकर्ता के तौर पर स्वीकार करना ही पड़ा। नाममात्र को कहने के लिए, अब मनुष्य के पाप उसके उद्धार को प्राप्त करने और परमेश्वर के सामने आने के लिए अवरोध नहीं रह गए थे और न ही शैतान द्वारा मनुष्य को दोषी ठहराने का लाभ उठाने के लिये रह गए थे। इसका कारण यह है कि परमेश्वर ने स्वयं वास्तविक कार्य किया था, वह उनके जैसा बन गया था और उसने स्वयं पापमय देह का स्वाद चखा था, और परमेश्वर स्वयं पाप बलि बन कर आया। इस प्रकार से, परमेश्वर का देह और देह की समानता की बदौलत मनुष्य क्रूस पर से उतारा गया, छुड़ाया गया एवं बचाया गया। इसलिए, शैतान के द्वारा बंदी बना लिए जाने के बाद, मनुष्य परमेश्वर के सामने उद्धार को ग्रहण करने के लिए एक कदम पास आया। बेशक, कार्य का यह चरण परमेश्वर के प्रबंधन का कार्य था जो एक कदम आगे था और व्यवस्था के युग से गहरा स्तर था।

परमेश्वर का प्रबंधन इस प्रकार से है: मानवजाति को शैतान की अधीनता में देना-एक ऐसी मानवजाति जो नहीं जानती कि परमेश्वर क्या है, रचयिता क्या है, परमेश्वर की आराधना किस प्रकार की जानी है, और परमेश्वर के अधीन होना क्यों आवश्यक है—और शैतान की भ्रष्टता को उन्मुक्त लगाम देना। और फिर कदम दर कदम, परमेश्वर शैतान के हाथों से मनुष्य को बचाता है, जब तक कि मनुष्य पूरी तरह से परमेश्वर की आराधना न करे और शैतान को अस्वीकार न कर दे। यही परमेश्वर का प्रबंधन है। यह सब कुछ एक मिथककथा लगती है; और यह सब कुछ हैरान कर देने वाला लगता है। लोगों को लगता है कि ये एक मिथक कथा है, और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन्हें इसका भान नहीं है कि पिछले हज़ारों सालों में लोगों के साथ कितना कुछ हुआ है, और इस बात को तो वे बिल्कुल नहीं जानते कि इस ब्रह्मांड और नभमण्डल में कितनी कहानियाँ घट चुकी हैं। इसके अलावा, ऐसा इसलिए कि वे इस बात को नहीं समझ सकते कि भौतिक संसार के परे एक अधिक आश्चर्यजनक अधिक भययुक्त संसार का अस्तित्व है, परन्तु उनकी नश्वर आंखें देखने से उन्हें वंचित करती हैं। इंसान को वह अबोधगम्य लगती है, और ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य को मानवजाति के लिए परमेश्वर के द्वारा किए गए उद्धार के कार्य की महत्ता और परमेश्वर के प्रबंधकारणीय कार्य की महत्ता की समझ नहीं है, और वह यह नहीं समझता कि परमेश्वर अंततः मनुष्य को कैसा बनते देखना चाहता है। क्या शैतान के दोष से रहित आदम और हव्वा के समान? नहीं! परमेश्वर का प्रबंधन लोगों के एक ऐसे समूह को प्राप्त करने के लिए है जो उसकी आराधना करे और उसके अधीन रहे। ये मानवजाति शैतान के द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी है, परन्तु अब शैतान को पिता के तौर पर नहीं देखती; वह शैतान के बुरे चेहरे को पहचानता है और उसे अस्वीकार करता है और परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने के लिये उसके सामने आता है। वह जानता है कि क्या बुरा है, और जो पवित्र है उसके विपरीत वह कैसा दिखता है, और वह परमेश्वर की महानता को पहचानता है और शैतान की दुष्टता को भी समझता है। इस प्रकार की मानवजाति अब शैतान के लिए कार्य नहीं करती है, या उसकी आराधना नहीं करती है, या शैतान को प्रतिष्ठित नहीं करती है। इसका कारण यह है कि यह एक ऐसे लोगों का समूह है जो वास्तव में परमेश्वर को प्राप्त हो गए हैं। यही परमेश्वर की मानवजाति के प्रबंधन की महत्ता है। इस समय में परमेश्वर के प्रबंधकारणीय कार्य के दौरान, मानवजाति शैतान की भ्रष्टता का लक्ष्य है, और इसी दौरान परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य भी है, साथ ही साथ परमेश्वर और शैतान के मध्य युद्ध का सामान भी। साथ ही इसी दौरान अपना कार्य करते हुए, परमेश्वर मनुष्य को शैतान के चंगुल से धीरे-धीरे बचाता है और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के निकट आता जाता है ...

और इसके बाद परमेश्वर के राज्य का युग आया, जो कि कार्य का और भी अधिक व्यवहारिक चरण है और मनुष्य के लिए उसे स्वीकार करना सबसे कठिन भी। वजह यह है कि जितना अधिक मनुष्य परमेश्वर के नज़दीक आता है, परमेश्वर की छड़ी इंसान के उतने ही करीब पहुँचती है और मनुष्य के सामने परमेश्वर का चेहरा उतना ही अधिक स्पष्ट होता जाता है। मानवजाति के छुटकारे के साथ मनुष्य औपचारिक तौर पर परमेश्वर के परिवार में लौट आता है। मनुष्य ने सोचा कि अब आनन्द का समय आया है, फिर भी वह पूरी तरह से परमेश्वर के ऐसे आक्रमण का सामना करने के लिए अधीन है जैसा कि कभी किसी ने नहीं देखा। लेकिन हुआ ऐसा कि, यह एक बपतिस्मा है जिससे परमेश्वर के लोगों को "आनन्द" लेना है। इस प्रकार के व्यवहार में, लोगों के पास ठहरकर सोचने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता, "मैं, कई सालों तक खोया हुआ एक मेमना हूं, जिसे वापस पाने के लिए परमेश्वर ने कितना कुछ खर्च किया है, तो परमेश्वर मुझसे इस प्रकार का व्यवहार क्यों करता है? क्या यह परमेश्वर का मुझ पर हँसने का, और मुझे प्रगट करने का तरीका है? ..." बरसों बीत जाने के बाद, मनुष्य शोधन और ताड़ना की कठिनाइयाँ सह-सहकर सिर्फ़ जीर्ण-शीर्ण हो कर रह गया है, हालांकि मनुष्य ने अतीत की "महिमा" और "प्रणय" को खो दिया है, पर उसने अनजाने में मानवीय आचरण के सिद्धांतों को समझ लिया है, और मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के सालों के समर्पण को भी समझ गया है। मनुष्य धीरे-धीरे स्वयं की बर्बरता से घृणा करने लगता है। वह अपनी असभ्यता से घृणा करने लगता है, और परमेश्वर के प्रति सभी प्रकार की गलतफहमियों से तथा उन सभी अनुचित मांगों से भी वह घृणा करने लगता है जो वह परमेश्वर से करता रहा है। समय को वापस नहीं लाया जा सकता है; अतीत की घटनाएं मनुष्य के लिए पछतावा करने वाली यादें बनकर रह जाती हैं, और परमेश्वर के वचन और प्रेम मानव के लिए नए जीवन की प्रेरणा शक्ति बन जाते हैं। मनुष्य के घाव दिन प्रतिदिन भरते जाते हैं, उसकी सामर्थ्य वापस आने लगती है, और वह खड़ा होता है और सर्वशक्तिमान के चेहरे की ओर देखने लगता है ... उसे तभी पता चलता है कि परमेश्वर हमेशा से मेरे साथ रहा है और उसकी मुस्कान और सुन्दर चेहरा अभी भी बहुत जोशीला है। उसके हृदय में अभी भी अपने द्वारा रची गई मानवजाति के लिए चिंता रहती है, और उसके हाथों में अभी भी वही गर्मी और शक्ति है जो आरंभ में थी। जैसे कि मानव अदन के बाग में लौट आया हो, लेकिन फिर भी इस बार मनुष्य सांप के प्रलोभनों को नहीं सुनता है, यहोवा के चेहरे से दूर नहीं जाता है। मनुष्य परमेश्वर के सामने घुटने टेकता है, परमेश्वर के मुस्कुराते हुए चेहरे को देखता है, और उसे अपनी सबसे प्रिय भेंट चढ़ाता है—ओह! मेरे प्रभु, मेरे परमेश्वर!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है' से उद्धृत

यद्यपि आज जिस मार्ग पर मनुष्य चलता है वह भी सलीब का और दुःख का एक मार्ग है, फिर भी आज का मनुष्य जो अभ्यास करता है, खाता है, पीता है और आनंद लेता है वे व्यवस्था के अधीन और अनुग्रह के युग के मनुष्य से बहुत अलग हैं। आज मनुष्य से जो माँग की जाती है वह अतीत की माँग के असदृश है और व्यवस्था के युग में मनुष्य से की गई माँग के तो और भी अधिक असदृश है। जब इस्राएल में कार्य किया गया था तब व्यवस्था के अंतर्गत मनुष्य से क्या माँग की गई थी? उससे सब्त और यहोवा की व्यवस्थाओं का पालन करने से बढ़कर और कुछ की माँग नहीं की गई थी। किसी को भी सब्त के दिन काम नहीं करना था या यहोवा की व्यवस्था का उल्लंघन नहीं करना था। परन्तु अब ऐसा नहीं है। सब्त पर, मनुष्य काम करते हैं, हमेशा की तरह इकट्ठे होते हैं और प्रार्थना करते हैं, और उन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाए जाते हैं। वे जो अनुग्रह के युग में थे उन्हें बपतिस्मा लेना पड़ता था; सिर्फ इतना ही नहीं, उन्हें उपवास करने, रोटी तोड़ने, दाखमधु पीने, अपने सिरों को ढकने और दूसरों के पाँव धोने के लिए कहा जाता था। अब, इन नियमों का उन्मूलन कर दिया गया है और मनुष्यों से और भी बड़ी माँगें की जाती हैं, क्योंकि परमेश्वर का कार्य लगातार अधिक गहरा होता जाता है और मनुष्य का प्रवेश पहले से कहीं अधिक ऊँचा हो गया है। अतीत में, यीशु मनुष्य पर हाथ रखता था और प्रार्थना करता था, परन्तु अब जबकि सब कुछ कहा जा चुका है, तो हाथ रखने का क्या उपयोग है? वचन अकेले ही परिणामों को प्राप्त कर सकते हैं। जब अतीत में वह अपना हाथ मनुष्य के ऊपर रखता था, तो यह मनुष्य को आशीष देने और चंगा करने के लिए था। उस समय पवित्र आत्मा इसी प्रकार से काम करता था, परन्तु अब ऐसा नहीं है। अब, पवित्र आत्मा कार्य करने और परिणामों को हासिल करने के लिए वचनों का उपयोग करता है। उसने अपने वचनों को तुम लोगों के लिए स्पष्ट कर दिया है, और तुम लोगों को बस उन्हें वैसे ही अभ्यास में लाना चाहिए, जैसे तुम्हें बताया गया है। उसके वचन उसकी इच्छा हैं और उस कार्य को दर्शाते हैं जिसे वह करना चाहता है। उसके वचनों के माध्यम से, तुम उसकी इच्छा को और उस चीज को समझ सकते हो जिसे प्राप्त करने के लिए वह तुम्हें कहता है। तुम्हें हाथ रखने की आवश्यकता नहीं है बस सीधे तौर पर उसके वचनों को अभ्यास में लाओ। कुछ लोग कह सकते हैं, "मुझ पर अपना हाथ रख! मुझ पर अपना हाथ रख ताकि मैं तेरे आशीष प्राप्त कर सकूँ और तेरा भागी बन सकूँ।" ये सभी पहले के अप्रचलित अभ्यास हैं जो अब निषिद्ध हैं, क्योंकि युग बदल चुका है। पवित्र आत्मा युग के अनुरूप कार्य करता है, न कि इच्छानुसार या तय नियमों के अनुसार। युग बदल चुका है, और एक नया युग अपने साथ नया काम अवश्य लेकर आता है। यह कार्य के प्रत्येक चरण के बारे में सच है, और इसलिए उसका कार्य कभी दोहराया नहीं जाता है। अनुग्रह के युग में, यीशु ने इस तरह का बहुत सा कार्य किया, जैसे कि बीमारियों को चंगा करना, दुष्टात्माओं को निकालना, मनुष्य के लिए प्रार्थना करने के लिए मनुष्य पर हाथ रखना, और मनुष्य को आशीष देना। हालाँकि, ऐसा करते रहने से वर्तमान में कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा। उस समय पवित्र आत्मा उस तरह से काम करता था, क्योंकि वह अनुग्रह का युग था, और आनन्द के लिए मनुष्य पर बहुत अनुग्रह बरसाया गया था। मनुष्य को कोई कीमत चुकानी नहीं पड़ती थी और जब तक उसके पास विश्वास था वह अनुग्रह प्राप्त कर सकता था। सब के साथ अत्यधिक अनुग्रह के साथ व्यवहार किया जाता था। अब, युग बदल चुका है, और परमेश्वर का काम और आगे प्रगति कर चुका है, उसकी ताड़ना और न्याय के माध्यम से, मनुष्य की विद्रोहशीलता को और मनुष्य के भीतर की अशुद्धता को दूर किया जाएगा। चूँकि वह छुटकारे का चरण था, इसलिए, मनुष्य के आनन्द के लिए मनुष्य पर पर्याप्त अनुग्रह प्रदर्शित करते हुए, परमेश्वर को ऐसा काम करना पड़ा, ताकि मनुष्य को पापों से छुटकारा दिया जा सके, और अनुग्रह के माध्यम से उसके पापों को क्षमा किया जा सके। वर्तमान चरण ताड़ना, न्याय, वचनों के प्रहार, और साथ ही अनुशासन तथा वचनों के प्रकाशन के माध्यम से मनुष्य के भीतर के अधर्मों को प्रकट करने के लिए है, ताकि बाद में मानवजाति को बचाया जा सके। यह कार्य छुटकारे के कार्य से कहीं अधिक गहरा है। अनुग्रह के युग में, मनुष्य ने पर्याप्त अनुग्रह का आनन्द उठाया और चूँकि उसने पहले से इस अनुग्रह का अनुभव कर लिया है, और इस लिए मनुष्य के द्वारा इसका अब और आनन्द नहीं उठाया जाना है। ऐसे कार्य का समय अब चला गया है तथा अब और नहीं किया जाना है। अब, मनुष्य को वचन के न्याय के माध्यम से बचाया जाता है। मनुष्य का न्याय, उसकी ताड़ना और उसके परिष्कृत होने के पश्चात्, इन सबके परिणामस्वरूप उसका स्वभाव बदल जाता है। क्या यह उन वचनों की वजह से नहीं है जिन्हें मैंने कहा है? कार्य के प्रत्येक चरण को समूची मानवजाति की प्रगति और उस युग के अनुसार किया जाता है। समस्त कार्य का अपना महत्व है; यह अंतिम उद्धार के लिए, मानवजाति की भविष्य में एक अच्छी मंज़िल के लिए है, और इसलिए है कि अंत में मनुष्य को उसके प्रकार के अनुसार विभाजित किया जा सके।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)' से उद्धृत

अंत के दिनों के कार्य में, वचन चिन्हों एवं अद्भुत कामों के प्रकटीकरण की अपेक्षा कहीं अधिक शक्तिमान है, और वचन का अधिकार चिन्हों एवं अद्भुत कामों से कहीं बढ़कर है। वचन मनुष्य के हृदय में गहराई से दबे सभी भ्रष्ट स्वभावों को प्रकट करता है। तुम अपने बल पर इन्हें पहचानने में असमर्थ हो। जब उन्हें वचन के माध्यम से तुम पर प्रकट किया जाता है, तब तुम्हें स्वाभाविक रुप से ही एहसास हो जाएगा; तुम उन्हें इनकार करने में समर्थ नहीं होगे, और तुम्हें पूरी तरह से यक़ीन हो जाएगा। क्या यह वचन का अधिकार नहीं है? यह वह परिणाम है जिसे वचन के वर्तमान कार्य के द्वारा प्राप्त किया गया है। इसलिए, बीमारियों की चंगाई और दुष्टात्माओं को निकालने के द्वारा मनुष्य को उसके पापों से पूरी तरह से बचाया नहीं जा सकता है और चिन्हों और अद्भुत कामों के प्रदर्शन के द्वारा उसे पूरी तरह से पूर्ण नहीं किया जा सकता है। चंगाई करने और दुष्टात्माओं को निकालने का अधिकार मनुष्य को केवल अनुग्रह प्रदान करता है, परन्तु मनुष्य का देह तब भी शैतान से सम्बन्धित होता है और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव तब भी मनुष्य के भीतर बना रहता है। दूसरे शब्दों में, वह जिसे शुद्ध नहीं किया गया है अभी भी पाप और गन्दगी से सम्बन्धित है। जब वचनों के माध्यम से मनुष्य को स्वच्छ कर दिया जाता है केवल उसके पश्चात् ही उसे परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और वह पवित्र बन सकता है। जब मनुष्य के भीतर से दुष्टात्माओं को निकाला गया और उसे छुटकारा दिलाया गया, तो इसका अर्थ केवल इतना था कि, मनुष्य को शैतान के हाथ से छीन कर परमेश्वर को लौटा दिया गया है। हालाँकि, उसे परमेश्वर के द्वारा स्वच्छ या परिवर्तित नहीं किया गया है, इसलिए वह भ्रष्ट बना रहता है। मनुष्य के भीतर अब भी गन्दगी, विरोध, और विद्रोशीलता बनी हुई है; मनुष्य केवल छुटकारे के माध्यम से ही परमेश्वर के पास लौटा है, परन्तु मनुष्य को परमेश्वर का जरा सा भी ज्ञान नहीं है और अभी भी परमेश्वर का विरोध करने और उसके साथ विश्वासघात करने में सक्षम है। मनुष्य को छुटकारा दिये जाने से पहले, शैतान के बहुत से ज़हर उसमें पहले से ही गाड़ दिए गए थे। हज़ारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किये जाने के बाद, मनुष्य के भीतर पहले ही ऐसा स्वभाव है जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिया गया है, तो यह छुटकारे से बढ़कर और कुछ नहीं है, जहाँ मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, परन्तु भीतर का विषैला स्वभाव नहीं हटाया गया है। मनुष्य जो इतना अशुद्ध है उसे परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर अवश्य गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से, मनुष्य अपने भीतर के गन्दे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। वह सब कार्य जिसे आज किया गया है वह इसलिए है ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; न्याय और ताड़ना के वचन के द्वारा और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से, मनुष्य अपनी भ्रष्टता को दूर फेंक सकता है और उसे शुद्ध किया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाए, यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्ध करने का कार्य है। सच में, यह चरण विजय का और साथ ही उद्धार के कार्य का दूसरा चरण है। मनुष्य को वचन द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जाता है; शुद्ध करने, न्याय करने और खुलासा करने के लिए वचन के उपयोग के माध्यम से मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताओं, अवधारणाओं, प्रयोजनों, और व्यक्तिगत आशाओं को पूरी तरह से प्रकट किया जाता है। यद्यपि मनुष्य को छुटकारा दिया गया है और उसके पापों को क्षमा किया गया है, फिर भी इसे केवल इतना ही माना जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता है और मनुष्य के अपराधों के अनुसार मनुष्य से व्यवहार नहीं करता है। हालाँकि, जब मनुष्य जो देह में रहता है, जिसे पाप से मुक्त नहीं किया गया है, वह भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को अंतहीन रूप से प्रकट करते हुए, केवल पाप करता रह सकता है। यही वह जीवन है जो मनुष्य जीता है, पाप और क्षमा का एक अंतहीन चक्र। अधिकांश मनुष्य दिन में सिर्फ इसलिए पाप करते हैं ताकि शाम को स्वीकार कर सकें। इस प्रकार, भले ही पापबलि मनुष्य के लिए सदैव प्रभावी है, फिर भी यह मनुष्य को पाप से बचाने में समर्थ नहीं होगी। उद्धार का केवल आधा कार्य ही पूरा किया गया है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव है। ... मनुष्य के लिए अपने पापों के प्रति अवगत होना आसान नहीं है; मनुष्य अपनी स्वयं की गहराई से जमी हुई प्रकृति को पहचानने में असमर्थ है। केवल वचन के न्याय के माध्यम से ही इन प्रभावों को प्राप्त किया जा सकता है। केवल इस प्रकार से ही मनुष्य को उस स्थिति से आगे धीरे-धीरे बदला जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)' से उद्धृत

इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के जीवन के लिए वचनों का पोषण देना; मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव और उसकी प्रकृति के सार को उजागर करना; और धर्म संबंधी धारणाओं, सामंती सोच, पुरानी पड़ चुकी सोच, और मनुष्य के ज्ञान और संस्कृति को समाप्त करना है। इन सभी चीजों को परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर करने के माध्यम से शुद्ध किया जाना है। अंत के दिनों में, मनुष्य को पूर्ण करने के लिए परमेश्वर चिह्नों और चमत्कारों का नहीं, वचनों का उपयोग करता है। वह मनुष्य को उजागर करने, उसका न्याय करने, उसे ताड़ना देने और उसे पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है, ताकि परमेश्वर के वचनों में मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि और मनोरमता देखने लगे, और परमेश्वर के स्वभाव को समझने लगे, और ताकि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर के कर्मों को निहारे। व्यवस्था के युग के दौरान यहोवा अपने वचनों से मूसा को मिस्र से बाहर ले गया, और उसने इस्राएलियों को कुछ वचन बोले; उस समय, परमेश्वर के कर्मों का अंश प्रकट कर दिया गया था, परंतु चूँकि मनुष्य की क्षमता सीमित थी और कोई भी चीज उसके ज्ञान को पूर्ण नहीं बना सकती थी, इसलिए परमेश्वर बोलता और कार्य करता रहा। अनुग्रह के युग में मनुष्य ने एक बार फिर परमेश्वर के कर्मों का अंश देखा। यीशु चिह्न और चमत्कार दिखा पाया, बीमारों को चंगा कर पाया और दुष्टात्माओं को निकाल पाया, और सलीब पर चढ़ पाया, जिसके तीन दिन बाद वह पुनर्जीवित हुआ और देह में मनुष्य के सामने प्रकट हुआ। परमेश्वर के बारे में मनुष्य इससे अधिक कुछ नहीं जानता। मनुष्य उतना ही जानता है, जितना परमेश्वर उसे दिखाता है, और यदि परमेश्वर मनुष्य को और अधिक न दिखाए, तो यह परमेश्वर के बारे में मनुष्य के परिसीमन की सीमा होगी। इसलिए परमेश्वर कार्य करता रहता है, ताकि उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान अधिक गहरा हो सके और वह धीरे-धीरे परमेश्वर के सार को जान जाए। अंत के दिनों में, परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए अपने वचनों का उपयोग करता है। परमेश्वर के वचनों द्वारा तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किया जाता है, और तुम्हारी धर्म संबंधी धारणाओं को परमेश्वर की वास्तविकता से बदल दिया जाता है। अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर मुख्य रूप से अपने इन वचनों को पूरा करने आया है, "वचन देह बन जाता है, वचन देह में आता है, और वचन देह में प्रकट होता है", और यदि तुम्हें इसका पूरा ज्ञान नहीं है, तो तुम दृढ़ता से खड़े नहीं रह पाओगे। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर की मंशा मुख्य रूप से कार्य के उस चरण को पूरा करने की है, जिसमें वचन देह में प्रकट होता है, और यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना का एक भाग है। इसलिए तुम लोगों का ज्ञान स्पष्ट होना चाहिए; परमेश्वर चाहे जैसे कार्य करे, किंतु वह मनुष्य को अपनी सीमा निर्धारित नहीं करने देता। यदि परमेश्वर अंत के दिनों के दौरान यह कार्य न करता, तो उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान इससे आगे न जा पाता। तुम्हें बस इतना पता होगा कि परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया जा सकता है और वह सदोम को नष्ट कर सकता है, और यीशु मरकर भी उठ सकता और पतरस के सामने प्रकट हो सकता है...। परंतु तुम यह कभी नहीं कहोगे कि परमेश्वर के वचन सब-कुछ संपन्न कर सकते हैं और मनुष्य को जीत सकते हैं। केवल परमेश्वर के वचनों का अनुभव करके ही तुम ऐसी ज्ञान की बातें बोल सकते हो, और जितना अधिक तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव करोगे, उसके बारे में तुम्हारा ज्ञान उतना ही अधिक विस्तृत हो जाएगा। केवल तभी तुम परमेश्वर को अपनी धारणाओं की सीमाओं में बाँधना बंद करोगे। मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करके ही उसे जानता है; परमेश्वर को जानने का कोई और सही मार्ग नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना' से उद्धृत

मनुष्य के उद्धार के कार्य में, तीन चरणों को कार्यान्वित किया जा चुका है, कहने का तात्पर्य है कि शैतान की सम्पूर्ण पराजय से पहले शैतान के साथ युद्ध को तीन चरणों में बाँटा गया है। मगर शैतान के साथ युद्ध के समस्त कार्य की भीतरी सच्चाई यह है कि इसके प्रभावों को कार्य के कई अनेक चरणों से हासिल किया जाता है : मनुष्य को अनुग्रह प्रदान करने, और मनुष्य के लिए पापबलि बनने, मनुष्य के पापों को क्षमा करने, मनुष्य पर विजय पाने, और मनुष्य को सिद्ध बनाने के माध्यम से हासिल किया जाता है। वस्तुतः शैतान के साथ युद्ध करना उसके विरुद्ध हथियार उठाना नहीं है, बल्कि मनुष्य का उद्धार है, मनुष्य के जीवन में कार्य करना है, और मनुष्य के स्वभाव को बदलना है ताकि वह परमेश्वर के लिए गवाही दे सके। इसी तरह से शैतान को पराजित किया जाता है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने के माध्यम से शैतान को पराजित किया जाता है। जब शैतान को पराजित कर दिया जाता है, अर्थात्, जब मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा, तो लज्जित शैतान पूरी तरह से लाचार हो जाएगा, और इस तरह से, मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। और इसलिए, मनुष्य के उद्धार का सार शैतान के साथ युद्ध है, और शैतान के साथ युद्ध मुख्य रूप से मनुष्य के उद्धार में प्रतिबिम्बित होता है। अंत के दिनों का चरण, जिसमें मनुष्य पर विजय पानी है, शैतान के साथ युद्ध में अंतिम चरण है, और शैतान के अधिकार क्षेत्र से मनुष्य के सम्पूर्ण उद्धार का कार्य भी है। मनुष्य पर विजय का आन्तरिक अर्थ मनुष्य पर विजय पाने के बाद शैतान के मूर्त रूप, मनुष्य का सृजनकर्ता के पास वापस लौटना है जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, जिसके माध्यम से वह शैतान को छोड़ देगा और पूरी तरह से परमेश्वर के पास वापस लौट जाएगा। इस तरह से, मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। और इसलिए, विजय का कार्य शैतान के विरुद्ध युद्ध में अंतिम कार्य है, और शैतान की पराजय के वास्ते परमेश्वर के प्रबंधन में अंतिम चरण है। इस कार्य के बिना, मनुष्य का सम्पूर्ण उद्धार अन्ततः असंभव होगा, शैतान की सम्पूर्ण पराजय भी असंभव होगी, और मनुष्यजाति कभी भी अपनी अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करने में, या शैतान के प्रभाव से छुटकारा पाने में सक्षम नहीं होगी। परिणामस्वरुप, शैतान के साथ युद्ध की समाप्ति से पहले मनुष्य के उद्धार के कार्य को समाप्त नहीं किया जा सकता है, क्योंकि परमेश्वर के प्रबधंन के कार्य का केन्द्रीय भाग मनुष्यजाति के उद्धार के वास्ते है। अति आदिम मनुष्यजाति परमेश्वर के हाथों में थी, किन्तु शैतान के प्रलोभन और भ्रष्टता की वजह से, मनुष्य को शैतान के द्वारा बाँध लिया गया था और वह इस दुष्ट के हाथों में पड़ गया था। इस प्रकार, शैतान वह लक्ष्य बन गया था जिसे परमेश्वर के प्रबधंन के कार्य में पराजित किया जाना था। क्योंकि शैतान ने मनुष्य पर कब्ज़ा कर लिया था, और क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रबंधन की पूँजी है, इसलिए यदि मनुष्य को बचाया जाना है, तो उसे शैतान के हाथों से वापस छीनना होगा, कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य को शैतान के द्वारा बन्दी बना लिए जाने के बाद उसे वापस लेना होगा। इस प्रकार, शैतान को मनुष्य के पुराने स्वभाव में बदलावों के माध्यम से पराजित किया जाना चाहिए, बदलाव जो उसकी मूल समझ को पुनः स्थापित करते हैं, और इस तरह से मनुष्य को, जिसे बन्दी बना लिया गया था, शैतान के हाथों से वापस छीना जा सकता है। यदि मनुष्य शैतान के प्रभाव और बंधन से मुक्त हो जाता है, तो शैतान शर्मिन्दा हो जाएगा, मनुष्य को अंततः वापस ले लिया जाएगा, और शैतान को हरा दिया जाएगा। और क्योंकि मनुष्य को शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त किया जा चुका है, इसलिए जब एक बार यह युद्ध समाप्त हो जाएगा तो मनुष्य इस सम्पूर्ण युद्ध में जीत के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ लाभ बन जाएगा, और शैतान वह लक्ष्य बन जाएगा जिसे दण्डित किया जाएगा, जिसके पश्चात् मनुष्यजाति के उद्धार का सम्पूर्ण कार्य पूरा कर लिया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

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