2. परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों में से प्रत्येक का उद्देश्य और अर्थ

(1) व्यवस्था के युग में परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य और अर्थ

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

यहोवा ने जो कार्य इस्राएलियों पर किया, उसने मानव-जाति के बीच पृथ्वी पर परमेश्वर के मूल स्थान को स्थापित किया, जो कि ऐसा पवित्र स्थान भी था जहाँ वह उपस्थित रहता था। उसने अपने कार्य को इस्राएल के लोगों तक ही सीमित रखा। आरंभ में उसने इस्राएल के बाहर कार्य नहीं किया, बल्कि उसने अपने कार्यक्षेत्र को सीमित रखने के लिए ऐसे लोगों को चुना, जिन्हें उसने उचित पाया। इस्राएल वह जगह है, जहाँ परमेश्वर ने आदम और हव्वा की रचना की, और उस जगह की धूल से यहोवा ने मनुष्य को बनाया; यह स्थान पृथ्वी पर उसके कार्य का आधार बन गया। इस्राएली, जो नूह के वंशज थे और आदम के भी वंशज थे, पृथ्वी पर यहोवा के कार्य की मानवीय बुनियाद थे।

उस समय, इस्राएल में यहोवा के कार्य की महत्ता, उद्देश्य और कदम पूरी पृथ्वी पर अपना कार्य शुरू करने के लिए थे, जो इस्राएल को अपना केंद्र बनाकर धीरे-धीरे अन्य-जाति राष्ट्रों में फैल गया। वह इसी सिद्धांत के अनुसार पूरे ब्रह्मांड में कार्य करता है—एक प्रतिमान स्थापित करता है और फिर उसे तब तक व्यापक करता है जब तक कि विश्व के सभी लोग उसके सुसमाचार को प्राप्त न कर लें। प्रथम इस्राएली नूह के वंशज थे। इन लोगों को केवल यहोवा की श्वास प्रदान की गई थी और वे जीवन की मूल आवश्यकताएँ पूरी करने की पर्याप्त समझ रखते थे, किंतु वे नहीं जानते थे कि यहोवा किस प्रकार का परमेश्वर है या मनुष्य के लिए उसकी इच्छा क्या है, और यह तो वे बिलकुल नहीं जानते थे कि समस्त सृष्टि के प्रभु का सम्मान कैसे करें। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि क्या ऐसे नियम और व्यवस्थाएँ हैं जिनका पालन किया जाना था[क], या क्या सृजित प्राणियों को स्रष्टा के लिए कोई कर्तव्य निभाना चाहिए, आदम के वंशज इन बातों के बारे में कुछ नहीं जानते थे। वे बस इतना ही जानते थे कि पति को अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए पसीना बहाना और परिश्रम करना चाहिए, और पत्नी को अपने पति के प्रति समर्पित होकर यहोवा द्वारा सृजित मानव-जाति को बनाए रखना चाहिए। दूसरे शब्दों में, वे लोग जिनके पास केवल यहोवा की श्वास और उसका जीवन था, इस बारे में कुछ भी नहीं जानते थे कि परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन कैसे करें या समस्त सृष्टि के प्रभु को कैसे संतुष्ट करें। वे बहुत ही कम समझते थे। इसलिए भले ही उनके हृदय में कुछ भी कुटिलता या छल-कपट नहीं था, और उनके बीच ईर्ष्या और कलह कभी-कभार ही उत्पन्न होते थे, फिर भी उन्हें समस्त सृष्टि के प्रभु, यहोवा के बारे में कोई ज्ञान या समझ नहीं थी। मनुष्य के ये पूर्वज केवल यहोवा की चीज़ों को खाना और उनका आनंद लेना जानते थे, किंतु वे यहोवा का आदर करना नहीं जानते थे; वे नहीं जानते थे कि उन्हें घुटने टेककर यहोवा की आराधना करनी चाहिए। तो वे उसके प्राणी कैसे कहला सकते थे? यदि ऐसा होता, तो क्या इन वचनों का बोला जाना, "यहोवा समस्त सृष्टि का प्रभु है" और "उसने मनुष्य को सृजित किया ताकि मनुष्य उसे अभिव्यक्त कर सके, उसे महिमामंडित कर सके और उसका प्रतिनिधित्व कर सके"—व्यर्थ न हो जाता? जिन लोगों में यहोवा के लिए आदर नहीं था, वे उसकी महिमा के गवाह कैसे बन सकते थे? वे उसकी महिमा की अभिव्यक्ति कैसे बन सकते थे? तब क्या यहोवा के ये वचन "मैंने मनुष्य को अपनी छवि में बनाया" दुष्टात्मा शैतान के हाथों में हथियार न बन जाते? क्या तब ये वचन यहोवा द्वारा मनुष्य के सृजन को लेकर अपमान का एक चिह्न न बन जाते? कार्य के उस चरण को पूरा करने के लिए, मनुष्य को बनाने के बाद, यहोवा ने आदम से नूह तक उन्हें निर्देश या मार्गदर्शन नहीं दिया। बल्कि, जल-प्रलय द्वारा दुनिया को नष्ट किए जाने के बाद ही उसने औपचारिक तौर पर नूह और आदम के वंशज, इस्राएलियों का मार्गदर्शन करना आरंभ किया था। इस्राएल में उसके कार्य और कथनों ने इस्राएल में रहने वाले सभी लोगों को मार्गदर्शन दिया और इस तरह मानव-जाति को दिखाया कि यहोवा न केवल मनुष्य में श्वास फूँकने में समर्थ है, ताकि वह परमेश्वर से जीवन प्राप्त कर सके और मिट्टी में से उठकर एक सृजित मानव बन सके, बल्कि वह मानव-जाति पर शासन करने के लिए उसे भस्म भी कर सकता है, उसे शाप भी दे सकता है और उस पर अपने राजदंड का उपयोग भी कर सकता है। इसलिए उन्होंने देखा कि यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन कर सकता है और मानव-जाति के बीच दिन और रात के समय के अनुसार बोल सकता है और कार्य कर सकता है। जो कार्य उसने किया, वह केवल इसलिए किया ताकि उसके प्राणी जान सकें कि मनुष्य उसके द्वारा उठाई गई धूल से उत्पन्न हुआ है। इसके अलावा, मनुष्य उसके द्वारा ही बनाया गया है। इतना ही नहीं, बल्कि उसने पहले इस्राएल में कार्य किया ताकि दूसरे लोग और राष्ट्र (जो वास्तव में इस्राएल से पृथक नहीं थे, बल्कि इस्राएलियों से अलग हो गए थे, मगर फिर भी वे आदम और हव्वा के वंशज ही थे) इस्राएल से यहोवा का सुसमाचार प्राप्त कर सकें ताकि विश्व में सभी सृजित प्राणी यहोवा का आदर कर सकें और उसे महान समझ सकें। यदि यहोवा ने अपना कार्य इस्राएल में आरंभ न किया होता, बल्कि मनुष्यों को बनाने के बाद उन्हें पृथ्वी पर निश्चिंत जीवन जीने दिया होता, तो उस स्थिति में, मनुष्य की भौतिक प्रकृति के कारण (प्रकृति का अर्थ है कि मनुष्य उन चीज़ों को कभी नहीं जान सकता, जिन्हें वह देख नहीं सकता, अर्थात् वह कभी नहीं जान पाएगा कि मानव-जाति को यहोवा ने बनाया है, और यह तो बिल्कुल नहीं जान पाएगा कि उसने ऐसा क्यों किया), वह कभी नहीं जान पाएगा कि यहोवा ने ही मानवजाति को बनाया है अथवा वह समस्त सृष्टि का प्रभु है। यदि यहोवा ने मनुष्य का सृजन करके उसे पृथ्वी पर छोड़ दिया होता और एक अवधि तक मनुष्यों का मार्गदर्शन करने के लिए उनके बीच रहने के बजाय ऐसे ही अपने हाथ झाड़कर चला गया होता, तो सारी मानव-जाति वापस शून्यता की ओर लौट गई होती; यहाँ तक कि स्वर्ग, पृथ्वी और उसकी बनाई हुई असंख्य चीज़ें और समस्त मानव-जाति शून्यता की ओर लौट गई होती और इतना ही नहीं, शैतान द्वारा कुचल दी गई होती। इस तरह से यहोवा की यह इच्छा "पृथ्वी पर अर्थात्, उसके सृजन के बीच, उसके पास पृथ्वी पर खड़े होने के लिए एक स्थान, एक पवित्र स्थान होना चाहिए" बिखर गई होती। इसलिए मानवजाति को बनाने के बाद, वह मनुष्यों के जीवन में मार्गदर्शन करने के लिए उनके बीच रह पाया और उनसे बात कर पाया—यह सब उसका अपनी इच्छा और योजना को पूरा करने के लिए था। उसने जो कार्य इस्राएल में किया, वह केवल उस योजना को क्रियान्वित करने के लिए था जिसे उसने सभी चीज़ों की रचना करने से पहले बनाया था, इसलिए उसका पहले इस्राएलियों के मध्य कार्य करना और सभी चीज़ों का सृजन करना एक-दूसरे से असंगत नहीं था, बल्कि दोनों उसके प्रबंधन, उसके कार्य और उसकी महिमा के लिए और उसके द्वारा मानव-जाति के सृजन के अर्थ को और अधिक गहरा करने के लिए किए गए थे। उसने नूह के बाद दो हज़ार वर्षों तक पृथ्वी पर मानवजाति के जीवन का मार्गदर्शन किया, उस दौरान उसने मानवजाति को यह समझाया कि समस्त सृष्टि के प्रभु यहोवा का किस प्रकार आदर करें, अपना जीवन कैसे चलाएँ और जीवन कैसे जिएँ, और इन सबसे बढ़कर, यहोवा के गवाह के रूप में कार्य कैसे करें, उसका आज्ञापालन कैसे करें और उसका सम्मान कैसे करें, यहाँ तक कि कैसे संगीत के साथ उसकी स्तुति करें जैसे दाऊद और उसके याजकों ने की थी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'व्यवस्था के युग का कार्य' से उद्धृत

व्यवस्था के युग के दौरान यहोवा के नाम से मानवजाति का मार्गदर्शन करने का कार्य किया गया था, और पृथ्वी पर कार्य का पहला चरण आरंभ किया गया था। इस चरण के कार्य में मंदिर और वेदी का निर्माण करना, और इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए व्यवस्था का उपयोग करना और उनके बीच कार्य करना शामिल था। इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करके उसने पृथ्वी पर अपने कार्य के लिए एक आधार स्थापित किया। इस आधार से उसने अपने कार्य का विस्तार इस्राएल से बाहर किया, जिसका अर्थ है कि इस्राएल से शुरू करके उसने अपने कार्य का बाहर विस्तार किया, जिससे बाद की पीढ़ियों को धीरे-धीरे पता चला कि यहोवा परमेश्वर था, और कि वह यहोवा ही था, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों का निर्माण किया, और कि वह यहोवा ही था, जिसने सभी प्राणियों को सिरजा था। उसने इस्राएल के लोगों के माध्यम से अपने कार्य को उनसे परे फैलाया। इस्राएल की भूमि पृथ्वी पर यहोवा के कार्य का पहला पवित्र स्थान थी, और इस्राएल की भूमि पर ही परमेश्वर पृथ्वी पर सबसे पहले कार्य करने गया। वह व्यवस्था के युग का कार्य था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)' से उद्धृत

आरंभ में, व्यवस्था के पुराने विधान के युग के दौरान मनुष्य का मार्गदर्शन करना एक बच्चे के जीवन का मार्गदर्शन करने जैसा था। आरंभिक मानवजाति यहोवा की नवजात थी; वे इस्राएली थे। उन्हें इस बात की समझ नहीं थी कि परमेश्वर का सम्मान कैसे करें या पृथ्वी पर कैसे रहें। दूसरे शब्दों में, यहोवा ने मानवजाति का सृजन किया, अर्थात् उसने आदम और हव्वा का सृजन किया, किंतु उसने उन्हें यह समझने की क्षमताएँ नहीं दीं कि यहोवा का सम्मान कैसे करें या पृथ्वी पर यहोवा की व्यवस्था का अनुसरण कैसे करें। यहोवा के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के बिना कोई इसे सीधे नहीं जान सकता था, क्योंकि आरंभ में मनुष्य के पास ऐसी क्षमताएँ नहीं थीं। मनुष्य केवल इतना ही जानता था कि यहोवा परमेश्वर है, किंतु जहाँ तक इस बात का संबंध है कि उसका सम्मान कैसे करना है, किस प्रकार का आचरण उसका सम्मान करना कहा जा सकता है, किस प्रकार के मन के साथ व्यक्ति को उसका सम्मान करना है, या उसके सम्मान में क्या चढ़ाना है, मनुष्य को इसका बिलकुल भी पता नहीं था। मनुष्य केवल इतना ही जानता था कि उस चीज का आनंद कैसे लिया जाए, जिसका यहोवा द्वारा सृजित सभी चीजों के बीच आनंद लिया जा सकता है, किंतु पृथ्वी पर किस तरह का जीवन परमेश्वर के प्राणी के योग्य है, मनुष्य को इसका कोई आभास नहीं था। किसी के द्वारा निर्देशित किए बिना, किसी के द्वारा अपना व्यक्तिगत रूप से मार्गदर्शन किए बिना, यह मानवजाति अपने लिए उपयुक्त जीवन उचित प्रकार से कभी न जी पाती, बल्कि केवल शैतान द्वारा गुप्त रूप से बंदी बना ली गई होती। यहोवा ने मानवजाति का सृजन किया, अर्थात्, उसने मानवजाति के पूर्वजों, हव्वा और आदम, का सृजन किया, किंतु उसने उन्हें और कोई बुद्धि या ज्ञान प्रदान नहीं किया। यद्यपि वे पहले से ही पृथ्वी पर रह रहे थे, किंतु वे समझते लगभग कुछ नहीं थे। और इसलिए, मानवजाति का सृजन करने का यहोवा का कार्य केवल आधा ही समाप्त हुआ था, पूरा नहीं। उसने केवल मिट्टी से मनुष्य का एक नमूना बनाया था और उसे अपनी साँस दे दी थी, किंतु परमेश्वर का सम्मान करने की पर्याप्त इच्छा प्रदान किए बिना। आरंभ में मनुष्य का मन परमेश्वर का सम्मान करने या उससे डरने का नहीं था। मनुष्य केवल इतना ही जानता था कि उसके वचनों को कैसे सुनना है, किंतु पृथ्वी पर जीवन के बुनियादी ज्ञान और मानव-जीवन के सामान्य नियमों से वह अनभिज्ञ था। और इसलिए, यद्यपि यहोवा ने पुरुष और स्त्री का सृजन किया और सात दिन की परियोजना पूरी कर दी, किंतु उसने किसी भी प्रकार से मनुष्य के सृजन को पूरा नहीं किया, क्योंकि मनुष्य केवल एक भूसा था, और उसमें मनुष्य होने की वास्तविकता का अभाव था। मनुष्य केवल इतना ही जानता था कि यह यहोवा है, जिसने मानवजाति का सृजन किया है, किंतु उसे इस बात का कोई आभास नहीं था कि यहोवा के वचनों और व्यवस्थाओं का पालन कैसे किया जाए। और इसलिए, मानवजाति के सृजन के बाद, यहोवा का कार्य अभी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ था। उसे अभी भी मनुष्यों को अपने सामने लाने के लिए उनका पूरी तरह से मार्गदर्शन करना था, ताकि वे धरती पर एक-साथ रहने और उसका सम्मान करने में समर्थ हो जाएँ, और ताकि वे उसके मार्गदर्शन से धरती पर एक सामान्य मानव-जीवन के सही रास्ते पर प्रवेश करने में समर्थ हो जाएँ। केवल इसी रूप में मुख्यतः यहोवा के नाम से संचालित कार्य पूरी तरह से संपन्न हुआ था; अर्थात्, केवल इसी रूप में दुनिया का सृजन करने का यहोवा का कार्य पूरी तरह से समाप्त हुआ था। और इसलिए, मानवजाति का सृजन करने के बाद उसे पृथ्वी पर हजारों वर्षों तक मानवजाति के जीवन का मार्गदर्शन करना पड़ा, ताकि मानवजाति उसके आदेशों और व्यवस्थाओं का पालन करने और पृथ्वी पर एक सामान्य मानव-जीवन की सभी गतिविधियों में भाग ले पाने में समर्थ हो जाए। केवल तभी यहोवा का कार्य पूर्णतः पूरा हुआ था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)' से उद्धृत

जब परमेश्वर ने अपनी प्रबंधन योजना का आधिकारिक कार्य आरंभ किया, तब उसने अनेक नियम निर्धारित किए जिनका पालन मनुष्य द्वारा किया जाना था। ये नियम मनुष्य को पृथ्वी पर मनुष्य का सामान्य जीवन जीने देने के लिए थे, मनुष्य का सामान्य जीवन जो परमेश्वर और उसके मार्गदर्शन से अवियोज्य है। परमेश्वर ने सबसे पहले मनुष्य को बताया कि वेदियाँ कैसे बनाएँ, वेदियाँ किस प्रकार स्थापित करें। उसके बाद, उसने मनुष्य को बताया कि बलि कैसे चढ़ाएँ, और स्थापित किया कि मनुष्य को किस प्रकार जीना था—उसे जीवन में किस पर ध्यान देना था, उसे किसका पालन करना था, उसे क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए। परमेश्वर ने मनुष्य के लिए जो निर्दिष्ट किया वह सर्वव्यापी था, और इन रीति-रिवाज़ों, नियमों, और सिद्धांतों के साथ उसने लोगों के व्यवहार के मानक तय किए, उनके जीवन का मार्गदर्शन किया, परमेश्वर की व्यवस्थाओं में उनकी दीक्षा का मार्गदर्शन किया, परमेश्वर की वेदी के समक्ष आने के लिए उनका मार्गदर्शन किया, और उन सभी चीज़ों के बीच जीवन पाने के लिए उनका मार्गदर्शन किया जो परमेश्वर ने व्यवस्था, नियमितता, और संयम से युक्त मनुष्य के लिए बनाई थीं। परमेश्वर ने मनुष्य के लिए सीमाएँ निर्धारित करने के उद्देश्य से सबसे पहले इन सीधे-सादे नियमों और सिद्धांतों का उपयोग किया था, ताकि पृथ्वी पर मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने वाला सामान्य जीवन हो, और उसके पास मनुष्य का सामान्य जीवन हो; ऐसी है उसकी छह हज़ार वर्षीय प्रबंधन योजना के आरंभ की विशिष्ट विषयवस्तु। इन नियमों और व्यवस्थाओं में बहुत व्यापक विषयवस्तु समाहित है, वे व्यवस्था के युग के दौरान मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर के मार्गदर्शन के विशिष्ट विवरण हैं, इन्हें व्यवस्था के युग के लोगों द्वारा स्वीकार और इनका पालन किया जाना था, ये व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य का अभिलेख हैं, और वे संपूर्ण मनुष्यजाति की परमेश्वर द्वारा अगुआई और मार्गदर्शन का वास्तविक प्रमाण हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

दो हज़ार वर्ष पूर्व जब यहोवा ने अपना कार्य किया, तो मनुष्य कुछ नहीं जानता था, और लगभग समस्त मानव-जाति पतित हो चुकी थी, जल-प्रलय द्वारा संसार के विनाश से पहले तक, मनुष्य स्वच्छंद संभोग और भ्रष्टता की गहराई में गिर चुका था, मनुष्य का हृदय पूरी तरह से यहोवा से रहित था और उसके मार्ग से तो बिल्कुल ही रहित था। उसने उस कार्य को कभी नहीं समझा था, जिसे यहोवा करने जा रहा था; लोगों में विवेक का अभाव था, ज्ञान और भी कम था, और एक साँस लेती हुई मशीन के समान वे मनुष्य, परमेश्वर, संसार, जीवन आदि से पूर्णतया अनभिज्ञ थे। पृथ्वी पर वे साँप के समान, बहुत-से प्रलोभनों में लिप्त थे, और बहुत-सी ऐसी बातें कहते थे जो यहोवा के लिए अपमानजनक थीं, लेकिन चूँकि वे अनभिज्ञ थे, इसलिए यहोवा ने उन्हें ताड़ना नहीं दी या अनुशासित नहीं किया। केवल जल-प्रलय के बाद ही, जब नूह 601 वर्ष का था, तो यहोवा ने औपचारिक रूप से नूह के सामने प्रकट होकर उसका तथा उसके परिवार का मार्गदर्शन किया और 2,500 वर्षों तक चले व्यवस्था के युग की समाप्ति तक नूह और उसके वंशजों के साथ-साथ, जल-प्रलय में जिंदा बचे पक्षियों और जानवरों की अगुआई की। वह इस्राएल में कार्यरत था, अर्थात् कुल 2,000 वर्षों तक औपचारिक रूप से इस्राएल में कार्यरत था और 500 वर्षों तक इस्राएल और उसके बाहर एक-साथ कार्यरत था, जो मिलकर 2,500 वर्ष होते हैं। इस दौरान उसने इस्राएलियों को निर्देश दिया कि यहोवा की सेवा करने के लिए उन्हें एक मंदिर का निर्माण करना चाहिए, याजकों के लबादे पहनने चाहिए और उषाकाल में नंगे पाँव मंदिर में प्रवेश करना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि उनके जूते मंदिर को अपवित्र कर दें और मंदिर के शिखर से उन पर आग गिरा दी जाए और उन्हें जलाकर मार डाला जाए। उन्होंने अपने कर्तव्य पूरे किए और यहोवा की योजनाओं के प्रति समर्पित हो गए। उन्होंने मंदिर में यहोवा से प्रार्थना की, और यहोवा का प्रकाशन प्राप्त करने के बाद, अर्थात् यहोवा के बोलने के बाद, उन्होंने जनसाधारण की अगुआई की और उन्हें सिखाया कि उन्हें उनके परमेश्वर, यहोवा के प्रति आदर दिखाना चाहिए। यहोवा ने उनसे कहा कि उन्हें एक मंदिर और एक वेदी बनानी चाहिए, और यहोवा द्वारा निर्धारित समय पर, अर्थात् फसह के पर्व पर उन्हें यहोवा की सेवा के लिए बलि के रूप में वेदी पर रखने के लिए नवजात बछड़े और मेमने तैयार करने चाहिए, जिससे लोगों को नियंत्रण में रखा जा सके और उनके हृदय में यहोवा के लिए आदर उत्पन्न किया जा सके। उनका इस व्यवस्था का पालन करना या न करना यहोवा के प्रति उनकी वफादारी का पैमाना बन गया। यहोवा ने उनके लिए सब्त का दिन भी नियत किया, जो उसकी सृष्टि की रचना का सातवाँ दिन था। सब्त के अगले दिन उसने पहला दिन बनाया, अर्थात् उनके द्वारा यहोवा की स्तुति करने, उसे चढ़ावा चढ़ाने और उसके लिए संगीत की रचना करने का दिन। इस दिन यहोवा ने सभी याजकों को एक-साथ बुलाकर वेदी पर रखे चढ़ावे को लोगों के खाने हेतु बाँटने के लिए कहा, ताकि वे यहोवा की वेदी के चढ़ावों का आनंद उठा सकें। यहोवा ने कहा कि वे धन्य हैं कि उन्होंने उसके साथ एक हिस्सा साझा किया, और कि वे उसके चुने हुए लोग हैं (जो कि इस्राएलियों के साथ यहोवा की वाचा थी)। यही कारण है कि आज तक भी इस्राएल के लोग यही कहते हैं कि यहोवा केवल उनका ही परमेश्वर है, वह अन्य-जातियों का परमेश्वर नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'व्यवस्था के युग का कार्य' से उद्धृत

व्यवस्था के युग के दौरान, यहोवा ने मूसा को उन इस्राएलियों तक पहुँचाने के लिए अनेक आज्ञाएँ निर्धारित कीं, जो मिस्र के बाहर उसका अनुसरण करते थे। ये आज्ञाएँ यहोवा द्वारा इस्राएलियों को दी गई थीं, उनका मिस्र के लोगों से कोई संबंध नहीं था; वे इस्राएलियों को नियंत्रित करने के लिए थीं, उसने उनसे माँग करने के लिए इन आज्ञाओं का उपयोग किया। वे सब्त का पालन करते थे या नहीं, अपने माता-पिता का आदर करते थे या नहीं, मूर्तियों की आराधना करते थे या नहीं, इत्यादि—यही वे सिद्धांत थे, जिनसे उनके पापी या धार्मिक होने का आकलन किया जाता था। उनमें से कुछ ऐसे थे जो यहोवा की आग से जला दिए गए, कुछ ऐसे थे जो पत्थरों से मार डाले गए, और कुछ ऐसे थे जिन्होंने यहोवा का आशीष प्राप्त किया, इसका निर्धारण इस बात से किया जाता था कि उन्होंने इन आज्ञाओं का पालन किया या नहीं। जो सब्त का पालन नहीं करते थे, उन्हें पत्थरों से मार डाला गया। जो याजक सब्त का पालन नहीं करते थे, उन्हें यहोवा की आग में जला दिया गया। जो अपने माता-पिता का आदर नहीं करते थे, उन्हें भी पत्थरों से मार डाला गया। यह सब यहोवा द्वारा कहा गया था। यहोवा ने अपनी आज्ञाओं और व्यवस्थाओं को इसलिए स्थापित किया था, ताकि जब वह लोगों के जीवन की अगुआई करे, तो वे उसके वचन सुनकर उनका पालन करें, उसके विरुद्ध विद्रोह न करें। उसने नवजात मानव-जाति को नियंत्रण में रखने, अपने भविष्य के कार्य की नींव को बेहतर ढंग से डालने के लिए इन व्यवस्थाओं का उपयोग किया। इसलिए, यहोवा द्वारा किए गए कार्य के आधार पर प्रथम युग को व्यवस्था का युग कहा गया। यद्यपि यहोवा ने बहुत-से कथन कहे और बहुत कार्य किया, किंतु उसने केवल लोगों का सकारात्मक ढंग से मार्गदर्शन किया और उन अज्ञानी लोगों को इंसान बनना सिखाया, जीना सिखाया, यहोवा के मार्ग को समझना सिखाया। उसके द्वारा किए गए कार्य का अधिकांश भाग लोगों से अपने मार्ग का पालन करवाना और अपनी व्यवस्थाओं का अनुसरण करवाना था। यह कार्य उन लोगों पर किया गया, जो कम भ्रष्ट थे; इसका उद्देश्य उनके स्वभाव का रूपांतरण या उनके जीवन का विकास नहीं था। वह केवल लोगों को मर्यादित और नियंत्रित करने हेतु व्यवस्थाओं का उपयोग करने के लिए चिंतित था। उस समय इस्राएलियों के लिए यहोवा मात्र मंदिर में विद्यमान परमेश्वर, स्वर्ग का परमेश्वर था। वह बादल का एक खंभा, आग का एक खंभा था। यहोवा का उद्देश्य मात्र लोगों से उन बातों का आज्ञापालन करवाना था जिन्हें आज लोग उसकी व्यवस्थाओं और आज्ञाओं के तौर पर जानते हैं, क्योंकि यहोवा ने जो किया, वह उन्हें रूपांतरित करने के लिए नहीं था, बल्कि उन्हें और बहुत-सी वस्तुएँ देने के लिए था, जो मनुष्य के पास होनी चाहिए, उन्हें स्वयं अपने मुँह से निर्देश देना था, क्योंकि सृजित किए जाने के बाद मनुष्य के पास ऐसा कुछ नहीं था, जो उसके पास होना चाहिए। इसलिए, यहोवा ने लोगों को वे वस्तुएँ दीं, जो पृथ्वी पर उनके जीवन के लिए उनके पास होनी चाहिए थीं, और ऐसा करके उन लोगों को, जिनकी यहोवा ने अगुआई की थी, उनके पूर्वजों, आदम और हव्वा से भी श्रेष्ठ बना दिया, क्योंकि जो कुछ यहोवा ने उन्हें दिया, वह उससे बढ़कर था जो उसने आरंभ में आदम और हव्वा को दिया था। इसके बावजूद, यहोवा ने इस्राएल में जो कार्य किया, वह केवल मानवजाति का मार्गदर्शन करने और उसे अपने रचयिता को पहचानना सिखाने के लिए था। उसने उन्हें जीता या रूपांतरित नहीं किया था, बल्कि मात्र उनका मार्गदर्शन किया था। व्यवस्था के युग में कुलमिलाकर यहोवा का यही कार्य था। यह इस्राएल की संपूर्ण धरती पर उसके कार्य की पृष्ठभूमि, उसकी सच्ची कहानी और उसका सार है, जो मानव-जाति को यहोवा के नियंत्रण में रखने के लिए—उसके छह हज़ार वर्षों के कार्य का आरंभ है। इसी से उसकी छह हज़ार वर्षीय प्रबंधन योजना में और अधिक कार्य उत्पन्न हुआ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'व्यवस्था के युग का कार्य' से उद्धृत

फुटनोट :

क. मूल पाठ में, "पालन किया जाना था" यह वाक्यांश नहीं है।

(2) अनुग्रह के युग में परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य और अर्थ

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

यीशु अनुग्रह के युग के समस्त कार्य का प्रतिनिधित्व करता है; वह देहधारी हुआ और उसे सलीब पर चढ़ाया गया, और उसने अनुग्रह के युग का आरंभ भी किया। उसे छुटकारे का कार्य पूरा करने, व्यवस्था के युग का अंत करने और अनुग्रह के युग का आरंभ करने के लिए सलीब पर चढ़ाया गया था, और इसलिए उसे "सर्वोच्च सेनापति," "पाप-बलि," और "उद्धारकर्ता" कहा गया। परिणामस्वरूप, यीशु के कार्य की विषयवस्तु यहोवा के कार्य से अलग थी, यद्यपि वे सैद्धांतिक रूप से एक ही थे। यहोवा ने व्यवस्था का युग आरंभ करके और व्यवस्थाएँ तथा आज्ञाएँ जारी करके पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य का आधार—उद्गम-स्थल—स्थापित किया। ये उसके द्वारा किए गए दो कार्य हैं, और ये व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व करते हैं। जो कार्य यीशु ने अनुग्रह के युग में किया, वह व्यवस्थाएँ जारी करना नहीं था बल्कि उन्हें पूरा करना था, और परिणामस्वरूप अनुग्रह के युग का सूत्रपात करना और व्यवस्था के युग को समाप्त करना था, जो दो हज़ार सालों तक रहा था। वह युग-प्रवर्तक था, जो अनुग्रह के युग को शुरू करने के लिए आया, फिर भी उसके कार्य का मुख्य भाग छुटकारे में निहित था। इसलिए उसका कार्य भी दोहरा था : एक नए युग का मार्ग प्रशस्त करना, और सलीब पर चढ़ने के माध्यम से छुटकारे का कार्य पूरा करना, जिसके बाद वह चला गया। उसके बाद से व्यवस्था का युग समाप्त हो गया और अनुग्रह का युग शुरू हो गया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'छुटकारे के युग के कार्य के पीछे की सच्ची कहानी' से उद्धृत

अनुग्रह के युग के दौरान, यीशु परमेश्वर था, जिसने मनुष्य को बचाया। उसका स्वरूप अनुग्रह, प्रेम, करुणा, संयम, धैर्य, विनम्रता, देखभाल और सहिष्णुता का था, और उसने जो इतना अधिक कार्य किया, वह मनुष्य के छुटकारे की खातिर किया। उसका स्वभाव करुणा और प्रेम का था, और चूँकि वह करुणामय और प्रेममय था, इसलिए उसे मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ना पड़ा, यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर मनुष्य से उसी प्रकार प्रेम करता है, जैसे वह स्वयं से करता है, यहाँ तक कि उसने स्वयं को अपनी संपूर्णता में बलिदान कर दिया। अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर का नाम यीशु था, अर्थात्, परमेश्वर ऐसा परमेश्वर था जिसने मनुष्य को बचाया, और वह एक करुणामय और प्रेममय परमेश्वर था। परमेश्वर मनुष्य के साथ था। उसका प्रेम, उसकी करुणा और उसका उद्धार प्रत्येक व्यक्ति के साथ था। केवल यीशु के नाम और उसकी उपस्थिति को स्वीकार करके ही मनुष्य शांति और आनंद प्राप्त करने, उसका आशीष, उसके व्यापक और विपुल अनुग्रह तथा उसका उद्धार प्राप्त करने में समर्थ था। यीशु को सलीब पर चढ़ाने के माध्यम से, उसका अनुसरण करने वाले सभी लोगों को उद्धार प्राप्त हो गया और उनके पाप क्षमा कर दिए गए। अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर का नाम यीशु था। दूसरे शब्दों में, अनुग्रह के युग का कार्य मुख्यतः यीशु के नाम से किया गया था। अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर को यीशु कहा गया। उसने पुराने विधान से परे नए कार्य का एक चरण शुरू किया, और उसका कार्य सलीब पर चढ़ाए जाने के साथ समाप्त हो गया। यह उसके कार्य की संपूर्णता थी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)' से उद्धृत

यीशु ने जो कार्य किया, वह उस युग में मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुसार था। उसका कार्य मानवजाति को छुटकारा दिलाना, उसे उसके पापों के लिए क्षमा करना था, और इसलिए उसका स्वभाव पूरी तरह से विनम्रता, धैर्य, प्रेम, धर्मपरायणता, सहनशीलता, दया और करुणामय प्यार से भरा था। वह मानवजाति के लिए भरपूर अनुग्रह और आशीष लाया, और उसने वे सभी चीज़ें, जिनका लोग संभवतः आनंद ले सकते थे, उन्हें उनके आनंद के लिए दीं : शांति और प्रसन्नता, अपनी सहनशीलता और प्रेम, अपनी दया और अपना करुणामय प्यार। उस समय मनुष्य के आनंद की ढेर सारी चीज़ें—उनके हृदयों में शांति और सुरक्षा का बोध, उनकी आत्माओं में आश्वासन की भावना, और उद्धारकर्ता यीशु पर उनकी निर्भरता—ये चीज़ें उस युग में सबको सुलभ थीं, जिसमें वे रहते थे। अनुग्रह के युग में मनुष्य पहले ही शैतान द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका था, इसलिए समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाने का कार्य पूरा करने के लिए भरपूर अनुग्रह, अनंत सहनशीलता और धैर्य, और उससे भी बढ़कर, मानवजाति के पापों का प्रयाश्चित करने के लिए पर्याप्त बलिदान की आवश्यकता थी, ताकि परिणाम हासिल किया जा सके। अनुग्रह के युग में मानवजाति ने जो देखा, वह मानवजाति के पापों के प्रायश्चित के लिए मेरा बलिदान मात्र था : यीशु। वे केवल इतना ही जानते थे कि परमेश्वर दयावान और सहनशील हो सकता है, और उन्होंने केवल यीशु की दया और करुणामय प्रेम ही देखा था। ऐसा पूरी तरह से इसलिए था, क्योंकि वे अनुग्रह के युग में जन्मे थे। इसलिए, इससे पहले कि उन्हें छुटकारा दिलाया जा सके, उन्हें कई प्रकार के अनुग्रह का आनंद उठाना था, जो यीशु ने उन्हें प्रदान किए थे; ताकि वे उनसे लाभान्वित हो सकें। इस तरह, उनके द्वारा अनुग्रह का आनंद उठाने के माध्यम से उनके पापों को क्षमा किया जा सकता था, और यीशु की सहनशीलता और धैर्य का आनंद उठाने के माध्यम से उनके पास छुटकारा पाने का एक अवसर भी हो सकता था। केवल यीशु की सहनशीलता और धैर्य के माध्यम से ही उन्होंने क्षमा पाने का अधिकार जीता और यीशु द्वारा दिए गए अनुग्रह की प्रचुरता का आनंद उठाया। जैसा कि यीशु ने कहा था : मैं धार्मिकों को नहीं बल्कि पापियों को छुटकारा दिलाने, पापियों को उनके पापों के लिए क्षमा करवाने के लिए आया हूँ। यदि यीशु मनुष्य के अपराधों के लिए उनका न्याय करने, उन्हें शाप देने और उनके प्रति असहिष्णुता का स्वभाव लाया होता, तो मनुष्य को छुटकारा पाने का अवसर कभी न मिला होता, और वह हमेशा के लिए पापी रह गया होता। यदि ऐसा हुआ होता, तो छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना व्यवस्था के युग में ही रुक गई होती, और व्यवस्था का युग छह हज़ार वर्ष लंबा हो गया होता। मनुष्य के पाप अधिक विपुल और अधिक गंभीर हो गए होते, और मानवजाति के सृजन का कोई अर्थ न रह जाता। मनुष्य केवल व्यवस्था के अधीन यहोवा की सेवा करने में ही समर्थ हो पाता, परंतु उसके पाप प्रथम सृजित मनुष्यों से अधिक बढ़ गए होते। यीशु ने मनुष्यों को जितना अधिक प्रेम किया और उनके पापों को क्षमा करते हुए उन पर पर्याप्त दया और करुणामय प्रेम बरसाया, उतना ही अधिक उन्होंने यीशु द्वारा बचाए जाने और खोए हुए मेमने कहलाने की पात्रता हासिल की जिन्हें यीशु ने बड़ी कीमत देकर वापस खरीदा। शैतान इस काम में हस्तक्षेप नहीं कर सकता था, क्योंकि यीशु अपने अनुयायियों के साथ इस तरह व्यवहार करता था, जैसे कोई स्नेहमयी माता अपने शिशु को अपने आलिंगन में लेकर करती है। वह उन पर क्रोधित नहीं हुआ या उसने उनका तिरस्कार नहीं किया, बल्कि वह सांत्वना से भरा हुआ था; वह उनके बीच कभी भी क्रोध से नहीं भड़का; बल्कि उनके पाप सहन किए और उनकी मूर्खता और अज्ञानता के प्रति आँखें मूँद लीं, और यहाँ तक कहा कि "दूसरों को सत्तर गुना सात बार क्षमा करो।" इस प्रकार उसके हृदय ने दूसरों के हृदयों को रूपांतरित कर दिया, और केवल इसी तरह से लोगों ने उसकी सहनशीलता के माध्यम से अपने पापों के लिए क्षमा प्राप्त की।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'छुटकारे के युग के कार्य के पीछे की सच्ची कहानी' से उद्धृत

यद्यपि यीशु अपने देहधारण में पूरी तरह से भावनाहीन था, फिर भी उसने हमेशा अपने चेलों को दिलासा दी, उन्हें पोषण प्रदान किया, उनकी सहायता की और उन्हें सहारा दिया। उसने चाहे जितना भी अधिक कार्य किया या जितना भी अधिक दर्द सहा, फिर भी उसने कभी भी लोगों से बहुत ज़्यादा माँग नहीं की, बल्कि उनके पापों के प्रति हमेशा धैर्यवान और सहनशील रहा, इतना कि अनुग्रह के युग में लोग उसे स्नेह के साथ "प्यारा उद्धारकर्ता यीशु" कहते थे। उस समय के लोगों के लिए—सभी लोगों के लिए—यीशु के पास जो था और जो यीशु स्वयं था, वह था दया और करुणामय प्रेम। उसने कभी लोगों के अपराधों को स्मरण नहीं किया, और उनके प्रति उसका व्यवहार उनके अपराधों पर आधारित नहीं था। चूँकि वह एक भिन्न युग था, वह प्रायः लोगों को प्रचुर मात्रा में भोजन प्रदान करता था, ताकि वे पेट भरकर खा सकें। उसने अपने सभी अनुयायियों के साथ अनुग्रहपूर्वक व्यवहार किया, बीमारों को चंगा किया, दुष्टात्माओं को निकाला और मुर्दों को जिलाया। इस उद्देश्य से कि लोग उस पर विश्वास कर सकें और देख सकें कि जो कुछ भी उसने किया, सच्चाई और ईमानदारी से किया, उसने उन्हें यह दिखाते हुए कि उसके हाथों में मृतक भी पुनर्जीवित हो सकते हैं, एक सड़ती हुई लाश तक को पुनर्जीवित कर दिया। इस तरह से उसने खामोशी से सहा और उनके बीच छुटकारे का अपना कार्य किया। यहाँ तक कि सलीब पर चढ़ाए जाने से पहले ही यीशु मानवता के पाप अपने ऊपर ले चुका था और मानवजाति के लिए एक पाप-बलि बन गया था। यहाँ तक कि सलीब पर चढ़ाए जाने से पहले ही उसने मानवजाति को छुटकारा दिलाने के उद्देश्य से सलीब का मार्ग खोल दिया था। अंततः उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, उसने अपने आपको सलीब के वास्ते बलिदान कर दिया, और उसने अपनी सारी दया, करुणामय प्रेम और पवित्रता मानवजाति को प्रदान कर दी। वह मानवजाति के लिए हमेशा सहिष्णु रहा, उसने उससे कभी बदला नहीं लिया, बल्कि उसके पापों को क्षमा कर दिया, उसे पश्चात्ताप करने के लिए प्रोत्साहित किया, उसे धैर्य, सहनशीलता और प्रेम रखना, अपने पदचिह्नों का अनुसरण करना और सलीब के वास्ते स्वयं को बलिदान करना सिखाया। अपने भाई-बहनों के प्रति उसका प्रेम मरियम के प्रति प्रेम से भी बढ़कर था। उसने जो कार्य किया, उसमें उसने लोगों को चंगा करने और उनके भीतर की दुष्टात्माओं को निकालने को उसके सिद्धांत के रूप में अपनाया था, और यह सब कुछ उसके द्वारा छुटकारे के लिए था। वह जहाँ भी गया, उसने उन सभी के साथ अनुग्रहपूर्ण व्यवहार किया, जिन्होंने उसका अनुसरण किया। उसने ग़रीबों को अमीर बनाया, लँगड़ों को चलाया, अंधों को आँखें दीं, और बहरों को सुनने की शक्ति दी। यहाँ तक कि उसने सबसे अधम, बेसहारा लोगों, पापियों को भी अपने साथ एक ही मेज पर बैठने के लिए आमंत्रित किया, उनसे किनारा नहीं किया, हमेशा धैर्यवान रहा, बल्कि यहाँ तक कहा : जब चरवाहा सौ में से एक भेड़ खो देता है, तो उस एक खोई हुई भेड़ को ढूँढ़ने के लिए वह निन्यानवे भेड़ों को छोड़ देता है, और जब वह उसे खोज लेता है, तो वह बहुत आनंदित होता है। वह अपने अनुयायियों से ऐसे ही प्रेम करता था, जैसे भेड़ अपने मेमनों से करती है। यद्यपि वे मूर्ख और अज्ञानी थे, और उसकी नज़रों में पापी थे, और इतना ही नहीं, समाज के सबसे दीन-हीन सदस्य थे, फिर भी उसने उन पापियों को—उन मनुष्यों को, जिनका दूसरे तिरस्कार करते थे—अपनी आँख का तारा समझा। चूँकि उसने उनका पक्ष लिया, इसलिए उसने उनके लिए, वेदी पर बलि चढ़ाए गए मेमने के समान अपना जीवन त्याग दिया। वह उनके बीच इस तरह गया, मानो वह उनका दास हो, और उनके प्रति बिना शर्त समर्पण करते हुए उन्हें अपना उपयोग करने और अपनी बलि चढ़ाने दी। अपने अनुयायियों के लिए वह प्यारा उद्धारकर्ता यीशु था, परंतु ऊँचे मंच से लोगों को उपदेश देने वाले फरीसियों के प्रति उसने कोई दया और करुणामय प्रेम नहीं दिखाया, बल्कि घृणा और आक्रोश दिखाए। उसने फरीसियों के बीच अधिक काम नहीं किया, केवल कभी-कभार उन्हें उपदेश दिया और फटकारा; वह छुटकारे का कार्य करते हुए उनके बीच नहीं गया, न ही उसने उन्हें चिह्न और चमत्कार दिखाए। उसने अपनी समस्त दया और करुणामय प्रेम अपने अनुयायियों को प्रदान किया, सलीब पर चढ़ाए जाने के समय बिल्कुल अंत तक वह इन पापियों के वास्ते कष्ट सहता रहा, और जब तक उसने पूरी मानवता को छुटकारा नहीं दिला दिया, तब तक हर प्रकार का अपमान भुगतता रहा। कुल मिलाकर यही उसका कार्य था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'छुटकारे के युग के कार्य के पीछे की सच्ची कहानी' से उद्धृत

यीशु द्वारा छुटकारा दिलाए बिना मानवजाति हमेशा के लिए पाप में रह रही होती और पाप की संतान और दुष्टात्माओं की वंशज बन जाती। इस तरह चलते हुए समस्त पृथ्वी शैतान का निवास-स्थान, उसके रहने की जगह बन जाती। परंतु छुटकारे के कार्य के लिए मानवजाति के प्रति दया और करुणामय प्रेम दर्शाने की ज़रूरत थी; केवल इस तरीके से ही मानवजाति क्षमा प्राप्त कर सकती थी और अंतत: पूर्ण किए जाने और परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त किए जाने का अधिकार जीत सकती थी। कार्य के इस चरण के बिना छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना आगे न बढ़ पाती। यदि यीशु को सलीब पर न चढ़ाया गया होता, यदि उसने केवल लोगों को चंगा ही किया होता और उनकी दुष्टात्माओं को निकाला ही होता, तो लोगों को उनके पापों के लिए पूर्णतः क्षमा नहीं किया जा सकता था। जो साढ़े तीन साल यीशु ने पृथ्वी पर कार्य करते हुए व्यतीत किए, उनमें उसने छुटकारे के अपने कार्य में से केवल आधा ही किया था; फिर, सलीब पर चढ़ाए जाने और पापमय देह के समान बनकर, शैतान को सौंपे जाकर उसने सलीब पर चढ़ाए जाने का काम पूरा किया और मानवजाति की नियति वश में कर ली। केवल शैतान के हाथों में सौंपे जाने के बाद ही उसने मानवजाति को छुटकारा दिलाया। साढ़े तैंतीस सालों तक उसने पृथ्वी पर कष्ट सहा; उसका उपहास उड़ाया गया, उसकी बदनामी की गई और उसे त्याग दिया गया, यहाँ तक कि उसके पास सिर रखने की भी जगह नहीं थी, आराम करने की कोई जगह नहीं थी और बाद में उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया, उसका संपूर्ण अस्तित्व—एक निष्कलंक और निर्दोष शरीर—सलीब पर चढ़ा दिया गया। उसने हर संभव कष्ट सहे। जो सत्ता में थे, उन्होंने उसका मज़ाक उड़ाया और उसे चाबुक मारे, यहाँ तक कि सैनिकों ने उसके मुँह पर थूक भी दिया; फिर भी वह चुप रहा और अंत तक सहता रहा, बिना किसी शर्त के समर्पण करते हुए उसने मृत्यु के क्षण तक कष्ट सहा, जिसके पश्चात उसने पूरी मानवजाति को छुटकारा दिला दिया। केवल तभी उसे आराम करने की अनुमति दी गई। यीशु ने जो कार्य किया, वह केवल अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व करता है; वह व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व नहीं करता, न ही वह अंत के दिनों के कार्य की जगह ले सकता है। यही अनुग्रह के युग, दूसरे युग, जिससे मानवजाति गुज़री है—छुटकारे के युग—में यीशु के कार्य का सार है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'छुटकारे के युग के कार्य के पीछे की सच्ची कहानी' से उद्धृत

(3) राज्य के युग में परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य और अर्थ

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

जब यीशु मनुष्य के संसार में आया, तो उसने अनुग्रह के युग में प्रवेश कराया और व्यवस्था का युग समाप्त किया। अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर एक बार फिर देहधारी बन गया, और इस देहधारण के साथ उसने अनुग्रह का युग समाप्त किया और राज्य के युग में प्रवेश कराया। उन सबको, जो परमेश्वर के दूसरे देहधारण को स्वीकार करने में सक्षम हैं, राज्य के युग में ले जाया जाएगा, और इससे भी बढ़कर वे व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर का मार्गदर्शन स्वीकार करने में सक्षम होंगे। यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति की मुक्ति का कार्य पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह से बचाने के लिए यीशु को न केवल पाप-बलि बनने और मनुष्य के पाप वहन करने की आवश्यकता थी, बल्कि मनुष्य को उसके शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए स्वभाव से मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करने की आवश्यकता थी। और इसलिए, अब जबकि मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिया गया है, परमेश्वर मनुष्य को नए युग में ले जाने के लिए वापस देह में लौट आया है, और उसने ताड़ना एवं न्याय का कार्य आरंभ कर दिया है। यह कार्य मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में ले गया है। वे सब, जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना' से उद्धृत

मनुष्य को छुटकारा दिए जाने से पहले शैतान के बहुत-से ज़हर उसमें पहले ही डाल दिए गए थे, और हज़ारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद मनुष्य के भीतर ऐसा स्थापित स्वभाव है, जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया है, तो यह छुटकारे के उस मामले से बढ़कर कुछ नहीं है, जिसमें मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति समाप्त नहीं की गई है। मनुष्य को, जो कि इतना अशुद्ध है, परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। आज किया जाने वाला समस्त कार्य इसलिए है, ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; वचन के द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से, और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से भी, मनुष्य अपनी भ्रष्टता दूर कर सकता है और शुद्ध बनाया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाय यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है। वास्तव में यह चरण विजय का और साथ ही उद्धार के कार्य का दूसरा चरण है। वचन द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने की स्थिति में पहुँचता है, और शुद्ध करने, न्याय करने और प्रकट करने के लिए वचन के उपयोग के माध्यम से मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताओं, धारणाओं, प्रयोजनों और व्यक्तिगत आकांक्षाओं को पूरी तरह से प्रकट किया जाता है। क्योंकि मनुष्य को छुटकारा दिए जाने और उसके पाप क्षमा किए जाने को केवल इतना ही माना जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता और उसके साथ अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। किंतु जब मनुष्य को, जो कि देह में रहता है, पाप से मुक्त नहीं किया गया है, तो वह निरंतर अपना भ्रष्ट शैतानी स्वभाव प्रकट करते हुए केवल पाप करता रह सकता है। यही वह जीवन है, जो मनुष्य जीता है—पाप करने और क्षमा किए जाने का एक अंतहीन चक्र। अधिकतर मनुष्य दिन में सिर्फ इसलिए पाप करते हैं, ताकि शाम को उन्हें स्वीकार कर सकें। इस प्रकार, भले ही पापबलि मनुष्य के लिए हमेशा के लिए प्रभावी हो, फिर भी वह मनुष्य को पाप से बचाने में सक्षम नहीं होगी। उद्धार का केवल आधा कार्य ही पूरा किया गया है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव है। उदाहरण के लिए, जब लोगों को पता चला कि वे मोआब के वंशज हैं, तो उन्होंने शिकायत के बोल बोलने शुरू कर दिए, जीवन का अनुसरण करना छोड़ दिया, और पूरी तरह से नकारात्मक हो गए। क्या यह इस बात को नहीं दर्शाता कि मानवजाति अभी भी परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन पूरी तरह से समर्पित होने में असमर्थ है? क्या यह ठीक उनका भ्रष्ट शैतानी स्वभाव नहीं है? जब तुम्हें ताड़ना का भागी नहीं बनाया गया था, तो तुम्हारे हाथ अन्य सबके हाथों से ऊँचे उठे हुए थे, यहाँ तक कि यीशु के हाथों से भी ऊँचे। और तुम ऊँची आवाज़ में पुकार रहे थे : "परमेश्वर के प्रिय पुत्र बनो! परमेश्वर के अंतरंग बनो! हम मर जाएँगे, पर शैतान के आगे नहीं झुकेंगे! बूढ़े शैतान के विरुद्ध विद्रोह करो! बड़े लाल अजगर के विरुद्ध विद्रोह करो! बड़ा लाल अजगर दीन-हीन होकर सत्ता से गिर जाए! परमेश्वर हमें पूरा करे!" तुम्हारी पुकार अन्य सबसे ऊँची थीं। किंतु फिर ताड़ना का समय आया और एक बार फिर मनुष्यों का भ्रष्ट स्वभाव प्रकट हुआ। फिर उनकी पुकार बंद हो गई और उनका संकल्प टूट गया। यही मनुष्य की भ्रष्टता है; यह पाप से ज्यादा गहरी दौड़ रही है, इसे शैतान द्वारा स्थापित किया गया है और यह मनुष्य के भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए है। मनुष्य के लिए अपने पापों से अवगत होना आसान नहीं है; उसके पास अपनी गहरी जमी हुई प्रकृति को पहचानने का कोई उपाय नहीं है, और उसे यह परिणाम प्राप्त करने के लिए वचन के न्याय पर भरोसा करना चाहिए। केवल इसी प्रकार से मनुष्य इस बिंदु से आगे धीरे-धीरे बदल सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)' से उद्धृत

अंत के दिनों का कार्य वचन बोलना है। वचनों के माध्यम से मनुष्य में बड़े परिवर्तन किए जा सकते हैं। इन वचनों को स्वीकार करने पर लोगों में अब जो परिवर्तन हुए हैं, वे उन परिवर्तनों से बहुत अधिक बड़े हैं, जो चिह्न और चमत्कार स्वीकार करने पर अनुग्रह के युग में लोगों में हुए थे। क्योंकि अनुग्रह के युग में हाथ रखकर और प्रार्थना करके दुष्टात्माओं को मनुष्य से निकाला जाता था, परंतु मनुष्य के भीतर का भ्रष्ट स्वभाव तब भी बना रहता था। मनुष्य को उसकी बीमारी से चंगा कर दिया जाता था और उसके पाप क्षमा कर दिए जाते थे, किंतु जहाँ तक इस बात का संबंध था कि मनुष्य को उसके भीतर के शैतानी स्वभावों से कैसे मुक्त किया जाए, तो यह कार्य अभी किया जाना बाकी था। मनुष्य को उसके विश्वास के कारण केवल बचाया गया था और उसके पाप क्षमा किए गए थे, किंतु उसका पापी स्वभाव उसमें से नहीं निकाला गया था और वह अभी भी उसके अंदर बना हुआ था। मनुष्य के पाप देहधारी परमेश्वर के माध्यम से क्षमा किए गए थे, परंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य के भीतर कोई पाप नहीं रह गया था। पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए जा सकते हैं, परंतु मनुष्य इस समस्या को हल करने में पूरी तरह असमर्थ रहा है कि वह आगे कैसे पाप न करे और कैसे उसका भ्रष्ट पापी स्वभाव पूरी तरह से मिटाया और रूपांतरित किया जा सकता है। मनुष्य के पाप क्षमा कर दिए गए थे और ऐसा परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य की वजह से हुआ था, परंतु मनुष्य अपने पुराने, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीता रहा। इसलिए मनुष्य को उसके भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से पूरी तरह से बचाया जाना आवश्यक है, ताकि उसका पापी स्वभाव पूरी तरह से मिटाया जा सके और वह फिर कभी विकसित न हो पाए, जिससे मनुष्य का स्वभाव रूपांतरित होने में सक्षम हो सके। इसके लिए मनुष्य को जीवन में उन्नति के मार्ग को समझना होगा, जीवन के मार्ग को समझना होगा, और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के मार्ग को समझना होगा। साथ ही, इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता होगी, ताकि उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल सके और वह प्रकाश की चमक में जी सके, ताकि वह जो कुछ भी करे, वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हो, ताकि वह अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर कर सके और शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो सके, और इसके परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह से ऊपर उठ सके। केवल तभी मनुष्य पूर्ण उद्धार प्राप्त करेगा। जिस समय यीशु अपना कार्य कर रहा था, उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान तब भी अनिश्चित और अस्पष्ट था। मनुष्य ने हमेशा उसे दाऊद का पुत्र माना, और उसके एक महान नबी और उदार प्रभु होने की घोषणा की, जिसने मनुष्य को पापों से छुटकारा दिलाया। कुछ लोग अपने विश्वास के बल पर केवल उसके वस्त्र के किनारे को छूकर ही चंगे हो गए; अंधे देख सकते थे, यहाँ तक कि मृतक भी जिलाए जा सकते थे। कितु मनुष्य अपने भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए भ्रष्ट शैतानी स्वभाव का पता लगाने में असमर्थ रहा, न ही वह यह जानता था कि उसे कैसे दूर किया जाए। मनुष्य ने बहुत अनुग्रह प्राप्त किया, जैसे देह की शांति और खुशी, एक व्यक्ति के विश्वास करने पर पूरे परिवार को आशीष, बीमारी से चंगाई, इत्यादि। शेष मनुष्य के भले कर्म और उसकी ईश्वर के अनुरूप दिखावट थी; यदि कोई इनके आधार पर जी सकता था, तो उसे एक स्वीकार्य विश्वासी माना जाता था। केवल ऐसे विश्वासी ही मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश कर सकते थे, जिसका अर्थ था कि उन्हें बचा लिया गया है। परंतु अपने जीवन-काल में इन लोगों ने जीवन के मार्ग को बिलकुल नहीं समझा था। उन्होंने सिर्फ इतना किया कि अपना स्वभाव बदलने के किसी मार्ग को अपनाए बिना बस एक निरंतर चक्र में पाप किए और उन्हें स्वीकार कर लिया : अनुग्रह के युग में मनुष्य की स्थिति ऐसी थी। क्या मनुष्य ने पूर्ण उद्धार पा लिया है? नहीं! इसलिए, उस चरण का कार्य पूरा हो जाने के बाद भी न्याय और ताड़ना का कार्य बाकी रह गया था। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध बनाने और उसके परिणामस्वरूप उसे अनुसरण हेतु एक मार्ग प्रदान करने के लिए है। यह चरण फलदायक या अर्थपूर्ण न होता, यदि यह दुष्टात्माओं को निकालने के साथ जारी रहता, क्योंकि यह मनुष्य की पापपूर्ण प्रकृति को दूर करने में असफल रहता और मनुष्य केवल अपने पापों की क्षमा पर आकर रुक जाता। पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए गए हैं, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले ही पूरा हो चुका है और परमेश्वर ने शैतान को जीत लिया है। किंतु मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उसके भीतर बना रहने के कारण वह अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है, और परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करने के लिए वचन का उपयोग करता है और उससे सही मार्ग के अनुसार अभ्यास करवाता है। यह चरण पिछले चरण से अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक लाभदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया होने में सक्षम बनाता है; कार्य का यह चरण कहीं अधिक विस्तृत है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूरा किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन-योजना का पूर्णतः समापन किया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)' से उद्धृत

अंत के दिनों का कार्य सभी को उनके स्वभाव के आधार पर पृथक करना और परमेश्वर की प्रबंधन योजना का समापन करना है, क्योंकि समय निकट है और परमेश्वर का दिन आ गया है। परमेश्वर उन सभी को, जो उसके राज्य में प्रवेश करते हैं—वे सभी, जो बिलकुल अंत तक उसके वफादार रहे हैं—स्वयं परमेश्वर के युग में ले जाता है। फिर भी, स्वयं परमेश्वर के युग के आगमन से पूर्व, परमेश्वर का कार्य मनुष्य के कर्मों को देखना या मनुष्य के जीवन की जाँच-पड़ताल करना नहीं, बल्कि उसकी अवज्ञा का न्याय करना है, क्योंकि परमेश्वर उन सभी को शुद्ध करेगा, जो उसके सिंहासन के सामने आते हैं। वे सभी, जिन्होंने आज के दिन तक परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण किया है, वे लोग हैं, जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने आते हैं, और ऐसा होने से, हर वह व्यक्ति, जो परमेश्वर के कार्य को उसके अंतिम चरण में स्वीकार करता है, परमेश्वर द्वारा शुद्ध किए जाने लायक है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के कार्य को उसके अंतिम चरण में स्वीकार करने वाला हर व्यक्ति परमेश्वर के न्याय का पात्र है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है' से उद्धृत

अंत के दिनों में मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति समर्पण के लिए पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है' से उद्धृत

परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सके और उसकी गवाही दे सके। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव का परमेश्वर द्वारा न्याय के बिना, संभवतः मनुष्य अपने धार्मिक स्वभाव को नहीं जान सकता था, जो कोई अपराध नहीं करता और न वह परमेश्वर के अपने पुराने ज्ञान को एक नए रूप में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है, इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के ज़रिए, मनुष्य को परमेश्वर के ज्ञान तक पहुँचने, उसको स्वभाव में रूपांतरित होने और परमेश्वर की ज़बर्दस्त गवाही देने लायक बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का रूपांतरण परमेश्वर के कई विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज़रिए प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में ऐसे बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसके पास जाने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में रूपांतरण दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह और ऐसा व्यक्ति बन गया है, जो परमेश्वर के दिल के क़रीब है। आज देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर अपना कार्य करने के लिए आया है और वह अपेक्षा रखता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति आज्ञाकारी हो, उसके लिए उसकी गवाही दे—उसके व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जाने, उसके उन सभी वचनों और कार्य का पालन करे, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं और उस समस्त कार्य की गवाही दे, जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और साथ ही सभी कर्मों की जिन्हें वह मनुष्य को जीतने के लिए कार्यान्वित करता है। जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही अचूक और वास्तविक होती है और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्‍वर अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने उसके न्याय और उसकी ताड़ना, व्यवहार और काट-छाँट से गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है और इसी तरह वह अपनी गवाही देने के लिए उन लोगों का भी उपयोग करता है, जिनका स्वभाव बदल गया है और जिन्होंने इस प्रकार उसके आशीर्वाद प्राप्त कर लिए हैं। उसे मनुष्य की आवश्यकता नहीं, जो अपने मुँह से उसकी स्तुति करे, न ही उसे शैतान की किस्म के लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जिन्हें उसने नहीं बचाया है। केवल वो जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही देने योग्य हैं और केवल वो जिनके स्वभाव को रूपांतरित कर दिया गया है, उसकी गवाही देने योग्य हैं। परमेश्वर जानबूझकर मनुष्य को अपने नाम को शर्मिंदा नहीं करने देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं' से उद्धृत

राज्य के युग में, परमेश्वर नए युग की शुरुआत करने, अपने कार्य के साधन बदलने और संपूर्ण युग के लिए काम करने के लिए अपने वचन का उपयोग करता है। वचन के युग में यही वह सिद्धांत है जिसके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। वह देहधारी हुआ ताकि विभिन्न दृष्टिकोण से बोल सके, मनुष्य वास्तव में परमेश्वर को देख सके, जो देह में प्रकट होने वाला वचन है, उसकी बुद्धि और चमत्कार को जान सके। इस तरह का कार्य मनुष्य को जीतने, उन्हें पूर्ण बनाने और ख़त्म करने के लक्ष्यों को बेहतर ढंग से हासिल करने के लिए किया जाता है। वचन के युग में वचन के उपयोग का यही वास्तविक अर्थ है। वचन के द्वारा परमेश्वर के कार्यों को, परमेश्वर के स्वभाव को मनुष्य के सार और इस राज्य में प्रवेश करने के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिए, यह जाना जा सकता है। वचन के युग में परमेश्वर जिन सभी कार्यों को करना चाहता है, वे वचन के द्वारा संपन्न होते हैं। वचन के द्वारा ही मनुष्य की असलियत का पता चलता है, उसे नष्ट किया जाता है और परखा जाता है। मनुष्य ने वचन देखा है, सुना है और वचन के अस्तित्व को जाना है। इसके परिणामस्वरूप वह परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करता है, मनुष्य परमेश्वर के सर्वशक्तिमान होने और उसकी बुद्धि पर, साथ ही साथ मनुष्य के लिए परमेश्वर के हृदय के प्रेम और मनुष्य को बचाने की उसकी इच्छा पर विश्वास करता है। यद्यपि "वचन" शब्द सरल और साधारण है, देहधारी परमेश्वर के मुख से निकला वचन संपूर्ण ब्रह्माण्ड को झकझोरता है; और उसका वचन मनुष्य के हृदय को रूपांतरित करता है, मनुष्य के सभी विचारों और पुराने स्वभाव और समस्त संसार के पुराने स्वरूप में परिवर्तन लाता है। युगों-युगों से केवल आज के दिन का परमेश्वर ही इस प्रकार से कार्य करता है और केवल वही इस प्रकार से बोलता और मनुष्य का उद्धार करता है। इसके बाद मनुष्य वचन के मार्गदर्शन में, उसकी चरवाही में और उससे प्राप्त आपूर्ति में जीवन जीता है। वह वचन के संसार में जीता है, परमेश्वर के वचन के कोप और आशीषों के बीच जीता है, तथा और भी अधिक लोग अब परमेश्वर के वचन के न्याय और ताड़ना के अधीन जीने लगे हैं। ये वचन और यह कार्य सब कुछ मनुष्य के उद्धार, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने और पुरानी सृष्टि के संसार के मूल स्वरूप को बदलने के लिए है। परमेश्वर ने संसार की सृष्टि वचन से की, वह समस्त ब्रह्माण्ड में मनुष्य की अगुवाई वचन के द्वारा करता है, उन्हें वचन के द्वारा जीतता और उनका उद्धार करता है। अंत में, वह इसी वचन के द्वारा समस्त प्राचीन जगत का अंत कर देगा। तभी उसके प्रबंधन की योजना पूरी होगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

अंत के दिनों में परमेश्वर वचन का उपयोग मुख्यत: मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करता है। वह मनुष्य का दमन करने या उन्हें कायल करने के लिए संकेतों और चमत्कारों का उपयोग नहीं करता; यह परमेश्वर के सामर्थ्य को स्पष्ट नहीं कर सकता। यदि परमेश्वर केवल संकेत और चमत्कार दिखाता, तो परमेश्वर की वास्तविकता स्पष्ट करना असंभव होता, और इस तरह मनुष्य को पूर्ण बनाना भी असंभव होता। परमेश्वर संकेतों और चमत्कारों से मनुष्य को पूर्ण नहीं बनाता, अपितु उसे सींचने और उसकी चरवाही करने के लिए वचन का उपयोग करता है, जिसके बाद मनुष्य की पूर्ण आज्ञाकारिता हासिल होती है और मनुष्य को परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त होता है। यही उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य और बोले जाने वाले वचनों का उद्देश्य है। परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए संकेत एवं चमत्कार दिखाने की विधि का उपयोग नहीं करता—वह मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचनों और कार्य की कई भिन्न विधियों का उपयोग करता है। चाहे वह शुद्धिकरण, व्यवहार, काँट-छाँट या वचनों का पोषण हो, मनुष्य को पूर्ण बनाने और उसे परमेश्वर के कार्य, उसकी बुद्धि और चमत्कारिकता का और अधिक ज्ञान देने के लिए परमेश्वर कई भिन्न-भिन्न परिप्रेक्ष्यों से बोलता है। ... मैं पहले कह चुका हूँ कि पूर्व से विजेताओं का एक समूह प्राप्त किया जा रहा है, ऐसे विजेताओं का, जो भारी क्लेश के बीच से आते हैं। इन वचनों का क्या अर्थ है? इनका अर्थ है कि केवल इन प्राप्त किए गए लोगों ने ही न्याय और ताड़ना, और व्यवहार और काँट-छाँट, और सभी प्रकार के शुद्धिकरण से गुजरने के बाद वास्तव में आज्ञापालन किया। इन लोगों का विश्वास अस्पष्ट और अमूर्त नहीं, बल्कि वास्तविक है। उन्होंने कोई संकेत और चमत्कार, या अचंभे नहीं देखे हैं; वे गूढ़ शाब्दिक अर्थों और सिद्धांतों या गहन अंर्तदृष्टियों की बात नहीं करते; इसके बजाय उनके पास वास्तविकता और परमेश्वर के वचन और परमेश्वर की वास्तविकता का सच्चा ज्ञान है। क्या ऐसा समूह परमेश्वर के सामर्थ्य को स्पष्ट करने में अधिक सक्षम नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के वचन के द्वारा सब-कुछ प्राप्त हो जाता है' से उद्धृत

विजय का कार्य अन्तिम चरण क्यों है? क्या यह इस बात को प्रकट करने के लिए नहीं है कि मनुष्य के प्रत्येक वर्ग का अन्त कैसा होगा? क्या यह प्रत्येक व्यक्ति को, ताड़ना और न्याय के विजय कार्य के दौरान, अपना असली रंग दिखाने और फिर उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत करने के लिए नहीं है? यह कहने के बजाय कि यह मनुष्यजाति को जीतना है, यह कहना बेहतर होगा कि यह उस बात को दर्शाना है कि व्यक्ति के प्रत्येक वर्ग का अन्त किस प्रकार का होगा। यह लोगों के पापों का न्याय करने के बारे में है और फिर मनुष्यों के विभिन्न वर्गों को उजागर करना और इस प्रकार यह निर्णय करना है कि वे दुष्ट हैं या धार्मिक हैं। विजय-कार्य के पश्चात धार्मिक को पुरस्कृत करने और दुष्ट को दण्ड देने का कार्य आता है। जो लोग पूर्णत: आज्ञापालन करते हैं अर्थात जो पूर्ण रूप से जीत लिए गए हैं, उन्हें सम्पूर्ण कायनात में परमेश्वर के कार्य को फैलाने के अगले चरण में रखा जाएगा; जिन्हें जीता नहीं गया उनको अन्धकार में रखा जाएगा और उन पर महाविपत्ति आएगी। इस प्रकार मनुष्य को उसकी किस्म के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, दुष्कर्म करने वालों को दुष्टों के साथ समूहित किया जाएगा और उन्हें फिर कभी सूर्य का प्रकाश नसीब नहीं होगा, और धर्मियों को रोशनी प्राप्त करने और सर्वदा रोशनी में रहने के लिए भले लोगों के साथ रखा जाएगा। सभी बातों का अन्त निकट है; मनुष्य को साफ तौर पर उसका अन्त दिखा दिया गया है, और सभी वस्तुओं का वर्गीकरण उनकी किस्म के अनुसार किया जाएगा। तब, लोग इस तरह वर्गीकरण किए जाने की पीड़ा से किस प्रकार बच सकते हैं? जब सभी चीज़ों का अन्त निकट होता है तो मनुष्य के प्रत्येक वर्ग के भिन्न अन्तों को प्रकट कर दिया जाता है, और यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड (इसमें समस्त विजय-कार्य सम्मिलित है जो वर्तमान कार्य से आरम्भ होता है) को जीतने के कार्य के दौरान किया जाता है। समस्त मनुष्यजाति के अन्त का प्रकटीकरण, न्याय के सिंहासन के सामने, ताड़ना के दौरान और अंत के दिनों के विजय-कार्य के दौरान किया जाता है। ... विजय के अन्तिम चरण का उद्देश्य लोगों को बचाना और उनके अन्त को प्रकट करना है। यह न्याय के द्वारा लोगों की विकृति को भी प्रकट करना है और इस प्रकार उनसे पश्चाताप करवाना, उन्हें ऊपर उठाना, जीवन और मानवीय जीवन के सही मार्ग की खोज करवाना है। यह सुन्न और मन्दबुद्धि लोगों के हृदयों को जगाना और न्याय के द्वारा उनके भीतरी विद्रोह को प्रदर्शित करना है। परन्तु, यदि लोग अभी भी पश्चाताप करने के अयोग्य हैं, अभी भी मानव जीवन के सही मार्ग को खोजने में असमर्थ हैं और अपनी भ्रष्टताओं को दूर करने के योग्य नहीं हैं, तो उनका उद्धार नहीं हो सकता, और वे शैतान द्वारा निगल लिए जाएँगे। परमेश्वर के विजय-कार्य के ये मायने हैं : लोगों को बचाना और उनका अन्त भी दिखाना। अच्छे अन्त, बुरे अन्त—वे सभी विजय-कार्य के द्वारा प्रकट किए जाते हैं। लोग बचाए जाएँगे या शापित होंगे, यह सब विजय-कार्य के दौरान प्रकट किया जाता है।

अंत के दिन वे होते हैं जब सभी वस्तुएँ जीतने के द्वारा किस्म के अनुसार वर्गीकृत की जाएँगी। जीतना, अंत के दिनों का कार्य है; दूसरे शब्दों में, प्रत्येक व्यक्ति के पापों का न्याय करना, अंत के दिनों का कार्य है। अन्यथा, लोगों का वर्गीकरण किस प्रकार किया जाएगा? तुम सब में किया जाने वाला वर्गीकरण का कार्य सम्पूर्ण ब्रह्मांड में ऐसे कार्य का आरम्भ है। इसके पश्चात, समस्त देशों को और सभी लोगों में भी विजय-कार्य किया जाएगा। इसका अर्थ यह है कि सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति किस्म के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, वह न्याय किए जाने के लिए न्याय के सिंहासन के समक्ष आएगा। कोई भी व्यक्ति और कोई भी वस्तु इस ताड़ना और न्याय को सहने से बच नहीं सकती और न ही कोई व्यक्ति और वस्तु ऐसी है जिसका किस्म के अनुसार वर्गीकरण नहीं किया जाता; प्रत्येक को वर्गीकृत किया जाएगा, क्योंकि समस्त वस्तुओं का अन्त निकट आ रहा है और जो भी स्वर्ग में और पृथ्वी पर है, वह अपने अंत पर पहुँच गया है। मनुष्य मानवीय अस्तित्व के अंतिम दिनों से कैसे बच सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य की आंतरिक सच्चाई (1)' से उद्धृत

अंत के दिनों का चरण, जिसमें मनुष्य को जीता जाना है, शैतान के साथ युद्ध का अंतिम चरण है, और यह शैतान के अधिकार-क्षेत्र से मनुष्य के संपूर्ण उद्धार का कार्य भी है। मनुष्य पर विजय का आंतरिक अर्थ मनुष्य पर विजय पाने के बाद शैतान के मूर्त रूप—मनुष्य, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है—का अपने जीते जाने के बाद सृजनकर्ता के पास वापस लौटना है, जिसके माध्यम से वह शैतान को छोड़ देगा और पूरी तरह से परमेश्वर के पास वापस लौट जाएगा। इस तरह मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। और इसलिए, विजय का कार्य शैतान के विरुद्ध युद्ध में अंतिम कार्य है, और शैतान की पराजय के वास्ते परमेश्वर के प्रबंधन में अंतिम चरण है। इस कार्य के बिना मनुष्य का संपूर्ण उद्धार अंततः असंभव होगा, शैतान की संपूर्ण पराजय भी असंभव होगी, और मानव-जाति कभी भी अपनी अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करने या शैतान के प्रभाव से छुटकारा पाने में सक्षम नहीं होगी। परिणामस्वरूप, शैतान के साथ युद्ध की समाप्ति से पहले मनुष्य के उद्धार का कार्य समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि परमेश्वर के प्रबधंन के कार्य का केंद्रीय भाग मानव-जाति के उद्धार के वास्ते है। आदिम मानव-जाति परमेश्वर के हाथों में थी, किंतु शैतान के प्रलोभन और भ्रष्टता की वजह से, मनुष्य को शैतान द्वारा बाँध लिया गया और वह इस दुष्ट के हाथों में पड़ गया। इस प्रकार, परमेश्वर के प्रबधंन-कार्य में शैतान पराजित किए जाने का लक्ष्य बन गया। चूँकि शैतान ने मनुष्य पर कब्ज़ा कर लिया था, और चूँकि मनुष्य वह पूँजी है जिसे परमेश्वर संपूर्ण प्रबंधन पूरा करने के लिए इस्तेमाल करता है, इसलिए यदि मनुष्य को बचाया जाना है, तो उसे शैतान के हाथों से वापस छीनना होगा, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य को शैतान द्वारा बंदी बना लिए जाने के बाद उसे वापस लेना होगा। इस प्रकार, शैतान को मनुष्य के पुराने स्वभाव में बदलावों के माध्यम से पराजित किया जाना चाहिए, ऐसे बदलाव, जो मनुष्य की मूल विवेक-बुद्धि को बहाल करते हैं। और इस तरह से मनुष्य को, जिसे बंदी बना लिया गया था, शैतान के हाथों से वापस छीना जा सकता है। यदि मनुष्य शैतान के प्रभाव और बंधन से मुक्त हो जाता है, तो शैतान शर्मिंदा हो जाएगा, मनुष्य को अंततः वापस ले लिया जाएगा, और शैतान को हरा दिया जाएगा। और चूँकि मनुष्य को शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त किया जा चुका है, इसलिए एक बार जब यह युद्ध समाप्त हो जाएगा, तो मनुष्य इस संपूर्ण युद्ध में जीत के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ लाभ बन जाएगा, और शैतान वह लक्ष्य बन जाएगा जिसे दंडित किया जाएगा, जिसके पश्चात् मानव-जाति के उद्धार का संपूर्ण कार्य पूरा कर लिया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना' से उद्धृत

जो अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य के दौरान अडिग रहने में समर्थ हैं—यानी, शुद्धिकरण के अंतिम कार्य के दौरान—वे लोग होंगे, जो परमेश्वर के साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे; वैसे, वे सभी जो विश्राम में प्रवेश करेंगे, शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके होंगे और परमेश्वर के शुद्धिकरण के अंतिम कार्य से गुज़रने के बाद उसके द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे। ये लोग, जो अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे, अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के कार्य का मूलभूत उद्देश्य मानवता को शुद्ध करना है और उन्हें उनके अंतिम विश्राम के लिए तैयार करना है; इस शुद्धिकरण के बिना संपूर्ण मानवता अपने प्रकार के मुताबिक़ विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत नहीं की जा सकेगी, या विश्राम में प्रवेश करने में असमर्थ होगी। यह कार्य ही मानवता के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। केवल परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण का कार्य ही मनुष्यों को उनकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा और केवल उसकी ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानवता के उन अवज्ञाकारी तत्वों को सामने लाएगा, और इस तरह बचाये जा सकने वालों से बचाए न जा सकने वालों को अलग करेगा, और जो बचेंगे उनसे उन्हें अलग करेगा जो नहीं बचेंगे। इस कार्य के समाप्त होने पर जिन्हें बचने की अनुमति होगी, वे सभी शुद्ध किए जाएँगे, और मानवता की उच्चतर दशा में प्रवेश करेंगे जहाँ वे पृथ्वी पर और अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का आनंद उठाएंगे; दूसरे शब्दों में, वे अपने मानवीय विश्राम का दिन शुरू करेंगे और परमेश्वर के साथ रहेंगे। जिन लोगों को रहने की अनुमति नहीं है, उनकी ताड़ना और उनका न्याय किया गया है, जिससे उनके असली रूप पूरी तरह सामने आ जाएँगे; उसके बाद वे सब के सब नष्ट कर दिए जाएँगे और शैतान के समान, उन्हें पृथ्वी पर रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवता में इस प्रकार के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ऐसे लोग अंतिम विश्राम की धरती पर प्रवेश करने के योग्य नहीं हैं, न ही ये उस विश्राम के दिन में प्रवेश के योग्य हैं, जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे क्योंकि वे दंड के लायक हैं और दुष्ट, अधार्मिक लोग हैं। उन्हें एक बार छुटकारा दिया गया था और उन्हें न्याय और ताड़ना भी दी गई थी; उन्होंने एक बार परमेश्वर को सेवा भी दी थी। हालाँकि जब अंतिम दिन आएगा, तो भी उन्हें अपनी दुष्टता के कारण और अवज्ञा एवं छुटकारा न पाने की योग्यता के परिणामस्वरूप हटाया और नष्ट कर दिया जाएगा; वे भविष्य के संसार में अब कभी अस्तित्व में नहीं आएँगे और कभी भविष्य की मानवजाति के बीच नहीं रहेंगे। जैसे ही मानवता के पवित्र जन विश्राम में प्रवेश करेंगे, चाहे वे मृत लोगों की आत्मा हों या अभी भी देह में रह रहे लोग, सभी बुराई करने वाले और वे सभी जिन्हें बचाया नहीं गया है, नष्ट कर दिए जाएँगे। जहाँ तक इन बुरा करने वाली आत्माओं और मनुष्यों, या धार्मिक लोगों की आत्माओं और धार्मिकता करने वालों की बात है, चाहे वे जिस युग में हों, बुराई करने वाले सभी अंततः नष्ट हो जाएँगे और जो लोग धार्मिक हैं, वे बच जाएँगे। किसी व्यक्ति या आत्मा को उद्धार प्राप्त होगा या नहीं, यह पूर्णतः अंत के युग के समय के कार्य के आधार पर तय नहीं होगा; बल्कि इस आधार पर निर्धारित किया जाता है कि क्या उन्होंने परमेश्वर का प्रतिरोध किया था, या वे परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी रहे हैं। पिछले युगों में जिन लोगों ने बुरा किया और जो उद्धार नहीं प्राप्त कर पाए, निःसंदेह वे दंड के भागी बनेंगे और वे जो इस युग में बुरा करते हैं और उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते, तो वे भी निश्चित रूप से दंड के भागी बनेंगे। मनुष्य अच्छे और बुरे के आधार पर पृथक किए जाते हैं, युग के आधार पर नहीं। एक बार इस प्रकार वर्गीकृत किए जाने पर, उन्हें तुरंत दंड या पुरस्कार नहीं दिया जाएगा; बल्कि, परमेश्वर अंत के दिनों में अपने विजय के कार्य को समाप्त करने के बाद ही बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने का अपना कार्य करेगा। वास्तव में, वह मनुष्यों को तबसे अच्छे और बुरे में पृथक कर रहा है, जबसे उसने उनके बीच अपना कार्य आरंभ किया था। बात बस इतनी है कि वह धार्मिकों को पुरस्कृत और दुष्टों को दंड देने का कार्य केवल तब करेगा, जब उसका कार्य समाप्त हो जाएगा; ऐसा नहीं है कि वह अपने कार्य के पूरा होने पर उन्हें श्रेणियों में पृथक करेगा और फिर तुरंत दुष्टों को दंडित करना और धार्मिकों को पुरस्कृत करना शुरू करेगा। बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने के परमेश्वर के अंतिम कार्य के पीछे का पूरा उद्देश्य, सभी मनुष्यों को पूरी तरह शुद्ध करना है, ताकि वह पूरी तरह पवित्र मानवता को शाश्वत विश्राम में ला सके। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण है; यह उसके समस्त प्रबंधन-कार्य का अंतिम चरण है। यदि परमेश्वर ने दुष्टों का नाश नहीं किया होता, बल्कि उन्हें बचा रहने देता तो प्रत्येक मनुष्य अभी भी विश्राम में प्रवेश करने में असमर्थ होता और परमेश्वर समस्त मानवता को एक बेहतर क्षेत्र में नहीं ला पाता। ऐसा कार्य पूर्ण नहीं होता। जब वह अपना कार्य समाप्त कर लेगा, तो संपूर्ण मानवता पूर्णतः पवित्र हो जाएगी। केवल इसी तरीक़े से परमेश्वर शांतिपूर्वक विश्राम में रह सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे' से उद्धृत

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