मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 11. देहधारण के महत्व का दूसरा पहलू

देहधारी परमेश्वर की साधारणता और सामान्यता का कारण क्या है? क्या यह सिर्फ इतना ही है कि वह काम करने में सक्षम है? क्या यह सिर्फ यह साबित करने के लिए है कि वह मसीह है? उसकी व्यावहारिक साधारणता और सामान्यता का क्या महत्व है? कुछ लोग कहते हैं कि देहधारी परमेश्‍वर निश्चित रूप से एक साधारण और सामान्य देह का अवश्य होना चाहिए। क्या इसका मतलब केवल यही है? यदि वे मसीह हैं, तो उन्हें निश्चित रूप से एक साधारण और सामान्य देह का अवश्य होना चाहिए, तो क्या यह परमेश्वर को सीमित नहीं करता है? यदि उन्हें निश्चित रूप से एक साधारण और सामान्य देह का अवश्य होना चाहिए, तो “निश्चित रूप से” का क्या मतलब है? कुछ लोग कहते हैं कि यह परमेश्वर के वचनों को व्यक्त करने के लिए है, ताकि मनुष्य आसानी से उनके साथ सम्पर्क में आ सके। क्या यह सिर्फ इस कारण से है? इससे पहले, सभी लोगों ने ऐसा ही सोचा था। अब हम मसीह के सार के बारे में बात कर रहे हैं। मसीह का सार पूरी तरह से स्वयं परमेश्वर है। यह उसका सार है, परन्तु वे जो कुछ भी करते हैं उसमें अर्थ होता है। विशेष रूप से नियुक्त देह, विशेष रूप से नियुक्त रूप के साथ एक देह, विशेष रूप से नियुक्त एक परिवार, विशेष रूप से नियुक्त एक जीने का वातावरण - ये चीज़ें जिन्हें परमेश्वर करते हैं उन सभी में अर्थ होता है। कुछ लोग पूछते हैं: “यह कैसे हो सकता है कि मैं परमेश्वर के द्वारा इस साधारण और सामान्य देह को पहनने के पीछे के उस बड़े महत्व को नहीं देख सकता हूँ? क्या यह सिर्फ एक बाहरी आवरण नहीं है? जब एक बार परमेश्वर ने अपना काम पूरा कर लिया है, तो क्या यह बाहरी आवरण बस बेकार नहीं होगा?” लोगों की कल्पनाओं में और उनकी अभिज्ञता में, उन्हें लगता है कि इस साधारण और सामान्य देह के बाहरी आवरण का कोई बड़ा उपयोग नहीं है, कि परमेश्वर के काम में या उसकी प्रबंधकारणीय योजना में इसका कोई बड़ा उपयोग नहीं है और यह केवल कार्य के इस चरण को पूरा करने के लिए है। लोग विश्वास करते हैं कि यह सिर्फ इसलिए है ताकि वे आसानी से उनके सम्पर्क में आ सकें और उनके वचनों को सुन सकें, वे उन्हें देख और महसूस कर पाएँ, और अधिक कुछ नहीं। यही है वह जिसे लोग भावी देहधारण के महत्व के रूप में समझा करते थे। वास्तविक तथ्य में, साधारण और सामान्य देह के काम के दौरान और देहधारण के समय के दौरान, उस कार्य को प्रारम्भ करने के आलावा जिसे उसे स्वयं करना चाहिए, वे दूसरा कार्य भी प्रारम्भ करते हैं। कार्य का वह पहलू जिसे यह देह आरम्भ करती है वह कुछ ऐसा है जिसका किसी ने अभी तक विचार नहीं किया है। यह काम का कौन सा पहलू है? स्वयं परमेश्वर के काम को करने के अलावा, वे संसार की पीड़ा का अनुभव करने के लिए आते हैं। यह कुछ ऐसा है जिसे लोगों ने पहले महसूस नहीं किया था। पहले, लोग सोचते थे: “देहधारी परमेश्वर हमेशा बीमारी दुःखसे पीड़ित रहते हैं। वह किसके लिए दुःखकष्ट उठाता है?” कुछ लोग कहते हैं कि यह परमेश्वर की विनम्रता और प्रच्छन्नता है, कि परमेश्वर मनुष्य से प्यार करते हैं, कि परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए इसे सहते हैं...। वे इस नासमझ तरीके से इसे समझाते हैं। परन्तु यदि देहधारी परमेश्वर खुद को पीड़ित होने की अनुमति नहीं देते, तो क्या वे इसे प्राप्त कर सकते थे? वह प्राप्त कर सकता था, क्या वह प्राप्त नहीं कर सकता था? कुछ लोग कहते हैं: “अनुग्रह के युग में जैसे ही कोई बीमारी आती उसका इलाज करने के लिए हमें सिर्फ परमेश्वर से प्रार्थना करने की आवश्यकता होती, तो ऐसा कैसे हो सकता है कि देहधारी परमेश्वर हमेशा बीमारी से पीड़ित रहते हैं? वे कैसे हमेशा बीमार रह सकते हैं? उसकी देह कैसे कभी भी अच्छी नहीं हो सकती है?” क्या यह बात हमेशा मनुष्य के लिए एक पहेली नहीं रही है? यद्यपि लोग कहते हैं कि परमेश्वर कष्ट सहते हैं, कि परमेश्वर उन्हें प्यार करते हैं, तब भी कुछ लोग सोचते हैं: “अनुग्रह के युग के दौरान, हमें बीमारी का इलाज करने के लिए सिर्फ प्रार्थना पर भरोसा करने की आवश्यकता है। हमने कभी दवा नहीं ली, कभी हमारे घरों में कोई दवा नहीं थी, हमें यह नहीं पता था कि अस्पताल कहाँ है और यहाँ तक कि हमें अपने कैंसर का इलाज करने के लिए सिर्फ प्रार्थना करने की ज़रूरत है। तो क्यों देहधारी परमेश्वर ने मनुष्य के जितना अनुग्रह प्राप्त नहीं किया है?” क्या यह एक पहेली नहीं है? यह मनुष्य के दिल में एक गाँठ है, लेकिन लोग पर्याप्त गंभीरता से इससे व्यवहार नहीं करते हैं और सिर्फ सरलता से समझा देते हैं, यह कहते हुए कि परमेश्वर मनुष्य से प्यार करते हैं, कि परमेश्वर मानवजाति के लिए कष्ट सहते हैं। अब तक, लोगों ने इसे सही ढंग से नहीं समझा है। संसार की पीड़ा का अनुभव करना देहधारी परमेश्वर की एक ज़िम्मेदारी है। लेकिन संसार दुःखोंकी पीड़ा का अनुभव करना किस उद्देश्य की पूर्ति करता है? यह अभी भी एक और मुद्दा है। परमेश्वर संसार की पीड़ा का अनुभव करने के लिए आये और यह कुछ ऐसा है जिसे आत्मा पूरी तरह से प्राप्त नहीं कर सकती है। सिर्फ देहधारी परमेश्वर जो साधारण, सामान्य और सम्पूर्ण देह के है और जो पूरी तरह से मानव बन गए हैं, वही पूरी तरह से संसार की पीड़ा का अनुभव कर सकते हैं। यदि आत्मा को यह काम करना पड़ता, तो वह किसी भी पीड़ा का अनुभव करने में पूरी तरह असमर्थ होती। वह देख सकती थी और वह समझ सकती थी, लेकिन वह किसी भी चीज़ का अनुभव नहीं कर सकती थी। क्या देखना, समझना और अनुभव करना सब एक ही चीज नहीं हैं? नहीं, वे नहीं हैं। पहले, परमेश्वर ने कहा था: “मैं संसार के खालीपन को जानता हूँ और उन कठिनाइयों को जानता हूँ जो मानवजाति के जीवन में मौज़ूद हैं। मैं संसार में यहाँ-वहाँ चला-फिरा हूँ और अत्यधिक दयनीयता देखी है। मैंने संसार में जीवन की कठिनाइयों, दयनीयताओं और जीवन के खालीपन को देखा है।” लेकिन उन्होंने इसे अनुभव किया है या नहीं, यह पूरी तरह से कुछ और है। उदाहरण के लिए, आप एक परिवार को देखते हैं जो बच निकलने के लिए संघर्ष करता है। आप इसे देखते हैं और आपके पास कुछ समझ आ जाती है, लेकिन क्या आपने खुद के लिए उनकी परिस्थिति का अनुभव किया है? क्या आपने उनकी कठिनाइयों, और उनकी पीड़ा को महसूस किया है और क्या आपके पास ये भावनाएँ या यह अनुभव है? नहीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि देखना और अनुभव करना दो अलग चीज़ें हैं। यह कहा जा सकता है कि इस काम, और इस चीज़ को निश्चित रूप से देहधारी परमेश्वर के द्वारा अवश्य किया जाना चाहिए। इस सम्बन्ध में, आत्मा किसी भी तरह से इसे प्राप्त नहीं कर सकती है। इसलिए, यह देहधारण के महत्व का एक और पहलू है: वह संसार की पीड़ा का अनुभव करने और उस पीड़ा का अनुभव करने के लिए आया है जिसे मनुष्य सहता है। तो मेरा मतलब किस पीड़ा से है? मानवजाति के जीवन में कठिनाइयाँ, परिवार में दुर्भाग्य, मनुष्य के धोखे, परित्याग और उत्पीड़न, और साथ ही व्यक्ति के शरीर में बीमारी के कुछ कष्ट – ये संसार के कष्ट हैं। बीमारी के कष्ट, आसपास के लोगों, मामलों और चीज़ों के हमले, परिवार में दुर्भाग्य, लोगों द्वारा एक दूसरे का परित्याग करना, लोगों की ईशनिन्दा, बदनामी, प्रतिरोध, विद्रोह, अपमान और मिथ्याबोध...। देहधारी परमेश्वर के लिए ये सब एक तरह का हमला है, और यह उन लोगों पर भी एक प्रकार का हमला है जो उन्हें सहन करते हैं। चाहे यह कोई महान व्यक्ति हो, या कोई उच्च-क्षमता वाला व्यक्ति हो, या उदार मन का कोई व्यक्ति हो, जहाँ तक​मनुष्य की बात है यह पीड़ा, ये चीज़ें, सभी एक तरह का हमला है। परमेश्वर संसार के उत्पीड़न से होकर गुज़रता है, उसे अपने सिर को आराम देने के लिए, और रहने के लिए कोई जगह नहीं है, और कोई विश्वासपात्र नहीं है...। ये सभी चीज़ें दर्दनाक हैं। इसके अलावा, वह ऐसे दुर्भाग्यों का भी अनुभव करता है जो परिवार में आते हैं। उसे पीड़ा के चरम पर पहुँचने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन वह इन सभी का अनुभव करता है। कुछ लोग पहले आश्चर्य करते थे: “देहधारी परमेश्वर के कार्य में, क्या परमेश्वर इन बीमारियों को दूर नहीं कर सकते हैं? उन्हें आसानी से अपना काम करने की इजाज़त देना, और लोगों को उनके खिलाफ विद्रोह करने या उसका प्रतिरोध करने इजाज़त नहीं देना - क्या वे ये चीज़ें नहीं कर सकते थे? यदि उसने लोगों को दण्ड दिया होता, तो वे उसका विरोध करने की हिम्मत नहीं करते। या किसी बीमारी को अनुमति नहीं देना जैसे कि, यदि किसी को कोई बीमारी है तो उसे ठीक करने के लिए उसे सिर्फ उसके लिए प्रार्थना करने की आवश्यकता है, तो परमेश्वर तब भी बीमार क्यों होता है?” ऐसा इसलिए है ताकि वह संसार की पीड़ा का अनुभव कर सके। वह उस देह से जिसे उसने देहधारण के रूप में ग्रहण किया है इन विपत्तियों या बीमारियों के कष्ट को दूर नहीं करता है, और न ही वह संसार के परित्याग को हटाता है। वह सिर्फ इस कठिन वातावरण में प्राकृतिक रूप से बढ़ता है और काम करता है। इस तरह परमेश्वर इस संसार की पीड़ा का अनुभव कर सकते हैं। यदि इन चीज़ों में से कोई भी अस्तित्व में नहीं होती, तो वह इस दुःख का स्वाद नहीं चख पाता। यदि इन बीमारियों को उनसे दूर रखा जाता, या यदि वे किसी बीमारी से पीड़ित नहीं हो सकते हैं जो सामान्य लोगों को कष्ट देती हैं..., तो क्या उनकी पीड़ा कम नहीं हो जाती? क्या इसे प्राप्त किया जा सकता है, कि उन्हें कोई सिरदर्द न हो, अपने दिमाग का बहुत अधिक उपयोग करने के बाद उन्हें कोई थकान न हो, जबकि अन्य लोग अपने दिमाग का बहुत अधिक उपयोग करने के बाद सिरदर्द से ग्रस्त हो जाते हैं? हाँ, इसे प्राप्त किया जा सकता है; लेकिन इस बार इसे अलग तरीके से किया गया है। यीशु के कार्य के चरण के दौरान, वे भोजन या पानी के बिना 40 दिन और रात तक रह सकते थे और उन्हें भूख का एहसास नहीं हो सकता था। इस युग में, यदि एक बार भी भोजन छूट जाता है तो भूख लगती है। कुछ लोग कहते हैं: “क्या परमेश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है? मैं देखता हूँ कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है। वे इस तरह की छोटी सी चीज़ को भी नहीं कर सकते हैं। उन्होंने जो कहा है उससे, वे परमेश्वर है; तो वे इन चीज़ों को कैसे प्राप्त नहीं कर सकते हैं?” ऐसा नहीं है कि वह उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता है, बल्कि इसके बजाए वे उन्हें उस तरह से नहीं करते हैं। उनके देहधारण का उद्देश्य उन चीज़ों को करना नहीं है जो लोग सोचते हैं कि परमेश्वर कर सकता है। वे संसार की पीड़ा का अनुभव करते हैं और उनके ऐसा करने का महत्व है। फिर ऐसे लोग हैं जो पूछते हैं: “हे परमेश्वर, आपके द्वारा संसार की पीड़ा का अनुभव करने की क्या उपयोग है? क्या आप मनुष्य के स्थान पर दुःख सह सकते हैं? क्या लोग इस समय भी दुःख नहीं सह रहे हैं?” परमेश्वर ऐसा कुछ भी नहीं करते हैं जो यादृच्छिक किया जाता हो। जब एक बार उन्होंने संसार की पीड़ा को सह लिया, जब एक बार उन्होंने नज़र डाला ली और देख लिया कि संसार कैसा है तो उसके बाद वे छोड़कर नहीं जाते हैंl इसके बजाए वह उन सभी कामों को पूरी तरह से सम्पूर्ण करने के लिए आते हैं जिसे उसके देहधारण को अवश्य करना चाहिए। कुछ लोग सोचते हैं कि हो सकता है कि परमेश्वर आरामदेह और सुकून की ज़िन्दगी का आनन्द लेने का इतना आदी हो गया है, कि वह बस थोड़ा सा ही दुःख उठाना चाहता है, कि वह परम आनन्द में रहता है और दुःख का स्वाद नहीं जानता है, इसलिए वह सिर्फ पीड़ा का स्वाद जानना चाहता है...। यह सब लोगों की कल्पनाओं में हैं। अब संसार की पीड़ा का अनुभव करना कुछ ऐसा है जिसे केवल देहधारण के समय के दौरान ही किया जा सकता है। यदि देहधारी परमेश्वर का काम किया गया होता और पूरी तरह से किया गया होता, तो अगला काम शुरू हो गया होता और संसार की पीड़ा का अनुभव करने का मामला अब नहीं होता। तो वास्तव में किस कारण से संसार की पीड़ा का अनुभव किया जाता है? क्या कोई जानता है? यह भविष्यवाणी की गई है कि मनुष्य के पास कोई आँसू नहीं होगा, कोई रुदन नहीं होगा, और कोई दुःख नहीं होगा और यह कि संसार में कोई बीमारी नहीं होगी। देहधारी परमेश्वर अब इस पीड़ा का अनुभव कर रहे हैं और जब वह पूरा कर लेते हैं तब वह मानवजाति को ख़ूबसूरत स्थान पर लाएँगे, और पहले की सभी पीड़ाएँ अब और नहीं होंगी। यह आगे और क्यों नहीं होगा? ऐसा इसलिए है क्योंकि स्वयं देहधारी परमेश्वर पहले से ही इन सभी दुःखोंदुःखों का अनुभव कर चुके होंगे और उन्होंने मानवता से इस पीड़ा को हटा दिया होगा। यह इसी उद्देश्य के लिए है कि इसे किया जाता है। मानवजाति के भविष्य के भाग्य को बेहतर ढंग से तैयार करने के लिए, इसे और सुन्दर, तथा और परिपूर्ण बनाने के लिए, देहधारी परमेश्वर संसार की पीड़ा का अनुभव करते हैं। यह देहधारण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है, और यह देहधारण के कार्य का एक पहलू है। यहाँ पर अब भी एक और मुद्दा है। शरीर बनने और इस पीड़ा का अनुभव करने में, परमेश्वर बाद में मानवता से इस पीड़ा को दूर कर देगा। लेकिन यदि कोई देहधारण नहीं होता और कोई अनुभव लेना नहीं होता, तो क्या इस कष्ट को तब भी नहीं हटाया जा सकता है? क्या इसे हटाया जा सकता है? हाँ, इसे अभी भी हटाया जा सकता है। क्रूस पर चढ़ाए जाने से, यीशु एक पापी के सदृश हो गए। वे एक धर्मी मनुष्य थे जो पापी शरीर के सदृश बन गए और अपने आप को पापबलि बना दिया, इस प्रकार पूरी मानवजाति को छुटकारा दिलाया और उन्हें शैतान की पकड़ से मुक्त किया। यह यीशु के क्रूस पर चढ़ाए जाने का उद्देश्य और महत्व था: मानवजाति का छुटकारा, अपने अनमोल रक्त के माध्यम से मानवजाति को छुटकारा दिलाना, कि उसके बाद से मानवजाति में और कोई पाप न हो। अब परमेश्वर ने इस पीड़ा का अनुभव किया, जिसका अर्थ है कि उन्होंने मानवजाति के स्थान पर इन सब का अनुभव किया। परमेश्वर का इस पीड़ा को सहने का मतलब है कि इसके बाद मानवजाति को कभी दोबारा इसे सहने की आवश्यकता नहीं है। आप इन वचनों को नहीं भूल सकते हैं: कार्य का प्रत्येक चरण जिसे परमेश्वर करता है उसे शैतान के साथ युद्ध करते हुए किया जाता है और कार्य का प्रत्येक चरण किसी न किसी तरीके से शैतान के साथ इस युद्ध से सम्बन्धित है। कार्य के पिछले चरण में, एक वचन का कहा जाना स्वीकार्य नहीं किया गया होता जिसने सम्पूर्ण मानवजाति के पापों को हटा दिया होता और उन्हें छुटकारा दिला दिया होता, क्योंकि यह तथ्यों के बिना है और किसी भी सबूत को प्रस्तुत किए बिना है। परमेश्वर के द्वारा बोले गए एक वचन से मानवजाति निष्पाप हो गई होती - यह प्राप्त किए जाने योग्य था। लेकिन शैतान को आश्वस्त नहीं किया गया होगा। उसने कहा होगा: “आपने कुछ नहीं सहा है न ही आपने कोई कीमत चुकाई है। एक वचन के साथ मानवजाति के पाप अब और नहीं रहे। यह अस्वीकार्य है, क्योंकि मानवजाति को आपके द्वारा बनाया गया था।” अब, सभी बचाए गए लोगों को ख़ूबसूरत मंजिल पर लाया जाना है और उन्हें अगले युग में लाया जाना है। मानवजाति को अब आगे से दुःख नहीं सहना है, अब और बीमारी से पीड़ित नहीं होना है। लेकिन किस आधार पर आगे से बीमारी का और अधिक कष्ट नहीं है? किस आधार पर संसार में अब और पीड़ा नहीं है? मनुष्य होने के नाते, लोगों को इस दुःख से गुज़रना चाहिए। अतः, देहधारी परमेश्वर इस समय कुछ अति महत्वपूर्ण काम भी करता है, और वह है मानवजाति की जगह लेना और उसके सभी दर्द को सहना - यह अनुभव मानवजाति के स्थान पर दुःख सहने के लिए है। कुछ लोग कहते हैं: “अब जबकि परमेश्वर मानवजाति के स्थान पर दुःख सहता है, तो हम अब भी दुःख क्यों सहते हैं?” क्या आप अब परमेश्वर के काम का अनुभव नहीं कर रहे हैं? आपको अभी तक पूरी तरह सिद्ध नहीं किया गया है, आपने अभी तक अनुगामी युग में पूरी तरह से प्रवेश नहीं किया है और आपका स्वभाव अभी भी भ्रष्ट है। परमेश्वर का काम अभी तक अपने आदर्श तक पहुँचा है और यह अभी भी किए जाने की प्रक्रिया में है। अतः लोगों को अपने दुःखोंदुःखों के बारे में शिकायत अवश्य नहीं करनी चाहिए; देहधारी परमेश्वर अभी भी दुःख सहता है, मनुष्य की तो बात ही छोड़िए। क्या इस बात का बड़ा महत्व नहीं है? देहधारी परमेश्वर छोटे-छोटे काम करने और फिर चले जाने के लिए नहीं आया है। बल्कि इसके बजाए लोगों की समझ बहुत उथली है, जो विश्वास करते हैं कि देहधारी परमेश्वर स्वयं परमेश्वर का काम करने के लिए आया है, कि यह देह परमेश्वर की ओर से बस परमेश्वर के वचन और कार्य को व्यक्त करने के लिए आयी है। कुछ लोग हैं जो यहाँ तक सोचते हैं कि यह देह सिर्फ एक बाहरी रूप है, लेकिन यह पूरी तरह से ग़लत है, और देहधारी परमेश्वर के विरुद्ध स्पष्ट ईश निन्दा है। देह का कार्य स्वयं परमेश्वर का कार्य है, और उनका इस दुःख को अनुभव करने के लिए देहधारण करना परमेश्वर का इस दुःख को अनुभव करने के लिए मनुष्य बनना है। यदि यह ऐसा होता जैसा कि लोग करते हैं, तो यह परमेश्वर की देह का बाहरी रूप होता जो अनुभव करने के लिए आया है, और परमेश्वर बिना कोई दुःख सहे भीतर होता; क्या वे सही होते? क्या परमेश्वर दुःख दुःखसहता है? वह दुःख दुःखसहता है जब देह दुःख दुःखसहती है। किस कारण से परमेश्वर के पास एक समय पर इस दुःख दुःखको छोड़ देने, और इस संकट को त्याग देने की इच्छा हुई? आपने देखा है कि जब यीशु को क्रूस पर चढ़ाया जाना था, उन्होंने प्रार्थना की: “यदि यह संभव हो, तो यह कप मेरे पास से चला जाए; तथापि जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, बल्कि जैसा तू चाहता है वैसा हो।” उसने यह इच्छा जाहिर की थी क्योंकि, जैसे ही उनकी देह ने कष्ट सहा, तो उन्होंने भी स्वयं देह के भीतर कष्ट सहा। यदि आप कहते हैं कि यह केवल देह का बाहरी आवरण है जो दुःख सहता है, कि परमेश्वर अपनी ईश्वरीयता में बिल्कुल भी दुःख नहीं सहता है, कोई यातना नहीं सहता है, तो यह ग़लत है। यदि आप इसे इस तरह समझते हैं तो यह साबित करता है कि आपने परमेश्वर के सार के पहलु को नहीं देखा है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि अब परमेश्वर एक देह के भीतर मूर्त रूप में प्रकट हो गया है? वह जब भी चाहे आ और जा सकता है, लेकिन वह ऐसा नहीं करता है। वास्तविकता में, और यथार्थ में, वह इस दुःख से गुज़रने के लिए मानव बन गया है, ताकि जब यह होता है तो लोग इसे देख सकें और महसूस कर सकें। साथ ही वे उस पीड़ा को भी महसूस कर सकते हैं जिनसे वे गुज़रते हैं, और उसे स्वयं के लिए अनुभव कर सकते हैं। उनकी देह कष्ट या यातना के ऐसे किसी पहलु को एक बार भी नहीं महसूस करती है जिसे उनकी आत्मा महसूस न करती हो - उनकी देह और आत्मा कष्ट को महसूस करने और सहने में एक समान हैं। क्या यह समझने में आसान है? यह आसान नहीं है। क्योंकि जिसे सभी मनुष्य देख सकते हैं वह आख़िरकार एक देह है, और वे नहीं देख सकते हैं कि आत्मा भी कष्ट सहती है जब देह कष्ट सहती है। क्या आप विश्वास करते हैं कि जब कोई कष्ट सहता है, तब उसकी आत्मा भी कष्ट सहती है? हम ऐसा क्यों कहते हैं कि हम अपने दिल की गहराई में ऐसा-ऐसा महसूस करते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य और आत्मा एक हैं। प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा और देह एक ही है; वे एक जैसा कष्ट सहते हैं और एक जैसी खुशी महसूस करते हैं। ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है जो, वास्तविक दर्द सहते समय, इसे केवल अपने हृदय में ही महसूस करता हो किन्तु अपनी देह में नहीं; और न ही कोई ऐसा है जो कहेगा कि उनका बाहरी देह बिलकुल भी कष्ट नहीं सहती है जब उनका हृदय पीड़ा की पराकाष्ठ पर होता है। हृदय की वे चीज़ें जो भावनाएँ या दर्द को उत्तेजित करती हैं, या जिसका अनुभव किया जा सकता है - इन चीज़ों को देह भी महसूस कर सकती है। यह मामूली और सामान्य देह मसीह है जो सभी मनुष्यों के दर्द को अपने ऊपर लेने हेतु अपना काम करने के लिए - संसार की पीड़ा का अनुभव करने के लिए - आया है। जब एक बार इन सभी दुःखों को सह लिया जाए, तो उसी काम को कार्य के अगले चरण में करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके बजाय, मानवजाति को ख़ूबसूरत मंजिल पर लाया जा सकता है। क्योंकि उसने मनुष्य के स्थान पर इस दर्द को सहा है, इसलिए वह मनुष्य को उस ख़ूबसूरत स्थान पर लाने के योग्य है - यह उसकी योजना है। कुछ बेतुके लोग कहते हैं: “यदि उसने इन सभी दुःखों का अनुभव किया है, तो मैंने इसे क्यों नहीं देखा? इसे पूरी तरह से सहा नहीं गया है। सभी प्रकार के दुःखों को सहा जाना चाहिए, और उन्हें क्रूस से पीड़ित नहीं किया जाना चाहिए।” इसे पहले सहन किया जा चुका है और फिर से सहने की आवश्यकता नहीं है। इसके अलावा, लोगों को उस तरह की चीज़ों को अवश्य नहीं कहना चाहिए। इन वर्षों के दौरान देहधारी परमेश्वर ने बहुत कुछ सहा है। बेतुके लोग इस तरह की सोच के प्रति प्रवृत्त होते हैं। कष्ट के दायरे के भीतर जिसे देहधारी परमेश्वर द्वारा सहन किया जा सकता है, मूल रूप से संसार की सभी पीड़ाएँ उन पर पड़ सकती हैं। जहाँ तक ऐसे दुःखकी बात है जो बहुत बड़ा है, ऐसे दुःख की बात है जिसे हज़ार में से सिर्फ एक मनुष्य सह सकता है, परमेश्वर को इसे सहने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि इस दुःख का पहले ही प्रतिनिधित्व किया जा चुका है। परमेश्वर बीमारी और कठिनाइयों की यातना जैसे दुःख का अनुभव कर सकते हैं, और इससे साबित होता है कि वे सामान्य लोगों से अलग नहीं हैं, यह कि उनमें और लोगों में कोई अन्तर नहीं है, यह कि उनके और लोगों के बीच में कोई पृथकत्व नहीं है, और यह कि उन्हें भी लोगों के समान ही कष्ट होता है। जब लोग कष्ट सहते हैं, तो क्या वे भी उनके साथ कष्ट नहीं सहते हैं? जब लोग बीमार होते हैं, तो वे भी बीमार होते हैं, और उन्होंने इस दुःख के स्वाद को चखा है। परमेश्वर ने मनुष्य की देह से अपनी स्वयं की देह को पृथक नहीं किया है, बल्कि इसके बजाए वह लोगों के समान ही कष्ट सहते हैं। इस समय देहधारी परमेश्‍वर का कष्ट पहले के समय के समान नहीं है जब उन्हें क्रूस पर मृत्यु का स्वाद चखना पड़ा था। यह ज़रूरी नहीं है क्योंकि मृत्यु का स्वाद पहले ही चखा जा चुका है। यह केवल कष्ट का अनुभव करने और मनुष्य की पीड़ा को अपने ऊपर लेने के लिए है।

इससे पहले, यहोवा ने आत्मा के माध्यम से काम किया था और इस से मनुष्य कुछ ज्ञान प्राप्त कर सका। हालाँकि, देहधारी परमेश्वर का कार्य लोगों के द्वारा देखा और महसूस किया जा सकता है, जो इसे आत्मा के कार्य की अपेक्षा अधिक सुविधाजनक और अधिक सुगम बनाता है। यह एक पहलू है। अन्य पहलू, वह पहलू कि देहधारी परमेश्वर संसार के कष्टों का अनुभव करता है, एक ऐसा पहलू है जिसे आत्मा के कार्य के द्वारा बिल्कुल भी प्राप्त नहीं किया जा सकता है, बल्कि उसके बजाए इसे सिर्फ उसके देहधारण के द्वारा ही प्राप्त अवश्य किया जाना चाहिए। आत्मा इसे प्राप्त नहीं कर सकती है। आत्मा बोलने के द्वारा अपना कार्य करती है और फिर, जब एक बार वे पूरा कर लेते हैं, तो वे चले जाते हैं। यहाँ तक कि जब वे लोगों के सम्पर्क में होते हैं तब भी, वे अभी भी संसार की पीड़ा का अनुभव नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग पूछना चाह सकते हैं: “यदि देहधारी परमेश्वर कष्ट सहता है, तो क्या आत्मा भी कष्ट नहीं सहती है? क्या आत्मा भी इसका अनुभव नहीं कर सकती है?” क्या यह भी बेतुका नहीं है? इस दुःख का अनुभव सिर्फ देह को धारण किए हुए आत्मा के माध्यम से होता है। उन्हें मनुष्य अवश्य बनना चाहिए, अन्यथा वे इस दुःख को महसूस करने में सक्षम नहीं होंगे। कभी-कभी देहधारी परमेश्वर ऐसा महसूस करते हैं कि उनका दिल टूट गया है, परन्तु आत्मा द्वारा कुछ देखने के बाद, वे सिर्फ घृणा या आनन्द महसूस करते हैं। वे इस भावना को केवल साधारण तौर पर महसूस करते हैं। किन्तु देह की भावनाएँ इस से कहीं अधिक होती हैं। देह अधिक बारीकी से, अधिक यथार्थवादिता से से, और अधिक व्यावहारिक दृष्टि से महसूस करती है, और आत्मा इन चीज़ों तक नहीं पहुँच सकती है। भौतिक संसार के अंतर्गत कुछ ऐसी चीज़ें हैं जिसके साथ आत्मा देह को स्थानापन्न नहीं कर सकती है। यह देहधारण का सबसे व्यापक महत्व है।

पहले यह कहा जा चुका है कि मसीह ने संसार की खुशियों में कोई हिस्सा नहीं लिया। कुछ कहते हैं: “मसीह ने बहुत अच्छी तरह से खाया, वे जहाँ कहीं भी गए लोगों ने अच्छी तरह से उनका स्वागत किया। कुछ लोगों ने उनके लिए अच्छी चीज़ों को भी खरीदा और हर जगह उनका बहुत आदर किया जाता था...। उन्होंने बिलकुल भी कष्ट नहीं सहा था, अतः कैसे उसने इसमें कोई हिस्सा नहीं लिया? हो सकता है कि उसके पास एक महान जीवन न हो, परन्तु उन्होंने ठीक से प्रबंधन कर लिया। इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने इसमें कोई हिस्सा नहीं लिया!” यह कहना कि “उसने इसमें कोई हिस्सा नहीं लिया” इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने इन चीज़ों का आनन्द नहीं लिया, बल्कि उसके बजाए उन्होंने इन चीज़ों की वजह से कम कष्ट नहीं उठाये। यही है “उन्होंने इसमें कोई हिस्सा नहीं लिया” का अर्थ। उदाहरण के लिए, आप कोई बीमारी से संक्रमित होते हैं और कोई आपको कुछ अच्छे कपड़े देता है। क्या इन कपड़ों के कारण आपको बीमारी के कष्ट से कुछ आराम मिलेगा? नहीं। आपको बीमारी से बिल्कुल भी आराम नहीं मिलेगा। यही है “उन्होंने इसमें कोई हिस्सा नहीं लिया” का अर्थ। यह ऐसा है मानो खाते समय, आप बहुत अच्छी तरह से खा सकते हैं किन्तु तब भी वह कष्ट अवश्य सहते हैं जो आपको अवश्य सहना चाहिए, जैसे कि कोई बीमारी, या पर्यावरण के अवरोध। देह के सुखों के कारण इस कष्ट से आराम नहीं पाया जा सकता है, वे इन चीज़ों को अपने आनन्द के लिए नहीं लेते हैं। इसलिए यह कहा जाता है कि “उसने इसमें कोई हिस्सा नहीं लिया।” क्या इस तरह का बेतुका व्यक्ति हो सकता है, जो सोचता हो, “यदि परमेश्वर संसार की खुशी में कोई हिस्सा नहीं लेता है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हम उन्हें कैसे स्वीकार करते हैं क्योंकि इस बात की परवाह किए बिना कि हम क्या करते हैं परमेश्वर कष्ट सहेंगे”? सत्य को स्वीकार करने का यह तरीका बहुत ही बेतुका है। लोगों के हृदयों को बेहतरीन ढंग से उपयोग में लाया जाना चाहिए; लोगों के कर्तव्यों को उनकी सम्पूर्ण क्षमता के साथ निभाया जाना चाहिए। फिर ऐसे लोग हैं जो इस तरह से स्वीकार करते हैं: “परमेश्वर परम आनन्द लिया करते थे, और अब कुछ भिन्न करने की कोशिश करने के लिए आए हैं।” क्या यह इतना सरल है? आपको अवश्य समझना चाहिए कि परमेश्वर संसार के कष्ट का अनुभव करने के लिए क्यों आए। हर चीज़ जिसे परमेश्वर करता है उसके महत्व में विचारणीय गहराई है, जैसे कि जब यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया था। उसे क्रूस पर क्यों चढ़ाया जाना पड़ा? क्या यह सम्पूर्ण मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए नहीं था? इस समय भी संसार की पीड़ा का अनुभव करने का विशेष महत्व है; यह मानवजाति की ख़ूबसूरत मंज़िल के लिए है। परमेश्वर का सम्पूर्ण कार्य वास्तविकता की पराकाष्ठा है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि मनुष्य अब पापरहित है, और उसके पास परमेश्वर के सामने आने का अच्छा सौभाग्य हो सकता है? ऐसा इसलिए है क्योंकि यीशु ने कार्य के एक चरण को पूरा किया और मनुष्य के पापों को अपने ऊपर ले लिया, और अपने अनमोल रक्त के माध्यम से मनुष्य को छुटकारा दिलाया। तो फिर मानवजाति अब और कष्ट क्यों नहीं सहेगी, किसी दुःख का एहसास नहीं करेगी, कोई आँसू नहीं बहाएगी, तथा अब और आह नहीं भरेगी? इसका कारण यह है कि देहधारी परमेश्वर ने इस समय इन सभी कष्टों को स्वयं के ऊपर ले लिया है और इस कष्ट को अब मनुष्य की ओर से सहा जा चुका है। एक माँ के समान जो अपने बच्चे को बीमारी से पीड़ित देखती है और स्वर्ग से प्रार्थना करती है, बल्कि खुद के लिए एक छोटे जीवन की कामना करते हुए यदि इस तरह से उसका बच्चा ठीक हो सकता है।

परमेश्वर भी इसी तरह से काम करता है, अपने दर्द को उस ख़ूबसूरत मंज़िल में बदलकर जो मानवजाति के लिए अनुसरण करेगी। कोई क्लेश नहीं होगा, और कोई आँसू नहीं होंगे, कोई आह नहीं होगी और कोई दुःख नहीं होगा। संसार की पीड़ा का अनुभव करने हेतु इस कीमत को चुकाने के लिए, वह इसे ख़ूबसूरत मंज़िल में परिवर्तित कर देता है जो मानवजाति के लिए अनुसरण करेगी। यह कहना कि परमेश्वर “इसे ख़ूबसूरत मंज़िल में परिवर्तित कर देता” है इसका अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर के पास कोई सामर्थ्य़ नहीं है या कोई अधिकार नहीं है, बल्कि इसके बजाए यह कि परमेश्वर लोगों को पूरी तरह से आश्वस्त करने के लिए कहीं अधिक व्यावहारिक और शक्तिशाली प्रमाण ढूँढ़ना चाहता है। परमेश्वर पहले ही इस पीड़ा का स्वाद चख चुके हैं, अतः वे अर्हताप्राप्त हैं, उनके पास वह सामर्थ है, और इससे भी बढ़कर उनके पास मानवजाति को उस ख़ूबसूरत मंज़िल तक पहुँचाने, उन्हें इस ख़ूबसूरत मंज़िल को देने और उनसे ख़ूबसूरत वादा करने का अधिकार है। इस प्रकार से शैतान भी पूरी तरह से आश्वस्त है और सम्पूर्ण विश्व में समस्त रचनाएँ ईमानदारी से आश्वस्त हैं, और अंत में मानवजाति के लिए परमेश्वर के सच्चे प्रेम को पाते हैं। हर चीज़ जो परमेश्वर करता है वह व्यावहारिक है, और वह ऐसा कुछ नहीं करता है जो रिक्त हो। यह वे स्वयं हैं जो इसका अनुभव करते हैं। वे दुःख के अपने स्वयं के अनुभव की कीमत का उपयोग करते हैं और इसे मानवजाति के लिए िंमंज़िल में बदल देते हैं। क्या यह व्यावहारिक कार्य नहीं है? माता-पिता अपने बच्चों की लिए एक सच्ची कीमत चुका सकते हैं और यह उनके सच्चे दिलों को दर्शाता है। यह एक प्रकार की कीमत है जिसका भुगतान किया जाता है। ऐसा करने में, देहधारी परमेश्वर भी मानवता के प्रति वास्तव में पूरी तरह से ईमानदार और वफादार हैं। परमेश्वर का सार विश्‍वसनीय है - जो वे कहते हैं उसे करते हैं और जो कुछ भी वे करते हैं उसे पूरा करते हैं। वह विश्‍वसनीय है; हर चीज़ जो वह मनुष्य के लिए करता है वह निष्कपट है और वे व्यर्थ में नहीं बोलते हैं। जब वे कहते हैं कि वे मूल्य चुकाएँगे, तो वे यथार्थ में मूल्य चुकते हैं; जब वे कहते हैं कि वे मनुष्य के दुःख को अपने ऊपर लेंगे, मनुष्य का स्थान लेंगे और उसके बदले में दुःख सहेंगे, तो वे यथार्थ में इस अनुभव को स्वयं पर ले लेते हैं, और मनुष्य के बीच रहने के लिए आते हैं। जब उन्होंने इस पीड़ा को महसूस कर लिया और इस दुःख को स्वयं अपनी आँखों से देखा लिया उसके बाद, विश्व की सभी चीज़ें कहेंगी कि हर चीज़ जो परमेश्वर करता है वह सही और धर्मी है, यह कि सब कुछ जो परमेश्वर करता है वह वास्तविक है: यह सामर्थ्यवान प्रमाण है। इसके अलावा, ख़ूबसूरत मंज़िल अनुसरण करेगी और वे सभी जिन्हें छोड़ दिया जाएगा वे परमेश्वर की प्रशंसा करेंगे; वे प्रशंसा करेंगे कि परमेश्वर के कार्य वास्तव में मनुष्य के लिए उनका प्रेम है। वे संसार में एक आकस्मिक यात्रा के लिए, कुछ काम करने के लिए, या कुछ वचन कहने और फिर चले जाने के लिए नहीं आते हैं। व्यावहारिक रूप से संसार की पीड़ा का अनुभव करने के लिए, संसार में मानव बनने के लिए, और संसार के दुःखों का अनुभव करने के लिए नम्रता से एक सामान्य व्यक्ति बनने के लिए आते हैं। जब इन सभी पीड़ाओं का अनुभव कर लिया जाता है केवल उसके बाद ही वे चले जाएँगे। उनका कार्य इसके समान ही वास्तविक है, इसके समान ही व्यावहारिक है। ऐसे लोगों जिन्हें छोड़ दिया जाएगा वे इसके लिए परमेश्वर की प्रशंसा करेंगे। वे मनुष्य के प्रति परमेश्वर की विश्वसनीयता को देखेंगे और परमेश्वर की दयालुता के पहलू को देखेंगे। परमेश्वर की सुन्दरता और अच्छाई के सार को देहधारण के महत्व के इस पहलू में देखा जा सकता है। जो कुछ भी वे करते हैं वह सच्चा है, जो कुछ भी वे कहते हैं वह सच्चा और विश्वसनीय है। वे सभी चीज़ें जिन्हें वे करने का इरादा करते हैं उन्हें व्यावहारिक रूप से किया जाता है; वे सभी मूल्य जिन्हें वे चुकाने का इरादा करता है उन्हें वास्तव में चुकाया जाता है। वे व्यर्थ में नहीं बोलते हैं। परमेश्वर एक धर्मी परमेश्वर है; परमेश्वर एक विश्वसनीय परमेश्वर है।