अंतिम दिनों के मसीह के कथन- संकलन

विषय-वस्तु
  • पहला भाग सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिए परमेश्वर का कथन(आरम्भ में मसीह के कथन) (चुने हुए भाग)
    • दूसरा भाग मसीह के वचन जैसे वह कलीसियाओं में चला (चुने हुए भाग)
      • तीसरा भाग अंत में मसीह के कथन

        “देहधारण का रहस्य” पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से एक संकलन

        1. अनुग्रह के युग में, यूहन्ना ने यीशु का मार्ग प्रशस्त किया। वह स्वयं परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकता था और उसने मनुष्य का कर्तव्य भी मुश्किल से ही निभाया था। यद्यपि यूहन्ना प्रभु का अग्रदूत था, फिर भी वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था; वह मात्र एक मनुष्य था जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया था। यीशु के बपतिस्मे के बाद “पवित्र आत्मा कबूतर के समान उस पर उतरा।” तब उसने अपना काम आरम्भ किया, अर्थात्, उसने मसीह की सेवकाई करना प्रारम्भ किया। इसी लिए उसने परमेश्वर की पहचान को अपनाया, क्योंकि वह परमेश्वर से आया था। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि इससे पहले उसका विश्वास कैसा था - कदाचित् कभी कभार यह दुर्बल था, या कभी कभार यह मज़बूत था – अपनी सेवकाई को करने से पहले यह सब उसका सामान्य मानव जीवन था। उसे बपतिस्मा (अभिषेक) दिए जाने के पश्चात्, उसके पास तुरन्त ही परमेश्वर के समान उसकी सामर्थ और महिमा आ गई, और इस प्रकार वह अपनी सेवकाई करने लगा था। वह चिन्ह और अद्भुत काम कर सकता था, और चमत्कार कर सकता था, उसके पास सामर्थ और अधिकार था, चूंकि वह सीधे स्वयं परमेश्वर की ओर से काम करता था; उसने पवित्र आत्मा के बदले में उसका काम किया और आत्मा की आवाज़ को अभिव्यक्त किया; इसलिए वह स्वयं परमेश्वर था। यह निर्विवादित है। पवित्र आत्मा के द्वारा यूहन्ना को इस्तेमाल किया गया था। वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, और परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करना उसके लिए सम्भव नहीं था। यदि उसने ऐसा करने की इच्छा की होती, तो पवित्र आत्मा इसकी अनुमति नहीं देता, क्योंकि वह उस काम को नहीं कर सकता था जिसे परमेश्वर ने स्वयं सम्पन्न करने का इरादा किया था। कदाचित् उसमें बहुत कुछ ऐसा था जो मनुष्यों की इच्छा या विचलन से था; वह किसी भी परिस्थिति में प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था। उसकी गलतियाँ और अशुद्धि केवल उसका ही प्रतिनिधित्व करती थीं, किन्तु उसका काम पवित्र आत्मा का प्रतिनिधि था। फिर भी, आप नहीं कह सकते हैं कि वह कुलमिलाकर परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता था। और क्या उसका विचलन परमेश्वर का भी प्रतिनिधित्व कर सकता था? मनुष्य का प्रतिनिधित्व करने में त्रुटि होना सामान्य है, परन्तु यदि परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में उसमें विचलन होता है, तो क्या वह परमेश्वर का अनादर नहीं होता? क्या वह पवित्र आत्मा के विरुद्ध ईश निंदा नहीं होता? पवित्र आत्मा मनुष्य को इच्छानुसार परमेश्वर के स्थान पर खड़े होने नहीं देता है, भले ही दूसरों के द्वारा उसे ऊँचा उठाया गया है। यदि वह परमेश्वर नहीं है, तो वह अंत में खड़े रहने में असमर्थ होगा। जैसे मनुष्य चाहता है वैसे पवित्र आत्मा मनुष्य को परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति नहीं देता है! उदाहरण के लिए, पवित्र आत्मा ने यूहन्ना की गवाही दी और साथ ही प्रकट भी किया कि वह एक ऐसा व्यक्ति है जो यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त करता है, परन्तु पवित्र आत्मा के द्वारा उसमें किए गए कार्य को अच्छी तरह से मापा गया था। यूहन्ना से कुलमिलाकर इतना कहा गया था कि वह यीशु के लिए मार्ग तैयार करने वाला बने, कि यीशु के लिए मार्ग तैयार करे। कहने का अभिप्राय है, कि पवित्र आत्मा ने केवल मार्ग बनाने में उसके कार्य का समर्थन किया था और केवल इसी प्रकार के कार्य को करने के लिए उसे अनुमति दिया, अन्य कोई कार्य नहीं। यूहन्ना ने एलिय्याह का प्रतिनिधित्व किया था, वह भविष्यवक्ता जिसने मार्ग तैयार किया। पवित्र आत्मा के द्वारा इसका समर्थन किया गया; जब तक उसका कार्य मार्ग बनाने का था, तब तक पवित्र आत्मा ने इसका समर्थन किया। फिर भी, यदि उसने दावा किया होता कि वह स्वयं परमेश्वर है और छुटकारे के कार्य को पूरा करने के लिए आया था, तो पवित्र आत्मा अवश्य उसे अनुशाषित करता। यूहन्ना का काम जितना भी बड़ा था, और पवित्र आत्मा ने उसे समर्थन दिया था, फिर भी उसका काम सीमाओं के अंतर्गत था। यह वास्तव में सत्य है कि पवित्र आत्मा के द्वारा उसके कार्य का समर्थन किया गया था, परन्तु उस समय उसे जो सामर्थ दी गई थी वह केवल मार्ग तैयार करने तक ही सीमित थी। वह अन्य कोई काम कदापि नहीं कर सकता था, क्योंकि वह सिर्फ यूहन्ना था जिसने मार्ग तैयार किया था, और वह यीशु नहीं था। इसलिए, पवित्र आत्मा की गवाही मुख्य है, किन्तु वह कार्य जिसको करने के लिए पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्य को अनुमति दिया गया है वह कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (1)” से

        2. कुछ ऐसे लोग हैं जो दुष्टात्माओं के द्वारा ग्रसित हैं और लगातार चिल्लाते रहते हैं, “मैं ईश्वर हूँ!” फिर भी अंत में, वे खड़े नहीं रह सकते हैं, क्योंकि वे गलत प्राणी की ओर से काम करते हैं। वे शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं और पवित्र आत्मा उन पर जरा सा भी ध्यान नहीं देता है। आप अपने आपको जितना भी ऊँचा उठाएं या आप जितनी भी ताकत से चिल्लाएं, आप अभी भी एक सृजे गए प्राणी ही हैं और एक ऐसे प्राणी हैं जो शैतान से सम्बन्धित है। मैं कभी नहीं चिल्लाता हूँ, कि मैं ईश्वर हूँ, मैं परमेश्वर का प्रिय पुत्र हूँ! परन्तु जो कार्य मैं करता हूँ वह परमेश्वर का कार्य है। क्या मुझे चिल्लाने की आवश्यकता है? ऊँचा उठाने की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर अपना काम स्वयं करता है और उसे मनुष्य से कोई आवश्यकता नहीं है कि वह उसे गरिमामय पदस्थिति या प्रतिष्ठा सूचक विशेष नाम दे, और उसकी पहचान और हस्ती को दर्शाने के लिए उसका काम ही पर्याप्त है। उसके बपतिस्मे से पहले, क्या यीशु स्वयं परमेश्वर नहीं था? क्या वह परमेश्वर का देहधारी शारीर नहीं था? निश्चय ही यह नहीं कहा जा सकता है कि केवल उसके लिए गवाही दिए जाने के पश्चात् ही वह परमेश्वर का एकलौता पुत्र बना गया? क्या उसके द्वारा काम आरम्भ करने से बहुत पहले ही यीशु नाम का व्यक्ति नहीं था? आप नए मार्ग नहीं ला सकते हैं या पवित्र आत्मा का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं। आप पवित्र आत्मा के कार्य को या उन वचनों को अभिव्यक्त नहीं कर सकते हैं जिन्हें वह कहता है। आप स्वयं परमेश्वर या पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं कर सकते हैं। आप परमेश्वर की बुद्धि, अद्भुत बातों, और अथाह गहराई, या उस सम्पूर्ण स्वभाव को अभिव्यक्त नहीं कर सकते हैं जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य को ताड़ना देता है। अतः परमेश्वर होने के आपके बारम्बार दावों से कोई फर्क नहीं पड़ता है; आपके पास सिर्फ नाम है और उस हस्ती में से कुछ भी नहीं है। परमेश्वर स्वयं आ गया है, किन्तु कोई भी उसे नहीं पहचाता है, फिर भी वह निरन्तर अपना काम जारी रखता है और पवित्र आत्मा के प्रतिनिधित्व में ऐसा ही करता है। चाहे आप उसे मनुष्य कहें या परमेश्वर, प्रभु कहें या मसीह, या उसे बहन कहें, यह सब कुछ सही है। परन्तु वह कार्य जिसे वह करता है वह आत्मा से है और स्वयं परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। वह उस नाम के विषय में कोई परवाह नहीं करता है जिसके द्वारा मनुष्य उसे पुकारते हैं। क्या वह नाम उसके काम का निर्धारण कर सकता है। इसके बावजूद कि आप उसे क्या कहते हैं, परमेश्वर के दृष्टिकोण से, वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारी शारीर है; वह आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है और उसे परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किया गया है। आप एक नए युग के लिए मार्ग नहीं बना सकते हैं, और आप पुराने युग का समापन नहीं कर सकते हैं और एक नए युग की शुरुआत या नया कार्य नहीं कर सकते हैं। इसलिए, आपको ईश्वर नहीं कहा जा सकता है!

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (1)” से

        3. यहाँ तक कि कोई मनुष्य जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया जाता है वह भी स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। और न केवल यह व्यक्ति परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है, बल्कि उसका काम भी सीधे तौर पर परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के अनुभव को सीधे तौर पर परमेश्वर के प्रबंधन के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता है, और यह परमेश्वर के प्रबंधन का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। वे समस्त कार्य जिन्हें स्वयं परमेश्वर करता है वे ऐसे कार्य हैं जिन्हें वह अपनी स्वयं की प्रबंधकीय योजना में करने का इरादा करता है और उन्हें अपने बड़े प्रबंधन से जोड़ता करता है। मनुष्य के द्वारा किया गया कार्य (ऐसा मनुष्य जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया है) उसके व्यक्तिगत अनुभव की आपूर्ति करता है। वह उस मार्ग से जिस पर वे लोग चले थे जो उससे पहले थे अनुभव का एक नया मार्ग पाता है और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के अधीन अपने भाईयों और बहनों की अगुवाई करता है। जो कुछ ये लोग प्रदान करते हैं वह उनका व्यक्तिगत अनुभव या आत्मिक मनुष्यों का आत्मिक लेख है। यद्यपि पवित्र आत्मा के द्वारा उनका उपयोग किया जाता है, फिर भी ऐसे मनुष्यों का कार्य छ: हज़ार सालों की योजना के उस बड़े प्रबंधकीय कार्य से असम्बद्ध है। उन्हें सिर्फ विभिन्न कालखण्डों में पवित्र आत्मा के द्वारा उभारा गया था कि वे पवित्र आत्मा की मुख्यधारा में लोगों की अगुवाई तब तक करें जब तक वे अपने कार्य को पूरा न कर लें या उनकी ज़िन्दगियों का अंत न हो जाए। वह कार्य जिसे वे करते हैं वह केवल स्वयं परमेश्वर के लिए एक उचित मार्ग तैयार करने के लिए है या पृथ्वी पर स्वयं परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना में एक मद को निरन्तर जारी रखने के लिए है। ऐसे मनुष्य उसके प्रबंधन में बड़े बड़े कार्य करने में असमर्थ होते हैं, और वे नए मार्गों की शुरुआत नहीं कर सकते हैं, और वे पूर्व युग के परमेश्वर के सारे कार्यों का समापन तो बिलकुल भी नहीं कर सकते हैं। इसलिए, वह कार्य जिसे वे करते हैं वह केवल एक सृजे गए प्राणी का प्रतिनिधित्व करता है जो अपने कार्यों को क्रियान्वित कर रहा है और स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है जो अपनी सेवकाई को क्रियान्वित कर रहा है। यह इसलिए है क्योंकि वह कार्य जिसे वे करते हैं वह स्वयं परमेश्वर के द्वारा किए जाने वाले कार्य के समान नहीं है। एक नए युग के शुभारम्भ के कार्य को परमेश्वर के स्थान पर मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। इसे स्वयं परमेश्वर के आलावा किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। मनुष्य के द्वारा किए गए सभी कार्य सृजे गए एक प्राणी के रूप में उसके कर्तव्य का निर्वहन है और इसे तब किया जाता है जब पवित्र आत्मा के द्वारा द्रवित या प्रकाशित किया जाता है। वह मार्गदर्शन जिसे ऐसे मनुष्य प्रदान करते हैं वह यह है कि मनुष्य के दैनिक जीवन में किस प्रकार आचरण किया जाए और मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर की इच्छा के साथ सामंजस्यता से कार्य करना चाहिए। मनुष्य का कार्य न तो परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना को सम्मिलित करता है और न ही आत्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है....। इसलिए, जबकि उन मनुष्यों का कार्य जिन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया जाता है उस कार्य के समान नहीं है जिसे स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया जाता है, तो उनकी पहचान और वे जिनकी और से कार्य करते हैं वे भी उसी तरह से अलग हैं। यह इसलिए है क्योंकि वह कार्य जिसे पवित्र आत्मा करने का इरादा करता है अलग है, उसके द्वारा उन सभी को अलग अलग पहचान और पदस्थिति प्रदान की जाती है जो कार्य करते हैं। ऐसे मनुष्य जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किया जाता है वे भी कुछ कार्य कर सकते हैं जो नया है और वे पूर्व युग में किये गए कुछ कार्य को हटा भी सकते हैं, किन्तु उनके कार्य नए युग में परमेश्वर के स्वभाव और इच्छा को अभिव्यक्त नहीं कर सकते हैं। वे केवल पूर्व युग के कार्य को हटाने के लिए कार्य करते हैं, और सीधे तौर पर स्वयं परमेश्वर के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के लिए कोई नया कार्य नहीं करते हैं। इस प्रकार, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उन्होंने पुराने हो चुके कितने रीति व्यवहारों का उन्मूलन किया है या नए रीति व्यवहारों का परिचय कराया है, क्योंकि वे अभी भी मनुष्य और सृजे गए प्राणीयों का प्रतिनिधित्व करते हैं। फिर भी, जब स्वयं परमेश्वर कार्य को क्रियान्वित करता है, तो वह प्राचीन युग के रीति व्यवहारों के उन्मूलन की खुलकर घोषणा नहीं करता है या सीधे तौर पर नए युग की शुरुआत की घोषणा नहीं करता है। वह अपने कार्य में प्रत्यक्ष और स्पष्टवादी है। वह उस कार्य को क्रियान्वित करने में बेबाक है जिसका उसने इरादा किया है; अर्थात्, वह उस कार्य को सीधे तौर पर अभिव्यक्त करता है जिसे उसने सम्पादित किया है, वह सीधे तौर पर अपना कार्य करता है जैसा उसने मूलतः इरादा किया था, और अपने अस्तित्व एवं स्वभाव को अभिव्यक्त करता है। जैसा मनुष्य इसे देखता है, उसका स्वभाव और उसी प्रकार उसका कार्य भी बीते युगों के उन लोगों के समान नहीं है। फिर भी, स्वयं परमेश्वर के दृष्टिकोण से, यह मात्र उसके कार्य की निरन्तरता और आगे का विकास है। जब स्वयं परमेश्वर कार्य करता है, तो वह अपने वचन को अभिव्यक्त करता है और सीधे तौर पर नया कार्य लाता है। इसके विपरीत, जब मनुष्य काम करता है, तो यह सोच-विचार एवं अध्ययन के माध्यम से होता है, या यह ज्ञान के विकास एवं रीति व्यवहार की क्रमबद्धता से होता है जो दूसरों के कार्य की बुनियाद पर निर्मित होता है। दूसरे शब्दों में, मनुष्य के द्वारा किए गए कार्य का सार-तत्व प्रथा को बनाए रखना और “नए जूतों में पुराने मार्ग पर चलना” है। इसका अर्थ है कि उस मार्ग को भी जिस पर उन मनुष्यों के द्वारा चला गया था जिन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया था उस पर बनाया गया है जिसे स्वयं परमेश्वर के द्वारा खोला गया था। अतः मनुष्य आखिरकर मनुष्य है, और परमेश्वर परमेश्वर है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (1)” से

        4. यूहन्ना प्रतिज्ञा के द्वारा जन्मा था, और उसका नाम स्वर्गदूत के द्वारा दिया गया था। उस समय, कुछ लोग उसके पिता जकरयाह के नाम पर उसका नाम रखना चाहते थे, परन्तु उसकी माँ ने कहा, “इस बालक को उस नाम से पुकारा नहीं जा सकता है। उसे यूहन्ना के नाम से पुकारा जाना चाहिए।” यह सब पवित्र आत्मा के द्वारा निर्देशित किया गया था। फिर यूहन्ना को ईश्वर क्यों नहीं कहा गया? यीशु का नाम भी पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन से था, और उसका जन्म पवित्र आत्मा से, और पवित्र आत्मा के प्रतिज्ञा के द्वारा हुआ था। यीशु परमेश्वर, मसीह, और मनुष्य का पुत्र था। यूहन्ना का कार्य भी महान था, किन्तु उसे क्यों ईश्वर नहीं कहा गया? यीशु के द्वारा किए गए कार्य और यूहन्ना के द्वारा किए गए कार्य के बीच ठीक-ठीक क्या अंतर था? क्या यही एकमात्र कारण था कि यूहन्ना वह व्यक्ति था जिसने यीशु के लिए मार्ग प्रशस्त किया था? या इसलिए क्योंकि इसे परमेश्वर के द्वारा पहले से ही ठहरा दिया गया था? यद्यपि यूहन्ना ने भी कहा था, “मन फिराओ: क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट है,” और स्वर्ग के राज्य का सुसमाचार भी प्रचार किया था, उसका कार्य अधिक गहरा नहीं था और मात्र एक आरम्भ था। इसके विपरीत, यीशु ने एक नए युग का प्रारम्भ किया, और पुराने युग का अंत किया, किन्तु उसने पुराने नियम की व्यवस्था को भी पूरा किया था। जो कार्य उसने किया था वह यूहन्ना की अपेक्षा अधिक महान था, और उसने समूची मानवजाति को छुटकारा देने के लिए कार्य की इस अवस्था को किया था। यूहन्ना ने बस मार्ग तैयार किया था। यद्यपि उसका कार्य महान था, उसके वचन बहुत थे, और वे चेले जो उसका अनुसरण करते थे वे असंख्य थे, फिर भी उसके कार्य ने लोगों को एक नई शुरुआत तक पहुँचाने से बढ़कर और कुछ नहीं किया। न ही कभी लोगों ने उससे जीवन, मार्ग, या गहरी सच्चाईयों को प्राप्त किया, और न ही उन्होंने उसके जरिए परमेश्वर की इच्छा की समझ को प्राप्त किया था। यूहन्ना एक बहुत बड़ा भविष्यवक्ता (एलिय्याह) था जो यीशु के कार्य के लिए नई भूमि की खोज करने में अग्रणी व्यक्ति था और जिसने चुने हुओं को तैयार किया था; वह अनुग्रह के युग का अग्रदूत था। ऐसे मुद्दों को साधारण तौर पर उनके सामान्य मानवीय रूप को देखकर परखा नहीं जा सकता है। विशेष रूप से, यूहन्ना ने बहुत बड़ा काम किया; इसके अतिरिक्त, वह पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा के द्वारा जन्मा था, और उसके कार्य को पवित्र आत्मा के द्वारा समर्थन दिया गया था। उसी रूप में, उनके कार्यों के द्वारा उनकी अपनी अपनी पहचान के बीच अन्तर किया जा सकता है, क्योंकि किसी मनुष्य का बाहरी रूप उसके मूलतत्व के विषय में नहीं बताता है, और मनुष्य पवित्र आत्मा की सच्ची गवाही को सुनिश्चित करने में असमर्थ है। यूहन्ना के द्वारा किए गए कार्य और यीशु के द्वारा किए गए कार्य एक समान नहीं थे और वे अलग अलग प्रकृति के थे। इसी से यह निर्धारित करना चाहिए कि वह परमेश्वर है या नहीं। यीशु का कार्य आरम्भ करना, निरन्तर जारी रखना, समापन करना और सम्पन्न करना था। इनमें से प्रत्येक कदम को यीशु के द्वारा सम्पन्न किया गया था, जबकि यूहन्ना का कार्य शुरुआत से बढ़कर और कुछ नहीं था। आरम्भ में, यीशु ने सुसमाचार फैलाया और पश्चाताप के मार्ग का प्रचार किया, फिर वह मनुष्य को बपतिस्मा देने लगा, बीमारियों को चंगा करने लगा, और दुष्टात्माओं को निकालने लगा। अंत में, उसने मानवजाति को पाप से छुटकारा दिया और सम्पूर्ण युग के अपने कार्य को पूरा किया। उसने मनुष्य को प्रचार किया और सभी स्थानों में स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को फैलाया। यूहन्ना के साथ भी ऐसा ही था, उस अन्तर के साथ कि यीशु ने एक नए युग का आरम्भ किया और मनुष्य के लिए अनुग्रह का युग लेकर लाया। उसके मुँह से वह वचन निकला जिसका मनुष्य को अभ्यास करना चाहिए और वह मार्ग निकला जिसका मनुष्य को अनुग्रह के युग में अनुसरण करना चाहिए, और अंत में, उसने छुटकारे के कार्य को पूरा किया। ऐसे कार्य को यूहन्ना के द्वारा कभी सम्पन्न नहीं किया गया। और इस प्रकार, वह यीशु ही था जिसने स्वयं परमेश्वर के कार्य को किया था, और यह वही है जो स्वयं परमेश्वर है और जो प्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (1)” से

        5. यदि आप यह नहीं समझते हैं कि आज के दिन के कार्य का चरण स्वयं परमेश्वर का है, तो यह इसलिए है क्योंकि आपके पास दर्शन की कमी है। अभी भी, आप कार्य के इस चरण का इंकार नहीं कर सकते हैं; इसे पहचानने में आपकी असफलता यह साबित नहीं करती है कि पवित्र आत्मा कार्य नहीं कर रहा है या यह कि उसका कार्य ग़लत है। यहाँ तक कि कुछ लोग वर्तमान समय के काम को बाईबिल के अंतर्गत यीशु के काम के विरुद्ध जाँचते हैं, और कार्य के इस चरण का इंकार करने के लिए विसंगतियों का उपयोग करते हैं। क्या यह किसी अंधे व्यक्ति का काम नहीं है? वह सब जो बाइबिल में लिखा है वह सीमित है और परमेश्वर के सम्पूर्ण कार्य का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है। सुसमाचार की चारों पुस्तकों में कुलमिलाकर सौ से भी कम अध्याय हैं जिनमें एक सीमित संख्या में घटनाओं को लिखा गया है, जैसे यीशु का अंजीर के वृक्ष को शाप देना, पतरस का तीन बार प्रभु का इंकार करना, यीशु का अपने क्रूसारोहण और पुनरुत्थान के बाद चेलों को दर्शन देना, उपवास के बारे में शिक्षा देना, प्रार्थना के बारे में शिक्षा देना, तलाक के बारे में शिक्षा देना, यीशु का जन्म और वंशावली, यीशु द्वारा चेलों की नियुक्ति, और इत्यादि। ये और कुछ नहीं बस कुछ लेख हैं, फिर भी मनुष्य उन्हें ख़ज़ाने के रूप में महत्व देता है, यहाँ तक कि उनके विरुद्ध आज के काम को भी सत्यापित करता है। वे यह भी विश्वास करते हैं कि यीशु ने अपने जन्म के बाद के समय में सिर्फ इतना ही किया था। यह ऐसा है मानो वे विश्वास करते हैं कि परमेश्वर केवल इतना ही कर सकता है, यह कि और अधिक कार्य नहीं हो सकता है। क्या यह हास्यास्पद नहीं है?

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (1)” से

        6. लोग विश्वास करते हैं कि जब परमेश्वर ने देहधारण किया तब निश्चित रूप से उसने वैसा जीवन नहीं जीया जैसा मनुष्य जीते हैं; वे विश्वास करते हैं कि वह अपने दांतों को साफ किए बिना या अपने चेहरे को धोए बिना ही स्वच्छ है, क्योंकि वह एक पवित्र व्यक्ति है। क्या ये सब पूर्ण रूप से मनुष्य की अवधारणाएँ नहीं हैं? बाईबिल एक मनुष्य के रूप में यीशु के जीवन को लिखित रूप में दर्ज नहीं करती है, केवल उसके कार्य को दर्ज करती है, किन्तु इससे यह साबित नहीं होता कि उसके पास एक सामान्य मनुष्यत्व नहीं था या यह कि उसने 30 वर्ष की आयु से पहले सामान्य मनुष्य का जीवन नहीं बिताया था। उसने आधिकारिक रूप से 29 वर्ष की आयु में अपने कार्य को आरम्भ किया था, किन्तु उस आयु से पहले आप मनुष्य के रूप में उसके सम्पूर्ण जीवन का इंकार नहीं कर सकते हैं। बाईबिल ने बस यों ही उस चरण को अपने लिखित दस्तावेज़ों से हटा दिया; चूँकि एक साधारण मनुष्य के रूप में यह उसका जीवन था और उसके ईश्वरीय कार्य का चरण नहीं था, इसलिए इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी कि उसे लिखा जाता। क्योंकि यीशु के बपतिस्मे से पहले, पवित्र आत्मा ने एकदम से अपना कार्य नहीं किया था, परन्तु उसने बस यों ही एक साधारण मनुष्य के रूप में उसके जीवन को उस दिन तक बनाए रखा था जब यीशु के लिए अपनी सेवकाई को करना निश्चित था। यद्यपि वह देहधारी शारीर में था, फिर भी वह परिपक्व होने की प्रक्रिया से वैसे ही गुज़रा था जैसे एक आम इंसान गुज़रता है। इस प्रक्रिया को बाईबिल से हटा दिया गया था, क्योंकि यह मनुष्य के जीवन की उन्नति में कोई बड़ी सहायता प्रदान नहीं कर सकता था। उसके बपतिस्मे से पहले एक ऐसा चरण था जिसमें वह गुप्त बना रहा, और न ही उसने चिन्ह और अद्भुत काम किया। केवल यीशु के बपतिस्मे के बाद ही उसने मानवजाति के छुटकारे के सभी कार्यों को करना आरम्भ किया, ऐसा कार्य जो अनुग्रह, सत्य, और प्रेम, और करुणा से बहुतायत से भरपूर था। इस कार्य का आरम्भ अनुग्रह के युग का प्रारम्भ भी था; इसी कारण से, इसे लिखा गया और वर्तमान तक पंहुचाया गया....। यीशु के द्वारा अपनी सेवकाई को करने से पहले, या जैसा बाइबल में कहा गया है, उसके ऊपर पवित्र आत्मा के उतरने से पहले, यीशु सिर्फ एक साधारण मनुष्य था और थोड़ी सी भी अलौकिकता धारण नहीं करता था। पवित्र आत्मा के उतरने पर, अर्थात्, जब उसने अपनी सेवकाई को करना आरम्भ किया, तब वह अलौकिकता से भर गया। उस सम्बन्ध में, लोगो ने ग़लत धारणा को धारण किया कि परमेश्वर का देहधारी शरीर कोई साधारण मनुष्य नहीं था और यह कि देहधारी परमेश्वर में मनुष्यत्व नहीं था। निश्चय ही, वह कार्य और वह सब कुछ जिसे मनुष्य परमेश्वर के विषय में पृथ्वी पर देखता है वह अलौकिक है। जो कुछ आप अपनी आँखों से देखते हैं और जो कुछ आप अपने कानों से सुनते हैं वे सब अलौकिक हैं, क्योंकि उसका कार्य और उसके वचन मनुष्य के लिए समझ से बाहर और अप्राप्य है। यदि स्वर्ग की किसी चीज़ को पृथ्वी पर लाया जाता है, तो वह अलौकिक होने के सिवाए कोई अन्य चीज़ कैसे हो सकता है? स्वर्ग के राज्य के रहस्यों को पृथ्वी पर लाया गया था, ऐसे रहस्य जो मनुष्य के लिए इतने अद्भुत और बुद्धिमत्तापूर्ण हैं कि उन्हें समझा या मापा नहीं जा सकता है - क्या वे सब अलौकिक नहीं थे? फिर भी, आपको यह जानना होगा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे कितने अलौकिक हैं, उन्हें उसकी सामान्य मानवता में सम्पन्न किया गया था। परमेश्वर के देहधारी शारीर में मानवता है, अन्यथा, वह परमेश्वर का देहधारी शारीर नहीं होता।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (1)” से

        7. शरीर में पवित्र आत्मा के कार्य के भी अपने कुछ अपने सिद्धान्त होते हैं। वह पिता के कार्य और ज़िम्मेदारी को केवल इस आधार पर आरम्भ कर सकता था कि वह सामान्य मानवता को धारण किए हुए था। केवल तभी वह अपना काम प्रारम्भ कर सकता था। अपने बचपन में, जो कुछ प्राचीन समयों में घटित हुआ था यीशु उन्हें बहुत ज़्यादा नहीं समझ सकता था, और केवल रब्बियों से पूछने के माध्यम से ही वह समझ पाता था। जब उसने पहली बार बोलना सीखा था तब यदि उसने अपने कार्य को आरम्भ किया होता, तो कोई ग़लती न करना कैसे सम्भव होता? परमेश्वर कैसे ग़लतियाँ कर सकता है? इसलिए, यह केवल उसके योग्य होने के पश्चात् ही हुआ कि उसने अपना काम आरम्भ किया; उसने तब तक किसी भी कार्य को सम्पन्न नहीं किया जब तक वह ऐसे कार्य को आरम्भ करने में पूरी तरह से सक्षम नहीं हो गया। 29 वर्ष की आयु में, यीशु पहले से ही काफी परिपक्व हो चुका था और उसकी मानवता उस कार्य को आरम्भ करने के लिए पर्याप्त थी जो उसे करना था। यह केवल तब हुआ कि पवित्र आत्मा, जो तीस वर्षों तक गुप्त था, उसने स्वयं को प्रकट करना आरम्भ किया, और परमेश्वर का आत्मा आधिकारिक रूप से उसमें कार्य करने लगा। उस समय, यूहन्ना ने उसके लिए मार्ग की तैयारी में सात वर्षों तक परिश्रम किया, और उसके कार्य के पूरे होने पर, यूहन्ना को बंदीगृह में डाल दिया गया। उसके बाद पूरा बोझ यीशु पर आ गया। यदि उसने इस कार्य को 21 या 22 वर्ष की आयु में प्रारम्भ किया होता, जब उसमें मानवता की बहुत कमी थी और उसने बस अभी अभी बालिग अवस्था में प्रवेश किया था, और उसमें बहुत सी चीज़ों की समझ की कमी थी, तो वह नियन्त्रण रख पाने में असमर्थ होता। उस समय, जब यीशु ने अपनी आधी आयु में अपने कार्य को आरम्भ किया था तो उसके कुछ समय पूर्व ही यूहन्ना ने पहले से ही अपने कार्य को सम्पन्न कर लिया था। उस आयु में, उसका सामान्य मनुष्यत्व उस कार्य को आरम्भ करने के लिए पर्याप्त था जो उसे करना चाहिए था।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (1)” से

        8. शरीर में देहधारी परमेश्वर के कार्य के बहुत से सिद्धान्त हैं। ऐसा बहुत कुछ है जिसे मनुष्य साधारणतः नहीं समझता है, फिर भी मनुष्य उसे मापने के लिए या परमेश्वर से बहुत अधिक मांग करने के लिए लगातार अपने स्वयं के विचारों का उपयोग करता है। और आज के दिन भी बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें बिलकुल भी पता नहीं है कि उनके ज्ञान में उनके स्वयं के विचारों से बढ़कर और कुछ भी नहीं है। वह युग या स्थान जो भी हो जिसमें परमेश्वर ने देहधारण किया है, देह में उसके कार्य के सिद्धान्त अपरिवर्तनीय बने रहते हैं। वह देहधारी नहीं हो सकता है फिर भी कार्य करने के लिए देह की सीमाओं से बाहर जाता है; इसके अतिरिक्त, वह देहधारी नहीं हो सकता है फिर भी देह की साधारण मानवता के अंतर्गत काम नहीं करता है। अन्यथा, परमेश्वर के देहधारण का महत्व घुलकर शून्य हो जाता, और वचन का देहधारण पूरी तरह से निरर्थक हो जाता। इसके अतिरिक्त, केवल स्वर्ग में मौजूद पिता (वह आत्मा) ही परमेश्वर के देहधारण के बारे में जानता है, और दूसरा कोई नहीं, यहाँ तक कि स्वयं देह या स्वर्ग के संदेशवाहक भी नहीं जानते हैं। इसी रूप में, देह में परमेश्वर का कार्य और भी अधिक सामान्य और बेहतर है कि वह यह प्रदर्शित करने में समर्थ है कि वचन वास्तव में देहधारी हुआ है; देह का अर्थ एक सामान्य और साधारण मनुष्य है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (1)” से

        9. कुछ लोग आश्चर्य कर सकते हैं, युग की शुरुआत स्वयं परमेश्वर के द्वारा क्यों की जानी चाहिए? क्या उसके स्थान पर कोई सृजा गया प्राणी नहीं हो सकता है? आप सब अवगत हैं कि परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से एक नए युग की शुरुआत के उद्देश्य हेतु देहधारण किया है, और, वास्तव में, जब उसने नए युग की शुरुआत की है, तो उसने उसी समय पूर्व युग का समापन कर दिया है। परमेश्वर आदि और अंत है; यह वही है जो अपने कार्य को सम्पन्न करता है और इस प्रकार वह स्वयं ही है जो पूर्व युग का समापन करता है। यह वह प्रमाण है कि उसने शैतान को पराजित किया है और संसार को जीत लिया है। प्रत्येक समय जब वह स्वयं मनुष्य के बीच कार्य करता है, तो यह एक नए युद्ध की शुरुआत होती है। नए कार्य की शुरुआत किए बिना, स्वाभाविक रूप से पुराने का समापन नहीं होता। और पुराने का समापन न होना इस बात का प्रमाण है कि शैतान के साथ युद्ध अभी तक समाप्त नहीं हुआ है। यदि स्वयं परमेश्वर मनुष्यों के बीच में आता है और एक नया कार्य करता है केवल तभी मनुष्य शैतान के प्रभुत्व को तोड़कर पूरी तरह से स्वतन्त्र हो सकता है और एक नया जीवन एवं नई शुरुआत हासिल कर सकता है। अन्यथा, मनुष्य सदैव ही पुराने युग में जीवन बिताएगा और हमेशा शैतान के पुराने प्रभाव के अधीन रहेगा। प्रत्येक युग जिसकी अगुवाई परमेश्वर के द्वारा की जाती है, मनुष्य के एक भाग को स्वतन्त्र किया जाता है, और इस प्रकार परमेश्वर के कार्य के साथ-साथ मनुष्य एक नए युग की ओर आगे बढ़ता है। परमेश्वर की विजय उन सबकी विजय है जो उसके पीछे पीछे चलते हैं। यदि सृष्टि की मानवजाति को युग के समापन का कार्यभार दिया जाता, तब भले ही यह मनुष्य के दृष्टिकोण से होता या शैतान के, तो यह एक ऐसे कार्य से बढ़कर नहीं है जो परमेश्वर का विरोध या विश्वासघात करता है, न ही परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का एक कार्य है, और इस प्रकार मनुष्य का कार्य शैतान को अवसर देगा। यदि मनुष्य केवल एक ऐसे युग में परमेश्वर की आज्ञाओं को मानता है और उसका अनुसरण करता है जिसका आरम्भ परमेश्वर के द्वारा किया गया है तो क्या शैतान पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएगा, क्योंकि यह सृजे गए प्राणी का कर्तव्य है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि आप को केवल अनुसरण और आज्ञापालन कंरने की आवश्यकता है, और इससे अधिक आप से नहीं मांगा गया है। प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा अपने कर्तव्य का पालन करने और अपने कार्य को क्रियान्वित करने का अर्थ यही है। परमेश्वर स्वयं अपना काम करता है और उसे मनुष्य की कोई आवश्यकता नहीं है कि उसके स्थान पर काम करे, और न ही वह सृजे गए प्राणियों के काम में अपने आपको शामिल करता है। मनुष्य स्वयं अपना कार्य करता है और परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करता है, और यही सच्ची आज्ञाकारिता है और सबूत है कि शैतान को पराजित कर दिया गया है। स्वयं परमेश्वर ने नए युग का आरम्भ किया उसके पश्चात्, वह मनुष्य के बीच स्वयं आगे से काम नहीं करता है। यह तभी होता है कि मनुष्य अपने कर्तव्य को निभाने और एक सृजे गए प्राणी के रूप में अपने मिशन को सम्पन्न करने के लिए आधिकारिक रूप से नए युग में कदम रखता है। कार्य करने के सिद्धान्त ऐसे ही हैं जिनका उल्लंघन किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता है। केवल इस तरह से कार्य करना ही संवेदनशील और तर्कसंगत है। परमेश्वर का कार्य स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया जाता है। यह वही है जो अपने कार्य को गति प्रदान करता है, और साथ ही वही है जो उसका समापन भी करता है। यह वही जो कार्य की योजना बनाता है, और साथ ही वही है जो उसका प्रबंधन भी करता है, और उससे भी बढ़कर, यह वही है जो उस कार्य को सफल करता है। यह ऐसा ही है जैसा बाईबिल में लिखा है “मैं ही आदि और अंत हूँ; मैं ही बोनेवाला और काटनेवाला हूँ।” सब कुछ जो उसके कार्य के प्रबंधन जुड़ा है उसे उसी के हाथ से किया जाता है। वह छ: हज़ार सालों की प्रबंधकीय योजना का शासक है; कोई भी उसके स्थान पर उसका काम नहीं कर सकता है या उसके कार्य को समाप्त नहीं कर सकता है, क्योंकि यह वही है जो सबको नियन्त्रण में रखता है। चूँकि उसने संसार को सृजा है, वह समूचे संसार की अगुवाई करेगा ताकि सब उसकी ज्योति में जीवन जीए, और वह अपनी सम्पूर्ण योजना को सफल करने के लिए समूचे युग का समापन करेगा!

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (1)” से

        10. उस समय जब यीशु यहूदिया में कार्य करता था, तब उसने खुलकर ऐसा किया था, परन्तु अब, मैं आपके बीच गुप्त रूप से काम करता और बोलता हूँ। अविश्वासी लोग इस बात से पूरी तरह से अनजान हैं। आप लोगों के बीच मेरा कार्य दूसरों से अलग-थलग है। इन वचनों, इन ताड़नाओं और न्यायों को केवल आप सभी ही जानते हैं और कोई नहीं। यह सब कार्य आपके बीच में सम्पन्न किया गया है और केवल आपके लिए प्रकट किया गया है; उन अविश्वासियों में से कोई भी इसे नहीं जानता है, क्योंकि समय अभी तक नहीं आया है। ये मनुष्य ताड़नाओं को सहने के बाद पूर्ण किए जाने के समीप हैं, परन्तु ऐसे लोग जो बाहर हैं वे इस बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं। यह कार्य बहुत ही अधिक गुप्त है! उनके लिए, परमेश्वर द्वारा देहधारण गोपनीय बात है, परन्तु जो इस मुख्यधारा में हैं, उसके लिए यह स्पष्ट है। यद्यपि परमेश्वर में सब कुछ खुला है, सब कुछ स्पष्ट है और सब कुछ सार्वजानिक किया गया है, फिर भी यह केवल उनके लिए सही है जो उस में विश्वास करते हैं, और उन अविश्वासियों पर कुछ भी प्रकट नहीं किया गया है। वह कार्य जिसे यहाँ किया जा रहा है उसे कड़ाई से पृथक किया गया है ताकि कोई उसे न जान सके। उन्हें पता लग जाने पर, बस दण्ड और उत्पीड़न ही मिलता है। वे विश्वास नहीं करेंगे। उस बड़े लाल अजगर के देश में, जो सबसे अधिक पिछड़ा हुआ इलाका है, कार्य करना कोई आसान काम नहीं है। यदि इस कार्य की जानकारी हो गई होती, तब इसे निरन्तर जारी रखना असम्भव होता। कार्य का यह चरण साधारण रूप में इस स्थान में आगे नहीं बढ़ सकता है। यदि ऐसे कार्य को खुले तौर पर किया जाता, तो वे इसे कैसे सहन कर सकते थे? क्या यह और अधिक जोखिम नहीं लाता? यदि इस कार्य को गुप्त नहीं रखा जाता, और उसके बजाए यीशु के समय के समान ही निरन्तर जारी रखा जाता जब उसने शानदार ढंग से बीमारों को चंगा किया था और दुष्टात्माओं को निकाला था, तो क्या इसे बहुत पहले ही दुष्टात्माओं के द्वारा “कब्ज़े” में नहीं कर लिया जाता? क्या वे परमेश्वर के अस्तित्व को बर्दाश्त कर सकते थे? यदि मुझे मनुष्य को उपदेश एवं व्याख्यान देने के लिए अभी बड़े बड़े हॉल में प्रवेश करना पड़ता, तो क्या मुझे बहुत पहले ही टुकड़े-टुकड़े नहीं कर दिया जाता? यदि ऐसा हो, तो मेरा कार्य कैसे जारी रह सकता है? चिन्हों और चमत्कारों को खुले तौर पर प्रदर्शित नहीं किया गया है उसका कारण है कि उन्हें गुप्त रखा जाए। अतः मेरे कार्य को अविश्वासियों के द्वारा देखा, जाना या खोजा नहीं जा सकता है। यदि कार्य के इस चरण को यीशु के अनुग्रह के युग के समान ही उसी रीति से किया जाता तो यह इस प्रकार नियमित रूप से जारी नहीं रह सकता था। अतः, कार्य को इसी रीति से गुप्त रखना ही आपके लिए और समस्त कार्य के लिए लाभदायक है। जब पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य समाप्त होता है, अर्थात्, जब यह गुप्त कार्य पूरा हो जाता है, तब कार्य का यह चरण पूरी तरह से प्रकट हो जाएगा। सभी जान जाएंगे कि चीन में विजयी होने वालों का एक समूह है; सभी जान जाएंगे कि परमेश्वर ने चीन में देहधारण किया है और यह कि उसका कार्य समाप्त होने पर है। केवल तब ही मनुष्य को यह बात समझ में आएगी: ऐसा क्यों है कि चीन ने अभी तक क्षय या पतन का प्रदर्शन नहीं किया है? इससे पता चलता है कि परमेश्वर चीन में व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य सम्पन्न कर रहा है और उसने एक समूह के लोगों को सिद्ध करके विजय प्राप्त करने वाला बना दिया है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (2)” से

        11. चूंकि वह व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है तो परमेश्वर का देहधारण अपने आपको केवल कुछ ही लोगों पर ही प्रगट करता है जो उसके पीछे पीछे चलते हैं और सभी प्राणियों पर प्रगट नहीं करता है। उसने कार्य के एक चरण को पूरा करने के लिए देहधारण किया, मनुष्य को अपना स्वरूप दिखाने के लिए नहीं। फिर भी, उसके कार्य को स्वयं उसके द्वारा ही सम्पन्न किया जाना चाहिए, इस प्रकार उसके लिए देह में ऐसा करना ज़रुरी है। जब यह कार्य पूरा होता है, तब वह पृथ्वी से चला जाएगा; वह लम्बी अवधि तक मानवजाति के मध्य बना नहीं रह सकता है इस बात के भय से कि कहीं आने वाले कार्य के मार्ग में खड़ा न हो जाए। जो कुछ वह भीड़ पर प्रकट करता है वह केवल उसका धर्मी स्वभाव और उसके सभी कार्य हैं, और उसकी देह का स्वरूप नहीं है जब वह दूसरी बार देहधारण करता है, क्योंकि परमेश्वर के स्वरूप को केवल उसके स्वभाव के माध्यम से प्रदर्शित किया जा सकता है, और उसे उसके स्वरूप के द्वारा बदला नहीं जा सकता है। चूंकि वह देह में कार्य करता है तो उसके देह के स्वरूप को केवल एक सीमित संख्या के लोगों पर ही प्रदर्शित किया गया है, केवल उन पर जो उसका अनुसरण करते हैं। इसी लिए वह कार्य जिसे अभी किया जा रहा है उसे इस तरह गुप्त में किया जाता है। यह बिलकुल यीशु के कार्य के समान है जिसे केवल यहूदियों पर ही प्रदर्शित किया गया था, और सार्वजनिक रूप में कभी भी दूसरी जातियों पर प्रकट नहीं किया गया था। इस प्रकार, जब एक बार उसने काम समाप्त कर दिया, तो वह तुरन्त ही मनुष्यों के बीच से चला गया और रुका नहीं; उसके बाद आने वाले समय में, उसने स्वयं के स्वरूप को मनुष्य पर प्रकट नहीं किया, किन्तु उसके बजाए वह कार्य सीधे तौर पर पवित्र आत्मा के द्वारा सम्पन्न किया गया। जब एक बार परमेश्वर के देहधारण का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाता है, तो वह मरणहार संसार से चला जाता है, और फिर कभी ऐसा कार्य नहीं करता है जो उस समय के समान होता है जब वह शरीर में था। उसके बाद का सभी कार्य स्वयं पवित्र आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किया जाता है। इस समय के दौरान, मनुष्य बमुश्किल ही देह में उसके स्वरूप को देखने में सक्षम होगा; वह स्वयं को मनुष्य पर बिलकुल भी प्रकट नहीं करता है, और हमेशा हमेशा के लिए गुप्त बना रहता है। देहधारी परमेश्वर के कार्य के लिए सीमित समय है, जिसे एक विशेष युग, समय, देश और विशेष लोगों के बीच में सम्पन्न किया जाना चाहिए। ऐसा कार्य केवल परमेश्वर के देहधारण के समय के दौरान उस कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, और यह उस युग के लिए विशेष है, जो एक विशेष युग में परमेश्वर के पवित्र आत्मा के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, और उसके कार्य की सम्पूर्णता का नहीं। इसलिए, परमेश्वर के देहधारण के स्वरूप को सभी लोगों पर प्रकट नहीं किया जाएगा। जो कुछ भीड़ को दिखाया गया है वह परमेश्वर की धार्मिकता और उसकी सम्पूर्णता में उसका स्वभाव है, उसके स्वरूप के बजाए जब वह दूसरी बार देहधारण करता है। यह न तो एकमात्र स्वरूप है जिसे मनुष्य को दिखाया गया है, और न ही दोनों स्वरूपों को एकजुट किया गया है। इसलिए, यह अति महत्वपूर्ण है कि परमेश्वर का देहधारी शारीर उस कार्य की समाप्ति पर पृथ्वी से चला जाए जिसे उसे करने की ज़रूरत है, क्योंकि वह केवल उस कार्य को करने आया है जिसे उसे अवश्य करना चाहिए, और वह लोगों को अपना स्वरूप नहीं दिखाने नहीं आया है। यद्यपि देहधारण के महत्व को परमेश्वर के द्वारा पहले से ही दो बार देहधारण करके पूरा किया जा चुका है, फिर भी वह किसी ऐसे देश पर अपने आपको अभी भी खुलकर प्रकट नहीं करेगा जिसने उसे पहले कभी नहीं देखा है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (2)” से

        12. आपको यह ज़रूर जानना चाहिए कि परमेश्वर के देहधारण का कार्य एक युग की शुरुआत करना है। यह कार्य कुछ वर्षों तक सीमित है, और वह परमेश्वर के आत्मा के सभी कार्यों को पूरा नहीं कर सकता है। यह बिलकुल इसके समान है कि एक यहूदी के रूप में यीशु का स्वरूप कैसे केवल परमेश्वर के स्वरूप का प्रतिनिधित्व कर सकता है जबकि वह यहूदिया में कार्य करता था, और वह केवल क्रूस पर चढ़ने का काम ही कर सकता था। उस समय के दौरान जब यीशु देह में था, वह किसी युग का अंत करने या मानवजाति का विनाश करने का कार्य नहीं कर सकता था। इसलिए, जब उसे क्रूस पर चढ़ाया गया और उसने अपना काम समाप्त कर लिया उसके पश्चात्, वह स्वर्ग पर चढ़ गया और सदा के लिए स्वयं को मनुष्य से छिपा लिया। उसके बाद से, अन्य जातीय देशों के वे वफादार विश्वासी केवल उसकी तस्वीर को ही देख सकते हैं जिसे उन्होंने दीवारों पर चिपकाया है, और प्रभु यीशु का प्रकटीकरण को नहीं देख सकते हैं। यह तस्वीर सिर्फ एक ऐसी तस्वीर है जिसे मनुष्य के द्वारा बनाया गया है, और वह स्वरूप नहीं है जिसे स्वयं परमेश्वर ने मनुष्य को दिखाया है। जब से परमेश्वर ने दो बार देहधारण किया है वह अपने आपको उस स्वरूप में जनसमूह के सामने खुलकर प्रकट नहीं करेगा। वह कार्य जिसे वह मानवजाति के बीच करता है यह उन्हें अनुमति देने के लिए है कि वे उसके स्वभाव को समझें। यह सब कुछ विभिन्न युगों के कार्य के जरिए मनुष्य को दिखाने के द्वारा किया गया है, साथ ही साथ उस स्वभाव जरिए जिसे उसने प्रकट किया है और उस कार्य जरिए जिसे उसने किया है, न कि यीशु के प्रकटीकरण के जरिए। कहने का अभिप्राय है, कि परमेश्वर के स्वरूप को देहधारी स्वरूप के जरिए मनुष्य पर प्रकट नहीं किया गया है, किन्तु देहधारी शारीर, अर्थात् स्वरूप और आकर के परमेश्वर, के द्वारा सम्पन्न किए गए कार्य के जरिए प्रकट किया गया है; और उसके (स्त्री/पुरुष) कार्य के जरिए, उसके स्वरूप को दिखाया गया है और उसके स्वभाव को प्रकट किया गया है। यही उस कार्य का महत्व है जिसे वह देह में होकर करने की इच्छा करता है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (2)” से

        13. एक बार जब उसके दोबारा देहधारण करने का कार्य समाप्त हो जाता है, तो वह अन्यजाति देशों को अपना धर्मी स्वभाव दिखाना शुरू कर देता है, और जनसमूह को अपना स्वरूप देखने की अनुमति देता है। वह अपने स्वभाव को प्रकट करने की इच्छा करता है, और इसके माध्यम से विभिन्न प्रकार के मनुष्य के अंत को स्पष्ट कर देता है, और इसके द्वारा पहले के युग को पूरी तरह से समाप्त कर देता है। देह में उसका कार्य बड़े पैमाने पर विस्तृत नहीं होता है (ठीक वैसे ही जैसे यीशु ने केवल यहूदिया में काम किया था, और मैं केवल आपके बीच में काम करता हूँ) क्योंकि देह में उसके कार्य के घेरे और सीमाएं हैं। वह इस देहधारी शरीर के जरिए अनंतकाल का कार्य करने के बदले, या अन्यजाति देशों के सभी लोगों पर प्रगट होने के कार्य को करने के बदले, केवल एक साधारण एवं सामान्य देह में एक अल्प समयावधि का कार्य सम्पन्न कर रहा है। देह में इस कार्य को दायरे में सीमित किया जाना चाहिए (जैसे सिर्फ यहूदिया में या सिर्फ आपके बीच में काम करना), तब इसकी सीमाओं के भीतर सम्पन्न किए गए कार्य के जरिए इसे विस्तृत किया जाना चाहिए। हाँ वास्तव में, ऐसे विस्तार के कार्य को पवित्र आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किया जाता है और यह उसके देहधरी शारीर का कार्य नहीं होगा। क्योंकि शरीर में इस कार्य की सीमाएं हैं और यह विश्व के सभी कोनों तक फैला नहीं है। इसे, यह पूरा नहीं कर सकता है। शरीर में उस कार्य के जरिए, उसका आत्मा उस कार्य को करता है जो उसके बाद आता है। अतः, देह में किया गया कार्य शुरूआत का एक ऐसा कार्य है जिसे सीमाओं के भीतर सम्पन्न किया गया है; उसका आत्मा इस कार्य को इसके पश्चात् सम्पन्न करता है, और इसके आधार पर फैलता है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (2)” से

        14. परमेश्वर इस पृथ्वी पर केवल उस युग की अगुवाई के कार्य को करने के लिए आया है; नए युग को आरम्भ करने और पुराने युग को समाप्त करने के लिए। वह इस पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन के पथक्रम को जीने के लिए, एक मनुष्य के रूप में स्वयं के लिए जीवन के सुखों एवं दुखों का अनुभव करने के लिए, या अपने हाथ के द्वारा किसी विशेष व्यक्ति को सिद्ध करने के लिए या जैसे कोई आगे बढ़ता है तो उसको व्यक्तिगत रूप से बढ़ते हुए देखने के लिए नहीं आया है। यह उसका काम नहीं है; उसका काम केवल एक नए युग का आरम्भ करना, और पुराने युग का समापन करना है। अर्थात्, वह एक नए युग को आरम्भ करेगा, अन्य युग का अंत करेगा, और एक व्यक्ति के रूप में कार्य करने के द्वारा शैतान को पराजित करेगा। हर समय वह एक व्यक्ति के रूप में कार्य करता है, यह ऐसा है मानो वह युद्ध के मैदान में कदम रख रहा है। देह में, वह सर्वप्रथम संसार को पराजित करता है और शैतान पर प्रबल होता है; वह सारी महिमा प्राप्त करता है और पूरे दो हज़ार वर्षों के कार्य पर से पर्दा उठता है, तथा पृथ्वी के सभी मनुष्यों को अनुसरण के लिए एक सही मार्ग, और शांति एवं आनन्द का जीवन प्रदान करता है। फिर भी, परमेश्वर लम्बे समय तक पृथ्वी पर मनुष्य के साथ नहीं रह सकता है, क्योंकि परमेश्वर तो परमेश्वर है, और बहरहाल मनुष्य के समान कतई नहीं है। वह एक सामान्य मनुष्य के जीवनकाल को नहीं जी सकता है, अर्थात्, वह पृथ्वी पर एक ऐसे मनुष्य के रूप में नहीं रह सकता है जो साधारण मनुष्य के अलावा कुछ भी नहीं है, क्योंकि उसके पास इस सम्बन्ध में अपने जीवन को बनाए रखने के लिए साधारण मनुष्यों की सामान्य मानवता का केवल एक अति सूक्ष्म अंश ही है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर कैसे एक परिवार शुरू कर सकता है और पृथ्वी पर सन्तानों को बढ़ा सकता है? क्या यह एक कलंक नहीं होगा? वह सिर्फ सामान्य रूप से कार्य करने के उद्देश्य से सामान्य मानवता धारण करता है, न कि एक परिवार को शुरु करने हेतु अपने आपको समर्थ करने के लिए जैसा एक आम मनुष्य करेगा। उसका सामान्य एहसास, सामान्य मस्तिष्क, और सामान्य खान-पान और उसकी देह के वस्त्र यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि उसमें सामान्य मानवता है; इस बात को साबित करने के लिए कि वह सामान्य मानवता से सुसज्जित है उसे एक परिवार शुरू करने की कोई ज़रूरत नहीं है। यह पूरी तरह से अनावश्यक है! परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, इसका अर्थ है वचन देहधारी हुआ है; वह मात्र अपने वचन को समझाने और अपने वचन को देखने के लिए मनुष्य को अनुमति देता है, अर्थात्, मनुष्य को अनुमति देता है कि वह देह के द्वारा सम्पन्न किए गए कार्य को देख सके। उसका अभिप्राय लोगों के लिए नहीं है कि वे उसके शरीर के प्रति एक विशेष रीति से व्यवहार करें, किन्तु केवल मनुष्य के लिए है कि वह अंत तक आज्ञाकारी बना रहे, अर्थात्, वह सभी वचनों का पालन करे जो उसके मुख से निकलते हैं, और उन सब कार्य के प्रति समर्पित हो जाए जिसे वह करता है। वह मात्र शरीर में काम कर रहा है, वह इच्छापूर्वक मनुष्य से यह नहीं कह रहा है कि वे उसकी देह की महानता या पवित्रता की प्रशंसा करें। वह मात्र मनुष्यों को अपने कार्य की बुद्धिमत्ता और समस्त अधिकार दिखा रहा है जिन्हें वह इस्तेमाल करता है। इसलिए, भले ही उसके पास एक असाधारण मानवता है, फिर भी वह कोई घोषणा नहीं करता है, और केवल उस काम पर ध्यान केन्द्रित करता है जिसे उसे करना चाहिए। आपको जानना चाहिए कि ऐसा क्यों है कि परमेश्वर ने देहधारण किया फिर भी उसके विषय में घमण्ड नहीं करता है या अपनी सामान्य मानवता के प्रति गवाही नहीं देता है, और इसके बदले मात्र उस कार्य को सम्पन्न करता है जिसे उसने करने की इच्छा की है। इसी लिए आप केवल परमेश्वर के देहधारण के ईश्वरत्व के अस्तित्व को देखते हैं, मात्र इसलिए क्योंकि वह मनुष्य के लिए कभी अपनी मानवता की घोषणा नहीं करता है कि वह उससे स्पर्धा करे। जब मनुष्य मनुष्य की अगुवाई करता है केवल तभी वह मानवता के अपने अस्तित्व के विषय में बात करता है, ताकि उन्हें प्रभावित और आश्वस्त करने के जरिए दूसरों का नेतृत्व हासिल कर सके। इसके विपरीत, परमेश्वर केवल अपने कार्य के जरिए ही मनुष्य पर विजय पाता है (अर्थात्, ऐसा कार्य जिसे मनुष्य नहीं कर सकता है)। वह मनुष्यों को प्रभावित नहीं करता है, और पूरी मानवजाति से अपनी “आराधना” नहीं करवाता है, किन्तु मात्र मनुष्य में आदर के एक एहसास को डालता है या मनुष्य को अपनी रहस्यमयता से अवगत कराता है। परमेश्वर को कोई आवश्यकता नहीं है कि वह मनुष्य को प्रभावित करे। वह आपसे बस इतना चाहता है कि जब एक बार आपने उसके स्वभाव को देख लिया है तो उसका आदर करें।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (2)” से

        15. देहधारी परमेश्वर का कार्य उन व्यक्तियों के समान नहीं है जिन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया गया था। जब परमेश्वर पृथ्वी पर अपना काम करता है, तब वह केवल अपनी सेवकाई को पूरा करने की परवाह करता है। जहाँ तक अन्य मुद्दों की बात है जो उसकी सेवकाई से सम्बन्धित नहीं हैं, वह व्यावहारिक रूप से कोई भाग नहीं लेता है, यहाँ तक कि उस हद तक जहाँ वह जान-बूझकर अनदेखा करता है। वह मात्र उस कार्य को सम्पन्न करता है जिसे उसे अवश्य करना चाहिए, और वह उस कार्य के विषय में तो बिलकुल भी परवाह नहीं करता है जिसे मनुष्य को अवश्य करना चाहिए। वह कार्य जिसे वह करता है वह केवल उस युग से सम्बन्धित है जिसमें वह है और उस सेवकाई से सम्बन्धित है जिसे उसे अवश्य पूरा करना है, मानो बाकी सभी मुद्दे उसकी ज़िम्मेदारी नहीं हैं। वह एक मनुष्य के रूप में जीवन जीने के विषय पर अपने आपको और अधिक मूलभूत ज्ञान से सुसज्जित नहीं करता है, तथा वह और अधिक सामाजिक कौशल या अन्य किसी चीज़ को नहीं सीखता है जिसे मनुष्य समझता है। वह उन सभी चीज़ों की ज़रा सी भी परवाह नहीं करता है जिनसे मनुष्य को सुसज्जित किया जाना चाहिए और वह मात्र उस कार्य को करता है जो उसका कर्तव्य है। और इस प्रकार, जैसा मनुष्य इसे देखता है, देहधारी परमेश्वर में बहुत कुछ की “कमी” है, यहाँ तक कि उस हद तक कि वह जान-बूझकर बहुत कुछ को अनदेखा कर देता है जो किसी मनुष्य के पास होना चाहिए, और उसके पास ऐसे मुद्दों की समझ नहीं है। ऐसे मामले जैसे जीवन का सामान्य ज्ञान, साथ ही साथ व्यवहार के सिद्धान्त और ऐसा प्रतीत होता है कि दूसरों के साथ जुड़ने का उसके लिए कोई महत्व नहीं है। इसके बावजूद, आप देहधारी परमेश्वर की ओर से थोड़े से भी असामान्य व्यवहार का आभास नहीं कर सकते हैं। कहने का अभिप्राय है, कि उसकी मानवता सिर्फ उसके जीवन को बनाए रखती है एक साधारण मनुष्य के रूप में जिसके पास अपने मस्तिष्क का सामान्य तर्क है, और उसे सही एवं ग़लत के बीच भेद करने की योग्यता देती है। फिर भी, वह किसी और चीज़ से सुसज्जित नहीं है, जिसमें से सब कुछ सिर्फ मनुष्य (सृजे गए प्राणियों) के लिए है। परमेश्वर केवल अपनी सेवकाई को पूरा करने के लिए देहधारी हुआ है। उसका कार्य एक समूचे युग की ओर निर्देशित है और न कि किसी विशेष व्यक्ति या स्थान की ओर। उसका कार्य समूचे विश्व की ओर निर्देशित है। यह उसके कार्य की दिशा है और वह सिद्धान्त है जिसके द्वारा वह कार्य करता है। इसे किसी के द्वारा बदला नहीं जा सकता है, और मनुष्य उसका कोई भाग नहीं ले सकता है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (3)” से

        16. परमेश्वर पृथ्वी पर केवल अपना काम पूरा करने आया है, और इस प्रकार पृथ्वी पर उसका कार्य थोड़े समय का है। वह पृथ्वी पर आता है किन्तु परमेश्वर के पवित्र आत्मा के लिए इस अभिप्राय के साथ नहीं कि वह उसके शरीर को कलीसिया के एक असाधारण अगुवे के रूप में संवर्धित करे। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो यह वचन का देहधारी होना है; फिर भी, मनुष्य उसके कार्य को नहीं जानता है और ऐसे इरादों को उस पर थोपता है। किन्तु आप सबको यह एहसास करना चाहिए कि परमेश्वर वह वचन है जो देहधारी हुआ है, न कि एक देह है जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा संवर्धित किया गया है कि वह थोड़े समय के लिए परमेश्वर की भूमिका को निभाए। स्वयं परमेश्वर को संवर्धित नहीं किया गया है, बल्कि स्वयं परमेश्वर वह वचन है जो देहधारी हुआ है, और आज वह आप सबके बीच में अपने कार्य को आधिकारिक रूप से सम्पन्न करता है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (3)” से

        17. परमेश्वर ने केवल उस युग की अगुवाई करने और एक नए कार्य को गतिमान करने के लिए देहधारण किया है। आपको इस बिन्दु को समझना होगा। यह मनुष्य की कार्य प्रणाली से बहुत अलग है, और दोनों का एक ही सांस में उल्लेख नहीं किया जा सकता है। इससे पहले कि कार्य सम्पन्न करने के लिए मनुष्य का उपयोग किया जाए, मनुष्य को संवर्धन एवं सिद्धता की एक लम्बी समयावधि की आवश्यकता है और विशेष रूप में बड़ी मानवता की आवश्यकता है। न केवल मनुष्य को अपनी सामान्य मानवीय समझ को बनाए रखने के योग्य होना होगा, बल्कि मनुष्य को दूसरों के सामने व्यवहार के अनेक सिद्धान्तों और नियमों को और भी अधिक समझना होगा, और इसके अतिरिक्त उसे मनुष्य की बुद्धि और नैतिकता को और अधिक सीखना होगा। यह वह है जिससे मनुष्य को सुसज्जित होना होगा। फिर भी, यह ऐसा नहीं है क्योंकि परमेश्वर ने देहधारण किया है, क्योंकि उसका कार्य न तो मनुष्य का प्रतिनिधित्व करता है और न ही मनुष्यों की ओर से है; उसके बजाए, यह उसके अस्तित्व की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है और उस कार्य का प्रत्यक्ष क्रियान्वयन है जिसे उसे अवश्य करना चाहिए। (स्वाभाविक रूप से, उसके कार्य को सम्पन्न किया जाता है जब उसे किया जाना चाहिए, और बिना सोचे समझे इच्छानुसार नहीं किया जाता है। इसके बजाए, उसके कार्य को तब शुरू किया गया है जब वह समय है कि उसकी सेवकाई को पूर्ण किया जाए) वह मनुष्य के जीवन में या मनुष्य के कार्य में भाग नहीं लेता है, अर्थात्, उसकी मानवता इन में से किसी चीज़ से सुसज्जित नहीं है (परन्तु यह उसके कार्य को प्रभावित नहीं करता है)। वह केवल अपनी सेवकाई को पूरा करता है जब उसके लिए ऐसा करने का समय होता है; उसका रुतबा कुछ भी हो, वह बस उस कार्य के साथ अथक प्रयास करते हुए आगे बढ़ता है जिसे उसे अवश्य करना चाहिए। मनुष्य उसके बारे में जो भी जानता है या उसके विषय में उनके राय जो भी हों, उससे उसके कार्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। यह ठीक ऐसा है जब यीशु ने अपना काम सम्पन्न किया था; कोई नहीं जानता था कि वह कौन था, परन्तु वह बस अथक प्रयास करते हुए अपने काम में आगे बढ़ता गया। इसमें से किसी ने भी उस कार्य को सम्पन्न करने में उसे प्रभावित नहीं किया जिसे उसे अवश्य करना चाहिए था। इसलिए, उसने पहले पहल अपनी स्वयं की पहचान का अंगीकार या उसकी घोषणा नहीं की, और महज इतना किया कि लोग उनका अनुसरण करें। स्वाभाविक रूप से यह न केवल परमेश्वर की विनम्रता थी; बल्कि यह वह सलीका था जिसके अंतर्गत परमेश्वर ने देह में काम किया था। वह केवल इसी रीति से काम कर सकता है, क्योंकि मनुष्य उसे अपनी खुली आँखों से पहचान नहीं सकता है। और यदि मनुष्य पहचान भी लेता, तो वह उसके काम में मदद करने में सक्षम नहीं होता। इससे बढ़कर, वह इसलिए देहधारी नहीं हुआ कि मनुष्य उसकी देह को जान सके; यह उस कार्य को सम्पन्न करने और अपनी सेवकाई को पूरा करने के लिए था। इसी कारण से, उसने अपनी पहचान जाहिर करने को कोई महत्व नहीं दिया। जब उसने वह सब काम पूरा कर लिया जिसे उसे अवश्य करना था, तब उसकी पूरी पहचान और हैसियत को मनुष्य के द्वारा स्वाभाविक रूप से समझा गया था। वह परमेश्वर जो देहधारी हुआ वह बस चुपचाप रहता है और कभी कोई घोषणा नहीं करता है। वह मनुष्य पर या उसका अनुसरण करते हुए मनुष्य किस प्रकार अकेला रह जाता है इस पर कोई ध्यान नहीं देता है, और अपनी सेवकाई पूरा करने में और उस कार्य को सम्पन्न करने में अथक प्रयास करते हुए आगे बढ़ते जाता है जिसे उसे अवश्य करना चाहिए। कोई भी उसके कार्य के मार्ग में खड़ा नहीं हो सकता है। जब उसके कार्य को समाप्त करने का समय आता है, तब यह उस कार्य के लिए आवश्यक है कि उसे समाप्त कर दिया जाए और उसका अंत कर दिया जाए। कोई भी किसी और ढंग से आदेश नहीं दे सकता है। अपने काम की समाप्ति के बाद जब वह मनुष्य के पास से चला जाता है केवल तभी मनुष्य उस काम को समझ पाएगा जो उसने किया है, भले ही वह अब भी उसे सम्पूर्ण एवं स्पष्ट रीति से नहीं समझता है। और जबकि उसने पहली बार अपने कार्य को सम्पन्न किया तो उसके इरादों को पूरी रीति से समझने के लिए मनुष्य को बहुत लम्बा समय लगेगा। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर ने देहधारण किया तो उस युग के कार्य को दो भागों में बांटा गया है। परमेश्वर जो स्वयं देहधारी हुआ प्रथम भाग उसके कार्य और वचनों के जरिए हुआ है। जब एक बार उसकी देह की सेवकाई पूरी तरह से सम्पूर्ण हो जाती है, तो उसके दूसरे भाग को उनके द्वारा सम्पन्न किया जाना है जिन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया जाता है; फिर यह मनुष्य का समय है कि वह अपने कार्य को पूरा करे, क्योंकि परमेश्वर ने पहले ही मार्ग खोल दिया है, और अब उस पर स्वयं मनुष्य को चलना होगा। कहने का अभिप्राय है, परमेश्वर ने अपने कार्य के एक भाग को सम्पन्न करने के लिए देहधारण किया है, और इसे पवित्र आत्मा साथ ही साथ उन लोगों के द्वारा निरन्तर जारी रखा जाता है जिन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया जाता है। अतः मनुष्य को उस प्राथमिक कार्य को जानना चाहिए जिसे परमेश्वर के द्वारा सम्पन्न किया जाता है जिसने कार्य के इस चरण में देहधारण किया है। मनुष्य को परमेश्वर द्वारा देहधारण करने के महत्व को और उस कार्य को सटीक रूप में जाना चाहिए जिसे उसे अवश्य करना है, इसके बजाए कि परमेश्वर से वह बात पूछे जो मनुष्य से पूछा गया है। यह मनुष्य की ग़लती है, साथ ही साथ यह उसका मत है, और उसके अतिरिक्त, उसकी अनाज्ञाकारिता है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (3)” से

        18. परमेश्वर ने देहधारण इस अभिप्राय से नहीं किया कि मनुष्य को उसकी देह को जानने की अनुमति दे, या मनुष्य को अनुमति दे कि वह देहधारी परमेश्वर की देह और मनुष्य की देह के बीच के अन्तर को पहचाने; परमेश्वर ने मनुष्य की परखने की योग्यता को प्रशिक्षित करने के लिए देहधारण नहीं किया है, मनुष्य के लिए इस अभिप्राय के साथ तो बिलकुल भी नहीं किया है कि वह परमेश्वर के देहधारी शरीर की आराधना करे, जिससे उसे बड़ी महिमा मिलेगी। इसमें से कुछ भी देहधारण करने के लिए परमेश्वर की मूल इच्छा नहीं है। परमेश्वर ने मनुष्य को दोषी ठहराने के लिए, जानबूझकर मनुष्य को प्रकट करने के लिए, या चीज़ों को मनुष्य के लिए कठिन करने के लिए देहधारण नहीं किया है। इसमें से कोई भी उसकी मूल इच्छा नहीं है। जब भी परमेश्वर देहधारण करता है, तो यह एक ऐसा कार्य है जिसे टाला नहीं जा सकता है। यह उसके बड़े कार्य और उसके बड़े प्रबंधन के लिए है कि वह ऐसा करता है, और उन कारणों के लिए नहीं है जिनकी मनुष्य कल्पना करते हैं। परमेश्वर पृथ्वी पर आता है केवल तभी जब उसके कार्य के द्वारा मांग की जाती है, और हमेशा आता है जब आवश्यकता होती है। वह पृथ्वी पर घूमने-फिरने के इरादे के साथ नहीं आता है, किन्तु उस कार्य को सम्पन्न करने लिए आता है जो उसे अवश्य करना चाहिए। नहीं तो वह ऐसे स्वर्गीय बोझ का भार क्यों उठाएगा और इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए इतना बड़ा जोखिम क्यों लेगा? परमेश्वर देहधारण करता है केवल तब जब उसे ऐसा करना है, और वह हमेशा एक अद्वितीय महत्व के साथ देहधारण करता है। यदि यह सिर्फ मनुष्य को अनुमति देने के लिए होता कि वह उस पर एक नज़र डाले और उनकी आँखों को खोले, तो वह, पूरी निश्चितता के साथ, इतने ओछे ढंग से मनुष्य के बीच कभी नहीं आता। वह पृथ्वी पर अपने प्रबंधन और अपने बड़े काम के लिए, और उसके लिए आता है जिससे वह बहुत से लोगों को हासिल करने में सक्षम हो जाए। वह उस युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए और शैतान को पराजित करने के लिए आया है, और वह शैतान को पराजित करने के लिए देह में होकर आया है। इसके अतिरिक्त, वह समस्त मानवजाति की उनकी ज़िन्दगियों में अगुवाई करने के लिए आया है। यह सब कुछ उसके प्रबंधन से सम्बन्धित है, और ऐसा कार्य है जो पूरे विश्व से सम्बन्धित है। यदि परमेश्वर ने मात्र मनुष्य को अपनी देह को जानने की अनुमति देने के लिए और उनकी आँखों को खोलने के लिए देहधारण किया होता, तो वह हर देश की यात्रा क्यों नहीं करता? क्या यह बहुत ज़्यादा आराम का विषय नहीं है? परन्तु उसने ऐसा नहीं किया, इसके बजाए एक उपयुक्त स्थान चुनता है कि उसमें उस कार्य को व्यवस्थित और आरम्भ करे जिसे उसे अवश्य करना चाहिए। केवल यह देह ही अत्याधिक महत्व का है। वह समूचे युग का प्रतिनिधित्व करता है, और साथ ही समूचे युग के कार्य को भी सम्पन्न करता है; वह पुराने युग का समापन और नए युग का आरम्भ दोनों करता है। यह सब महत्वपूर्ण मुद्दा है जो परमेश्वर के प्रबंधन से जुड़ा हुआ है, और यह कार्य के एक चरण का महत्व है जिसे परमेश्वर के द्वारा सम्पन्न किया गया है जो पृथ्वी पर आया है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (3)” से

        19. प्रत्येक युग के कार्य की शुरुआत स्वयं परमेश्वर के द्वारा की जाती है, परन्तु आपको अवश्य जानना चाहिए कि परमेश्वर का काम कुछ भी हो, वह कोई आन्दोलन शुरू करने के लिए, या विशेष सम्मेलन आयोजित करने के लिए या आपके लिए किसी प्रकार की संस्था की स्थापना करने के लिए नहीं आया है। वह केवल उस कार्य को सम्पन्न करने के लिए आया है जिसे उन्हें अवश्य करना चाहिए। उसके कार्य को किसी मनुष्य के द्वारा प्रतिबन्धित नहीं किया जाता है। वह अपने कार्य को जैसा चाहता है वैसा करता है; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य क्या सोचता है या जानता है, क्योंकि वह केवल अपने कार्य को सम्पन्न करने पर ध्यान केन्द्रित करता है। संसार की सृष्टि के समय से ही, पहले से ही कार्य के तीन चरण हैं; यहोवा से लेकर यीशु तक, व्यवस्था के युग से लेकर अनुग्रह के युग तक, परमेश्वर ने कभी भी मनुष्य के लिए एक विशेष सम्मलेन आयोजित नहीं किया है, न ही उसने कभी अपने कार्य को फैलाने हेतु एक विशेष वैश्विक कार्यकारी सम्मलेन आयोजित करने के लिए समस्त मानवजाति को इकट्ठा किया है। जब समय और स्थान सही होता है तब वह मात्र एक समूचे युग के प्राथमिक कार्य को सम्पन्न करता है, और इसके जरिए मानवजाति की उनकी ज़िन्दगियों में अगुवाई करने के लिए उस युग का आरम्भ करता है। विशेष सभाएं तो मनुष्य की मण्डलियां हैं; छुट्टियों का उत्सव मनाने के लिए लोगों को एकत्रित करना मनुष्य का काम है। परमेश्वर छुट्टियाँ नहीं मनाता है और, इसके अतिरिक्त, उनसे घृणा करता है; वह विशेष सम्मेलनों का आयोजन नहीं करता है और उससे बढ़कर उनसे घृणा करता है। अब आपको ठीक-ठीक समझ लेना चाहिए कि परमेश्वर का कार्य क्या है जिसने देहधारण किया है!

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (3)” से

        20. परमेश्वर के सम्पूर्ण स्वभाव को छ: हज़ार वर्षों की प्रबंधकीय योजना के दौरान प्रकट किया गया है। इसे सिर्फ अनुग्रह के युग में, सिर्फ व्यवस्था के युग में प्रकट नहीं किया गया है, या सिर्फ अंतिम दिनों की इस समयावधि में तो बिलकुल भी प्रकट नहीं किया गया है। अंतिम दिनों में किया गया कार्य न्याय, क्रोध और ताड़ना को दर्शाता है। अंतिम दिनों में किया गया कार्य व्यवस्था के युग या अनुग्रह के युग के कार्य का स्थान नहीं ले सकता है। फिर भी, तीनों चरण आपस में एक दूसरे से जुड़कर एक अस्तित्व बन जाते हैं और सभी एक ही परमेश्वर के द्वारा किये गए कार्य हैं। स्वाभाविक रूप में, इस कार्य के क्रियान्वयन को तीन अलग अलग युगों में बांटा गया है। अंत के दिनों में किए गए कार्य हर चीज़ को समाप्ति की ओर ले जाते हैं; जो कुछ व्यवस्था के युग में किया गया वह शुरुआत के विषय में है; और जो कुछ अनुग्रह के युग में किया गया वह छुटकारे के विषय में है। जहाँ तक सम्पूर्ण छ: हज़ार वर्षों की प्रबंधकीय योजना में कार्य के उन दर्शनों की बात है, तो किसी को भी अंर्तदृष्टि या समझ हासिल नहीं हो सकती है। ऐसे दर्शन हमेशा से ही रहस्य बने हुए हैं। अंत के दिनों में, राज्य के युग का आरम्भ करने के लिए केवल वचन के कार्य को किया गया है, परन्तु यह सभी युगों का प्रतिनिधि नहीं है। अंतिम दिन अंत के दिनों से बढ़कर नहीं हैं और राज्य के युग से बढ़कर नहीं हैं, जो अनुग्रह के युग या व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व नहीं करते है। अंत के दिन मात्र वह समय है जिसमें छ: हज़ार वर्षों की प्रबंधकीय योजना के सभी कार्य को आप पर प्रकट किया गया है। यह रहस्य से पर्दा उठाना है। ऐसे रहस्य को किसी भी मनुष्य के द्वारा बेपर्दा नहीं किया जा सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य के पास बाईबिल की कितनी अधिक समझ है, यह शब्दों से बढ़कर और कुछ नहीं है, क्योंकि मनुष्य बाईबिल के मूल तत्व को नहीं समझता है। जब मनुष्य बाईबिल पढ़ता है, तो वह कुछ सच्चाईयों को प्राप्त कर सकता है, कुछ शब्दों की व्याख्या कर सकता है या कुछ प्रसिद्ध अंशों या उद्धरणों का सूक्ष्म परिक्षण कर सकता है, परन्तु वह उन वचनों के भीतर निहित अर्थ को मुक्त करने में कभी भी समर्थ नहीं होगा, क्योंकि वह सब कुछ जिसे मनुष्य देखता है वे मरे हुए शब्द हैं, यहोवा और यीशु के कार्य के दृश्य नहीं हैं, और मनुष्य ऐसे कार्य के रहस्य को सुलझाने में असमर्थ है। इसलिए, छ: हज़ार वर्षों की प्रबंधकीय योजना का रहस्य एक बहुत बड़ा रहस्य है, एक ऐसा रहस्य जो मनुष्य से बिलकुल छिपा हुआ और पूरी तरह से उसकी सोच से परे है। कोई भी सीधे तौर पर परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझ सकता है, जब तक वह स्वयं न समझाए और उस पर प्रकट न करे, अन्यथा, वे सर्वदा मनुष्य के लिए पहेली बने रहेंगे और सर्वदा मुहरबंद रहस्य बने रहेंगे। वे जो धार्मिक जगत में हैं उन पर कभी ध्यान मत दो; यदि आपको आज नहीं बताया जाए, तो आप समझने में समर्थ नहीं होंगे।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (4)” से

        21. अंतिम दिनों का कार्य तीनों चरणों में अंतिम चरण है। यह एक अन्य नए युग का कार्य है और समग्र प्रबंधकीय कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। छ: हज़ार वर्षों की प्रबंधकीय योजना कार्य के तीन चरणों में बंटी हुई है। कोई भी चरण अकेले तीन युगों के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है परन्तु सम्पूर्ण भाग के केवल एक भाग का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है। यहोवा नाम अकेले ही परमेश्वर के सम्पूर्ण स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। इस तथ्य से कि उसने व्यवस्था के युग में कार्य सम्पन्न किया है यह साबित नहीं होता है कि परमेश्वर केवल व्यवस्था के अधीन परमेश्वर हो सकता है। यहोवा ने मनुष्य के लिए व्यवस्थाओं को निर्धारित किया था और आज्ञाओं को अगली पीढ़ियों को सौंपा था, और मनुष्य से मंदिर और वेदियाँ बनाने के लिए कहा था; वह कार्य जो उसने किया था वह केवल व्यवस्था के युग को दर्शाता था। वह कार्य जो उसने किया था वह यह साबित नहीं करता है कि परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मनुष्य से व्यवस्था, मंदिर के परमेश्वर, या वेदी के सामने के परमेश्वर का पालन करने के लिए कहता है। ऐसा नहीं कहा जा सकता है। व्यवस्था के युग के अधीन कार्य केवल एक ही युग का प्रतिनिधित्व कर सकता है। इसलिए, यदि परमेश्वर ने केवल व्यवस्था के युग में ही काम किया होता तो मनुष्य परमेश्वर की परिभाषा देता और कहता, “परमेश्वर मंदिर का परमेश्वर है। उसकी सेवा करने के लिए, हमें याजकीय वस्त्र पहनना होगा और मंदिर में प्रवेश करना होगा।” यदि अनुग्रह के युग में उस कार्य को कभी सम्पन्न नहीं किया जाता और व्यवस्था का युग वर्तमान तक जारी रहता, तो मनुष्य यह नहीं जान पाता कि परमेश्वर दयावन्त और प्रेमी भी है। यदि व्यवस्था के युग में कार्य नहीं किया जाता, और केवल अनुग्रह के युग में ही किया जाता, तो मनुष्य बस इतना ही जान पाता कि परमेश्वर मनुष्य को छुटकारा दे सकता है और मनुष्य के पापों को क्षमा कर सकता है। वे केवल इतना ही जान पाते कि वह पवित्र और निर्दोष है, और यह कि वह स्वयं का बलिदान कर सकता है और मनुष्य के लिए क्रूस पर चढ़ सकता है। मनुष्य केवल इसके विषय में ही जान पाता और अन्य सभी बातों के विषय में उसके पास कोई समझ नहीं होती। अतः, प्रत्येक युग परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग को दर्शाता है। व्यवस्था का युग कुछ पहलुओं को दर्शाता है, अनुग्रह का युग कुछ पहलुओं को दर्शाता है, और फिर यह युग कुछ पहलुओं को दर्शाता है। परमेश्वर के स्वभाव को सिर्फ तीनों युगों को मिलाने के जरिए ही पूरी तरह से प्रकट किया जा सकता है। जब मनुष्य इन तीनों चरणों को पहचान जाता है केवल तभी मनुष्य इसे पूरी तरह से प्राप्त कर सकता है। तीनों में से एक भी चरण को छोड़ा नहीं जा सकता है। जब एक बार आप कार्य के इन तीनों चरणों को जान लेते है तो आप केवल परमेश्वर के स्वभाव को उसकी सम्पूर्णता में देखेंगे। व्यवस्था के युग में परमेश्वर द्वारा अपने कार्य की समाप्ति यह साबित नहीं करती है कि वह व्यवस्था के अधीन परमेश्वर है, और छुटकारे के उसके कार्य की समाप्ति यह नहीं दर्शाती है कि परमेश्वर सदैव मानवजाति को छुटकारा देगा। ये सभी मनुष्य के द्वारा निकाले गए निष्कर्ष हैं। अनुग्रह का युग समाप्त हो गया है, परन्तु आप यह नहीं कह सकते हैं कि परमेश्वर केवल क्रूस से ही सम्बन्धित है और यह कि क्रूस परमेश्वर के उद्धार का प्रतिनिधित्व करता है। यदि आप ऐसा कहते हैं, तो आप परमेश्वर को परिभाषित कर रहे हैं। इस चरण में, परमेश्वर मुख्य रूप से वचन का काम कर रहा है, परन्तु आप यह नहीं कह सकते हैं कि परमेश्वर मनुष्य के प्रति कभी दयालु नहीं रहा है और यह कि वह सब कुछ जो वह लेकर आया है वह ताड़ना और न्याय है। अंत के दिनों में यह कार्य यहोवा और यीशु के कार्य को और सभी रहस्यों को खोलकर प्रकट करता है जिन्हें मनुष्य के द्वारा समझा नहीं गया है। इसे मानवजाति की नियति और अंत को प्रकट करने के लिए और मानवजाति के बीच उद्धार के सब कार्य को समाप्त करने के लिए किया गया है। अंत के दिनों में कार्य का यह चरण सभी चीज़ों को समाप्ति की ओर ले जाता है। सभी रहस्य जिन्हें मनुष्य के द्वारा समझा नहीं गया है उन्हें प्रकट किया जाना चाहिए कि मनुष्य को ऐसे रहस्यों में अंर्तदृष्टि पाने की अनुमति मिले और उनके हृदयों में एक स्पष्ट समझ हो सके। केवल तब ही मनुष्य को उनके वर्गों के अनुसार बांटा जा सकता है। जब छ: हज़ार वर्षों की प्रबंधकीय योजना को समाप्त कर दिया जाता है केवल उसके पश्चात् ही मनुष्य परमेश्वर के स्वभाव को उसकी सम्पूर्णता में समझ पायेगा, क्योंकि तब उसकी प्रबंधकीय योजना समाप्त हो जाएगी।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (4)” से

        22. छ: हजार वर्षों की प्रबंधकीय योजना के दौरान किए गए सभी कार्य अब समाप्त होने पर हैं। जब यह सब कार्य मनुष्य पर प्रकट कर दिया जाता है और मनुष्य के बीच सम्पन्न कर दिया जाता है केवल उसके पश्चात् ही वे परमेश्वर के सम्पूर्ण स्वभाव और उसकी व्यावहारिक सम्पदाओं (गुण, विशेषताओं) और अस्तित्व को जानेंगे। जब इस चरण के कार्य को पूरी तरह से पूर्ण कर लिए जाता है, तब वे सभी रहस्य जिन्हें मनुष्य के द्वारा समझा नहीं गया है उन्हें प्रकट कर दिया जाएगा, सारी सच्चाइयाँ जिन्हें पहले समझा नहीं गया था उन्हें स्पष्ट कर दिया जाएगा, और मानवजाति को उसके भविष्य के मार्ग और नियति के विषय में बता दिया जाएगा। यह वह सब कार्य है जिसे इस चरण में सम्पन्न किया जाना है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (4)” से

        23. आज मनुष्य से जो मांग की जाती है वह प्राचीन काल से अलग है और व्यवस्था के युग में मनुष्य से जो मांग की जाती थी यह तो उससे और भी अधिक अलग है। और जब इस्राएल में कार्य किया गया था तब व्यवस्था के अंतर्गत मनुष्य से क्या मांग की गई थी? उनसे सब्त और यहोवा की व्यवस्थाओं का पालन करने से बढ़कर और कुछ की मांग नहीं की गई थी। किसी को भी सब्त के दिन काम नहीं करना था या यहोवा की व्यवस्था का उल्लंघन नहीं करना था। परन्तु अब ऐसा नहीं है। सब्त में, मनुष्य काम करते हैं, हमेशा की तरह इकट्ठे होते हैं और प्रार्थना करते हैं, और उन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया जाता है? वे जो अनुग्रह के युग में थे उन्हें बपतिस्मा लेना पड़ता था; सिर्फ इतना ही नहीं, उन्हें उपवास करने, रोटी तोड़ने, दाखमधु पीने, अपने सिरों को ढांकने और अपने पांव धोने के लिए कहा जाता था। अब, इन नियमों का उन्मूलन कर दिया गया है और मनुष्यों से और भी बड़ी मांगें की गई हैं, क्योंकि परमेश्वर का कार्य लगातार और अधिक गहरा होता जाता है और मनुष्य का प्रवेश-द्वार पहले से कहीं अधिक ऊँचा हो गया है। अतीत में, यीशु मनुष्य पर हाथ रखता था और प्रार्थना करता था, परन्तु अब जबकि सब कुछ कहा जा चुका है, तो लोगों पर हाथ रखने का क्या काम है? अकेले वचन ही परिणामों को हासिल कर सकते हैं। जब अतीत में वह अपना हाथ मनुष्य के ऊपर रखता था, तो यह मनुष्य को आशीष देने और चंगा करने के लिए था। उस समय पवित्र आत्मा इसी प्रकार से काम करता था, परन्तु अब ऐसा नहीं है। अब, पवित्र आत्मा परिणामों को हासिल करने के लिए अपने कार्य में वचनों का उपयोग करता है। उसने अपने वचनों को आपके लिए स्पष्ट कर दिया है, और आपको बस उन्हें अभ्यास में लाना चाहिए। उसके वचन उसकी इच्छा हैं और उस कार्य को दर्शाते हैं जिसे वह करेगा। उसके वचनों के जरिए, आप उसकी इच्छा और उसे समझ सकते हैं जिसे वह आपको हासिल करने के लिए कहता है। आप बस हाथ रखने की आवश्यकता के बिना सीधे तौर पर उसके वचनों को अभ्यास में लाइए। कुछ लोग कह सकते हैं, “मुझ पर अपना हाथ रखिए! मुझ पर हाथ रखिए ताकि मैं आपकी आशीष को प्राप्त करूँ और आपका भागी बनूँ।” ये सभी पहले की पुरानी प्रथाएं हैं जो अब प्रतिबन्धित हैं, क्योंकि युग बदल चुका है। पवित्र आत्मा युग की अनुरूपता में कार्य करता है, न कि इच्छानुसार या तय नियमों के अनुसार। युग बदल चुका है, और एक नए युग को अपने साथ नया काम लेकर आना होगा। यह कार्य के प्रत्येक चरण के विषय में सत्य है, और इस प्रकार उसका कार्य कभी दोहराया नहीं जाता है। अनुग्रह के युग में, यीशु ने उस तरह के बहुत से काम किए, जैसे बीमारियों को चंगा करना, दुष्टात्माओं को निकालना, मनुष्य के लिए प्रार्थना करने के लिए मनुष्य पर हाथ रखना, और मनुष्य को आशीष देना। फिर भी, वर्तमान समय में निरन्तर ऐसा करने का कोई लाभ नहीं होगा। उस समय पवित्र आत्मा उस तरह से काम करता था, क्योंकि वह अनुग्रह का युग था, और आनन्द के लिए मनुष्य पर बहुत अनुग्रह किया गया था। मनुष्य को कोई कीमत चुकानी नहीं पड़ती थी और जब तक उसके पास विश्वास था वह अनुग्रह प्राप्त कर सकता था। सब के साथ अत्याधिक अनुग्रह के साथ व्यवहार किया जाता था। अब, युग बदल चुका है, और परमेश्वर का काम और आगे बढ़ चुका है, उसकी ताड़ना और न्याय के जरिए, मनुष्य के विद्रोहीपन को और मनुष्य के भीतर की अशुद्धता को दूर किया जाएगा। चूंकि यह छुटकारे का चरण था, परमेश्वर को ऐसा काम करना पड़ा, उसने मनुष्य के आनन्द के लिए मनुष्य पर पर्याप्त अनुग्रह किया, ताकि वह मनुष्य को उनके पापों से छुटकारा दे सके, और अनुग्रह के जरिए मनुष्य के पापों को क्षमा कर सके। इस चरण को ताड़ना, न्याय, वचनों के प्रहार, साथ ही साथ वचनों के प्रकाशन के जरिए मनुष्य के भीतर के अधर्मों को प्रकट करने के लिए पूरा किया गया है, ताकि बाद में उन्हें बचाया जा सके। यह कार्य छुटकारे के कार्य से कहीं अधिक गहरा है। अनुग्रह के युग में, मनुष्य ने पर्याप्त अनुग्रह का आनन्द उठाया और उसने पहले से ही इस अनुग्रह का अनुभव कर लिया है, और इस प्रकार अब आगे से मनुष्य के द्वारा इसका आनन्द नहीं उठाया जाएगा। ऐसा कार्य अब चलन से बाहर हो गया है और अब आगे से इसे नहीं किया जाता है। अब, मनुष्य को वचन के द्वारा न्याय से बचाया जाता है। मनुष्य का न्याय, उसकी ताड़ना और उसे परिष्कृत करने के पश्चात्, उसके परिणामस्वरूप उसका स्वभाव बदल जाता है। क्या यह उन वचनों के कारण नहीं है जिन्हें मैंने कहा है? कार्य के प्रत्येक चरण को समूची मानवजाति की प्रगति के साथ और उस युग के साथ एक मेल में किया जाता है। सभी कार्यों का अपना महत्व है; इसे अंतिम उद्धार के लिए, मानवजाति के लिए कि उनके पास भविष्य में एक अच्छी नियति हो, और मनुष्य के लिए किया गया है कि उन्हें अंत में उनकी श्रेणी के अनुसार विभाजित किया जाए।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (4)” से

        24. अंत के दिनों का कार्य है वचनों को बोलना। वचनों के जरिए मनुष्य में बड़े-बड़े परिवर्तन किए जा सकते हैं। अब वे परिवर्तन जिन्होंने इन वचनों को स्वीकार करने पर इन लोगों पर असर डाला है वे उन परिवर्तनों की अपेक्षा बहुत अधिक बड़े हैं जिन्होंने चिन्हों और अद्भुत कामों को स्वीकार करने पर अनुग्रह के युग में इन लोगों पर असर डाला था। क्योंकि, अनुग्रह के युग में, हाथ रखने और प्रार्थना करने के साथ ही दुष्टात्माएं मनुष्य से निकल जाते थे, परन्तु मनुष्य के भीतर का भ्रष्ट स्वभाव तब भी बना रहता था। मनुष्य को उसकी बीमारी से चंगा किया गया था और उसके पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु बस वह कार्य, कि किस प्रकार मनुष्य के भीतर से उन शैतानी स्वभावों को निकला जा सकता है, उसमें नहीं किया गया था। मनुष्य को केवल उसके विश्वास के लिए ही बचाया जाता था और उसके पापों को क्षमा किया जाता था, परन्तु उसका पापमय स्वभाव उसमें से निकाला नहीं जाता था और वह तब भी उसमें बना रहता था। मनुष्य के पापों को देहधारी परमेश्वर के द्वारा क्षमा किया जाता था, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य के भीतर कोई पाप नहीं है। पाप बलि के जरिए मनुष्य के पापों को क्षमा किया जा सकता है, परन्तु मनुष्य इस मसले को हल करने में असमर्थ रहा है कि वह कैसे आगे से पाप न करे और कैसे उसके पापमय स्वभाव को पूरी तरह से दूर किया जा सकता है और उसे रूपान्तरित किया जा सकता है। परमेश्वर के क्रूसारोहण के कार्य के कारण मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु मनुष्य पुराने, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में निरन्तर जीवन बिताता रहा। उसी रीति से, मनुष्य को भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से पूरी तरह से बचाया जाना चाहिए ताकि मनुष्य का पापमय स्वभाव पूरी तरह से दूर किया जाए और फिर कभी विकसित न हो, इस प्रकार मनुष्य के स्वभाव को बदल जाने की अनुमति देता है। यह मनुष्य से अपेक्षा करता है कि वह जीवन में उन्नति के पथ को, जीवन के उस मार्ग को, और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के मार्ग को समझे। साथ ही इसकी भी आवश्यकता है कि मनुष्य इस पथ की अनुरूपता में कार्य करे ताकि मनुष्य के स्वभाव को धीरे-धीरे बदला जा सके और वह ज्योति की चमक में जीवन जी सके, और यह कि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सभी चीज़ों को कर सके, और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर कर सके, और शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो सके, उसके परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह से बाहर निकले सके। केवल तब ही मनुष्य सम्पूर्ण उद्धार प्राप्त करेगा। जब यीशु अपना काम कर रहा था, तो परमेश्वर के विषय में मनुष्य का ज्ञान तब भी धुंधला और अस्पष्ट था। मनुष्य ने हमेशा से यह विश्वास किया कि वह दाऊद की संतान था और घोषणा की कि वह एक महान भविष्यवक्ता और विश्वासयोग्य प्रभु है जिसने मनुष्य को पापों से छुटकारा दिया था। विश्वास के आधार पर मात्र उसके वस्त्र को छूने के द्वारा ही कुछ लोग चंगे हो गए थे; अंधे देख सकते थे और यहाँ तक कि मृतक को जिलाया भी जा सकता था। फिर भी, मनुष्य अपने भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए उस शैतानी भ्रष्ट स्वभाव को समझ नहीं सकता है और न ही मनुष्य यह जानता है कि उसे कैसे दूर किया जाए। मनुष्य ने बहुतायत से अनुग्रह प्राप्त किया है, जैसे देह की शांति और खुशी, एक व्यक्ति के विश्वास करने पर पूरे परिवार की आशीष, और बीमारियों से चंगाई, और इत्यादि। बाकि चीज़ें मनुष्य के भले काम और उनका ईश्वरीय रूप था; यदि मनुष्य इस पर आधारित होकर जीवन जी सकता था, तो उसे एक अच्छा विश्वासी माना जाता था। केवल ऐसे विश्वासी ही मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश कर सकते थे, जिसका अर्थ है कि उन्होंने उद्धार पाया था। परन्तु, अपने जीवन काल में, उन्होंने जीवन के मार्ग को बिलकुल भी नहीं समझा था। उन्होंने बस यों ही पाप किया था, फिर परिवर्तित स्वभाव की ओर बिना किसी मार्ग के लगातार चलने वाले एक चक्र में अंगीकार किया था; अनुग्रह के युग में मनुष्य की दशा ऐसी ही थी। क्या मनुष्य ने पूर्ण उद्धार पा लिया था? नहीं! इसलिए, जब यह चरण पूरा हुआ उसके पश्चात्, अभी भी न्याय और ताड़ना का काम बाकी है। यह चरण वचन के जरिए मनुष्य को शुद्ध करता है ताकि मनुष्य को अनुसरण करने का एक मार्ग प्रदान करे। यह चरण फलप्रद या अर्थपूर्ण नहीं होगा यदि यह दुष्टात्माओं को निकालने के साथ जारी रहता, क्योंकि मनुष्य के पापमय स्वभाव को दूर नहीं जाएगा और मनुष्य केवल पापों की क्षमा पर आकर ठहर जाएगा। पापबलि के जरिए, मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया है, क्योंकि क्रूसारोहण का कार्य पहले से ही पूरा हो चुका है और परमेश्वर शैतान के ऊपर प्रबल हुआ है। परन्तु मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अब भी उनके भीतर बना हुआ है और मनुष्य अब भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है; क्योंकि परमेश्वर ने मानवजाति को हासिल नहीं किया है। इसी लिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करने के लिए वचन का उपयोग करता है और मनुष्यों से मांग करता है कि वे सही मार्ग के अनुसार व्यवहार करें। यह चरण पिछले चरण की अपेक्षा अधिक अर्थपूर्ण है और साथ ही साथ अधिक फलप्रद भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो मनुष्य के लिए सीधे तौर पर जीवन की आपूर्ति करता है और मनुष्य के स्वभाव को इस योग्य बनाता है कि उसे पूरी तरह से नया बनाया जाए; यह कार्य का ऐसा चरण है जो कहीं अधिक सम्पूर्ण है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूर्ण किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना को सम्पूर्ण रीति से पूरा किया है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (4)” से

        25. परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को सीधे तौर पर आत्मा के साधनों के माध्यम से या आत्मा के रूप में बचाया नहीं गया है, क्योंकि उसके आत्मा को मनुष्य के द्वारा न तो देखा जा सकता है और न ही स्पर्श किया जा सकता है, और मनुष्य के द्वारा उस तक पहुंचा नहीं जा सकता है। यदि उसने आत्मा की रीति से सीधे तौर पर मनुष्य को बचाने का प्रयास किया होता, तो मनुष्य उसके उद्धार को प्राप्त करने में असमर्थ होता। और यदि परमेश्वर सृजे गए मनुष्य का बाहरी रूप धारण नहीं करता, तो वे इस उद्धार को पाने में असमर्थ होते। क्योंकि मनुष्य किसी भी रीति से उस तक नहीं पहुंच सकता है, उसी प्रकार जैसे कोई भी मनुष्य यहोवा के बादल के पास नहीं जा सकता था। केवल सृष्टि का एक मनुष्य बनने के द्वारा ही, अर्थात्, उसके वचन को देह में रखकर ही वह मनुष्य बनेगा, वह व्यक्तिगत रूप से वचन के कार्य को उन सभी मनुष्यों में कर सकता है जो उसका अनुसरण करते हैं। केवल तभी मनुष्य स्वयं के लिए उसके वचन को सुन सकता है, उसके वचन को देख सकता है, और उसके वचन को ग्रहण कर सकता है, तब इसके माध्यम से पूर्ण रूप से उद्धार पा सकता है। यदि परमेश्वर ने देहधारण नहीं किया होता, तो कोई भी शारीरिक मनुष्य ऐसे बड़े उद्धार को प्राप्त नहीं कर पाता, और एक भी मनुष्य को बचाया नहीं जाता। यदि परमेश्वर का आत्मा सीधे तौर पर मनुष्य के बीच काम करता, तो मनुष्य को मारा गया होता या शैतान के द्वारा पूरी तरह से बंदी बनाकर ले जाया जाता क्योंकि मनुष्य परमेश्वर के साथ सहभागिता रखने में असमर्थ है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (4)” से

        26. प्रथम देहधारण यीशु की देह के जरिए मनुष्य को उसके पाप से छुटकारा देने के लिए था, अर्थात्, उसने मनुष्य को क्रूस से बचाया था, परन्तु वह भ्रष्ट शैतानी स्वभाव तब भी मनुष्य के भीतर बना हुआ था। दूसरा देहधारण आगे से पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए नहीं है परन्तु उन्हें पूरी तरह से बचाने के लिए है जिन्हें पाप से छुटकारा दिया गया था। इसे इसलिए किया गया है ताकि वे जिन्हें क्षमा किया गया उन्हें उनके पापों से छुटकारा दिया जा सके और पूरी तरह से शुद्ध किया जा सके, और वे स्वभाव में एक परिवर्तन हासिल कर सकें, उसके परिणामस्वरूप वे शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो जाते हैं और परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट आते हैं। केवल इसी रीति से ही मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध किया जा सकता है। जब व्यवस्था के युग का अंत हो गया उसके पश्चात् ही परमेश्वर ने अनुग्रह के युग में उद्धार के कार्य का आरम्भ किया था। यह अंतिम दिनों तक नहीं हुआ है, जब परमेश्वर ने विद्रोहीपन के लिए मनुष्य के न्याय और ताड़ना के कार्य को करने के द्वारा मानवजाति को पूरी तरह से शुद्ध कर दिया है, केवल तब ही परमेश्वर उद्धार के अपने कार्य को समाप्त करेगा और विश्राम में प्रवेश करेगा। इसलिए, कार्य के तीन चरणों में, परमेश्वर ने स्वयं मनुष्य के बीच अपने कार्य को सम्पन्न करने के लिए दो बार देहधारण किया। यह इसलिए है क्योंकि कार्य के तीन चरणों में से केवल एक चरण ही मनुष्य की उनकी ज़िन्दगियों में अगुवाई करने के लिए है, जबकि अन्य दो चरण उद्धार के कार्य हैं। यदि ने परमेश्वर देहधारण किया होता केवल तभी वह मनुष्य के साथ-साथ रह सकता है, संसार के दुख दर्द का अनुभव कर सकता है, और एक सामान्य शरीर में रह सकता है। केवल इसी तरह से वह उस व्यावहारिक वचन से अपनी सृष्टि के मनुष्य की आपूर्ति कर सकता है जिसकी उन्हें आवश्यकता है। मनुष्य देहधारी परमेश्वर के कारण परमेश्वर से सम्पूर्ण उद्धार प्राप्त करता है, न कि सीधे तौर पर स्वर्ग की ओर प्रेषित की गई अपनी प्रार्थनाओं से। क्योंकि मनुष्य शरीरिक है; मनुष्य परमेश्वर के आत्मा को देखने में असमर्थ है और उस तक पहुँचने में तो बिलकुल भी समर्थ नहीं है। मनुष्य केवल परमेश्वर के देहधारी शारीर के साथ ही सहभागिता कर सकता है; केवल उसके माध्यम से ही मनुष्य सारे वचनों और सारी सच्चाईयों को समझ सकता है, और सम्पूर्ण उद्धार प्राप्त कर सकता है। दूसरा देहधारण मनुष्य के पापों से पीछा छुड़ाने और पूरी तरह से मनुष्य को पवित्र करने के लिए पर्याप्त है। इस कारण से, दूसरा देहधारण देह में परमेश्वर के सभी कार्य को समाप्त करेगा और परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूर्ण करेगा। उसके बाद, देह में परमेश्वर का काम पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। दूसरे देहधारण के बाद, वह अपने कार्य के लिए पुन: देहधारण नहीं करेगा। क्योंकि उसका सम्पूर्ण प्रबंधन समाप्त हो जाएगा। अंत के दिनों में, उसके देहधारण ने उसके चुने हुए लोगों को पूरी तरह से हासिल कर लिया होगा, और अंत के दिनों में सभी मनुष्यों को उनकी श्रेणी के अनुसार विभाजित कर दिया जाएगा। वह आगे से उद्धार का कार्य नहीं करेगा, और न ही किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए देह में लौटेगा।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (4)” से

        27. अंतिम दिनों के कार्य में, वचन चिन्हों एवं चमत्कारों के प्रकटीकरण की अपेक्षा कहीं अधिक सामर्थी है, और वचन का अधिकार चिन्हों एवं चमत्कारों से कहीं बढ़कर है। वचन मनुष्य के हृदय के सभी भ्रष्ट स्वभावों को प्रकट करता है। आप स्वयं अपने आप से इन्हें पहचानने में असमर्थ हैं। जब उन्हें वचन के जरिए आप पर प्रकट किया जाता है, तब आप स्वाभाविक रुप से एहसास करेंगे; आप उनका इंकार करने में सक्षम नहीं होंगे, और आप पूरी तरह से आश्वस्त होंगे। क्या यह वचन का अधिकार नहीं है? यह वह परिणाम है जिसे वचन के वर्तमान कार्य के द्वारा हासिल किया गया है। इसलिए, बीमारियों की चंगाई और दुष्टात्माओं को निकालने के द्वारा मनुष्य को उसके पापों से पूरी तरह से बचाया नहीं जा सकता है और चिन्हों और चमत्कारों के प्रदर्शन के द्वारा उसे पूरी तरह से पूर्ण नहीं किया जा सकता है। चंगाई करने और दुष्टात्माओं को निकालने का अधिकार मनुष्य को केवल अनुग्रह प्रदान करता है, परन्तु मनुष्य का शरीर तब भी शैतान से सम्बन्धित होता है और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव तब भी मनुष्य के भीतर बना रहता है। दूसरे शब्दों में, वह जिसे शुद्ध नहीं किया गया है वह अभी भी पाप और गन्दगी से सम्बन्धित है। जब वचनों के जरिए मनुष्य को साफ कर दिया जाता है केवल उसके पश्चात् ही उसे परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किया जा सकता है और वह शुद्ध हो सकता है। यदि मनुष्य के भीतर से दुष्टात्माओं को निकालने और उसे छुटकारा देने से बढ़कर और कुछ नहीं किया जाता है, तो यह केवल मनुष्य को शैतान के हाथ से छीनना और उसे वापस परमेश्वर को लौटना है। फिर भी, उसे परमेश्वर के द्वारा शुद्ध या परिवर्तित नहीं किया गया है, और वह अब भी भ्रष्ट बना हुआ है। मनुष्य के भीतर अब भी गन्दगी, विरोध, और विद्रोहीपन बना हुआ है; मनुष्य केवल छुटकारे के द्वारा ही परमेश्वर के पास लौटा है, परन्तु मनुष्य के पास उसका कोई ज्ञान नहीं है और वह अब भी परमेश्वर का प्रतिरोध और विश्वासघात करता है। इससे पहले कि मनुष्य को छुटकारा दिया जाता, शैतान के बहुत सारे ज़हर उसमें पहले से ही डाल दिए गए थे। शैतान के भ्रष्टाचार के हज़ारों वर्षों के बाद, मनुष्य के भीतर पहले ही वह स्वभाव है जो परमेश्वर का प्रतिरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिया जाता है, तो यह छुटकारे से बढ़कर और कुछ नहीं है, जहाँ मनुष्य को एक ऊँची कीमत देकर खरीदा गया है, परन्तु भीतर जो विषैला स्वभाव है उसे हटाया नहीं गया है। मनुष्य जो इतना अशुद्ध हो गया है उसे परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर गुज़रना होगा। न्याय और ताड़ना के काम के जरिए, मनुष्य अपने भीतर के गन्दे और भ्रष्ट तत्व को पूरी तरह से जान पाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने में समर्थ होगा और शुद्ध हो जाएगा। केवल इसी रीति से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने में समर्थ हो सकता है। वह सब कार्य जिसे आज किया गया है वह इसलिए है ताकि मनुष्य को शुद्ध और परिवर्तित किया जा सके; न्याय के जरिए और ताड़ना के द्वारा, साथ ही साथ शुद्धिकरण के द्वारा, मनुष्य अपनी भ्रष्टता को दूर फेंक सकता है और उसे शुद्ध किया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाए, यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है। सच में, यह चरण विजय का चरण है साथ ही साथ उद्धार का दूसरा चरण है। मनुष्य को वचन के द्वारा न्याय और ताड़ना से परमेश्वर के द्वारा हासिल किया गया है; परिष्कृत करने, न्याय करने और खुलासा करने के लिए वचन के उपयोग के जरिए मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताओं, धारणाओं, उद्देश्यों, और व्यक्तिगत आशाओं को पूरी तरह से प्रकट किया है। यद्यपि मनुष्य को छुटकारा दिया गया है और उसके पापों को क्षमा किया गया है, फिर भी इससे केवल यह माना गया है कि मानो परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता है और मनुष्य के अपराधों के अनुसार मनुष्य से व्यवहार नहीं करता है। फिर भी, जब मनुष्य शरीर में जीवन जीता है और उसे पाप से स्वतन्त्र नहीं किया जाता है, तो वह सिर्फ लगातार पाप कर सकता है, और अंतहीन रूप से उस भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को प्रकट करता है। यह वह जीवन है जिसकी अगुवाई मनुष्य करता है, पाप और क्षमा का एक अंतहीन चक्र। अधिकांश मनुष्य दिन में सिर्फ इसलिए पाप करते हैं ताकि शाम को अंगीकार कर सकें। इसी रीति से, भले ही पापबलि मनुष्य के लिए सदा प्रभावी है, फिर भी यह मनुष्य को पाप से बचाने में सक्षम नहीं होगा। उद्धार का केवल आधा भाग ही पूरा किया गया है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव है.... यह पाप की अपेक्षा अधिक गहराई से फैलता है, इसे शैतान के द्वारा डाला गया है और यह मनुष्य के भीतर गहराई से जड़ पकड़े हुए है। मनुष्य के लिए अपने पापों के प्रति जागरूक होना आसान नहीं है; मनुष्य अपने स्वयं के गहराई से जड़ जमाए हुए स्वभाव को पहचानने में असमर्थ होता है। केवल वचन के द्वारा न्याय से ही इन प्रभावों को प्राप्त किया जा सकता है। केवल इस प्रकार ही मनुष्य को उस बिन्दु के आगे से धीरे-धीरे बदला जा सकता है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (4)” से

        28. जो कुछ मनुष्य ने अब प्राप्त किया है – आज के मनुष्य का डीलडौल, उनका ज्ञान, प्रेम, वफादारी, आज्ञाकारिता, साथ ही साथ उनका देखना – वे ऐसे परिणाम हैं जिन्हें वचन के द्वारा न्याय माध्यम से हासिल किया गया है। यह कि आप वफादारी रखने में और आज के दिन तक निरन्तर खड़े रहने में समर्थ हो सकते हैं जिसे वचन के जरिए हासिल किया गया है। अब मनुष्य देखता है कि देहधारी परमेश्वर का कार्य वास्तव में असाधारण है। बहुत कुछ ऐसा है जिसे मनुष्य के द्वारा हासिल नहीं किया जा सकता है; वे रहस्य और अद्भुत बातें हैं। इसलिए बहुतों ने समर्पण कर दिया है। कुछ लोगों ने अपने जन्म के समय से ही किसी भी मनुष्य के प्रति समर्पण नहीं किया, फिर भी जब वे आज के दिन परमेश्वर के वचनों को देखते हैं, तो वे पूरी तरह से समर्पण कर देते हैं इस पर ध्यान दिए बगैर कि उन्होंने ऐसा किया है। वे सूक्ष्म परिक्षण करने या कोई और बात कहने का जोखिम नहीं उठाते हैं; वे सब वचन के सामने और वचन के द्वारा न्याय के सामने गिर जाते हैं। यदि परमेश्वर का आत्मा मनुष्यों से सीधे तौर पर बात करता, तो वे सब उस वचन के प्रति समर्पित हो जाते, प्रकाशन के वचनों के बगैर नीचे गिर जाते, बिलकुल वैसे ही जैसे पौलुस ज्योति के मध्य भूमि पर गिर गया था जब उसने दमिश्क की यात्रा की थी। यदि परमेश्वर लगातार इसी रीति से काम करता, तो मनुष्य वचन के द्वारा न्याय माध्यम से अपने स्वयं के भ्रष्ट स्वभाव को पहचानने और उद्धार हासिल करने में कभी समर्थ नहीं होता। केवल देहधारण करने के जरिए ही वह व्यक्तिगत रूप से अपने वचनों को सभी के कानों तक पहुंचा सकता है ताकि वे सभी जिनके पास कान हैं उसके वचनों को सुन सकें और वचन के द्वारा न्याय के उसके कार्य को स्वीकार कर सकें। उसके वचन के द्वारा प्राप्त किया गया परिणाम सिर्फ ऐसा ही है, आत्मा के प्रकटीकरण के बजाए जो मनुष्य को भयभीत करके समर्पण करवाता है। केवल ऐसे ही व्यावहारिक और असाधारण कार्य के जरिए मनुष्य के पुराने स्वभाव को, जो अनेक वर्षों से भीतर गहराई में छिपा हुआ है, पूरी तरह से प्रकट किया जा सकता है ताकि मनुष्य उसे पहचाने सके और उसे बदला जा सके। यह देहधारी परमेश्वर का व्यावहारिक कार्य है; वह वचन के द्वारा मनुष्य के न्याय के परिणामों को हासिल करने के लिए व्यावहारिक रीति से बोलता है और न्याय को लागू करता है। यह देहधारी परमेश्वर का अधिकार है और परमेश्वर के देहधारण का महत्व है। इसे देहधारी परमेश्वर के अधिकार को, वचन के कार्य के द्वारा हासिल किए गए परिणामों को, और इस बात को प्रकट करने के लिए किया गया है कि आत्मा देह में आ चुका है; वह वचन के द्वारा मनुष्य के न्याय के माध्यम से अपने अधिकार को प्रदर्शित करता है। यद्यपि उसकी देह एक साधारण और सामान्य मनुष्यत्व का बाहरी रूप है, फिर भी ये वे परिणाम हैं जिन्हें उसके वचनों ने हासिल किया है जो मनुष्य को दिखाते हैं कि वह अधिकार से परिपूर्ण है, यह कि वह स्वयं परमेश्वर है और यह कि उसके वचन स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं। यह सब मनुष्य को दिखाता है कि वह स्वयं परमेश्वर है, स्वयं परमेश्वर है जो देहधारी हुआ, और यह कि किसी के भी द्वारा उसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। कोई भी उसके वचन के द्वारा किए गए न्याय से बढ़कर नहीं हो सकता है, और अंधकार की कोई भी शक्ति उसके अधिकार पर प्रबल नहीं हो सकती है।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (4)” से

        29. वह देहधारी हो गया क्योंकि देह भी अधिकार धारण कर सकता है, और वह एक व्यावहारिक रीति से मनुष्यों के बीच कार्य सम्पन्न करने में सक्षम है, जो मनुष्यों के लिए दृश्यमान और स्पर्शगम्य है। ऐसा कार्य परमेश्वर के आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किए गए किसी भी कार्य की अपेक्षा कहीं अधिक वास्तविक है जो सारे अधिकार को धारण करता है, और इसके परिणाम भी प्रकट हैं। यह इसलिए है क्योंकि उसका देहधारी शरीर व्यावहारिक रीति से बोल और कार्य कर सकता है; उसकी देह का बाहरी रूप कोई अधिकार धारण नहीं करता है और मनुष्य के द्वारा उस तक पहुंचा जा सकता है। उसकी हस्ती अधिकार को वहन करती है, किन्तु उसका अधिकार किसी के लिए भी दृश्यमान नहीं है। जब वह बोलता और कार्य करता है, तो मनुष्य उसके अधिकार के अस्तित्व का पता लगाने में असमर्थ होता है; यह उसके वास्तविक कार्य के लिए और भी अधिक अनुकूल है। और इस प्रकार के सभी कार्य परिणामों को हासिल कर सकते हैं। भले ही कोई मनुष्य यह एहसास नहीं करता है कि परमेश्वर अधिकार रखता या यह नहीं देखता है कि परमेश्वर का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है या परमेश्वर के क्रोध को नहीं देखता है, फिर भी परमेश्वर के पर्दानशी अधिकार और क्रोध और सार्वजनिक भाषण के जरिए, परमेश्वर अपने वचनों के इच्छित परिणामों को हासिल करता है। दूसरे शब्दों में, उसकी आवाज़ के अन्दाज़, भाषण की कठोरता, और उसके वचनों की सम्पूर्ण बुद्धिमत्ता के जरिए, मनुष्यों को पूरी तरह से आश्वस्त कर दिया गया है। इस रीति से, मनुष्य देहधारी परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पण करता है, जिसके पास प्रकट रूप में कोई अधिकार नहीं है, इसके परिणामस्वरूप परमेश्वर मनुष्य के लिए उद्धार के अपने लक्ष्य को हासिल करता है। यह उसके देहधारण का एक और महत्व है: अधिक वास्तविक रूप से कहना और उसके वचनों को अनुमति देना कि मनुष्य पर प्रभाव डालें ताकि वे परमेश्वर के वचन की सामर्थ के गवाह बनें। अतः यह कार्य, यदि देहधारण के जरिए नहीं किया जाए, थोड़े से भी परिणामों को हासिल नहीं करेगा और पूरी रीति से पापियों का उद्धार करने में समर्थ नहीं होगा। यदि परमेश्वर ने देहधारण नहीं किया होता, तो वह ऐसा आत्मा बना रहता जो मनुष्यों के लिए अदृश्य और अस्पर्शनीय है। मनुष्य शारीरक प्राणी है, और मनुष्य और परमेश्वर दो अलग अलग संसार से सम्बन्धित हैं, और स्वभाव में भिन्न हैं। परमेश्वर का आत्मा शारीरिक मनुष्य से बिलकुल अलग है, और उनके बीच कोई भी सम्बन्ध स्थापित नहीं किया जा सकता है; इसके अतिरिक्त, मनुष्य आत्मा नहीं बन सकता है। इसी रीति से, परमेश्वर के आत्मा को जीवधारियों में से एक बनना होगा और अपना मूल काम करना होगा। परमेश्वर सबसे ऊँचे स्थान पर चढ़ सकता है और सृष्टि का एक मनुष्य बनकर, कार्य करते हुए और मनुष्य के बीच रहते हुए, अपने आपको दीन भी कर सकता है, परन्तु मनुष्य सबसे ऊँचे स्थान पर चढ़ नहीं सकता है और आत्मा नहीं बन सकता है और वह निचले स्थान में तो बिलकुल भी उतर नहीं सकता है। इसलिए, अपने कार्य को सम्पन्न करने के लिए परमेश्वर को देहधारण करना होगा। यद्यपि प्रथम देहधारण सम्बन्ध में, केवल देहधारी परमेश्वर का शरीर ही क्रूसारोहण के जरिए मनुष्य को छुटकारा दे सकता था, जबकि परमेश्वर के आत्मा के लिए यह सम्भव नहीं था कि उसे मनुष्य के लिए पापबलि के रूप में क्रूस पर चढ़ाया जाता। परमेश्वर मनुष्य के लिए एक पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए प्रत्यक्ष रूप से देहधारण कर सकता था, परन्तु मनुष्य उस पापबलि को लेने के लिए प्रत्यक्ष रूप से स्वर्ग में चढ़ नहीं सकता था जिसे परमेश्वर ने उनके लिए तैयार किया था। उसी रीति से, परमेश्वर को स्वर्ग और पृथ्वी के बीच यहाँ वहाँ आना-जाना होगा, मनुष्य को अनुमति देने के बजाए कि वह इस उद्धार को लेने के लिए स्वर्ग में चढ़े, क्योंकि मनुष्य पतित हो चुका था और स्वर्ग पर चढ़ नहीं सकता था, और पापबलि को तो बिलकुल भी प्राप्त नहीं कर सकता था। इसलिए, यीशु के लिए यह आवश्यक था कि वह मनुष्यों के बीच आए और व्यक्तिगत रूप से उस कार्य को करे जिसे मनुष्य के द्वारा सरलता से पूरा नहीं किया जा सकता था। प्रत्येक समय जब परमेश्वर ने देहधारण किया, तब ऐसा करना बहुत ही आवश्यक था। यदि सभी चरणों में से किसी भी चरण को परमेश्वर के पवित्र आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर सम्पन्न किया जाता, तो उसने देहधारी होने के अनादर को सहन नहीं किया होता।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (4)” से

        30. कार्य के इस अंतिम चरण में, वचन के द्वारा परिणामों हो हासिल किया गया है। वचन के जरिए, मनुष्य बहुत से रहस्यों को और पिछली पीढ़ियों के दौरान किये गए परमेश्वर के कार्य को समझ गया है; वचन के जरिए, मनुष्य को पवित्र आत्मा के द्वारा प्रकाशमान किया गया है; वचन के जरिए, मनुष्य उन रहस्यों को जिन्हें पिछली पीढ़ियों के द्वारा कभी स्पष्ट रूप से जाना नहीं गया था, साथ ही साथ अतीत के समयों के भविष्यवक्ताओं और प्रेरितों के कार्य को, और उन सिद्धान्तों को समझ गया है जिनके द्वारा वे काम करते थे; वचन के जरिए, मनुष्य स्वयं परमेश्वर के स्वभाव को, साथ ही साथ मनुष्य के विद्रोहीपन और प्रतिरोध को भी समझ गया है, और स्वयं अपने मूलतत्व को जान गया है। कार्य के इन चरणों और बोले गए सभी वचनों के जरिए, मनुष्य आत्मा के कार्य को, परमेश्वर के देहधारी शारीर के कार्य को, और इससे बढ़कर, उसके सम्पूर्ण स्वभाव को जान गया है। छ: हज़ार वर्षों से भी अधिक की परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना के विषय में आपके ज्ञान को भी वचन के जरिए प्राप्त किया गया था। क्या आपकी पुरानी धारणाओं के विषय में आपके ज्ञान को और उनको दरकिनार करने में आपकी सफलता को वचन के जरिए ही हासिल नहीं किया गया था? पिछले चरण में, यीशु ने चिन्ह और चमत्कार किया था, परन्तु इस चरण में ऐसा नहीं है। वह ऐसा क्यों नहीं करता है क्या इसके विषय में आपकी समझ को भी वचन के जरिए ही हासिल नहीं किया गया है? इसलिए, इस चरण में बोले गए वचन पिछली पीढ़ियों के प्रेरितों और भविष्यवक्ताओं के द्वारा किए गए कार्य से कहीं बढ़कर हैं। यहाँ तक कि भविष्यवक्ताओं के द्वारा की गई भविष्यवाणियाँ भी ऐसे परिणामों को हासिल नहीं कर सकती थीं। भविष्यवक्ताओं ने केवल भविष्यवाणियों के विषय में कहा था, कि भविष्य में क्या होगा, परन्तु उस कार्य में विषय में नहीं कहा जिसे परमेश्वर उस समय करने वाला था। उन्होंने मनुष्य की ज़िन्दगियों में उनकी अगुवाई करने के लिए, मनुष्य को सच्चाई प्रदान करने के लिए या मनुष्य पर रहस्यों को प्रकट करने के लिए नहीं कहा था, और जीवन प्रदान करने के लिए तो उन्होंने बिलकुल भी नहीं कहा था। इस चरण में बोले गए वचनों के विषय में, इसमें भविष्यवाणी और सत्य है, परन्तु वे प्रमुख रूप से मनुष्य को जीवन प्रदान करने के लिए कार्य करते हैं। वर्तमान समय के वचन भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणियों से भिन्न हैं। यह कार्य का एक ऐसा चरण है जो भविष्यवाणियों के लिए नहीं है परन्तु मनुष्य के जीवन के लिए है, और मनुष्य के जीवन स्वभाव को परिवर्तित करने के लिए है। प्रथम चरण पृथ्वी पर आराधना करने हेतु मनुष्य के लिए एक मार्ग तैयार करने के लिए यहोवा का कार्य था। यह पृथ्वी पर कार्य के स्रोत को खोजने हेतु कार्य का आरम्भ था। उस समय, यहोवा ने इस्राएलियों को सब्त का दिन को मानना, अपने माता-पिता का आदर करना और दूसरों के साथ शांतिपूर्वक रहना सिखाया था। चूंकि उस समय के मनुष्य नहीं समझते थे कि मनुष्य को किसने रचा था, न ही वे यह समझते थे कि पृथ्वी पर किस प्रकार रहना है, इसलिए कार्य के प्रथम चरण में उसके लिए यह आवश्यक था कि मनुष्य की उनकी ज़िन्दगियों में अगुवाई करे। वह सब कुछ जो यहोवा ने उनसे कहा था उसे इससे पहले मानवजाति पर प्रकट नहीं किया गया था या उनके स्वामित्व में नहीं था। उस समय भविष्यवाणी के विषय में बोलने के लिए अनेक भविष्यवक्ताओं को खड़ा किया गया था, सभी को यहोवा की अगुवाई के अधीन नियुक्त किया गया था। यह उसके कार्य का मात्र एक भाग था। प्रथम चरण में, परमेश्वर ने देहधारण नहीं किया था, अतः वह भविष्यवक्ताओं के जरिए सभी गोत्रों और जातियों से बात करता था। जब यीशु ने उस समय अपना कार्य किया, तब उसने इतनी बातें नहीं की जितना आज के दिन किया जाता है। अंत के दिनों में वचन के इस कार्य को युगों और पिछली पीढ़ियों में कभी नहीं किया गया था। यद्यपि यशायाह, दानिय्येल और यूहन्ना ने बहुत सारी भविष्यवाणियाँ की हैं, फिर भी ऐसी भविष्यवाणियाँ उन वचनों से बिलकुल अलग हैं जिन्हें आज बोला जाता है। जो कुछ उन्होंने कहा था वे केवल भविष्यवाणियाँ थीं, किन्तु आज के वचन नहीं हैं। वह सब जो मैंने कहा है यदि आज मैं उन्हें भविष्यवाणियों में बदल दूँ, तो क्या आप समझने में सक्षम होंगे? यदि मैं भविष्य के लिए मुद्दों की बात करूँ, ऐसे मुद्दे जो मेरे जाने के बाद होंगे, तो आप समझदारी कैसे प्राप्त कर सकते हैं? वचन के कार्य को यीशु के समय में या व्यवस्था के युग में कभी नहीं किया गया था। कदाचित् कुछ लोग कह सकते हैं, “क्या यहोवा ने अपने कार्य के समय में भी वचनों को नहीं कहा था? बीमारियों की चंगा करने, दुष्टात्माओं को निकालने और चिन्ह एवं अद्भुत कामों को करने के अतिरिक्त, क्या यीशु ने उस समय वचनों को भी नहीं कहा था?” वचन कैसे बोले जाते हैं इनमें अन्तर हैं। यहोवा के द्वारा कहे गए वचनों की हस्ती क्या थी? वह केवल मनुष्य को पृथ्वी पर उनकी ज़िन्दगियों में अगुवाई दे रहा था, जिसे जीवन में आत्मिक मसलों के साथ शामिल नहीं किया गया था। ऐसा क्यों कहा जाता है कि यहोवा के वचनों की घोषणा सभी स्थानों में की गई है? “घोषणा” शब्द स्पष्ट व्याख्या करने और सीधे निर्देश देने की ओर संकेत करता है। उसने जीवन के साथ मनुष्य की आपूर्ति नहीं की थी; बल्कि इसके बजाए, उसने बस मनुष्य का हाथ पकड़ा था और मनुष्य को अपना आदर करना सिखाया था। वहाँ कोई दृष्टांत नहीं थे। इस्राएल में यहोवा का कार्य मनुष्य से व्यवहार करना या उसे अनुशाषित करना या न्याय करना और ताड़ना देना नहीं था; यह अगुवाई करने के लिए था। यहोवा ने मूसा से कहा कि उसके लोगों से कहे कि वे जंगल में मन्ना इकट्ठा करें। प्रतिदिन सूर्योदय से पहले, उन्हें मन्ना इकट्ठा करना पड़ता था, केवल इतना कि उसे उसी दिन ही खाया जा सके। मन्ना को अगले दिन के लिए बचाकर रखा नहीं जा सकता था, क्योंकि तब उसमें फफूँद लग जाता। उसने मनुष्य को नहीं सिखाया था या उनके स्वभावों को प्रकट नहीं किया था, और उसने उनकी युक्तियों और विचारों को प्रकट नहीं किया था। उसने मनुष्य को बदला नहीं था परन्तु उनकी ज़िन्दगियों में उनकी अगुवाई की थी। उस समय, मनुष्य एक बालक के समान था; मनुष्य कुछ नहीं समझता था और केवल कुछ मूल तकनीकी गतिविधियाँ ही करता था; इसलिए, यहोवा ने लोगों की अगुवाई करने के लिए केवल व्यवस्थाओं का आदेश दिया। यदि आप सुसमाचार फैलाना चाहते हैं ताकि सभी लोग जो सच्चे हृदय से खोजते हैं वे उस कार्य का ज्ञान प्राप्त कर सकें जिसे आज किया गया है और पूरी तरह से आश्वस्त हो सकें, तब आपको प्रत्येक चरण में किए गए कार्य के भीतर की कहानी, उसके मूलतत्व और महत्व को समझना होगा। आपके विचार विमर्श को सुनने के द्वारा, वे यहोवा के कार्य और यीशु के कार्य को और, इसके अतिरिक्त, उन सब कार्य को जिसे आज के दिन किया जा रहा है, साथ ही साथ कार्य के इन तीन चरणों के बीच के सम्बन्धों एवं विभिन्नताओं को समझ सकते हैं, ताकि, उनके सुनने के पश्चात्, वे देखेंगे कि तीनों चरणों में से कोई भी चरण अन्य चरणों में विघ्न नहीं डालता है। वास्तव में, सब कुछ एक ही आत्मा के द्वारा किया गया है। यद्यपि उन्होंने अलग अलग युगों में अलग अलग कार्य को सम्पन्न किया और ऐसे वचन कहे जो एक समान नहीं थे, फिर भी वे सिद्धान्त जिनके द्वारा उन्होंने कार्य किया वे एक और समान ही थे। ये वे सबसे बड़े दर्शन हैं जिन्हें सब लोगों को समझना चाहिए।

        वचन देह में प्रकट होता है में “देहधारण का रहस्य (4)” से