सबसे अधिक धन्य हैं वे लोग जो परमेश्वर के वचन को स्वीकार करते हैं और उसका पालन करते हैं

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सबसे पहले, उन सभी राष्ट्रों के सभी भाइयों और बहनों को बधाई, जिन्होंने अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार किया है। परमेश्वर आपका कल्याण करे। आज की बैठक के लिए, हमें पहले एक बात बतानी होगी। क्या तुम जानते हो कि हमें "प्रभु यीशु" के नाम में विश्वास करने के बजाय सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास क्यों करना चाहिए? क्या तुम जानते हो कि इसका रहस्य क्या है? बाइबल की भविष्यवाणी में प्रभु का नया नाम सर्वशक्तिमान परमेश्वर है। यह नया नाम कहाँ लिखा है? यह यशायाह की पुस्तक में, प्रकाशित वाक्य में लिखा गया है, और निम्नलिखित परिच्छेद उस पत्र का है जो प्रभु ने फिलेदिलफिया की कलीसिया को लिखा था, जो प्रकाशित वाक्य के अध्याय तीन से लिया गया है: "और फिलेदिलफिया की कलीसिया के दूत को यह लिख: जो पवित्र और सत्य है, और जो दाऊद की कुंजी रखता है, जिसके खोले हुए को कोई बन्द नहीं कर सकता और बन्द किए हुए को कोई खोल नहीं सकता, वह यह कहता है, कि मैं तेरे कामों को जानता हूँ: देख, मैं ने तेरे सामने एक द्वार खोल रखा है, जिसे कोई बन्द नहीं कर सकता; तेरी सामर्थ्य थोड़ी सी तो है, फिर भी तूने मेरे वचन का पालन किया है और मेरे नाम का इन्कार नहीं किया। देख, मैं शैतान के उन सभावालों को तेरे वश में कर दूँगा जो यहूदी बन बैठे हैं, पर हैं नहीं, वरन झूठ बोलते हैं – देख, मैं ऐसा करूँगा, कि वे आकर तेरे पैरों पर गिरेंगे, और यह जान लेंगे, कि मैंने तुझ से प्रेम रखा है। तूने मेरे धीरज के वचन को थामा है, इसलिये मैं भी तुझे परीक्षा के उस समय बचा रखूंगा, जो पृथ्वी पर रहने वालों के परखने के लिये सारे संसार पर आनेवाला है। मैं शीघ्र ही आनेवाला हूँ; जो कुछ तेरे पास है, उसे थामे रह कि कोई तेरा मुकुट छीन न ले। जो जय पाए, उसे मैं अपने परमेश्वर के मन्दिर में एक खंभा बनाऊंगा; और वह फिर कभी बाहर न निकलेगा; और मैं अपने परमेश्वर का नाम, और अपने परमेश्वर के नगर, अर्थात नये यरूशलेम का नाम, जो मेरे परमेश्वर के पास से स्वर्ग पर से उतरने वाला है और अपना नया नाम उस पर लिखूंगा। जिस के कान हों, वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है" (प्रकाशितवाक्य 3:7-13)। यहाँ, तीन नामों का उल्लेख किया गया है, "मैं अपने परमेश्वर का नाम, और अपने परमेश्वर के नगर, अर्थात नये यरूशलेम का नाम, जो मेरे परमेश्वर के पास से स्वर्ग पर से उतरने वाला है और अपना नया नाम उस पर लिखूंगा।" प्रभु यीशु का एक नया नाम होगा जब वह लौट कर आएगा, और यही सबूत है। यशायाह की किताब के अध्याय 62 में भी यह बताया गया है कि "प्रभु को एक नए नाम से बुलाया जाएगा"। "फिलेदिलफिया की कलीसिया" का मतलब उस कलीसिया से है जिसे स्वर्गारोहित किया गया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के अधिकांश लोग विभिन्न पंथों और संप्रदायों से परमेश्वर के पास आए हैं, और परमेश्वर के पास उनके आ जाने के बाद संप्रदायों में क्या कहा जाता है? "चमकती पूर्वी बिजली ने मेमनों को चुरा लिया है, उन्होंने सभी पंथों और संप्रदायों से सभी अच्छे मेमनों को चुरा लिया है। इसलिए, उन्हें चमकती पूर्वी बिजली से बहुत नफ़रत है। क्या उनका यह कहना सही है? वे सोचते हैं कि वे उनके अपने मेमने हैं, लेकिन तथ्य यह है कि परमेश्वर के मेमनों ने परमेश्वर की वाणी सुनी है। क्या यह सही नहीं है? इसके अलावा, फिलेदिलफिया की कलीसिया में जिनका स्वर्गारोहण किया जाने वाला था, उनसे प्रभु ने क्या कहा था? इसे यहाँ बताया गया है: "मैं तेरे कामों को जानता हूँ: ... तेरी सामर्थ्य थोड़ी सी तो है, फिर भी तूने मेरे वचन का पालन किया है और मेरे नाम का इन्कार नहीं किया"। फिलेदिलफिया की कलीसिया में यह सबसे क़ीमती चीज़ है, "तेरी सामर्थ्य थोड़ी सी तो है, फिर भी तूने मेरे वचन का पालन किया है और मेरे नाम का इन्कार नहीं किया" यह स्वर्गारोहित होने का प्रमाण है, और स्वर्गारोहित होने की शर्त है।

जिन्हें परमेश्वर की कृपा मिली है, उनके पास क्या होना चाहिए? उन्हें परमेश्वर के मार्ग का पालन करना चाहिए। चाहे व्यक्ति का पंथ या संप्रदाय कोई भी हो, यदि वह परमेश्वर में विश्वास करता है लेकिन परमेश्वर के मार्ग का पालन नहीं करता है, अर्थात वह परमेश्वर के वचन पर अमल नहीं कर रहा है, तो उसे परमेश्वर का आशीर्वाद नहीं मिला है, वह परमेश्वर के द्वारा अनुग्रहित नहीं है, और परमेश्वर उसे छोड़ देगा। यही परमेश्वर का स्वभाव है।

इज़राइलियों ने परमेश्वर में दो हज़ार सालों तक विश्वास किया था, तब एक दिन प्रभु यीशु का आगमन हुआ। फिर भी, न केवल उन्होंने यीशु को स्वीकार नहीं किया, बल्कि उन्होंने उसका विरोध किया और उसे दोषी भी ठहराया, और अंत में, प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया। उन्होंने क्या भूल की? इसे परमेश्वर में विश्वास करना और फिर भी परमेश्वर का विरोध करना कहते हैं। क्योंकि उन्होंने देहधारी प्रभु यीशु का विरोध किया और उसे दोषी ठहराया, वे परमेश्वर द्वारा शापित हुए। परमेश्वर द्वारा इज़राइलियों को शाप दिये जाने के बाद क्या हुआ? भीषण आपदाएँ आईं। सबसे पहले, इज़राइल राष्ट्र नष्ट हो गया, इज़राइलियों को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जाकर रहना पड़ा, उन्हें इतने सारे नरसंहारों का सामना करना पड़ा, खास तौर पर हिटलर द्वारा शुरू किए गए सर्वनाश का, जिसमें लाखों इज़राइलियों का नरसंहार हुआ था। क्या यह अभिशाप नहीं है? उन्हें क्यों शाप दिया गया? क्योंकि उन्होंने देहधारी प्रभु यीशु का विरोध किया था। क्या उन्होंने यहोवा का विरोध किया था? उन्होंने उसका विरोध किया था, क्योंकि प्रभु यीशु और यहोवा एक ही परमेश्वर हैं। अब भी, इज़राइली यह स्वीकार नहीं करते कि प्रभु यीशु यहोवा का प्रकटन है। समस्या क्या है? उन्होंने दो हज़ार साल तक यहोवा पर विश्वास किया और व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया, फिर भी जब यहोवा परमेश्वर ने प्रभु यीशु के रूप में देहधारण किया, तो उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। उनकी अस्वीकृति, प्रतिरोध और निंदा ने उनके लिए परेशानी खड़ी की, और ये उनके अंत का कारण बनी। वे परमेश्वर पर अपने विश्वास में विफल रहे। इसलिए, परमेश्वर पर विश्वास करने में परमेश्वर का विरोध करने की गलती को स्वीकार नहीं किया जा सकता है, और एक बार जब कोई परमेश्वर का विरोध करने के मार्ग पर कदम रख देता है, तो उस व्यक्ति का भाग्य पूरी तरह से खत्म हो जाता है।

बहुत से लोग कह सकते हैं: "ऐसी बात नहीं है। इज़राइलियों में बहुत से लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर का सम्मान करते थे, कई वफ़ादार संत थे जिन्होंने स्वयं को प्रभु के नाम पर शहीद किया, अय्यूब और अब्राहम जैसे कई लोग हैं। वे फिर भी शापित क्यों हैं? क्या वे बस इसी बात के कारण शापित हैं?" वे मानते हैं कि परमेश्वर दयालु और प्रेमी है, "जिस प्रभु यीशु में हम विश्वास करते हैं वह दयालु और प्रेमी है। वह दूसरों को शाप नहीं देता है, उसे कोई घृणा नहीं है, उसमें दूसरों के लिए केवल प्यार है; परमेश्वर नाराज़ नहीं होता है। विशेष रूप से उन लोगों के प्रति जो उस पर विश्वास करते हैं, भले ही वे उसे जानते हों या नहीं, जब तक कि वे कोई बुराई नहीं करते, उसका विरोध नहीं करते, परमेश्वर उन्हें शाप नहीं देगा। कितने सारे इज़राइलियों ने उसे स्वीकार नहीं किया है, इसलिए यह संभव नहीं है कि वह उन्हें शाप देगा।" क्या यह सही है? कुछ लोग अपने जीवन भर प्रभु में विश्वास करते हैं, बाइबल को जीवन भर पढ़ते हैं, फिर भी वे इस तथ्य को स्वीकार नहीं करेंगे। मुझे बताओ, उन्होंने क्या गलती की है? यह एक गंभीर मामला है। बाइबल में यह स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि प्रभु यीशु ने फरीसियों को शाप दिया था, "तुम्हें धिक्कार है", "तुम्हें धिक्कार है", "तुम्हें धिक्कार है", लगातार सात बार "तुम्हें धिक्कार है"। क्या "तुम्हें धिक्कार है" कोई आशीर्वाद है? क्या ये दया के वचन हैं? "तुम्हें धिक्कार है" एक अभिशाप है। क्या तुम्हें लगता है कि यीशु को धोखा देने के बाद यहूदा अपना बाक़ी जीवन चैन से जी सका था? उसका अंत कैसे हुआ? जब वह मरा, तो बीच से फट गया, और उसकी सारी आंतें बाहर फूट पड़ीं। प्रभु यीशु को धोखा देने के बाद, उसने इसका अफ़सोस किया, फिर भी उसका पश्चाताप बेकार रहा। तो तुम उसके "बीच से फट जाने, और उसकी सारी आँतों के बाहर फूट पड़ने" को कैसे समझाओगे? क्या तुम कह सकते हो कि यह प्रभु यीशु के अभिशाप के कारण नहीं था? क्या तुम अब भी कह सकते हो कि यह प्रभु यीशु का उसके प्रति दयालु और स्नेही होना है, उसे असीम क्षमा देना है, उसे सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा करना है? अनुग्रह के युग के दौरान, प्रभु यीशु ने बिलकुल और पूरी तरह से उन लोगों को क्षमा कर दिया जिन्होंने उस पर विश्वास किया था, अनंत काल के लिए सभी मानवीय पापों की एक ही बार में क्षमा; मगर तुम अभी भी पाप करते हो और उसका विरोध करते हो, तो वह तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार करेगा? यदि तुम बिना किसी सीमा के पाप करते हो, यदि तुम पाप करना जारी रखते हो, जान-बूझ कर पाप करते हो, तो क्या वह तुम्हें फिर भी क्षमा कर सकता है? क्या उसने कोई और बातें कही हैं? "प्रभु यीशु दयालु और स्नेही है, वह हमें अनंत काल तक क्षमा करेगा, वह हमें हमारे पिछले अपराधों से बांधकर नहीं रखेगा।" क्या ये सही है? नहीं। यह क्यों सही नहीं है? क्या बाइबल में इसका कोई आधार है? बाइबल के प्रकाशित वाक्य में, सात कलीसियाओं को भेजे गए पत्रों में प्रभु यीशु ने क्या कहा था? किस प्रकार के लोग हटा दिए जाएँगे? किस तरह के लोगों को शाप दिया जाएगा? किस प्रकार के लोग स्वर्गारोहित किये जाएंगे? वे फिलेदिलफिया की कलीसिया को दिए गए आशीर्वाद थे। लौदीकिया की कलीसिया के बारे में क्या कहेंगे? यह कहा गया है कि वे न तो उदासीन थे और न ही बहुत उत्साही थे, जैसा कि गुनगुना पानी होता है, और परमेश्वर उन्हें अपने मुंह से थूक देने, उन्हें पीछे छोड़ देने वाला था। क्या मुद्दा यह नहीं है?

वे सभी प्रभु यीशु में विश्वास करते थे, कुछ लोग प्रभु यीशु की कही हर बात पर विश्वास करते हैं, जबकि अन्य लोग प्रभु यीशु की केवल कुछ बातों में विश्वास करते हैं, केवल इस बात पर विश्वास करते हैं कि प्रभु यीशु दयालु और स्नेही है। जब कठोर वचनों की, न्याय के वचनों की बात आती है, उन वचनों की बात आती है जो किसी व्यक्ति के अंत का निर्धारण करते हैं, उन वचनों की जो अलग-अलग तरह के लोगों के लिए हैं, उन वचनों की जो अंत के दिनों में लोगों को प्रकट करने के लिए हैं, तो वे उनमें से किसी भी बात को स्वीकार नहीं करते हैं। प्रभु में इस तरह का विश्वास प्रभु के ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकता है। प्रभु यीशु में विश्वास करने के लिए, हमें उसके स्वभाव को समझना होगा, हमें उसके मन को समझना होगा। वह किसे बचाने जा रहा है, वह किसे हटाएगा, वह किसे शाप देगा। तुम यह नहीं कह सकते कि चूँकि प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग के दौरान हमारे पापों के लिए खुद का बलिदान किया है, वह हमें बिना किसी सीमा के माफ़ कर देगा और हमें अनंत काल तक क्षमा करता ही रहेगा। ऐसी बातें मनुष्यों की अवधारणाओं और कल्पनाओं से उत्पन्न होती हैं, बाइबल में इसका कोई आधार नहीं है। ये बातें जो प्रकाशित वाक्य में लिखी गई थीं, वे सभी बातें जिन्हें परमेश्वर ने प्रेरित यूहन्ना को देखने और सुनने दी हैं, वही हैं जो नबियों की किताबों में लिखी गई हैं; वे सभी परमेश्वर के वचन हैं; यह निश्चित है और इसमें कोई संदेह नहीं है।

क्या तुम ऐसा सोचते हो कि जो लोग भी प्रभु में विश्वास करते हैं, वे सब बचाए जा सकते हैं और वे जीवित रहेंगे? कि वे सब स्वर्ग के राज्य में जाएँगे? हमने अभी-अभी कहा है, "तुम्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर में क्यों विश्वास करना चाहिए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने का क्या अर्थ है?" इस मामले को समझना बहुत महत्वपूर्ण है। कुछ लोग चिंतन करते हैं: "मैं शुरू में प्रभु यीशु में विश्वास किया करता था। अब जबकि मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के प्रचारकों से बाइबल की सच्चाई की पूरी गवाही को सुना है, विशेष रूप से, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथनों को सुना है, जो सभी सत्य हैं और स्पष्ट रूप से परमेश्वर की वाणी हैं, और इससे वह वचन पूरा हुआ है जो प्रकाशित वाक्य में कहा गया है "जिसके कान हों, वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है" (प्रकाशितवाक्य 2:7)। जब मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सभी वचनों को सुन लिया, तो मुझे एक बात पक्की हो गई: प्रभु वापस आ गया है, प्रभु यीशु वापस आ गया है, वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर है। इस प्रकार, क्या हम प्रभु के द्वारा स्वर्गारोहित किये गए लोग नहीं हैं क्योंकि हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करते हैं? हम प्रभु के द्वारा स्वर्गारोहित किये गए लोगों में से हैं। बाइबल की कौन सी भविष्यवाणियां इससे पूरी हुई हैं? प्रभु यीशु ने कहा: "आधी रात को धूम मची, कि देखो, दूल्हा आ रहा है, उस से भेंट करने के लिये चलो" (मत्ती 25:6), और, "देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुन कर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आ कर उसके साथ भोजन करूंगा, और वह मेरे साथ" (प्रकाशितवाक्य 3:20)। "देख, मैं चोर के समान आता हूँ; धन्य वह है, जो जागता रहता है, और अपने वस्त्र की चौकसी करता है, कि नंगा न फिरे, और लोग उसका नंगापन न देखें" (प्रकाशितवाक्य 16:15)। ये भविष्यवाणियां पूरी की गई हैं। अब हम प्रभु के साथ हैं, और प्रभु हमारे साथ रात्रिभोज कर रहा है। इस "रात्रिभोज" का क्या नाम है? बाइबल में एक जगह है, जहाँ प्रभु यीशु ने इसे "मेम्ने के ब्याह का भोज" कहा है। "मेम्ने के ब्याह के भोज" का क्या मतलब है? इसे क्यों "मेम्ने के ब्याह का भोज" कहा जाता है? "मेम्ना" मसीह है, और मेम्ने के ब्याह का अर्थ है कि मसीह लोगों के एक समूह को पूर्ण करने के लिए, लोगों को प्राप्त करने के लिए आता है। वह अपने मेम्नों को पूर्ण करेगा, वे जिनका विजेता होना पूर्वनिर्धारित है, वह उन लोगों को आपदा के पहले ही विजेता बना देता है, इसलिए इसे "रात्रिभोज में भाग लेना" कहा जाता है। "मेम्ने के ब्याह का भोज", ब्याह का अर्थ हासिल करना है, और हासिल करने के बाद क्या होता है? हम एक परिवार बन जाते हैं। इसलिए, इस ग्रंथ को समझाते समय, कुछ जगहों पर कहा गया है कि मसीह दूल्हा है, कलीसिया दुल्हन है। इसे एक ब्याह कहा जाता है, और इसमें कुछ न कुछ हासिल किया जाना चाहिए। हासिल करने की बात करें तो, इसका संबंध अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य से है, न्याय और ताड़ना का कार्य, परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय का कार्य। लोग पहले परमेश्वर की विजय का अनुभव करते हैं, फिर विजय के बाद वे शुद्ध, पूर्ण, प्राप्त और सिद्ध किये जायेंगे; परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय का कार्य एक ऐसा ही कदम है। इंसानों द्वारा अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य का अनुभव किये जाने और उनके मसीह के अनुकूल बन के बाद, परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय का कार्य इस तरह पूरा हो जाता है। परमेश्वर के राज्य में वे लोग क्या हैं जिन्हें यह सब पूरा होने के बाद पूर्ण किया गया है? वे उन विजेताओं के समूह हैं जिन्हें आपदा के पहले पूर्ण किया गया है, वे विजेता हैं। परमेश्वर के राज्य में विजेताओं की क्या स्थिति होती है? उन्हें "मसीह के राज्य के स्तम्भ" कहा जाता है। आपदा के पहले परमेश्वर लोगों के एक समूह को, विजेताओं के एक समूह को पूर्ण करेगा, और ये विजेता मसीह के राज्य के स्तम्भ बन जाएँगे। क्या तुम्हें नहीं लगता कि यह एक बेहतरीन आशीर्वाद है? यह आशीर्वाद ज़बरदस्त है।

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कई ऐसे लोग हैं जो अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने के बाद कहते हैं, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन अत्यधिक गहरे, अत्यधिक कठोर हैं! इतने कठोर कि यह न्याय और ताड़ना है। मनुष्य कब जीवन स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त कर सकता है, परमेश्वर के अनुरूप हो सकता है, और वास्तव में शुद्ध हो सकता है?" ऐसे वचनों को देखकर, कोई आह भरते हुए कहता है, "परमेश्वर में विश्वास करना मुश्किल है। यीशु में विश्वास करना आसान है; बस इसे हर दिन आसानी से लेते हुए, तुम जैसे चाहो वैसे व्यवहार और मौज-मस्ती कर सकते हो। अगर मौज-मस्ती करते वक्त तुमसे पाप हो जाता है, तो बस प्रार्थना करो और इसे क़बूल करने के बाद तुम्हें क्षमा कर दिया जाएगा। तुम फिर से मौज-मस्ती में वापस जा सकते हो। यदि मौज-मस्ती करते वक्त तुमसे फिर पाप हो जाता है, तो बस एक बार और क़बूल करो। हर दिन पाप करना और हर दिन क़बूल करना, पाप करना और क़बूल करना, इसी तरह तुम्हारा विश्वास काम करता है। प्रभु में विश्वास करना ऐसा ही होता है। न्याय या ताड़ना पाने की, सत्य का अभ्यास करने की, और सत्य के बारे में सहभागिता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। प्रभु में विश्वास करना कितना महान है। यह किसी भी चीज़ में अड़चन नहीं डालता है, यह मेरे दैनिक जीवन को प्रभावित नहीं करता है और मैं अब भी शादी कर सकता हूँ, यह मेरे बच्चे होने या पारिवारिक जीवन की खुशी को प्रभावित नहीं करता है। यीशु में विश्वास करना बेहतर है; तुम खुश रह पाओगे।" क्या यह सही है? कुछ लोग विदेश जाते हैं, और फिर वे कहते हैं: "विदेश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था बहुत अच्छी है। यदि तुम्हारे पास योग्यता है, तो तुम पैसे कमा सकते हैं, और तुम जिस पर चाहो, पैसे खर्च कर सकते हो। ओह, अगर मैं यहाँ कुछ सालों में सुख नहीं भोगता हूँ, तो मैं उसके बगैर रह जाऊँगा।" यह किस तरह का व्यक्ति है? मुझे बताओ, किस तरह का व्यक्ति ऐसी बातें कह सकता है? क्या परमेश्वर ऐसे शब्दों को पसंद करता है? यह ऐसा कुछ है जो कोई ऐसा व्यक्ति ही कह सकता है, जिसे सत्य से कोई प्यार न हो। बाइबल में नीतिवचन की किताब यह कहती है: "और निश्चिन्त रहने के कारण मूढ़ लोग नष्ट होंगे" (नीतिवचन 1:32)। यह मूल बात है। किसी व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य आराम नहीं हो सकता है, व्यक्ति को अपने जीवन के साथ कुछ सार्थक करना चाहिए और सही मार्ग पर चलना चाहिए। मुझे बताओ, इस दुनिया में, सही मार्ग क्या होता है? आओ, इसे इस तरह से कहें: परमेश्वर में विश्वास करना ही एकमात्र सही मार्ग है; अन्य सभी रास्ते सही मार्ग नहीं हैं। हालांकि, यह पूरी कहानी नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करने का मार्ग एक व्यापक मार्ग है, विश्वास के सभी प्रकार होते हैं। विश्वास की स्वतंत्रता के कारण, प्रत्येक व्यक्ति की परमेश्वर के बारे में अपनी समझ होती है, और प्रत्येक व्यक्ति की अपनी स्वयं की खोजें होती हैं। हालाँकि परमेश्वर में विश्वास करने वाले बहुत से लोग हैं, परमेश्वर में विश्वास करने का हर किसी का अपना तरीक़ा होता है, फिर भी परमेश्वर में विश्वास करने में किसका मार्ग परमेश्वर के दिल के अनुरूप है जो उसे पूर्ण होने और परमेश्वर की आशीषें प्राप्त करने की अनुमति दे सकता है? मुझे बताओ, क्या इस मामले पर एक अच्छी समझ का होना महत्वपूर्ण है? यह बहुत ज़रूरी है। यदि तुम ऐसा नहीं सोचते हो, तो इन वचनों को लिख लो। यदि तुम अभी ही इस मार्ग पर चलना नहीं चुनते हो, तो फिर एक दिन, यदि तुमने वास्तव में इस मार्ग को नहीं चुना है, तो तुम कई दिनों तक रो रहे होगे, जब तुम इन वचनों को एक बार और पढ़ोगे, तब तुम्हें खेद होगा और खुद पर अफ़सोस होगा। क्या तुम इस बात पर शर्त लगाने के इच्छुक हो? यदि तुम इन वचनों का पालन नहीं करते हो, तो मैं तुम्हें साफ़-साफ़ बता देता हूँ: तुम अपने बाक़ी जीवन भर अफ़सोस करते रह जाओगे।

तो, परमेश्वर में विश्वास करने का कौन सा मार्ग है जो परमेश्वर को प्रसन्न करता है? केवल एक ही चीज़ है: सत्य की खोज करना और परमेश्वर को जानने की कोशिश करना। मैंने अभी जो कहा, क्या तुम उसे समझते हो? सत्य की खोज करो, और परमेश्वर को जानने की कोशिश करो। यही वह मार्ग है जो परमेश्वर द्वारा सबसे अधिक धन्य है। ऐसा कहा जा सकता है कि यह पवित्र परमात्मा की समझ तक पहुंचने का सबसे चतुर मार्ग है; यह भी कहा जा सकता है कि यह पवित्रता प्राप्त करने का मार्ग है, परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने वाला मार्ग है, एक संत और एक धर्मी व्यक्ति बनने का मार्ग है। परमेश्वर द्वारा पूर्ण किये जाने का मार्ग ही पवित्रता का मार्ग है, क्या यह सच नहीं है? तो, परमेश्वर द्वारा किस प्रकार का व्यक्ति पूर्ण किया जाएगा? सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति को परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया जाएगा। कोई और यह कह सकता है: "मैंने उन वचनों को पढ़ा है जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने कहे हैं, और मुझे लगता है कि उनमें से अधिकतर सही हैं; लेकिन मैं उन्हें बहुत कम समझ पाता हूँ। परमेश्वर के वचन अत्यधिक गहरे हैं। मैं उन्हें अपना जीवन कब बना सकता हूँ? मैं कब इन वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर सकता हूँ? मैं इन वचनों के वास्तविक जीवन को कब जी सकता हूँ? इसमें एक या दो सौ साल लग सकते हैं। मैं कभी भी शायद अपने जीवनकाल के दौरान इसे पूरा करने में सक्षम नहीं हो सकूँगा।" क्या तुम्हारे पास सत्य की खोज करने और परमेश्वर द्वारा पूर्ण किये जाने का दृढ़ संकल्प है? कुछ लोग कहते हैं: "मेरे पास यह संकल्प है। मैं इसकी खोज करने के लिए तैयार हूँ। मगर क्या मैं इसे हासिल कर सकता हूँ? मुझे अपने परिवार का पालन-पोषण करना है, मुझे काम पर भी जाना है, इसे करने की मेरे पास ऊर्जा नहीं है।" सोचने का यह तरीक़ा सही नहीं है। यह क्यों सही नहीं है? जब हम अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु में विश्वास करते थे, तो यह प्रसिद्ध कहावत बहुत लोकप्रिय थी: मनुष्य का अंत परमेश्वर की शुरुआत है। मनुष्य के लिए जो असंभव है, वह परमेश्वर के लिए संभव है, क्योंकि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है। तुम परमेश्वर पर निर्भर रहो, तुम अपना हर दिन परमेश्वर के सामने जियो, तुम हर दिन परमेश्वर से प्रार्थना करो, तुम्हारा दिल परमेश्वर के वचनों का हो जाए, और तुम परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करो। तुम परमेश्वर से प्रार्थना करो और सभी चीज़ों में परमेश्वर को देखो, फिर तुम परमेश्वर की इच्छा को जान लोगे; बिना सोचे ही, तुम परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर की मांगों और परमेश्वर की इच्छा को बेहतर ढंग से समझ पाओगे, और तुम्हारे भीतर अधिक स्पष्टता होगी। चाहे हमें यह कितना भी मुश्किल लगे, परमेश्वर के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं है। तुम्हें परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता में विश्वास करना होगा। देखो कि मैं किस तरह तुम्हारे साथ सहभागिता कर रहा हूँ, ऐसा लगता है कि मैं तुम्हारे साथ यूं ही बातें कर रहा हूँ। मैं जब तक चाहूँ, तब तक बात कर सकता हूँ, अगर मैं चाहूँ तो इस तरह हर दिन बात कर सकता हूँ, और मैं इसे हर तरह से कर सकता हूँ। क्या तुम्हें लगता है कि यह आसान है? तुम ऐसी चीज़ को कैसे प्राप्त कर सकते हो? तुम्हें सत्य की खोज और परमेश्वर की इच्छा की ओर ध्यान देना होगा। अपने दिल में, तुम्हें कहना होगा, "हे परमेश्वर, जबकि अन्य लोग तुम्हारी मांगों को अनदेखा करते हैं, मैंने उन पर ध्यान दिया; जबकि अन्य लोग तुम्हारी इच्छा पर ध्यान नहीं देते हैं, मैं देता हूँ; जबकि अन्य लोग तुम्हारे ख़िलाफ़ विद्रोह करते हैं और केवल अपने शरीर की देखभाल करते हैं, मैं तुम्हारी इच्छा की परवाह करता हूँ और तुम्हारी आज्ञा का पालन करता हूँ।" जैसा कि पतरस ने कहा था: जबकि दूसरे कमज़ोर हैं, मैं ऐसा नहीं हूँ; जबकि दूसरे धोखा देते हैं, मैं नहीं देता; चाहे कुछ भी हो, मैं प्रभु यीशु का अनुसरण कर रहा हूँ। उसके पास यह दृढ़ संकल्प था, और अंत में उसे पूर्ण किया गया था। एक बार हमारे पास परमेश्वर की उपस्थिति हो जाए, एक बार पवित्र आत्मा कार्य करने लगे, तो कुछ भी मुश्किल नहीं है।

मैं जो कह रहा हूँ क्या तुम उस पर विश्वास करते हो? पवित्र आत्मा तुम्हारी अगुवाई करता है, तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, और तुम्हारे परिवेश की व्यवस्था करता है। जब भी तुम प्रार्थना करते हो, तुम आत्मा में रहते हो, और एक बार जब तुम आत्मा में रहते हो, तो जो कुछ भी तुम कहते हो, वह पवित्र आत्मा के भीतर होता है, जो कुछ भी तुम देखते हो, वह पवित्र आत्मा के भीतर होता है। सब कुछ पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध और प्रकाशित होता है, जो कुछ भी तुम देखते हो उसमें स्पष्टता होती है; तुम जो कुछ भी करते हो, उसमें तुम बेफ़िक्र महसूस करते हो, सब कुछ आसान होता है, और सभी रास्ते तुम्हारे लिए खुल जाते हैं। यही सत्य है, और मुझे इसके बारे में गहरा अनुभव है। ऐसी कई चीज़ें हैं जिन्हें मैंने पहले कभी नहीं सीखा था, और मैं उन सभी चीज़ों में एक साधारण व्यक्ति था। परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, मैंने अपने कर्तव्यों को उस तरह पूरा किया, और अब जो कुछ भी मैं देखता हूँ, वह स्पष्ट होता है; मैं जिसे भी देखता हूँ, उसे लेकर मेरे भीतर स्पष्टता होती है, (मुझे लगता है) "यह तो सरल और आसान है"। इसलिए, कलीसिया के सभी मामले मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं हैं, और जैसे ही मैं उनका सामना करता हूँ, उनके बारे में मुझे अच्छी समझ होती है। केवल एक ही वाक्य से मैं तुम्हें सही राह पर ले आने में सक्षम हूँ, ताकि तुम उन चीज़ों को जान सको जिन्हें करना उचित होगा, और तुम्हें मैं जो कुछ भी बताता है, उसे करके तुम परमेश्वर को प्रसन्न कर पाओगे, इसका मैं तुम्हें आश्वासन देता हूँ। यह बात कैसे बनती है? पवित्र आत्मा कार्य करता है। एक बार जब पवित्र आत्मा तुम्हारे ऊपर कार्य करता है, यानी कि जब तुम पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर लेते हो, तो तुम जो कुछ भी करते हो, उसमें तुम बेफ़िक्र रहते हो, और सब कुछ तुम्हारे लिए आसान हो जाता है। इससे प्रभु यीशु की यह बात पूरी होती है, "क्योंकि मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हल्का है" (मत्ती 11:30)। इसलिए, यह चिंता न करो कि सत्य की खोज करना मुश्किल है, क्योंकि जब पवित्र आत्मा कार्य करता है तो कुछ भी मुश्किल नहीं होता।

मैं तुम्हें एक और सरल उदाहरण देता हूँ, कुछ ऐसा जो कि और भी अधिक लोगों ने अनुभव किया है। बहुत से लोग क़ैद हो जाने से डरते हैं। यदि सीसीपी सरकार तुम्हें क़ैद कर लेती है, तो वे कम से कम तुम्हें मार-पीट कर अधमरा कर देंगे। क़ैद होने के बाद, कुछ लोग पहले तो डर गए थे, और इसलिए उन्होंने प्रार्थना की थी: "हे परमेश्वर, मेरी रक्षा करो! हे परमेश्वर, मुझे बचाओ!" परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य के दौरान, परमेश्वर आम तौर पर अलौकिक चीज़ें नहीं करता है। क्यों? तुम्हें उस पीड़ा को सहन करनी चाहिए जिसे तुम्हें सहन करनी ही है, क्योंकि परमेश्वर चाहता है कि तुम उसके लिए गवाही दो। वह क्यों चाहता है कि तुम गवाही दो? क्या तुम गवाही देने का अर्थ जानते हो? इसे साफ़-साफ़ कहें तो, अनुग्रह के युग में छुटकारे के कार्य से शुरू करते हुए अंत के दिनों में न्याय के कार्य तक, जिसके द्वारा परमेश्वर अपनी प्रबंधन योजना पूरी करने के लिए मनुष्य को शुद्ध और पूर्ण करता है, उसकी संपूर्णता शैतान के साथ युद्ध करने का कार्य है। परमेश्वर इस युद्ध को कैसे लड़ता है? क्या परमेश्वर शैतान के साथ आमने-सामने लड़ता है? नहीं, यह युद्ध लोगों के लिए लड़ा जाता है। शैतान ने कहा: मैंने इस मानवता को पूरी तरह से भ्रष्ट कर दिया है, और तुम इसे दुबारा हासिल नहीं कर सकोगे। चाहे तुम कुछ भी करो, तुम इस मानवता को पूर्ण नहीं कर सकोगे। यह मानवता तुम्हें धोखा देगी, ये इंसान तुम में विश्वास नहीं करेंगे। परमेश्वर ने कहा: "तो मैं मानवता के कुछ हिस्से को पूर्ण करूँगा, मैं उनमें से कुछ को तुम्हारा अपमान करने के लिए तैयार करूँगा, और अंत में तुम्हें दोषी ठहराऊँगा, परास्त कर दूँगा।" क्या यह एक युद्ध नहीं है? हमने अय्यूब के परीक्षण को अंत तक देखा, परीक्षण के पीछे क्या कारण था? यह परमेश्वर और शैतान के बीच की एक शर्त थी। परमेश्वर ने कहा: "अय्यूब परमेश्वर से डरता है और बुराई से दूर रहता है, वह एक ईमानदार आदमी है।" शैतान सहमत नहीं हुआ, और बोला: "यह सच नहीं है। यदि जो कुछ भी उसके पास है, तुम वह सब ले लेते हो, तो वह निश्चित रूप से तुम्हें त्याग देगा।" परमेश्वर ने कहा: वह तुम्हारे क्षेत्र में है, तो चलो देखते हैं, क्या तुम उसे मुझे छोड़ देने के लिए राज़ी कर सकते हो"। इस तरह, ऐसी एक चीज़ इस दुनिया में हुई: जब सब कुछ शांत था, लुटेरों का एक गिरोह आया और उन्होंने अय्यूब को लूट लिया, फिर एक और गिरोह आया जिसने उससे कुछ और ले लिया। इन लुटेरों ने अय्यूब का सब कुछ लूट लिया। दशकों के व्यापार और उसकी सारी संपत्तियाँ जो परमेश्वर की आशीषों ने उसे दी थीं, वे सभी सिर्फ एक दिन में उससे छीन ली गईं। यहाँ क्या हो रहा है? क्या आध्यात्मिक क्षेत्र के युद्ध के साथ इसका कोई संबंध है? इसका पूरा संबंध है। यदि कोई व्यक्ति आत्मा को नहीं समझता है, अगर वह परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता है और परमेश्वर की इच्छा को नहीं जानता है, तो जब उसे ऐसी चीज़ों का सामना करना पड़ता है, तब यदि वह भौतिकवादी दृष्टिकोण चुनता है, यदि वह न्यायाधीश के दृष्टिकोण को चुनता है, अगर वह एक कानूनी दृष्टिकोण चुनता है, तो वह परेशानी में होगा, तो उसे इंसानों के माध्यम से इसे हल करना होगा।

बहरहाल, अय्यूब ने इस बात को इस तरह से देखा: "ऐसी बात नहीं है, यह परमेश्वर द्वारा मुझे वंचित किया जाना है। मुझे नहीं पता कि क्या हो रहा है, मैंने कैसे परमेश्वर को नाराज़ किया है? मैंने हमेशा परमेश्वर का भय माना है, मैंने पाप नहीं किया, तो फिर परमेश्वर द्वारा मुझे क्यों वंचित किया जा रहा है?" वह परेशान था, वह इस मामले पर विचार करने में सक्षम नहीं था। यह तथ्य कि उस युग में अय्यूब का विश्वास इस स्तर तक पहुँच सकता था, बहुत प्रभावशाली बात थी, यह आसान नहीं था। आज, हम इस मामले को केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर के उन सभी वचनों के माध्यम से समझने में सक्षम हैं, जिन्हें हमने पढ़ा है, फिर भी क्या अय्यूब ने परमेश्वर के इन सभी वचनों को पढ़ा था? नहीं, उसने नहीं पढ़ा था। इसलिए, यह बहुत सामान्य बात है कि अय्यूब के पास इस मामले में स्पष्टता नहीं थी। अगर हम भी उस युग के होते, तो हमने अय्यूब की तुलना में बहुत खराब कार्य किया होता, क्या यह सच नहीं है? और क्या आज हमारे पास अय्यूब की तुलना में बहुत अधिक है? परमेश्वर ने कहा है कि आज हम जो कुछ प्राप्त करते हैं, वह कई युगों में संतों को जो मिला था उससे भी अधिक है, यह न केवल व्यवस्था के युग के संतों से अधिक है, बल्कि अनुग्रह के युग के सभी संतों से भी अधिक, मूसा से अधिक, यशायाह को मिले प्रकाशन से अधिक, और यहाँ तक कि पतरस से भी अधिक है। परमेश्वर ऐसा क्यों कहता है कि हम कई युगों के संतों से भी अधिक प्राप्त करते हैं? इसलिए कि हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों को खाया-पिया है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों ने इन सभी सच्चाइयों और रहस्यों का खुलासा किया है, वे सभी बातें व्यक्त कर दी गई हैं। इसलिए, हम कई युगों के संतों से ज़्यादा प्राप्त करते हैं। क्या ऐसी बात नहीं है?

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अब ऐसे बहुत से भाई-बहन हैं जो हाल ही में धर्म से दूर आ गये हैं, जिन्होंने कई वर्षों तक प्रभु में विश्वास किया है, और उनमें से कुछ लोगों ने तो अपनी पूरी ज़िंदगी प्रभु यीशु में विश्वास किया है। जब उन्होंने पहली बार बाइबल पढ़ी, तो उन्होंने कहा, "बाइबल जो भी कहती है, सही है बाइबल जो भी कहती है, बिल्कुल सही हैं।" अब वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को देख कर कहते हैं: "और भी बेहतर, ये बाइबल के वचनों से भी अधिक स्पष्ट हैं। बाइबल पढ़ते समय मैं जिन सत्यों को नहीं समझ पाया, वे यहाँ इतनी स्पष्टता और तेजस्विता से समझाये गये हैं। वाह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर का वचन बहुत अच्छा है।" परमेश्वर के कार्य का हर चरण एक विशेष परिणाम प्राप्त करता है। व्यवस्था के युग के कार्य ने एक विशेष परिणाम हासिल किया था। कैसा परिणाम? लोगों को यह जानने देना कि यहोवा ही सृजनकर्ता हैं, कि उन्हें यहोवा की आराधना करनी चाहिए, कि उन्हें नकली परमेश्वर की आराधना नहीं करनी चाहिए, उन्हें मूर्तियों की उपासना नहीं करनी चाहिए, और उन्हें सब्त का पालन करना चाहिए चाहिए। इसके अलावा, चूंकि सभी मनुष्य भ्रष्ट थे इसलिए भले ही वे यहोवा की आराधना करते थे, भले ही वे यहोवा की आज्ञाओं, नियमों और आदेशों का पालन करते थे, वे फिर भी अपरिहार्य रूप से बहुत-से पाप करते रहे, और उन्हें उन पापों के लिए क्या करना चाहिए था? व्यवस्था के युग में इसके लिए प्रावधान थे – पाप-बलि, अग्नि आहुतियां और दूसरी कुर्बानियाँ। व्यवस्था के युग में पालन करने के लिए परमेश्वर के ये क़ानून और आज्ञाएं थीं। साथ ही, इसने लोगों को सिर्फ यहोवा को ही सृजनकर्ता के रूप में पहचानने की अनुमति दी, और यह कि यहोवा के अलावा कोई अन्य परमेश्वर नहीं हैं। यह परिणाम है जो व्यवस्था के युग के कार्य से प्राप्त किया गया। क्या यही बात नहीं है? अनुग्रह के युग में क्या हुआ? जब एक बार प्रभु यीशु का आगमन हुआ और वे पाप-बलि बने, तो प्रभु यीशु में विश्वास करने वाले सभी लोगों के सभी पाप क्षमा कर दिये गये। जब तक हम प्रभु यीशु के नाम से प्रार्थना करते रहते, हम परमेश्वर से शांति और आनंद पाकर उनकी असीम कृपा और आशीषों का शीघ्र ही आनन्द ले पाते। कुछ रोगियों ने प्रार्थना की, और उनके रोग दूर हो गये; यदि कोई आपदा आती, तो लोग बस प्रार्थना करते और आपदाएँ शांत हो जातीं; यदि लोगों को कोई मुश्किल होती, तो वे प्रार्थना करते, और परमेश्वर के आशीर्वाद से उनकी मुश्किलें हल हो जातीं। तो, अनुग्रह के युग ने क्या हासिल किया? इसने क़ानून को पूरा किया। लोगों को अब तरह-तरह के चढ़ावे नहीं चढ़ाने पड़े, अब उन्हें उन कानूनों का पालन नहीं करना पड़ा, उन्हें बस प्रभु यीशु में विश्वास करना था। प्रभु यीशु ही एकमात्र सच्चे परमेश्वर हैं, और वे ही यहोवा का प्रकटन हैं। परमेश्वर एक-एक कदम चल कर ही मनुष्यों का उद्धार करते हैं। वे हमें बर्दाश्त से बाहर का बोझ नहीं देंगे, इसलिए प्रभु यीशु द्वारा किये गये इस कार्य ने व्यवस्था के युग को पूर्ण किया, और ये परिणाम प्राप्त हुए।

राज्य के युग में क्या हुआ, परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य ने कौन-से मसले हल किये हैं? अनुग्रह के युग के ऐसे कौन-से मसले बच गये हैं जिनका समाधान अभी बाकी है? व्यवस्था के युग के ऐसे कौन-से मसले बच गये हैं जिनका समाधान अभी बाकी है? व्यवस्था के युग के दौरान, इन सब लोगों ने जो यहोवा में विश्वास करते थे, कभी भी यहोवा का मुख नहीं देखा, और यह एक बड़ा मसला है, है कि नहीं? एक और मसला है: ये सभी पाप और चढ़ावे, जो पापों के साथ चलते ही जा रहे हैं, इन सबको हम कैसे रोक सकते हैं? यह एक बहुत बड़ी बाधा लगती है – हम पाप क्यों करते रहते हैं, लगातार पाप में क्यों जीते हैं? हम कानून का पालन करने में सक्षम क्यों नहीं हैं? अंत में, व्यवस्था के युग ने एक परिणाम प्राप्त किया: "हमने गंभीर पाप किये हैं, हम कानून का पालन करने में असमर्थ हैं। परमेश्वर, कृपया हमें कानून के बंधन और दासता से बचा लें। वरना हम सब या तो कानून के दबाव में ख़त्म हो जाएंगे, या कानून द्वारा दण्डित किये जाएंगे।" परमेश्वर ने इसराइलियों की प्रार्थनाएं सुनीं: "अच्छा, तो फिर मैं तुम सबके लिए पाप-बलि बनकर यीशु - प्रेम और अनुग्रह से पूर्ण एक परमेश्वर, के रूप में देहधारण करूंगा। अब से, प्रभु यीशु में एक बार विश्वास करने से आपके पाप क्षमा कर दिये जाएंगे, और आपको तरह-तरह के चढ़ावे नहीं चढ़ाने पड़ेंगे।" इसने हमें परेशानी से बचाया। क्या देहधारी परमेश्वर को देखने और स्वर्ग में परमेश्वर को देखने में कोई फर्क होता है? हाँ। जो परिणाम प्राप्त होते हैं, वे अलग होते हैं। यहोवा ने स्वयं को किसके सामने प्रकट किया? यहोवा के मुख को किसने देखा? परमेश्वर ने स्वयं को कभी किसी के सामने प्रकट नहीं किया, यहाँ तक कि मूसा ने भी सिर्फ उनकी पीठ देखी, क्या यह सही नहीं है? तब, किसी ने कहा: "परमेश्वर का आत्मा हमारे सामने सीधे प्रकट क्यों नहीं होता?” क्या इस प्रश्न का कोई उत्तर है? शायद कोई कहे: परमेश्वर एक आत्मा हैं। हम आत्मा को नहीं देख सकते, हम मांस और रक्त से बने हैं, और आत्मा को देखते ही हम नष्ट हो जाएंगे।" क्या यह सही है? बात बस यही है कि हम आत्मा को नहीं देख सकते। यदि परमेश्वर ने अपना आत्मा किसी के सामने प्रकट किया है, तो बेशक वह व्यक्ति नष्ट हो जाएगा। परमेश्वर अपने आध्यात्मिक शरीर को मनुष्य के सामने प्रकट नहीं करते; मनुष्य के सामने इसके प्रकट होते ही मनुष्य नष्ट हो जाएंगे, और मनुष्य इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। परमेश्वर ने जिस महान प्रकाश की रचना की है – सूर्य, क्या मनुष्य उसके नजदीक जाने में सक्षम हैं? परमेश्वर के आत्मा के पास जाना तो दूर, भूमध्यरेखा के सबसे पास के स्थानों में भी दिन की गर्मी से लोग मर जाते हैं। मनुष्य परमेश्वर के करीब नहीं जा सकते, पास जाते ही हम नष्ट हो जाएंगे, हम राख बन जाएंगे। इसलिए परमेश्वर एक बेहतर तरीका लाये हैं, ताकि मनुष्य उन्हें जान सकें। यह बेहतर तरीका क्या है? यह है, देहधारण करना और फिर हमारे सामने प्रकट होकर हमसे बात करना। किसी ने कहा है, जब परमेश्वर देहधारण करते हैं, तो देह की छवि परमेश्वर के सच्चे स्वरूप को, उनकी सच्ची छवि को नहीं दर्शाती। यह भी सही है। मगर, याद रखें, देहधारी परमेश्वर का कार्य हमें उनकी छवि को देखने देना नहीं है; उसका मुख्य उद्देश्य यह है कि देहधारी परमेश्वर, परमेश्वर के स्वभाव, वह सब जो परमेश्वर हैं और उनका स्वभाव है, और परमेश्वर के जीवन के सार को व्यक्त कर सकें, ताकि हमें परमेश्वर के वचनों में परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो सके। यदि हमारे पास परमेश्वर के स्वभाव, उनके जीवन के सार, वह सब जो परमेश्वर हैं और उनके स्वभाव, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता का वास्तविक ज्ञान है, तो इससे हमें कौन-से स्पष्ट परिणाम प्राप्त हो सकते हैं? यह हमें परमेश्वर को जानने की अनुमति देगा, सही है न? परमेश्वर को जानने के बाद, हमारे जीवन का स्वभाव बदलना शुरू हो जाता है, हमें परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है। परमेश्वर के बारे में यह धारणा, वह धारणा, और तरह-तरह की धारणाएं और कल्पनाएँ जो हम पाले रहते हैं, वो सब गायब हो जायेंगी, वह सब अब वास्तविक ज्ञान बन जाएगा, और हम कहेंगे, "मैं परमेश्वर के रूबरू हूँ," और यह परिणाम प्राप्त हो जाएगा| आज मुझसे ये बातें सुनकर क्या आपने मेरे बारे में कुछ ज्ञान हासिल किया है? किसी ने कहा: "मैंने यह भी नहीं देखा आप कैसे दिखते हैं, मैं आपको कैसे जान सकता हूँ?" क्या इस बात के कोई मायने हैं? मैं आपसे इस तरह वार्तालाप कर रहा हूँ, मैं इस तरह आपसे संगति कर रहा हूँ, मैं इस तरह आपके सवालों के जवाब दे रहा हूँ, और वक्त बीतने के साथ क्या आप मेरे व्यक्तित्व और मेरे व्यक्तिगत दृष्टिकोण को समझ सकते हैं? ऐसा परिणाम प्राप्त किया जा सकता है। यदि हम परमेश्वर के वचनों को लगातार खाते-पीते रहें, परमेश्वर के आत्मा से प्रार्थना और उसके साथ संवाद करते रहें, और परमेश्वर के वचनों को और अधिक समझते रहें, तो क्या हम परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर क्या हैं और वो जो हैं, का वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं? हम निश्चित रूप से प्राप्त कर सकते हैं। क्या यह सही नहीं है? तो फिर मुझे बतायें, परमेश्वर को जानने के लिए, क्या उनके वास्तविक मुख को देखना बेहतर है, या उनके स्वभाव और वे क्या हैं और जो वो हैं को जानना बेहतर है? इनमें से क्या अधिक महत्वपूर्ण, अधिक मूल्यवान है? कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर के स्वभाव को जानना अधिक महत्वपूर्ण है। क्या आपने अब इसे साफ तौर पर समझा है? यदि आप सच में परमेश्वर के मुख, उनके आध्यात्मिक शरीर, उनकी वास्तविक छवि को देख लें, तो क्या आप परमेश्वर के स्वभाव का वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं? क्या इसका अर्थ यह है कि आप परमेश्वर के स्वभाव को जानते हैं? यह परिणाम नहीं हो सकता है। बेशक, आप कुछ परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। मगर, परमेश्वर उस ढंग से कार्य नहीं करते, और यदि परमेश्वर उस ढंग से कार्य करते भी हैं, तो भी शैतान आश्वस्त नहीं होगा और वह दोष लगायेगा। इसलिए, परमेश्वर हमें उनके वचनों का अनुभव करवाने के लिए देहधारी बन जाते हैं, उनके वचनों के जरिये हमें परमेश्वर से संगति करने की, उनके वचनों का अनुभव करने की, उनके वचनों के अभ्यास की, और अंतत: सत्य की समझ के माध्यम से परमेश्वर के बारे में ज्ञान प्राप्त करने की अनुमति देते हैं। इस प्रकार, हम पूर्ण उद्धार, शुद्धिकरण और पूर्णता के परिणाम प्राप्त कर सकेंगे। यदि हम सिर्फ परमेश्वर के वचनों को खायें-पियें, परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करें, अपने भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा पा लें, और एक पवित्र व्यक्ति बन जाएँ, तो यह शैतान को और अधिक शर्मिंदा करेगा। केवल बोलकर और अपनी वाणी का उच्चारण करके परमेश्वर इन लोगों को शुद्ध कर देंगे, पूर्ण कर देंगे और उन्हें परमेश्वर को जानने देंगे। क्या यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता का बेहतर प्रदर्शन नहीं है? इसलिए, परमेश्वर का इस प्रकार कार्य करना शैतान को नीचा दिखाने का सबसे प्रभावशाली तरीका है, और हमें बचाने, हमें पूर्ण करने का सबसे उपयोगी तरीका है। परमेश्वर इस प्रकार से कार्य करते हैं, जो अंतत: परमेश्वर की इच्छा को पूरी तरह से कार्यान्वित कर, लोगों के एक समूह को पूर्ण करेगा, और यह शैतान को शर्मिंदा करने का एक सबसे शक्तिशाली प्रमाण है।

अब, जब आप धर्म के अनेक लोगों को सर्वशक्तिमान परमेश्वर की गवाही देते हैं, तो वे क्या कहते हैं? "हम जिन प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, वही सच्चे परमेश्वर हैं, एकमात्र सच्चे परमेश्वर। आपके लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर की गवाही देना उचित नहीं है।" क्या उनका ऐसा कहना सही है? उनकी इस बात में कोई सच्चाई नहीं है। उनकी ये मूर्खतापूर्ण बातें क्या यह नहीं दर्शातीं कि ये लोग उसी मार्ग पर चल रहे हैं जिस पर चलकर इसराइलियों का पतन हुआ था, और ये वही गलती नहीं कर रहे हैं जो इसराइलियों ने की थी? इसराइलियों ने सोचा, "हम यहोवा में विश्वास करते हैं; यहोवा का नाम कभी नहीं बदलेगा। अब आप यीशु का प्रचार क्यों कर रहे हैं? यह सही नहीं है। यहोवा का नाम कभी नहीं बदलता, यहोवा के अलावा कोई सच्चा परमेश्वर नहीं है।" इसराइली यहोवा नाम के प्रति निष्ठावान थे। और फिर यीशु आये। उन लोगों ने न तो उन्हें माना, न स्वीकार किया, बल्कि उन्हें सूली पर भी चढ़ा दिया। इससे उन पर दुखों का सैलाब टूट पड़ा। इसे कहते हैं परमेश्वर में विश्वास करना मगर उन्हें न जानना, परमेश्वर में विश्वास करना, फिर भी उनसे विश्वासघात करना। पाप किया गया। क्या यह परमेश्वर में विश्वास की विफलता नहीं है? और अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु में विश्वास करने वालों के बारे में क्या? जब प्रभु यीशु सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम से आ गये हैं, तो वे उन्हें नहीं मानते ; केवल न मानना, और स्वीकार न करना ही नहीं, बल्कि यहाँ तक कि वे उनकी निंदा करते, और अंतत: परमेश्वर को एक बार फिर सूली पर चढ़ाते हैं। यह अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु में विश्वास करने वालों के द्वारा किया जाता है। क्या जिस मार्ग पर चलकर उनका पतन हो रहा है, क्या वही मार्ग नहीं है जिस पर चलकर यहूदी इसराइलियों का पतन हुआ था? आजकल, धार्मिक दुनिया में ऐसे बहुत-से पादरी और एल्डर्स हैं, जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते। वे कहते हैं, "प्रभु यीशु का नाम कल नहीं बदला, आज भी यह वही है, और अनंत काल तक यह कभी नहीं बदलेगा।" बाइबल के इन कथनों को वे चिरसम्मत नियम मानते हैं, और कोई भी व्यक्ति उन्हें किसी और बात में विश्वास नहीं दिला सकता। धार्मिक दुनिया के इन पादरियों और एल्डर्स को देखें, क्या वे इसराइल के उन फरीसियों के समान नहीं हैं? उन्होंने पतन के उसी मार्ग पर चलकर वही गलती की है। इसलिए, क्या ये लोग परमेश्वर का विरोध नहीं कर रहे हैं? यदि आप सिर्फ प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, फिर भी प्रभु यीशु के दोबारा आगमन को स्वीकार नहीं करते, तो क्या आपको प्रभु यीशु का आशीष मिल पायेगा? क्या आप अभी भी प्रभु यीशु की प्रतिज्ञाओं के योग्य होंगे? प्रभु यीशु ने कहा था, "उस दिन बहुत से लोग मुझ से कहेंगे, 'हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?' तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, 'मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ'" (मत्ती 7:22-23)। प्रभु यीशु ऐसा क्यों कहते हैं कि वे इन लोगों को जानते ही नहीं? ऐसा इसलिए क्योंकि ये लोग प्रभु यीशु को स्वीकार नहीं करते, इसलिए प्रभु यीशु भी इन लोगों को नहीं स्वीकारते। जब एक बार प्रभु यीशु ने अपना नाम बदल कर सर्वशक्तिमान परमेश्वर कर लिया, तो ये लोग उन्हें नहीं स्वीकारते। बताइए भला, क्या ये लोग प्रभु यीशु को जानते हैं? इसराइलियों ने यहोवा में विश्वास किया था, लेकिन जब यहोवा का प्रभु यीशु के रूप में देहधारण हुआ, तब उन लोगों ने उन्हें नहीं स्वीकारा, बल्कि उन्हें सूली पर भी चढ़ा दिया, और अंत में परमेश्वर के श्राप के भागी बने।

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तुम प्रभु में विश्वास करते हो, लेकिन तुम्हारे पास कोई सत्य नहीं है, और तुम स्वयं को इस तरह घोषित करते हो कि मानो तुम अन्य किसी से भी अधिक पवित्र और सदाचारी हो। यह खुद अपनी पूजा करवाना है। यह पाखंड है। और यदि आज कई लोगों ने उन धर्मनिष्ठ ईसाइयों को नरक में जाते हुए देखा, तो क्या तुम कल्पना करते हो कि उन्हें प्रभु के खिलाफ़ शिकायतें होंगी? वे शिकायतों से भरे हुए होंगे! वे घृणा से भरे हुए होंगे! वे सोचेंगे, "हे प्रभु, तुमने उन्हें नरक में भेजा! तुमने उन्हें इतनी पीड़ा दी। तुम बहुत निष्ठुर हो। बहुत हो गया, मैं तुममें बहुत विश्वास कर चुका!" ऐसे व्यक्ति के पास एक बुरा, अविश्वासी दिल होता है! क्या ऐसा नहीं है? वास्तव में, इस व्यक्ति की गलती कहाँ है? वह अपने सिर में दो आँखें तो उगा सकता है, लेकिन क्या वह समस्या के सार को देख सकता है? तो उसे इतना आत्मविश्वास क्यों है? जब भी वह धर्म में किसी विश्वासी को उत्साह से कोई भला काम करते हुए देखता है, तो वह कहता है, "प्रभु के लिए उसका प्यार कितना गहरा है!" जब भी वह धर्म में किसी विश्वासी को विधवाओं के लिए पानी ले जाते हुए या आँगन को साफ़ करते हुए, या अनाथ बच्चों के लिए भोजन पकाते हुए देखता है, तो वह कहता है, "वह कितना पवित्र है!" क्या तुम्हारे पास पवित्रता की कोई समझ है? क्या तुम्हारे पास भलाई की कोई समझ है? तुम खुद को पवित्र मानते हो, लेकिन क्या तुम प्रभु से अधिक पवित्र हो? तुम अपने को सदाचारी कहते हो, लेकिन क्या तुम प्रभु से अधिक सदाचारी हो? जब तुम उन शब्दों को बोलते हो, तो क्या तुम प्रभु का विरोध नहीं कर रहे हो? तुम प्रभु का विरोध कर रहे हो। कलीसिया में ऐसे पाखंडी लोग हैं जो, जब तुम परमेश्वर की गवाही देते हो, तो तुरंत क्रोध के साथ आँखें फाड़ लेते हैं और शैतान बन जाते हैं। लेकिन यदि तुम परमेश्वर की गवाही नहीं देते हो, तो वे बैठकर खूबमुस्कुराते हैं, जैसे कि वे सदाचारी हों। उनका सदाचार कहाँ है? पाखंडी कहीं के! उनके पास इस मामले की कोई सूझबूझ नहीं है, और फिर भी वे अंधाधुंध आकलन करते हैं! प्रभु से कौन प्यार करता है? क्या पूरी धार्मिक दुनिया में कोई एक भी ऐसा आदमी है जो वास्तव में प्रभु से प्यार करता हो? क्या मानवजाति का एक भी सदस्य ऐसा है जो वास्तव में प्रभु से प्यार करता हो? यदि तुम इसे नहीं समझ पाते कि प्रभु से प्यार करने का क्या अर्थ है, तो इस या उस व्यक्ति के सिर पर, और अंततः अपने सिर पर, इस तरह के पुरस्कारों को रखने के लिए मनुष्यों की अवधारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग करते न फिरो। तुम्हारे पास क्या अधिकार है? क्या तुम जानते हो कि पवित्रता क्या है? क्या तुम जानते हो कि प्रभु से प्यार करने का क्या अर्थ है? क्या केवल अच्छे कर्म करना ही प्रभु से प्यार करना है? यह तो एक बेतुका, संदर्भ-विहीन सिद्धांत है! प्रभु से वास्तव में प्यार करने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि व्यक्ति परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना का अनुभव करे, उसे परमेश्वर के स्वभाव की वास्तविक समझ हो, और अंत में, वह यह देख ले कि परमेश्वर के सभी कार्य प्रेम और उद्धार के कार्य हैं, चाहे वह कार्य न्याय का हो, ताड़ना, काट-छाँट या निपटने का हो, जिनका अंतिम परिणाम मनुष्य का शुद्धिकरण और पूर्णता है। जिस क्षण वह इस समझ तक पहुँचता है, जिस क्षण उसका अनुभव इस स्तर तक पहुँच जाता है, तो वह यह देख लेता है कि प्यार करने के लिए परमेश्वर के असंख्य पहलू हैं, वे अनगिनत हैं। परमेश्वर के कई कार्यों में मनुष्य केवल उसके धार्मिक स्वभाव, उसके प्रताप और उसके क्रोध को देखता है, लेकिन इन सभी चीज़ों से अंत में मनुष्य को लाभ होता है। वे अभी पीड़ित हैं, लेकिन उनकी पीड़ा के बाद ये लोग देखेंगे कि परमेश्वर का प्रेम कितना महान और वास्तविक है, और परमेश्वर के लिए उनके दिल में प्यार पैदा होगा। एक बार जब ऐसा होता है, तो ये लोग क्या कहते हैं? "अतीत में, मैं परमेश्वर के विरूद्ध बहुत विद्रोही था, मैं अंधा था, मैं परमेश्वर को नहीं जानता था! अतीत में, मैंने जो कुछ भी कहा, उनमें से कुछ भी व्यावहारिक नहीं था, यह सब इंसान की अवधारणाओं और कल्पनाओं पर आधारित था, इसमें कोई सच्चाई नहीं थी, मैंने लोगों और चीज़ों को बिना किसी सिद्धांत के देखा था, मेरे सभी नज़रिए गलत थे। मैंने अविश्वासियों के नज़रियों और धर्म की लोकप्रिय बातों का अनुसरण किया, लेकिन वे सब सत्य की वास्तविकता के अनुरूप नहीं हैं। वे (बातें) सिद्धांत और प्रभु की इच्छा के खिलाफ़ जाती हैं!" जब कोई व्यक्ति इन शब्दों को बोल सकता है, तो वह वास्तव में शुद्ध हो गया होता है। उसके दृष्टिकोण परमेश्वर के दृष्टिकोण के अनुरूप होते हैं, और जिस तरह से वह लोगों का मूल्यांकन करता है वह परमेश्वर के अनुरूप होता है, क्योंकि वह लोगों के बाहरी व्यवहार से परे देखता है, वह उनके इरादों और अभिप्रेरणाओं की जाँच करता है। आखिरकार, अगर हम उसे देखें, तो हम पाते हैं कि उसके पास एक ऐसा दिल है जो सचमुच प्रभु से प्यार करता है, और वह सभी चीज़ों में प्रभु की इच्छा का ध्यान रखता है। उसकी इच्छा प्रभु की इच्छा के साथ एक हो जाती है। परमेश्वर से प्यार करने का यही मतलब है! बाहरी व्यवहार के आधार पर, किसी के सिर पर सराहना का ताज़ रखना, यह दावा करना कि यह या वह व्यक्ति प्रभु से प्यार करता है, कि वह परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी है, या वह पुण्यात्मा है, कोरा बकवास है। क्या तुम्हें यह भय नहीं है कि ऐसे शब्द प्रभु को नाराज़ कर देंगे? क्या तुम सृष्टि के स्वामी हो? क्या तुम मनुष्य के रचयिता हो? क्या तुम मनुष्य के सार को समझ सकते हो? तुम अहंकारी, आत्माभिमानी और आत्म-तुष्ट हो। तुम सत्य को नहीं समझते हो, और तुम्हारे शब्द बकवास से भी बदतर हैं। क्या ऐसी बात नहीं है?

मैं तुम्हें बताता हूँ, जब मैंने अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार किया और परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के वचनों को पढ़ा, तो मुझे एहसास हुआ कि मुझमें धर्म की बातें और मानवीय अवधारणाएँ और कल्पनाएँ तुम्हारे जैसी ही थीं। वे सब तुममें हैं, और मुझमें भी थीं। मेरे पास वे उतनी ही थीं, जितनी तुममें। लेकिन इन वर्षों में, परमेश्वर के वचन को पढ़ने से, सत्य पर सहभागिता करने से, अपने कर्तव्यों को पूरा करने से, और पवित्र आत्मा से प्रबोधन और प्रकाश पाकर, अंततः मुझे इस मामले को समझने का ज्ञान प्राप्त हुआ। और इसलिए, मेरे विचारों में बदलाव होने लगे। वे धार्मिक लोगों से भिन्न हो गए, पूरी तरह से भिन्न। मैं उन शब्दों को लेकर पैदा नहीं हुआ था जिन पर मैं आज तुम्हारे साथ सहभागिता कर रहा हूँ, क्या तुम समझते हो? मुझे बताओ, अगर तुम आठ साल या एक दशक तक विश्वास करते हो, तो क्या तुम इन मानवीय अवधारणाओं और कल्पनाओं से, संदर्भ के बाहर की कहावतों और लापरवाह निर्णयों से, शुद्ध किये जा सकते हो? निश्चित रूप से तुम ऐसा कर सकते हो। मैं इसका जीता-जागता सबूत हूँ कि तुम ऐसा कर सकते हो। मुझे शुद्ध किया जा चुका है, और तुम्हें बस इतना करना है कि तुम मेरी तरह विश्वास कर परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करो, परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करो, प्रार्थना करो और सत्य की तलाश करो, और अंततः तुम मेरे जैसे बन जाओगे। तुम सुन सकते हो कि मेरे शब्द धार्मिक लोगों के शब्दों से अलग हैं। धर्म के शास्त्रियों, विद्वानों, पादरियों और एल्डर्स के सभी विचार गलत हैं। उन्होंने कभी परमेश्वर के कार्य का अनुभव ही नहीं किया है। उनके क़द के इंसानों में, मनुष्य के दृष्टिकोण, उनकी आत्म-तुष्टता और कल्पनाएँ बहुत गहरी जड़ें जमाए हुए होती हैं। परमेश्वर के वचनों के अलावा इंसान को कोई नहीं जीत सकता है। मुद्दे की बात यही है।

इसलिए, जब तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ना समाप्त करते हो, तो यह न कहना कि परमेश्वर में विश्वास करना मुश्किल है, क्योंकि ऐसा नहीं है! मनुष्य को यह मुश्किल लग सकता है, मगर परमेश्वर के लिए यह बिलकुल भी मुश्किल नहीं है। परमेश्वर तुम्हें पूर्ण करेगा, और पवित्र आत्मा तुम्हारे साथ रहेगा, वह तुम्हें प्रबुद्ध और प्रकाशित करेगा, और फिर यह तुम्हारे लिए मुश्किल नहीं होगा। परमेश्वर के कार्य के अनुभव का एक वर्ष, तुम्हारे लिए लाभ का एक वर्ष लेकर आएगा, दो वर्ष इसे दुगुना कर देंगे; तीन से पांच वर्ष तक अपने कर्तव्यों का पालन करने के बाद, तुम कई सच्चाइयों को समझोगे और बहुत अलग तरह के हो जाओगे; और अपने कर्तव्य-पालन के आठ से दस वर्षों के बाद, तुम्हारे पास परमेश्वर का ज्ञान होगा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास का एक दशक, तुम्हें धर्म में विश्वास की एक शताब्दी से अधिक लाभ प्राप्त कराएगा। क्या तुम इसे मानते हो? एक ऐसा व्यक्ति था जिसने धर्म में बीस साल से अधिक समय तक विश्वास किया था, लेकिन मुझे तीन घंटों तक सुनने के बाद, उसने कहा, "विश्वास के बीस वर्षों में मैंने जो प्राप्त किया था, उससे भी अधिक मैंने आपकी थोड़ी-सी सहभागिता से प्राप्त कर लिया!' जिस बात को समझने की कोशिश में वह बीस साल से अधिक समय लगाकर भी नाकामयाब रहा था, जो उसे बीस सालों में नहीं मिल पाया था, मैंने उसे एक पल में स्पष्ट कर दिया। क्या तुम्हें लगता है कि यह आसान था? कुछ लोग कहते हैं, "लेकिन मैं तो बूढ़ा हूँ, बड़ी आपदा आने ही वाली है, और मेरे पास समय बहुत ही कम है, क्या यह थोड़ा सा समय मुझे आवश्यक अनुभव देगा? क्या मैं अभी भी परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया जा सकता हूँ?" क्या वह पूर्ण किया जा सकता है? उसने कहा, "तुमने तीस साल से अधिक समय तक विश्वास किया है, लेकिन मुझे केवल हाल में ही विश्वास हुआ है!" प्रभु यीशु ने एक बार एक दृष्टान्त बताया था, जिसमें कुछ लोगों को जिन्होंने सात घंटे तक काम किया था जो मजदूरी दी गई, उसने उतनी ही मजदूरी उनको भी दी जिन्होंने एक ही घंटा काम किया था। मैं सात घंटे के काम के बराबर काम कर सकता हूँ, जबकि तुम एक घंटे के बराबर करते हो, लेकिन अंत में हमें एक समान इनाम प्राप्त होता है। इससे कुछ लोगों को ईर्ष्या होती है, वे कहते हैं, "हे प्रभु, तुम बहुत अन्यायी हो!" इस पर यीशु क्या कहता है? "उसे दिया गया दीनार मुझे तुम्हारे प्रति कर्ज़दार नहीं बनाता, मैंने तुम्हें बहुत दिया है। इसके अलावा, मेरे भले होने के कारण तुम मुझसे नाराज़ कैसे हो सकते हो!" इससे शैतान शर्मिंदा होता है। यही इस दृष्टान्त का मतलब है।

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अंत के दिनों में, परमेश्वर ने एक मनुष्य के रूप में देहधारण किया है। परमेश्वर मानवजाति के सर्जन से लेकर मानव सभ्यता के अंत तक, केवल दो बार देहधारण करता है: पहली बार तब था जब प्रभु यीशु छुटकारे के कार्य को करने आया था; अंतिम बार तब होता है जब परमेश्वर मनुष्य का न्याय और शुद्धिकरण करने, तथा उसे पूर्ण बनाने के लिए, अंत के दिनों में व्यक्तिगत रूप से आता है। यह एक बहुत ही दुर्लभ अवसर है! परमेश्वर के मनुष्य बनने के बारे में कुछ लोग कहते हैं, "परमेश्वर अपने वचन बोलने के लिए मनुष्य बन जाता है, वास्तव में, देखो, कोई भी इन वचनों को नहीं बोल सकता!" यदि तुम धार्मिक दुनिया के सभी धर्मशास्त्रियों और सभी पादरियों को एक साथ रख दो, तो भी क्या वे इन वचनों को बोलने में सक्षम होंगे? अगर वे कोशिश करते-करते थक कर मर भी जाएँ, तो भी नहीं। केवल देहधारी परमेश्वर ही इन वचनों को बोल सकता है, क्या यह इस मामले की सच्चाई नहीं है? मनुष्य के रूप में परमेश्वर का देहधारण पहले से ही एक तथ्य है; यह और भी अधिक तथ्यपूर्ण है कि शैतान ने इंसानों को भ्रष्ट कर दिया है और उन्हें राक्षसों में बदल दिया है। इसलिए मैं तुमसे पूछता हूँ, क्या शैतानों के राजा जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, खुद शैतान नहीं है? वे सभी शैतान हैं। उनका देह मनुष्य का हो सकता है, लेकिन उनकी आत्माएँ शैतान की हैं। यह कहना कि वे शैतान हैं, उनकी आत्माओं की ओर इशारा करता है, उनकी आत्माएँ शैतान की हैं। जब शैतान की आत्मा मानव देह के वस्त्र पहनती है, तो हम उसे क्या कहते हैं? इसके लिए सांसारिक कहावत क्या है? "शैतान का पुनर्जन्म, शैतान का अवतार"। क्या यह सही नहीं है? शैतान आख़िर कौन होता है? कुछ अविश्वासियों को यह समझ में आता है। जब मैंने पहली बार प्रभु में विश्वास करना शुरू किया था, तो मुझसे यह सवाल पूछा गया था। मैंने उत्तर दिया था, "शैतान एक दुष्ट आत्मा है"। "गलत"। मैंने पूछा, "मैं गलत क्यों हूँ?" "लोग ही शैतान हैं।" मैंने कहा,"तुम सही हो, मैं सहमत हूँ, लोग शैतान हैं"। लोग शैतान कैसे बन जाते हैं? वे ऐसे बेकार लोग होते हैं जो कुछ भी उपयोगी काम नहीं करते हैं और वे परमेश्वर का विरोध करते और उसे नकारते हैं, वे मानव कहलाने के योग्य नहीं होते। मनुष्य (का देह) वह बाहरी वस्त्र है जो शैतान पहनता है, इसलिए मनुष्य शैतानों की शैली में रहते हैं, मनुष्यों की शैली में नहीं। मुझे बताओ, क्या लोग जीते-जागते शैतान नहीं हैं? अतीत में हमने पारंपरिक रूप से कहा है कि शैतान दुष्ट आत्माएँ हैं, लेकिन आज मैं तुम्हें बताता हूँ कि शैतान मानव देह ओढ़े हुए हैं, इंसान शैतान हैं, और शैतान इंसान हैं। जब हम कहते हैं कि लोग जीवित शैतान होते हैं, तो हम पूरी तरह से सही हैं। यह एक बहुत यथार्थवादी अभिव्यक्ति है। क्या मैं जो कह रहा हूँ वह अतिशयोक्ति है? मैं जो कह रहा हूँ वह सच है, लेकिन हम इसे केवल आपस में ही बोल सकते और इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर हम अविश्वासी के पास जाते हैं और कहते हैं, "तुम शैतान हो", तब तो मुसीबत हो जाएगी। यदि तुम अपने अविश्वासी पति से कहोगी "तुम शैतान हो", तो परेशानी खड़ी हो जाएगी। बड़ी परेशानी। इसमें हमें विवेक रखना चाहिए। परमेश्वर चाहता है कि हम ईमानदार लोग बनें, लेकिन उसकी हमसे यह भी अपेक्षा है कि हम विवेक से काम लें। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें केवल महसूस किया जा सकता है, उन्हें कहना नहीं चाहिए। क्या यह सच नहीं है? विवेक-शून्य होकर लापरवाही से कुछ भी कह देना, अंतहीन समस्याओं का कारण बनता है, क्योंकि अन्य लोग तुम्हारा आकलन करेंगे और तुम्हारे खिलाफ़ मुकदमा दायर करेंगे। फिर तुम परेशानी में पड़ जाओगे।

आज परमेश्वर का वचन फैल चुका है और इसकी गवाही दी गई है, और तुममें से कई अपने देश और क्षेत्रों से सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार करने वाले पहले लोग हैं। तुम वास्तव में धन्य हो। इसके लिए, मैं तुम सभी को बधाई देता हूँ! कुछ लोग पूछते हैं "तुम हमें बधाई क्यों देते हो?" मैं जवाब देता हूँ कि मेरे वचन सांसारिक औपचारिकता नहीं हैं, क्योंकि मेरी बधाई का एक व्यावहारिक अर्थ है। सबसे पहले, तुमने अंत के दिनों के सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया है क्योंकि तुम देखते हो कि प्रभु यीशु वापस आ गया है, कि उसने मनुष्य के पुत्र के रूप में देहधारण किया है और सत्य को व्यक्त करना शुरू कर दिया है और वह अंत के दिनों में न्याय का कार्य कर रहा है, इसीलिए तुम उसे स्वीकार करते हो। इसका मतलब है कि तुमने स्वर्गारोहण कर लिया है, तुम्हारा परमेश्वर के सामने स्वर्गारोहण हो चुका है, तुम प्रभु से मिलने के लिए हवा में उठाए गए हो। यहाँ 'हवा' का क्या अर्थ है? सुसमाचार फैलाना और ऑनलाइन बोलना, क्या यह "हवा में" नहीं है? क्या ये वचन जो मैं तुमसे आज कह रहा हूँ, "हवा में" नहीं हैं? लोग पूछते हैं, "ये 'हवा' कहाँ है?" "हवा" एक सर्वनाम है और यह इस सवाल का प्रतिनिधित्व करता है कि हम स्वर्ग में हैं या पृथ्वी पर। बिलकुल शाब्दिक रूप से कहें तो, हम धरती पर हैं लेकिन हम परमेश्वर के साथ जीवन का आनंद लेते हैं, और हम परमेश्वर के वचन खाते-पीते हैं, जो कि सिंहासन से बहने वाली जीवन की नदी का पानी है, इसलिए हम ऐसे ही रहते हैं जैसे कि हम स्वर्ग में हों। इसका वास्तविक महत्व है, क्योंकि हम कहाँ हैं? हम स्वर्ग में हैं, या धरती पर? यह कहना मुश्किल है, इसलिए हम इसका वर्णन करने के लिए "हवा में" का उपयोग करते हैं। इसलिए एक अर्थ ये है, मैं तुम्हें मेमने के साथ दावत खाने के लिए, जो कि परमेश्वर के साथ दावत है, परमेश्वर के सिंहासन के सामने स्वर्गारोहण करने पर बधाई देता हूँ। दूसरा, तुमने अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा पूर्ण होने का मौका प्राप्त किया है, और यदि तुम मसीह के आसन के सामने न्याय और ताड़ना के माध्यम से शुद्ध और पूर्ण हो जाते हो, तो तुम परमेश्वर की मंजूरी पाने के योग्य हो जाओगे। यह आशीर्वाद कितना महान है! हमने वो हासिल कर लिया है जिसे आज तक के इतिहास में, संत भी चाहते रहे हैं पर खोजने में विफल रहे हैं, क्या हम भाग्यशाली नहीं हैं? तीसरा, हम परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से गुज़र रहे हैं, और भले ही हम अपने दिल में कुछ पीड़ित हों, और यह शुरू में लज्जास्पद हो सकता है, मगर हम कुछ-न-कुछ हासिल करेंगे, हम शुद्ध हो जाएँगे, हम सत्य को समझेंगे, और हम परमेश्वर को जान लेंगे। भले ही ताड़ना से गुज़रने के दौरान हम सारी प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान त्याग देते हैं, घुटने टेकते हैं, झुकते और सिसकियाँ भरते हैं, अपने पापों को स्वीकार करते और पश्चाताप करते हैं, फिर भी इस तरह की पीड़ा के एक दौर के बाद, हम बदलना शुरू कर देते हैं, हम और अधिक विवेकशील हो जाते हैं, हमारा जमीर जाग जाता है, हमारी आत्मा उज्ज्वल हो जाती है, और हम परमेश्वर को देखते हैं, इस पथ पर खुद को स्थापित कर लेते हैं, और हमारा मार्ग निरंतर उज्ज्वलतर होता जाता है, जब तक हम अंततः पूर्ण नहीं हो जाते और विजेता नहीं बन जाते हैं। विजेता होने का क्या मतलब है? इसका मतलब बड़ी आपदा का सामना न करना है, और जब बड़ी आपदा आती है, "तेरे निकट हजार, और तेरी दाहिनी ओर दस हजार गिरेंगे; परन्तु वह तेरे पास न आएगा" (भजन संहिता 91:7)। क्या हम भाग्यशाली नहीं हैं? अविश्वासी और धार्मिक दुनिया के लोग आपदा में पड़ जाएँगे, और हालाँकि ऐसा लग सकता है कि हम भी आपदा में फँसे हैं, पर परमेश्वर हमारे साथ होता है, इसलिए हम पर आपदा नहीं पड़ेगी। यदि तुम वास्तव में सत्य को हासिल करते हो, तो मौत तुम्हें नहीं छुएगी। ये वचन सच हैं। सबसे बड़ा आशीर्वाद, जो अंत के दिनों में परमेश्वर का वादा है, हम पर प्रदान किया जाएगा। क्या तुम समझते हो? यही कारण है कि मैं तुम्हें बधाई देता हूँ। मेरी बधाई का यही अर्थ है। क्या तुम समझे? तुम्हें ऐसा लग सकता है कि ये कोरी बातें हैं, लेकिन उनमें हमारा सबसे बड़ा आशीर्वाद निहित है!

कुछ ऐसे नए विश्वासी हैं जिनके अंदर परमेश्वर के वचन के बारे में कुछ अवधारणाएँ हैं और जो वचन में से कुछ को स्वीकार नहीं कर सकते हैं। उन्हें लगता है कि कुछ बातों में परमेश्वर अत्यधिक बोझिल तरीके से बोलता है, या वे महसूस करते हैं कि परमेश्वर के वचन पूरी तरह से तथ्यों के अनुसार नहीं हैं, या यह भी कि परमेश्वर उपहासपूर्ण, अशिष्ट बातें करता है। ऐसी भावनाओं का होना सामान्य बात है, क्योंकि हमने अपने विश्वास की शुरुआत में सब कुछ स्वीकार नहीं किया था, लेकिन ये पूरी तरह से परमेश्वर के वचन हैं, इसलिए उन पर संदेह मत करो। तुम जो भी करो, यह मत पूछो, "क्या ये वास्तव में परमेश्वर के वचन हैं?" संदेह मत करो। निस्संदेह, ये परमेश्वर के वचन हैं, क्या तुम समझते हो? लेकिन एक दिन ऐसा आएगा जब तुम अपने अनुभव से कहोगे, "परमेश्वर दरअसल हमारा उपहास नहीं कर रहा था, परमेश्वर के वचनों का वास्तविक महत्व है। वे खरे और तथ्यात्मक हैं, पक्षपातपूर्ण बिल्कुल नहीं हैं! वे सही हैं, पूरी तरह सटीक हैं!" सही अनुभव के बिना, तुम उन शब्दों को नहीं कह पाओगे। यही कारण है कि कई वर्षों के विश्वास के अनुभव के बाद, हमने अपने अहंकार को टूटते हुए महसूस किया। परमेश्वर के वचन के इस या उस हिस्से के बारे में हमारी जो अवधारणाएँ थी, उन सब का क्या हुआ? अंत में, हमने परमेश्वर से प्रार्थना की और अपने पाप को स्वीकार किया और हमने खुद के मुंह पर थप्पड़ मारा, "मैंने परमेश्वर और उसके वचन का आकलन किया। मुझे कोई समझ नहीं है। मैं अमानवीय हूँ!" कुछ वर्षों के अनुभव के बाद, तुम समझोगे। इसलिए चाहे आज तुम्हें परमेश्वर के वचन के किसी भी भाग के बारे में संदेह हो, या किसी भी भाग में प्रवेश की कमी हो, याद रखो, यह परमेश्वर का वचन है, और पर्याप्त अनुभव के बाद, तुम इसे समझोगे, इसलिए इसके बारे में निर्णय लेने से और अवधारणाओं से दूर रहो। अपने आप से कहो, "चाहे मैं इसे समझूँ या न समझूँ, चाहे मुझे यह पसंद हो या न हो, मैं इसे स्वीकार करूँ या न करूँ, यह परमेश्वर का वचन है। यह सही है, यह परमेश्वर का वचन है।" इसे लेने का यही सही तरीक़ा है। कुछ अनुभव के बाद, तीन वर्षों के भीतर, तुम महसूस करोगे, "अब, परमेश्वर का वचन पढ़ना एक अलग बात है। परमेश्वर के वचन व्यावहारिक, सही, सटीक, और उचित हैं। यह वास्तव में परमेश्वर का वचन है! मैं भाग्यशाली हूँ कि मैंने शुरुआत में आकलन नहीं कर लिया।" वे सभी अवधारणाएँ जो तुम्हारे अंदर विश्वास शुरू करने के समय होती हैं, परमेश्वर के वचन को अव्यवहारिक बना देती हैं, लेकिन तीन या पांच वर्षों के बाद, सब कुछ व्यावहारिक लगता है, और फिर कुछ भी समस्या नहीं होती है। यह वास्तव में परमेश्वर का वचन है! ये वो यात्रा है जिसका हम सभी अनुभव करते हैं। कुछ लोग कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि ये परमेश्वर के वचन हैं, ये वचन परमेश्वर से नहीं आ सकते हैं, क्या ये बातें गलती से इंसान ने लिख दी हैं?" चाहे तुम परमेश्वर के बारे में जो भी कहो, या परमेश्वर, उसके वचन या उसके कार्य के बारे में तुम्हारी कोई भी अवधारणाएँ हों, परमेश्वर के साथ जुआ मत खेलो। "हे परमेश्वर, तुम्हारे कुछ वचनों के बारे में मेरे मन में कई अवधारणाएँ हैं, इसलिए ये वचन तुमसे नहीं आ सकते हैं। परमेश्वर, यह करना निश्चित रूप से तुम्हारे लिए सही नहीं है; यह निश्चित रूप से मनुष्य से आता है।" जुआ मत खेलो, क्योंकि यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुम निश्चित रूप से पूरी तरह से हारोगे, इसमें कोई संदेह नहीं है। जो भी परमेश्वर के साथ दाँव खेलेगा, वह हारेगा, और बाद में, तुम अपमानित होगे और अनंत काल तक इसका अफ़सोस करोगे।

मैं तुम्हें बताता हूँ, सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास यीशु में विश्वास करने से अलग है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने वाले परमेश्वर के वचन को खाने-पीने का प्रयास करते हैं, और सत्य के बारे में रोज सहभागिता करते हैं, वे अपने कर्तव्यों को पूरा करने और हर दिन परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने के बारे में बात करते हैं, और हर दिन सच्चाई और परमेश्वर के वचन की उपस्थिति में बिताते हैं। जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं वे हर दिन बाइबल पढ़ते और इस पर चर्चा करते हैं, और फिर प्रभु के लिए काम पर जाते हैं। लेकिन प्रभु में दशकों के विश्वास के बाद भी, वे क्या हासिल करते हैं? वे प्रभु में दशकों के विश्वास से क्या लाभ पाते हैं? वे बाइबल के कुछ पत्रों और सिद्धांतों को समझते हैं, लेकिन उन्हें प्रभु की कोई वास्तविक समझ नहीं होती है, उनके पास केवल सिद्धांत, खोखली बातें और अव्यावहारिक परिकल्पनाएँ होती हैं। जीवन भर के लिए प्रभु में विश्वास करने से तुम्हें वह दिल नहीं मिलेगा जो परमेश्वर से डरता हो। जीवन भर के लिए प्रभु में विश्वास करने से तुम्हें प्रभु की समझ नहीं मिलेगी। जीवन भर के लिए परमेश्वर में विश्वास करना तुम्हारे व्यवहार को तो बदल सकता है, लेकिन यह तुम्हारे जीवन-स्वभाव को नहीं बदलेगा। जीवन भर के लिए प्रभु में विश्वास करने से तुम्हें केवल बाइबल के ज्ञान का जीवनकाल मिलेगा, और जैसे ही तुम इसे प्राप्त करोगे, तुम अधिक घमंडी और आत्मतुष्ट बन जाओगे, और एक दिन तुम किसी की नहीं सुनोगे! तुम्हें प्रभु में विश्वास करने से बस यही हासिल होगा। क्या मैं जो कह रहा हूँ वह सच नहीं है? किस कलीसिया में पादरी, एल्डर्स, शिक्षा-संस्था के छात्र, और विश्वासी बाइबल पर झगड़े नहीं किया करते, वहाँ कोई भी दूसरे की नहीं सुनता, और प्रत्येक व्यक्ति क़द के लिए प्रतिस्पर्धा करता है? उन्हें बाइबल से एक ही पंक्ति दे दो, और प्रत्येक की अपनी अटल राय होती है, इसलिए जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं वे पवित्र आत्मा द्वारा शासित नहीं होते हैं, और वे मसीह द्वारा तो और भी कम शासित होते हैं, क्योंकि उनका विश्वास "प्रभु यीशु" के शब्दों पर, केवल "प्रभु यीशु" के नाम पर, अटक जाता है, लेकिन प्रभु यीशु उनके बीच नहीं होता है, इसलिए वे कभी भी जीवन प्राप्त नहीं कर सकते हैं, चाहे वे प्रभु में कितने भी साल विश्वास कर लें। तुम में से जिसने भी प्रभु में वर्षों से विश्वास किया है, वह प्रभु के विषय में अपनी जानकारी के बारे में बात कर सकता है। क्या तुम्हारे अंदर कोई वास्तविक ज्ञान है? क्या तुम परमेश्वर की कोई वास्तविक समझ व्यक्त कर सकते हो? क्या तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के भाइयों और बहनों के सामने परमेश्वर की समझ के बारे में बात कर सकते हो? सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के भाइयों और बहनों से कहो कि तुम जो कहते हो उसे वे सुनें और उसका मूल्यांकन करें कि उसमें कोई सच्चाई है या नहीं, क्योंकि उनके अंदर जानने की सूझ-बूझ है। जिस क्षण वे तुम्हारे सिद्धांतों और शब्दों को सुनेंगे, वे जान लेंगे कि तुम्हारी बातों में कोई व्यावहारिक सत्य नहीं है, और वे उन्हें अस्वीकार कर देंगे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने के बाद चीज़ें इससे अलग होती हैं। अनुभव के एक वर्ष बाद, तुम एक बदलाव महसूस करना शुरू कर देते हो, "हे परमेश्वर, धर्म में सब कुछ केवल पत्र और सिद्धांत मात्र है, इस वर्ष में मुझे एहसास हुआ है कि ऐसे कई स्थान थे जहाँ मेरी अवधारणाएँ और कल्पनाएँ सच्चाई की वास्तविकता के साथ असंगत थीं, इस साल मैंने देखा है कि मैं भीतर से कितना घमंडी और आत्मतुष्ट रहा हूँ, मैंने खुद को बहुत ऊँचाई पर रखा है, मैंने अभी भी खुद को विनम्र नहीं बनाया है, हालांकि मैं खुद को विनम्र, प्यार करने वाला और सहिष्णु घोषित करता हूँ, मैं वास्तव में अपने दिल में दूसरों की तुलना में खुद को बहुत ऊँचा मानता हूँ, मैं दूसरों का बिल्कुल सम्मान नहीं करता हूँ।" मनुष्य जितने अधिक समय तक प्रभु में विश्वास करता है, उतना ही अधिक वह दूसरों का मूल्यांकन करता है, और उसकी खुद के बारे में राय उतनी ही ऊँची होती है। यही कारण है कि जब तुम प्रभु में विश्वास करने वाले किसी व्यक्ति की अव्यावहारिकता और पाखंड का पर्दाफ़ाश करते हो, तो वह तुरंत तुमसे लड़ने लगता है, तुम्हारी आलोचना करता है, और तुम्हारा दुश्मन बन जाता है। बाघ को पीछे से नहीं कोंचना चाहिए, सम्राट के चेहरे पर गंदगी कभी नहीं फेंकनी चाहिए! धार्मिक पादरी और एल्डर्स धार्मिक दुनिया के राजा हैं, और वे बाइबल के माध्यम से एक दूसरे के खिलाफ़ अपनी ताक़त आज़माते हैं, और एक स्पष्ट विजेता का फैसला होने तक उनके झगड़े लगातार चलते रहते हैं। वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि तुम शांति के होने से पहले, समर्पण करो और उन्हें बड़ा समझो। यदि तुम समर्पण नहीं करते हो, तो वे तुम्हारे खिलाफ़ अपनी ताक़त का प्रयोग करते हैं। धर्म में यही सब होता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की बात अलग है, जिनके पास सच्चाई की वास्तविकता नहीं वे शर्मिंदा होते हैं, और वे किसी और के कहे बिना ही शर्मिंदा महसूस करते हैं। तुम्हारे बोलने के तरीक़े, तुम्हारे स्वर, तुम्हारी भाषा को सुनकर वे अपने सिर हिलाएंगे और कहेंगे, "यहां सच्चाई की कोई वास्तविकता नहीं है।" बिना कुछ कहे ही, वे तुम्हें बता देंगे कि तुम्हारे अंदर सच्चाई की कोई वास्तविकता है या नहीं, और तुम्हारा आध्यात्मिक क़द कैसा है। इसलिए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में तुम देखते हो कि जब दूसरे किसी को बेनक़ाब करते हैं, या उसे दोष देते हैं, या उससे निपटते भी हैं, तो वह विरोध नहीं करता! शायद शुरू में ऐसा नहीं होता, लेकिन कुछ सालों के बाद वह विरोध नहीं करता है। तुम्हारा क्या विचार है कि ऐसा क्यों होता है? "यदि तुम जो कहते हैं वह सच है, तो मैं हर बात में तुम्हारा कहना मान लूँगा, जो भी सत्य से सुसंगत बातें कहता है, मैं उसका पालन करूँगा, चाहे मेरा अगुआ कोई भी हो, अगर वह जो कहता है वह सत्य और तथ्य के अनुरूप है, तो मैं मान लूँगा", और यही कारण है कि परमेश्वर के घर में सच्चाई शासन करती है। और इसका क्या अर्थ है कि सच्चाई शासन करती है? क्या इसका मतलब यह नहीं है कि परमेश्वर शासन करता है? क्या यह मसीह का शासन नहीं है? जहाँ भी मसीह शासन करता है, परमेश्वर का शासन होता है। क्या यह मसीह के राज्य के प्रकटन को इंगित नहीं करता है? यह कहना बिल्कुल सही है कि मसीह का राज्य पृथ्वी पर प्रकट हुआ है!

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तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को आज किस नज़र से देखते हो? तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के बारे में क्या समझते हो? बहुत से लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को नहीं समझ पाते हैं, और कुछ तो अभी भी सीसीपी और धार्मिक दुनिया की अफवाहों पर विश्वास कर लेते हैं। "अगर कोई कहने पर भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता है, तो उसके कान काट दिए जाएँगे, उसकी आँखें निकाल ली जाएँगी,और उसकी नाक काट दी जाएगी।" क्या तुम उस पर विश्वास करते हो, या नहीं? क्या तुमने कभी किसी ऐसे को देखा है जिसकी नाक काट दी गई हो या आँखें बाहर निकाल दी गई हों? क्या ऐसे लोग मौजूद हैं? चीनी मुख्य भूमि पर ऐसा कोई नहीं, ताइवान में कोई नहीं, न ही ऐसा कोई कोरिया में है। उन सभी जगहों पर जहाँ सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया सुसमाचार फैलाने का काम करती है, क्या एक भी उदाहरण है? नहीं। तो कम्युनिस्ट पार्टी अंधाधुंध इतनी अफ़वाहें क्यों बनाती है? कम्युनिस्ट लोग क्या हैं? वे हत्यारे राक्षस जो पलक झपके बिना मार डालते हैं! वे किसी भी अफ़वाह को तैयार करेंगे, ऐसी कोई अफ़वाह नहीं जो वे नहीं बनाएँगे, और ऐसा कोई झूठ नहीं जिसे वे नहीं बोलेंगे। राक्षस कौन होते हैं? जो झूठ बोलते हैं, वे राक्षस हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया सुसमाचार फैलाती है और परमेश्वर की गवाही देती है, और ये लोग कोई धन नहीं कमाते हैं, वे स्वयं को पूरी तरह से समर्पित करते हैं और परमेश्वर के लिए खर्च करते हैं, वे परमेश्वर के लिए खर्च करके प्रसन्न हैं, और अपने कर्तव्यों को पूरा करने के लिए वे सब कुछ छोड़ देते हैं। कुछ कहते हैं, "मैंने इसे देखा है, इसलिए मुझे विश्वास है!" जब मैं यह सुनता हूँ, तो मेरी प्रतिक्रिया होती है, "अच्छी बात है, चूँकि तुम अभी भी विश्वास कर पाते हो, तुम्हें अभी भी कुछ समझ है।" लेकिन कुछ लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों पर विश्वास नहीं करते हैं, और न ही वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की गवाही पर विश्वास करते हैं। वे किस पर विश्वास करते हैं? वे सीसीपी पर विश्वास करते हैं। वे कहते हैं, "सीसीपी सत्ताधारी पार्टी है, कोई सत्ताधारी पार्टी बकवास कैसे फैला सकती है?" लेकिन सच्चाई यह है कि सत्ताधारी पार्टियां सबसे ज़्यादा बकवास फैलाती हैं, है ना? क्या आज दुनिया में एक भी सत्ताधारी पार्टी ऐसी है जो बकवास नहीं फैलाती हो? कोई नहीं है, यह सच है। सत्ता में रहने वाली पार्टियाँ आम लोगों की तुलना में अधिक बकवास फैलाया करती हैं। यह मेरी व्यक्तिगत राय है, लेकिन क्या यह एक तथ्य भी नहीं है? तो अगर कोई सीसीपी के द्वारा फैलाई गई अफ़वाहों और झूठी बातों पर विश्वास करता है, तो क्या गलत है? यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचन पर विश्वास करने के बजाए, शैतान की बातों को मानता है, तो समस्या यह है कि उसके अंदर विश्वास की बहुत कमी है। उसका विश्वास दूषित है। और अगर वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में विश्वास नहीं करता है, तो उसकी समस्या और भी गंभीर है! वह देखता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के लोग अपने परिवारों और पेशों को छोड़ देते हैं, परमेश्वर के लिए पीड़ित होने, परमेश्वर की सेवा करने और परमेश्वर की गवाही देने के लिए सब कुछ त्याग देते हैं, पूरे समय वे एक भी पैसा नहीं कमाते हैं, और फिर भी वह विश्वास नहीं करता है।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया किस तरह की कलीसिया है? सबसे पहले, यह एक आरोहित कलीसिया है। इसके सदस्यों ने सबसे पहले परमेश्वर के कार्य को हासिल किया, उन्होंने मसीह के न्याय-सिंहासन के सामने न्याय और ताड़ना का अनुभव किया, और परमेश्वर की थोड़ी-बहुत समझ हासिल करने के बाद, उनमें सच्ची निष्ठा पैदी होती है। परमेश्वर का भय मानने वाला दिल विकसित करने के लिए, उनमें से कुछ कई परीक्षणों से गुज़रे हैं, लेकिन निश्चित रूप से, परमेश्वर द्वारा विजेताओं का जो एक समूह बनाया गया है, उन लोगों की गवाही पहले से ही प्रकट हुई है। कुछ लोगों के पास इस तथ्य का वास्तविक अनुभव और साक्ष्य है, जो कि परमेश्वर के लिए एक ज़बरदस्त गवाही है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया एक आरोहित कलीसिया है, जिसका अर्थ है कि जब बड़ी आपदा आएगी, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया मसीह के राज्य का प्रकटन होगी, मसीह का राज्य पृथ्वी पर प्रकट हो चुका होगा। यदि तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में शामिल हो जाते हो, तो तुम राज्य के युग में प्रवेश कर चुके हो। कुछ लोग पूछेंगे, "हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार कर लिया है और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में हम शामिल हो गए हैं, तो क्या हम मसीह के राज्य के नागरिक हैं?" रुको, तुमने आवेदन किया है, लेकिन तुम्हें अभी भी परीक्षणों का सामना करना है। यदि तुम दृढ़ रहते हो और सच्ची गवाही देते हो, तो तुम एक नागरिक होगे, लेकिन हम अभी भी परीक्षण की अवधि में हैं। हम सभी मसीह के राज्य के "परीक्षण नागरिक" हैं। "परीक्षण नागरिक" परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं, और बड़ी आपदा के बाद, चुने हुए लोगों में से जो बचते हैं, वे अपना नाम "राज्य के नागरिकों" में बदल देंगे। राज्य के नागरिक वो हैं जो बड़ी आपदा से निकल आते हैं और बचे रहते हैं। अगर कोई कहता है, "मैं स्वीकार करता हूँ कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन परमेश्वर की आवाज़ हैं, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करता हूँ, लेकिन मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को नहीं समझ पाता हूँ। मैं उस कलीसिया में शामिल नहीं हो सकता।" क्या यह स्वीकार्य होगा? हाँ। परमेश्वर तुम्हें मजबूर नहीं करेगा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता है, कोई भी प्रवेश कर सकता है, लेकिन जो भी प्रवेश करता है वह कलीसिया की जाँच और अनुमोदन से गुज़रता है, और अन्य शर्तें भी हैं! सबसे पहले, तुम एक बुराई करने वाले व्यक्ति नहीं होगे, दुनिया में तुम्हारी एक नेकनामी और अच्छी मानवता होगी, और तुम्हारे पास योग्य पाए जाने के लिए एक अच्छे और ईमानदार व्यक्ति का स्वरूप होना चाहिए। दूसरा, तुम्हें एक दुष्ट आत्मा नहीं होना चाहिए। दुष्ट आत्माएँ अस्वीकार्य हैं। हम उन्हें नहीं चाहते। हम एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं चाहते हैं जो अजीब भाषाएँ बोलता हो, ऐसी आत्माएँ दुष्ट होती हैं। हम एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं चाहते हैं जो खुली आँखों से आत्माओं और भूतों को देखता हो, ऐसी आत्माएँ दुष्ट होती हैं। हम एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं चाहते हैं जो दुष्ट आत्माओं के वश में हो, उन्हें योग्य नहीं माना जाएगा। तीसरा, हम कोई भी समलिंगकामी नहीं चाहते हैं। चौथा, कोई भी सिलसिलेवार व्याभिचारी न हो, दुनिया में उनका नाम अच्छा नहीं होता है, हम उन्हें नहीं चाहते हैं। पाँचवा, हत्यारे, बलात्कारी और चोर, हम उन्हें नहीं चाहते हैं। ये हमारी शर्तें हैं। यही कारण है कि हम कहते हैं कि जाँच होती है, और केवल जो लोग शर्तों को पूरा करते हैं, उन्हें ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में प्रवेश के योग्य माना जाता है। अगर यह जानकारी न रही हो कि कोई समलैंगिक था या अतीत में बुरे कर्म करता था, या दुनिया में उसका नाम अच्छा नहीं था, और अगर इन तथ्यों के बारे में बाद में पता चलता है, तो उसे कलीसिया से निकाल दिया जाएगा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया राज्य के प्रशासनिक नियमों को बनाए रखती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जो चाहे प्रवेश न कर ले, लेकिन यदि कोई भी विश्वास छोड़ना चाहता है या अपना विश्वास बंद करना चाहता है, तो हम इसे प्राकृतिक ढंग से होने देते हैं। हम लोगों को स्वतंत्रता देते हैं। हम किसी को छोड़ने से नहीं रोकते हैं। किसी भी सदस्य को यह अनुमति नहीं दी जाती कि वह किसी व्यक्ति को कलीसिया से जाने से रोके। और किसी को भी किसी सदस्य के छोड़ जाने के लिए शर्तें लगाने की अनुमति नहीं है। कोई भी किसी भी समय छोड़ सकता है, क्या तुम इसे समझते हो? कुछ लोग पूछते हैं, "आज मैं विश्वास करता हूँ, लेकिन क्या मैं कल छोड़ कर जा सकता हूँ?" तुम अभी ही वापस जा सकते हो, यह इतना आसान है! दरवाज़ा खुला है, जब भी तुम चाहो छोड़ सकते हो, बिना किसी शर्त के, और कोई भी तुम्हें रोकने की कोशिश नहीं करेगा, कोई भी तुम्हारे ऊपर कोई प्रतिबंध नहीं लगाएगा, कोई भी तुम्हारे घर नहीं आएगा, और कोई तुम्हें फोन नहीं करेगा और न ही तुम्हें परेशान करेगा। कुछ लोग, प्यार से, कह सकते हैं, "मैं उस छोड़ने वाले को कुछ समझाने की कोशिश करूँगा," लेकिन अगर मुझे इसके बारे में पता चल जाए, तो मैं इसे रोक दूँगा। ऐसा मत करो, लोग जब चाहें, छोड़ सकते हैं, वे स्वतंत्र हैं, कोई भी जा सकता है। इसके अलावा, नए विश्वासियों को लापरवाही से बनाई गई चढ़ावे की परियोजनाओं को कार्यान्वित करने से रोका जाता है, चाहे वे उत्साह से की जाएँ, क्यों? क्योंकि तुम किसी भी सत्य को नहीं समझते हो, और तुम्हारे चढ़ावे जोश में दिए जाते हैं, नेक विश्वास में नहीं। एक वर्ष के लिए विश्वास करने के बाद, जब तुम सत्य को कुछ समझने लगते हो, और कई बार प्रार्थना करते हो, और तब तुम इस तरह के चढ़ावे को परमेश्वर के प्रति सहर्ष आज्ञाकारिता के साथ अर्पण करते हो, तो हम इसकी अनुमति देते हैं। नए विश्वासियों को चढ़ावे देने की इजाज़त नहीं है क्योंकि वे सत्य को नहीं समझते हैं। यही कारण है कि, परमेश्वर के घर में, हम उपदेशों को इस बात की अनुमति नहीं देते हैं कि वे चढ़ावों को प्रोत्साहित करें। हमारी बैठकों में, कोई भी चढ़ावों के बारे में उपदेश नहीं दे सकता, और यदि कोई करता है, तो उसे अपने नेतृत्व के पद से हटा दिया जाता है, यह परमेश्वर के घर का प्रशासनिक आदेश है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया द्वारा प्रकाशित किताबें, सीडी और फिल्मों को मुफ़्त में दिया जाता है, हम उनके लिए एक पैसा भी नहीं माँगते हैं, और ज़रूरत पड़ने पर हमारे भाई-बहन एक दूसरे की मदद करते हैं। कलीसिया ने कई सालों से इस तरह से अपना संचालन किया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया ने कभी भी चढ़ावे नहीं मांगे हैं, परन्तु परमेश्वर की कृपा पर्याप्त से भी अधिक है, और हमें आशीर्वाद से धन मिला है! यह बड़े लाल अजगर को क्रोधित करता है, इतना क्रोधित कि उसकी आँखें क्रोध से भड़कती हैं और वह हमारे धन की तलाश में एक सेना भेजता है। वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सदस्यों के घरों में आते हैं और यहाँ तक कि हमारे धन को खोजने के लिए वे फर्श भी खोद डालते हैं। क्या ये डाकू और लुटेरे नहीं हैं? यह शर्मनाक है। वे इतने गरीब हैं कि वे मुश्किल से रोटी-कपड़ा पाते हैं, इसलिए वे हमें लूटने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में आते हैं। सीसीपी सरकार, बड़े लाल अजगर, की ये करतूत है! यह एक घटिया साजिश है!

मुझे लगता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के उन पहलुओं को पेश करना आज के लिए पर्याप्त है। यदि तुममें से कोई भी छोड़ना चाहता है, और हमारे सदस्यों में से कोई तुम्हें रोकने की हिम्मत करता है, तो उसे निष्कासित कर दिया जाएगा। अपने उत्साह को रोको, क्योंकि जो भी छोड़ना चाहता है वह जा सकता है। हम तुम्हें रोकने की कोशिश नहीं करेंगे, अगर तुम्हारे पास पैसे नहीं हैं, तो हम घर जाने के लिए तुम्हारा टिकट भी खरीदेंगे और तुम्हें विदा करेंगे। लेकिन किसी भी डंडे की मार सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सदस्यों से विश्वास को नहीं छीन सकती है, उनके विश्वास को डंडे की मार से नहीं भगाया जा सकता है। बड़े लाल अजगर की अंधाधुंध गिरफ्तारी और दमन के बावजूद, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की सदस्यता घटने की बजाय अधिक तेज़ी से बढ़ती जा रही है। मैं क्यों ऐसा कहता हूँ कि यह घटने की बजाय अधिक तेज़ी से बढ़ती जा रही है? क्योंकि कुछ लोग मार से डरते हैं, कुछ ऐसे डरपोक हैं जो कलीसिया से डरकर भाग जाते हैं, और यहाँ भी कुछ यहूदा जैसे लोग हैं, लेकिन ऐसे लोग भी हैं जो सुसमाचार सुनते हैं और कलीसिया में प्रवेश करते हैं। छोड़ने से ज़्यादा लोग कलीसिया में प्रवेश करते हैं, इसलिए हम कहते हैं कि सदस्यता घटने की बजाय अधिक तेज़ी से बढ़ती जा रही है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया लगातार बढ़ती और विकसित क्यों होती जा रही है? यह परमेश्वर का आशीर्वाद है। बड़े लाल अजगर का अंधाधुंध दमन और उसका उत्पीड़न वास्तव में सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को शुद्ध करते हैं। वे इसे शुद्ध कैसे करते हैं? यदि डरपोक और भीरु छोड़ जाते हैं, लेकिन जो लोग यह विश्वास करते हैं कि सचमुच परमेश्वर है और जो लोग सच्चाई से प्यार करते हैं, वे नहीं भगाए जा सकते चाहे उन्हें कितना भी सताया जाए, तो क्या कलीसिया परिणामस्वरूप शुद्ध नहीं होती है? बहुत से लोग कहते हैं, "जब बड़ा लाल अजगर हार जाएगा तो हम विश्वास करेंगे।" वह कोई अच्छी बात नहीं है। यदि तुम बड़े लाल अजगर के गिरने के बाद विश्वास करते हो, तो भोज खत्म हो चुका होगा, और अनुग्रह का द्वार बंद हो जाएगा। तुम्हें बहुत देर हो चुकी होगी, क्योंकि यही वो पृष्ठभूमि है जिसमें परमेश्वर विजेताओं को पूर्ण करता है। आज की बैठक में मैं इतना ही कहूँगा। यदि तुम्हारे पास अभी भी कोई महत्वपूर्ण प्रश्न हों, तो उन्हें उठाने के लिए स्वतंत्र महसूस करो।

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प्रश्न & उत्तर

प्रश्न 1 :कुछ लोगों के लिए, जैसे कि अमेरिका में हमारे लिए, कार्यक्षेत्र में और घर में, दोनों जगह हमारा जीवन बहुत व्यस्त होता है। कभी-कभी मैं परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ता, और इससे मुझे चिंता होती है, क्योंकि मैं दोषी महसूस करता हूँ। अगर हम परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो क्या हमें सभी चीज़ों में परमेश्वर के वचन को सबसे पहले रखना होगा? अगर हम परमेश्वर के वचन को सबसे पहले नहीं रखते हैं, तो क्या हम परमेश्वर का अपमान करते हैं? मुझे लगता है कि परमेश्वर में विश्वास करना एक ख़ुशी की प्रक्रिया होनी चाहिए, लेकिन मैंने हाल ही में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार किया है, और मैंने अभी अपना संतुलन नहीं बनाया है। जो भी हो, यह बहुत सुखद नहीं है। हमें अपने काम, घर और कलीसिया को आपस में कैसे संतुलित करना चाहिए?

उत्तर: एक लोकतांत्रिक देश में जीवन व्यस्त होता है! यदि तुम पैसे नहीं कमाते हो, तो ऐसे कर होते हैं जिनका तुम भुगतान नहीं कर सकते, और तुम्हें अपना किराया चुकाना होगा, अपनी कार का रख-रखाव करना होगा, और बिजली-पानी के अपने बिलों का भुगतान करना होगा, जिन सब के लिए धन चाहिए, इसलिए निश्चित रूप से तुम्हें काम करना ही होगा, है ना? यहाँ एक समस्या पैदा होती है। ऐसा लगता है जैसे परमेश्वर में विश्वास करना एक अतिरिक्त बोझ हो, ख़ासकर अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए। लेकिन अगर तुम परमेश्वर पर विश्वास न करो, तो क्या तुम बोझ से मुक्त होगे? तुम्हारा बोझ, उससे अधिक नहीं तो उतना तो होगा ही। कुछ लोग पूछते हैं, क्या कोई बोझ इससे भी ज़्यादा थकाऊ हो सकता है? मैं गारंटी देता हूँ कि ऐसा है, क्योंकि तुम पीड़ित हो जाओगे। तुम्हारे दिन रोजी-रोटी के लिए संघर्ष के, जीवित रहने की खातिर एक लड़ाई के दिन होंगे और कई कठिनाइयाँ और परेशानियाँ होंगी, चूँकि दुनिया अन्यायपूर्ण और लोग दुष्ट हैं, कई बाधाएँ और मुश्किलें होंगी, और कुछ भी आसान न होगा। लेकिन परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास और सच्चाई की तुम्हारी बढ़ती समझ के माध्यम से, तुम ज्ञान प्राप्त करोगे और रास्तों को देख पाओगे, तुम अब शैतानों से खुद को दूषित नहीं करोगे, और तुम उनके प्रति अधिक सयाने होगे, जो तुम्हें अपने अधिकांश दुखों से बचा लेगा, क्या ये व्यावहारिक वचन नहीं हैं? बाहरी दुनिया में ज़्यादातर पीड़ा का क्या कारण होता है? सबसे पहले, जिस परिवेश में तुम रहते हो उसे तुम शैतानों के साथ साझा करते हो। दूसरा, तुम्हारे पास परमेश्वर की सुरक्षा और आशीष की कमी रहती है, इसलिए शैतान तुम्हें हमेशा भ्रष्ट करते हैं। तीसरा, तुम्हारे पास सच्चाई और ज्ञान की कमी होती है। यदि तुम्हारे पास सच्चाई है, तो तुम्हारे पास ज्ञान होगा। जब तुम्हारे पास सच्चाई होती है, तो तुम जानते हो कि शैतानों से कैसे निपटा जाए। यही कारण है कि जब तुम सच्चाई को समझते हो, तो तुम ज्ञान, परमेश्वर की सुरक्षा और आशीषें भी प्राप्त करते हो, जिससे तुम बहुत-सी पीड़ा से बच जाते हो! यह एक तथ्य है। तुम बहुत-सी पीड़ा से इसलिए बच जाते हो क्योंकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, तुम परमेश्वर के वचन को खाते-पीते हो, और तुम सच्चाई की खोज करते हो, जो तुम्हें आध्यात्मिक आराम देता है, और तुम परमेश्वर द्वारा दी गई शांति और खुशी का आनंद लेते हो। विचार करो कि एक दिन बड़ी आपदा आ पड़ेगी, और तुम शांत रहोगे। अविश्वासी लोग आतंक में अपना आपा खो देंगे और आने वाले दिनों के लिए डरेंगे, वे यह महसूस करेंगे कि यही दुनिया का अंत है। लेकिन जब वही आपदा हमारे ऊपर आ पड़े, तो परमेश्वर में विश्वास करने वाले हम लोग अविश्वासियों की तुलना में अलग महसूस करेंगे। परमेश्वर हमारे साथ है, और मसीह के राज्य में हम भागीदार हैं। यह ज्ञान हमें कितना दिलासा देता है! क्या यह दिलासा आत्मा की ख़ुशी नहीं है? यह सबसे सच्ची ख़ुशी है। हम इसे प्राप्त करते हैं क्योंकि परमेश्वर में विश्वास करते समय, हम सत्य को समझ चुके हैं, परमेश्वर को जान चुके हैं, और परमेश्वर के वादे प्राप्त करने के योग्य बन गए हैं। यह आध्यात्मिक ख़ुशी, यह आराम और तड़प मानवता की सबसे वास्तविक ख़ुशी है, और इसे परमेश्वर में विश्वास किए बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता है! इसलिए, जब तुम कहते हो, "परमेश्वर में विश्वास करना बहुत व्यस्त हो जाना है, मुझे पैसे कमाने हैं और अपने परिवार की देखभाल करनी है, और इस पर भी मुझे परमेश्वर में विश्वास करना है, परमेश्वर के वचन को पढ़ना है, कलीसियाई जीवन जीना है और बैठकों में जाना है। इन सब बातों का कितना बोझ है!" वह बात गलत तो नहीं है, लेकिन तुमने कितने आशीर्वाद प्राप्त किए हैं, कितनी आपदाओं और पीड़ा से तुम बच पाए हो?! तुम उसे क्यों नहीं देखते? क्या यह उस दृष्टिकोण से कम तनावपूर्ण नहीं है? जब मैं इसे इस तरह से कहता हूँ, तो क्या तुम समझते हो? कौन-सा रास्ता आशीर्वाद का मार्ग है? परमेश्वर में विश्वास। कुछ भाई-बहन परमेश्वर में विश्वास करने के बाद राक्षसी दुनिया का सार देखते हैं। वे इस दुनिया के शैतानों से बातचीत करने से बचते हैं, जीवित रहने के लिए वे शैतानों पर भरोसा नहीं करते, उन्हें अब शैतानों को प्रसन्न करने या उनकी ख़ुशामद करने की आवश्यकता नहीं होती है, और नतीजतन वे अधिक ख़ुशहाल जीवन जीते हैं। जैसे ही तुम इस राह पर आगे बढ़ते हो, तुम्हारा मार्ग अधिक उज्ज्वल हो जाता है, और तुम्हारे दिल में और अधिक ख़ुशी होती है, और अंततः तुम सच्चे आशीर्वाद और आनंद को प्राप्त कर लेते हो। सच्ची ख़ुशी क्या है? यही सच्ची ख़ुशी है! केवल उन लोगों को जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और सच्चाई की खोज करते हैं, ख़ुशी मिलती है, केवल उन्हीं के पास वो शांति, वो ख़ुशी और तड़प होती है, वो आनंद और आराम होता है, जो लोग सत्य प्राप्त करते हैं, वे ही इन सुखों का अनुभव कर सकते हैं। क्या तुम समझते हो? तुम परमेश्वर में विश्वास करने वालों को व्यस्त रहते देख सकते हो, लेकिन यह भी देखो कि उनके आशीर्वाद और सौभाग्य कितने महान हैं! अविश्वासी लोग आलसी दिख सकते हैं लेकिन वे पीड़ित भी होते हैं और चिंता करते हैं, क्योंकि उनके पास कोई अच्छा अंत और कोई अच्छी मंज़िल नहीं होती है, और वे नहीं जानते कि वे कब मरने जा रहे हैं। आज, यदि तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार करते हो, तो तुम परमेश्वर के घर में अपना स्थान आरक्षित कर रहे हो, तुम अपना नाम जीवन की पुस्तक में लिख रहे हो। "जीवन की पुस्तक" के क्या मायने हैं? इसका मतलब है कि जो लोग दावत के लिए स्वर्गारोहित होते हैं वे सत्य और जीवन प्राप्त करते हैं। धर्म में रहने वालों को जीवन की पुस्तक में दर्ज नहीं किया गया है, क्योंकि उनके पास कोई जीवन नहीं होता। अंत के दिनों में मसीह जो लाता है वह अनन्त जीवन का मार्ग है, और यदि तुम अंत के दिनों में मसीह को स्वीकार करते हो और उसकी पूर्णता प्राप्त करते हो, तभी जीवन की पुस्तक में तुम्हारा नाम होगा। तभी तुम्हारा नाम इसके अन्दर दर्ज किया जाएगा। जीवन की पुस्तक में तुम्हारे नाम लिखे गए हैं, यह एक आश्चर्यजनक आध्यात्मिक आनंद है, यह असीम आशीर्वाद है! क्या यीशु में विश्वास करने वालों ने उसे अर्जित किया है? नहीं। जब आकाश गरजेगा और बारिश होगी, तो वे कहेंगे, "अजीब बात है, प्रभु अभी तक नहीं आया है, वह कब आएगा? क्या वह आ रहा है? क्या मुझे हटा दिया गया है?" ऐसा व्यक्ति जितना अधिक सोचता है, उतना ही अधिक वह डरता है, क्योंकि उसके दिल में प्रभु यीशु नहीं है, वह केवल यही जानता है कि वह स्वर्गारोहण करना चाहता है। वह दिन में ख्व़ाब देख रहा है! कुछ लोग कहते हैं, "मैं इस बात पर यकीन नहीं करूँगा कि यीशु पर विश्वास करने लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास नहीं करने का अर्थ यह होगा कि मैं कि प्रभु को बादलों से नीचे आते हुए नहीं देखूँगा। तुम देख सकते हो। प्रकाशितवाक्य में इसके बारे कुछ कहा गया है, "देखो, वह बादलों के साथ आने वाला है; और हर एक आंख उसे देखेगी, वरन जिन्होंने उसे बेधा था, वे भी उसे देखेंगे, और पृथ्वी के सारे कुल उसके कारण छाती पीटेंगे" (प्रकाशितवाक्य 1:7)। जब वह खुले आम बादलों के साथ आएगा, तो पृथ्वी के सारे कुल छाती पीटेंगे। वे क्यों छाती पीटेंगे? क्योंकि जब परमेश्वर मानवजाति को पूर्ण करने के लिए मनुष्य के पुत्र के रूप में अंत के दिनों में आया, तो उन लोगों ने उसे नकार दिया, उस पर दोष लगाया, और उसका विरोध किया, इसलिए जब वह खुले आम बादलों के साथ आएगा, तो वे केवल छाती पीटेंगे और अपने दांतों को पीसेंगे। यह कौन सी भविष्यवाणी पूरी करता है? जब पुनरुत्थान के 40 दिन बाद प्रभु यीशु प्रकट हुआ, तो थोमा को देखकर प्रभु ने क्या कहा? "तूने तो मुझे देखकर विश्वास किया है, धन्य वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्वास किया" (यूहन्ना 20:29)। जब तुम प्रभु को बादलों पर खुले आम आते देखते हो, तो विश्वास करने में बहुत देर हो चुकी होती है, अब प्राप्त करने के लिए कोई आशीर्वाद नहीं बचा है, तुम्हें हटा दिया गया है, और तुम्हारे लिए अब जो कुछ बचा है, वह छाती पीटना ही है। कुछ लोग पूछते हैं, "प्रभु यीशु बादलों पर सरेआम क्यों आएगा?" यह प्रभु यीशु का बादलों पर सरेआम आना नहीं है, यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अपने रूप को बदल कर सिय्योन लौटना है। बड़ी आपदा के आने और गुज़र जाने के बाद, जब सब कुछ लगभग खत्म हो जाएगा, तो परमेश्वर खुले आम बादलों पर आएगा, क्या तुम समझते हो? बड़ी आपदा हम पर लगभग आ चुकी है, परमेश्वर सिय्योन लौटने ही वाला है, और अवतरित देह का कार्य केवल अब होता है, इन दो या तीन दशकों में यह तुम्हारा एकमात्र मौका है। यह प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य की तरह ही है, जिसे उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान से केवल कुछ साल पहले ही पेश किया गया था, और फिर चालीस दिन के प्रकटन के बाद उसने स्वर्गारोहण किया था। अपने पुनरुत्थान के बाद जब प्रभु यीशु ने थोमा को देखा, तो उसने कहा, "तूने तो मुझे देखकर विश्वास किया है, धन्य वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्वास किया" (यूहन्ना 20:29)। यदि तुम इस बात पर विश्वास करने से इंकार करते हो कि देहधारी परमेश्वर आज मनुष्य का पुत्र है, जबकि परमेश्वर गुप्त रहकर कार्य करता है, अगर तुम केवल तभी विश्वास करते हो जब परमेश्वर खुले आम प्रकट होता है, तो क्या वह तुम्हें स्वीकार करेगा? प्रभु ने कहा था कि जो लोग उसके आध्यात्मिक शरीर के प्रकटन को देखे बिना ही विश्वास करते हैं, जो लोग उसका, देहधारण करके रात में एक चोर की तरह आने का, विश्वास कर लेते हैं, वे धन्य हैं।

प्रश्न 2: हम किसी अन्य कलीसिया से आए हैं, और हम अभी भी हर रविवार को सेवाओं में भाग लेते हैं। हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में कैसे स्थानांतरित हो सकते हैं, और हमें अपने कर्तव्यों को कैसे पूरा करना चाहिए?

उत्तर: फिलहाल के लिए, अपने कर्तव्यों को निष्पादित करना छोड़ दो। सबसे पहले, अपने कर्तव्यों को करने की सोचने से पहले, परमेश्वर के वचन को खाओ-पीओ ताकि तुम इस बारे में कुछ अंतर्दृष्टि और समझ हासिल कर सको। सबसे पहले तुम्हें परमेश्वर के वचन को खाना और पीना चाहिए जिससे तुम यह देख सको कि क्या तुम समझ सकते हो, शायद तुम कहो, "इस बारे में मेरी बहुत-सी अवधारणाएँ हैं, मुझे इस बारे में कई संदेह हैं," और अंत में तुम छोड़ने का फैसला कर सकते हो। अगर तुममें अभी भी इसे समझने की तीक्ष्णबुद्धि नहीं है, तो तब तक प्रतीक्षा करो जब तक तुम निश्चित नहीं हो जाते कि तुम इस पर विश्वास करते हो, जब तक कि तुम्हारे अंदर अपने कर्तव्यों को पूरा करने को लेकर हर अवधारणा या संदेह समाप्त न हो जाए, ठीक है ना? जहाँ तक उस कलीसिया का सवाल है जहाँ तुम प्रत्येक रविवार जाते हो, उन्हें अभी यह न बताओ कि तुम यहाँ आते हो, क्योंकि तुमने अभी यहाँ अपनी जड़ें नहीं जमाई हैं। यदि तुम अपनी कलीसिया को यह बता देते हो, तो वे तुम पर आरोप लगाने के लिए बाइबल का उपयोग करेंगे, और फिर सीसीपी की अफ़वाहों और झूठ को दोहराएँगे, और फिर जब तुम उन्हें सुनोगे, तो तुम सोचोगे, "मैंने गलत कलीसिया चुनी है", और तुम वापस लौट जाओगे। तुम उन्हें रोक नहीं पाओगे, तुम्हारे पास वैसा आध्यात्मिक क़द नहीं है। एक बार जब तुम सब कुछ समझ जाओगे, जब तुम्हारे अंदर कोई अवधारणा या संदेह नहीं रहेगा, तो तुम यहाँ की अपनी सदस्यता के बारे में अपनी मूल कलीसिया को जानकारी दे सकते हो। यदि तुम यह बात अभी बता दोगे, तो तुम उन्हें रोक नहीं पाओगे। मैं तुमसे वादा करता हूँ, अगर तुम यह बात अभी बता देते हो, तो तुम उन्हें रोक नहीं पाओगे, और फिर क्या मैं तुम्हारी मदद कर पाऊँगा? क्या तुम हमारे साथ सच्चाई को खोजना जारी रखोगे? नहीं। केवल यही होगा कि तुम अपने घुटनों पर गिर जाओगे और अपना पाप स्वीकार करोगे, और फिर कुछ समय के बाद, तुम हमारे पास वापस नहीं आओगे, तुम असंभव रूप से खो जाओगे, और तुम लौट कर नहीं आ सकोगे। मैंने इस तरह के काफ़ी लोगों को देखा है, जो एक बार मेरी सहभागिता सुनते हैं और कहते हैं, "तुम्हारी आज की बैठक ने मुझे प्रबुद्ध किया है, तुमने जो कहा है उस पर मुझे एक सौ प्रतिशत विश्वास है, मैं जाकर अपनी कलीसिया को बता दूँगा कि मैंने आज क्या सुना है। मैं कहता हूँ, "यदि तुम वहाँ जाते हो तो तुम वापस नहीं आओगे, तुम खुद को उन्हें सौंप दोगे।" वे मेरा विश्वास नहीं करते, और फिर वे खुद को अपनी कलीसिया को सौंप देते हैं। जड़ों को जमाए बिना, तुम उन्हें नकार नहीं सकते, इसलिए तुम्हें यहाँ अपने जुड़ने की बात धर्म में कभी नहीं बतानी चाहिए।

कुछ कहते हैं, "मेरे पास कुछ छोटे-मोटे संदेह हैं, क्या मुझे अपने धार्मिक पादरी से पूछना चाहिए?" यह एक ऐसा सवाल है जिसे तुम्हें सही व्यक्ति से पूछना होगा। यदि तुम अपने धार्मिक पादरी से पूछते हो, तो तुम एक मसीह-विरोधी से पूछ रहे हो, और उसके हाथ तुम्हें बर्बाद करने का मौका लग जाएगा। अपने पादरी से मत पूछो। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया किसी को भी मजबूर नहीं करेगी, हम तुम्हें यहाँ रोककर नहीं रखेंगे। अगर तुम सुन सकते हो, तो मैं तुमसे सहभागिता करूँगा, लेकिन अगर तुम चले जाना चाहते हो, तो मैं तुम्हें एक मुस्कान के साथ विदा करूँगा। कोई भी तुम्हें मारेगा-पीटेगा नहीं, कोई भी तुम्हारे सिर का एक बाल भी बांका नहीं करेगा, तुम्हारी आँखें निकाल देने की बात तो दूर रही। हम तुम्हारे सिर का एक बाल भी नहीं रखेंगे, और हम तुम्हारे धन की भेंट नहीं चाहते हैं। हम तुम्हें धन देने की अनुमति नहीं देते हैं। तुम इस कलीसिया के बारे में क्या सोचते हो? तुम परमेश्वर के वचन को मुफ़्त में खा-पी सकते हो और यह तय कर सकते हो कि क्या यह सत्य और जीवन है, और क्या यह सिंहासन से बहने वाली जीवन की नदी का पानी है। प्रभु यीशु के वचन अनन्त जीवन का मार्ग, और सिंहासन से बहने वाली जीवन की नदी का पानी, क्यों नहीं हैं? प्रकाशितवाक्य की भविष्यवाणी कहाँ से साकार होनी शुरू होती है? अंत के दिनों में परमेश्वर के देहधारण से। प्रभु यीशु छुटकारे के कार्य को करने आया था, लेकिन उसने वो पूरा सत्य व्यक्त नहीं किया जो मनुष्य को शुद्ध करता है, बचाता है और परमेश्वर की समझ देता है, इसलिए उसके वचनों को सिंहासन से बहने वाली जीवन की नदी का पानी नहीं कहा जा सकता है। उसे केवल जीवित पानी का स्रोत कहा जा सकता है, क्योंकि वह स्वयं परमेश्वर था। अंत के दिनों में मसीह द्वारा व्यक्त किए गए वचन सिंहासन से बहने वाली जीवन की नदी का पानी हैं, जो मानवजाति को शुद्ध करने, बचाने और पूर्ण करने के कार्य के दौरान अंत के दिनों में परमेश्वर के द्वारा व्यक्त पूर्ण सत्य है; मानवजाति के लिए सृष्टि के बाद से इतने सारे वचनों को सुनने का यह पहला मौका है। प्रकाशितवाक्य में कहा गया है, "जिस के कान हों, वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है," और यह अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सभी वचन ही हैं, जिन्हें यह इंगित करता है।

इसे ज्ञात कराने से पहले तुम इसे समझने की प्रतीक्षा करो। इसे अभी ज्ञात मत कराओ। तुम्हारा क़द अभी भी बहुत छोटा है, तुम उन्हें रोकने में सक्षम नहीं होगे। और शेखी बघारने की कोशिश मत करो, मैंने बहुत से लोगों को घमंड करते और फिर कभी वापस नहीं आते देखा है। उनमें से कुछ ने कहा, "मेरी कलीसिया में मेरा वापस चले जाना और यीशु में विश्वास करना भी सही है, है ना?" और उनके साथ क्या होता है? यदि तुम यीशु में विश्वास करने के लिए वापस चले जाते हो, तो तुम नरक के लिए नियत होगे, और वही अंत है। बाइबल में, फरीसियों पर आरोप लगाते हुए प्रभु यीशु ने क्या कहा था? "हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो" (मत्ती 23:15)। वे लोगों को परमेश्वर के सामने लाने के बजाय धर्म में ले आए, और जिस क्षण लोगों ने उनके धर्म में प्रवेश किया, वे नरक के लिए नियत हो गए थे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया में शामिल होने का अर्थ धर्म में शामिल होना नहीं है, इसका मतलब है परमेश्वर की उपस्थिति में स्वर्गारोहित होना, सिंहासन के सामने स्वर्गारोहित होना! धार्मिक दुनिया में कोई सच्ची कलीसिया नहीं है, उनके पास परमेश्वर का सिंहासन नहीं हैं, इसलिए उनके संप्रदायों में शामिल होकर, तुम खुद को नरक की दंडाज्ञा देते हो, और तुम परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त करने की पूरी सम्भावना को खो देते हो। क्या तुम समझते हो?

और, कुछ और भी है! यीशु अनुग्रह के युग का कार्य करने आया, और यदि तुमने कहा होता, "मैं छुटकारे के अनुग्रह को स्वीकार करता हूँ, लेकिन मैं व्यवस्था का पालन भी करता हूँ", तो यीशु ने क्या कहा होता? क्या वह तुम्हें मंजूरी दे देता? यहाँ कौन सी भूल है? परमेश्वर के प्रति विद्रोह! यह व्यक्ति ऐसा है जो परमेश्वर के प्रति आज्ञा-पालन नहीं कर सकता! यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के दिल के अनुरूप होने के लिए आज परमेश्वर के कार्य के प्रति आज्ञाकारी होना ही होगा। अतीत का काम पुराना हो चुका है, यह मृत इतिहास है, और यह परमेश्वर के साथ मेल नहीं खाता है। इसे समाप्त कर दिया गया है। परमेश्वर मनुष्यों के पापों का न्याय करता है, उन्हें कार्य के इस चरण के अनुसार पूर्ण करता और बचाता है, उस चरण के अनुसार नहीं, क्योंकि वह चरण तो हटा दिया गया है, क्या तुम समझते हो? यदि तुम उन वचनों को पढ़ते हो जिन्हें परमेश्वर आज कहता है, तो यीशु का आत्मा तुम्हारे साथ है; यदि तुम अतीत में यीशु ने जो कहा था उसे पढ़ना जारी रखते हो, तो वह तुम्हें अस्वीकार कर देगा और तुमसे नफ़रत करेगा। वह कहेगा कि तुम वर्तमान में परमेश्वर के कार्य के साथ नहीं रह सकते हो, और वह तुम्हें विद्रोही और एक पाखंडी कहेगा। यदि तुम कहते हो, "मैं यहोवा को नाराज़ नहीं करूँगा, मैं प्रभु यीशु को नाराज़ नहीं करूँगा, और मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर को नाराज़ नहीं करूँगा", तो तुम उन सभी को नाराज़ करते हो, तुम कुछ भी हासिल नहीं करोगे और कुछ भी नहीं पाओगे। क्या तुम समझते हो? केवल एक ही परमेश्वर है, और वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रभु यीशु का आत्मा है, और यहोवा का आत्मा है, क्या तुममें यह देखने की तीक्ष्णबुद्धि नहीं है? यदि तुम उनके बीच अपने विश्वास को घुमाते रहते हो, और अंततः तीन परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो तुमने भूल की है, तुमने गलत रास्ता ले लिया है, तुम परमेश्वर का विरोध और अनादर कर रहे हो, और तुम परमेश्वर को नहीं समझते हो। परमेश्वर केवल एक है। राज्य के युग में परमेश्वर का नाम सर्वशक्तिमान परमेश्वर है, व्यवस्था के युग में यह यहोवा था, और अनुग्रह के युग में यह प्रभु यीशु था, लेकिन वे सभी एक ही परमेश्वर और एक ही आत्मा हैं। यदि तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ो, और तीन या पांच साल के बाद, या सात या आठ साल के बाद, तुम्हें सब कुछ समझ आ जाएगा, और तुम पूरी तरह से प्रभु यीशु और यहोवा के वचनों को भी समझ लोगे, क्योंकि तुम जान लोगे कि यहोवा, यीशु और सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक हैं। आराम से पढ़ो, और जब तुम इसे पूरा कर लोगे तो तुम सब कुछ समझ लोगे। यदि तुमने पर्याप्त नहीं पढ़ा है, तो मेरा कहा गया कुछ भी उपयोगी न होगा। यह तुम्हारे द्वारा किए गए प्रयासों पर निर्भर करता है।

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775 तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास

Iसमझना चाहिये तुम्हें कितना बहुमूल्य है आज कार्य परमेश्वर का।जानते नहीं ये बात ज़्यादातर लोग,सोचते हैं कि पीड़ा है बेकार:अपने विश्वास के लिए...

वचन देह में प्रकट होता है अंत के दिनों के मसीह के कथन (संकलन) अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप अंत के दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश

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