जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप

2 परमेश्वर के वचन के बारे में धर्मोपदेश और सहभागिता "तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए"

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हमने अभी-अभी परमेश्वर के बहुत महत्वपूर्ण वचन के एक अंश को पढ़ा है जिसका नाम है, "तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए"। इस अंश में परमेश्वर के वचन किस स्तर पर इतने महत्वपूर्ण हैं? यदि लोग इस अंश में परमेश्वर के वचनों में प्रवेश नहीं कर सकते हैं, अगर वे परमेश्वर की अपेक्षा को संतुष्ट नहीं कर सकते हैं, तो क्या वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं? सर्वशक्तिमान परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास तुमको स्वर्ग के राज्य में सहभागी होने का कोई आश्वासन नहीं देता है, न ही तुम्हारी इस कथित स्वीकृति का, कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर देहधारी परमेश्वर, मसीह का प्रकटन है, मतलब यह है कि तुम बच गए हो। तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तुम अपना कर्तव्य कर सकते हो, और तुम परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए सब कुछ त्याग सकते हो, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि स्वर्ग में तुम्हारे लिए एक हिस्सा होना ही चाहिए। परमेश्वर के वचनों को सुनो, और जान लो कि उसकी सबसे बुनियादी बात यह है कि तुम्हें मसीह के साथ अनुकूल होना चाहिए। किस परिणाम को हासिल करना है? तुम परमेश्वर के अंतिम दिनों के कार्य का अनुभव करो और मसीह के तख़्त के समक्ष तुम न्याय और ताड़ना को पाओ। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या तुम अंततः मसीह के साथ अनुकूल हो, क्या तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो मसीह के प्रति समर्पण कर सकता है, एक ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर की आज्ञा का अनुसरण और परमेश्वर की आराधना कर सकता है। जब लोग प्रभु यीशु में विश्वास करते थे, परमेश्वर उनके साथ सख्त नहीं था, लेकिन जब वह अंतिम दिनों में न्याय का कार्य करता है, तो वह मनुष्य के साथ गंभीर होता है। वह किस हद तक गंभीर होता है? वह देखता है कि एक व्यक्ति वास्तव में अंतिम दिनों के मसीह के साथ अनुकूल है या नहीं। यदि कोई व्यक्ति सही मायने में अनुकूल हो, तो उसकी अवज्ञा, उसका प्रतिरोध, उसका शैतानी स्वभाव, उसके दृष्टिकोण, ये सब परिशुद्ध हो जाएँगे। वह व्यक्ति पूरी तरह से मसीह का अनुसरण कर सकता है, और मसीह के वचन के प्रभुत्व के प्रति आज्ञा-पालन कर सकता है, और केवल एक ऐसा व्यक्ति ही है जो बच सकता है और राज्य की प्रजा में से एक हो सकता है। क्या अब यह दर्शन स्पष्ट है? कुछ ऐसे नए विश्वासी भी हो सकते हैं जो अभी भी इसे स्पष्ट रूप से नहीं देखते हैं। यह सामान्य बात है। लेकिन उन लोगों में होकर जो कई सालों से विश्वासी रहे हैं, यदि तुम अभी भी इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हो, तो तुम्हारा परमेश्वर के वचन को पढ़ना अर्थहीन रहा है और इसका कोई लाभ नहीं है। तुम कुछ भी नहीं समझते!

परमेश्वर का वचन कहता है: "मैं मनुष्य के मध्य में बहुत कार्य कर चुका हूं, और इस समय के दौरान जो वचन मैंने व्यक्त किये हैं, वे बहुत हो चुके हैं। ये वचन मनुष्य के उद्धार के लिए ही हैं, और इसलिए व्यक्त किये गए थे ताकि मनुष्य मेरे अनुसार, मुझ से मेल खाने वाला बन सके। फिर भी, पृथ्वी पर मैंने ऐसे बहुत थोड़े ही लोग पाये हैं जो मुझ से मेल खाते हैं, और इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य मेरे वचनों को बहुमूल्य नहीं समझता, क्योंकि मनुष्य मेरे अनुकूल नहीं है।" परमेश्वर यहाँ क्या कहना चाहता है? क्या तुम समझते हो? देहधारी परमेश्वर ने आखिरी दिनों में कई वचन कहे हैं, और ये वचन मनुष्य की मुक्ति के लिए हैं। लेकिन जहाँ तक इस कार्य के परिणाम की बात है, परमेश्वर कहता है: "फिर भी, पृथ्वी पर मैंने ऐसे बहुत थोड़े ही लोग पाये हैं जो मुझ से मेल खाते हैं, और इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य मेरे वचनों को बहुमूल्य नहीं समझता, क्योंकि मनुष्य मेरे अनुकूल नहीं है।" आखिरकार मसीह के साथ अनुकूल होने का क्या मतलब है? कौन-से लोग मसीह के साथ अनुकूल नहीं हैं? शायद अधिकांश लोग वास्तव में इस बारे में स्पष्ट नहीं हैं, और मुमकिन है कि जिन लोगों ने अभी हाल में सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार किया है, वे विशेष रूप से जवाबों के बारे में अनिश्चित हों। एक व्यक्ति जिसने अभी हाल में सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार किया है, संभवतः सोच सकता है: "मैंने इतने सालों से परमेश्वर में विश्वास किया है और पहले से ही उसके लिए सब कुछ छोड़ दिया है, मैंने परमेश्वर के लिए पहले से ही इतना काम किया है और बहुत मुश्किलों का सामना किया है, इसलिए मैं परमेश्वर के साथ अनुकूल हूँ।" ये एक नए आस्तिक के विचार हैं। जिन लोगों ने मसीह के तख़्त के सामने न्याय का अनुभव किया है, उन्हें क्या लगता है? "मसीह के तख़्त के सामने मैंने न्याय और ताड़ना को पाया है। मैं पहले से ही अपनी भ्रष्टता, अपनी प्रकृति, और अपने सार के बारे में जानता हूँ। मैं अपने पुराने स्व से घृणा करता हूँ, इस भ्रष्ट देह से घृणा करता हूँ। मैं अपने समग्र ह्रदय से परमेश्वर से प्रेम करने को तैयार हूँ, सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार हूँ, सच्चाई की तलाश करने को तैयार हूँ। मैं परमेश्वर के लिए अपना सर्वस्व दे देने को तैयार हूँ, यही वह है जिसकी मैं अभिलाषा रखता हूँ। क्या यह संभव है कि मैं परमेश्वर के साथ अनुकूल नहीं हूँ?" क्या ये दो विचार सही हैं? दोनों गलत हैं। बिना किसी अनुभव के तुम परमेश्वर के वचन की वास्तविक समझ प्राप्त नहीं कर सकते हो। परमेश्वर के वचन की समझ अनुभव के माध्यम से प्राप्त की जाती है। कुछ लोग कहते हैं, "मैं क्षमता वाला व्यक्ति हूँ, मेरे पास तेज बुद्धि है, मैं किसी भी अड़चन के बिना, शीघ्र ही परमेश्वर के वचन को समझ सकता हूँ।" यह कथन मान्य नहीं है। यह क्यों मान्य नहीं है? वे क्षमताधारी लोग जो बूझ सकते हैं, परमेश्वर के वचन को पढ़ने और समझने में सक्षम हैं, लेकिन यह समझ बहुत उथली होती है; यह सिर्फ चीजों की सतह को छूती है। परमेश्वर के वचन का सच्चा अर्थ, उसके वचन का सार, और उसके इरादे, इन्हें समझने के लिए आठ से दस वर्षों के लिए इनको अनुभूत करना चाहिए। इस उदाहरण पर गौर करो। एक धार्मिक व्यक्ति जो परमेश्वर पर विश्वास करता है अपने पापों को स्वीकार करता है, परमेश्वर के सामने वह उन सभी पापों को स्वीकार करता है जो उसने कभी भी किये हों, वह सब कुछ प्रकट कर देता है। लेकिन क्या वह वास्तव में पाप के सार को जानता है? क्या वह पाप की उत्पत्ति को जानता है? वह अक्सर प्रार्थना में अपने पापों को कबूल करता है और तथापि, बाद में वह फिर से पाप करता है। वह पश्चाताप करने में सक्षम क्यों नहीं है? क्या कोई यह समझ सकता है? वास्तव में कोई भी नहीं कर सकता, सभी प्रचारकों और पादरियों को, यहाँ तक ​​कि पौलुस को भी, यह समझ नहीं है। पौलुस केवल इतना ही कर सकता था कि वह प्रमुख पापी होना स्वीकार करे। क्या उसने कहा कि उसका स्वभाव और उसका सार क्या था? क्या उसने अपने प्रतिरोध की उत्पत्ति की, या उसने प्रभु यीशु की निंदा क्यों करी, इसकी व्याख्या की थी? वह इसे नहीं कह सका था। वास्तव में, ऐसा कुछ भी नहीं था जो वह कह सके। ऐसा क्यों है? उसने परमेश्वर से न्याय और ताड़ना को प्राप्त नहीं किया था। अनुग्रह के युग में, परमेश्वर ने मनुष्य के पापी स्वभाव के सार के बारे में, मनुष्य के स्वभाव के तत्व के बारे में, इस तथ्य के बारे में कि मनुष्य शैतान द्वारा भ्रष्ट हो चुका है, कुछ भी नहीं कहा। क्यों प्रभु यीशु ने कुछ नहीं कहा और केवल लोगों को उनके पापों को कबूल करने दिया? बाइबल के, प्रभु यीशु के वचनों के मूल तत्व को कौन खोज सकता है? परमेश्वर का कार्य सशक्त और सुस्पष्ट है, स्वर्गीय वस्त्र का एक अखंड अंश। प्रभु यीशु ऐसा कुछ भी नहीं करेगा जो कि पूर्ण न हो, ठोस न हो। तो ऐसा क्यों है कि यीशु ने कुछ नहीं कहा? क्यों उसने आखिरी दिनों के न्याय के बारे में कुछ भी नहीं कहा? क्या तुम कह सकते हो कि प्रभु यीशु की क्षमता कम है? क्या तुम कह सकते हो कि प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर नहीं है? कोई भी यह नहीं कह सकता। लेकिन यीशु ने कुछ भी क्यों नहीं कहा? जो कोई भी इस मामले का अर्थ समझ सकता है, वास्तव में बाइबल का तत्व पा लेता है। प्रभु यीशु ने क्या कहा था? ऐसा नहीं है कि हमारे पास कोई स्पष्टीकरण उपलब्ध है, इसके बजाय हम प्रभु यीशु के वचनों के एक आधार का पता लगाएँ। प्रभु यीशु ने ऐसा कहा: "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा।"(यूहन्ना 16: 12-13)। क्या यही आधार है? बाइबल कहती है: "जो पुत्र पर विश्‍वास करता है, अनन्त जीवन उसका है; परन्तु जो पुत्र की नहीं मानता, वह जीवन को नहीं देखेगा, परन्तु परमेश्‍वर का क्रोध उस पर रहता है।"(यूहन्ना 3:36) इन शब्दों का क्या अर्थ है? अनुग्रह के युग में तुमने प्रभु यीशु के कार्य का अनुभव किया है, प्रभु यीशु के लिए अपना जीवन बिताया है, फिर तुम्हारे पास अनन्त जीवन क्यों नहीं है? बाइबल क्या कहती है इस पर गौर करो: "जो पुत्र पर विश्‍वास करता है, अनन्त जीवन उसका है; परन्तु जो पुत्र की नहीं मानता, वह जीवन को नहीं देखेगा।"यह एक विरोधाभास नहीं है। यह बात कैसे विरोधाभासी नहीं है? सर्वशक्तिमान परमेश्वर आ गया है, लेकिन क्या वह प्रभु यीशु का आत्मा है? यदि तुम केवल प्रभु यीशु के कार्य को स्वीकार करते हो, लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते, तो क्या तुम वास्तव में पुत्र में विश्वास रखने वाले हो? तुम नहीं हो। आखिरी दिनों में, इस वचन का "जो पुत्र पर विश्‍वास करता है, अनन्त जीवन उसका है" साक्षात्कार होगा और यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही होगा जो उन्हें अनन्त जीवन देगा। यह स्पष्ट है, है ना? तुम्हें बाइबल के वचनों को गलत नहीं समझना चाहिए। अब सर्वशक्तिमान परमेश्वर आ गया है और तुमने उसके आखिरी दिनों के कार्य को स्वीकार कर लिया है, लेकिन प्रभु यीशु ने इस बारे में हमसे क्या वादा किया है? प्रभु यीशु की भविष्यवाणी में, क्या तुम इस बात की पुष्टि करने के लिए कोई आधार पा सकते हो कि जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, वे अनन्त जीवन प्राप्त करेंगे और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर पाएँगे? फिल्म मेरा प्रभु कौन है इन सवालों के जवाब देती है, इसलिए मैं यहाँ कुछ और नहीं कहूँगा।

मैं परमेश्वर के वचन के इस अंश के बारे में सहभागिता जारी रखूँगा, जो कि आखिरी दिनों के मसीह के द्वारा कहा गया था। प्रभु यीशु द्वारा मुक्ति के कार्य को पूरा करने और मृत्यु से पुनरुत्थान कर स्वर्ग में आरोहित होने को दो हजार साल बीत चुके हैं। तब से इन दो हजार वर्षों के दौरान किसी भी समय, क्या हमने परमेश्वर की आवाज सुनी है? हमने नहीं सुनी है। उन दो हजार वर्षों के दौरान, मानव जाति ने प्रभु यीशु का नाम फैलाया है, और उसके लिए गवाही दी है, अनुग्रह के युग के दौरान कलीसिया का जीवन जीते हुए। प्रभु में विश्वास करने वाले सभी लोगों ने परमेश्वर की कृपा प्राप्त की है, और पापों की क्षमा और परमेश्वर के अनुग्रह की बहुतायत के साथ आने वाली शांति और आनंद का उपभोग किया है। परन्तु प्रभु यीशु के अंतिम दिनों में प्रकट होने के बाद, उसने "वचन देह में प्रकट होता है" में कई वचनों को अभिव्यक्त किया है। आज हम "तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए" पढ़ते हैं, जो "वचन देह में प्रकट होता है" में उपलब्ध है। इस अंश को सुनने के बाद, तुम्हें कैसा महसूस होता है? प्रभु यीशु, जो दो हजार से अधिक वर्षों पहले चला गया, वापस आ गया है और उसने हमसे इतने सारे वचन कहे हैं। तुम्हें लगता है कि यह परमेश्वर की आवाज़ है। तुम ऐसा क्यों कह रहे हो? हम यह कैसे कह सकते हैं कि यह परमेश्वर की आवाज़ है? दरअसल, ऐसा कहना कोई आसान बात नहीं है। ऐसी एक भावना होती है कि, "आह, ये वचन परमेश्वर के शब्द हैं, लोग तो ऐसी बातें नहीं कह सकते, वे मानव और परमेश्वर के बीच के संबंधों को, मानवता की वर्तमान स्थिति, और मानवता की हड्डियों के अंदर निहित चीज़ों को पूरी तरह से उघाड़ नहीं सकते हैं।" तुम बस महसूस करते हो कि कोई मनुष्य ऐसी बातें नहीं कह सकता है, केवल परमेश्वर ही ऐसे वचनों को बोलने में सक्षम है, और फिर तुम स्वीकार करते हो कि, "हाँ, ये परमेश्वर के वचन हैं, वह परमेश्वर की आवाज़ है।" लेकिन क्या यह वाकई इतना सरल है? क्या तुम मानते हो कि परमेश्वर के वचनों का यह अंश संतों की सभी पिछली पीढ़ियों के लिए उसका न्याय है? ये वचन भ्रष्ट मानव जाति के लिए परमेश्वर का न्याय है, और वे मसीह के तख़्त के सामने परमेश्वर के घराने के सभी ऐतिहासिक विश्वासियों को कहे गए न्याय के वचन हैं।

जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, चाहे कितने ही साल से वे विश्वास करते रहे हों, उनके पास एक स्वप्न होता है। वह स्वप्न क्या है? स्वर्गीय राज्य का स्वप्न। क्या प्रभु में विश्वास करने वाले लोगों का उद्देश्य स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना नहीं है? क्या वे सभी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का स्वप्न नहीं देखते? एक कहता है, "स्वर्गीय राज्य का मेरा सपना ऐसा है," और दूसरा कहता है, "स्वर्गीय राज्य का मेरा सपना वैसा है।" और उनमें से प्रत्येक का मानना ​​है कि वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता है। इस प्रकार, लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए प्रभु के आने का इंतजार करते हैं, ताकि उनका सपना सच हो जाए। परमेश्वर के वचनों का वह अंश जो कहता है "तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए", उन सभी लोगों को जो स्वर्गीय राज्य का सपना देखते हैं, एक उत्तर और स्पष्टीकरण देता है। इस प्रवचन को पढ़ने के बाद, तुम को अपने स्वप्न के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए? क्या सपना बिखर जाता है, क्या यह पूरी तरह से गायब हो जाता है, या यह सिर्फ हटाकर रख दिया जाता है? क्या सपना सच हो सकता है? एक उत्तर होना चाहिए, है ना? यहीं पर परमेश्वर लोगों को एक राह देता है—“तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए" यदि तुम सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह, को स्वीकार करते हो, तो तुम कहते हो, "मैं उसके न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करता हूँ; चाहे परमेश्वर जो भी प्रकट करे, मुझे इसे स्वीकार करना ही होगा, मुझे इसके प्रति समर्पण करना ही होगा, मैं परमेश्वर की सभी माँगों को पूरा करूँगा, मैं परमेश्वर के वचनों को खाऊँगा और पीऊँगा, और परमेश्वर के वचनों का पालन करूँगा।" यदि तुम मसीह के तख़्त के सामने न्याय और ताड़ना को समर्पित हो सकते हो, यदि तुम परमेश्वर के सभी कार्यों के प्रति समर्पण कर सकते हो, तो परमेश्वर स्वर्गीय राज्य के तुम्हारे सपने को मान लेगा और तुम्हारे सपने को सच कर देगा। क्या तुम्हें लगता है कि यह सच है? कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर केवल हमारे सपने को समाप्त करने के लिए, जानबूझकर हमारे सपने को तोड़ देने के लिए, और अंत में हमें नरक में निन्दित करने के लिए आया है। क्या बात ऐसी है? ऐसा क्यों है कि बहुत सारे लोग अंतिम दिनों के मसीह के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं करते? कुछ लोग अवचेतन मन में सोचते हैं कि यदि वे अंतिम दिनों के मसीह के न्याय को स्वीकार करते हैं और इसे मान लेते हैं, तो उन्हें दोषी ठहराया जाएगा और परिणामस्वरूप उन्हें नरक में डाल दिया जाएगा, और स्वर्गीय राज्य का उनका सपना टूट जाएगा। लेकिन अगर वे इस न्याय को स्वीकार नहीं करते हैं, तो सपना नहीं टूटेगा और वे अभी भी उम्मीद कर सकते हैं कि यह सच हो जाएगा। क्या ऐसे धार्मिक लोग नहीं हैं जो इस तरह से सोचते हैं? ऐसे लोग हैं। ऐसा व्यक्ति मसीह के तख़्त के सामने न्याय को स्वीकार नहीं करता, आखिरी दिनों के परमेश्वर के न्याय को स्वीकार नहीं करता। "हम प्रभु में विश्वास करते हैं, अपने पापों की क्षमा पर विश्वास करते हैं, तो हमारा न्याय क्यों किया जाए? क्या परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों का कोई मोल नहीं है? यदि क्षमा है, तो न्याय क्यों होगा? क्या यह हमारे साथ पुराना हिसाब ठीक करना नहीं है?" तो अंतिम दिनों के न्याय का क्या अर्थ है? प्रभु यीशु ने हमारे पापों को क्षमा किया है, तो न्याय का अर्थ क्या है? तुम इसे कैसे समझते हो? न्याय पुराने खातों को पलटना नहीं है, न ही अतीत में किए गए पापों की खुदाई कर हमारी निंदा करना है। हमारे साथ न्याय किया जा रहा है क्योंकि हम शैतान के द्वारा भ्रष्ट हुए हैं; हमारी शैतानी प्रकृति, हमारे शैतानी सार और हमारे शैतानी स्वभाव के कारण हमारे साथ न्याय किया जाता है। जो कुछ भी हमारे अंदर ऐसा है जो कि परमेश्वर के साथ अनुकूल नहीं, उसी की वजह से हमारे साथ न्याय किया जाता है। अंतिम विश्लेषण में, न्याय हमें शुद्ध करने के लिए होता है, न्याय का परिणाम हमें शुद्ध करना है; न्याय हमारी शैतानी प्रकृति और हमारे शैतानी स्वभाव को, हमारी उन चीजों को जो अशुद्ध हैं, शुद्ध करता है। इसलिए, जब परमेश्वर न्याय का कार्य करता है, तो वह पुराने खातों का निपटारा नहीं कर रहा है या पिछले पापों के लिए फिर से मनुष्य की निंदा नहीं कर रहा है, वह मनुष्य को उसकी शैतानी प्रकृति और उसके शैतानी स्वभाव से परिशुद्ध कर रहा है। तुम्हें तुम्हारे शैतानी स्वभाव से शुद्ध करने के लिए, परमेश्वर न्याय करता है और परमेश्वर समस्या के सार को प्रकट कर स्पष्ट रूप से तुम को बताता है। अगर वह तुम्हारी भ्रष्ट प्रकृति और इस भ्रष्टता के मूल कारण को स्पष्ट रूप से न बताता, तो क्या तुम इन्हें पहचान पाते? इन्हें पहचानने में कोई भी सक्षम नहीं होता। लोग चतुर हैं और उनके पास अच्छे दिमाग हैं, लेकिन वे आध्यात्मिक दुनिया को भेद नहीं सकते हैं और सीधे सत्य को नहीं समझ सकते हैं। यह एक तथ्य है। कुछ लोग कहते हैं, "क्या यह सही है कि लोग सच्चाई को वास्तव में समझ नहीं सकते हैं? यदि हम सच्चाई को समझ नहीं सकते हैं, तो हमें परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के लिए और सच्चाई के बारे में सहभागिता करने के लिए क्यों कहा जाता है,? क्या यह एक विरोधाभास नहीं है?" तुम को क्या लगता है? क्या यह एक विरोधाभास है? नहीं। सत्य को समझना लोगों की सहज प्रवृत्तियों पर निर्भर रहना नहीं है। लोगों को ज्ञान और विज्ञान जैसी बाहरी चीजों को समझने के लिए, उनका अध्ययन करना होता है और फिर वे कोई परिणाम प्राप्त कर सकते हैं, कुछ बातों को समझने के लिए। लेकिन जब सत्य के रहस्य की बात आती है, तो मनुष्य शक्तिहीन है। इसलिए, वैज्ञानिक लोग कई सालों तक विज्ञान का अध्ययन कर सकते हैं, लेकिन वे परमेश्वर की खोज नहीं करते हैं, वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं। परमेश्वर में विश्वास करने वाले धर्मशास्त्र के विशेषज्ञ कई सालों से बाइबल का अध्ययन कर सकते हैं, लेकिन वे सत्य को नहीं समझते हैं, वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं। वह एक बात कौन-सी है जिसे हम इसके माध्यम से अच्छी तरह से समझ सकते हैं? यदि लोग बाइबल का अध्ययन करने और मानव जीवन का अनुभव करने के लिए स्वयं पर ही निर्भर हैं, तो वे सत्य को समझने में सक्षम नहीं हैं, वे परमेश्वर को नहीं जान पाते हैं। सच्चाई को समझने के लिए लोगों को किस पर निर्भर होना चाहिए? वे पवित्र आत्मा के कार्य पर निर्भर हैं! क्यों, पवित्र आत्मा स्वयं परमेश्वर ही है! केवल पवित्र आत्मा के कार्य के आधार पर लोग सत्य को समझ सकते हैं। यदि पवित्र आत्मा लोगों को प्रबुद्ध नहीं करता है और उन्हें प्रेरणा नहीं देता, और उन्हें प्रकाश नहीं दिखाता है, तो वे सत्य को कभी नहीं समझेंगे। यह प्रेरणा ही है जो कि वैज्ञानिक विकास को चलाता है। प्रेरणा के बिना, मानव जाति का काम पसीने का उत्पादन तो करता है, लेकिन अन्यथा बेकार है। यदि वैज्ञानिक विकास प्रेरणा पर निर्भर करता है, तो मानवता की सच्चाई की समझ और परमेश्वर का ज्ञान प्रेरणा पर और भी अधिक निर्भर हैं और प्रेरणा देना पवित्र आत्मा का कार्य है। अगर हम इन वचनों की इस तरह से सहभागिता नहीं करते हैं, तो कोई भी नहीं समझ सकता है। मैंने अपने आप इसे नहीं किया। यदि पवित्र आत्मा ने मुझे प्रबुद्ध नहीं किया होता, तो मैं समझ नहीं पाया होता।