मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 25. कार्यकर्ता कैसे कार्य करते हैं उसके मुख्य सिद्धान्तों

अपने काम में, कार्यकर्ताओं को दो बिन्दुओं पर ध्यान देना चाहिये: एक यह है कि उन्हें कार्य प्रबंधनों के द्वारा निर्धारित सिद्धान्तों के अनुसार ही कार्य करना चाहिये। कार्यकर्ताओं को इन सिद्धान्तों का उल्लंघन नहीं करना चाहिये, न तो उन्हें अपनी स्वयं की कल्पनाओं के अनुसार कार्य करना चाहिये, और न अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करना चाहिये। उन्हें परमेश्वर के परिवार के कार्य के लिए चिंता दिखानी चाहिये, और जो कुछ भी वे करते हैं उसमें परमेश्वर के परिवार के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिये। दूसरा बिन्दु भी मुख्य है, और वह यह है, कि जो कुछ भी वे करते हैं उसमें पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करने के लिए ध्यान दें, और परमेश्वर के वचन का पालन करने के लिए हर चीज़ को कड़ाई से करें। यदि आप पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन को नहीं मानते हैं या जिद्दी बनकर अपने ही मन के अनुसार चलते हैं और अपनी ही कल्पना के अनुसार कार्य करते हैं, तो यह परमेश्वर के प्रति एक अति गंभीर विरोध का निर्माण करता है। लगातार पवित्र आत्मा की अगुवाई और विशेष प्रकाशन की अवज्ञा से आपके आत्मिक जीवन की समाप्ति हो जाती है। यदि किसी ने पवित्र आत्मा के कार्य को खो दिया है तो ऐसे कार्य के साथ आगे बढ़ने का कोई मार्ग नहीं है, और भले ही कोई कार्य करे, फिर भी कुछ पूरा नहीं होता है। कार्य के दौरान इन दोनों सिद्धान्तों का पालन करना आवश्यक है: एक यह है कि कार्य को ऊपर से प्राप्त प्रबंधनों के अनुसार ही सटीकता से करना है, और ऊपर से तय किये गये सिद्धान्तों के साथ ही कामों को करना है। और दूसरा बिन्दु यह है कि भीतर बसे पवित्र आत्मा के द्वारा दिये गए निर्देशों का पालन करना है। जब एक बार इन दोनों बिन्दुओं को अच्छी तरह से समझ लिया जाता है, तो यह असंभव है कि कार्य अपने लक्ष्य से चूक जाये। आप सभी जिनका अनुभव इस क्षेत्र में अभी तक सीमित है, आपकी स्वयं की इच्छा आपके कार्य को और अधिक दूषित करेगी। कभी-कभी, हो सकता है कि आप पवित्र आत्मा के विशेष प्रकाशन और मार्गदर्शन को अपने भीतर न समझ पाएँ; और कभी ऐसा भी हो सकता है कि लगे कि आप लोग इसे समझ गये हैं, परन्तु संभव है कि आप इसकी अनदेखी कर दें। आप हमेशा मानवीय रीति से सोचते या निष्कर्ष निकालते हैं, जैसा आपको उचित लगता है वैसा करते हैं, और आप पवित्र आत्मा के इरादों की बिल्कुल भी परवाह नहीं करते हैं। आप स्वयं के विचारों के अनुसार अपने कार्य को करते जाते हैं, और पवित्र आत्मा के विशेष प्रकाशन को एक किनारे कर देते हैं। ऐसी स्थितियां अक्सर घटित होती हैं। पवित्र आत्मा का आन्तरिक मार्गदर्शन बिल्कुल भी लोकोत्तर या अतींद्रियनहीं है। वास्तव में यह बिल्कुल ही सामान्य है: आपकी आत्मा की आन्तरिक पहुँच इसे जानती है कि यही कार्य करने का सही और सर्वोत्तम तरीका है। ऐसा विचार बहुत ही स्पष्ट है; यह गंभीर सोच का परिणाम नहीं है, और कभी-कभी तो आप पूरी तरह से नहीं समझ पाते हैं कि इस रीति से क्यों करना है। अक्सर यह पवित्र आत्मा का ही प्रकाशन होता है अन्य कोई बात नहीं। यह एक परिस्थिति है जो अधिकांश लोगों में सामान्य रूप से घटित होती है। पवित्र आत्मा उपयुक्त तरीके से कार्य करने के लिये आपका मार्गदर्शन करती है। यह आपके विचार का नतीजा नहीं है, बल्कि बजाय आपके हृदय में यह एहसास है और आप सहज ज्ञान से जान लेते हैं कि कार्य करने का सबसे अच्छा तरीका यही है। शायद यह पवित्र आत्मा की ओर से है। इंसान की स्वयं की इच्छा अक्सर सोच प्रक्रिया का परिणाम है और उसमें उनके स्वयं के विचारों के द्वारा ही रंग भरा जाता है: इसमें मेरे लिये क्या है, मुझे कैसे फायदा होगा-लोग कुछ भी करने का निर्णय लेने से पहले इन बातों को सोचते हैं। पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में ऐसी कोई मिलावट नहीं होती है। पवित्र आत्मा के विशेष प्रकाशन और मार्गदर्शन पर सावधानीपूर्वक ध्यान देना बहुत ही आवश्यक है; विशेषकर मुख्य विषयों में आपको बहुत सावधान रहना होगा ताकि इन्हें समझा जा सके। ऐसे लोग जो बहुत अधिक सोचते हैं, जो अपने विचारों पर ही कार्य करना पसन्द करते हैं, अधिक संभव है कि वे इसमें चूक जाएँ। अच्छे और विश्वसनीय कार्यकर्ता पवित्र आत्मा के काम पर ध्यान देते हैं। ऐसे लोग जो लोग पवित्र आत्मा की आज्ञा का पालन करते हैं, वे परमेश्वर का भय मानते हैं और बिना थके सच्चाई को खोजते हैं। परमेश्वर को सन्तुष्ट करने के लिये और उसकी गवाही देने के लिये व्यक्ति को अपने कार्य में मिलावट व इरादों की जाँच करनी चाहिये, और यह देखने का प्रयास करना चाहिये कि वह व्यक्तिगत इच्छाओं से कितना प्रेरित है, वह पवित्र आत्मा के अंश से कितना प्रेरित हुआ है, और परमेश्वर के वचन का पालन कितना कर रहा है। आपको निरन्तर और सभी परिस्थितियों में अपनी कथनी और करनी की जाँच करते रहनी चाहिये। अक्सर इस तरह का अभ्यास करना आपको परमेश्वर की सेवा के लिये सही रास्ते पर बनाए रखेगा। परमेश्वर के वचन की सच्चाइयों को अच्छी तरह से जानना, परमेश्वर के हृदय के अनुसार उसकी सेवा करने के लिये आवश्यक है। जब लोग परमेश्वर के वचन को समझ लेते हैं केवल उसके बाद ही उनके पास भेद करने की क्षमता आती है और वे यह पहचानने के योग्य होते हैं कि उनकी स्वयं की इच्छा और उन चीज़ों से क्या प्रगट होता है जो उनकी प्रेरणा की ओर संकेत करते हैं। वे मानवीय अशुद्धता को पहचानने के योग्य हो जाते हैं, और यह कि सच्चाई के अनुसार कार्य करना क्या होता है। तभी आप जानेंगे कि और अधिक शुद्धता से आज्ञाओं का पालन कैसे करें। सच्चाई के बिना लोगों के लिए भेद करना असंभव है। एक नासमझ व्यक्ति भ्रष्टता को प्रकट करने के अर्थ को समझे बगैर अपने सम्पूर्ण जीवन में परमेश्वर पर विश्वास कर सकता है, और वह यह भी नहीं जानता है कि परमेश्वर का विरोध करने का क्या अर्थ है, क्योंकि उसके पास सच्चाई नहीं है और यह विचार उसके मन में मौजूद ही नहीं है। यह एक बिजली के उपकरण की मरम्मत करने की तरह है। कोई व्यक्ति उसकी मरम्मत कैसे कर सकता है जब वह जानता ही नहीं कि कौन सा सर्किट खराब है? आप लोगों के अन्दर भी बहुत सारे सर्किट हैं। कभी-कभी खराबी आपके इरादों में होती है, या वहां पर होती है जहाँ पर आपकी स्वयं की इच्छा शामिल है। कभी-कभी खराबी आप लोगों की समझ या ज्ञान की विकृति में होती है। या यह स्वयं की इच्छा का अनुसरण करने के कारण या दूसरों पर विश्वास करने और दूसरों के द्वारा गुमराह होने के कारण हो सकता है। कभी-कभी आप सभी अपने शरीर का अनुसरण करते हैं जब आप अपनी प्रतिष्ठा और हैसियत को बचाने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार के बिगड़े हालात अक्सर उत्पन्न होते हैं, इस प्रकार ये कार्य को कार्यप्रणाली से दूर कर देते हैं और परमेश्वर के परिवार के कार्य और भाइयों एवं बहनों के जीवन को नुकसान पहुंचाते हैं। इस प्रकार के काम का क्या मूल्य है? इसमें तो बस रुकावट, उपद्रव और विनाश है। उस कार्य को पूरा करने के लिए जिसे परमेश्वर ने सौंपा है इन दो सिद्धान्तों को समझना जरुरी है। आपको ऊपर से दिए गये कार्य के प्रबंधनों का पालन कड़ाई से करना होगा, और आपको पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करने पर ध्यान देना होगा। जब इन दोनों सिद्धान्तों को समझ लिया जाता है केवल तभी कार्य प्रभावशाली होगा और परमेश्वर की इच्छा सन्तुष्ट होगी।