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25. सेवा में तालमेल का महत्व

मी जी जिनान सिटी, शैंडॉन्ग प्रदेश

कलीसिया के प्रशासन को उसके वास्तविक रूप में बदलने के बाद, परमेश्वर के घर में अगुआ के हर स्तर के लिए साझेदारी स्थापित की गई थी। उस समय, मैं सोचा था कि यह अच्छी व्यवस्था थी। मेरी क्षमता कम थी और मेरे पास करने के लिए काफी काम था; मुझे वाकई एक साझेदार की जरूरत थी जो मेरे क्षेत्र में सभी तरह के काम पूरा करने में मेरी मदद करे।

इसलिए, मैं और वह बहन जो मेरी साझेदार बन गई थी, हमने एक साथ कलीसिया में पादरी संबंधी काम पूरा करना शुरू कर दिया। लेकिन धीरे—धीरे, मैंने देखा कि सभी तरह के काम मेरी इच्छा के अनुसार ही कर रही थी, और मेरे दिल में प्रतिरोध शुरू हो गया: भले ही मैं अपना काम खुद करने पर थोड़ी सी व्यस्त हो जाती हूं, ठीक है, और एक साझेदार की व्यवस्था करना दिक्कत भरा हो जाएगा। अगर मैं उसे कुछ काम करने देती हूं और यह आदर्श नहीं है, तो बेहतर होगा कि मैं वह काम खुद कर लूं। अगर मैं उसे काम करने नहीं देती हूं, तो खैर, वह मेरी साझेदार है।… इसलिए, ज्यादा से ज्यादा प्रतिरोध मेरे दिल में आता गया, और एक बार, मैं और नहीं सह पाई और मैंने अपना उस पर अपना गुस्सा उतार दिया: “तुम इतनी मूर्ख कैसे हो सकती है? तुम कई सालों से अगुआ रही हो, फिर भी अच्छा काम कैसे नहीं कर सकती हो? क्यों तुम कभी भी नहीं समझ सकती हो या उत्तर नहीं दे सकती हो?…” मेरी बात पूरी होने के बाद, मुझे बहुत खराब लगा, वाकई शर्मिंदगी महसूस हुई। मैंने खुद में सोचा: क्या मेरी स्थिति गलत है? इसलिए, मैं प्रार्थना करने के लिए परमेश्वर के समक्ष गई, और मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े, जिसमें कहा गया था: “आज तुम लोगों की एक साथ मिलकर काम करने की अपेक्षा वैसी ही है जैसी यहोवा की अपेक्षा थी कि इस्राएली उसकी सेवा करें। अन्यथा, बस अपनी सेवा समाप्त कर दो। क्योंकि तुम सब वे लोग हो जो सीधे परमेश्वर की सेवा करते हो, कम से कम तुम लोगों को अपनी सेवा में वफादार और आज्ञाकारी होने में सक्षम होना चाहिए, और व्यवाहारिक तरीके से सबक सीखने में सक्षम होना चाहिए।…तुम लोग इस तरह के व्यावहारिक सबक का अध्ययन या प्रवेश भी नहीं करते हो, और तुम फिर भी परमेश्वर की सेवा करने की बात करते हो!... यदि तुम लोग, जो कलीसिया में काम करने के लिए समन्वय करते हैं, एक-दूसरे से सीखते नहीं हो, और एक-दूसरे की कमियों कि पूर्ति करने के लिए संवाद नहीं करते हो, तो तुम सभी सबक कहाँ से सीख सकते हो? जब तुम लोगों का किसी से सामना होता है, तो तुम लोगों को एक दूसरे के साथ सहभागिता करनी चाहिए, ताकि तुम्हारा जीवन लाभ पा सके।” (“वचन देह में प्रकट होता है” से “मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है” से) फिर मैंने मनुष्य की संगति में इसे देखा: “यहां ऐसे भी कुछ लोग हैं जो अपने कर्तव्य को पूरा करते हुए किसी भी और व्यक्ति के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते हैं। कोई भी उनके निकट नहीं आ सकता है; यह उनके अहंकार और दंभ को प्रकट करता है, उनमें कोई भी मानवीय संवेदना नहीं है, वे खुद को नहीं जानते हैं, और दूसरों को तुच्छ समझते हैं। क्या यह दयनीय नहीं है? इस तरह के मनुष्यों का स्वभाव बिल्कुल भी नहीं बदलता है, और यह कहना आसान नहीं है कि वे परमेश्वर द्वारा बचाए जा सकते हैं या नहीं। वे लोग जो सच में खुद को जानते हैं, बहुत गंभीर हुए बिना दूसरों के साथ सही ढंग से बर्ताव कर सकते हैं। वे धैर्य के साथ दूसरों की मदद और सहयोग भी कर सकते हैं, लोगों को महसूस करा सकते हैं कि वे प्यारे और प्रिय हैं; वे दूसरों के साथ ही उचित संबं​ध बना सकते हैं। उन लोगों में मानवता होती है, और मानवता रखने वाले लोग ही परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं, वे दूसरों के साथ सद्भावनतापूर्ण ढंग से रह सकते हैं, और पर्याप्त रूप से अपने कर्तव्य को पूरा कर सकते हैं ( कलीसिया के अगुओं और कर्मियों के साथ मसीह की बातों के दस्तावेज में “अपने कर्तव्य को पूरा करने ही मनुष्य का असल स्वभाव प्रकट होता है”)। परमेश्वर के उन वचनों और मनुष्य की इस संगति को संयोजित करके, मैं ध्यानपूर्वक खुद का परीक्षण किया और पाया कि मैंने अगुओं के सभी स्तरों के लिए परमेश्वर के लोगों के साझेदारों की व्यवस्था करने में परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझा था। इसके अलावा, मैंने सद्भावनापूर्ण तालमेल के सत्य का अभ्यास नहीं किया था या उसमें प्रवेश नहीं किया था। परमेश्वर के लोगों द्वारा हमारे के लिए साझेदारों की व्यवस्था करने का एक कारण हमारी क्षमता का काफी कम होना था, और सत्य के सभी पहलुओं की हमारी समझ भी काफी सीमित थी। हम खुद ही कलीसिया में सभी कामों को पूरा नहीं कर सकते थे। एक साझेदार की मदद सक, हम कलीसिया के काम को बेहतर ढंग से पूरा कर सकते थे साथ ही अकेले काम करने, अपनी इच्छानुसार कुछ भी करने, और परमेश्वर की अपनी सेवा में अपनी खुद की इच्छा के भरोसे रहने के माध्यम से परमेश्वर का विरोध करने से बच सकते थे। एक अन्य कारण यह था कि ताकि हम सामान्य मानवता के सत्य में प्रवेश करने का बेहतर ढंग से अभ्यास कर सकें, ताकि हम साझेदारों के सा​थ पारस्परिक सहभागिता बना सकें, और एक—दूसरे से सीख सकें। यह कलीसिया के काम के साथ ही साथ जीवन में हमारे व्यक्तिगत प्रवेश के लिए भी काफी लाभदायक है। इससे मैंने समझा कि हमारी सेवा में सद्भावनापूर्ण तालमेल कलीसिया के कार्य और जीवन में हमारे व्यक्तिगत प्रवेश के लिए कितना महत्वपूर्ण है! लेकिन मैं इसमें परमेश्वर की इच्छा बिल्कुल भी नहीं देख पाई। इस तालमेल के माध्यम से मैं जो व्यावहारिक सबक सीख सकती थी, उसमें मैंने ध्यान नहीं दिया था। मैंने कलीसिया की व्यवस्था की वजह से उसके साथ अनिच्छापूर्वक काम किया था, और जैसे ही यह बहन कुछ चीजों को अच्छे से नहीं संभाल पाती थी, मैं उसने डांट देती थी और अपना आपा खो देती थी। मैं हमेशा सोचती थी कि वह मेरी तरह सक्षम नहीं थी, और मैं उसकी क्षमताओं और फायदों को नहीं देखती थी। मैंने कलीसिया की व्यवस्थाओं का भी विरोध किया था। मैं वाकई बहुत ज्यादा अहंकारी थी, खुद से काफी अनजान थी, और मुझे थोड़ी सी भी सामान्य मानवता या तर्क नहीं था, और इससे भी अधिक मेरे दिल में परमेश्वर के लिए बिल्कुल भी आदर नहीं था, और मैं परमेश्वर के समक्ष सेवा करने के योग्य नहीं थी।

हे परमेश्वर! तुम्हारे प्रकटन ने सद्भावनापूर्ण तालमेल करने में मेरी अयोग्यता, मेरे अहंकार और तुम्हारी सेवा करने के मेरे दयनीय पक्ष से मुझे परिचित कराया है। आज से ही, मैं अपने दिल में तुम्हारे लिए आदर रखने, खुद का समर्थन न करने, और सभी चीजों में कलीसिया के हितों का ध्यान रखने की इच्छुक हूं। सेवा के तालमेल में, मैं दूसरों का सहयोग करूंगी और दूसरों से सीखूंगी। मैं सत्य में अपने खुद के प्रवेश पर ध्यान दूंगी, और जल्द से जल्द सत्य एवं मानवता वाली ऐसी व्यक्ति बनने की कोशिश करूंगी जो तुम्हारे उपयोग करने के लायक है।

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