मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 40.मानव में बेवफ़ाई के तत्व और मानव-प्रकृति जो परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती है 

वे कठिनाइयाँ जो कि आसानी से लोगों के अनुभव में आ खड़ी होती हैं, वे चीज़ें जो लोगों के आसानी से गिर पड़ने के कारण बनती हैं, और जहां प्रत्येक व्यक्ति की घातक कमजोरियां रहती हैं, ये सभी वे मुद्दे हैं जिन पर महारत हासिल होनी चाहिए। ऐसा क्यों है कि आप गिर जाते हैं, परमेश्वर को छोड़ देते हैं और जब आप कुछ चीजों के सामने आते हैं, तो अपनी सच्चाई की खोज जारी रखने के विश्वास को खो देते हैं? वर्तमान में, हर कोई इन बातों के खतरे में है। आप सामान्य रूप से कितना विश्वास रखते हैं, आपका उत्साह कितना महान है, आप कितने दृढ़ या अटल हैं, इन सब के बावजूद सिर्फ एक प्रकार की चीज हो सकती है जो आसानी से हर एक व्यक्ति को चकराकर गिरा देगी। वह किस तरह की चीज है? जब यह देखा जाता है कि जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे दुनिया में उत्पीड़न और बहिष्कार से गुजरते हैं, जबकि अविश्वासी लोग दुनिया में समृद्ध होते हैं, अमीर और शक्तिशाली होते हैं, और जब विश्वासियों को सताया और झिड़काया जाता है, तो अधिकांश लोग इसे समझ नहीं सकते हैं। कुछ लोग शिकायत भी करते हैं: “क्या अंततः कोई परमेश्वर नहीं है? परमेश्वर हमें सहारा क्यों नहीं देते? परमेश्वर इन लोगों के बारे में कुछ क्यों नहीं करते?” जब इस तरह की स्थिति अक्सर होती है तो समस्या क्या होती है? खासकर जब आप देखते हैं कि अविश्वासी लोगों की ताकतें विशेष रूप से मजबूत होती हैं, तो आप सोचते हैं: “परमेश्वर के परिवार की अपनी कोई शक्तियाँ क्यों नहीं है? क्यों परमेश्वर का परिवार हमेशा दूसरों की धौंस और उत्पीड़न से व्यथित होता है?” जब यह बात होती है तो अधिकांश लोग इसी तरह कमजोर हो जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति सोचता होगा कि दुनिया में अधिकारियों के तौर-तरीके कितने रोबदार होते हैं, उनके जीवन-दर्शन कितने शानदार, छिपे या अपारदर्शी होते हैं, वे कितने कामयाब हैं, कैसी उनकी पोशाक और चाल-ढाल है .... अधिकांश लोगों के दिलों में इन चीज़ों के लिए ईर्ष्या है। क्या यह सही नहीं है? सभी लोगों के भीतर ये चीजें हैं और इन चीजों के द्वारा उन्हें अभिभूत और प्रलोभित किया जा सकता है, उस हद तक ​​कि ये चीज़ें उन्हें क्षण भर के लिए कमज़ोर बना सकती हैं। यह साबित करता है कि लोगों को अभी भी परमेश्वर में, उनके वचन में या सत्य में बहुत रुचि नहीं है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितने अचल हैं या आप सामान्य रूप से कितना ज्यादा विश्वास करते हैं, जब आप इस तरह से किसी चीज़ से मिलते हैं तो आप क्षण भर कमजोर हो जाते हैं; जब बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, तो आपको पुनः ठीक होने में कई दिन लग जाते हैं। कुछ लोग इसे सहन नहीं कर सकते जब वे किसी और को कॉलेज में प्रवेश करते या अधिकारी बनते देखते हैं। यहां तक ​​कि अगर किसी को तनख्वाह में बढ़ोतरी मिलती है या उनके पास एक अच्छा पारिवारिक जीवन है, या यदि उनके पास कुछ ऐसा है जिससे वे ख़ुशी पाते हैं, तो लोग इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। कुछ लोग कारों को पसंद करते हैं, और वे सोचते हैं: “ऐसा क्यों है कि दूसरों के पास सुन्दर कारें हो सकती हैं, लेकिन हमारे पास नहीं? हम परमेश्वर में विश्वास करते हैं इसलिए हमें प्राथमिकता मिलनी चाहिए। परमेश्वर को हमें इन चीजों का आनंद पहले देना चाहिए। हम उनका आनंद अभी क्यों नहीं पा सकते हैं?” लोगों में इन प्रतिक्रियाओं का होना और उनका इन बातों को अपने दिलों में सोचना, उनका इन बातों को बहुत महत्त्वपूर्ण मानना, यह प्रकट करता है कि मनुष्य का स्वभाव कैसा है। लोगों के भीतर उनकी प्रकृति में एक बात है और इससे उन्हें इन चीजों में रुचि हो सकती है। इसके अलावा, ऐसा लगता है कि वे इस तरह की चीजों से खुद को दूर नहीं कर सकते। उन्हें लगता है कि इन चीजों के बिना, जीवन उबाऊ है। अब ऐसे कई लोग हैं जो आम तौर पर सोचा करते हैं: “यदि मेरे पास सत्य न होता, तो क्या मैं जीवित रह सकता था? क्या मैं परमेश्वर के बिना जीवित रह सकता था?” वे इस पर विचार करते हैं और अंत में सोचते हैं: “हां, मैं तब भी जीवित रह सकता था, और मुझे इस बारे में बहुत बुरा नहीं लगेगा। अगर कोई समाज नहीं होता, कोई भी राष्ट्र नहीं, कोई अविश्वासी न होता, तो मुझे लगता कि शायद यह दुनिया बहुत खाली है, कोई भी रोमांचक बात नहीं हो रही है।” लोगों की प्रकृति के भीतर ये बातें हैं, और वे परमेश्वर के लिए तरसते नहीं हैं, न ही वे लालसा रखते हैं ऐसी चीजों के लिए जो सकारात्मक, उज्ज्वल, सुंदर या अच्छी हों। तो फिर लोग आखिर क्यों परमेश्वर में विश्वास करते हैं? वे केवल इसलिए परमेश्वर पर विश्वास करते हैं क्योंकि उनकी कोई इच्छा है, और उनको उनसे कुछ चाहिए। इस इच्छा से प्रेरित हो कर ही, लोग सत्य की खोज करते हैं, परमेश्वर में विश्वास करते हैं, कठिनाइयों का सामना करते हैं और दृढ़ हैं। परन्तु कोई व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास करता है और थोड़ा-सा कष्ट उठाता है, इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने उन चीज़ों को छोड़ दिया है। वास्तव में, वे अभी भी उनके लिए तरसते हैं। ऐसा क्यों है कि कुछ लोग जैसे ही एक बार नेता बनते या जिम्मेदारी की स्थिति में आते हैं, अपने शैतान को प्रकट करने लगते हैं? इससे पता चलता है कि उनके दिल उन चीजों के लिए तरसते हैं। यह किस प्रकार की प्रकृति है? मनुष्य के भीतर की यह प्रकृति शैतान की ही है। ये सब ही वे चीज़ें हैं जिन को शैतान पूजता है और जिनका वह आनंद उठाता है। मनुष्य के भीतर की प्रकृति शैतान की ही होती है, इसलिए लोग शैतान जैसी दृष्टि को थामे रहते हैं, अनजाने में ही इस के साथ एक होकर। आप देखते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर कुछ चीजें हैं जो सत्य के खिलाफ जाती हैं, जो उसके साथ संघर्ष करती हैं। ये बातें पूरी तरह सत्य से असंगत हैं और उसके साथ कोई संबंध नहीं रखती हैं, फिर भी लोग इसका प्रत्यक्ष अनुभव करने में असमर्थ हैं। लोग कभी-कभी महसूस करते हैं: “किसी कारण से मैं इसको इस तरह करता हूँ; यह ठीक है। यह कहा जाना चाहिए कि यह सत्य के अनुरूप है और मैं इसे परमेश्वर की आवश्यकताओं के अनुसार कर रहा हूँ।” वास्तव में आप जो कुछ करते हैं वह मनुष्य के मित्रभाव और आपके शैतानी स्वभाव से उत्पन्न हुआ है। आपको लग सकता है कि यह बहुत अच्छा है, लेकिन वास्तव में यह सत्य के अनुरूप नहीं है। अविश्वासियों की महान ताकतों को देख कर कुछ लोगों को डर क्यों लगता है? इसके अलावा, वे अपने दिलों में उनसे ईर्ष्या करते हुए कहते हैं: “अगर परमेश्वर पर विश्वास करते हुए, साथ-साथ मुझे इस तरह की शक्ति, इतनी दौलत और सहायता करने वाले इतने सारे लोग भी मिल जाएँ, तो यह बहुत बढ़िया होगा।” ये वो चीज़ें हैं जिसकी लोग ईर्ष्या करते हैं। अगर लोगों के पास पवित्र आत्मा का कोई काम न होता, कोई दमनकारी माहौल न होता, उनका नेतृत्व करने वाला कोई न होता, कोई भी उन्हें मजबूर न करता, तो फिर हर कोई दुनिया की रुझानों का पालन करेगा और कोई भी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करेगा। आप लोगों में से वे जो अब नेता हैं, आप सब ऊर्जा से भरे हो सकते हैं, और आप लोग सोचते हैं: “मुझे अपना काम अच्छी तरह से करना चाहिए और इन लोगों की अच्छी तरह से अगुआई करनी चाहिए।” लेकिन अगर आप नीचे के लोगों में से एक होते, दूसरों का अनुसरण करते, और आपका नेतृत्व करने वाला कोई और होता, तो शायद आपके पास वह ताकत न होती जो अभी है, और संभवत: आप भी अन्य लोगों की तरह अक्सर कमजोर और निराश होते। जब आप जिम्मेदारी की स्थिति में हों, तो आपको लगता है कि आपको उन लोगों से उनके विश्वास में गंभीरतापूर्वक अनुसरण करवाना चाहिए, और उन्हें आपके नेतृत्व के कारण गलत नहीं होने देना चाहिए। एक नेता के रूप में आपका काम है कि आप उन्हें जो आपके नीचे हैं, आपका अनुसरण करने दें। इस दर्जे के साथ आप अच्छी तरह से काम कर सकते हैं, लेकिन अगर आपके पास यह दर्जा न हो, तो शायद आप जितने मजबूत अभी हैं, उतने मजबूत न होंगे। लोगों के भीतर इन चीजों के विश्लेषण के माध्यम से हम यह जान लेंगे कि जिन चीजों की वे इच्छा रखते हैं, वे धर्मोचित नहीं, प्रकाश और सत्य से नहीं आतीं, तथा तथ्यों के अनुरूप नहीं हैं। इसके बजाय, वे उन चीज़ों की इच्छा रखते हैं जो सांसारिक हैं, जो शैतान की हैं, और जिन्हें लोग बेहतर मानते हैं। सुसमाचार फैलाने में कई लोग नकारात्मक हो जाते हैं, जब वे देखते हैं कि उनका काम मुश्किल हो जाता है या बहुत कम लोग कलीसिया में प्रवेश करते हैं। वे सोचते हैं: “सभी दलों और संप्रदायों की ताकत इतनी ज्यादा है और जिन्हें वे बदल पाते हैं वे कॉलेज के छात्र, सभी प्रकार के बुद्धिजीवी और कुछ अधिकारी भी हैं।” ऐसा लगता है जैसे कि इन कई अधिकारी और कॉलेज के छात्रों की वजह से उन्हें अविश्वसनीय रूप से सम्मानित महसूस होता है, वे नहीं जानते कि कॉलेज के छात्र की महत्ता कितनी है। वे थोड़े ज्ञान या थोड़ी शिक्षा वाले लोगों का आदर करने के लिए काफी दूऱ तक जाते हैं, और वे अधिकारियों और इन ताकतों को विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं। लेकिन आपका विश्वास तो परमेश्वर में है, न कि उन में, न ही उनकी शक्ति में विश्वास है। लोग विश्वास तो परमेश्वर पर करते हैं, लेकिन इन ताकतों में शरण लेते हैं और उन लोगों का आदर करते हैं जिनके पास ऊंची जानकारी होती है। यह आदमी के स्वभाव को किस प्रकार का तय करता है? मनुष्य परमेश्वर को धोखा दे रहा है। इन चीज़ों के भीतर जिन्हें लोग पूजते हैं, कौन-सी चीज़ परमेश्वर को खुशी पहुंचाती है? इनमें से कोई भी नहीं! जानकारी, हैसियत, प्रसिद्धि और लाभ, धन, ताकत - इनमें से क्या परमेश्वर पसंद करते हैं? उनमें से कौन-सी चीजें सकारात्मक हैं? कौन-सी सत्य के अनुरूप हैं? इनमें से कोई भी नहीं! लेकिन ये चीजें हर किसी में मौजूद हैं और हर किसी के द्वारा पसंद की जाती हैं। पारस्परिक संबंधों और दूसरों के प्रति उनके दृष्टिकोण से यह देखा जा सकता है कि लोग हैसियत, ताकत और धन को बहुत महत्व देते हैं। जब कोई दूसरे के घर जाता है और देखता है कि वे लोग अमीर हैं, और उनका परिवार अनुकूल परिस्थितियों में रहता है, तो वे वहां देर तक रुकना चाहते हैं और जाते नहीं, अपने माता-पिता को भी भूल कर। माता-पिता जो उन्हें जन्म देते हैं और उन्हें बड़ा करते हैं, जिन्होंने उनके पोषण में इतने वर्षों को लगा दिया था, पूरी तरह से भुला दिए जाते हैं, उस हद तक कि पल भर में अपने माता-पिता का भी त्याग कर देते हैं, तो फिर परमेश्वर को भूलना क्या उनके लिए इतना आसान न होगा? मनुष्य के अंदर विश्वासघात की प्रकृति बहुत गंभीर है और इसकी जड़ें गहरी हैं। ऐसा क्यों कहा गया है कि धोखा देना तो मनुष्य का स्वभाव ही है? इस विश्वासघात में कितनी बातें शामिल हैं? इसमें वे सभी चीजें शामिल हैं जिनसे लोग प्यार करते हैं, जिनकी वे इच्छा रखते हैं, तलाश करते हैं, रक्षा करते हैं और वे सभी चीज़ें जिनके बारे में लोग सोच सकते हैं। सामान्य तौर पर यह कहा जा सकता है कि मनुष्य का स्वभाव ही धोखा देना है। हम यह कैसे देख सकते हैं कि मुद्दा यही है? यह देखना पूरी तरह से संभव है यदि हम परमेश्वर के प्रति लोगों के रवैये, परमेश्वर के प्रति उनकी चाह और उनके ह्रदय की सोच की तुलना इस से करें कि परमेश्वर उनसे क्या चाहते हैं, और कोई व्यक्ति जिसके बारे में दिन भर सोचता है, वह बात परमेश्वर की इच्छा से मेल खाती है या नहीं। तो लोग दिन में 24 घंटे किसके बारे में सोचते हैं? जब वे सो रहे हों या भोजन के समय के अलावा, लोग किसके बारे में सोचते हैं? कुछ भी न करते हुए वे यूं ही बैठ कर सोचते हैं: “ओह, देखो वह परिवार कितनी खुशी से, कितने आराम से जीता है। अगर मैं उनके जैसे जीता होता और ईश्वर में विश्वास भी करता, तो यह कितना बेहतर होता! मेरे पास दुनिया में जो कुछ सबसे बेहतरीन है, वह सब होता!” फिर कुछ लोग ऐसे हैं जो पूरे दिन विचार करते हैं: “अगर मुझे उनकी तरह एक सही पारिवारिक जीवन मिलता और एक ऐसा अच्छा जीवन-साथी होता जो मुझे सताता नहीं, तो कितना अच्छा होता!” और कुछ ऐसे लोग भी हैं जो दूसरों को अच्छी नौकरी के साथ देखते हैं, और सोचते हैं: “ओह, अगर मेरे पास एक वैसी परिस्थिति होती जो उनकी है, एक अच्छी नौकरी होती जो बहुत धन दे सके, पहनने को अच्छे कपड़े हों और अच्छा खाना भी, और अगर इनके साथ-साथ मैं परमेश्वर में विश्वास भी करता, तो कितना अच्छा होता!” परमेश्वर में विश्वास करने को वे हमेशा बिलकुल अंत में रखते हैं, और परमेश्वर में विश्वास करने के उल्लेख पर वे महसूस करेंगे: “अब परमेश्वर पर इस तरह से  विश्वास करने का अर्थ है कि मैं कुछ खो रहा हूँ। अगर मैं जीवन का कुछ अधिक आनंद ले सकूं, थोड़ा बेहतर खा सकूं और मुझे कोई सताए नहीं, तो क्या यह बेहतर नहीं है? फिर क्यों परमेश्वर मुझे इस तरह से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद नहीं करते हैं? फिर परमेश्वर  मुझे इस तरह से संतुष्ट क्यों नहीं करते हैं?” यह पहले से क्यों कहा गया है कि मनुष्य के हृदय में जो भी चीज होती है वह बुरी है, और वह ईश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं है? मनुष्य का दिल भोजन खाने, कपड़े पहनने, आनंद और मज़े लेने से भरता है। लेकिन इन चीजों का संबंध किससे है? वे दुनिया से संबंधित हैं; वे शैतान से संबंधित हैं। परमेश्वर की यह इच्छा नहीं है कि लोगों को  मात्र इन चीज़ों का आनंद उठाने दिया जाए; जैसा कि बाइबल ने पहले ही कहा  है: “मनुष्य केवल  रोटी से नहीं जीएगा, परन्तु हर वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है।” परन्तु अब मनुष्य केवल परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए जीवित नहीं है, न ही लोग परमेश्वर के वचन को प्राप्त करने के लिए जीवित रहते हैं। उनके पास कई और उद्देश्य हैं, कई चीजें हैं जो वे चाहते हैं। जीवन के बारे में  उनका दृष्टिकोण परमेश्वर के लिए जीवित रहना नहीं है और न ही परमेश्वर के वचन के लिए जीवित रहना, न ही यह जीना  है धर्माचरण  के लिए, या परमेश्वर को संतुष्ट करने, या परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने, या बचाये जाने के लिए। मनुष्य इन बातों को  लक्ष्य नहीं बनाता है, और लोग उस लक्ष्य  से बहुत दूर हो गए हैं। अधिकांश लोग आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए  जीवित रहते हैं, फिर कुछ लोग ऐसे हैं जो श्रेय जीतने के लिए जीते हैं, और यह तो और भी गलत है! “बड़ा लाल अजगर मुझ पर इस हद तक ज़ुल्म करता  है। क्या मुझे अच्छी तरह से नहीं रहना चाहिए? बड़ा लाल अजगर मुझे बहुत अधिक हानि पहुँचाता है, मेरे भाइयों और बहनों को हानि पहुँचाता है और परमेश्वर के परिवार को हानि पहुँचाता है। मुझे कोशिश करनी चाहिए और अच्छी तरह से रहना चाहिए और अंत में मुझे उद्धार प्राप्त होगा । वह इसे दिखा देगा, और यह मेरी जवाबी लड़ाई का एक शक्तिशाली तरीका होगा।”  और फिर वे लोग भी हैं जो अपने दिल में कहते हैं: “ओह, अगर इस समूह के हम लोग जो गंभीरता से परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं, और परमेश्वर का काम हम पर बर्बाद हो गया है, तो हमें शाप दिया जाना चाहिए, और हम  दुनिया के लोगों को अपना चेहरा दिखाने के काबिल न रहेंगे! जो पहले से हमारा मजाक उड़ाते और हमें बदनाम करते हैं, उन लोगों को हम अपने चेहरे दिखाने को और भी कम सक्षम होंगे!” इसका अर्थ है: “हे परमेश्वर, आप मुझे पूर्ण कर दें। यदि नहीं, तो मैं अपना चेहरा कहाँ दिखा सकता हूं? मैं अब किसी से मिलने के लिए सक्षम नहीं रहूंगा।” यह एक सोच है जो कि लोगों में है। क्यों लोग जीते हैं, उनके जीवन के लक्ष्य क्या हैं, जीवन पर उनका दृष्टिकोण क्या है, जीवन के लिए उनका आधार क्या है - इन सब चीजों को पूरी तरह से देखा जा सकता है। कुछ लोग अब सोचते हैं कि उनके पास परमेश्वर के लिए जीवित रहने का कुछ इरादा है और इसके लिए कुछ विशिष्ट अभिव्यक्तियां हैं। वे अपने परिवार को छोड़ सकते हैं और परमेश्वर के लिए खर्च और समर्पण कर सकते हैं। अब वे अपने बच्चे, अपने पति या अपनी पत्नी की चाह नहीं रखते हैं। उन्हें लगता है कि वे युवा हैं लेकिन शादी नहीं करेंगे, और यह परमेश्वर के लिए जीवित रहना माना जा सकता है। सतह पर आपने अपने परिवार को छोड़ दिया है, और आप इस तरह से थोड़ा-सा व्यवहार करते हैं और इस तरह से थोड़ा-बहुत कार्य करते हैं - यह सहयोग का इंसानी पहलू है। लेकिन लोगों के दिलों में जो इच्छाएं होती है, वे ये नहीं हैं। लोग दिन में 24 घंटे जिनके बारे में सोचते हैं वे हैं कौन-सा अच्छा भोजन खाएं, कौन-से अच्छे कपड़े पहनें, कौन-से बढ़िया जूते खरीदें, या अन्य लोगों की चर्चा करना या भविष्य में उनके साथ क्या होगा इस पर विवेचना करना, या एक अच्छा जीवन कैसे जीना। ये वो सारी चीजें हैं जिनके बारे में वे सोचते हैं। और फिर कुछ ऐसे लोग हैं जो विचार करते हैं: “जब मैं बूढ़ा हो जाऊंगा, मेरा कोई परिवार नहीं होगा और मैं बेघर हो जाऊंगा। तब मैं खुशी से कब जी सकूंगा? मुझे ऐसा कब न भुगतना पड़ेगा?” वे हमेशा इन चीजों के बारे में अंदर से परेशान महसूस करते हैं और उनका इतना दबाव महसूस करते हैं कि वे साँस नहीं ले सकते। आप देखते हैं कि जब आप लोग एक साथ मिलकर बैठते हैं, तो इस तरह की स्थिति अक्सर होती है: एक बहन दूसरे के साथ मिल रही है और कहती है, “आप हाल में कैसी रही हैं?” दूसरी कहती है: “मेरी हालत पहले अच्छी नहीं थी, लेकिन मैंने इसे ठीक कर लिया।” बहन कहती है: “तो मुझे बताओ कि तुमने कैसे ठीक किया।” दूसरी फिर उसके साथ मेलझोल बढाती है, अप्रासंगिक बातचीत करते हुए, विषय से भटक कर। यदि कोई भी पर्यवेक्षण के लिए न हो, तो यह मुलाक़ात एक गपशप में बदल जाती है, और कुछ भी हासिल नहीं होता है। मनुष्य में सच्चाई का अधिक प्रकाश नहीं है, सच्चाई का अधिक अनुभव या समझ नहीं है। यहां तक ​​कि जब वे सहभागिता करें भी, तो भी सही विषय पर नहीं पहुंच पाते हैं - यही अभी आदमी का कद है। इस समय ऐसे कई लोग हैं जो कोई परीक्षा नहीं दे रहे हैं या कोई प्रतिकूल परिस्थिति से पीड़ित नहीं है और उनका मानना है कि “मैं अभी सत्य की सचमुच सही तलाश कर रहा हूँ। कम से कम मुझे पता है कि कैसे अनुभव हासिल किया जाए और मैं वास्तविकता के कुछ करीब हूँ। मैं समझ सकता हूँ कि परमेश्वर क्या कहते हैं और उसे मैं प्राप्त भी कर सकता हूँ। चाहे अब जो भी हो, मुझे लगता है कि मैं बेकार नहीं जाऊंगा और न ही परमेश्वर का त्याग करूँगा।” आराम से रह्ने वाले लोग ज्यादातर ऐसा ही महसूस करते हैं। लेकिन वास्तव में आप यह समझ नहीं पाए हैं कि, हालाँकि आप परमेश्वर को छोड़ नहीं सकते हैं, यह ज़रूरी नहीं कि आपका दिल वैसा ही हो। यदि आप वास्तव में पक्का विश्वास दिला सकते हैं कि आप चलते रहेंगे चाहे आपका परिवेश जैसा भी हो, चाहे आपके साथ जो भी हो, चाहे आप किसी भी क्लेश, परीक्षण या पीड़ा से गुजरें, या आपको कोई बीमारी हो जाए, आप उसकी परवाह किए बिना चलेंगे, अपने मूल प्रस्ताव या लक्ष्य की तलाश को बदले बिना, तो आपको अपने रास्ते में से सभी बाधाओं को काट गिराना होगा और अपने दिल से उन सभी चीजों को पूरी तरह से हटाकर शुद्ध कर देने की आवश्यकता होगी जो सच्चाई के अनुरूप नहीं हैं। तभी आप अपनी समस्याओं को हल करने में सक्षम होंगे।

अब कुछ ही लोग कहते हैं: “मैं अपना पूरा जीवन परमेश्वर को समर्पित करता हूँ, कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरा जीवन कितने समय तक रहता है, मैं अंत तक चलूँगा। चाहे परमेश्वर जो भी करें, चाहे वे मुझसे जैसा भी व्यवहार करें, मैं परमेश्वर के वचनों को दृढ़ता से रखूंगा।” क्या आपने ऐसा सोचा है? आपने कभी-कभी इस तरह सोचा भी हो, लेकिन आप अभी भी महसूस करते हैं कि आपके पास उस तरह का कोई संकल्प नहीं है, कि आप इस तरह जीने के लिए पर्याप्त शक्तिशाली नहीं हैं। ये सभी स्थितियां लोगों के दिलों में मौजूद हैं। यदि बाद में कुछ अचानक बदल जाता है, तो आप गिरने के खतरे में पड़ सकते हैं, आप सही मार्ग का त्याग कर सकते हैं, और आप ऐसे व्यक्ति बन सकते हैं जो परमेश्वर की निन्दा करते हों। क्या यह एक खतरा नहीं है? यदि आपके भीतर के अवलोकन और विचारों में कोई परिवर्तन नहीं है, और आपके जीवन के लक्ष्यों में और आपके जीवन-आधार में कोई परिवर्तन नहीं है, तो आप सुरक्षित नहीं होंगे और किसी संकट का सामना कर सकते हैं। क्योंकि हर दिन लोगों के जीवंत विचार होते हैं और उनके दिमाग और दिल उस हद तक जीवित रहते हैं, कि किसी भी समय, वे अपने वातावरण और परिस्थितियों में परिवर्तन का अनुसरण करेंगे। अभी आप यहां बैठे हैं लेकिन शायद अगली बार आप कहीं और भाग जायेंगे और बिना किसी सुराग के गायब हो जाएंगे। परिवर्तन इतनी जल्दी हो सकते हैं! कलीसिया के भीतर कुछ ऐसे लोग हैं जो आज भजन गाएंगे और नृत्य करेंगे, और आंसुओं में भाव-विभोर होकर प्रार्थना करेंगे। लेकिन कल वे गायब हो चुके होंगे, भाग कर कौन जाने कहाँ, शायद सिनेमा, नाच-घर, जुआ घर, दुनिया के महासागरों में गायब हो जाएँ। आप लोग जो आज नेता हैं या मजदूर बन गए हैं, आपको ऐसा लगता है कि आप लोग सुरक्षित हैं और आप लोगों के लिए गिरना मुमकिन नहीं है। कुछ लोग तो यह भी सोचते हैं: “मैं खतरों से गुजर चुका हूँ और मैंने जेल में समय बिताया है। मैंने पीड़ा सहन की है और परीक्षणों का अनुभव किया है और मैं हार कर दूर नहीं भागा हूँ।” ये बातें आपके भाग्य की गारंटी नहीं हैं। वास्तव में, प्रत्येक व्यक्ति हर दिन खतरे में है। कुछ लोगों के साथ अचानक एक दिन कुछ ऐसा होता है जिससे उन्हें लगता है कि वे और नहीं जी सकते हैं, यहाँ तक कि वे मर जाना चाहते हैं। जैसे कोई बहुत बीमार होता हो और आखिरी सांस ले रहा हो। उन्हें लगता है कि जीवन बहुत दर्दनाक है, इसका कोई अर्थ नहीं है और वे मर ही क्यों न जाएँ। मौत भी मुक्त होने का एक तरीका है। क्या यह उनका विचार नहीं है? यदि कोई बुरी बात किसी के साथ नहीं हुई है, तो वे सोचते हैं, “नहीं, मैं नहीं कर सकता! मैं नहीं कर सकता!” लेकिन आप जितना भी सोचते हैं, आप उस भावना को नहीं खोज सकते, और आप कितना भी इस पर चिंतन करें, आप यह नहीं जान सकते कि उस समय वह मानसिकता क्या थी। जब कोई बीमार और भयानक दर्द में हो, तो उन्हें लगता है कि वे इसे सहन नहीं कर सकते। फिर भी बाद में जब वे उस समय की सोचते हैं, वे इसे याद नहीं कर सकते, मानो कि उन्होंने ऐसे किसी दर्द को महसूस किया ही नहीं था; एक बार किनारे पर आ जाए तो कोई और प्रार्थना नहीं करता। लोग जीवित विचारों के साथ जी रहे हैं और वे अपने वातावरण के साथ बदल जाते हैं। इसका मतलब यह है कि हर कोई बड़े खतरे में है, और खतरे के किनारे पर है; आप सुरक्षित नहीं हैं और कोई आश्वासन नहीं है, कुछ पता नहीं कि कब कोई बदलाव आ जाएगा। बाद में, कुछ ऐसे लोग होंगे जो महान यातनाओं या महान परीक्षणों से गुजरेंगे। बेशक, जब आप लोगों पर बाद में परीक्षण आएंगे, तो ये अय्यूब की हद तक नहीं होंगे; कैसे कोई अय्यूब के जैसे कद का हो सकता है? आजकल लोगों को अच्छे लोग नहीं कहा जा सकता, धर्मपरायण तो बिलकुल नहीं। तो जो लोग बाद में आए, वे अय्यूब की तरह परीक्षा का आनंद लेने के हकदार नहीं थे। जिस तरह की परीक्षा अय्यूब ने दी, वह यहोवा के लिए गवाही देने के लिए थी और यह कुछ ऐसा है जो फिर से नहीं होगा। अय्यूब विशेष रूप से इस परीक्षण का आनंद लेने के लिए सौभाग्यशाली थे और उनकी गवाही सम्पूर्ण थी। आजकल लोगों के पास मूल रूप से अय्यूब की तरह विश्वास और मानवता नहीं हैं, उनके पास वह सच्चाई नहीं है जो कि होनी चाहिए, और उनकी भ्रष्ट प्रकृति लगभग इलाज से परे है, इसलिए वे किसी भी परीक्षण के दौरान खड़े कैसे रह सकते हैं? आपको स्वयं को सच्चाई से लैस करने की ज़रूरत है अगर आपको भविष्य में होने वाले परीक्षणों के दौरान खड़े रहने के बारे में जानना है, और यदि आप जानना चाहते हैं कि आपको किस तरह का दृष्टिकोण रखना चाहिए। यदि अब आप खुद को सच्चाई से अच्छी तरह से लैस नहीं करते हैं, तो जब परीक्षण आते हैं, तो आप गंभीर संकट में होंगे, और अफसोस करने के लिए तब बहुत देर हो चुकी होगी।