10. ऑनलाइन गेम खेलने की आदत की व्यथा

जब मैंने कॉलेज की शुरुआत की, मैंने देखा कि अन्य छात्र अपने फोन हाथ में लेकर, हर जगह गेम खेलने में लगे रहते थे: क्लासरूम, हॉस्टल, कैफेटेरिया, लाइब्रेरी, बास्केटबॉल कोर्ट, हर जगह गेम खेला जाता। वे लगातार इन खेलों के बारे में गंदे, हिंसक तरीकों से बातें किया करते और कहते कि उन्हें खेलने में कितना मज़ा आया। एक विश्वासी के रूप में, मुझे लगा कि ऑनलाइन गेम खेलना कोई अच्छी बात नहीं है, इसलिए मैंने ऐसे प्रस्तावों को ठुकरा दिया। सभाओं में भाई-बहनों के साथ परमेश्वर के वचनों को पढ़कर मुझे वाकई संतोष महसूस हो रहा था।

लेकिन बाद में, मुझे पता चला कि अन्य बहुत से छात्र मोबाज़ नाम का गेम खेल रहे हैं, उन्होंने मुझे भी उस गेम के बारे में बताया। मैंने क्लास के समय से बाहर थोड़ा-थोड़ा खेलना शुरू कर दिया, मगर मैं धीरे-धीरे लड़ाई के रोमांच में खो सा गया। मैं न केवल अन्य खिलाड़ियों को मरने और मारने का रोमांच चाहता था, बल्कि लेवल ऊपर होने के बाद मैं उसमें और खोता चला गया। जब भी मेरे पास खाली समय होता, मेरा मन उन सभी किरदारों और मार-धाड़ के विचारों से भर जाता। बात यहाँ तक पहुंच गई कि खाने के दौरान भी मैं और मेरे रूममेट्स गेम की बात करते हुए खो जाते। मैंने खाने-पीने में रुचि खो दी थी। हॉस्टल आते वक्त अपने अगले मैच की रणनीति के बारे में सोचता रहता था, रात में हम सभी इकट्ठा होते और सुबह तक बिना रुके खेलते रहते। मैं बहुत देर तक सोया रहता, मेरे लिए देर से उठना और कक्षा में सो जाना आम बात हो गई थी। पहले से ही, मेरे ग्रेड गिरते जा रहे थे। जैसे-जैसे समय बीतता गया, मैं पूरी तरह से उस काल्पनिक दुनिया में रहने लगा और गेम खेलने के अलावा कुछ भी नहीं करना चाहता था। उससे पहले मैं अपने खाली समय में, बाहर जाकर गतिविधियों में भाग लेता या लाइब्रेरी में पढ़ने जाता था, लेकिन उन खेलों से चिपके रहने के बाद, मैं हॉस्टल में बस गेम खेलने लगा और बाकी सब चीजों में रुचि खो दी। मैं खरीदकर खेलने वाला गेम खेला करता था, तो मैंने बस नए किरदार बनाने पर अपना पूरा गुजारा भत्ता खर्च कर दिया। खाने के लिए भी पैसे नहीं थे, मैंने सहपाठियों और रूममेट्स से पैसे उधार लिए। इससे भी बदतर, मेरा हर चीज़ को देखने का नज़रिया भी बदल गया। मुझे लगता था कि मैं कॉलेज में कुछ उपयोगी चीजें सीख सकता हूँ और शिक्षा प्राप्त कर सकता हूँ, लेकिन ऑनलाइन गेम में इतना खो जाने के बाद, मुझे महसूस हुआ कि वहाँ होने का मतलब बस गेम खेलना है। मेरे गेम खेलने पर लगाम लगाने के लिए मेरे माता-पिता वहां नहीं थे और वो मुझे गुज़रा भत्ता भेजते थे। मैं बुनियादी जरूरतों के बारे में नहीं सोचता था, बस गेम खेल रहा था, मुझे लगा कि कॉलेज ही इतना अधिक गेम खेलने की एकमात्र जगह है।

इतना ही नहीं, मैं परमेश्वर से अधिक से अधिक दूर होता चला गया। जब मैं परमेश्वर के वचनों को पढ़ता तो मैं अपने दिल को शांत नहीं कर पाता था और मेरी प्रार्थनाएँ नीरस हो जाती थीं। मैं किसी भी सभा में पूरी तरह से ध्यान नहीं दे पाता था और कभी-कभी तो जाता भी नहीं था। एक समय था जब मैं अपना कुछ खाली समय परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के लिए उपयोग करना चाहता था, लेकिन सिर्फ आधे घंटे के बाद मैं अपना फोन पकड़ कर उसे घूरता रहता और बिना यह महसूस किए कि मैं क्या कर रहा था और मैं किरदारों और गेम की लड़ाई के विचारों में खो जाता। यह एक नशे की तरह था जिसने मुझे जकड़ लिया था। मैं वास्तव में खुद को रोक नहीं सका, और सोचा, "मैं बस थोड़ा सा खेलूंगा। मुझे अभी परमेश्वर के वचनों को पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। वैसे भी, मैं अगली सभा में कुछ वचन पढ़ लूंगा। मैं पहले ही थोड़ा पढ़ चुका हूँ और गेम खेलना अलग है। अगर मैं गेम में टास्क पूरा नहीं करता, तो मुझे इनाम नहीं मिलते।" यह सोचकर, मैंने परमेश्वर के वचनों को एक तरफ रख दिया और खेलना शुरू कर दिया। एक बार पूरी रात खेलने के बाद, मैंने अगली सुबह की एक सभा को छोड़ दिया। जब भाई-बहनों ने पूछा, मैंने झूठ बोलते हुए कहा कि एक स्कूल का कार्यक्रम था, जिसमें मुझे भाग लेना था, बस मामले को नज़रअंदाज़ कर दिया।

कभी-कभी जब मैं इतना खेलता था कि बुरी तरह थक जाता था, तो मुझे लगता कि मैं अपनी पढ़ाई की उपेक्षा कैसे कर रहा हूँ, मेरे माता-पिता ने अपने खून, पसीने और आंसुओं से जो कुछ कमाया, वह सब बर्बाद कर रहा हूँ। मुझे लगा कि मैं वास्तव में उनके साथ गलत कर रहा हूँ। मैं परमेश्वर के घर आने और परमेश्वर के प्रेम का आनंद लेने के बारे में भी सोचा करता, लेकिन सभाओं में जाने या परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बारे में नहीं सोचता, सिर्फ इसलिए कि मुझे गेम खेलने का शौक था। मैंने भाई-बहनों से भी झूठ बोला। मैं वास्तव में इसके बारे में दोषी महसूस करता था, और यह कि मैं परमेश्वर का बहुत बड़ा कर्ज़दार हो गया था। मैं परमेश्वर के वचनों को पढ़ना चाहता था, लेकिन जैसे ही मैंने देखा कि गेम में एक नया मैच होने जा रहा है, मैं बस खुद को शामिल होने से नहीं रोक सका।

एक दिन मुझे ऐसा लगा कि ऑनलाइन गेमिंग के कारण, मेरी पढ़ाई और कलीसिया जीवन, दोनों को बहुत बड़ा झटका लगा है। मैं बहुत छोटा था, अगर मैं इस तरह के गेम खेलता रहता तो यह बहुत बड़ी बर्बादी नहीं होती? मुझे पता था कि मुझे गेमिंग छोड़ना होगा, मैं उस रास्ते पर नहीं जा सकता। लेकिन जैसे ही मैं गेम को अनइंस्टॉल करने के लिए टैप करने वाला था, मेरा हाथ रुक गया। मैंने उन सभी पैसों के बारे में सोचा जो मैंने उस पर खर्च किए थे, समय और ऊर्जा की तो बात ही क्या करें। मैं इसे आसानी से खत्म करना सहन नहीं कर सकता था, मैंने सब कुछ वक्त पर छोड़ दिया। इस आंतरिक संघर्ष से जूझते हुए, अंत में मैंने इसे अनइंस्टॉल नहीं किया। मैं नहीं जानता कि मैंने कितनी बार परमेश्वर के सामने संकल्प लिया कि मैं इससे छुटकारा पाऊंगा; कितनी बार मैं इसे अनइंस्टॉल करने के लिए मन बनाया, लेकिन मैं अंत में असफल रहा। ऐसा लगता था जैसे मैं वर्षों से अंधेरे में जी रहा हूँ, लेकिन जब मैं प्रकाश की ओर जाना चाहता था, मुझे लगता कि मैं एक ही जगह पर सुरक्षित रूप से बंधा हुआ हूँ और बिल्कुल भी हिल-डुल नहीं सकता। मैं इस पीड़ा से जूझ रहा था और मुझे नहीं पता था कि क्या करना चाहिए। तब मैं परमेश्वर से बार-बार प्रार्थना करता, उससे मेरी मदद करने और मेरा मार्गदर्शन करने को कहता।

परमेश्वर के वचनों के पाठ एक वीडियो था जिसे मैंने एक सभा में देखा था। "हालांकि बढ़ती उम्र के बहुत-से बच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, पर वे कम्प्यूटर गेम्स खेलने और इंटरनेट कैफों में जाने की बुरी आदत को नहीं छोड़ पाते। कम्प्यूटर गेम्स में किस तरह की चीजें होती हैं? उनमें बहुत सारी हिंसा होती है। गेमिंग यानी जुआ—जोकि शैतान की दुनिया है। इन खेलों को बहुत देर तक खेलने के बाद अधिकांश बच्चे कोई असली काम नहीं कर पाते—वे स्कूल या काम पर जाना नहीं चाहते, या अपने भविष्य के बारे में कोई विचार करना नहीं चाहते, अपने जीवन के बारे में विचार करना तो दूर की बात है। आजकल कौनसी चीजें दुनिया के अधिकांश तरुणों के विचारों और आत्माओं को प्रभावित करती हैं? खाना,पीना और गेम्स खेलना। वे जो कुछ भी कहते या सोचते हैं, वह सब अमानवीय है। वे जिन चीजों के बारे में सोचते हैं, उनका वर्णन करने के लिए अब कोई 'गंदा' या 'बुरा' जैसे शब्दों का उपयोग नहीं कर सकता है; इनमें से बहुत-सी चीजें अमानवीय हैं। यदि तुम उनके साथ सामान्य मानवता के बारे में बात करो या उनके साथ सामान्य मानवता से संबंधित किसी विषय पर बात करो, तो वे इसके बारे में सुनना तक सहन नहीं कर पाते, उनकी न तो इसमें कोई रुचि है और न ही वे इसके बारे में कुछ सुनने के हैं, और जैसे ही वे ऐसी बातें सुनेंगे वे अपनी नजरें घुमा लेंगे और इससे चिढ़ जाएँगे। सामान्य मनुष्यजाति के साथ वे आम भाषा या कोई आम विषय साझा नहीं कर पाते, किन्तु जब वे अपनी तरह के लोगों के साथ होते हैं तो उन्हें बात करने के विषय मिल जाते हैं। इनमें से ज़्यादातर विषय गेम्स खेलने, खाने, पीने और मजे करने से जुड़े होते हैं। जो लोग हमेशा इन्हीं विषयों पर बात करते हैं, उनके हृदय इन्हीं चीजों से भरे होते हैं। उनके भविष्य की क्या संभावनाएँ हैं? क्या उनके भविष्य की कोई संभावनाएँ हैं? ... जब लोग लगातार गेम्स खेलते हुए कम्प्यूटर पर अपना समय नष्ट करते हैं तो उनकी इच्छा-शक्ति खत्म हो जाती है और उनका पतन होने लगता है; फिर वे सामान्य मनुष्य नहीं रह पाते। वे इन खेलों की हिंसा और हत्या की भावनाओं से और आभासी दुनिया की दूसरी चीजों से भर जाते हैं। ये खेल उनकी सामान्य मानवता की चीजों को छीन लेते हैं और वे बस इन्हीं खेलों से भर जाते हैं और इन्हीं में लिप्त रहते हैं,और उनका दिमाग भी इन्हीं में खोया रहता है; ये लोग पतनशील हो जाते हैं। अविश्वासी लोग भी इन्हें पसंद नहीं करते, और अविश्वासियों की इस वर्तमान दुनिया में इन तरुणों को कोई सहारा नजर नहीं आता; उनके माता-पिता उन्हें संभाल नहीं पाते, उनके शिक्षक भी उनका कुछ नहीं कर पाते, और किसी देश की शिक्षा प्रणाली में ऐसा कुछ भी नहीं है कि इस चलन के सामने हार मानने के अलावा और कुछ कर पाए। दुष्ट शैतान लोगों को लुभाने के लिए और उन्हें भ्रष्ट करने के लिए ये सब चीजें करता है। जो लोग आभासी दुनिया में जीते हैं, उन्हें सामान्य मानवता की जिंदगी में कोई रुचि नहीं रहती; वे काम या अध्ययन करने की मनोदशा में भी नहीं रहते। उन्हें तो बस आभासी दुनिया में वापस जाने की चिंता रहती है, मानो वे किसी चीज के द्वारा सम्मोहित किए जा रहे हों। जब भी वे ऊब महसूस करते हैं या कोई वास्तविक काम कर रहे होते हैं, तो वे इसकी बजाय गेम खेलना चाहते हैं, और धीरे-धीरे गेम खेलना ही उनकी पूरी जिंदगी बन जाता है। गेम खेलना एक तरह से किसी नशीले पदार्थ का सेवन करना है। एक बार जब किसी को गेम खेलने की लत लग जाती है तो फिर इससे बाहर निकलना और पीछा छुड़ाना बहुत मुश्किल हो जाता है। बच्चा हो या कोई बड़ी उम्र का व्यक्ति, एक बार यह बुरी लत लग जाए तो इसे छोड़ना आसान नहीं होता। ... अगर गेमिंग सामान्य मानवता के लिए जरूरी होती—अगर यह सही रास्ता होता—तो लोग इसे छोड़ क्यों नहीं पाते हैं? वे इस हद तक इससे वशीभूत कैसे हो सकते हैं? इससे तो यही साबित होता है कि यह एक भला रास्ता, एक सन्मार्ग नहीं है। इस या उस चीज के लिए ऑनलाइन सर्फिंग करते रहना, अस्वस्थ चीजें देखना, और गेम्स खेलना—इनमें से कोई भी भला रास्ता नहीं है। ये सही रास्ते नहीं हैं" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए')।

परमेश्वर के वचनों से मेरी वास्तविक स्थिति का पता चला। ऑनलाइन गेम की आदत से मजबूर, मैं नीच और दुष्ट बन गया हूँ। मेरा मस्तिष्क उस लड़ाई और मार-धाड़ के विचारों से भर गया है। ऐसा लगा कि संभवतः इसकी तुलना किसी भी चीज़ से नहीं की जा सकती। उस क्षणिक रोमांच ने मुझे बिल्कुल खाली महसूस कराया और मैं अधिक से अधिक गेमिंग रोमांच पाने को तरस गया। बार-बार ऐसा करना एक दुष्चक्र बन गया। शैतान मेरे दिल को बहकाने के लिए गेम की हिंसा और बुराई का इस्तेमाल कर रहा था। इसने मेरी इच्छाओं को तृप्त करके मेरे विचारों पर काबू कर लिया, मुझे इसकी ऐसी लत लगी कि निकलने का कोई रास्ता नहीं मिला। मैंने गेमिंग के लिए अपनी पढ़ाई को छोड़ दिया, मुझे सामान्य मानवता का ज़रा सा भी अंश नहीं रहा। मैं सभाओं में शामिल नहीं होना चाहता था या परमेश्वर के वचनों को पढ़ना नहीं चाहता था, मैंने भाई-बहनों को भी धोखा दिया। मैं परमेश्वर से भी दूर, बहुत दूर होता चला गया। केवल परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद मैंने जाना कि गेमिंग लोगों को चोट पहुँचाने और निगल जाने के लिए शैतान की चालों में से एक है। वह चाहता था कि मैं सामान्य मानवता और समझ खो दूं, परमेश्वर को छोड़ दूं और विश्वासघात करूं, उसके उद्धार को खो दूं। तब शैतान मुझे पूरा निगल सकता था। मैंने सोचा कि मेरे जैसे ही अन्य कितने युवा ऑनलाइन गेम की आदत से मजबूर हैं। वे खुलकर जिंदगी जीने के बजाय समाज से दूर होने लगते हैं, भलेमानस होने के बजाय आसक्त और विरोधाभासी बन जाते हैं। वे अपने माता-पिता और अन्य लोगों के साथ सामान्य रूप से बातचीत करते हैं, लेकिन फिर गेम के चलते स्कूल जाना छोड़ देते हैं, अपने घरों को छोड़ देते हैं, और अपनी पढ़ाई छोड़ देते हैं। गेमिंग उपकरण खरीदने के लिए, कुछ लोग चोरी करना और लोगों को मारना सीख लेते हैं, अपराध की राह पर चल पड़ते हैं। यह सब दर्शाता है कि शैतान अनगिनत युवाओं को चोट पहुंचाने और निगलने के लिए ऑनलाइन गेम का उपयोग करता है। यह बहुत भयावह और बुरा है! जब मैंने उन सब के बारे में सोचा, तो जाना कि वास्तव में गेम कितना डरावना है। यह एक बुरा रास्ता है जो लोगों को गुमनामी में ले जाता है। जब मुझे इस बात का एहसास हुआ, तो मैंने संकल्प लिया कि मुझे पूरी तरह से ऑनलाइन गेम के बंधन से खुद को मुक्त करना है।

हालाँकि मैं उनसे बचना चाहता था, फिर भी मुझे वास्तविक जीवन में अपनाने के लिए किसी अभ्यास की जानकारी नहीं थी। फिर एक सुबह अपने धार्मिक कार्य के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों में से कुछ पढ़ा "कभी-कभी, परमेश्वर पर निर्भर होने का मतलब विशिष्ट वचनों का उपयोग करके परमेश्वर से कुछ करने को कहना, या उससे विशिष्ट मार्गदर्शन या सुरक्षा माँगना नहीं होता है। बल्कि, इसका मतलब है किसी समस्या का सामना करने पर, लोगों का उसे ईमानदारी से पुकारने में सक्षम होना। तो, जब लोग परमेश्वर को पुकारते हैं तो वह क्या कर रहा होता है? जब किसी के हृदय में हलचल होती है और वह सोचता है: 'हे परमेश्वर, मैं यह खुद नहीं कर सकता, मुझे नहीं पता कि यह कैसे करना है, और मैं कमज़ोर और नकारात्मक महसूस करता हूँ...,' जब उनके मन में ये विचार आते हैं, तो क्या परमेश्वर इसके बारे में जानता है? जब ये विचार लोगों के मन में उठते हैं, तो क्या उनके हृदय ईमानदार होते हैं? जब वे इस तरह से ईमानदारी से परमेश्वर को पुकारते हैं, तो क्या परमेश्वर उनकी मदद करने की सहमति देता है? इस तथ्य के बावजूद कि हो सकता है कि उन्होंने एक वचन भी नहीं बोला हो, वे ईमानदारी दिखाते हैं, और इसलिए परमेश्वर उनकी मदद करने की सहमति देता है। जब कोई विशेष रूप से कष्टमय कठिनाई का सामना करता है, जब ऐसा कोई नहीं होता जिससे वो सहायता मांग सके, और जब वह विशेष रूप से असहाय महसूस करता है, तो वह परमेश्वर में अपनी एकमात्र आशा रखता है। ऐसे लोगों की प्रार्थनाएँ किस तरह की होती हैं? उनकी मन:स्थिति क्या होती है? क्या वे ईमानदार होते हैं? क्या उस समय कोई मिलावट होती है? केवल तभी तेरा हृदय ईमानदार होता है, जब तू परमेश्वर पर इस तरह भरोसा करता है मानो कि वह अंतिम तिनका है जिसे तू अपने जीवन को बचाने के लिए पकड़ता है और यह उम्मीद करता है कि वह तेरी मदद करेगा। यद्यपि तूने ज्यादा कुछ नहीं कहा होगा, लेकिन तेरा हृदय पहले से ही द्रवित है। अर्थात्, तू परमेश्वर को अपना ईमानदार हृदय देता है, और परमेश्वर सुनता है। जब परमेश्वर सुनता है, वह तेरी कठिनाइयों को देखेगा, तो वह तुझे प्रबुद्ध करेगा, तेरा मार्गदर्शन करेगा, और तेरी सहायता करेगा" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'विश्वासियों को संसार की दुष्ट प्रवृत्तियों की असलियत समझने से ही शुरुआत करनी चाहिए')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे एक स्पष्ट मार्ग दिया, जो वास्तव में मेरी कठिनाइयों के बारे में परमेश्वर से प्रार्थना करने का मार्ग था। वह मुझे सुनता, फिर प्रबुद्ध करता और मेरी मदद करता। मैंने तब परमेश्वर से बार-बार प्रार्थना की, खुद को गेमिंग से मुक्त करने के लिए मार्गदर्शन देने के लिए कहा। मैंने परमेश्वर की उस संगति के बारे में सोचा जिसमें कहा गया है कि युवा लोगों को अपने जीवन में बहुत व्यवस्थित होना चाहिए, कार्यक्रम बनाकर, समय पर और योजना के अनुसार काम करना चाहिए। उन्हें रोजमर्रा के जीवन में व्यवस्थित होना चाहिए, बहुत स्वतंत्र और आसक्त होना ठीक नहीं है। जो लोग बहुत स्वतंत्र होते हैं, जो नियमों या प्रतिबंधों के बिना रहना चाहते हैं, उन्हें कुछ नहीं मिलता। जैसा कि परमेश्वर के वचनों में कहा गया, मैंने ऑनलाइन गेम में अपना समय सीमित करने के लिए हर दिन के लिए एक कार्यक्रम तैयार किया। कुछ दिनों तक इस योजना का पालन करने के बाद, मेरा जीवन व्यवस्थित हो गया और हर दिन वास्तव में पूरा लगने लगा। लेकिन मेरी लालसा वास्तव में बहुत तीव्र थी, कुछ दिन पहले की ही बात है जब मैं अपनी देर तक गेम खेलने की इच्छा पर काबू नहीं कर पाया। मुझे डर था कि मैं फिर से आदी हो जाऊंगा, और बुराई में डूब जाऊंगा। मैं जल्दी से परमेश्वर के सामने आया और यह प्रार्थना की: "हे परमेश्वर, मैं गेम के सार और खतरे को जानता हूँ और मैंने इसके कारण होने वाली पीड़ा का स्वाद चख लिया है। मैं अब इन बुराई, शैतानी प्रवृत्तियों का पालन नहीं करना चाहता। मैं उन्हें पूरी तरह से छोड़ना चाहता हूँ, लेकिन मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है। मैं शैतान के प्रलोभनों का विरोध और ऑनलाइन गेमिंग को रोक नहीं सकता हूँ। हे परमेश्वर! मेरा मार्गदर्शन करो।"

उसके बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों के इस अंश को पढ़ा: "तुझे सत्य के लिए कठिनाई उठानी होगी, तुझे स्वयं को सत्य के लिए देना होगा, तुझे सत्य के लिए अपमान सहना होगा, और अधिक सत्य प्राप्त करने के लिए तुझे अधिक कष्ट से होकर गुज़रना होगा। तुझे यही करना चाहिए। एक शांतिपूर्ण पारिवारिक ज़िन्दगी के लिए तुझे सत्य को नहीं फेंकना चाहिए, और क्षणिक आनन्द के लिए तुझे अपने जीवन की गरिमा और सत्यनिष्ठा को नहीं खोना चाहिए। तुझे उन सब चीज़ों का अनुसरण करना चाहिए जो ख़ूबसूरत और अच्छा है, और तुझे अपने जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज़्यादा अर्थपूर्ण है। यदि तू एक ऐसा घिनौना जीवन जीता है, किसी उद्देश्य के लिए प्रयास नहीं करता है, तो क्या तू अपने जीवन को बर्बाद नहीं करता है? ऐसे जीवन से तू क्या हासिल कर पाएगा? तुझे एक सत्य के लिए देह के सारे सुख विलासों को छोड़ देना चाहिए, थोड़े से सुख विलास के लिए सारे सत्य को नहीं फेंकना चाहिए। ऐसे लोगों के पास कोई सत्यनिष्ठा और गरिमा नहीं होती है; उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं है!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान')। इसे पढ़ने से मुझे यह समझने में मदद मिली कि सत्य का अभ्यास करने के लिए देह-सुख को त्यागने और कष्ट सहते हुए कीमत चुकाने के लिए तैयार रहने की आवश्यकता है। मैं अपनी लत या क्षणभंगुर सांसारिक सुखों के कारण सत्य का अनुसरण करने का अपना मौका नहीं गंवा सकता। गेम मुझे जीवन नहीं दे सकते थे, लेकिन धीरे-धीरे मेरी मानवता और आत्मा को खोखला कर देते। गेम ने मुझे खालीपन और दर्द के अलावा कुछ नहीं दिया और मैंने अपना जीवन बर्बाद कर लिया। मैं वास्तव में उस तरह से जीना नहीं चाहता था। एक सृजित प्राणी होने के नाते, मेरी जिम्मेदारी और लक्ष्य सत्य का अनुसरण करना और परमेश्चर की गवाही देने के लिए अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाना है। केवल यही सार्थक है। परमेश्‍वर की इच्छा को समझकर सत्य का अभ्यास करने की मेरी इच्छा प्रबल हो गई। मैंने दृढ़ता से ऑनलाइन गेमिंग को पीछे छोड़ने का संकल्प लिया।

उसके बाद, जब भी मैं गेम खेलना चाहता, मैं तुरंत परमेश्वर के सामने आकर प्रार्थना करने लगता हूँ, उनसे मेरे दिल को राह दिखाने के लिए कहता हूँ ताकि मैं उसके सामने मजबूती से खड़ा रह सकूं। मैंने उसके वचनों को भी पढ़ा, भजन गाये और सभाओं में भाई-बहनों के साथ संगति की। मैंने धीरे-धीरे ऑनलाइन गेम खेलना बंद कर दिया। मुझे यह भी लगा कि यह व्यर्थ की लड़ाई और मार-धाड़ है, यह वास्तव में उबाऊ है, और अब मैंने वाकई ऑनलाइन गेम खेलने की अपनी इच्छा को ख़त्म कर दिया है। मेरा जीवन अधिक व्यवस्थित हो गया और मेरे ग्रेड बहुत बेहतर हो गए। मैं सभाओं में जाने लगा और परमेश्वर के वचनों को पढ़ने लगा, जैसा कि मुझे करना चाहिए, और यहाँ तक कि कलीसिया में कर्तव्य भी निभा रहा हूँ।

बाद में, मेरे कुछ रूममेट ने मुझसे कहा, "अरे यार, हमने बहुत समय से तुम्हें गेम में नहीं देखा है। क्यों न हमारे बीच जल्द ही एक मैच हो जाए?" यह सुनकर मुझे भी थोड़ा खेलने का मन हुआ, और मैंने सोचा, "मैंने इतने लंबे समय से नहीं खेला है। शायद एक बार और?" लेकिन तभी मुझे परमेश्वर के वचन याद आए: "तुम लोगों को जागते रहना चाहिए और समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए, और तुम लोगों को मेरे सामने अधिक बार प्रार्थना करनी चाहिए। तुम्हें शैतान की विभिन्न साजिशों और चालाक योजनाओं को पहचानना चाहिए, आत्माओं को पहचानना चाहिए, लोगों को जानना चाहिए और सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों को समझने में सक्षम होना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 17')। परमेश्वर की प्रबुद्धता के लिए धन्यवाद, मुझे एहसास हुआ कि मेरे रूममेट के पीछे शैतान की चालाक साजिशें थीं जो मुझे मैच खेलने के लिए कह रही थीं। शैतान चाहता था कि मैं फिर से गेम का आदी हो जाऊं, परमेश्वर से दूर रहूँ और उसके साथ विश्वासघात करूं, शैतान के शिविर में वापस आ जाऊं ताकि यह मुझे चोट पहुंचा सके। मैं फिर से इसके झांसे में नहीं आ सकता। मैंने मन ही मन में परमेश्वर से प्रार्थना की, "परमेश्वर, मैं अब और शैतान की बुरी प्रवृत्तियों का पालन नहीं करना चाहता। मैं सत्य का अभ्यास करना चाहता हूँ और देह-सुख का त्याग करना चाहता हूँ।" मैंने उन्हें दृढ़ता से कहा, "नहीं, धन्यवाद, मैं छोड़ चुका हूँ।" यह कहते हुए मुझे स्वतंत्रता की वास्तविक भावना का एहसास हुआ। आज मेरा ऑनलाइन गेम से मुक्त होना पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन की वजह से है। मुझे बचाने के लिए मैं वास्तव में परमेश्वर का आभारी हूँ।

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