सत्य समझने के द्वारा ही एक व्यक्ति विवेक पा सकता है

14 सितम्बर, 2019

यी रैन लेईवु शहर, शैंडॉन्ग प्रांत

कुछ समय पहले, जब कलीसिया ने एक अगुआ को बदला, तो कलीसिया के कार्मिकों के पुनरीक्षण के पीछे का सिद्धांत मेरी समझ में नहीं आने के कारण, एक धारणा मेरे भीतर उठी। जिससे मैं जो देख सकती थी, कि जिस बहन को बदला गया था वह सच्चाई को प्राप्त करने और सच्चाई की संगति करने दोनों में बहुत अच्छी थी, और भ्रष्टता की अपनी स्वयं की अभिव्यक्तियों के बारे में स्पष्ट हो सकती थी। इसलिए मैं कभी नहीं समझ पाई कि किसी ऐसे को जिसने सच्चाई के लिए इतना प्रयास किया हो बदला जा सकता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने भ्रष्टता की अपनी स्वयं की अभिव्यक्तियों के बारे में बहुत अधिक बात की हो, और इसलिए उसके अगुवा ने उसे ग़लत ढंग से लिया हो कि वह एक ऐसी है जो सच्चाई की खोज में नहीं है, और उसे बदल दिया? यदि ऐसा वास्तव में हुआ था, तो क्या सच्चाई की तलाश कर रहे किसी व्यक्ति के लिए प्रशिक्षण के अवसर को बर्बाद नहीं कर दिया गया है?

जैसे ही मैं इस बारे में बहुत उलझी हुई महसूस कर रही थी, तभी मैंने कलीसिया द्वारा कार्य व्यवस्था में जारी किया गया यह अंश पढ़ा: "परमेश्वर का परिवार लोगों को उनके सार के अनुसार प्रशिक्षित करने और उपयोग करने का फैसला करता है। यदि किसी का सार ऐसा है जो सच्चाई का अनुसरण करता है, तब परमेश्वर का परिवार निश्चित रूप से उनके लिए हार नहीं मानेगा; यदि कोई सच्चाई का अनुसरण करने का इच्छुक है, तो वह निःसंदेह बदलाव का अनुभव करेंगे। यदि किसी का सार ऐसा है जो सच्चाई का अनुसरण नहीं करता है, अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह है और जो सही मार्ग पर नहीं चलता है, तो वह प्रशिक्षण के लायक नहीं हैं और न ही परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति को सिद्ध बना सकता है। क्योंकि जिसे परमेश्वर सिद्ध बनाने का अनिच्छुक है, परमेश्वर का परिवार भी उसे प्रशिक्षित नहीं कर सकता है। ...इसलिए लोगों को सँभालने के लिए परमेश्वर के कार्य की आवश्यकताओं और लोगों के सार के अनुसार अवश्य पहुँचा जाना चाहिए। परमेश्वर के साथ कार्य करने और वास्तव में परमेश्वर की सेवा करने का केवल यही एक प्रभावी तरीका है। यदि परमेश्वर के साथ कार्य करने के इस प्रभावी तरीके को काम में नहीं लाया जाता है, तो परमेश्वर का कार्य बाधित होता है और परमेश्वर की इच्छा का पूरी तरह से उल्लंघन होता है" (कार्य व्यवस्था)। इन वचनों को समझने का अधिक से अधिक प्रयास करते हुए, मेरी समझ में आया कि चाहे कलीसिया किसी को पदोन्नत करता था या बदलता था तो इसमें कार्य का एक सिद्धांत था। मैं समझ गई कि यह परमेश्वर के कार्य की आवश्यकताओं और लोगों के सार के अनुसार आगे बढ़ाया जा रहा था, और लोगों का बस आँख बंद करके इच्छानुसार उपयोग नहीं किया था या उन्हें बदला नहीं जा रहा था। इसके अलावा कलीसिया लोगों को अपनी भ्रष्टता व्यक्त करने के आधार पर नहीं बदलता है, बल्कि इसके बजाय उनके सार के आधार पर चीजों को निर्धारित करता है। यदि किसी व्यक्ति का सार ऐसा है जो सच्चाई को तलाशता है, तो कलीसिया निश्चित रूप से उसके लिए हार नहीं मानेगा, ऐसे किसी को भी बिल्कुल भी अनदेखा या बर्बाद नहीं करेगा जो सच्चाई की तलाश कर रहा हो। इसलिए मैं प्रार्थना करने और मार्गदर्शन तलाशने के लिए परमेश्वर के समक्ष गई: "हे परमेश्वर! मुझे पता है कि मुझे शैतान द्वारा बहुत गहराई तक भ्रष्ट किया गया है, अपने अन्दर कई धारणाओं और कई दृष्टिकोणों के साथ जो कभी भी तेरे अनुकूल नहीं हो सकते हैं, मुझे तेरे कार्य की कोई समझ नहीं है। आज, तेरे मार्गदर्शन के तहत, अब मुझे पता है कि चाहे लोगों को चुनना हो, प्रशिक्षित करना हो या उन्हें बदलना हो, इस सब में कलीसिया तेरे कार्य की आवश्यकताओं और लोगों के सार के अनुसार दृष्टिकोण अपनाती है। लेकिन मैं अभी भी उस बहन का सार बिल्कुल नहीं समझी हूँ, जिसे बदला गया था, जिसके परिणामस्वरूप कलीसिया की व्यवस्था के बारे में मेरी एक राय बनी है। मैं तुझसे मेरा मार्गदर्शन और नेतृत्व करने की प्रार्थना करती हूँ; मुझे स्पष्टता से समझने की अनुमति दे ताकि, अब से आगे अपने कार्य में मेरे विचलन और मेरी त्रुटियों की वजह से मैं तेरे कार्य को बाधित न करूँ।"

मेरे प्रार्थना करने के बाद, मैंने कार्य की व्यवस्थाओं पर विचार किया और, परमेश्वर के मार्गदर्शन के तहत, इन वचनों को पढ़ा: "परमेश्वर के वचनों को पढ़ कर, जो सच्चाई का अनुसरण करते हैं वे परमेश्वर के वचनों से अपनी स्वयं की भ्रष्ट स्थिति को माप सकते हैं। परमेश्वर के वचनों के बारे में उनकी संगति सिर्फ परमेश्वर के वचनों को समझने के बारे में बात करने से पूरी नहीं होती है, बल्कि स्व यं को समझने के बारे में बात करने से होती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कौन सी भ्रष्टता व्यक्त की जाती है, वे इसे स्पष्ट रूप से बाहर निकाल सकते हैं ताकि भाई-बहनें कुछ वास्तविकता प्राप्त कर सकें, जबकि उसके साथ-साथ अपनी स्वयं की भ्रष्टता का समाधान करें। यह परमेश्वर के वचनों में लोगों की अगुआई करने का सबसे अच्छा तरीका है। ...वे सभी जो केवल शाब्दिक अर्थ के बारे में बात करते हैं और जो वास्तविकता से विहीन हैं, परमेश्वर के परिवार में अगुआ होने के लायक नहीं हैं। इस तरह के अगुआ और कार्यकर्ता को बदल दिया जाना चाहिए" (कार्य व्यवस्था)। इन वचनों ने मुझे एहसास करवाया कि परमेश्वर के वचनों को पढ़ कर, जो सही मायने में सच्चाई को तलाशते हैं वे परमेश्वर के वचनों से अपनी स्वयं की भ्रष्ट हालत को माप सकते हैं, परमेश्वर के वचनों के सार की सही समझ प्राप्त कर सकते हैं, और अपनी स्वयं की भ्रष्टता की प्रकृति और उसके सार को वास्तव में समझ सकते हैं। उनकी संगति लोगों के लिए असली मार्ग प्रकट कर सकती है और लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकती है। इसके अलावा, दूसरों की समस्याओं को हल करने के साथ-साथ, वे अपनी स्वयं की समस्याओं का समाधान भी कर सकते हैं, और जीवन में स्वयं की प्रविष्टि और अपने स्वभाव में परिवर्तन पर ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं।

इस समय, मैंने उस बहन, जिसे बदल दिया गया था, के आग्रही आचरण और प्रदर्शन को विस्तार से याद करना शुरू किया। यद्यपि अन्य लोगों की समस्याओं को हल करते समय वह तार्किक रूप से मान्य और तर्कसंगत शब्दों का उपयोग करके वाकपटुता से और विस्तार से बातें करती थी, किन्तु उसने जीवन में स्वयं की प्रविष्टि की कठिनाई का समाधान नहीं किया था और, वह बेहद गर्व महसूस करते हुए, यह विश्वास करते हुए कि उसने हर काम को अच्छी तरह से किया है, हमेशा दंभ की स्थिति में रहती थी। वास्तव में, उसका काम गड़बड़ था। यदि उसने जो प्राप्त किया था और संगति की थी उसमें वास्तव में सच्चाई के सार की समझ थी, तो वह स्वयं अपनी सहायता करने के लिए अपनी समझ का उपयोग क्यों नहीं कर सकी थी? जब अगुआ उसकी ग़लत हालत की तरफ इशारा करते, उसके कार्य में विद्यमान गंभीर समस्याओं को गंभीरता से लेते और उनका विश्लेषण करते, और इसके बारे में उसके साथ संगति करते, तो यद्यपि इसे करने के लिए सैद्धान्तिक रूप से अपनी स्वीकृति और इच्छा व्यक्त करते हुए, बाहरी तौर पर वह बार-बार सहमति में अपने सिर को हिलाती थी, तब भी वह एक बार फिर से कार्य के अहित में चीजों को जैसा वह चाहती थी उसी तरह से करते हुए, गुप्त रूप से सिद्धांत के उल्लंघन के अपने पुराने तरीकों पर डटी रहती थी। जब उसके साथ निपटा जा रहा था, तो यद्यपि उसका बाहरी प्रकटन दर्शाता था कि वह बहुत पछतावे से पूर्ण है, किन्तु उसके बाद उसने किसी भी तरह का कोई बदलाव नहीं किया। यद्यपि वह अपनी स्वयं की समझ के बारे में स्वयं बात करती थी और अपनी स्वयं की भ्रष्टता का स्पष्ट रूप से खुलासा करती थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि वह दूसरों से अपनी प्रशंसा करवाती थी, अपने बारे में ऊँचा विचार करवाती थी, लोगों को अपने सम्मुख लाती थी। उसका शुद्ध रूप से चीजों का खुलासा करने का तरीका किसी को कोई भी लाभ नहीं पहुँचा सकता था। यह केवल लोगों को नुकसान पहुँचा और धोखा दे सकता था। ...मैं उसके आग्रही प्रदर्शन से देख सकती थी कि, यद्यपि उसने कई वर्षों तक कार्य किया था और स्वयं को शाब्दिक समझ से बहुत सुसज्जित कर लिया था, किन्तु उसके जीवन के स्वभाव में ज़रा सा भी परिवर्तन नहीं हुआ था। इसके विपरीत, वह और अधिक अभिमानी और घमंडी बन गई थी। केवल अब मुझे एहसास होता है कि वह कोई ऐसी व्यक्ति नहीं थी जो सच्चाई को खोजती थी, न ही कोई ऐसी व्यक्ति थी जो शुद्ध सच्चाई को प्राप्त करती थी या मर्मभेदी ढंग से संगति करती थी। वह निश्चित रूप से प्रशिक्षण के लायक नहीं थी और, यदि उसे उसके पद पर बनाए रखा जाता, तो वह कलीसिया के कार्य को केवल रोके रख सकती थी और अपने भाई-बहनों को नुकसान पहुँचा सकती थी। उसे बदला जाना वास्तव में परमेश्वर की धार्मिकता थी और उसे बचाने का परमेश्वर का एक बेहतर तरीका था। अन्यथा, वह अभी भी अपने स्वयं के बाहरी रूप-रंग से धोखा खा जाती और उसने अपने तरीकों की गलतियों को नहीं देखा होता, अंत में परमेश्वर के दंड में पड़ जाती।

केवल इस मामले के माध्यम से ही मैंने देखा कि मैंने सच्चाई को कितना कम जाना है, केवल कार्य व्यवस्थाओं के शाब्दिक अर्थ और सच्चाई तक अपना ध्यान केन्द्रित रखा है, मेरे पास केवल सैद्धांतिक ज्ञान है। मैं निश्चित रूप से कार्य व्यवस्थाओं में परमेश्वर की इच्छा पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर रही थी, और न ही मुझे सच्चाई की कोई मूलभूत समझ थी। इसलिए अंततः मैं न केवल लोगों के सार को समझने में असमर्थ रही थी, बल्कि इसके विपरीत मैं घमंड से चिंतित थी कि कोई व्यक्ति जो सच्चाई की खोज करता था उसे ग़लत तरीके से बदल दिया गया है।

हे परमेश्वर! मैं तेरे प्रकाशऩ और प्रबुद्धता के लिए तुझे धन्यवाद देती हूँ जिसने मुझे मेरी अकिंचनता, अज्ञानता दिखाई और दिखाया कि मैं कितनी दयनीय थी, जिसने मुझे एहसास करवाया कि सत्य के बिना, कोई भी मामले के सार को पूरी तरह से नहीं समझ सकता है, इसके बजाय वह केवल बाहरी प्रकटन से धोखा खाता है। केवल सत्य को समझकर ही, कोई मूलभूत कार्य को अच्छी तरह से कर सकता है। हे परमेश्वर! आज से ही, मैं सत्य की तलाश में बहुत अधिक प्रयास करना, सभी चीजों में तेरी इच्छा को तलाशना, तेरी आवश्यकता के अनुसार चीज़ों को करना और शीघ्र ही तेरे उपयोग की होना चाहती हूँ।

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मैं परमेश्वर की प्रबुद्धता और रोशनी तो धन्यवाद देती हूँ जिसने मुझे इन बातों को समझने दिया, और फिर इसके बाद मैंने इस पहलु का अभ्यास करने और इसमें प्रवेश करने पर ध्यान केन्द्रित करना शुरू कर दिया।