क्रूर यातना का समय

08 जनवरी, 2021

चेन हुई, चीन

मैं चीन के एक साधारण परिवार में पली-बढ़ी हूँ। मेरे पिता सेना में थे और चूंकि मैं कम उम्र से ही उनके द्वारा ढाली गई थी और उनसे प्रभावित थी, इसलिए मैं यह मानने लगी थी कि एक सैनिक का पेशा और कर्तव्य मातृभूमि की सेवा करना, आदेशों का पालन करना और कम्युनिस्ट पार्टी तथा जनता की निस्वार्थ रूप से सेवा करना है। मैंने खुद सैनिक बनने और अपने पिता के नक्शेकदम पर चलने का संकल्प ले लिया। हालांकि, जैसे-जैसे समय बीता, कुछ खास घटनाएं घटित हुईं, जिससे मेरे जीवन का मार्ग और मेरे प्रयासों की दिशा धीरे-धीरे बदल गई। 1983 में, मैंने प्रभु यीशु के सुसमाचार को सुना। यह पवित्र आत्मा का विशेष मार्गदर्शन था जिसके कारण मेरे जैसा व्यक्ति, जिसे कच्ची उम्र से ही नास्तिकता और चीनी कम्युनिस्ट विचारधारा का ज़हर दिया गया था, प्रभु यीशु के प्रेम द्वारा गहराई से प्रभावित हो गया। सुसमाचार सुनने के बाद, मैंने परमेश्वर में विश्वास के जीवन को अपना लिया—मैंने कलीसिया जाना, प्रार्थना करना और प्रभु की स्तुति में भजन गाना शुरू कर दिया। इस नए जीवन ने मुझे बहुत स्थिरता और शांति दी। 1999 में, मैंने वापस आए प्रभु यीशु—सर्वशक्तिमान परमेश्वर—के अंतिम दिनों के सुसमाचार को स्वीकार किया। परमेश्वर के वचन को लगातार पढ़ने और अपने भाई-बहनों से मिलने तथा संगति करने से, मैंने कई सत्यों को समझ लिया और मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के अत्‍यावश्‍यक उद्देश्य के बारे में जाना। मैंने महसूस किया कि परमेश्वर ने हममें से प्रत्येक को एक महान ध्‍येय और जिम्मेदारी दी है, और इसलिए मैं उत्‍साहपूर्वक सुसमाचार फैलाने के काम में जुट गई।

मगर सीसीपी सरकार के क्रूर उत्पीड़न ने मेरे शांत और खुशहाल जीवन को छिन्‍न-भिन्‍न कर दिया। 2002 के अगस्त में, मसीह में हमारे कुछ सहकर्मियों के बीच सुसमाचार प्रचार करने के लिए मैंने अपने पति के साथ उत्तर-पश्चिम की यात्रा की। एक रात, जब मैं दो भाई-बहनों के साथ बैठक कर रही थी, जिन्होंने हाल ही में अंतिम दिनों के परमेश्वर के काम को स्वीकार किया था, तो मैंने अचानक किसी चीज़ के गिरकर टूटने की आवा़ज़ सुनी और देखा कि डंडे लिये छह-सात पिशाच-से दिखने वाले पुलिसवाले लातों से दरवाजा तोड़कर भीतर घुस आये हैं। एक पुलिसवाले ने मेरी ओर इशारा किया और क्रूर गुर्राहट के साथ कहा, "उसे हथकड़ी पहनाओ!" दो पुलिसवालों ने हमें दीवार के सहारे बिना हिले-डुले खड़े होने का आदेश दिया, जबकि उन्होंने हमलावर डाकुओं की तरह घर में बक्सों और संदूकों को खोलकर तलाशी लेने लगे। उन्होंने ध्यान से ऐसी हर चीज़ की तलाशी ली, जिस पर उन्हें संदेह था कि चीज़ों को छुपाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है, और कुछ ही समय में उन्होंने पूरी जगह को उलट-पुलट कर रख दिया। अंत में, एक पुलिसवाले को मेरी बहन के बैग में एक सुसमाचार पुस्तिका और परमेश्वर के वचन की एक पुस्तक मिल गई और उसने मुझे भयंकर दृष्‍टि‍ से घूरते हुए चिल्लाकर कहा, "क्या तू मरना चाहती है? यहाँ आकर अपना सुसमाचार फैला रही है। यह कहां से आया?" मैंने कोई जवाब नहीं दिया तो वह गुस्‍से से मुझसे बोला, "तो तू नहीं बोलेगी, हूं? हम तेरा मुंह खुलवाएंगे। अब चलो! जहां हम कहाँ जा रहे हैं वहां तू खुद ही बोलेगी!" इसके साथ ही वह मुझे घसीटकर घर से बाहर लाया और पुलिस की गाड़ी में धकेल दिया। उस समय, मुझे एहसास हुआ कि उन्‍होंने सिर्फ छह या सात पुलिसवाले ही नहीं भेजे थे—बाहर की सड़क के दोनों ओर विशेष पुलिस के बहुत से सशस्त्र लोग खड़े हुए थे। जब मैंने देखा कि उन्होंने हमें पकड़ने के लिए कितना बड़ा पुलिसबल तैनात किया है, तो मैं बहुत डर गई और अनायास ही परमेश्वर के मार्गदर्शन और सुरक्षा की याचना करते हुए उससे प्रार्थना करने लगी। कुछ ही समय बाद, मेरे मन में परमेश्वर के वचन का एक अंश आया, "तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम्हारे परिवेश में सभी चीज़ें मेरी अनुमति से हैं, मैं इन सभी की व्यवस्था करता हूँ। स्पष्ट रूप से देखो और तुम्हें दिए गए वातावरण में मेरे दिल को संतुष्ट करो। डरो नहीं, सेनाओं का सर्वशक्तिमान परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारे साथ होगा; वह तुम लोगों के पीछे है और तुम्हारा रक्षक है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 26')। "यह सही है!" मैंने सोचा। "परमेश्वर मेरा स्तंभ है; मुझे चाहे जैसी स्थिति का सामना करना पड़े, सभी चीज़ों का शासक और रचयिता, परमेश्वर, हमेशा मेरे साथ है। मुझे चाहे जिस स्थिति का सामना करना पड़े, उससे पार पाने की राह परमेश्वर मुझे दिखाएगा। क्योंकि, वह भरोसेमंद है और वही है जो सभी चीज़ों पर शासन करता है और उन्‍हें संचालित करता है।" इन बातों को सोचते हुए, मेरा मन फिर से शांत हो गया।

उस रात लगभग दस बजे थे जब मुझे आपराधिक पुलिस ब्रिगेड में लाया गया। मेरी तस्वीर ली गई, और फिर मुझे एक पूछताछ कक्ष में ले जाया गया। मुझे देखकर आश्चर्य हुआ कि वहाँ पहले से ही चार-पाँच क्रूर दिखने वाले गुंडे थे। जब मैं अंदर आ रही थी तो वे मुझे घूर रहे थे। जैसे ही मैं कमरे में दाखिल हुई, उन्होंने शिकार को मारने के लिए तैयार भूखे भेड़ियों के झुंड की तरह मुझे चारों ओर से घेर लिया। मैं बुरी तरह से घबरा गई और बदहवास होकर परमेश्वर से प्रार्थना करने लगी। पहले तो, इन पुलिस के गुंडों ने मुझ पर उंगली भी नहीं उठाई, बस मुझे तीन-चार घंटे तक खड़े रहने का आदेश दिया। मैं इतनी देर तक खड़ी रही कि मेरी टांगें और पैर के पंजे दर्द से अकड़ने और सुन्न होने लगे और मेरा पूरा शरीर थकान से निढाल हो गया। रात के लगभग एक या दो बजे, आपराधिक पुलिस ब्रिगेड का प्रमुख मुझसे पूछताछ करने के लिए आया। मैं घबराहट से कांपने लगी। उसने मुझे घूरकर देखा और मुझसे पूछताछ शुरू करते हुए बोला, "बताओ! तुम कहां की रहने वाली हो? यहाँ तुम किसे जानती हो? तुम्हारा वरिष्‍ठ कौन है? तुम लोगों की सभाएं कहां होती रही हैं? तुम्‍हारे अधीन कितने लोग काम कर रहे हैं?" जब मैंने कुछ नहीं कहा, तो वह गुस्‍से से बौरा गया, मुझे बालों से पकड़ लिया और घूंसे और लातें बरसाने लगा। मुझे बहुत पीटने के बाद भी उसने मुझे और भी कठोरता से मारना जारी रखा। एकदम से मेरे कान बजने लगे जिससे मुझे कुछ भी सुनाई देना बंद हो गया, और ऐसा लगा जैसे मेरा सिर तेज दर्द से फटने वाला है। मैं दर्द से चीखे बिना नहीं रह सकी। संघर्ष के कुछ और क्षणों के बाद, हिलने-डुलने में असमर्थ, मैं फर्श पर लेट गई। प्रमुख ने मुझे फिर से बालों से पकड़ लिया और मुझे घसीटते हुए खड़ा किया, जिसके बाद उन क्रूर गुंडों में से चार-पांच मेरे चारों ओर इकट्ठा हो गए और उन्होंने मुझे लातों-घूंसों से मारना शुरू कर दिया; मैं ज़मीन पर गिर गई, मैं हाथों से अपने सिर को ढँक रही थी, और मैं दर्द से इधर-उधर लोट और तड़प रही थी। पुलिस के ये गुंडे कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे—हर लात और घूंसे में घातक बल था। मुझे मारते हुए वे चिल्ला रहे थे, "तू बोलेगी या नहीं? मुँह बंद रखने की हिम्मत करके तो दिखा! बता दे वरना तू मरेगी!" जब प्रमुख ने देखा कि मैं अभी भी बात नहीं कर रही हूं, तो उसने मुझे टखने में कसकर लात मारी। उसकी हर लात पर मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी हड्डियों में कील ठोंक दी हो, यह बेहद तकलीफदेह था। उसके बाद, वे मुझे तब तक लातों से मारते रहे जब तक कि मुझे ऐसा नहीं लगने लगा कि उन्होंने मेरे शरीर की हर हड्डी को तोड़ डाला है, और मेरे भीतर हो रही भीषण ऐंठनों के कारण मुझे इतना दर्द हुआ कि मैं मुश्किल से सांस ले पा रही थी। मैं साँस के लिए छटपटाती हुई और दर्द के आंसू बहाती हुई जमीन पर पड़ी थी। दिल ही दिल में, मैंने परमेश्वर को पुकारते हुए कहा, "प्रिय परमेश्वर! मैं और नहीं झेल सकती। कृपया मुझे सुरक्षित रखें क्योंकि मुझे डर है कि मैं इस रात से गुज़र नहीं पाउंगी। हे परमेश्वर, मुझे शक्ति प्रदान करो। ..." मुझे नहीं पता कि यातनाएं कब तक चलती रहीं। मुझे बहुत चक्कर आ रहा था और मुझे इतना भयानक दर्द हो रहा था कि मुझे लगा जैसे मेरा अंग-अंग टूट गया हो। दर्द इतना तीखा था कि वास्तव में मेरा पूरा शरीर सुन्न हो गया। पुलिस के एक गुंडे ने कहा, "लगता है अभी भी तेरा जी नहीं भरा। तू ज़रूर बोलेगी!" यह बोलते हुए उसने एक बिजली के हथौड़े जैसी दिखने वाली एक चीज़ उठाई और उसे मेरे माथे पर दे मारा। उसकी हर चोट मुझे अपनी हड्डी के भीतर तक महसूस हुई, और उसके हर वार पर मेरा शरीर सुन्‍न हो जाता था। फिर मैं ढीली पड़ गयी और लगातार कांपती रहती। जब पुलिस के गुंडे ने देखा कि मैं कितनी तकलीफ़ में हूं, तो वह अपने काम से खुश लगा और ठहाके मारकर हंसने लगा। अपनी पीड़ा के बीच, परमेश्वर के वचन ने मुझे मार्गदर्शन व प्रबोधन दिया: "तुझे सत्य के लिए कठिनाई उठानी होगी, तुझे स्वयं को सत्य के लिए देना होगा, तुझे सत्य के लिए अपमान सहना होगा, और अधिक सत्य प्राप्त करने के लिए तुझे अधिक कष्ट से होकर गुज़रना होगा। तुझे यही करना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान')। परमेश्वर के वचन ने मुझे अविश्वसनीय शक्ति दी, और मैंने अपने मन में उस अंश को बार-बार दोहराया। मैंने सोचा: "मैं शैतान के आगे समर्पण करके परमेश्वर को निराश नहीं कर सकती। सत्य को प्राप्त करने के लिए, मैं किसी भी कष्ट को सहन करने का प्रण लेती हूं, और अगर इसका अर्थ मेरी मृत्यु है, तब भी यह इसके लायक होगी और मेरा जीवन व्यर्थ नहीं होगा!" राक्षसों के इस गिरोह ने अगली सुबह तक मुझसे पूछताछ की, लेकिन मुझे प्रोत्साहित करने के लिए परमेश्वर का वचन मेरे पास था, इसलिए मैं उनकी यातना को झेल सकी! अंत में, उनकी सोची हुई अंतिम रणनीति भी काम नहीं आई और वे बेबस होकर कहने लगे, "आप एक साधारण गृहिणी की तरह लगती हैं जिसमें कोई विशेष प्रतिभा नहीं है, तो आपके परमेश्वर ने आपको इतनी जबरदस्त ताकत कैसे दी?" मुझे पता था कि ये पुलिस के गुंडे मुझसे हार नहीं मान रहे, बल्कि वे परमेश्वर के अधिकार और शक्ति के सामने आत्मसमर्पण कर रहे थे। मैंने स्वयं देखा कि परमेश्वर का वचन सत्य है, यह लोगों को अपार शक्ति से भर सकता है, और परमेश्वर के वचन के अनुसार आचरण करने से व्यक्ति मृत्यु के भय को दूर कर सकता है और शैतान को परास्‍त कर सकता है। इस सबके परिणामस्वरूप, परमेश्वर में मेरा विश्वास और भी मजबूत हो गया।

दूसरे दिन सुबह करीब सात बजे प्रमुख मुझसे दोबारा पूछताछ करने आया। जब उसने देखा कि मैं अभी भी बोलने के लिए तैयार नहीं हूँ, तो उसने मुझे एक और धूर्तता भरी चाल से लुभाने की कोशिश की। सादी वर्दी में एक गंजा पुलिसकर्मी अंदर आया, उसने मुझे उठने में मदद की, और मुझे एक सोफे पर बैठाया। उसने मेरे कपड़े ठीक किए, मुझे कंधे पर थपथपाया और चिंता का दिखावा करते सूखी मुस्‍कान के साथ कहा, "खुद को देखिए, इस तरह से तकलीफ झेलने का कोई मतलब नहीं है। बस हमें जानकारी दे दीजिए और फिर आप घर जा सकती हैं। यहाँ रहकर यह सब कष्ट क्यों सहना? आपके बच्चे घर पर आपका इंतजार कर रहे हैं। क्या आप जानती हैं कि आपको इस तरह से पीड़ित होते हुए देख मुझे कितना दुख हो रहा है?" उसके सारे झूठ सुनकर और उस घृणित, बेशर्म चेहरे को देखकर, मैंने गुस्से से दाँत पीसे और मन में सोचा, "तुम सिर्फ एक राक्षस हो जो मुझे धोखा देने के लिए तमाम तरह के झूठ बोलता है। एक मिनट के लिए भी ये न सोचना कि मैं परमेश्वर को धोखा देने वाली हूं। सपने में भी मत सोचना कि मैं कलीसिया के बारे में एक शब्द भी बोलने वाली हूं!" जब पुलिसवाले ने देखा कि मुझ पर कोई असर नहीं हुआ है, तो वह मुझे कामुक ढंग से घूरने लगा अपने हाथ से मेरा शरीर सहलाने लगा। मैं एकदम से उससे दूर जाने लगी, लेकिन उस बदमाश ने मुझे एक हाथ से पकड़ रखा था ताकि मैं हिल न सकूं और फिर उसने अपने दूसरे हाथ से मेरी छाती पकड़ ली। मैं दर्द से चीख उठी और इस आदमी के लिए मैंने असीम घृणा महसूस की; मुझे इतना गुस्सा आ रहा था कि मेरा पूरा शरीर कांप गया और मेरे गालों पर आँसू बहने लगे। मैंने गुस्से से दहकती आँखों से से उसे देखा और और मेरी नज़रों को देखकर उसने मुझे छोड़ दिया। इस व्यक्तिगत अनुभव के माध्यम से, मैंने वास्तव में सीसीपी सरकार की दुष्ट, प्रतिक्रियावादी और क्रूर प्रकृति को देखा। मैंने देखा कि कैसे सीसीपी की संस्था के लिए काम करने वाली "जनता की पुलिस" में वास्तव में बिल्कुल नीच, बेशर्म गुंडे और नीच लोग थे जिनमें ज़रा भी ज़मीर नहीं था! चूंकि मुझे 24 घंटे से पानी की एक बूंद नहीं मिली थी, इसलिए मेरा शरीर खतरनाक रूप से कमज़ोर और जर्जर हो गया था और मुझे यकीन नहीं था कि अब मैं और चल सकूंगी। मैं अचानक दुख और निराशा की भावना से घिर गई। उस समय, मैंने एक कलीसिया के भजन के बारे में सोचा। "मज़बूत इच्छा के साथ बुराई की गर्जना के खिलाफ़ हूं मैं खड़ा। कठिन राह पर, मेरा दिल हो जाता है दृढ़ और मज़बूत। सच्चा प्रकाश करता है मेरा मार्गदर्शन, मैं चलूंगा उसके पीछे। मानव जाति है बहुत क्रूर, परमेश्वर के लिए कहाँ है जगह? शैतानों की शासित भूमि में परमेश्वर पर विश्वास है बहुत मुश्किल। मैं शैतान को त्याग दूंगा, परमेश्वर के पीछे चलूंगा। परमेश्वर से प्यार करता हुआ मेरा दिल, फैलाएगा रोशनी और गर्मी, अंत तक वफ़ादार रहेगा, परमेश्वर को महिमान्वित करने के लिए देगा गवाही। परमेश्वर चाहे जैसे भी मुझे करे शुद्ध, मैं गवाही दूंगा, करूंगा उसे संतुष्ट, उसे संतुष्ट। शैतान मेरे पीछे है पड़ा, मुझे मिलता नहीं कहीं आराम। परमेश्वर की सेवा है स्वर्ग का क़ानून, धरती का सिद्धांत। शैतान मेरा दमन करता है, मैं मसीह के बारे में और ज़्यादा हूं निश्चित। उसकी योजनाएं है शातिर और घिनौनी। मैं नहीं झुकूंगा शैतान के सामने, नहीं जिऊंगा बिना मोल के। मैं सहूंगा सारा दर्द, अंधेरी रातों को गुज़ार लूंगा। मैं पूर्ण जीत में गवाही दूंगा, परमेश्वर के दिल को दूंगा सांत्वना, प्राप्त करूंगा उसकी प्रशंसा। सुबह से पहले रात में धार्मिकता उभर रही है। मृत्यु को देख सामने शैतान आता है परमेश्वर की सेवा करने। परमेश्वर ने की है प्राप्त अपनी महिमा, बनाए हैं विजेता। मैं करता हूं उसकी बुद्धि और धार्मिकता की जय। परमेश्वर की इच्छा पर विचार करते हुए, उसके परिवार में हर तरह से सेवा करती हूं। परमेश्वर से प्यार करता हुआ मेरा दिल, फैलाएगा रोशनी और गर्मी, अंत तक वफ़ादार रहेगा, परमेश्वर को महिमान्वित करने के लिए देगा गवाही। परमेश्वर चाहे जैसे भी मुझे करे शुद्ध, मैं गवाही दूंगा, करूंगा उसे संतुष्ट, उसे संतुष्ट" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'अंधेरे और दमन के बीच उठ खड़े होना')। यह मधुर और शक्तिशाली भजन मेरे लिए बहुत प्रेरणादायी था: ये राक्षस परमेश्वर के विश्वासियों को इसीलिए इस तरह सता रहे थे क्योंकि वे परमेश्वर से नफरत करते हैं। उनका कायरतापूर्ण और दुष्टतापूर्ण लक्ष्य हमें परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने से रोकना, और इस प्रकार परमेश्वर के कार्य को बाधित और नष्ट करना और मानव जाति के उद्धार के अवसर को बर्बाद करना है। इस आध्यात्मिक लड़ाई के इस महत्वपूर्ण क्षण में, मैं बस पड़े रहकर खुद को शैतान के मजाक का पात्र नहीं बनने दे सकती थी। जितना अधिक शैतान मुझे सताता था, उतने ही स्पष्ट रूप से मैं उसके राक्षसी चेहरे को देख सकती थी और उतना ही अधिक मैं उसे तिलांजलि देकर परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना चाहती थी। मुझे विश्वास है कि परमेश्वर विजयी होगा, और शैतान की हार होनी तय है। मैं हार नहीं मान सकती थी और मैं परमेश्वर पर भरोसा करना चाहती थी और उसके लिए एक मजबूत और शानदार गवाही देना चाहती थी।

जब पुलिस को समझ आया कि उन्हें मुझसे काम की कोई जानकारी नहीं मिलने वाली है, तो उन्होंने पूछताछ करना छोड़ दिया और उसी शाम, उन्होंने मुझे एक सुधार केंद्र में पहुंचा दिया। उस समय तक, मुझे इतना पीटा गया था कि मुझे पहचानना कठिन था—मेरा चेहरा सूज गया था, मैं अपनी आँखें नहीं खोल पा रही थी और मेरे होंठ घावों से भरे थे। सुधार केंद्र के लोगों ने एक नज़र मुझ पर डाली और यह देखकर कि मुझे पीट-पीट कर लगभग मार डाला गया है, उन्‍होंने मुझे स्वीकार करने से इनकार कर दिया क्योंकि जो कुछ हुआ था उसकी ज़ि‍म्‍मेदारी वे नहीं लेना चाहते थे। हालांकि, कुछ बातचीत के बाद, आखिरकार मुझे उस शाम लगभग सात बजे अंदर ले लिया गया और एक कोठरी में पहुंचा दिया गया।

उस रात, मैंने गिरफ्तार होने के बाद से अपना पहला भोजन खाया: एक कड़ी, काली, और चीमड़ उबली हुई पावरोटी, जिसे चबाना और निगलना मुश्किल था, और सूखी हुई सब्जियों के सूप का एक कटोरा जिसमें मरे कीड़े तैर रहे थे और गंदगी की एक परत कटोरे की तली में थी। लेकिन इन सबके बावजूद मैंने उस भोजन को तेज़ी से खत्‍म कर दिया। चूंकि मैं एक विश्वासी थी, इसलिए अगले कुछ दिनों में, सुधार अधिकारी दूसरे कैदियों को मेरा जीना दूभर बना देने के लिए उकसाता था। एक बार, हमारी कोठरी के प्रमुख कैदी के आदेश पर उसके मातहतों ने मुझे बालों से पकड़कर और मेरा सिर दीवार से दे मारा। उन्होंने मेरे सिर को दीवार से इतने ज़ोर से टकराया कि मुझे चक्कर आ गया और मैं सीधे देख नहीं पा रही थी। इसके अलावा, रात में वे मुझे बिस्तर पर सोने की अनुमति नहीं देते थे और इसलिए मुझे शौचालय के बगल में ठंडे कंक्रीट के फर्श पर सोना पड़ता था। इतना ही नहीं, जेल के गार्ड मुझसे सुधार केंद्र के नियमों को बोलकर सुनाने के लिए कहते, और अगर मैंने उन्हें गलत सुनाया या भूल गई, तो वे मुझे चमड़े की बेल्ट से मारते थे। लगभग लगातार होने वाली इस अमानवीय यातना और अपमान का सामना करते हुए, मैं कमज़ोर हो गई, और सोचने लगी कि दिन-ब-दिन पिंजरे में बंद पशु की तरह तकलीफ झेलने से तो बेहतर है कि मैं मर जाऊं। कई मौकों पर, जैसे ही मैं अपने सिर को दीवार पर मारकर सबकुछ खत्म कर देने के कगार पर थी, परमेश्वर के वचन मेरा मार्गदर्शन करते हुए कहते, "इन अंतिम दिनों में, तुम्हें परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहना आवश्यक है, और परमेश्वर की कृपा पर रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही मजबूत और सामर्थी गवाही है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे प्रोत्साहन दिया और मेरे दिल को राहत दी। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए मेरी आँखों से आँसू बह निकले। मैंने सोचा कि जब मुझे पुलिस के गुंडों द्वारा बुरी तरह से पीटा जा रहा था, तो परमेश्वर का प्रेम ही था जिसने हर समय मेरा ख़्याल रखा, उसने अपने वचनों से मेरा मार्गदर्शन किया था, और उसने मुझे विश्वास और शक्ति दी थी, और मुझे दृढ़तासे उस भयानक यातना के बीच ज़िंदा रहने दिया था। जब हमारी कोठरी के प्रमुख कैदी के दुर्व्यवहार और गुंडागर्दी और अन्य कैदियों द्वारा उस हद तक यातनाएं दिए जाने के बाद मैं अवसाद की ऐसी हालत में पहुंच गई थी जहां मैं अपने जीवन को समाप्त करने पर विचार कर रही थी, तो परमेश्वर के वचनों ने मुझे एक बार फिर विश्वास और नए सिरे से उठ खड़े होने का साहस दिया। यदि परमेश्वर मेरी निगरानी करते हुए मेरे साथ नहीं रहा होता, तो वे दुष्‍ट पिशाच बहुत पहले ही यातनाएं देकर मुझे मार चुके होते। परमेश्वर के महान प्यार और दया के सामने, मैं अब निष्क्रिय रूप से विरोध करके परमेश्वर के हृदय को दुःखी नहीं कर सकती थी। मुझे परमेश्वर के साथ दृढ़ रहना था और निष्ठा के साथ परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान देना था। अनायास, जब मैंने अपने मन की स्थिति को दुरुस्‍त कर लिया, तो परमेश्वर के कारण एक दूसरा कैदी मेरी ओर से विरोध करने के लिए उठा और उसके और प्रमुख कैदी के बीच खूब लड़ाई हुई। अंतत: प्रमुख कैदी झुक गयी और उसने मुझे बिस्तर पर सोने दिया। परमेश्वर का धन्यवाद। अगर परमेश्वर की दया न होती, तो गीले, ठंडे कंक्रीट के फर्श पर लंबे समय तक सोते रहने से मेरी मौत हो जाती या मेरे कमज़ोर शरीर के कारण मुझे लकवा मार जाता। इस तरह, मैं सुधार केंद्र में दो थका देनेवाले महीनों के दौरान जीवित रहने में कामयाब रही। उस दौरान, पुलिस के गुंडों ने उसी एक बार अच्छे व्यवहार, फिर बुरे व्यवहर की रणनीति का उपयोग करके मुझसे दो बार पूछताछ की। फिर भी, परमेश्वर की सुरक्षा के साथ, मैं शैतान की धूर्त चाल को देखने और उनकी दुष्ट योजना को विफल करने में सक्षम रही। अंत में, उनकी सारी रणनीतियां खत्म हो गईं और उनकी सारी पूछताछ असफल होने के बाद, उन्होंने आखिरकार मुझे तीन साल के कारावास की सज़ा सुनाई और मुझे अपनी सज़ा काटने के लिए दूसरी महिला जेल में भेज दिया।

जेल में पहुँचने के पहले दिन से ही मुझे बेहद थकाऊ शारीरिक श्रम करने के लिए मजबूर होना पड़ा। मुझे दिन में दस घंटे काम करना पड़ता था, और मुझे एक स्वेटर बुनना पड़ता था, या तीस-चालीस कपड़े बनाने होते थे, या हर दिन दस-हजार जोड़ी चॉपस्टिक्स पैक करने पड़ते थे। अगर मैं इन कार्यों को पूरा करने में असमर्थ होती, तो मेरी जेल की अवधि बढ़ा दी जाती। मानो कि ये शारीरिक श्रम पर्याप्त थकाऊ नहीं था, रात में हमारा मनोबल तोड़ने के इरादे से हमें एक तरह के राजनीतिक मत-परिवर्तन में भाग लेने के लिए मजबूर किया जाता, जिसमें हमें जेल के नियमों, कानून, मार्क्सवाद-लेनिनवाद, और माओ त्‍से-तुंग विचारधारा का अध्ययन करने के लिए बाध्‍य किया जाता। जब भी मैं सुधार अधिकारियों को उनकी नास्तिकता से भरी वाहियात बातें करते हुए सुनती, मुझे उल्टी जैसा महसूस होता और उनके घृणित, बेशर्म तरीकों पर शुद्ध नफ़रत महसूस होती। जेल में रहने के पूरे समय, मैं एक रात भी चैन से सो नहीं पाई—हम अक्सर जेल के पहरेदारों की सीटी से आधी रात में चौंककर जाग जाते थे। वे या तो हमें उठाकर बिना किसी स्पष्ट कारण के गलियारे में खड़ा कर देते या हमें आलू, मक्का और चारा उठाकर लाने जैसे काम सौंप देते। हर बोरी का वजन 50 किलोग्राम से अधिक था। सर्दियों की रातों के दौरान, हमें हू-हू करती, हाड़ कंपा देने वाली हवाओं से जूझना पड़ता। हम झुके हुए और लड़खड़ाते हुए एक-एक कदम बढ़ाते, कभी-कभी अपनी पीठ पर लदे बोझ के वजन से ढेर भी जाते। अक्सर, मैं अपने थके हुए शरीर को ढोते हुए रात के दो-तीन बजे अपनी कोठरी में जाती, मैं थककर चूर होती और मेरी आंखें आँसुओं से भर जातीं। ऐसी रातों में, थकान, ठंड और गुस्से के मिले-जुले असर से मैं सो नहीं पाती थी। जब भी मैं सोचती कि मुझे अभी भी तीन साल की कैद और झेलनी है, तो मैं और भी निराशा में डूब जाती और मेरा पूरा शरीर थकावट से सुन्न महसूस करता। परमेश्वर मेरे दुख से भलीभांति परिचित था, और मेरे सबसे कमज़ोर क्षणों में, उसने मुझे उसके वचनों के इस अंश को याद करने के लिए निर्देशित किया, "निराश न हो, कमज़ोर न बनो, मैं तुम्हारे लिए चीज़ें स्पष्ट कर दूँगा। राज्य की राह इतनी आसान नहीं है; कुछ भी इतना सरल नहीं है! तुम चाहते हो कि आशीष आसानी से मिल जाएँ, है न? आज हर किसी को कठोर परीक्षणों का सामना करना होगा। बिना इन परीक्षणों के मुझे प्यार करने वाला तुम लोगों का दिल मजबूत नहीं होगा और तुम्हें मुझसे सच्चा प्यार नहीं होगा। यदि ये परीक्षण केवल मामूली परिस्थितियों से युक्त भी हों, तो भी सभी को इनसे गुज़रना होगा; अंतर केवल इतना है कि परीक्षणों की कठिनाई हर एक व्यक्ति के लिए अलग-अलग होगी" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 41')। परमेश्वर के वचन मेरे दुखित और पीड़ित हृदय के लिए गहरी राहत थे और उनके कारण मैं उसकी इच्छा को समझ सकी। जिस स्थिति में मैं अब थी, वह वास्तविक परीक्षा थी। परमेश्वर यह देखना चाहता था कि क्या मैं इस तरह के कष्टों के बीच उसके प्रति वफादार रहूंगी या नहीं और क्या मैं वास्तव में उससे प्रेम करती थी या नहीं। हालाँकि तीन साल जेल में बहुत लंबा समय था, परंतु मुझे पता था कि मैं अकेली नहीं थी क्योंकि परमेश्वर के वचन मेरा मार्गदर्शन करने के लिए और परमेश्वर का प्रेम मुझे सहारा देने के लिए मौजूद थे। मैं सारे दर्द और कष्ट सहन करने और शैतान पर विजय पाने के लिए परमेश्वर पर भरोसा करूंगी। मैं खुद को डरपोक बनने की अनुमति नहीं दे सकती थी।

सीसीपी सरकार का अंधेरा और बुराई उनकी देखरेख में चलने वाली इस जेल के हर पहलू में उजागर थी। लेकिन परमेश्वर का प्रेम हमेशा मेरे साथ था। एक बार, एक जेल के गार्ड ने मुझे चॉपस्टिक की एक बोरी को पाँचवीं मंजिल तक उठाकर लाने का आदेश दिया। चूंकि सीढ़ियाँ बर्फ से ढकी थीं, इसलिए बोरी के वजन के कारण मुझे बहुत धीरे चलना पड़ रहा था। मगर गार्ड मुझे जल्दी करने के लिए कहता रहा और अपना काम पूरा न कर पाने पर बुरी तरह पीटे जाने के डर से, मैं घबरा गई और जल्दबाजी में फिसलकर सीढ़ियों से नीचे गिर गई और मेरी एड़ी की हड्डी टूट गई। मैं फर्श पर पसरी हुई थी, अपने पैर को हिलाने में असमर्थ थी और हड्डी टूटने से हो रहे तीखे दर्द के कारण मुझे ठंडे पसीने आ रहे थे। मगर गार्ड ने ज़रा भी दिलचस्पी नहीं दिखाई। उसने कहा कि मैं दिखावा कर रही थी और मुझे उठकर काम करते रहने का आदेश दिया। लेकिन मैं खड़े होने में शारीरिक रूप से असमर्थ थी। कलीसिया की एक बहन, जो मेरे जैसे ही जेल की सज़ा काट रही थी, ने देखा कि क्या हुआ था और तुरंत मुझे जेल क्लिनिक में ले गई। क्लिनिक में, मुझे देखने वाले चिकित्सक ने बस मेरे पैर पर पट्टी बांधी, मुझे सस्ती दवा की कुछ गोलियां दीं और वापस भेज दिया। मैं अपने काम के कोटे को पूरा नहीं कर पाऊंगी, इस डर से जेल के गार्ड ने मुझे कोई इलाज करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया, इसलिए मुझे अपने टूटे हुए पैर के साथ काम करना पड़ा। हम जो भी काम करते थे, उसमें बहन मेरी मदद करती थी। चूंकि परमेश्वर के प्रेम ने हमारे दिलों को एक साथ बांध दिया था, जब भी उसे अवसर मिलता था, बहन मुझे प्रोत्साहित करने के लिए मेरे साथ परमेश्वर के वचन पर संगति करती थी। मेरे सबसे कमज़ोर और सबसे मुश्किल क्षणों में यह मेरे लिए एक बहुत बड़ी राहत थी। उस अवधि के दौरान, मुझे नहीं पता कि मैंने कितनी बार इतनी पीड़ा और कमज़ोरी महसूस की कि मैं मुश्किल से उठ पाती थी, और मुझमें मुश्किल से सांस लेने की ताकत थी, और इसलिए कई बार मैं आंसुओं के साथ परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए रजाई में छिप जाती, लेकिन ये दो भजन मुझे हमेशा प्रोत्साहन और संबल प्रदान करते थे: "तुम्हारा परमेश्वर केन्याय, ताड़ना, प्रहार और शब्द-शोधन को स्वीकार करने में सक्षम होना और इसके अलावा, परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार कर पाना, युगों से पहले ही परमेश्वर ने पूर्वनिर्धारित कर दिया था और इस प्रकार जब तुम्हें ताड़ना दी जाए तो तुम्हें बहुत व्यथित नहीं होना चाहिए। तुम लोगों में जो कार्य किया गया है और तुम्हें जो आशीर्वाद दिए गए हैं, उन्हें कोई नहीं ले सकता और जो तुम लोगों को दिया गया है, वह कोई भी नहीं ले जा सकता। धार्मिकलोग तुम लोगों के साथ तुलना में नहीं ठहर सकते। तुम लोगों के पास बाइबल में महान विशेषज्ञता नहीं है और तुम धार्मिक सिद्धांतों से सुसज्जित नहीं हो, पर चूँकि परमेश्वर ने तुम्हारे भीतर कार्य किया है, तुमने सारे युगों में अन्य किसी से ज़्यादा प्राप्त किया है—और इसलिए यह तुम्हारा सबसे बड़ा आशीर्वाद है" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'तुम परमेश्वर की इच्छा को निराश नहीं कर सकते')। "बहुत से उतार-चढ़ाव हैं राज्य के मार्ग में। जीवन और मृत्यु के बीच, यातना और आँसुओं के बीच मँडराऊँ मैं। बग़ैर परमेश्वर की सुरक्षा के, कौन पहुँच सका यहाँ तक? हमारे जन्म की योजना बनाई उसने अंत के दिनों में; मसीह का अनुसरण करते हैं, ख़ुशकिस्मत हैं हम। परमेश्वर इंसान बना दीनता से, झेल रहा शर्मिंदगी बहुत। इंसान कैसे हुआ मैं, गर प्रेम न करूँ परमेश्वर से? ... न मलाल होगा अनुसरण करने, गवाही देने में क्योंकि प्रेम है मुझे परमेश्वर से। हालाँकि कमज़ोर हूँ, नकारात्मक हूँ, आँसुओं में अब भी प्यार है मुझे परमेश्वर से। दुख सहता हूँ, उसे अपना प्यार देता हूँ, ताकि शोक न हो फिर कभी उसे। परीक्षण में तपना, है जैसे आग में सोने का तपना। सोने-सा तपा हुआ है दिल मेरा; कैसे न दूँ मैं परमेश्वर को दिल अपना? मुश्किल है राह स्वर्ग की हालाँकि, बहुत से आँसू होंगे राह में, प्रेम करूँगा सदा परमेश्वर से, न मलाल करूँगा" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में 'बिना पश्चाताप के परमेश्वर से प्रेम करने का गीत')। परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर के प्रेम ने मुझे निराशा की गहराई से बचाया और, बार-बार, मुझे जीवित रहने की हिम्मत दी। पृथ्वी पर इस ठंडे, अंधेरे नरक में, मैंने परमेश्वर के प्रेम की गर्मजोशी और सुरक्षा का अनुभव किया, और मैंने जीवित रहने का दृढ़ निश्चय किया ताकि मैं परमेश्वर के प्रेम का बदला चुका सकूं। चाहे मैं कितना भी कष्ट सहूं, मुझे आगे बढ़ते रहना था; चाहे मेरी एक ही सांस बची हो, मुझे परमेश्वर के प्रति वफादार रहना था। कैद के अपने तीन साल के जीवन में, मैं सबसे ज़्यादा गहराई से तब प्रभावित हुई जब मेरी बहन ने मुझे परमेश्वर के वचन के कुछ हस्तलिखित पन्ने दिए। शैतानों द्वारा चलाई जा रही जेल में, जहां किसी महल से भी ज़्यादा सख्त पहरा था, वहां मैं परमेश्वर के वचन को पढ़ने में सक्षम थी, यह वास्तव में परमेश्वर द्वारा मुझसे किए जा रहे असीम प्रेम और दया का प्रमाण था। परमेश्वर के इन्हीं वचनों ने मुझे प्रोत्साहित किया और मार्गदर्शन दिया, जिससे मैं उन सबसे कठिन समयों को झेल सकी।

सितंबर, 2005 में मेरी सज़ा समाप्त हो गई और मैं आखिरकार जेल के काले दिनों को पीछे छोड़ सकी। जेल से बाहर आकर मैंने एक गहरी साँस ली और परमेश्वर के प्रेम और सुरक्षा के लिए अपने हृदय की गहराई से परमेश्वर को धन्यवाद दिया, जिसके कारण मैं अपनी जेल की सज़ा के दौरान जीवित रह सकी थी। सीसीपी सरकार द्वारा गिरफ्तार किए जाने और सताए जाने के अपने व्यक्तिगत अनुभव के कारण, अब मुझे पता है कि क्या धार्मिक है और क्या बुरा है, क्या अच्छा है और क्या दुष्टतापूर्ण है, और क्या सकारात्मक है और क्या नकारात्मक है। मैं जानती हूं कि मुझे किस चीज़ का अनुसरण करने के लिए सबकुछ छोड़ देना चाहिए और किस चीज़ को मुझे घृणा और धिक्कारपूर्वक अस्वीकार करना चाहिए। इस अनुभव के माध्यम से, मुझे वास्तव में पता चला कि परमेश्वर का वचन परमेश्वर का अपना जीवन है और इसमें अलौकिक शक्तियां निहित हैं जो मनुष्य के जीवन की प्रेरणा स्रोत हो सकती हैं। जब तक मनुष्य परमेश्वर के वचन के अनुसार जीता है, तब तक वह शैतान की सभी शक्तियों पर काबू पाने में सक्षम है और अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में भी विजयी हो सकता है। परमेश्वर का धन्यवाद!

क्या आप जानना चाहते हैं कि सच्चा प्रायश्चित करके परमेश्वर की सुरक्षा कैसे प्राप्त करनी है? इसका तरीका खोजने के लिए हमारे ऑनलाइन समूह में शामिल हों।

संबंधित सामग्री

बन्धनों को उतार फेंकना

बहन मोमो हेफि शहर, एन्हुई प्रान्त परमेश्वर पर विश्वास करने से पहले, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि मैं क्या करती थी, मैं कभी पीछे रहना नहीं...

हटाए जाने के बाद

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर हर एक व्यक्ति में कार्य करता है, और इससे फर्क नहीं पड़ता है कि उसकी विधि क्या है, सेवा करने के...