अच्छे इरादों के द्वारा अब आगे से मेरी आँखों पर पट्टी नहीं बाँधी जाएगी

18 सितम्बर, 2019

मेंग यू पिंगडिंगशेन शहर, हेनान प्रान्त

एक बार अपने कर्तव्य को निभाते वक्त, मैंने ध्यान दिया कि एक भाई अपनी बहनों को प्रसन्न करने का प्रयत्न कर रहा था, जो मेरी नज़रों में उसके स्वभाव के बुरे पहलू का प्रदर्शन था। मैंनेइन चीज़ों के विषय में उसे स्मरण दिलाने हेतु किसी अवसर को खोजने का निर्णय लिया। दिन गुज़रते गए और मैंने ध्यान दिया कि कर्तव्य के प्रति उसका प्रदर्शनकम फलदायी हो गया−जो कि उसके विषय में मेरे पूर्व आँकलन का प्रमाण था। अतः मैंने उसके साथ आमने-सामने बात करने का निर्णय लिया। हालाँकि, जब हमने इस मामले पर थोड़ी चर्चा की, तो उसने कठोरता से मेरी सभी टीका-टिप्पणियों को नकार दियाऔर कठोरता सेजवाब दिया कि मैं आलोचनात्मक हूँ। उसने कहा कि, "इन सभी वर्षों में, जब भी आप मुझसे बातचीत करते हैं, तोआप मुझे दूसरों कोनीचाजताने वाली प्रवृत्तिमें उपदेश देते हैं, और आज आप उसीदूसरों को नीचा जताने वाले ढंग सेसे बात करते हैं...।" बातचीत निष्फलसे भी बदतर हो गई−यह सम्पूर्ण असहमति में टूट कर बिखर गई। उसकी प्रतिक्रिया ने मुझे एक कड़वे नतीजे पर पहुंचाया, यह सोचते हुए कि: "मैंने सहायता करने के लिए बातचीत की थी, न कि आपकी कमियों को उजागर करके आपको लज्जित करने के लिए। सुनने के बजाए, आपने मुझ में गलतियों की खोज की और मुझ परदूसरों को नीचा जतानेका दोष लगाया। बहुत अच्छा!मैं आपको अकेला छोड़ दूंगा। तौभी, मेरे इरादे अच्छे थे, और आपकी अस्वीकृति, केवल यह दिखाती है कि आप सत्य की खोज नहीं करते हैं।" तब से, मैंने अपने आपको हमेशा ऐसे व्यक्ति के रूप में माना है जो सही था, यह सोचते हुएकि वह भाई ही था जो गलत था। हालाँकि, लोगों से व्यवहार करने, चीज़ों एवं वस्तुओं से निपटनेके ज़रिए जिन्हें परमेश्वर ने मेरे आस-पास रखा थामैंने हाल ही में अपने स्वयं के बारेमें ज्ञान प्राप्त किया।

कई दिनों पहले, कलीसिया ने मेरे युवा भाइयों में से एक को एक नया कार्य सौंपा। वह एक ख़राब स्थिति में हुआकरता था, किन्तु इंतज़ाम के बाद से, वह एक नए मनुष्य में रूपान्तरित हो गया, जो मन में अधिक ऊर्जावान और वचन में अधिक आत्मविश्वासी, था। एक दिन, उसने एक ऐसेअंदाज़, अभिव्यक्ति, और ढंगसेमुझ से बात की, जिसने मुझे बहुत चिढ़ा दिया। मैं जानता था कि उसने परमेश्वर की इच्छा का संवादकिया था और मेरे विषय में सच्चाई से बोला था, किन्तु मैं बस उसे सुन नहीं सकता था, जो उसने कहा उसे स्वीकार करने की तो बात ही छोड़ दीजिए। जैसे ही मैं भड़कने वाला था, कि मैंने अचानक ही उसमें अपने आपको देखा और उस अंदाज़ एवं हाव भावअभिव्यक्तिकास्मरण किया जिसे मैंने कई महीनों पहले उपयोग किया था जब मैंने अपने भाई के साथ बात की थी। कोई आश्चर्य नहीं कि मुझे दूसरों को नीचा जताने वाले के रूप में माना गया था। जो उसने महसूस किया वह निष्कपटथा, मैंने अब वैसी हीचिढ़ का एहसास किया जैसी उसने मुझ से अनुभव की थी—किसी मरी हुई मक्खी को खाने के घिनौने एहसास के समान। परमेश्वर ने इस सच्चाई को देखने हेतु मुझे समर्थ बनानेके लिए ही ऐसे वातावरण का इंतज़ाम किया: अच्छे इरादेइरादोंकिन्तु एक अपरिवर्तितस्वभाव वाले मनुष्य के हृदय मेंपरमेश्वर के लिए कोई स्थान नहीं होता है, इसलिए, जो वहप्रगट करताहै वह स्वाभाविक है, और उसके शैतानी स्वभाव का मूर्त रूप है। उसी वक्त, मैंने मसीह की संगति से कुछ स्मरण किया: "आत्म-चिंतन और स्वयं को जानने की कुंजी है: जितना अधिक तुम महसूस करते हो कि तुमने किसी निश्चित क्षेत्र में अच्छा कर लिया है या सही चीज़ को कर लिया है, और जितना अधिक तुम सोचते हो कि तुम परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट कर सकते हो या तुम कुछ क्षेत्रों में शेखी बघारने में सक्षम हो, तो उतना ही अधिक उन क्षेत्रों में अपने आप को जानना तुम्हारे लिए उचित है, और यह देखने के लिए कि तुम में कौन सी अशुद्धियाँ हैं और साथ ही तुममें कौन सी चीजें परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट नहीं कर सकती हैं उतना ही अधिक उनमें गहन परिश्रम करना तुम्हारे लिए उचित है” ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने पथभ्रष्‍ट विचारों को पहचानकर ही तुम स्‍वयं को जान सकते हो')। इस से, परमेश्वर का आशय मनुष्यों को यह सिखाना है कि वे अपने वचनों एवं कार्यों में शुद्धता की कमी को समझें। क्योंकि मनुष्य स्वाभाविक रूप से विद्रोही और शैतानी विषों से भरे हैं, उनके कार्यकलाप, जब तक सत्य के द्वारा सही न किये जायें, स्वाभाविक तौर पर परमेश्वर के प्रति विरोधी होते हैं। ऐसे लोग जो सोचते हैं कि उनका व्यवहार सत्य के अनुरूप है और निन्दा से परे है, वे वास्तव में अपने स्वभाव में अपरिवर्तितहैं, और उन्हें अब तक परमेश्वर के द्वारा सिद्ध नहीं किया गया है। वे अपने भीतरी सार के सम्बन्ध में अभी भी परमेश्वर का विरोध कर रहे हैं और वे अपने शैतानी स्वभाव को प्रगट कर रहे हैं। मनुष्यों में बहुत सीअशुद्धताएं हैं जिनका विश्लेषण, पहचान और सम्बोधित किए जानेकी आवश्यकता है। अब जब मैं उस भाई के साथ अपने संवाद की ओर मुड़कर देखता हूँ, तो मैंने अपने अच्छे इरादों के द्वारा अपनी सत्यता को न्यायोचित ठहराया था, किन्तु मैं इस बात पर ध्यान देने में असफलरहा था था कि मैंनेअपनी बातचीत में एक गलत रुख अपनाया था। मैंने अपने आपको सत्य के स्वामी के रूप में रखा था, ऐसा व्यक्ति जो यह बता सकता है कि अन्य लोग सामान्य रूप से व्यवहार कर रहे हैं या नहीं, और जो सिद्धता से परख सकता है; मैंने स्वीकृति के लिए अपने श्रोताओं पर कड़ा दबाव डाला और असहमति के लेशमात्र चिन्ह पर "सत्य को नहीं खोजने वाला" के रूप में उन्हें वर्गीकृत किया। मैंने क्या प्रगट किया है? अहंकार, रूखापन, उत्पीड़न, अनुशासन—शैतान का घृणास्पदएवं घिनौना स्वभाव। क्या जो कुछ मैंने प्रगट किया है और असंख्य राजनैतिक आन्दोलनों में बड़े लाल अजगर के द्वारा जबरन बढ़ाये गए राजनैतिक उत्पीड़न के बीच कोई अन्तर है? बड़ा बड़ेलाल अजगर ने जब लोगों पर दोष स्थापित किए और उन्हें क्रूर दमन के अधीन किया तो उसने अपने स्वयं के इरादों के अलावा किसी और चीज़ पर भरोसा नहीं किया। इससे पहले कि मैं अपने भाई के साथ बात करता मैंने सचमुच में परमेश्वर से प्रार्थना नहीं की या उसके मार्गदर्शन की खोज नहीं की, न ही अपनीपिछली धारणाका उपयोग करने के पहले मैंने इस बात की पुष्टि कि वह वाकई में गलत था या नहीं, और उसके निष्फलप्रदर्शन का ज़िम्मेदार ऐसे अस्तित्व को ठहराया जो बुरे के प्रभाव के अधीन था, और दोषारोपण के विषय में उसकी स्वीकृति के लिए कड़ाई से दबाव डाला। अब मैं एहसास करता हूँ कि मेरा अंतर्निहित स्वभाव उस बड़े लाल अजगर के समान ही है—मेरी हर हरकत, मेरा रूप और बोलने के ढंगसभी से उन अहंकारी स्वभावोंकीदुर्गन्ध आती थी जो आमतौर पर बड़े लाल अजगर में प्रगट होते हैं। मैं अपने सड़े हुए स्वभाव के साथ किस प्रकार मनुष्यों के लिए लाभकारी हो सकता हूँ? पवित्र आत्मा किस प्रकार मेरे जरिए कार्य कर सकता था? उसके कार्य के बिना, मैं अपने संवादसेकिस प्रकार फल उत्पन्न करने की अपेक्षा कर सकता हूँ? अब मैं देखता हूँ कि वार्तालाप निरर्थक था, सत्य के विषय में उस भाई की अस्वीकृति के कारण नहीं, किन्तु इसलिए क्योंकि मैंने परमेश्वर को अपने हृदय में स्थान नहीं दिया और मैं परमेश्वर के सामने एक सही इंसान नहीं था। जो कुछ मैंनेप्रगट किया उससे न केवल परमेश्वर के द्वारा, बल्कि मनुष्यों के द्वारा भी घृणा की गई थी।

परमेश्वर के वास्तविक कार्य के कारण, मैं स्वयं को जानता और समझता हूँ कि यदि मनुष्य स्वभावमें नहीं बदलते है, तो उऩके पासशैतान के स्वभाव को प्रगट करने के अलावाकोई विकल्प नहीं है भले ही वे सोचें कि उनके पास अच्छे इरादे और उचित आचरणहै, और तब उन्हें अपने आपको समझना चाहिए। अब से, मैं अपने जीवन के स्वभावों में परिवर्तनों पर ध्यान केन्द्रित करने, स्वयं को जानने और अपने अंतर्निहित स्वभाव को बदलने, ऊपरी झलक से अनुमान लगाने से रुकने, जब मेरे पास अच्छे इरादे होते हैं तब स्वयं में अवगुण को देखने से रोकने की प्रवृत्ति से परहेज करने, हर एक चीज़ में स्वयं को जानने का प्रयास करने, स्वभाव में परिवर्तनों को हासिल करने और परमेश्वर के हृदय को राहत देने की कोशिश करूंगा।

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