परमेश्वर का न्याय शुद्धिकरण और उद्धार के लिए है या निंदा और विनाश के लिए?

26 दिसम्बर, 2021

जैसे-जैसे आपदाएँ पूरे विश्व में फैल रही हैं, प्रभु के विश्वासी दम साधे प्रभु यीशु के बादल पर आने का इंतज़ार कर रहे हैं ताकि वह आकर उन्हें विपत्तियों से बचाकर मिलने के लिए आकाश में ले जाए। लेकिन अब तक उन्होंने प्रभु यीशु को बादल पर उतरते नहीं देखा है, बल्कि, चमकती पूर्वी बिजली लगातार गवाही दे रही है कि वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर देहधारी होकर वापस आ गया है, इंसान को शुद्ध करने और बचाने की खातिर अंत के दिनों का न्याय-कार्य करने के लिए सत्य व्यक्त कर रहा है। यह कई लोगों के लिए आश्चर्यजनक है। उन्हें लगता है, "प्रभु को पहले विश्वासियों को आकाश में उठाना चाहिए। पहले हमें आपदाओं से बचाना ज़रूरी है। अंत के दिनों में न्याय-कार्य करने के लिए परमेश्वर सत्य क्यों व्यक्त करेगा? हम सभी को हमारे पापों के लिए क्षमा कर दिया गया है और परमेश्वर ने हमें धार्मिक मान लिया है, तो फिर उसके न्याय की क्या आवश्यकता है?" अधिकांश लोगों का मानना है कि अंत के दिनों में, परमेश्वर के न्याय का लक्ष्य अविश्वासी होंगे, न्याय का मतलब है निंदा और विनाश, और जिनके पाप क्षमा कर दिए गए हैं, उनका न्याय करने की आवश्यकता नहीं होगी। तो फिर, इंसान के लिए परमेश्वर का न्याय उसके शुद्धिकरण और उद्धार के लिए है या निंदा और विनाश के लिए? आइए आज इसी पर चर्चा करते हैं।

लेकिन इससे पहले हम, इस पर विचार कर लेते हैं कि क्या अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय का बाइबल में कोई आधार है। वास्तव में, इसका उल्लेख बाइबल की कई भविष्यवाणियों में किया गया है, और सबसे महत्वपूर्ण बात, प्रभु ने खुद भविष्यवाणियाँ की हैं : "जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:48)। "पिता किसी का न्याय नहीं करता, परन्तु न्याय करने का सब काम पुत्र को सौंप दिया है। ... वरन् उसे न्याय करने का भी अधिकार दिया है, इसलिये कि वह मनुष्य का पुत्र है" (यूहन्ना 5:22, 27)। "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। "सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर : तेरा वचन सत्य है" (यूहन्ना 17:17)। प्रकाशितवाक्य में भी लिखा है, "फिर मैं ने एक और स्वर्गदूत को आकाश के बीच में उड़ते हुए देखा, जिसके पास पृथ्वी पर के रहनेवालों की हर एक जाति, और कुल, और भाषा, और लोगों को सुनाने के लिये सनातन सुसमाचार था। उसने बड़े शब्द से कहा, 'परमेश्‍वर से डरो, और उसकी महिमा करो, क्योंकि उसके न्याय करने का समय आ पहुँचा है" (प्रकाशितवाक्य 14:6-7)। क्या ये बहुत स्पष्ट नहीं हैं? प्रभु मनुष्य के पुत्र के रूप में देह में लौटकर, अंत के दिनों में न्याय-कार्य करने के लिए सत्य व्यक्त करता है। इसमें कोई शक नहीं है। इन भविष्यवाणियों में लिखा है "जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा।" और "वह तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा," ताकि लोग साफ़ तौर पर देख सकें कि परमेश्वर अंत के दिनों में मनुष्य का न्याय करने, उसे शुद्ध करने, सभी सत्यों में ले जाने, इंसान को पाप से बचकर परमेश्वर द्वारा बचाए जाने के लिए सत्य का उपयोग करता है। 1 पतरस 4:17 कहता है, "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए।" इसका अर्थ है कि अंत के दिनों में, परमेश्वर अपने घर से शुरू होने वाला न्याय-कार्य करता है, यानी यह उन सभी से शुरू होगा जिन्होंने अंत के दिनों के परमेश्वर के न्याय को स्वीकार लिया है। परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय का यही अर्थ है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार करने वालों को परमेश्वर के वचनों का न्याय स्वीकारना चाहिए, वे शुद्ध होकर ही उसके राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार करने का दावा करते हैं, लेकिन न्याय के द्वारा शुद्ध नहीं हुए हैं, उन्हें आखिरकार हटा दिया जाएगा और वे आपदाओं में नष्ट हो जाएँगे। आपदाओं द्वारा अविश्वासियों से निपटा जाएगा क्योंकि जो परमेश्वर के न्याय को अस्वीकार करेंगे, वे कभी शुद्ध नहीं हो सकते या उद्धार नहीं पा सकते। उन्हें निंदित करके नष्ट कर दिया जाएगा। इससे हम देख सकते हैं कि अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय-कार्य यथासंभव इंसान को बचाने के लिए है। चाहे वे प्रभु के विश्वासी हों या न हों, अगर वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय को स्वीकार करके शुद्ध हो जाते हैं, तो परमेश्वर उन्हें बचा लेता है। और जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय कार्य को अस्वीकार कर देते हैं उन्हें निंदित करके हटा दिया जाएगा, और वे आपदाओं में जा गिरेंगे। परमेश्वर के न्याय-कार्य के परिणाम को देखते हुए, क्या इसकी तुलना निंदा और विनाश से करना सही है? यह एक बड़ी गलती है। विश्वासियों को राज्य में ऊपर ले जाने के लिए परमेश्वर का कार्य न्याय और शुद्धिकरण के ज़रिए पूर्ण उद्धार द्वारा किया जाता है। क्या यह अत्यंत सार्थक नहीं है? तो फिर इतने सारे लोग इसे देख क्यों नहीं पाते? यदि परमेश्वर का न्याय लोगों की निंदा करके उन्हें दण्ड देना होता, तो फिर उस काम का महत्व ही क्या रह जाता? परमेश्वर सीधे आपदाओं की बारिश करके लोगों का सफ़ाया कर सकता था। अलग से परेशानी क्यों उठाता? बहुत से लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय-कार्य के बारे में सुनकर भी उस पर गौर नहीं करते, बल्कि सीधे उसकी आलोचना और निंदा कर देते हैं। क्या यह अहंकार नहीं है? प्रभु के विश्वासी बाइबल की आराधना करते हैं, उसे हर चीज़ का आधार मानते हैं। वे समझ क्यों नहीं पाते कि परमेश्वर के अंत के दिनों का न्याय-कार्य पूरी तरह उसी के अनुरूप है? अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा न्याय-कार्य करने के बारे में बाइबल में बहुत-सी भविष्यवाणियाँ हैं। वे उन भविष्यवाणियों पर ध्यान क्यों नहीं देते? आप इसे चाहे जैसे भी देखें, अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार न करने वाला इंसान अंधा और मूर्ख होता है और बाइबल को नहीं समझता है। ऐसे लोग अहंकारी और तर्कहीन होते हैं। वे परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार न करके, आपदाओं से पहले ही स्वर्गारोहण का अवसर गँवा चुके हैं। इससे प्रभु यीशु की यह भविष्यवाणी साकार होती है : "क्योंकि जिस किसी के पास है, उसे और दिया जाएगा; और उसके पास बहुत हो जाएगा : परन्तु जिसके पास नहीं है, उससे वह भी जो उसके पास है, ले लिया जाएगा। और इस निकम्मे दास को बाहर के अंधेरे में डाल दो, जहाँ रोना और दाँत पीसना होगा" (मत्ती 25:29-30)।

विश्वासियों को परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव करने की आवश्यकता क्यों होगी? यह एक और रहस्य है जिसे ज्यादातर लोग नहीं समझते हैं, तो आइए देखें कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर क्या कहता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति की मुक्ति का कार्य पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह से बचाने के लिए यीशु को न केवल पाप-बलि बनने और मनुष्य के पाप वहन करने की आवश्यकता थी, बल्कि मनुष्य को उसके शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए स्वभाव से मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करने की आवश्यकता थी। और इसलिए, अब जबकि मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिया गया है, परमेश्वर मनुष्य को नए युग में ले जाने के लिए वापस देह में लौट आया है, और उसने ताड़ना एवं न्याय का कार्य आरंभ कर दिया है। यह कार्य मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में ले गया है। वे सब, जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना')।

"मनुष्य को छुटकारा दिए जाने से पहले शैतान के बहुत-से ज़हर उसमें पहले ही डाल दिए गए थे, और हज़ारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद मनुष्य के भीतर ऐसा स्थापित स्वभाव है, जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया है, तो यह छुटकारे के उस मामले से बढ़कर कुछ नहीं है, जिसमें मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति समाप्त नहीं की गई है। मनुष्य को, जो कि इतना अशुद्ध है, परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। आज किया जाने वाला समस्त कार्य इसलिए है, ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; वचन के द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से, और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से भी, मनुष्य अपनी भ्रष्टता दूर कर सकता है और शुद्ध बनाया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाय यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है। वास्तव में यह चरण विजय का और साथ ही उद्धार के कार्य का दूसरा चरण है। वचन द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने की स्थिति में पहुँचता है, और शुद्ध करने, न्याय करने और प्रकट करने के लिए वचन के उपयोग के माध्यम से मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताओं, धारणाओं, प्रयोजनों और व्यक्तिगत आकांक्षाओं को पूरी तरह से प्रकट किया जाता है। क्योंकि मनुष्य को छुटकारा दिए जाने और उसके पाप क्षमा किए जाने को केवल इतना ही माना जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता और उसके साथ अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। किंतु जब मनुष्य को, जो कि देह में रहता है, पाप से मुक्त नहीं किया गया है, तो वह निरंतर अपना भ्रष्ट शैतानी स्वभाव प्रकट करते हुए केवल पाप करता रह सकता है। यही वह जीवन है, जो मनुष्य जीता है—पाप करने और क्षमा किए जाने का एक अंतहीन चक्र। अधिकतर मनुष्य दिन में सिर्फ इसलिए पाप करते हैं, ताकि शाम को उन्हें स्वीकार कर सकें। इस प्रकार, भले ही पापबलि मनुष्य के लिए हमेशा के लिए प्रभावी हो, फिर भी वह मनुष्य को पाप से बचाने में सक्षम नहीं होगी। उद्धार का केवल आधा कार्य ही पूरा किया गया है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव है। ... यह पाप से ज्यादा गहरी दौड़ रही है, इसे शैतान द्वारा स्थापित किया गया है और यह मनुष्य के भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए है। मनुष्य के लिए अपने पापों से अवगत होना आसान नहीं है; उसके पास अपनी गहरी जमी हुई प्रकृति को पहचानने का कोई उपाय नहीं है, और उसे यह परिणाम प्राप्त करने के लिए वचन के न्याय पर भरोसा करना चाहिए। केवल इसी प्रकार से मनुष्य इस बिंदु से आगे धीरे-धीरे बदल सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)')।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन स्पष्ट हैं। अनुग्रह के युग में, प्रभु यीशु ने छुटकारे का कार्य किया, इस तरह उसके उद्धार-कार्य का पहला भाग ही पूरा हुआ। प्रभु में विश्वास का अर्थ है कि लोगों के पाप क्षमा कर दिए गए हैं, अब उन्हें व्यवस्था के तहत दंडित नहीं किया जाएगा, और वे प्रभु से प्रार्थना और उसके साथ वार्तालाप कर सकते हैं, वे उसका अनुग्रह और आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। यह है छुटकारे के कार्य की उपलब्धि। लेकिन पाप क्षमा कर दिए जाने के बावजूद, लोगों ने झूठ बोलना और पाप करना नहीं छोड़ा है, वे निजी लाभ के लिए संघर्ष, ईर्ष्या, अंतर्कलह में लिप्त रहकर आलोचना और घृणा करते हैं। वे प्रभु के वचनों का अभ्यास करना चाहते हैं, पर कर नहीं पाते। वे पाप के दुष्चक्र में फँसकर पाप करते, अपराध स्वीकारते और फिर पाप करते रहते हैं, और इस दुष्चक्र से निकल नहीं पाते। इससे पता चलता है कि भले ही प्रभु ने इंसान के पापों को क्षमा कर दिया है, लेकिन हमारी पापी प्रकृति अभी भी हममें है। यह हमारी शैतानी प्रकृति और स्वभाव है जो हमें पाप करने की ओर धकेलता है। अगर इस पाप की जड़ को मिटाया न गया, तो किसी के पापों को कितनी बार भी क्षमा कर दिया जाए, वह कभी पाप करना नहीं छोड़ेगा और पवित्र नहीं बन पाएगा। वह पाप-कर्म में लिप्त रहकर परमेश्वर का विरोध करता रहता है। ज़रा उन फरीसियों की सोचिए। वे मंदिर में परमेश्वर की पूजा करके बलि चढ़ाते थे, लेकिन जब प्रभु यीशु ने प्रकट होकर कार्य करना शुरू किया तो उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। बुरी तरह उसका विरोध किया, निंदा की और आखिरकार उसे सूली पर चढ़ाने का जघन्य पाप किया। इससे हमें क्या पता चलता है? अगर किसी की प्रकृति शैतानी है, तो वो माफ़ी के लिए कितनी भी पापबलि चढ़ाए, वो बुराई करना नहीं छोड़ सकता। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने प्रकट होकर सत्य के लाखों वचन व्यक्त किए हैं, वह परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय का कार्य कर रहा है। आपदाओं से पहले विजेताओं का समूह बना लिया है, परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य दिखाते हुए उसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। अनेक धार्मिक लोग न तो खोज करते हैं और न ही जाँच-पड़ताल, बस अपनी धारणाओं से चिपके रहते हैं, बल्कि परमेश्वर के नए कार्य का तिरस्कार, विरोध और उसकी निंदा करने का हर संभव प्रयास करते हुए, नए सिरे से सत्य व्यक्त करने वाले मसीह को सूली पर चढ़ाने के लिए मरे जा रहे हैं। इससे पता चलता है कि भले ही इंसान के पाप माफ़ कर दिए गए हैं, लेकिन इंसान अपनी शैतानी प्रकृति के कारण, अभी भी बुरी तरह से परमेश्वर का विरोध करता है, उसे अपना शत्रु समझकर असंगत मानता है। परमेश्वर का धार्मिक, पवित्र स्वभाव किसी भी अपराध को सहन नहीं करता, तो क्या वह ऐसे किसी इंसान को अपने राज्य में ले जाएगा जो पाप-क्षमा पाकर भी निरंतर पाप और उसका विरोध करता रहता है? बिल्कुल नहीं। जैसा कि प्रभु यीशु ने कहा है, "मैं तुम से सच सच कहता हूँ कि जो कोई पाप करता है वह पाप का दास है। दास सदा घर में नहीं रहता; पुत्र सदा रहता है" (यूहन्ना 8:34-35)। "इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ" (लैव्यव्यवस्था 11:45)। बाइबल में भी लिखा है, "पवित्रता के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा" (इब्रानियों 12:14)। "क्योंकि सच्‍चाई की पहिचान प्राप्‍त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं" (इब्रानियों 10:26)। परमेश्वर का पवित्र, धार्मिक स्वभाव अलंघनीय है। परमेश्वर के विरोधियों को सज़ा देकर नष्ट कर दिया जाएगा, और उन्हें कभी भी परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा। इसलिए, जब प्रभु यीशु ने वादा किया था कि वह अंत के दिनों में वापस आएगा, तो यह हमें स्वर्ग में ले जाने और सीधे तौर अविश्वासियों की निंदा कर उन्हें आपदाओं में नष्ट करने के लिए नहीं था। उसके आने का अभिप्राय सत्य व्यक्त करना और इंसान की शैतानी प्रकृति और स्वभाव के लिए न्याय-कार्य करना था, पहले इंसान को बुराई और शैतान की ताकतों से बचाने के लिए था, ताकि हम परमेश्वर की ओर मुड़कर उसे प्राप्त हो सकें, फिर उसके राज्य में ले जाए जा सकें। तब परमेश्वर का उद्धार-कार्य पूरा हो जाएगा। यदि परमेश्वर का न्याय मात्र इंसान की निंदा कर उसे नष्ट करने के लिए होता, जैसा कि लोग सोचते हैं, तो भ्रष्ट मानवता में से कौन बच पाता? क्या परमेश्वर पाप करने और उसका विरोध करने के लिए सभी का अंत नहीं कर देता? और अगर ऐसा होता, तो क्या इंसान के उद्धार के लिए परमेश्वर की योजना निष्फल नहीं हो जाती? इसलिए परमेश्वर ने इंसान को बचाने की अपनी योजना के अनुसार अंत के दिनों में फिर से देहधारण किया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने विनम्रता से इंसानों के बीच छिपकर बहुत से सत्य व्यक्त किए हैं, वह परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय का कार्य कर रहा है, ताकि उन सभी को शुद्ध करके बचाया जा सके जो परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय को स्वीकार करते हैं। ऐसा इसलिए है ताकि हम बुराई से बचकर शुद्ध हो सकें, और परमेश्वर के राज्य में ले जाने योग्य बन सकें। परमेश्वर का अंत के दिनों का न्याय-कार्य लोगों की निंदा करने या उन्हें नष्ट करने के लिए नहीं है, बल्कि उसका लक्ष्य इंसान का शुद्धिकरण और उद्धार करना है। परमेश्वर की इच्छा को समझना महत्वपूर्ण है। इंसान के उद्धार के लिए परमेश्वर का अंत के दिनों का न्याय-कार्य उसका सबसे महत्वपूर्ण कदम है, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय को स्वीकारना ही एकमात्र तरीका है जिससे हम भ्रष्टता से बचकर, शुद्ध होकर आपदाओं से बचाए जा सकते हैं।

कोई यह सवाल कर सकता है : सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपने न्याय-कार्य से इंसान को शुद्ध करके कैसे बचाता है? हम इसका उत्तर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों में पा सकते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन तमाम विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है')।

"परमेश्वर द्वारा मनुष्य की पूर्णता किन साधनों से संपन्न होती है? यह उसके धार्मिक स्वभाव द्वारा पूरी होती है। परमेश्वर के स्वभाव में मुख्यतः धार्मिकता, क्रोध, भव्यता, न्याय और शाप शामिल हैं, और वह मनुष्य को प्राथमिक रूप से न्याय द्वारा पूर्ण बनाता है। कुछ लोग नहीं समझते और पूछते हैं कि क्यों परमेश्वर केवल न्याय और शाप के द्वारा ही मनुष्य को पूर्ण बना सकता है। वे कहते हैं, 'यदि परमेश्वर मनुष्य को शाप दे, तो क्या वह मर नहीं जाएगा? यदि परमेश्वर मनुष्य का न्याय करे, तो क्या वह दोषी नहीं ठहरेगा? तब वह कैसे पूर्ण बनाया जा सकता है?' ऐसे शब्द उन लोगों के होते हैं जो परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर मनुष्य की अवज्ञा को शापित करता है और वह मनुष्य के पापों का न्याय करता है। यद्यपि वह बिना किसी संवेदना के कठोरता से बोलता है, फिर भी वह उन सबको प्रकट करता है जो मनुष्य के भीतर होता है, और इन कठोर वचनों के द्वारा वह उन सब बातों को प्रकट करता है जो मूलभूत रूप से मनुष्य के भीतर होती हैं, फिर भी ऐसे न्याय द्वारा वह मनुष्य को देह के सार का गहन ज्ञान प्रदान करता है, और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के समक्ष समर्पण कर देता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो')।

"परमेश्वर पृथ्वी पर भ्रष्ट मानवता को बचाने के लिए कार्य करने आया है—इसमें कोई झूठ नहीं है। यदि होता, तो वह अपना कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से निश्चित ही नहीं आता। अतीत में, उद्धार के उसके साधन में परम प्रेम और करुणा दिखाना शामिल था, यहाँ तक कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। वर्तमान अतीत जैसा नहीं है : आज तुम लोगों को दिया गया उद्धार अंतिम दिनों के समय में प्रत्येक व्यक्ति का उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकरण किए जाने के दौरान घटित होता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन प्रेम या करुणा नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है, ताकि मनुष्य को अधिक अच्छी तरह से बचाया जा सके। इस प्रकार, तुम लोगों को जो भी प्राप्त होता है, वह ताड़ना, न्याय और निर्दय मार है, लेकिन यह जान लो : इस निर्मम मार में थोड़ा-सा भी दंड नहीं है। मेरे वचन कितने भी कठोर हों, तुम लोगों पर जो पड़ता है, वे कुछ वचन ही हैं, जो तुम लोगों को अत्यंत निर्दय प्रतीत हो सकते हैं, और मैं कितना भी क्रोधित क्यों न हूँ, तुम लोगों पर जो पड़ता है, वे फिर भी कुछ शिक्षाप्रद वचन ही हैं, और मेरा आशय तुम लोगों को नुकसान पहुँचाना या तुम लोगों को मार डालना नहीं है। क्या यह सब तथ्य नहीं है? जान लो कि आजकल हर चीज़ उद्धार के लिए है, चाहे वह धार्मिक न्याय हो या निर्मम शुद्धिकरण और ताड़ना। भले ही आज प्रत्येक व्यक्ति का उसके प्रकार के अनुसार वर्गीकरण किया जा रहा हो या मनुष्य की श्रेणियाँ प्रकट की जा रही हों, परमेश्वर के समस्त वचनों और कार्य का प्रयोजन उन लोगों को बचाना है, जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं। धार्मिक न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से लाया जाता है, और निर्मम शुद्धिकरण उन्हें निर्मल बनाने के लिए किया जाता है; कठोर वचन या ताड़ना, दोनों शुद्ध करने के लिए किए जाते हैं और वे उद्धार के लिए हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के उद्धार के लिए तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष से दूर रहकर परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए')।

परमेश्वर के वचन पढ़कर, क्या हम अच्छी तरह नहीं समझ गए हैं कि परमेश्वर अपना न्याय-कार्य कैसे करता है? बहुत से लोग परमेश्वर के कार्य को नहीं समझते, इसलिए जब वे न्याय और ताड़ना के वचन देखते हैं, तो वे परमेश्वर के दंड और निंदा के बारे में सोचते हैं। इससे अधिक गलत बात नहीं हो सकती। व्यवस्था के तहत, न्याय केवल दंड के ज़रिए व्यवहार को प्रतिबंधित करना था, लेकिन यह लोगों की पापी प्रकृति को दूर नहीं कर रहा था। परमेश्वर का न्याय मुख्य रूप से हमारी आंतरिक शैतानी प्रकृति और स्वभाव का न्याय करने और उसे प्रकट करने के लिए सत्य व्यक्त करने के बारे में है, और फिर हमें उजागर करने के लिए हमारे साथ निपटना, अनुशासित करना और हमारी परीक्षा लेना है। यह इसलिए है ताकि हम अपने भ्रष्ट सार और उसकी असलियत को देखकर खुद से नफरत करें, देह से विमुख होकर सत्य का अभ्यास और पश्चाताप करें। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन इंसान के शैतानी स्वभाव, हमारी नीच मंशाओं, भ्रष्ट मिलावटों और हास्यास्पद दृष्टिकोण की अभिव्यक्तियों को उजागर करते हैं। हम परमेश्वर के वचनों के न्याय से, देखते हैं कि हम आस्था रखकर केवल आशीष पाने की कामना करते हैं परमेश्वर के प्रति हम सच्चे नहीं होते। हम थोड़ा-सा त्याग, थोड़ी-सी कीमत चुकाकर सोचते हैं कि हम परमेश्वर के अनुग्रह और राज्य में प्रवेश के हकदार हो गए। लेकिन जब हमारी परीक्षा ली जाती है, तो हम परमेश्वर को दोष देने लगते हैं, उससे तर्क-वितर्क करते हैं और फिर हम उसके लिए काम नहीं करना चाहते। उसके प्रति हमारी कोई आज्ञाकारिता ही नहीं है। साफ तौर पर हममें सत्य की वास्तविकता की कमी है, लेकिन दिखावे और प्रशंसा पाने के लिए सिद्धांतों की बात करते रहते हैं। हम हमेशा अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को बचाने में लगे रहते हैं, और यह जानते हुए भी कि दूसरों के विचार सत्य के अनुरूप हैं, हम उनसे सहमत नहीं होना चाहते। हम अभिमानी और अड़ियल हैं, हममें न मानवता है, न विवेक है। परमेश्वर के वचनों के न्याय से हम देखते हैं कि शैतान ने हमें कितनी बुरी तरह भ्रष्ट कर दिया है, हम अभिमानी, चालाक और दुष्ट हो गए हैं, हम शैतान की जीती-जागती अभिव्यक्तियाँ हैं। हम बेहद शर्मिंदा हैं और कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं हैं। पछतावे में डूबे, हम प्रार्थना करते हैं और अपने आपको कोसते हैं, और चाहते हैं कि हम अपनी शैतानी भ्रष्टता में जीना बंद कर दें। हम परमेश्वर की धार्मिकता और पवित्रता का भी अनुभव करते हैं, परमेश्वर हमारी भ्रष्टता को जाँचकर उसका पर्दाफाश करेगा, उसका स्वभाव अलंघनीय है, अगर हमने पश्चाताप करके अपने आपको नहीं बदला, तो वो हमें दंडित करेगा। तब हमारे मन में परमेश्वर के प्रति श्रद्धा पैदा होती है। कई बार न्याय, ताड़ना, काट-छाँट, निपटारे, परीक्षण और शोधन होने के बाद, हमारा भ्रष्ट स्वभाव धीरे-धीरे शुद्ध होने और बदलने लगता है। हम अधिक विनम्र, वचन और कर्म में अधिक विवेकशील हो जाते हैं। हम हर उस बात को स्वीकार कर लेते हैं जो सत्य के अनुरूप हो, फिर वह चाहे कहीं से भी आए और हमारे कर्तव्य में भी बहुत कम मिलावट होती है। चाहे हमें परमेश्वर का आशीर्वाद मिले या न मिले, चाहे हमारा अंतिम परिणाम और गंतव्य कुछ भी हो, हम परमेश्वर को समर्पित होने और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने में प्रसन्नता अनुभव करते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय के ज़रिए, हम आखिरकार पाप से मुक्त होकर एक सच्चे इंसान की तरह जीते हुए, सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते हैं। परमेश्वर का न्याय और ताड़ना इंसान के लिए उसका महान प्रेम और उद्धार है! इसके बिना, हम न तो खुद को जान पाएँगे और न ही कभी भी अपनी भ्रष्टता की सच्चाई को देख पाएँगे। और यह सोचकर सपनों में जीते रहेंगे कि हमारे पास राज्य का अधिकार है क्योंकि हमारे पाप क्षमा कर दिए गए हैं, और प्रभु का इंतज़ार करते रहेंगे कि वो आकर हमें स्वर्गारोहित करेगा कि हम उसके आशीषों का आनंद लें। यह कोरा अज्ञान और बेशर्मी है। हमने अच्छी तरह अनुभव कर लिया है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का न्याय और ताड़ना ही भ्रष्टता को दूर करने, शुद्ध होने और राज्य में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। आप कह सकते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का न्याय पाप-मुक्त होने, परमेश्वर द्वारा बचाए जाने और फिर राज्य में प्रवेश करने का हमारा एकमात्र मार्ग है। जैसा सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन कहते हैं, "अपने जीवन में, यदि मनुष्य शुद्ध होकर अपने स्वभाव में परिवर्तन लाना चाहता है, यदि वह एक सार्थक जीवन बिताना चाहता है, और एक प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाना चाहता है, तो उसे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करना चाहिए, और उसे परमेश्वर के अनुशासन और प्रहार को अपने-आपसे दूर नहीं होने देना चाहिए, ताकि वह खुद को शैतान की चालाकी और प्रभाव से मुक्त कर सके, और परमेश्वर के प्रकाश में जीवन बिता सके। यह जान लो कि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय प्रकाश है, मनुष्य के उद्धार का प्रकाश है, और मनुष्य के लिए इससे बेहतर कोई आशीष, अनुग्रह या सुरक्षा नहीं है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान')।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर को अंत के दिनों में न्याय का कार्य शुरू किए हुए तीन दशक हो चुके हैं। परमेश्वर के बहुत से चुने हुए लोग इससे गुज़रकर धीरे-धीरे भ्रष्टता से मुक्त होकर शुद्ध हो रहे हैं, और विजेताओं का एक समूह आपदाओं से पहले ही बना लिया गया है। उनके पास पाप से बचने और बचाए जाने की शानदार गवाही है, जैसे उत्पीड़न और मुश्किलें सहकर शैतान को हराना, परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना के ज़रिए पश्चाताप करना, सत्य का अभ्यास करके ईमानदार बनना, परीक्षण और शोधन के दौरान परमेश्वर को समर्पित होना। ये गवाहियाँ वीडियो के रूप में ऑनलाइन उपलब्ध हैं, जो पूरी दुनिया को परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की गवाही देती हैं, ताकि सभी की आँखें खुलें और वे पूरी तरह आश्वस्त हो सकें। हर देश और संप्रदाय के अधिक से अधिक लोग जो सत्य से प्रेम करते हैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों में परमेश्वर की वाणी को पहचानकर उसके सिंहासन के सामने आ रहे हैं। राज्य का सुसमाचार दुनिया भर में फैलकर शानदार ढंग से फलीभूत हो रहा है। ज़ाहिर है, परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला उसके अंत के दिनों का न्याय साकार हो रहा है। आपदाओं के आने का सिलसिला शुरू हो चुका है, और कोई भी व्यक्ति साफ़ तौर पर देख सकता है कि बड़ी आपदाएँ शुरू हो चुकी हैं। जो लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय को स्वीकार कर अपनी भ्रष्टता दूर कर चुके हैं वो लोग आपदाओं से सुरक्षित रहेंगे और परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करेंगे। जो लोग सत्य को, परमेश्वर के न्याय या शोधन को नकार कर केवल आशीष पाने और राज्य में प्रवेश करने की सोचते हैं, वे अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य द्वारा उजागर हुए घास-फूस और गैर-विश्वासी हैं। परमेश्वर पहले ही उन्हें तिरस्कृत कर चुका है, वे नरक के भागी होंगे और आपदा के वक्त दंडित किए जाएँगे। इससे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन साकार होते हैं : "कि जब तुम लोग यीशु को एक श्वेत बादल पर स्वर्ग से उतरते अपनी आँखों से देखोगे, तो यह धार्मिकता के सूर्य का सार्वजनिक प्रकटन होगा। शायद वह तुम्हारे लिए एक बड़ी उत्तेजना का समय होगा, मगर तुम्हें पता होना चाहिए कि जिस समय तुम यीशु को स्वर्ग से उतरते देखोगे, यही वह समय भी होगा जब तुम दंडित किए जाने के लिए नीचे नरक में जाओगे। वह परमेश्वर की प्रबंधन योजना की समाप्ति का समय होगा, और वह समय होगा, जब परमेश्वर सज्जन को पुरस्कार और दुष्ट को दंड देगा। क्योंकि परमेश्वर का न्याय मनुष्य के देखने से पहले ही समाप्त हो चुका होगा, जब सिर्फ़ सत्य की अभिव्यक्ति होगी। वे जो सत्य को स्वीकार करते हैं और संकेतों की खोज नहीं करते और इस प्रकार शुद्ध कर दिए गए हैं, वे परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट चुके होंगे और सृष्टिकर्ता के आलिंगन में प्रवेश कर चुके होंगे। सिर्फ़ वे जो इस विश्वास में बने रहते हैं कि 'ऐसा यीशु जो श्वेत बादल पर सवारी नहीं करता, एक झूठा मसीह है' अनंत दंड के अधीन कर दिए जाएँगे, क्योंकि वे सिर्फ़ उस यीशु में विश्वास करते हैं जो संकेत प्रदर्शित करता है, पर उस यीशु को स्वीकार नहीं करते, जो कड़े न्याय की घोषणा करता है और जीवन और सच्चा मार्ग प्रकट करता है। इसलिए केवल यही हो सकता है कि जब यीशु खुलेआम श्वेत बादल पर वापस लौटे, तो वह उनके साथ निपटे। वे बहुत हठधर्मी, अपने आप में बहुत आश्वस्त, बहुत अभिमानी हैं। ऐसे अधम लोग यीशु द्वारा कैसे पुरस्कृत किए जा सकते हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नया बना चुका होगा')।

"जो अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य के दौरान अडिग रहने में समर्थ हैं—यानी, शुद्धिकरण के अंतिम कार्य के दौरान—वे लोग होंगे, जो परमेश्वर के साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे; वैसे, वे सभी जो विश्राम में प्रवेश करेंगे, शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके होंगे और परमेश्वर के शुद्धिकरण के अंतिम कार्य से गुज़रने के बाद उसके द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे। ये लोग, जो अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे, अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के कार्य का मूलभूत उद्देश्य मानवता को शुद्ध करना है और उन्हें उनके अंतिम विश्राम के लिए तैयार करना है; इस शुद्धिकरण के बिना संपूर्ण मानवता अपने प्रकार के मुताबिक़ विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत नहीं की जा सकेगी, या विश्राम में प्रवेश करने में असमर्थ होगी। यह कार्य ही मानवता के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। केवल परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण का कार्य ही मनुष्यों को उनकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा और केवल उसकी ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानवता के उन अवज्ञाकारी तत्वों को सामने लाएगा, और इस तरह बचाये जा सकने वालों से बचाए न जा सकने वालों को अलग करेगा, और जो बचेंगे उनसे उन्हें अलग करेगा जो नहीं बचेंगे। इस कार्य के समाप्त होने पर जिन्हें बचने की अनुमति होगी, वे सभी शुद्ध किए जाएँगे, और मानवता की उच्चतर दशा में प्रवेश करेंगे जहाँ वे पृथ्वी पर और अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का आनंद उठाएंगे; दूसरे शब्दों में, वे अपने मानवीय विश्राम का दिन शुरू करेंगे और परमेश्वर के साथ रहेंगे। जिन लोगों को रहने की अनुमति नहीं है, उनकी ताड़ना और उनका न्याय किया गया है, जिससे उनके असली रूप पूरी तरह सामने आ जाएँगे; उसके बाद वे सब के सब नष्ट कर दिए जाएँगे और शैतान के समान, उन्हें पृथ्वी पर रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवता में इस प्रकार के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ऐसे लोग अंतिम विश्राम की धरती पर प्रवेश करने के योग्य नहीं हैं, न ही ये उस विश्राम के दिन में प्रवेश के योग्य हैं, जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे क्योंकि वे दंड के लायक हैं और दुष्ट, अधार्मिक लोग हैं। ... बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने के परमेश्वर के अंतिम कार्य के पीछे का पूरा उद्देश्य, सभी मनुष्यों को पूरी तरह शुद्ध करना है, ताकि वह पूरी तरह पवित्र मानवता को शाश्वत विश्राम में ला सके। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण है; यह उसके समस्त प्रबंधन-कार्य का अंतिम चरण है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे')।

परमेश्वर की ओर से एक आशीर्वाद—पाप से बचने और बिना आंसू और दर्द के एक सुंदर जीवन जीने का मौका पाने के लिए प्रभु की वापसी का स्वागत करना। क्या आप अपने परिवार के साथ यह आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं?

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