मैंने परमेश्वर के उद्धार का अनुभव किया

21 दिसम्बर, 2017

चेंग हाओ, योंगझाऊ शहर, हुनान प्रांत

मेरी पत्नी और मैं कलीसिया में सुसमाचार के प्रचार का कर्तव्य निभाते हैं। कुछ समय पहले, मेरी पत्नी को एक सुसमाचार समूह का निदेशक पदोन्नत किया गया था, जबकि, अपने घमंडी और अनियंत्रित व्यवहार के कारण मैंने पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा दिया और मुझे अपने कृत्यों पर चिंतन करने के लिए घर भेज दिया गया था। यह देखते हुए कि मेरी पत्नी और मैंने एक ही समय पर अपने कर्तव्यों को पूरा करना शुरू किया था, उसे पदोन्नत किए जाते हुए देखना जबकि मुझे मेरे कर्तव्यों से पदच्युत किया गया था, इस बात को स्वीकार करना मुश्किल था। यह सोचते हुए मेरी आँखों में आँसू आ जाते थे कि: "परमेश्वर प्रत्येक को उसके प्रकार के अनुसार अलग कर रहा है और, यह देखते हुए कि मुझे पदच्युत कर दिया गया है, इससे यह निश्चित है कि मुझे प्रकट कर दिया गया है और हटा दिया गया है। आह! किसने सोचा होगा कि इतने वर्षों के बाद, एक विश्‍वासी के रूप में मेरा जीवन इतनी बुरी तरह से असफल हो जाएगा। अब मैं केवल अपने दंड की प्रतीक्षा ही कर सकता हूँ।" फिर मैं भारी मन से घर की ओर चल दिया। उसके बाद, मैं असफलता के दलदल में धँस गया और ग़लतफ़हमियों और परमेश्वर के लिए दोष से भर गया।। मैं निराशाजनक ढंग से अंधकार में डूब गया था।

एक दिन, संयोग से मुझे परमेश्वर के वचन के निम्नलिखित दो अंश मिले: "मैंने कभी नहीं कहा कि तुम लोगों के लिए भविष्य की कोई संभावनाएँ नहीं है, और यह तो बिल्कुल नहीं कहा कि तुम लोगों को तबाह और बर्बाद कर दिया जाएगा। क्या मैंने सार्वजनिक रूप से कभी ऐसी बातों की घोषणा की है? तुम कहते हो कि तुम नाउम्मीद हो, लेकिन क्या यह निष्कर्ष तुमने खुद नहीं निकाला है? क्या यह तुम्हारी अपनी मन:स्थिति का परिणाम नहीं है? क्या तुम्हारे निष्कर्ष कोई महत्त्व रखते हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य के उद्धार के लिए तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष से दूर रहकर परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए')। "आपको परमेश्वर का धर्मी स्वभाव नज़र नहीं आता है, और आप हमेशा ही परमेश्वर को गलत समझ लेते हैं और उनकी आकांक्षाओं को तोड़-मरोड़ देते हैं, यही कारण है कि आप निराशावादी होकर उम्मीद छोड़ बैठते हैं। क्या यह खुद पर थोपा हुआ नहीं है? ... आप परमेश्वर के कार्यों को और परमेश्वर की इच्छाओं को बिल्कुल भी नहीं समझते हैं; बल्कि आप परमेश्वर की उन आकांक्षाओं को भी नहीं समझते हैं जो उन्होंने 6000 सालों के अपने प्रबंधन कार्य में समाहित कर दी हैं!" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्वर की इच्छा है कि यथासंभव लोगों की रक्षा की जाये')। इन अंशों को पढ़ कर, मुझे महसूस हुआ कि: क्या परमेश्वर मेरे बारे में बात नहीं कर रहा है? जैसे ही मुझे पता चला कि कलीसिया ने मुझे पदच्युत कर दिया है, तो मैंने अनुमान लगाया और निष्कर्ष निकाला कि मुझे प्रकट किया गया था और हटाया गया था और मैंने सत्य को खोजने में विश्‍वास को खो दिया था। मैं अपनी स्वयं की असफलता से पूरी तरह से निराश हुआ, सतत नकारात्‍मक अवस्था और मिथ्‍याबोध में रहता था। उस स्थिति में, मैंने यह पूछते हुए अपने हृदय के भीतर झाँका कि: "क्या तू वाकई में जानता है कि तुझे यह दुर्भाग्य क्यों मिला है? क्या तू वास्तव में परमेश्वर की इच्छा को समझता है? निस्संदेह नहीं! मैं नहीं समझता हूँ! तो मैं इन ख़याली अटकलबाजियों और निराधार रूपरेखाओं को क्यों बनाता हूँ? क्या यह अत्‍यधिक अभिमानी और विश्वासघाती नहीं है? क्या मैंने अपने आप को इस अंधकारमय कष्ट के स्थान में नहीं फेंक दिया था? मैं कितना मूर्ख और बेतुका था!" इसलिए, मैं प्रार्थना के लिए परमेश्वर के समक्ष गया, उससे प्रबुद्धता के लिए प्रार्थना की ताकि मैं हाल ही के इस प्रकाशन में उसकी इच्छा का अनावरण कर सकूँ।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन के इस अंश को देखा: "वह जो कुछ करता है, उस सबमें वह तुम्हारे प्रति वास्तव में प्रेमपूर्ण है। वह कोई बुरी मंशा नहीं रखता। यह तुम लोगों के पापों के कारण है कि वह तुम लोगों का न्याय करता है, ताकि तुम आत्म-परीक्षण करो और यह ज़बरदस्त उद्धार प्राप्त करो। यह सब मनुष्य को संपूर्ण बनाने के लिए किया जाता है। प्रारंभ से लेकर अंत तक, परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए पूरी कोशिश कर रहा है, और वह अपने ही हाथों से बनाए हुए मनुष्य को पूर्णतया नष्ट करने का इच्छुक नहीं है। आज वह कार्य करने के लिए तुम लोगों के मध्य आया है, और क्या ऐसा उद्धार और भी बड़ा नहीं है? अगर वह तुम लोगों से नफ़रत करता, तो क्या फिर भी वह व्यक्तिगत रूप से तुम लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए इतने बड़े परिमाण का कार्य करता? वह इस प्रकार कष्ट क्यों उठाए? परमेश्वर तुम लोगों से घृणा नहीं करता, न ही तुम्हारे प्रति कोई बुरी मंशा रखता है। तुम लोगों को जानना चाहिए कि परमेश्वर का प्रेम सबसे सच्चा प्रेम है। यह केवल लोगों की अवज्ञा के कारण है कि उसे न्याय के माध्यम से उन्हें बचाना पड़ता है; यदि वह ऐसा न करे, तो उन्हें बचाया जाना असंभव होगा। ... वह तुम्हें और अधिक भ्रष्ट होते नहीं देख सकता; वह तुम्हें इस मलिन भूमि पर रहते हुए नहीं देख सकता जहाँ तुम अभी रह रहे हो और शैतान द्वारा उसकी इच्छानुसार कुचले जा रहे हो, और वह तुम्हें अधोलोक में गिरने नहीं दे सकता। वह केवल लोगों के इस समूह को प्राप्त करना और तुम लोगों को पूर्णतः बचाना चाहता है। तुम लोगों पर विजय का कार्य करने का यह मुख्य उद्देश्य है—यह केवल उद्धार के लिए है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य की आंतरिक सच्चाई(4)')। परमेश्वर के हृदयस्‍पर्शी वचनों ने मेरे हृदय को उत्साहित कर दिया और मुझे मेरी स्‍तब्‍ध मायूसी से उठाया। जैसा कि पता चला, यद्यपि पहली नज़र में मेरी स्थिति विकट प्रतीत होती थी, किन्तु वास्तव में यह मुझ पर परमेश्वर अपनी स्‍नेह-वर्षा कर रहा था, और मुझे अपने उद्धार से विभूषित कर रहा था। यह वैसा नहीं था, जैसा कि मैं सोचता था, कि मुझे हटा दिया जाएगा। मैं अहंकारी और हठी रहा था—लापरवाही और आवारा स्वच्छन्दता के साथ अपने कर्तव्यों को पूरा कर रहा था। परमेश्वर मुझे बस शैतान के द्वारा कुचले जाना नहीं सह सकता था। वह मुझे और अधिक नीचे डूबते हुए देखना नहीं सह सकता था और विशेष रूप से वह मेरे आवारा अहंकारी क़ृत्यों के माध्यम से परमेश्वर के स्‍वभाव को अपमानित करने के कारण मुझे दंड का सामना करते हुए देखना सहन नहीं कर सकता था। इसलिए, वह मुझे अपने बचाने वाले अनुग्रह का आशीष देते हुए और शैतान की भ्रष्टता के चंगुल से बच निकलने में मेरी सहायता करते हुए, न्याय और ताड़ना के माध्यम से, मुझ पर उद्धार लाया। कलीसिया से पदच्युति, वास्तव में, परमेश्वर का सबसे बड़ा उद्धार था। जितना अहंकारी मैं बनता था, उतने ही अधिक परिवेशों का परमेश्वर मेरे दोषों का सामना करने के लिए सृजन करता था। उसने मेरी कामनाओं को अतृप्‍त रहने दिया ताकि मेरा स्तब्ध हृदय पीड़ा को महसूस करना शुरू कर दे। मुझसे मेरे कृत्यों पर चिंतन करवाने, मेरी भ्रष्ट प्रकृति के सार को समझाने और मेरे स्वभाव में एक परिवर्तन लाने हेतु सत्य की तलाश करवाने के लिए उसने इस पीड़ा के माध्यम से कार्य किया। यह उद्धार का अत्यंत वास्‍तविक कार्य है जो परमेश्वर ने मुझे भेंट किया। उसने केवल मेरा ध्यान रखा और मुझे प्रेम किया। अन्यथा, मैं आज भी अनजाने में में जी रहा होता, अभी भी सुसमाचार कार्य के साथ लापरवाही के साथ कार्य कर रहा होता, इसे बाधित और इसमें हस्तक्षेप कर रहा होता। अंत में, मेरे कार्यों ने परमेश्वर के स्वभाव का अपमान किया होता और मुझे परमेश्वर द्वारा हटा दिया जाता। इस स्थिति में, मैं समझ पाया कि परमेश्वर का उद्धार बहुत वास्तविक है। परमेश्वर के प्रेम के बारे में कुछ भी असत्य या निरर्थक नहीं है–यह सच्चा और वास्तविक है। हालाँकि, मैं परमेश्वर के कार्य और उसके उद्धार को देखने में असफल रहा। मैं न केवल परमेश्वर के उद्धार में ईमानदार इरादे को ढूँढने में असफल रहा बल्कि प्रत्येक मोड़ पर स्वयं को अति-निर्धारित करता रहा जबकि परमेश्वर के प्रति ग़लतफ़हमी रखता रहा उसकी आलोचना करता रहा और निराशावादी एकाकीपन में जीता रहा। मैं कितना अविवेकी था! मैं परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को पाने के योग्य नहीं था।

प्रिय परमेश्वर, तेरा धन्यवाद! इस अनुभव के माध्यम से, मैं यह समझा हूँ कि तेरे द्वारा उद्धार वास्तविक है और तेरा न्याय और तेरी ताड़ना प्रेम से भरे हुए हैं। तेरे न्याय और तेरी ताड़ना के बिना, मैं कभी भी स्वयं को ईमानदारी से नहीं देख सकता था। मैं भ्रष्टता में, और अधोगामी कुंडली पर, शैतान द्वारा कुचले जाते हुए जीवन जीना जारी रख रहा होता, और अंत में उससे पराजित हो जाता। इस अनुभव के माध्यम से, मैंने यह भी समझा कि तेरा सार प्रेम है और कि तेरे सभी कार्य मनुष्यजाति को बचाने पर लक्षित हैं। परमेश्‍वर, मैं स्वयं को पूरी तरह से सत्य को खोजने और एक नई शुरुआत करने में समर्पित होने की शपथ लेता हूँ। परिणाम चाहे कुछ भी क्यों न हो, मैं तेरी इच्छा को संतुष्ट करने के लिए प्राणी के अपने कर्तव्य को पूरा करने की शपथ लेता हूँ।

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