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ईसाई जीवन: कैसे अपने बच्चे को शिक्षित करें और सुखी माता-पिता बनें

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हुईयुआन, मलेशिया

“पिछले कुछ हफ्तों से, आपके बेटे ने कक्षा में बहुत ध्यान दिया है, वो बहुत समझदार बच्चा है। वह पहले जैसा हुआ करता था उससे पूरी तरह से बदल गया है। वह अचानक इतना बदल कैसे गया? आप उसे घर पर कैसे पढ़ा रही हैं?” शिक्षिका की इन बातों को सुनकर, मैं थोड़ा मुस्कुरायी, और मेरा दिल परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता से भर गया। मेरा बेटे में आये इतने बदलाव सिर्फ परमेश्वर के कार्यों का परिणाम हैं, और मैं परमेश्वर को धन्यवाद देती हूँ! पहले, मैं अपने बेटे को पढ़ाने की कोशिश करने में हमेशा विफल रहती थी, लेकिन फिर मुझे अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्यों को स्वीकार करने का सौभाग्य मिला और परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में, मैं आखिरकार समझ गयी कि अपने बेटे को कैसे शिक्षित करना है और मैं एक सुखी माँ बन गयी।

मेरे नटखट बेटे के कारण मेरा सिर चकरा जाता था

पिछले कुछ वर्षों में, मैंने कई माता-पिताओं को अपने बच्चों को बिगाड़ते हुए देखा है, जिसके कारण उनके बच्चे अधिकाधिक निरंकुश और लापरवाह हो जाते हैं। इसलिए, जब शादी के बाद मेरे बच्चे हुए, तो मैंने खुद से कहा: “मैं अपने बच्चों को बिल्कुल भी बर्बाद नहीं करूँगी। मैं निश्चित रूप से उनके साथ सख्त रहूँगी, उनके व्यवहार को स्वीकार्य मानदंडों में रखूंगी, और उन्हें शुरू से ही अच्छी आदतें विकसित करने के लिए प्रेरित करूंगी।” लेकिन मेरा बड़ा बेटा बहुत शरारती था, और उसकी कई बुरी आदतें थीं। उदाहरण के लिए, वह अक्सर एस्केलेटर की रेलिंग पर चढ़ कर ऊपर से नीचे की ओर सरकते हुए आता था, वह घर की चीजों को जानबूझकर तोड़ देता था, जहाँ भी वह चाहता, कूड़ा फेंक दिया करता था, खाने को लेकर बहुत परेशान किया करता था, इत्यादि। इन समस्याओं से निपटने के लिए, मैंने उसे शिक्षित करने की योजना तैयार की: जब भी वह अपने खाने को लेकर उधम मचाता, तो मैं उसे डांट लगाती थी, फिर वह उधम मचाने की हिम्मत नहीं करता था; अगर मुझे जीवन में कुछ भी ऐसा दिखता, जो मेरे अनुसार उसकी परवरिश के लिए फायदेमंद था, तो उसे वही करना होता था जो मैं कहती थी। यदि वह नहीं करता, तो मेरे पास उसे नियंत्रित करने के अपने तरीके थे और मैं उसे बता देती थी कि अगर उसने बात न मानी तो परिणाम क्या होंगे… मैंने अपने बेटे को शिक्षित करने के लिए हर संभव प्रयास किया, लेकिन उसमें बहुत कम बदलाव हुआ। यह सब मेरे लिए बड़ा सिरदर्द था।

एक दिन, मैं उसे खेलने के लिए उसकी मौसी के घर ले गयी। जब मैं ध्यान नहीं दे रही थी, तब मेरे बेटे ने अपनी मौसी के घर के बाहर पेशाब कर दिया और उसने अपने नाश्ते के पैकेट को भी बाहर फेंक दिया। मेरी बहन ने कहा कि मेरा बेटा बहुत अशिष्ट है, उसने मुझे मेरे बेटे को अनुशासित करने के लिए कहा। उसे यह कहते हुए सुनकर मेरा चेहरा लाल हो गया, और मुझे थोड़ा गुस्सा आया। मैंने सोचा, यह लड़का बहुत उपद्रवी है। जब भी हम बाहर जाते हैं, वह मुझे शर्मिंदा करता है। ये नहीं चलेगा। मुझे इन बुरी आदतों को छुड़वाना ही होगा! घर आने के बाद, मैंने अपने बेटे को डांटा और उससे उसकी बुरी आदतों को छोड़ने के लिए कहा। अप्रत्याशित रूप से, कई घंटे बाद, मेरे बेटे ने एक बार फिर अपने नाश्ते का पैकेट फर्श पर फेंक दिया। हालाँकि मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था, लेकिन मैंने खुद को शांत रखा और उससे ऐसा न करने के लिए कहा। लेकिन थोड़ी देर बाद, उसने फिर से गंदगी फर्श पर फेंक दी। अपने बेटे को बार-बार बातों को अनसुना करते देख, मैं अपने गुस्से को को रोक नहीं पायी, और मैंने सोचा: अगर मैंने शुरुआत में ही इसे नहीं रोका, तो क्या उसके बड़े होने के साथ स्थिति बदतर नहीं होती जाएगी? गुस्से के आवेश में, मैंने उसे बहुत ज़ोर की डांट लगाई। इस पर उसने रोना शुरू कर दिया और कहा कि वह अब से गंदगी नीचे नहीं फेंकेगा। निश्चय ही, अगले कुछ दिनों में मुझे फर्श पर कोई गंदगी नहीं मिली। मैं यह सोचकर बहुत खुश थी कि वह आखिरकार बदल गया है लेकिन मुझे नहीं पता था कि एक दिन घर की सफाई करते हुए, मुझे सोफे के नीचे का हिस्सा नमकीन के पैकेटों से ढका हुआ मिलेगा। मुझे बहुत गुस्से और बेबसी की अनुभूति हुई, मैंने सोचा: अपने बेटे की बुरी आदतें छुड़वाने के लिए मैंने उसे नियंत्रित करने की कोशिश की, उसे समझाया, उस पर चिल्ला कर भी देखा; मैंने वह सब कुछ किया है जो मैं कर सकती हूँ, लेकिन अभी भी वह बिल्कुल बात नहीं मानता है। आखिर मैं अपने बच्चे को अच्छी तरह सिखाऊँ तो कैसे? थोड़ी देर के लिए, मैं पूरी तरह से शक्तिहीन महसूस कर रही थी।

न केवल मेरे बेटे के कारण मुझे रोज़ाना के जीवन में बहुत चिंता होती थी, बल्कि उसकी पढ़ाई भी मेरे लिए चिंता का विषय थी। एक दिन, उसकी शिक्षिका ने मुझसे कहा कि, मेरा बेटा पाँच साल का होने के बावजूद, कई चीनी और अंग्रेजी अक्षर नहीं लिख पाता है, और उसने मुझसे पूछा कि मैंने उसके पिछले किंडरगार्टन को कैसे चुना था और उसकी शिक्षा को इस तरह हाथ से निकलने कैसे दिया। शिक्षिका के इन कुछ ही शब्दों ने मुझे बहुत शर्मिंदा कर दिया, और मैंने मन में सोचा: मेरा बेटा पढ़ाई में इतना खराब क्यों है? ऐसे कैसे चलेगा? ऐसा लगता है जैसे मुझे अब से उसकी पढ़ाई को अपने हाथों में लेना होगा। इसलिए, तब से, हर दिन स्कूल के बाद मैं उसे अतिरिक्त पाठ पढ़ाती थी, और मैं उसके लिखने के लिए अंग्रेजी, चीनी और मलेशियाई शब्द बोला करती थी। सप्ताहांत में भी, उसे वही करना था जो मैं उससे कहती थी, मैंने देखा कि मेरे बेटे का बर्ताव थोड़ा अस्वाभाविक होता जा रहा था: अब जब मैं उससे बोलती तो वो मेरी ओर नहीं देखता था, कभी-कभी वो मेरी बात न सुनने का दिखावा करता था, उसने मुझसे ज़्यादा बात करना भी बंद कर दिया था। अपने शिक्षण को उस पर ऐसा प्रभाव करते देख, मैं बहुत व्यथित हुई, लेकिन मुझे नहीं पता था कि इस बारे में मैं क्या करूँ।

“आप मेरी माँ नहीं हैं” इन शब्दों ने मुझ पर खंजर सा वार किया

एक बार, मेरे बेटे की शिक्षिका का फोन का आया और उसने कहा कि वह कक्षा में अच्छी तरह से पढ़ाई नहीं कर रहा था, वह हमेशा खेलता रहता था और परीक्षा के सवालों का जवाब देते समय वह अनर्थक बातें लिख रहा था। यह सुनकर मुझे बेहद गुस्सा आया। जैसे ही मेरा बेटा घर आया, मैंने उसे बहुत बुरे से फटकारते हुए कहा: “मैंने कितनी बार तुम्हें कक्षा में ध्यान देने के लिए कहा है? तुम मेरी बात क्यों नहीं मानते? मैं जो कुछ भी कहती हूँ, वह तुम्हारे दिमाग में घुसता भी है या नहीं?” मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे बेटे की मेरे प्रति इतनी विद्रोही प्रतिक्रिया होगी, उसने रोते हुए कहा, “मैं दादी के घर जाना चाहता हूँ, मैं यहाँ नहीं रहना चाहता! मैं आपके साथ नहीं रहना चाहता! सभी मुझे स्कूल में तंग करते हैं, और जब मैं घर आता हूँ तो आप मुझे धमकाती हैं। आप मेरी माँ नहीं हैं!”

अपने बेटे की ऐसी प्रतिक्रिया देख, मैं पूरी तरह से हतप्रभ थी। उसने जो कुछ कहा उसका हर शब्द मेरे दिल में नुकीले चाकू की तरह गहराई तक धंस गया, और मुझे दिल में बहुत दर्द महसूस हुआ। मैंने कभी नहीं सोचा था कि इतने वर्षों में मैंने अपने बेटे को शिक्षित करने के लिए जितने भी कष्ट उठाए हैं और जो कीमत मैंने चुकाई है, उसका प्रतिफल मेरे बेटे के इन शब्दों के साथ चुकाया जाएगा। मैंने अपने आँसू रोककर उससे कहा, “तुम्हारी माँ तुमसे बहुत प्यार करती है। मैं तुम्हारी भलाई के लिए ऐसा करती हूँ। तुम ऐसी बातें कह भी कैसे सकते हो?”

वह ज़ोर-ज़ोर से रोता रहा और उसने कहा, “नहीं! आप मुझसे प्यार नहीं करतीं!” यह कहकर, वह अपने कमरे में दौड़ता हुआ चला गया और मुझे अकेला छोड़ दिया। बाद में, मुझे पता चला कि शिक्षिका ने उस अवसर पर मेरे बेटे को गलत समझा था। जब मेरा बेटा कक्षा में था, तो वह अपनी पेंसिल और रबड़ की तलाश कर रहा था, जब उसकी शिक्षिका को लगा कि वो कोई गड़बड़ी कर रहा है, और इसलिए उसने उसे डांट दिया। उसके सहपाठी भी उसके अंक अच्छे न आने को लेकर उसे चिढ़ाया करते थे। यह पता चलने के बाद, अपने बेटे पर गुस्सा होने और उसकी भावनाओं को चोट पहुंचाने से पहले स्थिति न जाँचने के लिए मैं खुद से नफरत करने लगी। लेकिन एक माँ के रूप में अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए, मैंने अपने बेटे के सामने कोई गलती स्वीकार नहीं की।

तब से, मैंने देखा कि मेरे बड़े बेटे का अपने छोटे भाई और बहन के प्रति रवैया बद से बदतर होता जा रहा था। जब भी वे कुछ ऐसा करते थे जो उसे पसंद नहीं होता था, तो वह उन्हें धमकाता था, “क्या तुम नहीं समझ रहे हो कि मैं तुमसे क्या कह रहा हूँ? यदि तुमने मेरी बात नहीं मानी, तो मैं तुम्हें मारूँगा!” जिस तरह से वो उनसे बात करता था, और उसका स्वर बिल्कुल उसी तरह था जैसे मैं उसके साथ व्यवहार करती थी। थोड़ी देर के लिए मैं कुछ समझ नहीं पा रही थी, मैं बहुत असहाय महसूस कर रही थी। मैंने सोचा, आखिर क्यों मैं अपने बेटे को शिक्षित करने के लिए इतने कष्ट उठा रही हूँ जब मुझे यही परिणाम मिलने हैं? मुझे क्या करना चाहिए? मैं अपने बेटे को शिक्षित करूँ तो कैसे?

अपनी समस्याओं को समझने के बाद मैंने खुद को अपने बेटे के कर्ज़दार के रूप में महसूस किया

बाद में, मैंने देखा कि मेरी पड़ोसन का बच्चा (मेरी पड़ोसन एक ईसाई था) बहुत अच्छा आचरण वाला था, और मैंने मन में सोचा: क्या ईसाईयों के बच्चे अन्य बच्चों की तुलना में अधिक अच्छे आचरण वाले हो सकते हैं? वह अपने बच्चे को कैसे शिक्षित करती है? तब मुझे याद आया कि चाची भी एक ईसाई हैं, और उनका बच्चा शरारती था, लेकिन अब बहुत अच्छा बर्ताव करता है। उन्होंने ऐसा कैसे किया? मुझे इस बारे में बहुत उत्सुकता महसूस हुई, इसलिए मैं उनसे संपर्क किया और उन्हें अपनी कठिनाइयों के बारे में बताया। उन्होंने मुझे बताया कि यह सब इसलिए हो रहा था क्योंकि मैं परमेश्वर के सामने नहीं आई थी, क्योंकि मुझे सच्चाई समझ में नहीं आई थी, और क्योंकि मैं अपने बेटे के साथ व्यवहार करने के लिए अपने क्रोध और भ्रष्ट स्वभाव पर भरोसा कर रही थी। उन्होंने बताया कि अगर हम सत्य समझ लेते हैं, सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना सीख लेते हैं, तो हम जान जायेंगे कि हमें अपने बच्चों को कैसे शिक्षित करना है। उसकी यह बात सुनकर मुझे आशा की झलक दिखने लगी। अपने बेटे को शिक्षित करने की खातिर, मैंने सत्य समझने का दृढ़ मन बना लिया। बाद में, मैंने अपनी चाची से मुझे उनकी कलीसिया में ले चलने के लिए कहा।

जब मैंने अपने बेटे को शिक्षित करने में आ रही अपनी परेशानियों के बारे में भाई-बहनों से बात कर ली, तो उन्होंने मेरे लिए परमेश्वर के वचनों का एक प्रासंगिक अंश पढ़ा: “जब एक बार किसी व्यक्ति के पास हैसियत आ जाती है, तो उसे अकसर अपने मिजाज़ पर नियन्त्रण पाने में कठिनाई होगी, और इस प्रकार वह अपने असंतोष को अभिव्यक्त करने और अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए घटनाओं का इस्तेमाल करने में आनन्द करेगा; वह अक्सर बिना किसी स्पष्ट कारण के क्रोध से आगबबूला होगा, जिससे अपनी योग्यता को प्रकट कर सके और दूसरे जान सकें कि उसकी हैसियत और पहचान अन्य सामान्य लोगों से अलग है। हाँ वास्तव में, भ्रष्ट लोग बिना किसी हैसियत के भी बार बार नियन्त्रण खो देते हैं। उनके व्यक्तिगत हितों के नुकसान के द्वारा उनका क्रोध बार बार प्रकट होता है। अपनी स्वयं की हैसियत और गरिमा की सुरक्षा करने के लिए, भ्रष्ट मानवजाति बार बार अपनी भावनाओं को व्यक्त करेगी और अपने अहंकारी स्वभाव को प्रकट करेगी… संक्षेप में, मनुष्य का क्रोध उसके भ्रष्ट स्वभाव में से ही निकलता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि इसका उद्देश्य क्या है, यह शारीर और स्वभाव से है; इसका न्याय और अन्याय से कोई लेना देना नहीं है क्योंकि मनुष्य के स्वभाव और हस्ती में ऐसा कुछ नहीं है जो सत्य के अनुरूप हो” (“स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II”)।

बहनों में से एक ने संगति करते हुए कहा, “जब हमारे बच्चे शरारती होते हैं तो वे चीजों को ठीक से नहीं समझते हैं, माता-पिता होने के नाते उन्हें सिखाना हमारी ज़िम्मेदारी है—इसमें कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन जब हम शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिए जाते हैं, तो हमारी प्रकृति अत्यधिक घमंडी, दम्भी, खुद को महत्वपूर्ण और हमेशा सही मानने वाली हो जाती है। हम हमेशा चाहते हैं कि दूसरे वो सुनें जो हम कह रहे हैं, हम अपने घमंड में चूर होते हैं, और हम अपने बच्चों के साथ भी ऐसे ही व्यवहार करते हैं। हम अक्सर अपने बच्चों को माता-पिता के नज़रिए से शिक्षा देते हैं, उसने हमारी इच्छा के अनुसार काम करने को कहते हैं; जब हमारे बच्चे हमारी बात नहीं मानते हैं, तो हम तर्कहीन हो जाते हैं, उन पर क्रोधित हो जाते हैं, और हम माँ-बाप के रूप में अपनी गरिमा बनाये रखने के लिए उन्हें हमारा कहा मानने पर मजबूर करते हैं; जब हमारे बच्चे कुछ गलत करते हैं या वे हमारी मांगों को पूरा करने में विफल रहते हैं, तो हम उनमें निराश हो जाते हैं, उनके कारण शर्मिंदा महसूस करते हैं, इसलिए हम उन्हें नियंत्रित करने, उन्हें अपनी अपेक्षाओं और मानकों के अनुसार बनाने के लिए हर तरह के तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। हम अपने बच्चों के नज़रिए से उनकी कठिनाइयों के बारे में विचार किए बिना, शांति से उनका मार्गदर्शन किए बिना, उन्हें यह बताए बिना कि क्या सही है और क्या गलत, उनको शिक्षित करते हैं। हम बच्चों को अपनी मांगों के अनुसार जीने और बढ़ने के लिए मजबूर करते हैं, उन्हें विवश करते हैं, उन्हें बांधते और नुकसान पहुंचाते हैं, और हम अपने बच्चों को न केवल खुद से दूर कर देते हैं बल्कि हम उन पर नकारात्मक प्रभाव भी डालते हैं, और वे हमसे सीखते हैं कि दूसरों को नीचा दिखाते हुए उपदेश कैसे देना है। ये सभी बातें अपने घमंडी स्वभाव पर भरोसा करके अपने बच्चों को शिक्षित करने के परिणाम हैं! अगर हम सत्य के बगैर हैं और सिद्धांत के अनुसार बोलते या करती नहीं करते हैं, तो हम अपने बच्चों को अपने अभिमानी स्वभावों पर भरोसा करके शिक्षित करेंगे, इन सब के दौरान हम यही सोचते रहेंगे कि हम ये सब अपने बच्चों के प्यार के कारण करते हैं और इसलिए करते हैं कि हम उनका भला चाहते हैं। लेकिन नतीजा यह होता है कि हमारे बच्चे और हम स्वयं दर्द में जीने लगते हैं। अंत के दिनों में, देहधारी परमेश्वर न्याय और शुद्ध करने का अपना कार्य करने के लिए आए हैं। उन्होंने लाखों वचन व्यक्त किये हैं, उन्होंने शैतान द्वारा हमारे भ्रष्टाचार के सत्य को और हमारे शैतानी स्वभावों को उजागर किया है, और वह इस उम्मीद में ऐसा करते हैं कि हमें उनके वचनों के माध्यम से अपने स्वयं के शैतानी स्वभावों का पता चल जाएगा, हम स्पष्ट रूप से देख पाएंगे कि हमारे भ्रष्ट स्वभाव हमारे साथ दूसरों को भी नुकसान पहुंचाते हैं, अपने अभिभावकीय दृष्टिकोण को छोड़िये, अपने अभिमानी स्वभावों से जीना बंद करिये, लोगों से परमेश्वर के वचनों और अपेक्षाओं के अनुसार व्यवहार कीजिये, और एक सामान्य मानवता को जियें।”

परमेश्वर के वचनों और उस बहन की संगति के माध्यम से, मैंने अचानक प्रकाश देखा। हाँ वास्तव में, मैंने हमेशा अपने आप को अपने बेटे के अभिभावक के तौर पर देखा था, मुझे विश्वास था कि मैं चाहे जैसे भी उसे शिक्षित करूँ वह उसके लाभ के लिए है, और अगर मैं उसे पढ़ने या मेरी इच्छानुसार काम करने पर भी मजबूर करती हूँ, उस पर गुस्सा करती हूँ तो यह गलत नहीं है। केवल अब मुझे समझ आया कि मैं अपने अभिमानी स्वभाव पर भरोसा करके अपने बच्चे को शिक्षित कर रही थी। मैंने कहा था कि यह उसके भले के लिए है, लेकिन वास्तव में, मैंने एक अभिभावक के तौर पर अपनी गरिमा बनाए रखने और अपने आत्म-अभिमान को बनाये रखने के लिए ये सब किया था। मैंने ये भी देखा कि मैं सत्य के बिना थी और अपने बेटे को शिक्षित करने के लिए हमेशा अपने भ्रष्ट स्वभाव पर भरोसा करके, मैं केवल उसे अपने से ज़्यादा से ज़्यादा दूर कर रही थी, इस कारण जब स्कूल में उसके साथ कुछ गलत होता था, तो वह मुझे बताना नहीं चाहता था। बात उस हद तक पहुंच गयी थी जहाँ मैं उस पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही थी मैंने उसे सिखाया था कि अपने छोटे भाई-बहन को नीचा दिखाने के ढंग से उपदेश कैसे दिया जाए। अपने बेटे को शिक्षित करने का मेरा तरीका पूरी तरह से विफल हो गया था; न केवल मेरे बेटे को इससे कोई लाभ नहीं हुआ था, बल्कि उस पर इसका विपरीत प्रभाव भी पड़ा था। इस बारे में सोचते हुए, मैंने अपने बेटे के प्रति आभार की गहरी भावना महसूस की, और मैं अब उसके साथ अपने अभिमानी स्वभाव पर भरोसा करके व्यवहार नहीं करना चाहती थी।

बाद में, मैंने अपने बड़े बेटे के नाम एक क्षमा-पत्र लिखा: “मेरे बेटे, तुम्हारी माँ को बहुत अफ़सोस है! मैंने तुम्हारी भावनाओं के बारे में कुछ करने से पहले नहीं सोचा। यह सब तुम्हारी माँ की गलती है और मैं बदल जाऊँगी। क्या तुम अपनी माँ के साथ बदलना चाहते हो?” मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरे मुझे ये जवाब देगा, “माँ, मुझे पता है कि आप मुझ पर चिल्लाना नहीं चाहती हैं। मुझे पता है कि आप एक अच्छी माँ हैं और मैं आपसे प्यार करता हूँ! मैं आपके साथ बदलना चाहता हूँ।” मेरे बेटे के जवाब से मुझे बहुत राहत महसूस हुई। मैंने कभी नहीं सोचा था कि वह इतनी अच्छी तरह से चीजों को समझ सकता है। मैंने सोचा कि कैसे मैंने उसके साथ कभी दिल से दिल की बात नहीं की थी, कभी ये नहीं सुना कि वह अपने दिल में कैसा महसूस करता है, इसके बजाय उसके साथ व्यवहार करने में मैं हमेशा अपने अभिमानी स्वभाव पर भरोसा करती थी। इस बारे में सोचकर मुझे और भी शर्मिंदगी महसूस हुई।

अपने बेटे को परमेश्वर के समक्ष लाने के द्वारा मैंने उसे सर्वोत्तम शिक्षा दी

बाद में, मैंने एक उपदेश में एक अंश पढ़ा: “अपने गृहस्थ जीवन में, यदि लोग आपके परिवार के प्रभारी होते थे, तो आपको उन्हें उनके पद से हटा देना चाहिए। आपको सभी मूर्तियों को हटा देना चाहिए, परमेश्वर के वचनों को अपने घर का स्वामी बनाना चाहिए, और मसीह को शासन करने देना चाहिए। पति और पत्नी, पिता और पुत्र, माँ और बेटी—सभी को परमेश्वर के वचनों को एक साथ पढ़ना और संगति करनी चाहिए। यदि कोई समस्या या असहमति है, तो उसे प्रार्थना करने, परमेश्वर के वचनों को पढ़ने, और सत्य की संगति करने के माध्यम से हल किया जा सकता है। जैसे आप पहले, दूसरों की बातें सुनकर कार्य किया करते थे, वैसा न करें। लोगों को अन्य लोगों के कहे अनुसार कार्य नहीं करना चाहिए, उन्हें मसीह को बड़ा बनाना चाहिए, और मसीह के वचनों को अपने परिवार पर शासन करने देनी चाहिए, परमेश्वर के वचनों को अपने घर में कार्य करने देना चाहिए” (जीवन में प्रवेश पर उपदेश और संगति (VI) में “परमेश्वर के वचन ‘सत्य के लिए जियो चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो’ के बारे में उपदेश और संगति”)। सत्य वचन! परमेश्वर के वचन सत्य हैं और वे हमारे कार्यों और आचरण के सिद्धांत हैं। सभी बातों में, हमें परमेश्वर को सर्वोच्च बनाना चाहिए और उनके वचनों को शक्ति धारण करने देना चाहिए। मुझे पता था कि मुझे अपने बेटे को परमेश्वर के सामने लाना चाहिए और उसे भी परमेश्वर की सर्वोच्च के रूप प्रशंसा करने देना चाहिए और किसी भी समस्या के आने पर, उसे खुद को परमेश्वर के वचनों के अनुसार संचालित करने और कार्य करने देना चाहिए—क्या यह मेरे बेटे के लिए सबसे अच्छी शिक्षा नहीं होगी? इसके बाद, हर शाम मैं अपने बेटे के साथ बातें करने और परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के लिए समय निकालती थी, उसे बताती थी कि इन्सान को परमेश्वर ने वैसे ही बनाया था, जैसे कि स्वर्ग और पृथ्वी पर की सभी चीज़ों को बनाया था, यह परमेश्वर थे जो हमें राह दिखाते थे और हमें उनकी सुननी चाहिए। जब वह खेलना चाहता था और मेरी बात नहीं मानता था, तो मैं धैर्यपूर्वक उसे बताती थी कि परमेश्वर को कौन सा व्यवहार पसंद है और वह किस व्यवहार से उन्हें नफरत है, ताकि मेरा बेटा उनके बीच अंतर करना सीख जाए। कभी-कभी मेरा बेटा कहता कि उसने कोई गलती की है, तो मैं उसे अपना समय लेने के लिए प्रोत्साहित करती थी, साथ ही साथ उसे प्रार्थना करने और परमेश्वर पर भरोसा करने और परमेश्वर से मदद मांगने के लिए प्रेरित करती थी। धीरे-धीरे, मैंने देखा कि मेरा बेटा पहले से अधिक मुस्कुरा रहा था, वह फिर से मुझसे बात करने के लिए तैयार हो गया था, और हमारा मित्रवत व्यवहार बढ़ता ही गया।

एक दिन, उसकी शिक्षिका ने मुझे यह कहने के लिए बुलाया कि उसने एक अन्य बच्चे पर अपना आपा खो दिया था, क्योंकि वो उसे मिठाई नहीं दे रहा था, अपना आपा खोने के बाद, वह अपनी कुर्सी के नीचे छिप गया था। घर जाने के बाद, मैंने उससे पूछा कि उसने दूसरे बच्चे पर अपना आपा खोकर कुर्सी के नीचे क्यों छिप गया था। उसने कहा कि ऐसा इसलिए था क्योंकि उस बच्चे ने पूरी कक्षा में सभी को मिठाई दी थी, सिवाय उसके, इसलिए उसे गुस्सा आ गया था। लेकिन गुस्सा करने के बाद वह जानता था कि परमेश्वर को उस तरह का व्यवहार पसंद नहीं था, इसलिए वह अपनी कुर्सी के नीचे छिप गया और प्रार्थना की, और परमेश्वर से मदद मांगी कि वो और गुस्सा ना करे। उसे यह सब बोलते हुए सुनकर मुझे बहुत राहत मिली, और मैंने उससे कहा, “अगली बार, अपना आपा खोने से पहले परमेश्वर से प्रार्थना करना याद रखना!” मेरे बेटे ने हंसते हुए कहा, “मुझे पता है, माँ!”

अब, मुझे और मेरे बेटे को परमेश्वर पर विश्वास करते हुए छह महीने से अधिक हो गये हैं और, परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में, मैं अब उस पर गुस्सा नहीं करती, जैसे मैं पहले करती थी। मेरा बड़ा बेटा भी बहुत समझदार हो गया है, अब जब वह अपना होमवर्क करता है, तो मुझे उसकी देखरेख करने की ज़रूरत नहीं पड़ती है। उसके अंक भी बेहतर हो रहे हैं, और अभी ही स्कूल में डी से बी ग्रेड पर पहुंच गया है। मुझे पता है कि यह सब परमेश्वर के मार्गदर्शन के कारण हुआ है और यह परमेश्वर के कार्य का परिणाम है! अपने स्वयं के अनुभवों के बारे में सोचते हुए, मैं वास्तव में स्वीकार करती हूँ कि यह परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन ही था जिसने मुझे अपने स्वयं के भ्रष्ट स्वभावों का कुछ ज्ञान प्राप्त करने और अभ्यास करने का एक मार्ग पाने में सक्षम बनाया, और तभी मुझे समझ में आया कि कैसे मुझे अपने बेटे को शिक्षित करना है और एक सुखी अभिभावक बनना है। परमेश्वर का धन्यवाद!

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