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परमेश्वर राज्य के युग में न्याय और ताड़ना के अपने कार्य को कैसे पूरा करता है?

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आइए देखते हैं कि परमेश्वर राज्य के युग में न्याय और ताड़ना के अपने कार्य को कैसे पूरा करता है; यहाँ परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की गवाही देने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को उद्धृत करना आवश्यक है।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: “इस समय जब परमेश्वर देहधारी हुआ, तो उसका कार्य, प्राथमिक रूप में ताड़ना और न्याय के द्वारा, अपने स्वभाव को व्यक्त करना है। इसे नींव के रूप में उपयोग करके वह मनुष्य तक अधिक सत्य को पहुँचाता है, अभ्यास करने के और अधिक मार्ग दिखाता है, और इस प्रकार मनुष्य को जातने और मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से बचाने के अपने उद्देश्य को प्राप्त करता है। राज्य के युग में परमेश्वर के पीछे यही निहित है।

“केवल वही जो परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करता है” से

अपने न्याय का कार्य करने में, परमेश्वर केवल कुछ वचनों से ही मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता है; वह लम्बे समय तक इसे उजागर करता है, इससे निपटता है, और इसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने की इन विधियों, निपटने, और काट-छाँट को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसे मनुष्य बिल्कुल भी धारण नहीं करता है। केवल इस तरीके की विधियाँ ही न्याय समझी जाती हैं; केवल इसी तरह के न्याय के माध्यम से ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति समर्पण में पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इसके अलावा मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य जिस चीज़ को उत्पन्न करता है वह है परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य के बारे में मनुष्य में समझ। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा की, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य की, और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त करने देता है जो उसके लिए अबोधगम्य हैं। यह मनुष्य को उसके भ्रष्ट सार तथा उसकी भ्रष्टता के मूल को पहचानने और जानने, साथ ही मनुष्य की कुरूपता को खोजने देता है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य के द्वारा निष्पादित होते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया गया न्याय का कार्य है। यदि तुम इन सच्चाइयों को महत्व का नहीं समझते हो और निरंतर इनसे बचने के बारे में या इनसे अलग किसी नए मार्ग को पाने का विचार करते रहते हो, तो मैं कहूँगा कि तुम एक दारुण पापी हो। यदि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है, फिर भी सत्य को या परमेश्वर की इच्छा को नहीं खोजते हो, न ही परमेश्वर के निकट लाने वाले मार्ग को प्यार करते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो न्याय से बचने की कोशिश कर रहा है, और यह कि तुम एक कठपुतली और ग़द्दार हो जो महान श्वेत सिंहासन से दूर भाग रहा है। परमेश्वर ऐसे किसी भी विद्रोही को नहीं छोड़ेगा जो उसकी आँखों के नीचे से बचकर भागता है। इस प्रकार के लोग और भी अधिक कठोर दण्ड पाएँगे।

“मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है” से

अपने न्याय का कार्य करने में, परमेश्वर केवल कुछ वचनों से ही मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता है; वह लम्बे समय तक इसे उजागर करता है, इससे निपटता है, और इसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने की इन विधियों, निपटने, और काट-छाँट को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसे मनुष्य बिल्कुल भी धारण नहीं करता है। केवल इस तरीके की विधियाँ ही न्याय समझी जाती हैं; केवल इसी तरह के न्याय के माध्यम से ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति समर्पण में पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इसके अलावा मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य जिस चीज़ को उत्पन्न करता है वह है परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य के बारे में मनुष्य में समझ। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा की, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य की, और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त करने देता है जो उसके लिए अबोधगम्य हैं। यह मनुष्य को उसके भ्रष्ट सार तथा उसकी भ्रष्टता के मूल को पहचानने और जानने, साथ ही मनुष्य की कुरूपता को खोजने देता है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य के द्वारा निष्पादित होते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया गया न्याय का कार्य है।

“देहधारण का रहस्य (4)” से

परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य उसे जाने, और उसकी गवाही को जाने। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव पर परमेश्वर के न्याय के बिना, मनुष्य परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को नहीं जानेगा जो कोई भी अपराध की अनुमति नहीं देता है, और परमेश्वर के बारे में अपनी पुरानी जानकारी को नई जानकारी में बदल नहीं सकता है। परमेश्वर की गवाही के लिए, और परमेश्वर के प्रबंधन की ख़ातिर, परमेश्वर अपनी सम्पूर्णता को सार्वजनिक बनाता है, इस प्रकार से मनुष्य को परमेश्वर का ज्ञान हासिल करने, अपने स्वभाव को बदलने, और परमेश्वर के सार्वजनिक प्रकटन के माध्यम से परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम बनाता है। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन परमेश्वर के विभिन्न कार्यों के द्वारा प्राप्त होता है; मनुष्य के स्वभाव में इस प्रकार के परिवर्तन के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ होगा, और परमेश्वर के हृदय के अनुसार नहीं बन सकता है। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधनों से मुक्त करा लिया है, अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है और परमेश्वर के कार्य के लिए वास्तव में एक मॉडल और नमूना बन गया है, सचमुच परमेश्वर के लिए गवाह बन गया है और परमेश्वर के हृदय के अनुसार व्यक्ति बन गया है। आज, देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर अपना कार्य करने के लिए आया है, और वह चाहता है कि मनुष्य उसका ज्ञान रखे, आज्ञापालन करे, उसकी गवाही दे – उसके व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जाने, उसके सम्पूर्ण वचन और कार्य का पालन करे जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होते हैं और मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के सभी कार्य , और उऩ सभी कार्यों की गवाही दे जो परमेश्वर मनुष्य को जीतने के लिए करता है। जो परमेश्वर के लिए गवाही देते हैं उनके पास परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस प्रकार की ही गवाही यथार्थ और वास्तविक होती है, और केवल इस प्रकार की गवाही ही शैतान को शर्मसार कर सकती है। परमेश्वर उन्हें इस्तेमाल करता है जो उसके न्याय और ताड़ना, व्यवहार और कांट-छांट से गुजर कर उसे जानने आए हैं ताकि परमेश्वर की गवाही दे सकें। वह उनका इस्तेमाल करता है जो शैतान द्वारा भ्रष्ट बना दिए गए हैं ताकि वे पमेश्वर की गवाही दे सकें, और उन्हें भी इस्तेमाल करता है जिनके स्वभाव बदल चुके होते हैं, और जिन्होंने उसकी आशीषें प्राप्त कर ली हों, ताकि उसकी गवाही दे सकें। उसे मनुष्यों की इसलिए जरूरत नहीं है कि वे केवल शब्दों से उसकी तारीफ करें, न ही वह शैतान किस्म के लोगों द्वारा अपनी प्रशंसा और गवाही चाहता है, जो परमेश्वर के द्वारा बचाए न गए हों। जो कोई परमेश्वर को जानते हैं केवल वे उसकी गवाही देने के योग्य हैं और जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हों केवल वे ही उसकी गवाही के लिए योग्य हैं, और परमेश्वर मनुष्य को अनुमति नहीं देगा कि वे जानबूझ कर उसके नाम को शर्मसार करें।

“केवल वही जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही दे सकते हैं” से

तुझे यह जानना चाहिए कि मनुष्यों को पूर्ण बनाने का, मनुष्यों को पूरा करने और मनुष्यों को जीतने का परिणाम हुआ है केवल तलवारें और उनके देह के लिए मार-काट, और साथ आई हैं अंतहीन पीड़ा, आग की जलन, निर्दयी न्याय, ताड़ना और अभिशाप, साथ ही असीम परीक्षण भी। ऐसी है अन्दर की कहानी और सच्चाई मानव के प्रबंधन के कार्य की। फिर भी, इन सब बातों का उद्देश्य मनुष्य के देह के विरोध में है, और शत्रुता के भालों की सभी नोकें निर्दयता से मनुष्य के देह के प्रति निर्देशित हैं (क्योंकि मनुष्य मूल रूप से निर्दोष था)। ये सब उसकी महिमा और गवाही के लिए और उसके प्रबंधन के लिए हैं। इसका कारण यह है कि उसका कार्य पूरी तरह से केवल मानव जाति के लिए ही नहीं है, बल्कि यह पूरी योजना के लिए है और मानव जाति को बनाते समय उसकी जो मूल इच्छा थी, उसे पूरा करने के लिए है। इसलिए, शायद नब्बे प्रतिशत लोग जिन्हें अनुभव करते हैं, वे हैं पीड़ाएँ और अग्नि-परीक्षाएँ, लेकिन वो मीठे और खुशहाल दिन बहुत कम या बिलकुल नहीं हैं जिसके लिए मनुष्य के देह तड़पते हैं, और परमेश्वर के साथ खूबसूरत शामों को बिताकर उनके खुशहाल पलों का देह में आनंद लेने के लिए वे और भी अधिक असमर्थ हैं। देह भ्रष्ट है, इसलिए मनुष्य का देह जो देखता है या जिसका भोग करता है, वह परमेश्वर की ताड़ना के अलावा और कुछ नहीं जो मनुष्य को पसंद नहीं है, और यह ऐसा है मानो इसमें साधारण विवेक-बुद्धि की कमी हो। इसका कारण यह है कि वह अपने धर्मी स्वभाव को प्रकट करेगा जो मनुष्य को प्रिय नहीं है, जो मनुष्य के अपराधों को बर्दाश्त नहीं करता है, और दुश्मनों से घृणा करता है। परमेश्वर अपने स्वभाव को पूरी तरह प्रकाशित करता है चाहे जिस किसी माध्यम की आवश्यकता पड़े, इस तरह शैतान के साथ उसके छह हजार वर्षों के युद्ध के कार्य को समाप्त करते हुए—वह कार्य जो समग्र मानव-जाति की मुक्ति और पुराने शैतान के विनाश का है!

“मानव जाति के प्रबंधन का उद्देश्य” से

अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सभी चीजों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, और उनकी प्रकृति के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जाएगा। यही वह समय है जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और उनकी मंज़िल को प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय से नहीं गुज़रते हैं,तो उनकी अवज्ञा और अधार्मिकता को प्रकट करने का कोई तरीका नहीं होगा। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी चीजों का अंत प्रकट हो सकता है। मनुष्य केवल तभी अपने वास्तविक रंगों को दिखाता है जब उसे ताड़ना दी जाती है और उसका न्याय किया जाता है। बुरा बुरे के साथ रखा जाएगा, अच्छा अच्छे के साथ रखा जाएगा, और लोगों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से, सभी चीजों का अंत प्रकट होगा, ताकि बुराई को दंडित किया जाएग और अच्छे को पुरस्कृत किया जाएगा, और सभी लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन नागरिक बन जाएँगे। सभी कार्य धर्मी ताड़ना और न्याय के माध्यम से अवश्य प्राप्त किया जाना चाहिए। क्योंकि मनुष्य की भ्रष्टता अपने चरम पर पहुँच गई है और उसकी अवज्ञा अत्यंत गंभीर रही है, केवल परमेश्वर का धर्मी स्वभाव ही, जो मुख्यत: ताड़ना और न्याय का है और जो अंत के दिनों दिनों में प्रकट होता है, मनुष्य को रूपान्तरित और पूरा कर सकता है। केवल यह स्वभाव ही बुराई को उजागर कर सकता है और इस तरह सभी अधर्मियों को गंभीर रूप से दण्डित कर सकता है।

“परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)” से

तुम सबों को देखना चाहिये कि परमेश्वर की इच्छा और कार्य आकाश और पृथ्वी के सृजन और अन्य सब वस्तुओं के सृजन के समान आसान नहीं हैं। आज का कार्य उन लोगों का रूपांतरण करना है जो भ्रष्ट हो चुके हैं, और अत्यधिक सुन्न हो चुके हैं, और उन्हें शुद्ध करना है जो सृजे जाने के बाद शैतान के अनुसार चले हैं, आदम और हव्वा के सृजन करना नहीं, ज्योति की सृष्टि या अन्य सभी पेड़ पौधों और पशुओं के सृजन की तो बात ही दूर है। अब उसका काम उन सबको शुद्ध करना है जिन्हें शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है ताकि उनको फिर से हासिल किया जा सके और वे उसकी संपत्ति और उसकी महिमा बनें। यह कार्य उतना आसान नहीं जितना मनुष्य आकाश और पृथ्वी के सृजन और अन्य वस्तुओं के सृजन के संबंध में कल्पना करता है, और न ही यह शैतान को शाप देकर अथाह कुंड में डालने के समान है जैसा मनुष्य कल्पना करता है। बल्कि, यह तो मनुष्य को रूपांतरित करने के लिए है, वह जो नकारात्मक है उसे सकारात्मक बनाने के लिए है और उन सबको अपने अधिकार में लाने के लिए जो परमेश्वर के नहीं है। परमेश्वर के कार्य के इस चरण की यह भीतरी कहानी है। तुम को यह एहसास होना चाहिये, और मामलों को अतिसरल नहीं समझना चाहिये। परमेश्वर का कार्य किसी साधारण कार्य के समान नहीं है, मनुष्य का मन उसके अद्भुत स्वरूप को आत्मसात नहीं कर सकता, और न उसमें निहित बुद्धि को प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर सब चीजों का सृजन नहीं कर रहा, और न ही विनाश कर रहा है। बल्कि, वह अपनी समस्त सृष्टि को बदल रहा है और शैतान के द्वारा अशुद्ध की गई सब चीजों को शुद्ध कर रहा है। इसलिये, परमेश्वर महान परिमाण का काम शुरू करेगा, और यह परमेश्वर के कार्य का कुल महत्व है। इन वचनो से, क्या तुम विश्वास करते हो कि परमेश्वर का कार्य बहुत आसान है?

“क्या परमेश्वर का कार्य इतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?” से

क्या अब तुम समझ गए कि न्याय क्या है और सत्य क्या है? यदि तुम समझ गए हो, तो मैं तुम्हें न्याय किए जाने हेतु आज्ञाकारी ढंग से समर्पित होने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ, अन्यथा तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा प्रशंसा किए जाने या परमेश्वर द्वारा उसके राज्य में ले जाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा। जो केवल न्याय को स्वीकार करते हैं परन्तु कभी भी शुद्ध नहीं किए जा सकते हैं, अर्थात्, जो न्याय के कार्य के बीच ही भाग जाते हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर द्वारा नफ़रत किए जाएँगे और अस्वीकार कर दिए जाएँगे। फरीसियों के पापों की तुलना में उनके पाप बहुत अधिक हैं, और अधिक दारुण हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है और वे परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही हैं। इस प्रकार के लोग जो सेवा करने के योग्य भी नहीं है अधिक कठोर दण्ड प्राप्त करेंगे, ऐसा दण्ड जो इसके अतिरिक्त चिरस्थायी है। परमेश्वर किसी भी गद्दार को नहीं छोड़ेगा जिसने एक बार तो वचनों से वफादारी दिखायी मगर फिर परमेश्वर को धोखा दिया। इस तरह के लोग आत्मा, प्राण और शरीर के दण्ड के माध्यम से प्रतिफल प्राप्त करेंगे। क्या यह हूबहू परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को प्रकट नहीं करता है? क्या मनुष्य का न्याय करने, और उसे प्रकट करने में यह परमेश्वर का उद्देश्य नहीं है? परमेश्वर उन सभी को जो न्याय के समय के दौरान सभी प्रकार के दुष्ट कर्म करते हैं दुष्टात्माओं से पीड़ित स्थान में भेजता है, इन दुष्टात्माओं को इच्छानुसार उनके दैहिक शरीरों को नष्ट करने देता है। उनके शरीरों से लाश की दुर्गंध निकलती है, और ऐसा ही उनके लिए उचित दण्ड है। परमेश्वर उन निष्ठाहीन झूठे विश्वासियों, झूठे प्रेरितों, और झूठे कार्यकर्ताओं के हर एक पाप को उनकी अभिलेख पुस्तकों में लिखता है; फिर, जब सही समय आता है, वह उन्हें इच्छानुसार गंदी आत्माओं के बीच में फेंक देता है, इन अशुद्ध आत्माओं को अपनी इच्छानुसार उनके सम्पूर्ण शरीरों को दूषित करने देता है, ताकि वे कभी भी पुनः-देहधारण नहीं कर सकें और दोबारा कभी भी रोशनी को नहीं देख सकें। वे पाखण्डी जिन्होंने किसी समय सेवकाई की किन्तु अंत तक वफादार बने रहने में असमर्थ हैं परमेश्वर द्वारा दुष्टों में गिने जाते हैं, ताकि वे दुष्टों की सलाह पर चलें, और उनकी उपद्रवी भीड़ का हिस्सा बन जाएँ; अंत में, परमेश्वर उन्हें जड़ से मिटा देगा। परमेश्वर उन लोगों को अलग फेंक देता है और उन पर कोई ध्यान नहीं देता है जो कभी भी मसीह के प्रति वफादार नहीं रहे हैं या जिन्होंने कोई भी प्रयास समर्पित नहीं किया है, और युगों के बदलने पर उन सभी को जड़ से मिटा देगा। वे पृथ्वी पर अब और अस्तित्व में नहीं रहेंगे, परमेश्वर के राज्य में मार्ग तो बिल्कुल नहीं प्राप्त करेंगे। जो कभी भी परमेश्वर के प्रति ईमानदार नहीं रहे हैं किन्तु परमेश्वर के साथ बेपरवाह ढंग से व्यवहार करने के लिए परिस्थितिवश मजबूर किए जाते हैं उनकी गिनती ऐसे लोगों में होती है जो परमेश्वर के लोगों के लिए सेवा करते हैं। ऐसे लोगों की छोटी सी संख्या ही जीवित बचती है, जबकि बहुसंख्य उन लोगों के साथ तबाह हो जाएँगे जो सेवा करने के भी योग्य नहीं हैं। अंत में, परमेश्वर उन सभी को जिनका मन परमेश्वर के समान है, लोगों को और परमेश्वर के पुत्रों को और साथ ही पादरी बनाए जाने के लिए परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत लोगों को, अपने राज्य में ले आएगा। परमेश्वर द्वारा अपने कार्य के माध्यम से प्राप्त किया गया आसव ऐसा ही होता है। जहाँ तक उनका प्रश्न है जो परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी श्रेणी में पड़ने में असमर्थ हैं, वे अविश्वासियों में गिने जाएँगे। और तुम लोग निश्चित रूप से कल्पना कर सकते हो कि उनका परिणाम क्या होगा। मैं तुम सभी लोगों से पहले ही वह कह चुका हूँ जो मुझे कहना चाहिए; जिस मार्ग को तुम लोग चुनते हो वह तुम लोगों का लिया हुआ निर्णय होगा। तुम लोगों को जो समझना चाहिए वह है किः परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी का भी इंतज़ार नहीं करता है जो उसके साथ तालमेल बनाए नहीं रख सकता है, और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी मनुष्य के प्रति कोई दया नहीं दिखाता है।

“मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है” से

तुम्हारा परमेश्वर के शब्दों के न्याय, ताड़ना, प्रहार, और शुद्धिकरण को स्वीकार करने में सक्षम होना, और इसके अलावा, परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार कर पाना, समय की शुरुआत में परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित किया गया था, और इस प्रकार जब तुम्हें प्रताड़ित किया जाए तो तुम्हें बहुत व्यथित नहीं होना चाहिए। तुम लोगों में जो कार्य किया गया है, और तुम सब के भीतर जो आशीर्वाद दिए गए हैं उन्हें कोई भी दूर नहीं कर सकता है, और जो सब तुम सभी को दिया गया है वह कोई भी छीन कर नहीं ले जा सकता है। धर्म के लोग तुम सब के साथ तुलना में ठहर नहीं सकते। तुम लोगों के पास बाइबल में महान विशेषज्ञता नहीं हैं, और तुम सब धार्मिक सिद्धांत से लैस नहीं हो, परन्तु चूँकि परमेश्वर ने तुम सभी के भीतर कार्य किया है, तुम लोगों ने सारे युगों में अन्य किसी से भी ज्यादा लाभ पाया है—और इसलिए यह तुम लोगों का सबसे बड़ा आशीर्वाद है। इस वजह से, तुम सभी को परमेश्वर के प्रति और भी अधिक समर्पित होना चाहिए, परमेश्वर के प्रति और भी अधिक निष्ठावान। क्योंकि परमेश्वर तुम्हें उठाता है, तुम्हें अपने प्रयासों को संभालना होगा, और परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार करने के लिए अपने कद को तैयार करना होगा। परमेश्वर द्वारा दी गई जगह में तुम्हें दृढ़ खड़ा होना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के लोगों में से एक बनने का अनुसरण करना, राज्य के प्रशिक्षण को स्वीकार करना, परमेश्वर द्वारा विजित होना चाहिए और अंततः परमेश्वर का एक गौरवपूर्ण साक्षी बनना चाहिए। इन संकल्पों में से कितने तुम्हारे पास हैं? यदि तुम्हारे पास ऐसे संकल्प हैं, तो अंततः तुम निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त होगे, और परमेश्वर के लिए एक शानदार गवाह बन जाओगे। तुम्हें यह समझना चाहिए कि प्रमुख आदेश परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाना है और परमेश्वर के लिए एक शानदार साक्षी बन जाना है। यही परमेश्वर की इच्छा है।

“परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और परमेश्वर के चरण-चिन्हों का अनुसरण करो” से

उपरोक्त परमेश्वर के वचनों के कई अनुच्छेदों से, हम स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि अंत के दिनों में परमेश्वर का न्याय का कार्य मनुष्य को शुद्ध करने, मनुष्य को बचाने और मनुष्य को सिद्ध करने का कार्य है। न्याय का कार्य सबसे पहले मनुष्य पर विजय प्राप्त करना, और फिर मनुष्य को सिद्ध करना है। केवल जीते जाने के बाद ही कोई व्यक्ति सच में परमेश्वर के कार्य का पालन कर सकता है, सच्चाई का पीछा कर सकता है और परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है, और धीरे-धीरे परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किया जा सकता है। केवल वे लोग ही जो परमेश्वर के वचनों द्वारा जीते जा चुके हैं, वास्तव में परमेश्वर के सामने स्वयं को दण्डवत कर सकते हैं, एक ऐसा हृदय उत्पन्न कर सकते हैं जो परमेश्वर का सम्मान करता है और परमेश्वर के कार्य का पालन करता है। केवल वे लोग ही जो परमेश्वर के वचनों द्वारा जीते जा चुके हैं, जान सकते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव अपराध को बिल्कुल भी सहन नहीं करता है। केवल ऐसे लोग ही सच में जान सकते हैं कि मानवजाति की भ्रष्टता गहरी है, कि वे उस प्रकार के हैं जो परमेश्वर के विरूद्ध विद्रोह करते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं, कि वे शैतानी स्वभाव से भरे हुए हैं, और निरंतर और आवेगपूर्ण रूप से परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करते हैं और उसका विरोध करते हैं। केवल वे लोग ही जो परमेश्वर के वचनों द्वारा जीते जा चुके हैं, स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि भ्रष्ट मानवजाति परमेश्वर से मिलने के योग्य नहीं है; वे केवल शुद्धिकरण प्राप्त करने और उद्धार प्राप्त करने के लिए ही परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करने में ईमानदार और सभ्य हो सकते हैं। केवल यही वह व्यक्ति है जो सच में परमेश्वर की ओर मुड़ता है, और परमेश्वर के कार्य का पालन करता है। यह केवल जीते जाने के बाद ही है कि कोई व्यक्ति सच्चाई का पीछा करना शुरू कर सकता है और परमेश्वर के विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर के कार्य का पालन कर सकता है, और उसके बाद परमेश्वर का उद्धार और उसकी सिद्धता प्राप्त कर सकता है।

धर्मोपदेशों—जीवन के लिए आपूर्ति—के संग्रह में “अंत के दिनों में न्याय और ताड़ना के परमेश्वर के कार्य को कैसे जानें” से

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