अब सत्ता से डर नहीं

04 फ़रवरी, 2022

क्षीयोहान, चीन

इस फरवरी में कलीसिया की एक अगुआ बहन वांग मेरे समूह की सभा में बहन सॉन्ग को लेकर आईं और कलीसिया की एक नई चुनी गई अगुआ के रूप में उसका परिचय कराया, जो अब से उनके साथ काम करेगी। इसके बाद बहन सॉन्ग कुछ बार हमसे मिलने आई, लेकिन हमेशा कोई चीज पहुँचाने या किसी बात की सूचना देने के लिए ही आई, कभी किसी सभा में शामिल होकर हमारे काम को बेहतर समझने और जीवन-प्रवेश में हमारी समस्याएँ जानने के लिए नहीं आई। मुझे लगा, शायद वह बहुत व्यस्त है और उसके पास हमारे काम की बारीकियाँ समझने का वक्त नहीं है, इसलिए हमें अपने काम में और मेहनत करने की जरूरत है।

मार्च के शुरु में एक दिन, बहन सॉन्ग ने अपने अनुभवों के बारे में एक निबंध लिखा और उसमें सुधार के लिए मुझसे सुझाव माँगे। यह 1,000 शब्दों से थोड़ा बड़ा था, और अस्पष्ट-सा लगता था, जिसमें ब्योरे की कमी थी। जब मैंने उससे यह बात कही, तो उसने बताया कि वह 2008 से विश्वासी है, और कुछ साल पहले बीमार पड़ने तक, पूरे समय वह अगुआ के रूप में ही सेवा कर रही थी। उसे लगा कि इतने वर्षों तक लगातार कर्तव्य निभाने से वह थक गई है, इसलिए उसने नौकरी करने का फैसला किया। वह तीन वर्षों से न तो किसी सभा में जा रही थी और न ही परमेश्वर के वचन पढ़ रही थी। यह सुनकर मैं चौंक गई, इसलिए मैंने उससे पूछा कि क्या कलीसिया का जीवन जिए बिना और परमेश्वर के वचन पढ़े बिना इतने साल बिताकर उसे दिल में दर्द महसूस होता है? उसने कहा, "मुझे सचमुच कुछ महसूस नहीं होता।" उसने आगे कहा कि तीन महीने पहले जिस सुपरमार्केट में वह काम करती थी, वहाँ कलीसिया के अन्य सदस्यों से उसकी मुलाक़ात हो गई, जिन्होंने उसे लौट आने को कहा। मैं उलझन में पड़ गई और मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा। मैंने सोचा, "तीन साल कलीसिया से बाहर रहने के बाद क्या यह सिर्फ तीन महीने पहले आकर कलीसिया में अगुआ का पद सँभाल सकेगी?" मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आए : "अगुआओं और कार्यकर्ताओं को परमेश्वर के वचनों की संगति करने में सक्षम होना चाहिए, परमेश्वर के वचनों से अभ्यास करने के लिए मार्ग खोजने में सक्षम होना चाहिए, उन्हें परमेश्वर के वचनों को समझने और उन्हें अपने दैनिक जीवन में अनुभव करने और उनमें प्रवेश करने में लोगों की अगुआई करनी चाहिए। उन्हें परमेश्वर के वचनों को अपने दैनिक जीवन में शामिल करने में सक्षम होना चाहिए, और जब उनके सामने कोई समस्या आए, तो उन्हें परमेश्वर के वचनों का उपयोग करके उसे हल करने में सक्षम होना चाहिए; उन्हें इसलिए भी परमेश्वर के वचनों का उपयोग करने में सक्षम होना चाहिए कि वे अपने कर्तव्य का पालन करते हुए विभिन्न कठिनाइयों का सामना कर सकें" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'नकली अगुआओं की पहचान करना (1)')। वह कई साल तक कलीसिया से बाहर रही, आध्यात्मिक रूप से सुन्न थी, कोई व्यावहारिक अनुभव नहीं था। भाई-बहनों की मदद करने के लिए वह सत्य के बारे में संगति कैसे कर सकेगी? उसे अगुआ के रूप में चुनना सिद्धांतों के विरुद्ध था। उस समय मैंने सोचा, शायद इसे इसकी अच्छी काबिलियत और सत्य को शीघ्र समझने के कारण चुना गया हो। मैं कुछ नहीं बोली।

फिर कुछ दिन बाद, मैं अपने समूह की बहन झांग और बहन झोऊ के साथ सभा कर रही थी, उन्होंने कहा कि उनके विचार से बहन सॉन्ग को अगुआ नहीं होना चाहिए, और कि दूसरे कुछ लोगों ने भी शंका जताई है, कि किस आधार पर बहन सॉन्ग को पदोन्नत किया गया है। बहन सॉन्ग को सभाओं में साझा करने के लिए परमेश्वर के वचनों की कोई सच्ची समझ नहीं थी, और कभी-कभी कोई अंश पढ़ने के बाद वह बस उसका सारांश बता देती। जब भाई-बहन अपनी समस्याएँ लेकर उसके पास आते, तो उसे समझ न आता कि क्या कहे। बहन झांग और बहन झोऊ ने इस बारे में हमारी अगुआ बहन वांग से चर्चा की, लेकिन वे बस इतना बोलीं कि बहन सॉन्ग ने पहले अगुआ के रूप में हमेशा बहुत अच्छा काम किया था, और उसे दूसरे क्षेत्रों में काम करने के लिए भी पदोन्नत किया गया था। इस बार उसने अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपनी नौकरी छोड़ी है, और यह सब उसके सही व्यक्ति होने की ओर इशारा करता है, इसलिए उसे एक उच्च अगुआ द्वारा सीधे पदोन्नत किया गया है। मुझे लगा कि बहन वांग भी मुद्दा समझ नहीं पाईं। उन दो बहनों और मैंने इस बारे में सत्य की खोज की, और हमें परमेश्वर के वचनों का यह अंश मिला : "जो लोग कलीसिया की अगुवाई कर सकते हैं, लोगों को जीवन प्रदान कर सकते हैं, और लोगों के लिए प्रेरित हो सकते हैं, उनके पास वास्तविक अनुभव होने ही चाहिए; उन्हें आध्यात्मिक चीज़ों की सही समझ, सत्य की सही समझ और अनुभव होना चाहिए। ऐसे ही लोग कलीसिया की अगुवाई करने वाले कर्मी या प्रेरित होने के योग्य हैं। अन्यथा, वे न्यूनतम रूप में केवल अनुसरण ही कर सकते हैं, अगुवाई नहीं कर सकते, वे लोगों को जीवन प्रदान करने में समर्थ प्रेरित तो बिलकुल भी नहीं हो सकते। क्योंकि प्रेरित का कार्य भाग-दौड़ करना या लड़ना नही है; बल्कि जीवन की सेवकाई का कार्य करना और लोगों के स्वभाव में परिवर्तन लाने के लिए उनकी अगुवाई करना है। इस कार्य को करने वालों को बड़ा दायित्व दिया जाता है जिसे हर कोई नहीं कर सकता है। इस प्रकार के कार्य का बीड़ा केवल ऐसे लोगों द्वारा ही उठाया जा सकता है जिन्हें जीवन की समझ है, अर्थात जिन्हें सत्य का अनुभव है। इसे बस यों ही ऐसा कोई व्यक्ति नहीं कर सकता है जो त्याग कर सकता हो, भाग-दौड़ कर सकता हो या जो खुद को खपाने की इच्छा रखता हो; जिन्हें सत्य का कोई अनुभव नहीं है, जिनकी काट-छाँट या जिनका न्याय नहीं किया गया है, वे इस प्रकार का कार्य करने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग जिनके पास कोई अनुभव नहीं है, लोग जिनके पास कोई वास्तविकता नहीं है, वे वास्तविकता को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते, क्योंकि उनके पास ऐसा अस्तित्व नहीं होता। इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति न केवल अगुवाई का कार्य नहीं कर पाता, बल्कि यदि उसमें लम्बी अवधि तक कोई सत्य न हो, तो वह निष्कासन की वस्तु बन जाएगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य')। यह हमें दिखाता है कि अगुआ इस काबिल होने चाहिए कि वे सत्य को समझने में परमेश्वर के चुने हुए लोगों का मार्गदर्शन कर सकें, परमेश्वर के वचनों में पैठ सकें, लोगों की वास्तविक समस्याएँ सुलझाने के लिए सत्य के बारे में संगति कर सकें, और दूसरों की सेवा कर सकें। अगुआई सिर्फ थोड़ा जोश होने और कुछ त्याग करने से ताल्लुक नहीं रखती। परमेश्वर के घर के लिए अगुआ चुनने के सिद्धांतों में भी कहा गया है कि यह भाई-बहनों द्वारा चुनाव के जरिए किया जाना चाहिए, और सत्य का अनुसरण करने वाले लोग ही परमेश्वर के वचनों को पढ़ने और सत्य को उचित ढंग से समझने में दूसरों की अगुआई कर सकते हैं। बेशक, खास हालात में अगुआओं को सीधे भी पदोन्नत किया जा सकता है, फिर भी उन्हें मौलिक मानदंडों पर खरा उतरना होगा, और ज्यादातर संबंधित लोगों की स्वीकृति अपेक्षित होगी। बहन सॉन्ग बाहर रही थी, तीन साल तक कलीसिया के जीवन में भाग नहीं ले रही थी, उसे परमेश्वर के वचनों की वास्तविक समझ भी नहीं थी कि उन्हें साझा कर सके। वह जीवन-प्रवेश में लोगों की समस्याओं में मदद करने के लिए सत्य की खोज भी नहीं कर सकती थी, इसलिए अगुआ का बहन सॉन्ग को पदोन्नत करना सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन था।

हमें परमेश्वर के वचनों का एक और अंश भी मिला। "अगुआओं और कार्यकर्ताओं की श्रेणी के लोगों के उद्भव के पीछे क्या कारण है और उनका उद्भव कैसे हुआ? एक विराट स्तर पर, परमेश्वर के कार्य के लिए उनकी आवश्यकता है, जबकि अपेक्षाकृत छोटे स्तर पर, कलीसिया के कार्य के लिए उनकी आवश्यकता है, परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए उनकी आवश्यकता है। ... उनके और अन्य लोगों के कर्तव्यों में जो अंतर है, वह उनके एक विशिष्ट गुण से जुड़ा हुआ मामला है। यह विशिष्ट गुण क्या है? अगुआई के कार्य को विशिष्ट रूप से दर्शाया जाता है। उदाहरण के लिए, लोगों का एक समूह है जिसकी अगुआई एक व्‍यक्ति कर रहा है; अगर इस व्‍यक्ति को 'अगुआ' या 'कार्यकर्ता' कहा जाता है, तो समूह के अंदर इनका कार्य क्‍या है? (अगुआई का कार्य।) इस व्‍यक्ति की अगुआई का उन लोगों पर जिनकी वह अगुआई कर रहा है और कुल मिलाकर पूरे समूह पर क्‍या प्रभाव पड़ता है? वह समूह की दिशा और उसके मार्ग को प्रभावित करता है। इसका निहितार्थ यह है कि अगर अगुआ के पद पर आसीन यह व्‍यक्ति गलत मार्ग पर चलता है, तो इसके कारण, बिल्कुल कम-से-कम, उसके नीचे के लोग और पूरा समूह सही मार्ग से हट जाएगा; इससे भी अधिक, यह आगे बढ़ते हुए उस पूरे समूह की दिशा, साथ ही उसकी गति और चाल को बाधित कर सकता है या पूरी तरह रोक सकता है। इसलिए जब लोगों के इस समूह की बात आती है, तब वे जिस मार्ग का अनुसरण करते हैं और उनके द्वारा चुने गए मार्ग की दिशा, सत्‍य की उनकी समझ की सीमा और साथ ही परमेश्‍वर में उनका विश्‍वास न सिर्फ स्वयं उनको, बल्कि उनकी अगुआई के दायरे के भीतर सभी भाइयों और बहनों को प्रभावित करता है। अगर अगुआ सही व्‍यक्ति है, ऐसा व्‍यक्ति जो सही मार्ग पर चल रहा है और सत्‍य का अनुसरण और अभ्‍यास करता है, तो उसकी अगुआई में चल रहे लोग अच्छी तरह खाएँगे और पिएँगे और अच्छी तरह तलाश करेंगे, और, साथ ही साथ, अगुआ की व्यक्तिगत प्रगति दूसरों को निरंतर दिखाई देगी। तो, वह सही मार्ग क्‍या है जिस पर अगुआ को चलना चाहिए? यह है दूसरों को सत्‍य की समझ और सत्‍य में प्रवेश की ओर ले जाने, और दूसरों को परमेश्‍वर के समक्ष ले जाने में समर्थ होना। गलत मार्ग क्‍या है? यह है बार-बार स्वयं अपने को ऊँचा उठाना और स्वयं अपनी गवाही देना, प्रतिष्‍ठा, प्रसिद्धि तथा लाभ के पीछे भागना, और कभी भी परमेश्‍वर की गवाही न देना। इसका उनके नीचे के लोगों पर क्‍या प्रभाव पड़ता है? (यह उन लोगों को उनके समक्ष ले आता है।) लोग भटककर परमेश्‍वर से दूर चले जाएँगे और इस अगुआ के नियंत्रण में आ जाएँगे। अगर तुम लोगों को अपने समक्ष ले आने के लिए उनकी अगुआई करते हो, तो तुम उन्‍हें भ्रष्‍ट मनुष्यजाति के समक्ष ले आने के लिए उनकी अगुआई कर रहे हो, और तुम उन्‍हें परमेश्‍वर के समक्ष नहीं, शैतान के समक्ष ले आने के लिए उनकी अगुआई कर रहे हो। लोगों को सत्‍य के समक्ष ले आने के लिए उनकी अगुआई करना ही उन्‍हें परमेश्‍वर के समक्ष ले आने के लिए उनकी अगुआई करना है। अगुआ और कार्यकर्ता चाहे मार्ग सही पर चलें या गलत मार्ग पर, उनका परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर सीधा प्रभाव पड़ता है। जब परमेश्वर के चुने हुए लोगों ने सत्य नहीं समझा होता है, तो वे आँखें मूँदे अनुसरण करते हैं। उनका अगुआ भला हुआ तो वे उसका अनुसरण करेंगे; उनका अगुआ बुरा हुआ तो भी वे उसका अनुसरण करेंगे—वे भेद नहीं करते। वफादार किस रास्ते पर चलते हैं, इसका सीधा संबंध उस मार्ग से होता है जिस पर अगुआ और कार्यकर्ता चलते हैं, और वे उन अगुआओं तथा कार्यकर्ताओं द्वारा अलग-अलग मात्राओं में प्रभावित हो सकते हैं" ("मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे लोगों का दिल जीतना चाहते हैं')। मैं समझ सकी कि कोई अगुआ सत्य का अनुसरण करता है या नहीं और वह किस मार्ग पर है, यह बात सिर्फ उन्हें ही नहीं, बल्कि भाई-बहनों के जीवन-प्रवेश और कलीसिया के कार्य को भी प्रभावित करती है। अगर परमेश्वर के चुने हुए लोगों के पास सिंचन और सहारे के लिए एक अच्छा अगुआ हो, तो उनके लिए सत्य और उद्धार खोजने के मार्ग पर बने रहना आसान होता है। लेकिन अगर अगुआ कमजोर हो, जिसे परमेश्वर के वचनों की सही समझ न हो या जो सत्य का अभ्यास न करता हो, जिसे परमेश्वर के वचनों का कोई अनुभवजन्य ज्ञान न हो, जिसमें सिर्फ थोड़ी बुद्धि हो, थोड़े गुण हों, और जो सिर्फ सिद्धांतों की बात कर सकता हो, तो परमेश्वर के चुने हुए लोगों को कोई पोषण नहीं मिलेगा और वे बरबाद हो जाएँगे। उस अगुआ का बहन सॉन्ग को पदोन्नत करने के लिए सिद्धांतों के खिलाफ जाना अजीब बात थी, जो भाई-बहनों के उद्धार को प्रभावित कर सकती थी। मैं जानती थी कि मुझे कलीसिया के कार्य की रक्षा और परमेश्वर की इच्छा की परवाह करनी है, और इसकी सूचना उच्च अगुआ को देनी है। बहन सॉन्ग एक अगुआ के रूप में सेवा करने के काबिल नहीं थी—उसे उसके उपयुक्त पद पर होना चाहिए। यह उसके लिए, कलीसिया के कार्य के लिए और सबके जीवन-प्रवेश के लिए अच्छा होगा।

अगली सुबह मैंने अगुआ बहन वांग को पत्र लिखकर मिलने का निवेदन किया। मैंने कहा कि बहन सॉन्ग करीब दस साल से विश्वासी है, इसलिए उसे सत्य के कुछ पहलुओं की समझ जरूर है और वह इस मार्ग पर सधी हुई लगती है। इसलिए तीन साल के लिए बाहरी दुनिया में वापस जाने के लिए एक भी शब्द बोले बिना परमेश्वर को पीछे छोड़ देना उसकी क्षणिक कमजोरी नहीं, बल्कि परमेश्वर के साथ धोखा था, परमेश्वर का गंभीर अपमान था। परमेश्वर की गरिमा है, इंसानों के प्रति उसका प्रेम और उसकी दया सैद्धांतिक है। अगर बहन सॉन्ग ने सच में प्रायश्चित न किया हो, तो पवित्र आत्मा का कार्य पाने के लिए उसे संघर्ष करना होगा। वह कई वर्षों से परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ रही थी, और वह भाई-बहनों के काम या जीवन-प्रवेश में आने वाली समस्याएँ नहीं सुलझा सकती। मैंने कहा कि उसे उस पद पर पदोन्नत करना सिद्धांतों के विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि वे बहन सॉन्ग की पृष्ठभूमि के बारे में नहीं जानतीं, इसलिए वे इस पर गौर करेंगी। करीब 10 दिन बाद बहन वांग ने आकर मेरे साथ संगति की और कहा कि बहन सॉन्ग अपने काम में उत्साही है, इसलिए वह सही व्यक्ति है और उस काम को सँभाल सकती है। उन्होंने कहा कि हमें उसके साथ उचित व्यवहार करना चाहिए। मैंने कहा कि बात यह नहीं है कि हम उसके साथ उचित व्यवहार नहीं कर सकतीं, बल्कि यह है कि सिद्धांतों के पैमाने पर उसे अगुआ नहीं बनाया जाना चाहिए, और उसे उस तरह से पदोन्नत करना गलत था। मेरे साथ काम करने वाली बहन ने भी कहा कि बहन सॉन्ग ने कई वर्षों से परमेश्वर के वचन नहीं पढ़े हैं, और वह दूसरों की वास्तविक समस्याएँ नहीं सुलझा सकती। अगर हम उसे उस पद पर रखने पर अड़ी रहीं, तो इससे दूसरों को नुकसान होगा। लेकिन बहन वांग जोर देती रहीं कि वह सही व्यक्ति है, और उच्च अगुआ को उन्हें पदोन्नत करने का अधिकार है। फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मुझे कुछ और कहना है। मुझे नहीं लगा कि उनकी बातें सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप हैं, लेकिन उन्हें इतनी अडिग देखकर मैं झिझक गई। मैं सोच रही थी कि अगर उच्च अगुआ बहन सॉन्ग को उस काम पर देखना चाहती हैं, और मैं अपना विरोध जताती रही, तो शायद बहन वांग यह सोचें कि मैं घमंडी हूँ और अपना दायरा लाँघ रही हूँ, उनका समर्थन करने से इनकार कर रही हूँ, और अन्यायपूर्ण हूँ। वे मेरे लिए मुश्किल खड़ी कर सकती हैं, मुझे मेरे काम से बरखास्त कर सकती हैं, या मुझे वापस घर भी भेज सकती हैं। अपनी आस्था के कारण कम्युनिस्ट पार्टी से बचकर भाग रही मैं छोड़कर जाने के लिए कहे जाने पर कहाँ जाऊँगी? मुझे लगा, अगर मैंने ज्यादा बात की तो जरूर कोई गलती कर बैठूँगी, बाद में अगर किसी दूसरे ने आपत्ति उठाई, तो मैं बोल सकती हूँ। इसलिए मैंने बहन वांग से कहा कि मैं इसे स्वीकार करूँगी और जो कुछ मैं नहीं समझ पाई हूँ, उस पर विचार करूँगी। लेकिन अगले कुछ दिनों में जब भी मैं सोचती कि मैं खुद को बचाने के लिए किस तरह कपट कर रही हूँ, तो मुझे बहुत ज्यादा अपराध-बोध होता। मैंने लगातार प्रार्थना की।

अपनी खोज में मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश देखा : "ज़्यादातर लोग सत्य का अनुसरण और अभ्यास करना चाहते हैं, लेकिन अधिकतर समय उनके पास ऐसा करने का केवल संकल्प और इच्छा ही होती है; सत्य उनका जीवन नहीं बना है। इसके परिणाम स्वरूप, जब लोगों का बुरी शक्तियों से वास्ता पड़ता है या ऐसे दुष्ट या बुरे लोगों से उनका सामना होता है जो बुरे कामों को अंजाम देते हैं, या जब ऐसे झूठे अगुआओं और मसीह विरोधियों से उनका सामना होता है जो अपना काम इस तरह से करते हैं जिससे सिद्धांतों का उल्लंघन होता है—इस तरह परमेश्वर के घर के कार्य को नुकसान उठाना पड़ता है, और परमेश्वर के चुने गए लोगों को हानि पहुँचती है—वे डटे रहने और खुलकर बोलने का साहस खो देते हैं। जब तुम्हारे अंदर कोई साहस नहीं होता, इसका क्या अर्थ है? क्या इसका अर्थ यह है कि तुम डरपोक हो या कुछ भी बोल पाने में अक्षम हो? या फ़िर यह कि तुम अच्छी तरह नहीं समझते और इसलिए तुम में अपनी बात रखने का आत्मविश्वास नहीं है? इनमें से तो कोई नहीं; बात यह है कि तुम कई प्रकार के भ्रष्ट स्वभावों द्वारा नियंत्रित किये जा रहे हो। इन सभी स्वभावों में से एक है, कुटिलता। तुम यह मानते हुए सबसे पहले अपने बारे में सोचते हो, 'अगर मैंने अपनी बात बोली, तो इससे मुझे क्या फ़ायदा होगा? अगर मैंने अपनी बात बोल कर किसी को नाराज कर दिया, तो हम भविष्य में एक साथ कैसे काम कर सकेंगे?' यह एक कुटिल मानसिकता है, है न? क्या यह एक कुटिल स्वभाव का परिणाम नहीं है? एक अन्‍य स्‍वार्थी और कृपण स्‍वभाव होता है। तुम सोचते हो, 'परमेश्‍वर के घर के हित का नुकसान होता है तो मुझे इससे क्‍या लेना-देना है? मैं क्‍यों परवाह करूँ? इससे मेरा कोई ताल्‍लुक नहीं है। अगर मैं इसे होते देखता और सुनता भी हूँ, तो भी मुझे कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। यह मेरी ज़ि‍म्‍मेदारी नहीं है—मैं कोई अगुआ नहीं हूँ।' इस तरह के विचार और शब्द कोई ऐसी चीजें नहीं हैं जो तुम जान-बूझकर सोचते हो, बल्कि वे तुम्हारे अवचेतन द्वारा उत्पन्न होते हैं—जो कि लोगों द्वारा किसी समस्या का सामना करने पर प्रकट होने वाला शैतानी स्‍वभाव है। इस तरह के भ्रष्ट स्वभाव तुम्हारे सोचने के तरीके को नियंत्रित करते हैं, वे तुम्हारे हाथ-पैर बांध देते हैं और तुम जो कहते हो, उस पर नियंत्रण रखते हैं। कुछ बातें हैं जो तुम कहना चाहते हो, पर तुम्हें संदेह होता है, यहाँ तक कि जब तुम बोलते हो, तब भी तुम घुमा-फिराकर बातें करते हो, और अपने लिए गुंजाइश रखते हो, या फिर तुम हिचकते हो। यह सभी पर स्पष्ट है, फिर भी तुम मन में सोचते हो, 'अच्‍छा है, मैंने बोल लिया। मेरा अन्‍त:करण निश्चिंत हुआ। मैंने अपनी ज़ि‍म्‍मेदारी पूरी कर दी।' सच्चाई यह है कि तुम अपने हृदय में जानते हो कि तुमने वह सब नहीं कहा है जो तुम्‍हें कहना चाहिए, कि तुमने जो कहा है उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और परमेश्‍वर के घर के कार्य का अहित ज्‍यों-का-त्‍यों बना हुआ है। तुमने अपनी ज़ि‍म्‍मेदारी पूरी नहीं की, फिर भी तुम खुल्‍लमखुल्‍ला कहते हो कि तुमने अपनी ज़ि‍म्‍मेदारी पूरी कर दी है, या जो कुछ भी हो रहा था वह तुम्‍हारे लिए स्पष्ट नहीं था। क्या यह सच है? क्या तुम वाकई यही सोचते हो? फिर क्या तुम पूरी तरह अपने शैतानी स्वभावों के काबू में नहीं हो?" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'जो सत्य का अभ्यास करते हैं केवल वही परमेश्वर का भय मानने वाले होते हैं')। परमेश्वर के प्रकाशन से मुझे एहसास हुआ कि सत्य का अभ्यास या कलीसिया के हितों की रक्षा करने में विफल होना पूरी तरह से एक धूर्त, स्वार्थी और नीच प्रकृति का नतीजा है। "हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाये," "जो ज्यादा बोलता है, वह ज्यादा गलतियाँ करता है," "जितनी कम परेशानी, उतना ही बेहतर," और "काउंटी अधिकारी आसपास के लोगों को उस तरह से आदेश नहीं दे सकता जैसे स्थानीय अधिकारी दे सकता है" जैसे शैतानी फलसफे मेरे आदर्श बन गए थे। मैं हर चीज में सिर्फ अपने हितों के बारे में सोचती थी। मैं बिना किसी संदेह के जानती थी कि बहन वांग, बहन सॉन्ग की पदोन्नति के मामले में गलत हैं, इसमें सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ है। लेकिन मुझे डर था कि अगर मैं अपने विचारों पर अड़ी रही, तो मुझे दबा दिया जाएगा, और मेरे लिए कोई रास्ता नहीं होगा। इसलिए मैंने रियायत दी और अपने दिल के खिलाफ जाकर कहा, कि मैं इसे स्वीकार करूँगी और इसे बेहतर ढंग से समझने की कोशिश करूँगी। यूँ लगा जैसे मैं आज्ञाकारी ढंग से अपने कर्तव्य का पालन और सत्य का अभ्यास कर रही हूँ, लेकिन जब मुझे परमेश्वर के घर के लिए आवाज उठाने की जरूरत थी, तो मैंने डरपोक, धूर्त और स्वार्थी बनकर रेत में सिर घुसा लिया। परमेश्वर पवित्र और धार्मिक है, तो फिर मुझ जैसी शैतानी स्वभाव वाली परमेश्वर द्वारा कैसे बचाई जा सकती है? मैंने एक और अंश पढ़ा : "वह मानक क्या है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति के कर्मों का न्याय अच्छे या बुरे के रूप में किया जाता है? यह इस बात पर निर्भर करता है कि अपने विचारों, अभिव्यक्तियों और कार्यों में तुममें सत्य को व्यवहार में लाने और सत्य की वास्तविकता को जीने की गवाही है या नहीं। यदि तुम्हारे पास यह वास्तविकता नहीं है या तुम इसे नहीं जीते, तो इसमें कोई शक नहीं कि तुम कुकर्मी हो। परमेश्वर कुकर्मियों को किस नज़र से देखता है? तुम्हारे विचार और बाहरी कर्म परमेश्वर की गवाही नहीं देते, न ही वे शैतान को शर्मिंदा करते या उसे हरा पाते हैं; बल्कि वे परमेश्वर को शर्मिंदा करते हैं और ऐसे निशानों से भरे पड़े हैं जिनसे परमेश्वर शर्मिंदा होता है। तुम परमेश्वर के लिए गवाही नहीं दे रहे, न ही तुम परमेश्वर के लिये अपने आपको खपा रहे हो, तुम परमेश्वर के प्रति अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को भी पूरा नहीं कर रहे; बल्कि तुम अपने फ़ायदे के लिये काम कर रहे हो। 'अपने फ़ायदे के लिए' से क्या अभिप्राय है? शैतान के लिये काम करना। इसलिये, अंत में परमेश्वर यही कहेगा, 'हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।' परमेश्वर की नज़र में तुमने अच्छे कर्म नहीं किये हैं, बल्कि तुम्हारा व्यवहार दुष्टों वाला हो गया है। परमेश्वर की स्वीकृति पाने के बजाय, तुम तिरस्कृत किए जाओगे। परमेश्वर में ऐसी आस्था रखने वाला इंसान क्या हासिल करने का प्रयास करता है? क्या इस तरह की आस्था अंतत: व्यर्थ नहीं हो जाएगी?" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दो, और तुम सत्य को प्राप्त कर सकते हो')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे समझाया कि परमेश्वर सिर्फ हमारे सतही त्याग और प्रयास नहीं देखता, बल्कि यह देखता है कि हम उसे संतुष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं या नहीं, हमारे पास सत्य का अभ्यास करने की गवाही है या नहीं। अगर मैं बहुत सारे त्याग करती दिखती हूँ, लेकिन मेरे मनसूबे और लक्ष्य मेरे अपने फायदे के लिए हैं, और मैं अभी भी जीवित रहने के लिए भ्रष्ट स्वभाव और शैतान के नियमों से जी रही हूँ, तो मैं अपने काम में परमेश्वर की गवाही नहीं दूँगी, बल्कि वास्तव में शैतान को परमेश्वर को नीचा दिखाने का मौका दूँगी। परमेश्वर की नजरों में यह दुष्कर्म है, और वह इससे घृणा करता है। परमेश्वर इंसान के सतही सदाचार की परवाह नहीं करता। अहम बात है सत्य का अभ्यास करना, सिद्धांत कायम रखना, परमेश्वर के साथ खड़े होना और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करना।

मैंने बाद में परमेश्वर के वचनों का एक दूसरा अंश पढ़ा, जिसने मुझे अभ्यास का एक मार्ग दिखाया। "तुम्हें पता होना चाहिए कि क्या तुम्हारे भीतर सच्चा विश्वास और सच्ची वफादारी है, क्या परमेश्वर के लिए कष्ट उठाने का तुम्हारा कोई इतिहास है, और क्या तुमने परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पण किया है। यदि तुममें इन बातों का अभाव है, तो तुम्हारे भीतर अवज्ञा, धोखा, लालच और शिकायत अभी शेष हैं। चूँकि तुम्हारा हृदय ईमानदार नहीं है, इसलिए तुमने कभी भी परमेश्वर से सकारात्मक स्वीकृति प्राप्त नहीं की है और प्रकाश में जीवन नहीं बिताया है। अंत में किसी व्यक्ति की नियति कैसे काम करती है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या उसके अंदर एक ईमानदार और भावुक हृदय है, और क्या उसके पास एक शुद्ध आत्मा है। यदि तुम ऐसे इंसान हो जो बहुत बेईमान है, जिसका हृदय दुर्भावना से भरा है, जिसकी आत्मा अशुद्ध है, तो तुम अंत में निश्चित रूप से ऐसी जगह जाओगे जहाँ इंसान को दंड दिया जाता है, जैसाकि तुम्हारी नियति में लिखा है। यदि तुम बहुत ईमानदार होने का दावा करते हो, मगर तुमने कभी सत्य के अनुसार कार्य नहीं किया है या सत्य का एक शब्द भी नहीं बोला है, तो क्या तुम तब भी परमेश्वर से पुरस्कृत किए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हो? क्या तुम तब भी परमेश्वर से आशा करते हो कि वह तुम्हें अपनी आँख का तारा समझे? क्या यह सोचने का बेहूदा तरीका नहीं है? तुम हर बात में परमेश्वर को धोखा देते हो; तो परमेश्वर का घर तुम जैसे इंसान को, जिसके हाथ अशुद्ध हैं, जगह कैसे दे सकता है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ')। इससे मुझे यह समझने में मदद मिली कि मेरी मंजिल और परिणाम अच्छा होगा या नहीं, इसका ताल्लुक इससे है कि सत्य के प्रति मेरा रवैया कैसा है, मैं परमेश्वर को अपना सच्चा दिल देती हूँ या नहीं, मैं अपनी कथनी और करनी में ईमानदार हूँ या नहीं। परमेश्वर निष्ठावान है, और आशा करता है कि हम उसके साथ ईमानदारी से पेश आएँ, उसकी इच्छा की परवाह करें, चीजों में अपनी लाभ-हानि का ध्यान न रखें। मैं समझ गई कि परमेश्वर ने मुझे यह समझने का रास्ता दिखाया था कि बहन सॉन्ग की पदोन्नति सिद्धांतों के विरुद्ध थी, लेकिन बहन वांग से एक-दो बार बात करके मैंने देखा कि उन्होंने कितना ज्यादा जोर दिया था कि यह सिद्धांतों के अनुरूप है, और उच्च अगुआ ने भी इसकी स्वीकृति दी थी, इसलिए मैं बस लोगों की राय और रवैये के साथ हो ली। मैंने सोचा, "'काउंटी अधिकारी आसपास के लोगों को उस तरह से आदेश नहीं दे सकता है जैसे स्थानीय अधिकारी दे सकता है।' अगर मैं अपने विचारों पर जोर देती रही, तो हो सकता है, आखिरकार बहन वांग मुझे निकाल बाहर करें और मुझे अपने काम से हाथ धोना पड़े।" मैं बस अपने ही भविष्य के बारे में सोच रही थी। इसलिए जब बहन वांग ने अपनी बात पूरी करके पूछा कि क्या मुझे कुछ और कहना है, तो मैंने तुरंत अपना राग बदल दिया और सारे गलत कारणों से उनके साथ सहमत हो गई, कह दिया कि मैं इसे स्वीकार करूँगी और धीरे-धीरे इसे समझने की कोशिश करूँगी। लेकिन यह धोखा देने के इरादे से लगाया गया एक बिलकुल झूठा मुखौटा था, ताकि मैं खुद को बचा सकूँ। यह सचमुच कपट और धोखा था। अगुआओं का सही चुनाव भाई-बहनों के उद्धार और कलीसिया के कार्य की उचित प्रगति को सीधे प्रभावित करता है। परमेश्वर के घर की कीमत पर अपने हितों की रक्षा करना परमेश्वर के लिए घिनौना काम था। मुझे मालूम था कि अगर मैंने प्रायश्चित नहीं किया तो वह मुझे दंड देगा। सत्य का अभ्यास न करने के नतीजे देखकर मैंने अपने परिणाम के बारे में सोचना छोड़ दिया और इस बारे में उच्च अगुआ से बात करने का फैसला किया। मैंने सोचा, मैं अगर बरखास्त भी हो जाऊँ, तो भी यह परमेश्वर की अनुमति से ही होगा। इसमें मेरे लिए एक सबक होगा, यह परमेश्वर द्वारा मेरी परीक्षा होगी, यह देखने के लिए कि मैं अपने हितों की रक्षा करती हूँ या परमेश्वर के घर के हितों की। मैंने संगति में बताई गई बातें याद कीं, कि सत्य के बारे में सबकी समझ सीमित होती है, और थोड़ी-बहुत समझ होने पर भी हमें सत्य को समझने वाले कुछ दूसरे लोगों से उसकी पुष्टि करनी चाहिए और अपनी गलतियाँ कम करनी चाहिए।

इसलिए मैंने इस बारे में अपने साथ काम कर रही कुछ बहनों के साथ और ज्यादा संगति की, जिससे मुझे यह समझने में मदद मिली कि अगर कोई अगुआ सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाला कोई काम करता है, तो चाहे उसका कोई भी स्तर हो, परमेश्वर के चुने हुए लोग उस पर आपत्ति उठा सकते हैं और सत्य के बारे में संगति कर सकते हैं। अगर मामला फिर भी न सुलझे, तो वे और भी ऊँचे अगुआ से बात करके इसकी सूचना दे सकते हैं। यही परमेश्वर की इच्छा है। लेकिन मैं परमेश्वर की धार्मिकता को नहीं समझ पाई, न ही यह जान पाई कि परेश्वर सभी चीजों को देखता और उन पर राज करता है। मैंने परमेश्वर के घर को बाहरी दुनिया जैसा समझा, सोचा कि मुझे अपने उच्च अगुआओं के सही होने का नाटक करना होगा, अगर मैं उनके साथ नहीं चली, तो मुझे बाहर निकाल दिया जाएगा और शत्रु जैसा बरताव किया जाएगा, वे मुझे खरी-खोटी सुनाएँगे या धक्के मार कर बाहर निकाल देंगे, और मुझे बहुत दुख देंगे। इसलिए मैंने अपनी बात पर अड़े रहने की हिम्मत नहीं की, मैं अपना दायरा लाँघने और अगुआ द्वारा दमन किए जाने से डर गई। मुझे विश्वास नहीं था कि परमेश्वर के घर में सत्य और धार्मिकता का राज चलता है। मुझे परमेश्वर में सच्ची आस्था नहीं थी। मैं अपना काम कर सकती हूँ या नहीं, और मेरा परिणाम और भाग्य क्या होगा, यह सब परमेश्वर के हाथों में है, किसी अगुआ के हाथों में नहीं। अगुआ चाहे जितना भी ऊँचा हो, अगर वह सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और परमेश्वर के घर के कार्य में बाधा डालता है, तो उसे परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा उजागर करके रोका जा सकता है। यह कलीसिया के कार्य को कायम रखना और परमेश्वर की इच्छा की परवाह करना है, दायरा लाँघना नहीं। अगर किसी अगुआ को उजागर करने और उसकी सूचना देने के लिए हमें दमन का सामना करना पड़े, तो यह परमेश्वर की अनुमति से होगा। यह अगुआओं का असली रंग दिखाएगा और हमें बेहतर समझ देगा। हमारी संगति मुझे प्रबुद्ध करने वाली थी, और मेरा डर जाता रहा। सब लोग राजी थे कि बहन सॉन्ग के मसलों की सूचना उच्च अगुआओं को देना जरूरी है। इसलिए सारी बातों को जैसा हमने समझा, ठीक वैसे ही लिख डाला, शपथ ली, दस्तखत किए, और भेज दिया।

रिपोर्ट भेजने के बाद मैंने सुकून महसूस किया। लेकिन एक हफ्ता बीत गया, कोई मामले की छानबीन करने नहीं आया। मैं बेचैन होने लगी। हमारा पत्र किसी अगुआ ने रोक तो नहीं लिया? क्या मैं सचमुच अपने काम से हाथ धोने वाली हूँ? मैंने तुरंत प्रार्थना करके परमेश्वर से विनती की कि मुझे मेरे भविष्य के विचारों में डूबने से रोके। कुछ दिन बाद जो बहन हमारी रिपोर्ट पर कार्रवाई कर रही थीं, वे हमें यह बताने आईं कि उन्होंने सबसे पूछताछ कर ली है, और हमारी सूचना बिलकुल सही है। बहन सॉन्ग को परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ नहीं है जिसे वे साझा कर सकें, और वह समस्याएँ नहीं सुलझा सकती। वह अगुआई के लिए उपयुक्त नहीं है, और उसे बरखास्त कर दिया जाएगा। उसे पदोन्नत करने वाले अगुआ ने बाद में माना कि यह सिद्धांतों के विरुद्ध था, और वे हमारे निरीक्षण को स्वीकार करने, आत्मचिंतन करने और परमेश्वर के सामने प्रायश्चित करने को तैयार थीं।

कुछ दिन बाद बहन वांग हम लोगों के साथ सभा करने आईं, उन्होंने माना कि बहन सॉन्ग के मामले में वे घमंडी और अड़ियल थीं, और सिद्धांतों के विरुद्ध गई थीं। वे प्रायश्चित करना चाहती थीं। चीजों का यह नतीजा निकलता देख मैंने परमेश्वर का हार्दिक धन्यवाद किया और उसकी स्तुति की। मैं समझ गई कि परमेश्वर के घर में सत्य और धार्मिकता का ही राज है। सभी अगुआओं को सत्य के सिद्धांतों का अनुसरण करना होता है, वे उनके विरुद्ध नहीं जा सकते। इससे मुझे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की कुछ सच्ची समझ मिली। मैं यह भी समझ सकी कि सिर्फ ईमानदार बनना, परमेश्वर के वचनों का पालन और सत्य के सिद्धांतों का अनुसरण करना ही परमेश्वर के अनुरूप होना है। मुझे यह अनमोल अनुभव देने के लिए मैं परमेश्वर की आभारी हूँ।

परमेश्वर की ओर से एक आशीर्वाद—पाप से बचने और बिना आंसू और दर्द के एक सुंदर जीवन जीने का मौका पाने के लिए प्रभु की वापसी का स्वागत करना। क्या आप अपने परिवार के साथ यह आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं?

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