क्रूर यातनाओं ने मेरी आस्था को मजबूत किया

24 जनवरी, 2021

2009 की वसंत ऋतु में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने बड़े पैमाने पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सदस्यों की गिरफ्तारी का अभियान चलाया। एक-एक करके पूरे देश में कलीसियाओं के प्रधान अगुआओं को गिरफ्तार करके जेल में ठूँस दिया गया। 4 अप्रैल को रात के करीब 9 बजे मैं और एक बहन, जिसके साथ मैं अपने कर्तव्य निभाने में सहयोग कर रही थी, बहन वांग के घर से निकलकर रास्ते पर जा रहे थे कि अचानक सादे कपड़ों में तीन व्यक्ति लपककर हमारे पीछे आए और बाँहों से पकड़कर हमें जबरन घसीटने लगे, और चिल्लाकर बोले, "चलो! तुम लोग हमारे साथ चल रहे हो!" इससे पहले कि हम कुछ कर पाते, उन्होंने हमें रास्ते पर खड़ी एक काली गाड़ी की पिछली सीट पर पटक दिया। यह बिलकुल वैसे ही हुआ, जैसे फिल्मों मे बदमाश आते हैं और दिन-दहाड़े किसी का अपहरण कर लेते हैं, फर्क सिर इतना था कि अब यह हमारे साथ असलियत में हो रहा था, और बहुत ही खौफनाक था। मैं बुरी तरह डर गई और मन ही मन परमेश्वर को पुकारने लगी : "प्यारे परमेश्वर! मुझे बचा ले! हे परमेश्वर, कृपा कर मुझे बचा ले...।" मैं सँभल भी नहीं पाई थी कि हमारी गाड़ी नगरपालिका के सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो के अहाते में आकर रुकी। तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि हम लोग पुलिस के हत्थे चढ़ गए हैं। तभी वे बहन वांग को भी ले आए। हम तीनों को दूसरी मंजिल के दफ्तर में ले जाया गया। एक अधिकरी ने बिना कोई स्पष्टीकरण दिए हमसे हमारे थैले जब्त कर लिए और हमें दीवार की तरह मुँह करके खड़ा करवा दिया। उसने जबरन हमारे कपड़े उतरवा दिए और हमारी पूरी तलाशी ली। फिर उसने हमसे जबरदस्ती कलीसिया के काम से संबंधित कुछ सामग्री, कलीसिया के पैसे की रसीदें, हमारे मोबाइल फोन, 5,000 से ज्यादा नकदी चीनी मुद्रा, एक बैंक-कार्ड और घड़ी, और साथ ही हमारे पास मौजूद और हमारे थैलों में रखी अन्य निजी वस्तुएँ जब्त कर लीं। जब यह सब चल रहा था, तो सात-आठ पुरुष पुलिस अधिकारी कमरे में आते-जाते रहे और उनमें से दो अधिकारियों ने, जो हम पर निगाह रखे हुए थे, अट्टहास करते हुए मेरी तरफ इशारा किया और कहा, "यह कलीसिया में बहुत अहमियत रखती है, लगता है आज हमने बड़ी मछली पकड़ी है।" उसके फौरन बाद सादी वर्दी पहने चार पुलिस अधिकारियों ने मुझे हथकड़ी लगाई, मेरी आँखें टोप से ढक दीं, और शहर से बहुत दूर स्थित नगरपालिका के सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो की शाखा में ले गए।

जब मैंने पूछताछ-कक्ष में जाकर लोहे की ऊँची, जालीदार खिड़की और वह खौफनाक, ठंडी दिखने वाली टाइगर-कुर्सी देखी, तो मुझे उन भाई-बहनों की भयानक कहानियाँ याद आ गईं, जिन्हें पहले यातनाएँ दी गई थीं। उन अनजान यातनाओं के बारे में सोचकर, जो ये दुष्ट पुलिस अधिकारी मुझे देने वाले थे, मैं बेहद डर गई, और अनजाने ही मेरे हाथ काँपने लगे। ऐसी निराशाजनक स्थिति में मैंने परमेश्वर के इन वचनों के बारे में सोचा : "तुम्हारे दिल में अभी भी डर बैठा हुआ है। तब क्या ऐसा नहीं है कि तुम्हारा दिल अब भी शैतान से आने वाले विचारों से भरा हुआ है?" "एक विजेता क्या है? मसीह के अच्छे सैनिकों को बहादुर होना चाहिए और आध्यात्मिक रूप से मजबूत होने के लिए मुझ पर निर्भर रहना चाहिए; उन्हें योद्धा बनने के लिए लड़ना होगा और शैतान का सामना मौत तक करना होगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 12')। परमेश्वर के वचनों के प्रबोधन ने धीरे-धीरे मेरे भयभीत हृदय को शांत कर दिया और मुझे एहसास कराया कि मेरे भय का स्रोत शैतान में है। मैंने मन ही मन सोचा : "शैतान मेरी देह को यातना देना चाहता है, ताकि मैं उसकी निरंकुशता के आगे हार मान लूँ। लेकिन मैं उसके धोखे से भरे षड्यंत्र में फँस नहीं सकती। परमेश्वर हर समय मेरा पक्का सहारा और शाश्वत आसरा रहेगा। यह एक आध्यात्मिक युद्ध है और यह जरूरी है कि मैं परमेश्वर की गवाही दूँ। मुझे परमेश्वर के साथ खड़ा होना चाहिए, मैं शैतान के आगे नहीं झुक सकती।" इस बात का एहसास होने के बाद मैंने मन ही मन प्रार्थना की : "हे परमेश्वर! तेरे नेक इरादों के कारण ही आज मैं इन दुष्ट पुलिसवालों के हाथ लगी हूँ। लेकिन मेरा आध्यात्मिक कद बहुत ही छोटा है, मैं घबराई हुई और भयभीत हूँ। मैं तुझसे प्रार्थना करती हूँ कि तू मुझे आस्था और हौसला दे, ताकि मैं शैतान के प्रभाव के बंधनों से मुक्त हो सकूँ, उसके आगे न झुकूँ और दृढ़तापूर्वक तेरी गवाही दे सकूँ!" प्रार्थना करने के बाद मेरा दिल हौसले से भर गया, और मुझे उन दुर्जन दिखने वाले दुष्ट पुलिसकर्मियों से उतना भय नहीं लगा।

तभी दो अधिकारियों ने मुझे टाइगर-कुर्सी में धकेल दिया और मेरे हाथों-पैरों में ताले डाल दिए। एक विशालकाय जानवर-से दिखने वाले अधिकारी ने दीवार की तरफ इशारा किया, जिस पर लिखा था "कानून का सभ्य प्रवर्तन", और फिर मेज पर जोर से हाथ मारते हुए चिल्लाया, "तुझे पता है, तू कहाँ है? सार्वजनिक सुरक्षा ब्यूरो चीनी सरकार की एक ऐसी शाखा है, जिसे हिंसा में महारत हासिल है! अगर तूने सब-कुछ साफ-साफ नहीं बताया, तो फिर तेरी खैर नहीं! चल बता! तेरा नाम क्या है? उम्र कितनी है? कहाँ से है? कलीसिया में तेरी हैसियत क्या है?" उसका आक्रामक व्यवहार देखकर मैं गुस्से से तमतमा गई। मैंने सोचा : "ये लोग हमेशा 'जनता की पुलिस' होने और अपना लक्ष्य 'दुष्टों का खात्मा करना और कानून का पालन करने वालों को शांति से रहने देना' होने का दावा करते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि ये लोग ठगों, डाकुओं और अपराध-जगत के हत्यारों का झुंड हैं। ये लोग ऐसे दरिंदे हैं, जो इंसाफ पर आक्रमण करते हैं और नेक व ईमानदार लोगों को दंडित करते हैं! ये पुलिसवाले उन लोगों को नजरंदाज कर देते हैं, जो नियम तोड़ते हैं और अपराध करते हैं, और उन्हें कानून के दायरे से बाहर रहने की छूट देते हैं। जबकि हम लोग सिर्फ परमेश्वर में आस्था रखते हैं, परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं और सही राह पर चलते हैं, इसके बावजूद हम इस वहशी झुंड की हिंसा का निशाना बन गए हैं। सीसीपी सरकार न्याय को पलटने वाली विकृत सरकार है।" हालाँकि मुझे उन दुष्ट पुलिसवालों से घृणा हो गई थी, लेकिन मुझे पता था कि मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, और मैं उनकी क्रूर यातना सह नहीं पाऊँगी। इसलिए मैंने बार-बार परमेश्वर को पुकारते हुए उससे याचना की कि मुझे शक्ति दे। तभी परमेश्वर के इन वचनों ने मुझे प्रबुद्ध किया : "विश्वास एक ही लट्ठे से बने पुल की तरह है: जो लोग घृणास्पद ढंग से जीवन से चिपके रहते हैं उन्हें इसे पार करने में परेशानी होगी, परन्तु जो आत्म बलिदान करने को तैयार रहते हैं, वे बिना किसी फ़िक्र के, मजबूती से कदम रखते हुए उसे पार कर सकते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 6')। परमेश्वर के वचनों की दिलासा और हौसले ने मुझे स्थिर रहने में मदद की, और मैंने मन ही मन सोचा : "आज मुझे सब-कुछ दाँव पर लगाने के लिए तैयार रहना चाहिए—अगर मरने की नौबत आती है, तो वही सही। अगर दरिंदों के इस गिरोह को यह लगता है कि ये लोग मुझसे कलीसिया के पैसे, काम या हमारे अगुआओं के बारे में उगलवा लेंगे, तो ये गलतफहमी में हैं!" बाद में उन दरिंदों ने हर तरह से मुझसे पूछताछ की और मुझसे जानकारी निकलवाने की कोशिश की, लेकिन मैंने अपनी जबान नहीं खोली।

यह देखकर कि मैं जबान नहीं खोल रही हूँ, एक दूसरा अधिकारी गुस्से से भर उठा और जोर से मेज पर हाथ मारकर तेजी से मेरी तरफ बढ़ा और उस टाइगर-कुर्सी को एक लात मारी, जिससे मैं बँधी हुई थी और फिर मेरे सिर को पकड़कर झिंझोड़ते हुए चिल्लाया, "उगल दे, जो कुछ तुझे पता है! यह मत सोच कि हम कुछ नहीं जानते। अगर हमें कुछ पता न होता, तो हम लोग तुम तीनों की सही ठिकाने पर धर-पकड़ कैसे करते?" वह लंबा पुलिसवाला दहाड़ा, "देख, मेरे सब्र का इम्तहान मत ले! अगर हमने तुझे थोड़े-बहुत दर्द का एहसास नहीं कराया, तो तू सोचेगी कि हम तुझे सिर्फ गीदड़-भभकी दे रहे हैं। चल खड़ी हो जा!" इतना कहते ही वह मुझे टाइगर-कुर्सी से घसीटकर खिड़की के नीचे ले गया, जो दीवार में काफी ऊँचाई पर थी और जिसमें लोहे की जालियाँ लगी हुई थीं। उन्होंने मेरे दोनों हाथों में काँटेदार हथकड़ियाँ लगा दीं, उनका एक सिरा मेरे हाथों से बाँध दिया और दूसरा लोहे की जाली से, ताकि मैं सिर्फ हाथों के सहारे खिड़की से लटक जाऊँ और सिर्फ मेरी एड़ियाँ ही जमीन को छू पाएँ। एक दुष्ट पुलिसवाले ने कमरे का एयरकंडीशनर चलाकर कमरे का तापमान कम कर दिया और एक गोल की हुई पत्रिका से मेरे सिर पर जोर से मारा। इसके बावजूद मुझे शांत देखकर वह गुस्से से पागल होकर चीखा : "तू जबान खोलेगी या नहीं? अगर नहीं, तो हम तुझे 'झूला झुलाएँगे'!" इसके बाद उसने एक फौजी-स्तर की पैकिंग बेल्ट मेरे पैरों में बाँध दी और फिर बेल्ट को टाइगर-कुर्सी से बाँध दिया। दो पुलिसवाले टाइगर-कुर्सी को खींचकर दूर ले गए और इस तरह मैं हवा में लटक गई। ऐसी स्थिति में मेरा शरीर आगे की ओर हो गया, हथकड़ियाँ खिसककर मेरी कलाइयों के मुहाने पर आ गईं, जिसके कारण हथकड़ियों के काँटे मेरे हाथों के पिछले हिस्से में गड़ गए। मुझे भयंकर पीड़ा हो रही थी, लेकिन मैंने अपने होठ कसकर काट लिए, ताकि मेरी चीख न निकले और उन दुष्ट पुलिसवालों को मुझ पर हँसने का मौका न मिले। उनमें से एक ने कुटिल मुसकराहट के साथ कहा, "लगता है, इसे दर्द नहीं हो रहा! ला, इसकी चूड़ियाँ थोड़ी और कस दूँ।" यह कहकर उसने अपना पैर उठाया और मेरी पिंडलियों पर चढ़कर मेरे शरीर को दोनों तरफ झुला दिया। इसके कारण मेरी कलाइयों के आसपास और हाथों की पिछली तरफ हथकड़ियाँ और ज्यादा कस गईं। दर्द न सह पाने की वजह से आखिरकार मेरी चीख निकल गई, जिससे वे हँस-हँसकर लोट-पोट हो गए। तब जाकर उसने मेरे पैरों को दबाना बंद किया, जिससे मैं फिर हवा में लटक गई। करीब बीस मिनट बाद उसने अचानक टाइगर-कुर्सी कर्कश ध्वनि के साथ वापस मेरी तरफ धकेल दी, जिससे मेरी चीख निकल गई, क्योंकि मेरा शरीर फिर से दीवार से लटक गया था, सिर्फ मेरी एड़ियाँ जमीन को छू रही थीं। इसके साथ ही हथकड़ियाँ फिर से मेरी कलाइयों में चढ़ गईं। हथकड़ियों के अचानक ढीला पड़ने के कारण खून का बहाव तेजी से हाथों से बाजुओं की तरह जाने लगा, और खून की वापसी के दबाव से टीस के साथ दर्द होने लगा। मेरी पीड़ा देखकर वे कुटिलता से खिलखिलाकर हँसने लगे, और फिर पूछताछ पर उतर आए, "तेरी कलीसिया में कितने लोग हैं? तू पैसा कहाँ रखती है?" उन्होंने मुझसे जो भी सवाल-जवाब किए, मैंने एक का भी उत्तर नहीं दिया, जिससे वे लोग इतने क्रोधित हो गए कि वे मुझे गालियाँ बकने लगे : "कमीनी! तू बहुत ही टेढ़ी खीर है! देखते हैं, तू कब तक टिकती है!" यह कहते हुए उन्होंने टाइगर-कुर्सी फिर से दीवार से दूर खींच ली, और मैं फिर से हवा में लटक गई। इस बार हथकड़ियों ने पहले से ही जख्मी हाथों के पिछले हिस्से को कसकर जकड़ लिया, जिससे मेरे हाथ तेजी से सूज गए और उनमें खून उभर आया, ऐसा लगा जैसे ये अभी फट जाएँगे। दर्द पहली बार से भी ज्यादा तेज था। उन्होंने कैदियों को यातना देने और दंडित करने के अपने "अतीत के गौरवमय शोषण" के कारनामों का एक-दूसरे के सामने विशद चित्रण किया। यह सब पंद्रह मिनट तक चला, फिर उन्होंने लात मारकर कुर्सी को दीवार से झुका दिया और मैं फिर से सीधे खिड़की से लटकने और एड़ियों से जमीन को छू पाने भर की अपनी पुरानी स्थिति में लौट आईं। उनकी इस कारगुजारी के चलते मैं एक बार फिर भयानक पीड़ा से गुजरी। तभी एक नाटे थुलथुल पुरुष अधिकारी ने आकर उनसे पूछा, "इसने कुछ बताया?" दोनों पुलिसवालों ने जवाब दिया, "नहीं, बहुत ही अड़ियल घोड़ी है।" यह सुनकर वह थुलथुल दुष्ट पुलिसवाला मेरे पास आया और उसने मुझे कसकर एक तमाचा मारा, फिर कुटिलता से फुँफकारते हुए बोला, "देखता हूँ, तू कितनी अड़ियल है! ला तेरे हाथ ढीले कर दूँ।" मैंने अपने हाथ देखे, तो उनमें बहुत सूजन आ गई थी और वे काले-नीले पड़ गए थे। तभी उसने मेरी उँगलियाँ पकड़ीं और उन्हें आगे-पीछे हिलाने, मसलने और चिकोटी काटने लगा, और वह ऐसा तब तक करता रहा, जब तक कि मेरी सुन्न पड़ी उँगलियों में फिर से दर्द नहीं होने लगा। उसके बाद उसने मेरी हथकड़ियाँ एकदम कस दीं और उन दो अधिकारियों को मुझे हवा में ऊपर की ओर खींचने का इशारा किया। मैं एक बार फिर हवा में लटक गई। मैं बीस मिनट तक उसी स्थिति में रही, उसके बाद मुझे नीचे किया गया। वे लोग मुझे बार-बार ऊपर-नीचे खींचते-उतारते रहे। मुझे इस ढंग से यातना दी गई कि मैं पीड़ा से बचने के लिए मौत की कामना करने लगी। हथकड़ियाँ जब भी मेरे हाथों में ऊपर-नीचे होतीं, तो पहले से ज्यादा दर्द होता। अंत में हथकड़ियों के काँटे मेरे हाथों के पिछले हिस्से की चमड़ी में घुस गए और बहुत ज्यादा खून बहने लगा। मेरे हाथों में खून का बहाव एकदम रुक गया और वे गुब्बारे की तरह फूल गए। ऑक्सीजन न मिलने के कारण मेरा सिर जोर से चबक-चबक कर रहा था, जैसे अभी फट जाएगा। मुझे वाकई लगा कि मैं मरने वाली हूँ।

जब मुझे लगा कि अब मैं यह सब और नहीं झेल पाऊँगी, तभी मेरे दिमाग में परमेश्वर के वचनों का एक अंश आया : "यरूशलम जाने के मार्ग पर यीशु बहुत संतप्त था, मानो उसके हृदय में कोई चाकू भोंक दिया गया हो, फिर भी उसमें अपने वचन से पीछे हटने की जरा-सी भी इच्छा नहीं थी; एक सामर्थ्यवान ताक़त उसे लगातार उस ओर बढ़ने के लिए बाध्य कर रही थी, जहाँ उसे सलीब पर चढ़ाया जाना था" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें')। परमेश्वर के वचनों ने अचानक मुझे शक्ति दी और मैंने सोचा कि प्रभु यीशु ने किस तरह सलीब पर कष्ट सहा होगा : रोमन सैनिकों ने उसे कोड़े मारे, उसका मजाक उड़ाया, उसे अपमानित किया और बुरी तरह से पीटा। और उसके बाद भी उसे भारी सलीब लेकर चलवाया गया, वही सलीब जिस पर बाद में उसे जिंदा लटकाया गया, जब तक कि उसके शरीर से खून की आखिरी बूँद न निकल गई। कितना क्रूर अत्याचार! कितनी अकल्पनीय पीड़ा! फिर भी प्रभु यीशु ने यह सब चुपचाप बरदाश्त कर लिया। हालाँकि वह भयंकर पीड़ा निश्चित रूप से बयाँ नहीं की जा सकती, लेकिन प्रभु यीशु ने इंसान के छुटकारे की खातिर अपनी इच्छा से स्वयं को शैतान के हवाले किया था। मैंने सोचा : "आज परमेश्वर दूसरी बार देहधारण करके नास्तिक देश चीन में आया है। यहाँ उसने अनुग्रह के युग से भी ज्यादा भयानक खतरों का सामना किया है। जबसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने प्रकट होकर अपना कार्य शुरू किया है, तबसे सीसीपी सरकार ने उसे लांछित करने, उसकी निंदा करने, पागलों की तरह उसका पीछा करके पकड़ने के लिए हर मुमकिन तरीके का इस्तेमाल किया है, और व्यर्थ में उम्मीद लगाए बैठी है कि वह परमेश्वर के कार्य को तबाह कर देगी। अपने दोनों देहधारणों में परमेश्वर ने जितना कष्ट उठाया है, उसकी कल्पना करना भी असंभव है, उसे बरदाश्त करने की तो बात ही क्या है। चूँकि परमेश्वर ने हमारे लिए इतने कष्ट सहे हैं, इसलिए मेरे अंदर अधिक विवेक होना चाहिए; मुझे परमेश्वर को संतुष्टि और सुख देना चाहिए, भले ही मेरी मौत हो जाए।" उस पल मेरे मन में युग-युगांतर के तमाम संतों और नबियों की कड़ी मेहनत कौंध गई: दनिय्येल का शेर की माँद में जाना, पतरस का सूली पर उलटा लटकना, याकूब का सिर धड़ से अलग किया जाना...। बिना किसी अपवाद के इन संतों और नबियों ने मौत के कगार पर पहुँचकर परमेश्वर की शानदार गवाही दी। मुझे एहसास हुआ कि मुझे भी उनकी आस्था, भक्ति और समर्पण का अनुकरण करना चाहिए। इस तरह मैंने परमेश्वर से मन ही मन प्रार्थना की : "प्यारे परमेश्वर! तू पाप-मुक्त है, लेकिन तू हमारे उद्धार के लिए सूली पर चढ़ा। अपना कार्य करने के लिए तूने चीन में देहधाण करके अपना जीवन खतरे में डाला। तेरा प्रेम इतना महान है कि मैं तुझे कभी भी उसका प्रतिदान नहीं दे सकती। तेरे साथ-साथ यातनाएँ झेलना आज मेरे लिए गौरव की बात है। तेरे दिल को सुख देने के लिए मैं गवाही देने को तैयार हूँ। भले ही शैतान मेरी जान ले ले, मैं बिलकुल शिकायत नहीं करूँगी!" परमेश्वर के प्रेम पर ध्यान केंद्रित होने से मेरी शारीरिक पीड़ा काफी हद तक कम हो गई। रात के दूसरे पहर में दुष्ट पुलिसवाले लगातार बारी-बारी से मुझे यातना देते रहे। दूसरे दिन सुबह 9 बजे जाकर उन्होंने मेरे पैर खोले और मुझे खिड़की से लटकता छोड़ दिया। मेरे दोनों हाथ सुन्न हो गए थे, उनमें कोई संवेदना नहीं थी, मेरा पूरा बदन सूज गया था। उस समय वे लोग उस बहन को भी मेरे बगल वाले पूछताछ-कक्ष में ले आए, जिसके साथ मिलकर मैं अपने कर्तव्यों का निर्वाह किया करती थी। अचानक आठ-नौ अधिकारी मेरे पूछताछ-कक्ष में घुस आए, और एक छोटे, थुलथुल पुलिस अधिकारी ने गुस्से से कमरे में आकर मुझसे पूछताछ कर रहे दुष्ट पुलिसवालों से पूछा, "इसने अभी तक अपनी जबान खोली या नहीं?" "नहीं खोली," उन्होंने जवाब दिया। जैसे ही उसने यह जवाब सुना, वह लपककर मेरी तरफ आया और मेरे चेहरे पर तड़ातड़ दो तमाचे मारे और तमतमाकर चिल्लाया, "तू अभी भी हमारा साथ नहीं दे रही है! हमें तेरा नाम पता है, हम यह भी जानते हैं कि तू कलीसिया की अहम अगुआ है। इस गलतफहमी में मत रहना कि हमें कुछ नहीं पता! तूने पैसा कहाँ रखा है?" मुझे चुप देख उसने मुझे धमकी दी, "अगर तूने अपना जुर्म कुबूल नहीं किया, और हमने पता लगा लिया, तो तेरी और भी ज्यादा दुर्गति होगी। कलीसिया में तेरी हैसियत को देखते हुए तू बीस साल के लिए जेल जाएगी!" बाद में उन लोगों ने मेरा बैंक-कार्ड हासिल कर लिया और मुझसे कार्ड पर मेरा नाम और उसका पिन पूछने लगे। मैंने मन में सोचा : "देख लेने दो, क्या फर्क पड़ता है। वैसे भी मेरे घरवालों ने खाते में कुछ ज्यादा पैसे तो डाले नहीं। हो सकता है, देखने के बाद ये लोग मुझे कलीसिया के पैसों के लिए परेशान न करें।" यह सोचकर मैंने उन्हें अपना नाम और पिन नंबर बता दिया।

बाद में मैंने कहा कि मुझे बाथरूम जाना है, तब जाकर उन्होंने मुझे नीचे उतारा। उस समय तक मैं पैरों पर अपना नियंत्रण खो चुकी थी, इसलिए वे खुद मुझे बाथरूम तक ले गए और बाहर चौकसी करते रहे। लेकिन न तो मेरे हाथों में किसी तरह की कोई संवेदना थी, न उन तक मेरे दिमाग की कोई बात पहुँच रही थी, इसलिए मैं बस दीवार से टेक लगाकर खड़ी हो गई, यहाँ तक कि मैं अपनी पैंट उतारने की स्थिति में भी नहीं थी। जब मैं काफी देर बाद भी बाहर नहीं निकली, तो एक दुष्ट पुलिसवाले ने जोर से दरवाजे को धक्का मारा और कामुक मुसकराहट के साथ चिल्लाया, "अभी तक हुआ नहीं क्या?" यह देखकर कि मेरे हाथ काम नहीं कर रहे, उसने मेरी पैंट उतारी और बाथरूम जाने के बाद दोबारा पहना दी। पुरुष अधिकारियों का एक समूह बाथरूम के बाहर इकट्ठा होकर भद्दी फब्तियाँ कसने लगा और गंदी भाषा में मेरा अपमान करने लगा। मेरे जैसी करीब बीस साल की एक मासूम युवा लड़की के बारे में अपमानजनक फब्तियाँ कसने वाले उन ठगों और दुष्टों के अन्याय ने अचानक मुझे व्याकुल कर दिया और मैं रोने लगी। मुझे यह भी खयाल आया कि अगर मेरे हाथों को कहीं सचमुच लकवा मार गया, और आगे चलकर मैं अपनी देखभाल नहीं कर पाई, तो उससे तो बेहतर है कि मुझे मौत ही आ जाए। अगर उस वक्त मैं ठीक से चल पाती, तो मैं उसी समय बिल्डिंग से कूदकर अपनी जान दे देती। अपने सबसे कमजोर पलों में मुझे कलीसिया का "परमेश्वर के महिमा दिवस को देखना मेरी अभिलाषा है" नामक भजन याद आया : "मैं अपना प्यार और अपनी निष्ठा परमेश्वर को अर्पित कर दूँगा और परमेश्वर को महिमान्वित करने के अपने लक्ष्य को पूरा करूँगा। मैं परमेश्वर की गवाही में डटे रहने, और शैतान के आगे कभी हार न मानने के लिये दृढ़निश्चयी हूँ। मेरा सिर फूट सकता है, मेरा लहू बह सकता है, मगर परमेश्वर-जनों का जोश कभी ख़त्म नहीं हो सकता। परमेश्वर के उपदेश दिल में बसते हैं, मैं दुष्ट शैतान को अपमानित करने का निश्चय करता हूँ। पीड़ा और कठिनाइयाँ परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित हैं। मैं मृत्युपर्यंत उसके प्रति वफादार और आज्ञाकारी रहूँगा। मैं फिर कभी परमेश्वर के आँसू बहाने या चिंता करने का कारण नहीं बनूँगा" (मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ)। परमेश्वर की प्रबुद्धता और रोशनी ने मेरे अंदर एक बार फिर आस्था भर दी और मेरी आत्मा को मजबूती मिली। मैंने सोचा : "शैतान की चालाकियाँ मुझे बेवकूफ नहीं बना सकतीं। मुझे इस तरह की बात को लेकर अपनी जान नहीं देनी चाहिए। ये लोग जानबूझकर मेरा अपमान कर रहे हैं और तंज कस रहे हैं, ताकि मैं ऐसा कुछ करूँ जो परमेश्वर को आहत करे और धोखा दे। मेरा जान देना उनके धूर्त षड्यंत्र में फँसने वाली बात होगी। मैं शैतान की साजिश कामयाब नहीं होने दे सकती। अगर मैं सचमुच अपाहिज भी हो जाऊँ, तो भी जब तक मेरे अंदर एक भी साँस बाकी है, मुझे परमेश्वर की गवाही देते रहनी चाहिए।"

जब मैं पूछताछ कक्ष में लौटी, तो थकान के मारे फर्श पर लुढ़क गई। कई पुलिसवाले मुझे घेरकर मुझ पर चिल्लाने लगे, और मुझे खड़े होने का हुक्म देने लगे। उस ठिगने, मोटे अधिकारी ने, जिसने मुझे तमाचे मारे थे, मुझे कसकर लात मारी और कहने लगा कि मैं नाटक कर रही हूँ। उस वक्त मेरा शरीर काँपने लगा, मुझे साँस लेने में दिक्कत होने लगी, और मैं जोर-जोर से साँस लेने लगी। मेरा बायाँ पैर और सीने का बायाँ हिस्सा ऐंठने और एक-दूसरे की ओर सिकुड़ने लगे। मेरा पूरा शरीर ठंडा और सख्त होने लगा, और दो अधिकारियों ने खींचकर मेरे शरीर को सीधा करने की काफी कोशिश की, लेकिन वे लोग मुझे सीधा नहीं कर पाए। मैं मन में जानती थी कि परमेश्वर इस दर्द और तकलीफ के इस्तेमाल से मेरे लिए कोई रास्ता खोल रहा है, वरना वे लोग मुझे लगातार क्रूर यातना देते रहते। मेरी यह विकट स्थिति देखने के बाद ही उन दुष्ट अधिकारियों ने आखिरकार मुझे पीटना बंद किया। उसके बाद उन्होंने मुझे टाइगर-कुर्सी से बाँध दिया और दो अधिकारियों को मुझ पर नजर रखने के लिए छोड़कर, मेरी कलीसिया की बहन को यातना देने के लिए बगल वाले कमरे में चले गए। अपनी बहन की रोंगटे खड़े कर देने वाली लगातार आती चीखें सुनकर मेरा मन तो ऐसा हुआ कि मैं उन दरिंदों पर झपट पड़ूँ और उन्हें मौत के घाट उतार दूँ, लेकिन मौजूदा हालात में मैं थकान से चूर स्थिति में वहीं फर्श पर गिर गई। मैं केवल परमेश्वर से यही प्रार्थना और याचना कर सकती थी कि वह मेरी बहन को शक्ति और सुरक्षा दे, ताकि वह गवाही दे सके। उसी समय मैंने उस नीच और दुष्ट पार्टी को दिल से बददुआ दी, जिसने अपने लोगों को दुखों की गहराइयों में धकेल दिया था, और परमेश्वर से इंसानी शक्ल में मौजूद ऐसे जानवरों को सजा देने की गुहार लगाई। बाद में, मुझे वहाँ पड़े, आखिरी साँसें गिनते देखकर, और यह झमेला न पालने की इच्छा से कि कोई उनकी निगरानी में मर जाए, उन्होंने मुझे अस्पताल भेज दिया। अस्पताल आने के बाद मेरे पैर और सीना फिर से ऐंठने और एक-दूसरे की ओर सिकुड़ने लगे, और मुझे सीधा करने के लिए कई लोगों को मशक्कत करनी पड़ी। मेरे दोनों हाथ गुब्बारे की तरह सूज गए थे और उनमें खून के थक्के बन गए थे। मेरे हाथों में मवाद भर गया था, जिसकी वजह से वे मुझे आईवी नहीं दे पा रहे थे, क्योंकि जैसे ही वे मुझे सुई लगाते, वैसे ही मेरी नसों से खून बहकर आसपास के टिशूज में फैल जाता और इंजेक्शन की जगह से खून निकलने लगता। डॉक्टर ने जब यह देखा, तो वह बोला, "हमें इन हथकड़ियों को निकालना पड़ेगा!" उन्होंने पुलिस को यह भी सुझाव दिया कि आगे की जाँच के लिए मुझे म्युनिसिपल अस्पताल भेज दिया जाए, क्योंकि उसे अंदेशा था कि मुझे हृदय-रोग संबंधी कोई परेशानी हो गई है। वे दुष्ट पुलिसवाले मेरी सहायता के लिए कुछ नहीं करना चाहते थे, लेकिन उसके बाद उन्होंने मुझे हथकड़ी नहीं लगाई। अगले दिन, जो अधिकारी मुझसे पूछताछ कर रहा था, उसने एक कागज पर ईशनिंदा और परमेश्वर को कलंकित करने वाली बातें लिखीं, जिसे वह मेरे मौखिक बयान के तौर पर इस्तेमाल करना चाहता था, और उसने मुझसे कहा कि मैं उस पर हस्ताक्षर करूँ। जब मैंने बयान पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया, तो उसने उत्तेजित होकर मेरा हाथ पकड़ा और बयान पर मेरी उँगलियों की छाप लेने के लिए मुझसे जबरदस्ती करने लगा।

9 अप्रैल की शाम को मंडल निदेशक और दो पुरुष पुलिस अधिकारी मुझे नजरबंदी-गृह लेकर गए। जब नजरबंदी-गृह के डॉक्टर ने देखा कि मेरा पूरा शरीर सूजा हुआ है, और मैं चल भी नहीं पा रही, मेरे बाजुओं में किसी तरह की कोई संवेदना नहीं है, और मेरी हालत बहुत ज्यादा खराब है, तो उन्होंने मुझे भर्ती करने से मना कर दिया, क्योंकि उन्हें मेरी मौत हो जाने का अंदेशा था। उसके बाद मंडल निदेशक ने नजरबंदी-गृह के गवर्नर से एक घंटे तक कुछ सौदेबाजी की और उससे वादा किया कि अगर मुझे कुछ हो गया, तो नजरबंदी-गृह को उसका जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा। तब जाकर गवर्नर मुझे अपने संरक्षण में लेने को तैयार हुआ।

दस से ज्यादा दिनों के बाद दर्जनभर से भी अधिक दुष्ट पुलिसवालों को दूसरे सीमाप्रांतों से अस्थायी तौर पर नजरबंदी-गृह में स्थानांतरित कर दिया गया, ताकि वे लोग पारियों में दिन-रात मुझसे पूछताछ कर सकें। किसी कैदी से पूछताछ करने की एक तय सीमा होती है, लेकिन पुलिस का कहना था कि चूँकि यह एक बड़ा और बहुत ही गंभीर किस्म का महत्वपूर्ण मामला था, इसलिए वे लोग मुझे यूँ ही अकेला नहीं छोड़ सकते। उन्हें डर था कि अगर उन्होंने मुझसे ज्यादा समय तक पूछताछ की, तो मेरी नाजुक हालत को देखते हुए कहीं कोई स्वास्थ्य संबंधी आपातस्थिति न आ जाए, इसलिए वे लोग रात को करीब एक बजे तक ही पूछताछ करते थे और उसके बाद मुझे मेरी जेल की कोठरी में वापस भेज देते थे और अगले दिन सुबह होते ही बुला लेते थे। उन्होंने लगातार तीन दिनों तक मुझसे हर दिन करीब 18 घंटे पूछताछ की। हालाँकि उन्होंने मुझसे हर तरह से पूछताछ की, लेकिन मैंने अपनी जबान नहीं खोली। जब उन्होंने देखा कि उनकी सख्त चालें काम नहीं आ रहीं, तो उन्होंने नर्म रुख अपनाया। वे मेरी चोटों के प्रति चिंता जाहिर करने लगे, मुझे दवा लाकर देते, और मेरे जख्मों पर मरहम लगाते। उनकी अचानक उभर आई "दयालुता" देख मैंने भी यह सोचकर सतर्कता थोड़ी कम कर दी : "अगर मैं इन्हें कलीसिया के बारे में कोई महत्वहीन बात बता दूँ, तो शायद ठीक रहेगा...।" उसी क्षण मेरे मन में परमेश्वर के ये वचन उभरे : "इसके प्रति लापरवाही का रवैया न अपनाओ, बल्कि जब तुम लोगों पर मुसीबत आए तो मेरे और करीब आ जाओ; मेरी ताड़ना को अपमानित करने और शैतान के कुटिल षड्यंत्रों में फँसने से बचने के लिए हर बात में अधिक सावधान और सतर्क रहो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 95')। अचानक मुझे एहसास हुआ कि मैं शैतान की धूर्त चाल में फँस रही हूँ। क्या ये वही लोग नहीं हैं, जो अभी कुछ दिन पहले तक मुझे यातना दे रहे थे? ये लोग अपना बरताव बदल सकते हैं, लेकिन इनकी दुष्ट प्रकृति नहीं बदल सकती—शैतान हमेशा शैतान ही रहता है। परमेश्वर के वचनों ने मुझे इस सच्चाई से रूबरू करा दिया कि ये लोग भेड़ की खाल में भेड़िए हैं और गुप्त मनसूबे पाले हुए हैं। इसलिए ये लोग मुझे जितना चाहें लालच दें या गहन पूछताछ करें, मैं एक शब्द भी नहीं बोलूँगी। उसके फौरन बाद परमेश्वर ने उनकी कलई खोल दी; एक अधिकारी ने, जिसे वे कैप्टन वू कह रहे थे, मुझसे बड़े ही भयावह अंदाज में पूछताछ की : "तू कलीसिया की अगुआ होते हुए भी यह नहीं जानती कि पैसा कहाँ रखा है? अगर तू नहीं बताएगी, तो पता लगाने के हमारे पास और भी तरीके हैं!" एक बूढ़ा, मरियल-सा पुलिस अधिकारी गालियों की बौछार करते हुए चिल्लाया, "कमीनी, हम तुझे उँगली पकड़ा रहे हैं और तू पहुँचा पकड़ रही है! अगर तूने जबान नहीं खोली, तो हम तुझे बाहर ले जाकर फिर से लटका देंगे। देखते हैं, तू कैसे अब भी कलीसिया की वफादार कुतिया बनकर हमसे जानकारी छिपाती है! तेरे जैसी के साथ निपटने के लिए मेरे पास बहुत-से तरीके हैं!" वह इस अंदाज में जितना ज्यादा बोल रहा था, मेरा चुप रहने का निश्चय उतना ही दृढ़ हो रहा था। आखिरकार उत्तेजित होकर उसने मुझे धक्का दिया और बोला, "तेरे इस तरह के बरताव से तो बीस साल की सजा भी तेरे लिए कम है!" यह कहते हुए, कुंठित होकर वह कमरे से बाहर निकल गया। इसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के सार्वजनिक सुरक्षा के प्रांतीय विभाग प्रभारी के यहाँ से एक अधिकारी मुझसे पूछताछ करने के लिए आया। उसने परमेश्वर पर हमला करने और उसका विरोध करने वाली बहुत-सी बातें कहीं और वह लगातार अपने अनुभव और ज्ञान की शेखी बघारता रहा, दूसरे अधिकारी भी उसकी चापलूसी करते रहे। उसके दंभ और आत्म-संतुष्टि की बदसूरती देखकर, सत्य को तोड़ने-मरोड़ने, अफवाह फैलाने, झूठ बोलने और झूठे आरोप मढ़ने वाली बातें सुनकर, मेरे मन में उस अधिकारी के प्रति नफरत और जुगुप्सा दोनों पैदा हो गईं। मैं उसकी शक्ल भी देखना बरदाश्त नहीं कर पा रही थी, इसलिए मैं सीधे अपने सामने वाली दीवार की तरफ देखती रही और मन ही मन उसकी हर बात का खंडन करती रही। उसकी बकवास पूरी सुबह चली और जब वह सब-कुछ कह चुका, तो उसने मेरी राय पूछी। मैंने अधीरता से कहा : "मैं तो अनपढ़ हूँ, इसलिए समझ नहीं पाई कि आप क्या बक-बक कर रहे थे।" यह सुनकर वह उखड़ गया और एक सवाल-जवाब करने वाले अधिकारी से बोला, "यह चिकना घड़ा है। मेरा खयाल है, यह परमेश्वरीकृत होकर बरबाद हो चुकी है!" यह कहते हुए वह कन्नी काटकर खिन्न मन से निकल गया।

जब दुष्ट पुलिस नजरबंदी की मेरी कोठरी में मुझे खींचकर ले गई, और मैंने देखा कि बहन वांग भी उसी कोठरी में है, तो इस दृश्य ने मेरे दिल को स्नेह से भर दिया। मैं समझ गई कि यह परमेश्वर का आयोजन और व्यवस्था है, परमेश्वर का प्रेम मुझे खोज रहा है, और परमेश्वर ने यह सब इसलिए किया है, क्योंकि उस समय मैं अपाहिज अवस्था में थी—मेरी बाँहें और हाथ सूज गए थे और मवाद के कारण फूल गए थे। मेरी उँगलियों में किसी प्रकार की कोई संवेदना नहीं थी, और वे मूली की तरह मोटी होकर कठोर हो गई थीं। मैं अपने पैर हिला नहीं पाती थी और एकदम कमजोर हो गई थी, और मेरा पूरा शरीर दर्द से कराहता था। छह महीनों तक मैं अपने ईंट के बिस्तर से करीब-करीब हिली भी नहीं। उस दौरान मेरी बहन ने हर दिन मेरा खयाल रखा—वो मुझे ब्रश कराती, मेरा मुँह धुलाती, नहलाती, मेरे बाल सँवारती और मुझे खाना खिलाती...। एक महीने बाद मेरी बहन को रिहा कर दिया गया और मुझे सूचित किया गया कि मुझे औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया है। अपनी बहन की रिहाई के बाद, यह सोचकर कि मैं अभी भी इस काबिल नहीं हो पाई हूँ कि अपना ध्यान रख पाऊँ और मुझे इस बात का भी पता नहीं कि मुझे और कितने समय तक जेल में रखा जाएगा, मुझे बहुत ही बेबसी और सूनेपन का एहसास हुआ। मैं परमेश्वर को पुकारने के अलावा कुछ नहीं कर सकती थी : "हे परमेश्वर, मैं अपने आपको एक अपाहिज की तरह महसूस करती हूँ—ऐसा कैसे चल पाएगा? मैं तुझसे अपने दिल की रक्षा के लिए याचना करती हूँ, ताकि मैं इस स्थित पर काबू पा सकूँ।" बेहद उलझन और परेशानी के इन लम्हों में मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : "क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि एक दिन परमेश्वर तुम लोगों को एक बहुत अपरिचित जगह में रखेगा? क्या तुम लोग सोच सकते हो जब मैं तुम लोगों से सब कुछ छीन लूँगा, तो तुम लोगों का क्या होगा? क्या उस दिन तुम लोगों की ऊर्जा वैसी ही होगी जैसी आज है? क्या तुम लोगों की आस्था फिर से प्रकट होगी?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम लोगों को कार्य को समझना चाहिए—भ्रम में अनुसरण मत करो!')। परमेश्वर के वचनों ने किसी चमकते दीपस्तंभ की तरह मेरे दिल को रोशन कर दिया, जिससे मैं परमेश्वर की इच्छा समझ पाई। मैंने सोचा : "मैं जिस परिवेश का सामना कर रही हूँ, वह मेरे लिए एकदम अजनबी है। मेरी आस्था को पूर्ण बनाने के लिए परमेश्वर चाहता है कि मैं इस प्रकार के परिवेश में उसके कार्य का अनुभव करूँ। भले ही मेरी बहन चली गई, लेकिन परमेश्वर तो निश्चित रूप से मेरे साथ है! जब मैं उस मार्ग का विचार करती हूँ जिस पर मैं चली हूँ, तो मैं देखती हूँ कि परमेश्वर ने हर कदम पर मुझे राह दिखाई है! अगर मैं परमेश्वर पर भरोसा करती हूँ, तो ऐसी कोई मुसीबत नहीं, जिससे पार न पाया जा सके।" मैंने देखा कि मेरी आस्था बहुत कम है, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की : "प्यारे परमेश्वर, मैं अपना पूरा अस्तित्व तेरे हाथों में सौंपने और तेरे आयोजनों के प्रति समर्पित होने को तैयार हूँ। भविष्य में मुझे चाहे जैसे हालात का सामना करना पड़े, मैं तेरे प्रति समर्पित हो जाऊँगी और शिकायत नहीं करूँगी।" प्रार्थना करने के बाद मुझे शांति और सुकून का एहसास हुआ। अगले दिन दोपहर को सुधार अधिकारी एक नई कैदी को लेकर आया। जब उस कैदी ने मेरी हालत देखी, तो वह मुझसे बिना कुछ पूछे मेरी देखभाल करने लगी। इस घटना में मुझे परमेश्वर की अद्भुतता और निष्ठा दिखाई दी; परमेश्वर ने मुझे त्यागा नहीं था—स्वर्ग और धरती की सभी चीजें, इंसान के विचारों समेत, परमेश्वर के हाथों में हैं। अगर ये परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्थाएँ न होतीं, तो यह महिला जिससे मैं कभी मिली नहीं, मेरे साथ इतनी भलाई से क्यों पेश आती? उसके बाद मैंने और भी कई बार परमेश्वर के प्रेम के दर्शन किए। नजरबंदी-गृह से उस महिला की रिहाई के बाद परमेश्वर एक के बाद एक महिला को मेरी देखभाल के लिए लाता रहा, जिनसे मैं कभी मिली नहीं थी, और वे भी जाने से पहले मेरी देखभाल की जिम्मेदारी दूसरी कैदी को इस तरह सौंपती रहीं, जैसे कोई रिले-बैटन सौंप रही हों। कुछ कैदी तो ऐसी थीं, जिन्होंने अपनी रिहाई के बाद मेरे खाते में पैसे तक ट्रांसफर कर दिए। इस दौरान हालाँकि मेरा शरीर जरूर थोड़ा-बहुत पीड़ित था, लेकिन मैंने इंसान के लिए परमेश्वर के निष्कपट प्रेम की प्रत्यक्ष अनुभूति की। इंसान चाहे जैसी भी परिस्थिति में फँसा हो, लेकिन परमेश्वर कभी उसका त्याग नहीं करता, बल्कि निरंतर उसकी सहायता करता रहता है। अगर इंसान परमेश्वर में अपनी आस्था न छोड़े, तो वह निश्चित रूप से परमेश्वर के कर्मों की अनुभूति कर पाएगा।

मुझे एक साल तीन महीने नजरबंद रखा गया और फिर मुझ पर "कानून-व्यवस्था में बाधा पहुँचाने के लिए शी जियाओ संगठन में काम करने" का इल्जाम लगाकर तीन साल और छह महीने के लिए जेल में डाल दिया गया। मुझे अपराधी सिद्ध करने के बाद सजा काटने के लिए मेरा तबादला प्रांतीय महिलाओं की जेल में कर दिया गया। जेल में तो हमारे साथ और भी ज्यादा अमानवीय व्यवहार किया जाता था। हमसे हर रोज मजदूरों वाला काम कराया जाता था और प्रतिदिन काम का बोझ इतना ज्यादा होता था कि उसे किसी भी व्यक्ति के लिए पूरा करना संभव नहीं था। लेकिन अगर हम अपना काम पूरा न कर पाते, तो हमें शारीरिक दंड दिया जाता था। हम मजदूरी करके जो भी कमाते थे, वह सीधे-सीधे जेल के सुरक्षा गार्डों की जेबों में चला जाता था। हमें हर महीने कुछ ही युआन कथित गुजारा भत्ते के तौर पर दिए जाते थे। जेल वाले कहते यह थे कि श्रम के जरिये कैदियों को पुनर्शिक्षित किया जा रहा है, जबकि सच्चाई यह थी कि हम लोग उनके लिए सिर्फ पैसा कमाने की मशीन, उनके लिए बेगार करने वाले नौकर थे। दिखाने को तो, कैदियों की सजा कम करने के लिए जेल के नियम कैदियों के हित में थे—कुछ शर्तें पूरी करके कैदी अपनी सजा कम करवाने के पात्र हो सकते थे। लेकिन हकीकत में यह केवल मुखौटा था, सिर्फ दिखाने भर के लिए। वास्तविकता यह थी कि उनकी तथाकथित मानवीय प्रणाली कागज पर लिखे खोखले शब्दों के अलावा कुछ नहीं थी : गार्ड खुद जो हुक्म जारी कर देते थे, बस वही वहाँ का असली कानून होता था। जेल सख्ती से इस बात को देखती थी कि साल भर में सजायाफ्ता कैदियों में कुल कितनी कमी आई है, ताकि मजदूरों की संख्या पर्याप्त बनी रहे और जेल के गार्डों की आमदनी में कोई कमी न आए। सजा में छूट तो श्रम-उत्पादकता बढ़ाने के लिए जेलवालों की एक चाल थी। जेल में सैकड़ों कैदियों में से सजा में छूट केवल दस-एक कैदी ही प्राप्त कर पाते थे, और इसके लिए लोग हाड़-तोड़ मेहनत और एक-दूसरे के खिलाफ साजिशें करते थे। लेकिन, सजा में छूट ज्यादातर उन्हीं कैदियों को मिल पाती थी, जिनकी पुलिस में ऊपर तक पहुँच होती थी और जिन्हें शारीरिक श्रम करना ही नहीं पड़ता था। इस बारे में कैदियों के पास अपनी नाराजगी अपने तक ही सीमित रखने के अलावा और कोई चारा न था। कुछ ने तो इसके विरोध में आत्महत्या तक कर ली थी, लेकिन ऐसा होने के बाद जेल वाले पीड़ित के परिजनों को मनाने के लिए कोई भी कहानी गढ़ लेते थे, इसलिए उनकी मौत बेकार चली जाती थी। जेल के गार्ड हमें कभी इंसान समझते ही नहीं थे; अगर हमें कभी उनसे बात करनी होती थी, तो हमें थोड़ा झुककर या उकड़ूँ बैठकर उनकी ओर देखना होता था, और अगर कोई बात उन्हें नापसंद होती, तो वे लोग हमें भद्दी-भद्दी गालियाँ देते हुए हमारा अपमान करते थे। जब साढ़े तीन साल की लंबी सजा काटने के बाद मैं घर लौटी, तो मुझे एक अस्थि-पिंजर के रूप में देखकर मेरे घरवाले अपनी पीड़ा नहीं छिपा सके। मैं इतनी कमजोर और जर्जर हो गई थी कि पहचान में भी नहीं आ रही थी। उन सबकी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। लेकिन हम सबके दिल परमेश्वर के आभारी थे। हमने परमेश्वर को धन्यवाद दिया कि मैं अभी भी ज़िंदा थी और उसने मेरी रक्षा की, ताकि मैं धरती के उस नरक से जीवित बाहर आ सकूँ।

घर वापस आने के बाद ही मुझे पता चला कि दुष्ट पुलिस घर पर आई थी और उसने पूरे घर की तलाशी ली थी और सब-कुछ बेरहमी से तितर-बितर कर दिया था। मेरे माता-पिता परमेश्वर में आस्था रखते थे, उन्हें भी घर छोड़कर भागना पड़ा था, और सरकार के हाथों गिरफ्तारी से बचने के लिए वे दो साल तक इधर-उधर भागते रहे थे। अंतत: जब वे लोग वापस आए, तो अहाते में खरपतवार भी घर जितनी ऊँची उग आई थी, छत का एक हिस्सा ढह चुका था, पूरे घर की सूरत भयावह हो गई थी। पुलिस ने भी गाँव में हर जगह हमारे बारे में अफवाह फैला दी थी : उन्होंने कहा कि मैंने किसी को धोखा देकर उसके लाखों-करोड़ों रुपए हड़प लिए हैं और मेरे माँ-बाप ने मेरे छोटे भाई को कॉलेज में पढ़ाने के लिए किसी को लाखों रुपए का चूना लगा दिया है। दरिंदों का यह गिरोह पेशेवर अंदाज में सफेद झूठ बोलता था, जिसका कोई मुकाबला नहीं था! जबकि सच्चाई यह है कि मेरे माता-पिता के पलायन कर जाने के बाद मेरे छोटे भाई को अपनी ट्यूशन फीस देने और कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के लिए अपनी स्कॉलरशिप के पैसों का इस्तेमाल करना पड़ा था और कर्ज लेना पड़ा था। और तो और, काम पर घर से दूर जाने के लिए उसे अपनी यात्रा का पैसा इकट्ठा करने हेतु खानदानी फसल का अनाज और नागफनी की फलियाँ बीनकर बेचनी पड़ीं। फिर भी उन दरिंदों ने बेशर्मी से कार्रवाई की, मेरे परिवार पर झूठे आरोप लगाए, और उन अफवाहों ने आज तक हमारा पीछा नहीं छोड़ा। गाँववाले सजायाफ्ता राजनीतिक अपराधी और जालसाज मानकर आज भी मुझे ठुकराते हैं। मुझे वास्तव में शैतानों के गिरोह—सीसीपी से नफरत है!

जब मैं परमेश्वर में अपनी आस्था के उन वर्षों को याद करती हूँ, तो पाती हूँ कि मैंने परमेश्वर के उन वचनों को केवल ही स्वीकार किया था, जिनमें सैद्धांतिक स्तर पर सीसीपी सरकार की शैतानी प्रकृति और सार उजागर होते हैं, लेकिन वास्तव में उन्हें कभी समझी नहीं थी। क्योंकि बचपन से ही मेरे मन में देशभक्तिपूर्ण शिक्षा के सिद्धांत बैठा दिए गए थे, जिन्होंने मुझे प्रतिबंधित कर दिया था और व्यवस्थित रूप से एक खास तरह की सोच में ढाल दिया था, मैं तो यहाँ तक सोचती थी कि परमेश्वर के वचन बढ़ा-चढ़ाकर कहे गए हैं—यह सोचकर कि कम्युनिस्ट पार्टी हमेशा सही है, हमारी सेना देश की रक्षक है, पुलिस समाज में व्याप्त असामाजिक तत्त्वों को सजा देती है, उन्हें मिटाती है और आम जनता के हितों की रक्षा करती है, मैं कभी देशभक्ति का भाव छोड़ नहीं पाई। उन दरिंदों के हाथों यातना का अनुभव करने के बाद ही मैं सीसीपी सरकार का असली चेहरा देख पाई; यह सरकार बेहद धोखेबाज और पाखंडी है, यह बरसों से चीन की जनता और पूरे विश्व की आँखों में धूल झोंकती रही है। यह लगातार आस्था और प्रजातांत्रिक कानूनी अधिकारों की आजादी कायम रखने का दावा करती है, लेकिन सच्चाई यह है कि यह धार्मिक आस्था को बुरी तरह कुचलती है। हकीकत में यह सिर्फ अपनी निरंकुशता, जबरन नियंत्रण और तानाशाही कायम रखती है। भले ही सीसीपी की क्रूर यातनाओं के चलते मेरा शरीर बुरी तरह से जख्मी हो गया था और मैं पीड़ा में थी, कमजोर थी, पर परमेश्वर के वचन मुझे लगातार प्रबुद्ध करते, मुझे आस्था और मजबूती देते, ताकि मैं शैतान की चालें समझ पाऊँ और परमेश्वर की गवाही दे सकूँ। साथ ही, मेरे अंदर परमेश्वर के प्रेम और करुणा की गहरी समझ पैदा हो गई और परमेश्वर का अनुसरण करने की मेरी आस्था और बढ़ गई। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन कहते हैं : "यही समय है : मनुष्य अपनी सभी शक्तियाँ लंबे समय से इकट्ठा करता आ रहा है, उसने इसके लिए सभी प्रयास किए हैं, हर कीमत चुकाई है, ताकि वह इस दानव के घृणित चेहरे से नकाब उतार सके और जो लोग अंधे हो गए हैं, जिन्होंने हर प्रकार की पीड़ा और कठिनाई सही है, उन्हें अपने दर्द से उबरने और इस दुष्ट प्राचीन शैतान से मुँह मोड़ने दे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (8)')। अब मैं कलीसिया में वापस आ गई हूँ और सुसमाचार का प्रचार-प्रसार करके अपना कर्तव्य निभा रही हूँ। परमेश्वर का धन्यवाद!

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